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द्रोण पर्व · अध्याय 89

अर्जुन द्वारा गज-सेना का संहार

अर्जुन कृष्ण से कहते हैं कि वे घोड़ों को दुर्मर्षण की ओर हाँकें, जिससे वे गज-सेना को चीरकर भीतर घुस सकें। भयंकर संग्राम होता है, जिसमें अर्जुन योद्धाओं को सैकड़ों की संख्या में काट डालते हैं; कटे हुए सिरों और अंगों से पृथ्वी पट जाती है और स्तब्ध कौरव सर्वत्र पार्थ को ही देखने लगते हैं। उनकी फुर्ती से शत्रु चकित रह जाते हैं और दुर्योधन की सेना टूटकर, भय से व्याकुल हो भाग खड़ी होती है।

अध्याय 88अध्याय-सूचीअध्याय 90

अर्जुन उवाच

श्लोक 1 (7.89.1)

चोदयाश्वान्हृषीकेश यत्र दुर्मर्षणः स्थितः । एतद्भित्त्वा गजानीकं प्रवेक्ष्याम्यरिवाहिनीम् ॥

codayāśvānhṛṣīkeśa yatra durmarṣaṇaḥ sthitaḥ | etadbhittvā gajānīkaṃ pravekṣyāmyarivāhinīm

"हृषीकेश, घोड़ों को वहाँ ले चलिए जहाँ दुर्मर्षण खड़ा है। इस गज-सेना को भेदकर मैं शत्रु की सेना में प्रवेश करूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 2 (7.89.2)

एवमुक्तो महाबाहुः केशवः सव्यसाचिना । अचोदयद्धयांस्तत्र यत्र दुर्मर्षणः स्थितः ॥

evamukto mahābāhuḥ keśavaḥ savyasācinā | acodayaddhayāṃstatra yatra durmarṣaṇaḥ sthitaḥ

सव्यसाची के ऐसा कहने पर महाबाहु केशव ने घोड़ों को वहीं हाँक दिया जहाँ दुर्मर्षण खड़ा था।

श्लोक 3 (7.89.3)

स सम्प्रहारस्तुमुलः सम्प्रवृत्तः सुदारुणः । एकस्य च बहूनां च रथनागनरक्षयः ॥

sa samprahārastumulaḥ sampravṛttaḥ sudāruṇaḥ | ekasya ca bahūnāṃ ca rathanāganarakṣayaḥ

तब अत्यन्त भयंकर और तुमुल संग्राम छिड़ गया, जिसमें एक अकेला और अनेक योद्धा भिड़ गए, और रथों, हाथियों तथा मनुष्यों का संहार होने लगा।

श्लोक 4 (7.89.4)

ततः सायकवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् । परानवाकिरत्पार्थः पर्वतानिव नीरदः ॥

tataḥ sāyakavarṣeṇa parjanya iva vṛṣṭimān | parānavākiratpārthaḥ parvatāniva nīradaḥ

तब पार्थ ने बाणों की वर्षा से शत्रुओं को ढक दिया, जैसे बरसने वाला बादल पर्वतों को ढक देता है।

श्लोक 5 (7.89.5)

ते चापि रथिनः सर्वे त्वरिताः कृतहस्तवत् । अवाकिरन्बाणजालैस्तत्र कृष्णधनञ्जयौ ॥

te cāpi rathinaḥ sarve tvaritāḥ kṛtahastavat | avākiranbāṇajālaistatra kṛṣṇadhanañjayau

उन सभी रथियों ने भी, जो फुर्तीले और निपुण हाथ वाले थे, वहाँ कृष्ण और धनञ्जय को बाणों के जाल से ढक दिया।

श्लोक 6 (7.89.6)

ततः क्रुद्धो महाबाहुर्वार्यमाणः परैर्युधि । शिरांसि रथिनां पार्थः कायेभ्योऽपाहरच्छरैः ॥

tataḥ kruddho mahābāhurvāryamāṇaḥ parairyudhi | śirāṃsi rathināṃ pārthaḥ kāyebhyo'pāharaccharaiḥ

तब शत्रुओं द्वारा युद्ध में रोके जाने पर महाबाहु पार्थ क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने बाणों से रथियों के सिर उनके धड़ों से अलग कर दिए।

श्लोक 7 (7.89.7)

उद्भ्रान्तनयनैर्वक्रैः सन्दष्टौष्ठपुटैः शुभैः । सकुण्डलशिरस्त्राणैर्वसुधा समकीर्यत ॥

udbhrāntanayanairvakraiḥ sandaṣṭauṣṭhapuṭaiḥ śubhaiḥ | sakuṇḍalaśirastrāṇairvasudhā samakīryata

पृथ्वी पर सुन्दर मुखों के ढेर बिछ गए, जिनकी आँखें घूम रही थीं और होंठ दाँतों से भिंचे थे, और उनके साथ कुण्डलों सहित शिरस्त्राण भी बिखरे थे।

श्लोक 8 (7.89.8)

पुण्डरीकवनानीव विध्वस्तानि समन्ततः । विनिकीर्णानि योधानां वदनानि चकाशिरे ॥

puṇḍarīkavanānīva vidhvastāni samantataḥ | vinikīrṇāni yodhānāṃ vadanāni cakāśire

योद्धाओं के चारों ओर बिखरे हुए मुख उजड़े हुए कमल-वनों के समान जगमगा रहे थे।

श्लोक 9 (7.89.9)

सुवर्णचित्राभरणाः संसिक्ता रुधिरेण च । संसक्ता इव दृश्यन्ते मेघसङ्घाः सविद्युतः ॥

suvarṇacitrābharaṇāḥ saṃsiktā rudhireṇa ca | saṃsaktā iva dṛśyante meghasaṅghāḥ savidyutaḥ

सुनहरे आभूषणों से जगमगाते और रक्त से भीगे हुए वे बिजली से युक्त मेघ-समूहों जैसे दिखाई देते थे।

श्लोक 10 (7.89.10)

शिरसां पततां राजञ्शब्दोऽभूद्वसुधातले । कालेन परिपक्वानां तालानां पततामिव ॥

śirasāṃ patatāṃ rājañśabdo'bhūdvasudhātale | kālena paripakvānāṃ tālānāṃ patatāmiva

हे राजन्, भूमि पर गिरते हुए सिरों की आवाज़ वैसी थी जैसी समय पर पकने वाले ताल-फलों के गिरने की होती है।

श्लोक 11 (7.89.11)

कबन्ध उत्थितः कश्चिद्विष्फार्य सशरं धनुः । किञ्चित्खड्गं विनिष्कृष्य भुजेनोद्यम्य तिष्ठति । गृहीत्वाऽन्यस्य केशेषु शिरो नृत्यति चापरः ॥

kabandha utthitaḥ kaścidviṣphārya saśaraṃ dhanuḥ | kiñcitkhaḍgaṃ viniṣkṛṣya bhujenodyamya tiṣṭhati | gṛhītvā'nyasya keśeṣu śiro nṛtyati cāparaḥ

कोई कबन्ध (सिरकटा धड़) उठ खड़ा हुआ, बाण-सहित धनुष की टंकार करता हुआ, और तलवार को कुछ खींचकर भुजा से ऊपर उठाए खड़ा रहा; और दूसरा किसी अन्य का सिर बालों से पकड़कर नाचने लगा।

श्लोक 12 (7.89.12)

पतितानि न जानन्ति शिरांसि पुरुषर्षभाः । अमृष्यमाणाः सङ्ग्रामे कौन्तेयं जयगृद्धिनः ॥

patitāni na jānanti śirāṃsi puruṣarṣabhāḥ | amṛṣyamāṇāḥ saṅgrāme kaunteyaṃ jayagṛddhinaḥ

वे पुरुषश्रेष्ठ योद्धा, जो युद्ध में कुन्तीपुत्र को सह नहीं पा रहे थे और विजय के लोभी थे, यह नहीं जान पाए कि उनके सिर गिर चुके हैं।

श्लोक 13 (7.89.13)

हयानामुत्तमाङ्गैश्च हस्तिहस्तैश्च मेदिनी । बाहुभिश्च शिरोभिश्च वीराणां समकीर्यत ॥

hayānāmuttamāṅgaiśca hastihastaiśca medinī | bāhubhiśca śirobhiśca vīrāṇāṃ samakīryata

घोड़ों के सिरों, हाथियों की सूँड़ों तथा वीरों की भुजाओं और सिरों से पृथ्वी पट गई।

श्लोक 14 (7.89.14)

अयं पार्थः कुतः पार्थः पार्थोऽयमिति सर्वशः । तिष्ठ पार्थेहि मां पार्थ क्व यासीति च जल्पताम् । तव सैन्येषु योधानां पार्थभूतमिवाभवत् ॥

ayaṃ pārthaḥ kutaḥ pārthaḥ pārtho'yamiti sarvaśaḥ | tiṣṭha pārthehi māṃ pārtha kva yāsīti ca jalpatām | tava sainyeṣu yodhānāṃ pārthabhūtamivābhavat

"यह पार्थ है! पार्थ कहाँ से आया? वह रहा पार्थ!"—इस प्रकार चारों ओर पुकार मच गई; और "ठहरो पार्थ! आओ पार्थ, मुझसे लड़ो! कहाँ जा रहे हो?" ऐसा बकते हुए आपके सैनिकों को सब कुछ पार्थमय ही लगने लगा।

श्लोक 15 (7.89.15)

अन्योन्यमपि चाजघ्नुरात्मानमपि चापरे । पार्थभूतममन्यन्त जनाः कालेन मोहिताः ॥

anyonyamapi cājaghnurātmānamapi cāpare | pārthabhūtamamanyanta janāḥ kālena mohitāḥ

वे एक-दूसरे को मारने लगे, और कुछ तो अपने आपको भी मारने लगे; काल से मोहित हुए लोग सब कुछ पार्थमय समझने लगे।

श्लोक 16 (7.89.16)

निष्टनन्तः सरुधिरा विसंज्ञा गाढवेदनाः । शयाना बहवो वीराः कीर्तयन्तः स्वबान्धवान् ॥

niṣṭanantaḥ sarudhirā visaṃjñā gāḍhavedanāḥ | śayānā bahavo vīrāḥ kīrtayantaḥ svabāndhavān

कराहते, लहूलुहान, अचेत और गहरी पीड़ा में पड़े हुए बहुत-से वीर अपने बन्धुओं के नाम पुकारते हुए लेटे थे।

श्लोक 17 (7.89.17)

सभिण्डिपालाः सप्रासाः सशक्त्यृष्टिपरश्वथाः । सनिर्व्यूहाः सनिस्त्रिंशाः सशरासनतोमराः ॥

sabhiṇḍipālāḥ saprāsāḥ saśaktyṛṣṭiparaśvathāḥ | sanirvyūhāḥ sanistriṃśāḥ saśarāsanatomarāḥ

भिन्दिपाल, प्रास, शक्ति, ऋष्टि और फरसों से युक्त, निर्व्यूह, तलवारों, धनुषों और तोमरों से सज्जित,

श्लोक 18 (7.89.18)

सबाणवर्माभरणाः सगदाः साङ्गदा रणे । महाभुजगसङ्काशा बाहवः परिघोपमाः ॥

sabāṇavarmābharaṇāḥ sagadāḥ sāṅgadā raṇe | mahābhujagasaṅkāśā bāhavaḥ parighopamāḥ

बाणों, कवचों और आभूषणों से युक्त, रणभूमि में गदाओं और बाजूबन्दों सहित, महासर्पों जैसी और लोहे की अर्गलाओं जैसी भुजाएँ,

श्लोक 19 (7.89.19)

उद्वेष्टन्ति विचेष्टन्ति सञ्चेष्टन्ति च सर्वशः । वेगं कुर्वन्ति संरब्धा निकृत्ताः परमेषुभिः ॥

udveṣṭanti viceṣṭanti sañceṣṭanti ca sarvaśaḥ | vegaṃ kurvanti saṃrabdhā nikṛttāḥ parameṣubhiḥ

चारों ओर छटपटाती, ऐंठती और काँपती थीं; उनके उत्तम बाणों से कटी हुई वे क्रोध से भरी हुई-सी वेग से हिलती थीं।

श्लोक 20 (7.89.20)

यो यः स्म समरे पार्थं प्रतिसञ्चरते नरः । तस्यतस्यान्तको बाणः शरीरमुपसर्पति ॥

yo yaḥ sma samare pārthaṃ pratisañcarate naraḥ | tasyatasyāntako bāṇaḥ śarīramupasarpati

रणभूमि में जो-जो मनुष्य पार्थ के सामने बढ़ता, उस-उस के शरीर में यमराज-रूप बाण जा घुसता।

श्लोक 21 (7.89.21)

नृत्यतो रथमार्गेषु धनुर्व्यायच्छतस्तथा । न कश्चित्तत्र पार्थस्य ददृशेऽन्तरमण्वपि ॥

nṛtyato rathamārgeṣu dhanurvyāyacchatastathā | na kaścittatra pārthasya dadṛśe'ntaramaṇvapi

रथ के मार्गों पर नाचते और धनुष खींचते हुए पार्थ में कोई भी वहाँ ज़रा-सा भी छिद्र नहीं देख पाया।

श्लोक 22 (7.89.22)

यत्तस्य घटमानस्य क्षिप्रं विक्षिपतः शरान् । लाघवात्पाण्डुपुत्रस्य व्यस्मयन्त परे जनाः ॥

yattasya ghaṭamānasya kṣipraṃ vikṣipataḥ śarān | lāghavātpāṇḍuputrasya vyasmayanta pare janāḥ

प्रयत्नपूर्वक शीघ्रता से बाण छोड़ते हुए पाण्डुपुत्र की फुर्ती देखकर दूसरे लोग चकित रह गए।

श्लोक 23 (7.89.23)

हस्तिनं हस्तियन्तारमश्वमाश्विकमेव च । अभिनत्फल्गुनो बाणै रथिनं च ससारथिम् ॥

hastinaṃ hastiyantāramaśvamāśvikameva ca | abhinatphalguno bāṇai rathinaṃ ca sasārathim

फल्गुन ने बाणों से हाथी और उसके महावत को, घोड़े और उसके सवार को, तथा रथी को सारथि सहित बींध डाला।

श्लोक 24 (7.89.24)

आवर्तमानमावृत्तं युध्यमानं च पाण्डवः । प्रमुखे तिष्ठमानं च न कञ्चिन्न निहन्ति सः ॥

āvartamānamāvṛttaṃ yudhyamānaṃ ca pāṇḍavaḥ | pramukhe tiṣṭhamānaṃ ca na kañcinna nihanti saḥ

चाहे कोई घूमकर लौटता, लौट चुका होता, लड़ता होता या सामने खड़ा होता, ऐसा कोई नहीं था जिसे पाण्डुपुत्र ने न मारा हो।

श्लोक 25 (7.89.25)

यथोदयन्वै गगने सूर्यो हन्ति महत्तमः । तथाऽर्जुनो गजानीकमवधीत्कङ्कपत्रिभिः ॥

yathodayanvai gagane sūryo hanti mahattamaḥ | tathā'rjuno gajānīkamavadhītkaṅkapatribhiḥ

जैसे आकाश में उदय होता हुआ सूर्य घने अन्धकार का नाश कर देता है, वैसे ही अर्जुन ने कंकपत्र वाले बाणों से गज-सेना का संहार कर दिया।

श्लोक 26 (7.89.26)

हस्तिभिः पतितैर्भिन्नैस्तव सैन्यमदृश्यत । अन्तकाले यथा भूमिर्व्यवकीर्णा महीधरैः ॥

hastibhiḥ patitairbhinnaistava sainyamadṛśyata | antakāle yathā bhūmirvyavakīrṇā mahīdharaiḥ

गिरे और फटे हुए हाथियों से आपकी सेना ऐसी दिखाई देती थी जैसे प्रलय के समय पर्वतों से पटी हुई पृथ्वी।

श्लोक 27 (7.89.27)

यथा मध्यंदिने सूर्यो दुष्प्रेक्ष्यः प्राणिभिः सदा । तथा धनञ्जयः क्रुद्धो दुष्प्रेक्ष्यो युधि शत्रुभिः ॥

yathā madhyaṃdine sūryo duṣprekṣyaḥ prāṇibhiḥ sadā | tathā dhanañjayaḥ kruddho duṣprekṣyo yudhi śatrubhiḥ

जैसे दोपहर का सूर्य प्राणियों के लिए सदा देखना कठिन होता है, वैसे ही क्रुद्ध धनञ्जय युद्ध में शत्रुओं के लिए देखना कठिन थे।

श्लोक 28 (7.89.28)

तत्तथा तव पुत्रस्य सैन्यं युधि परन्तप । प्रभग्नं द्रुतमाविग्नमतीव शरपीडितम् ॥

tattathā tava putrasya sainyaṃ yudhi parantapa | prabhagnaṃ drutamāvignamatīva śarapīḍitam

इस प्रकार, हे शत्रुओं को तपाने वाले, आपके पुत्र की सेना युद्ध में टूट गई, भाग खड़ी हुई, भयभीत हो गई और बाणों से अत्यन्त पीड़ित हुई।

श्लोक 29 (7.89.29)

मारुतेनेव महता मेघानीकं व्यदीर्यत । प्रकाल्यमानं तत्सैन्यं नाशकत्प्रतिवीक्षितुम् ॥

māruteneva mahatā meghānīkaṃ vyadīryata | prakālyamānaṃ tatsainyaṃ nāśakatprativīkṣitum

प्रबल वायु से छिन्न-भिन्न मेघ-समूह की तरह, खदेड़ी जाती हुई वह सेना पीछे मुड़कर देख भी न सकी।

श्लोक 30 (7.89.30)

प्रतोदैश्चापकोटीभिर्हुंकारैः साधुवाहितैः । कशापार्ष्ण्यभिघातैश्च वाग्भिरुग्राभिरेव च ॥

pratodaiścāpakoṭībhirhuṃkāraiḥ sādhuvāhitaiḥ | kaśāpārṣṇyabhighātaiśca vāgbhirugrābhireva ca

अंकुशों, धनुष की नोकों, "हूँ" की हुंकारों, भली-भाँति चलाए गए चाबुकों, एड़ी की ठोकरों और कठोर वचनों से,

श्लोक 31 (7.89.31)

चोदयन्तो हयांस्तूर्णं पलायन्ते स्म तावकाः । सादिनो रथिनश्चैव पत्तयश्चार्जुनार्दिताः ॥

codayanto hayāṃstūrṇaṃ palāyante sma tāvakāḥ | sādino rathinaścaiva pattayaścārjunārditāḥ

अपने घोड़ों को तेज़ी से हाँकते हुए आपके सैनिक भाग खड़े हुए: घुड़सवार, रथी और पैदल, सब अर्जुन से पीड़ित होकर।

श्लोक 32 (7.89.32)

पार्ष्ण्यङ्गुष्ठाङ्कुशैर्नागं चोदयन्तस्तथाऽपरे । शरैः सम्मोहिताश्चान्ये तमेवाभिमुखा ययुः ॥

pārṣṇyaṅguṣṭhāṅkuśairnāgaṃ codayantastathā'pare | śaraiḥ sammohitāścānye tamevābhimukhā yayuḥ

दूसरे लोग एड़ियों, अँगूठों और अंकुशों से हाथियों को हाँकते हुए, और कुछ अन्य बाणों से मोहित होकर, उसी की ओर मुँह किए चले गए।

श्लोक 33 (7.89.33)

तव योधा हतोत्साहा विभ्रान्तमनसस्तदा ॥

tava yodhā hatotsāhā vibhrāntamanasastadā

आपके योद्धाओं ने, जिनका उत्साह नष्ट हो गया था और मन भ्रान्त हो गया था, उस समय ऐसा ही किया।

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