द्रोण पर्व · अध्याय 90
अर्जुन द्वारा दुःशासन की गज-सेना की पराजय
कौरवों की अग्र-सेना के टूट जाने पर धृतराष्ट्र पूछते हैं कि अर्जुन के सामने कौन टिका। सञ्जय बताते हैं कि क्रुद्ध दुःशासन विशाल गज-सेना लेकर अर्जुन पर चढ़ आता है। तूफ़ानी समुद्र में मकर की तरह अर्जुन उस सेना में घुसकर हाथियों और उनकी पीठ पर बैठे योद्धाओं के ढेर लगा देते हैं। सेना के भागने पर अर्जुन दस बाणों से दुःशासन को बींधते हैं और उसे ललकारते हैं; भयभीत और घायल दुःशासन रक्षा के लिए द्रोण की शरण में शकट-व्यूह की ओर भाग जाता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.90.1)
तस्मिन्प्रभग्ने सैन्याग्रे वध्यमाने किरीटिना । के नु तत्र रणे वीराः प्रत्युदीयुर्धनञ्जयम् ॥
tasminprabhagne sainyāgre vadhyamāne kirīṭinā | ke nu tatra raṇe vīrāḥ pratyudīyurdhanañjayam
"जब सेना का अग्रभाग टूट गया और किरीटी द्वारा मारा जा रहा था, तब वहाँ युद्ध में कौन-से वीर धनञ्जय के सामने उठ खड़े हुए?
श्लोक 2 (7.90.2)
आहोस्विच्छकटव्यूहं प्रविष्टा मोघनिश्चयाः । द्रोणमाश्रित्य तिष्ठन्ति प्राकारमकुतोभयाः ॥
āhosvicchakaṭavyūhaṃ praviṣṭā moghaniścayāḥ | droṇamāśritya tiṣṭhanti prākāramakutobhayāḥ
या फिर व्यर्थ संकल्प वाले वे लोग शकट-व्यूह में घुसकर द्रोण को अपना प्राचीर बनाकर निर्भय बने रहे?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (7.90.3)
तथाऽर्जुनेन सम्भग्ने तस्मिंस्तव बलेऽनघ । हतवीरे हतोत्साहे पलायनकृतक्षणे ॥
tathā'rjunena sambhagne tasmiṃstava bale'nagha | hatavīre hatotsāhe palāyanakṛtakṣaṇe
हे निष्पाप, जब अर्जुन के द्वारा आपकी सेना इस प्रकार टूट चुकी थी, उसके वीर मारे गए थे, उत्साह जाता रहा था और वह भागने का अवसर ढूँढ रही थी,
श्लोक 4 (7.90.4)
पाकशासनिनाऽभीक्ष्णं वध्यमाने शरोत्तमैः । न तत्र कश्चित्सङ्ग्रामे शशाकार्जुनमीक्षितुम् ॥
pākaśāsaninā'bhīkṣṇaṃ vadhyamāne śarottamaiḥ | na tatra kaścitsaṅgrāme śaśākārjunamīkṣitum
और पाकशासनि (अर्जुन) के उत्तम बाणों से बार-बार मारी जा रही थी, तब वहाँ युद्ध में कोई अर्जुन की ओर देख भी न सका।
श्लोक 5 (7.90.5)
ततस्तव सुतो राजन्दृष्ट्वा सैन्यं तथागतम् । दुःशासनो भृशं क्रुद्धो युद्धायार्जुनमभ्यगात् ॥
tatastava suto rājandṛṣṭvā sainyaṃ tathāgatam | duḥśāsano bhṛśaṃ kruddho yuddhāyārjunamabhyagāt
तब हे राजन्, आपके पुत्र दुःशासन ने सेना को ऐसी दशा में देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हो अर्जुन से युद्ध करने के लिए धावा बोल दिया।
श्लोक 6 (7.90.6)
सकाञ्चनविचित्रेण कवचेन समावृतः । जाम्बूनदशिरस्त्राणः शूरस्तीव्रपराक्रमः ॥
sakāñcanavicitreṇa kavacena samāvṛtaḥ | jāmbūnadaśirastrāṇaḥ śūrastīvraparākramaḥ
सोने से जड़े विचित्र कवच से ढका हुआ, स्वर्णमय शिरस्त्राण पहने, तीव्र पराक्रम वाला वह शूरवीर,
श्लोक 7 (7.90.7)
नागानीकेन महता ग्रसन्निव महीमिमाम् । दुःशासनो महाराज सव्यसाचिनमावृणोत् ॥
nāgānīkena mahatā grasanniva mahīmimām | duḥśāsano mahārāja savyasācinamāvṛṇot
विशाल गज-सेना के साथ, मानो इस पृथ्वी को ही निगल जाएगा, दुःशासन ने हे महाराज, सव्यसाची को घेर लिया।
श्लोक 8 (7.90.8)
ह्रादेन गजघण्टानां शङ्खानां निनदेन च । ज्याक्षेपनिनदैश्चैव विरावेण च दन्तिनाम् ॥
hrādena gajaghaṇṭānāṃ śaṅkhānāṃ ninadena ca | jyākṣepaninadaiścaiva virāveṇa ca dantinām
हाथियों के घण्टों की ध्वनि, शंखों के नाद, प्रत्यंचाओं की टंकार और हाथियों की चिंघाड़ के साथ,
श्लोक 9 (7.90.9)
भूर्दिशश्चान्तरिक्षं च शब्देनासीत्समावृतम् । युवराजो बलश्लाघी पिङ्गलः प्रियदर्शनः । स मुहूर्तं प्रतिभयो दारुणः समपद्यत ॥
bhūrdiśaścāntarikṣaṃ ca śabdenāsītsamāvṛtam | yuvarājo balaślāghī piṅgalaḥ priyadarśanaḥ | sa muhūrtaṃ pratibhayo dāruṇaḥ samapadyata
पृथ्वी, दिशाएँ और आकाश उस ध्वनि से भर गए। वह युवराज, जो अपने बल पर गर्व करता था, पिंगल वर्ण का और देखने में सुन्दर था; और एक क्षण के लिए वह नाद भयावह और दारुण हो उठा।
श्लोक 10 (7.90.10)
तान्दृष्ट्वा पततस्तूर्णमङ्कुशैरभिचोदितान् । व्यालम्बहस्तान्संरब्धान्सपक्षानिव पर्वतान् ॥
tāndṛṣṭvā patatastūrṇamaṅkuśairabhicoditān | vyālambahastānsaṃrabdhānsapakṣāniva parvatān
अंकुशों से हाँके जाते हुए, क्रोध से भरे, सूँड़ें लटकाए, पंखधारी पर्वतों जैसे उन हाथियों को तेज़ी से आते देखकर,
श्लोक 11 (7.90.11)
सिंहनादेन महता नरसिंहो धनञ्जयः । तदाचलघनप्रख्यं पताकाशतसङ्कुलम् । गजानीकममित्राणामभितो व्यधमच्छरैः ॥
siṃhanādena mahatā narasiṃho dhanañjayaḥ | tadācalaghanaprakhyaṃ patākāśatasaṅkulam | gajānīkamamitrāṇāmabhito vyadhamaccharaiḥ
नरसिंह धनञ्जय ने महान सिंहनाद करके शत्रुओं की उस गज-सेना को, जो पर्वतों के घने समूह जैसी दिखती थी और सैकड़ों पताकाओं से भरी थी, बाणों से चारों ओर छिन्न-भिन्न कर दिया।
श्लोक 12 (7.90.12)
महोर्मिणमिवोद्धूतं श्वसनेन महार्णवम् । किरीटी तद्गजानीकं प्राविशन्मकरो यथा ॥
mahormiṇamivoddhūtaṃ śvasanena mahārṇavam | kirīṭī tadgajānīkaṃ prāviśanmakaro yathā
जैसे हवा से उठी ऊँची लहरों वाले महासागर में मकर घुस जाता है, वैसे ही किरीटी उस गज-सेना में घुस गए।
श्लोक 13 (7.90.13)
खमाश्रित इवादित्यः प्रतपन्स युगक्षये । ददृशे दिक्षु सर्वासु पार्थः परपुरञ्जनः ॥
khamāśrita ivādityaḥ pratapansa yugakṣaye | dadṛśe dikṣu sarvāsu pārthaḥ parapurañjanaḥ
युगान्त के समय आकाश में तपते हुए सूर्य के समान शत्रुओं के नगरों को जीतने वाले पार्थ सभी दिशाओं में दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 14 (7.90.14)
खुरशब्देन चाश्वानां नेमिघोषेण तेन च । तेन चोत्क्रुष्टशब्देन ज्यानिनादेन तेन च ॥
khuraśabdena cāśvānāṃ nemighoṣeṇa tena ca | tena cotkruṣṭaśabdena jyāninādena tena ca
घोड़ों की टापों, पहियों की चालों की घरघराहट, ऊँचे जयघोषों और प्रत्यंचा की टंकार से,
श्लोक 15 (7.90.15)
नानावादित्रशब्देन पाञ्चजन्यस्वनेन च । देवदत्तस्य घोषेण गाण्डीवनिनदेन च । मन्दवेगा नरा नागा बभूवुस्ते विचेतसः ॥
nānāvāditraśabdena pāñcajanyasvanena ca | devadattasya ghoṣeṇa gāṇḍīvaninadena ca | mandavegā narā nāgā babhūvuste vicetasaḥ
अनेक वाद्यों की ध्वनि, पाञ्चजन्य के नाद, देवदत्त के घोष और गाण्डीव की टंकार से मनुष्य और हाथी मन्द वेग वाले हो गए और होश खो बैठे।
श्लोक 16 (7.90.16)
शरैराशीविषस्पर्शैर्निर्भिन्नाः सव्यसाचिना । ते गजाः समसीदन्त मग्नाः पङ्कार्णवेष्विव ॥
śarairāśīviṣasparśairnirbhinnāḥ savyasācinā | te gajāḥ samasīdanta magnāḥ paṅkārṇaveṣviva
सव्यसाची के विषैले सर्पों के स्पर्श जैसे बाणों से बिंधे हुए वे हाथी कीचड़ के समुद्र में धँसे हुए-से बैठ गए।
श्लोक 17 (7.90.17)
युगपच्च समाविष्टैः शरैर्गाण्डीवधन्वनः । अनेकशतसाहस्रैर्द्रुमा मधुकरैरिव । पुङ्खावशिष्टैर्बहुभिः शोणितोत्पीडवाहिभिः ॥
yugapacca samāviṣṭaiḥ śarairgāṇḍīvadhanvanaḥ | anekaśatasāhasrairdrumā madhukarairiva | puṅkhāvaśiṣṭairbahubhiḥ śoṇitotpīḍavāhibhiḥ
गाण्डीवधारी के सैकड़ों-हज़ारों बाण एक साथ उनमें धँस गए थे, जिससे वे मधुमक्खियों से भरे वृक्षों जैसे लगते थे; और अनेक बाण, जिनके केवल पंखयुक्त पिछले सिरे ही बचे थे, रक्त की धाराएँ बहा रहे थे।
श्लोक 18 (7.90.18)
आरावं परमं कृत्वा वध्यमानाः किरीटिना । निपेतुरनिशं भूमौ छिन्नपक्षा इवाद्रयः ॥
ārāvaṃ paramaṃ kṛtvā vadhyamānāḥ kirīṭinā | nipeturaniśaṃ bhūmau chinnapakṣā ivādrayaḥ
किरीटी के हाथों मारे जाते हुए वे भयंकर चीत्कार करके निरन्तर भूमि पर गिरते रहे, मानो पंख कटे पर्वत हों।
श्लोक 19 (7.90.19)
अपरे दन्तवेष्टेषु कुम्भेषु च कटेषु च । शरैः समर्पिता नागाः क्रौञ्चवद्व्यनदन्मुहुः ॥
apare dantaveṣṭeṣu kumbheṣu ca kaṭeṣu ca | śaraiḥ samarpitā nāgāḥ krauñcavadvyanadanmuhuḥ
कुछ दूसरे हाथी, जिनके दाँतों की जड़ों, मस्तकों और पार्श्वों में बाण धँस गए थे, बार-बार क्रौंच पक्षी की तरह चिंघाड़ने लगे।
श्लोक 20 (7.90.20)
गजस्कन्धगतानां च पुरुषाणां किरीटिना । छिद्यन्ते चोत्तमाङ्गानि भल्लैः सन्नतपर्वभिः ॥
gajaskandhagatānāṃ ca puruṣāṇāṃ kirīṭinā | chidyante cottamāṅgāni bhallaiḥ sannataparvabhiḥ
और हाथियों के कन्धों पर बैठे पुरुषों के सिर किरीटी ने चिकनी गाँठ वाले भल्ल बाणों से काट डाले।
श्लोक 21 (7.90.21)
सकुण्डलानां पततां शिरसां धरणीतले । पद्मानामिव सङ्घातैः पार्थश्चक्रे निवेदनम् ॥
sakuṇḍalānāṃ patatāṃ śirasāṃ dharaṇītale | padmānāmiva saṅghātaiḥ pārthaścakre nivedanam
कुण्डलों सहित गिरते हुए सिरों के कमलों जैसे ढेरों से पार्थ ने मानो भूमि पर पूजा-निवेदन कर दिया।
श्लोक 22 (7.90.22)
यन्त्रबद्धा विकवचा व्रणार्ता रुधिरोक्षिताः । भ्रमत्सु युधि नागेषु मनुष्या विललम्बिरे ॥
yantrabaddhā vikavacā vraṇārtā rudhirokṣitāḥ | bhramatsu yudhi nāgeṣu manuṣyā vilalambire
बँधे हुए, कवचहीन, घावों से पीड़ित और रक्त से भीगे हुए मनुष्य युद्ध में चक्कर काटते हुए हाथियों से लटक रहे थे।
श्लोक 23 (7.90.23)
केचिदेकेन बाणेन सुयुक्तेन सुपत्रिणा । द्वौ त्रयश्च विनिर्भिन्ना निपेतुर्धरणीतले ॥
kecidekena bāṇena suyuktena supatriṇā | dvau trayaśca vinirbhinnā nipeturdharaṇītale
कुछ योद्धा, दो-दो, तीन-तीन करके, एक ही भली-भाँति जुड़े हुए पंखदार बाण से बिंधकर भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 24 (7.90.24)
अपरे मदसंरब्धा मातङ्गाः पर्वतोपमाः । सारोहा न्यपतन्भूमौ द्रुमवन्त इवाचलाः ॥
apare madasaṃrabdhā mātaṅgāḥ parvatopamāḥ | sārohā nyapatanbhūmau drumavanta ivācalāḥ
दूसरे पर्वत-जैसे मदमस्त और क्रुद्ध हाथी अपने सवारों सहित भूमि पर गिर पड़े, मानो वृक्षों से लदे पर्वत हों।
श्लोक 25 (7.90.25)
मौर्वीं ध्वजं धनुश्चैव युगमीषां तथैव च । रथिनां कुट्टयामास भल्लैः सन्नतपर्वभिः ॥
maurvīṃ dhvajaṃ dhanuścaiva yugamīṣāṃ tathaiva ca | rathināṃ kuṭṭayāmāsa bhallaiḥ sannataparvabhiḥ
उन्होंने चिकनी गाँठ वाले भल्ल बाणों से रथियों की प्रत्यंचाओं, ध्वजाओं, धनुषों, जुओं और ईषा-दण्डों को चूर-चूर कर दिया।
श्लोक 26 (7.90.26)
न सन्दधन्न चाकर्षन्न विमुञ्चन्न चोद्वहन् । मण्डलेनैव धनुषा नृत्यन्पार्थः स्म दृश्यते ॥
na sandadhanna cākarṣanna vimuñcanna codvahan | maṇḍalenaiva dhanuṣā nṛtyanpārthaḥ sma dṛśyate
न तो वे बाण चढ़ाते दिखाई देते थे, न खींचते, न छोड़ते, न उठाते; पार्थ केवल धनुष को मण्डलाकार घुमाते हुए नाचते दिखाई देते थे।
श्लोक 27 (7.90.27)
अतिविद्धाश्च नाराचैर्वमन्तो रुधिरं मुखैः । मुहूर्तान्न्यपतन्नन्ये वारणा वसुधातले ॥
atividdhāśca nārācairvamanto rudhiraṃ mukhaiḥ | muhūrtānnyapatannanye vāraṇā vasudhātale
दूसरे हाथी नाराच बाणों से गहरे बिंधकर मुँह से रक्त उगलते हुए एक ही क्षण में भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 28 (7.90.28)
उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः । अदृश्यन्त महाराज तस्मिन्परमसङ्कुले ॥
utthitānyagaṇeyāni kabandhāni samantataḥ | adṛśyanta mahārāja tasminparamasaṅkule
हे महाराज, उस अत्यन्त भीड़-भरे संग्राम में चारों ओर असंख्य कबन्ध उठ खड़े दिखाई देने लगे।
श्लोक 29 (7.90.29)
सचापाः साङ्गुलित्राणाः सखड्गाः साङ्गदा रणे । अदृश्यन्त भुजाश्छिन्ना हेमाभरणभूषिताः ॥
sacāpāḥ sāṅgulitrāṇāḥ sakhaḍgāḥ sāṅgadā raṇe | adṛśyanta bhujāśchinnā hemābharaṇabhūṣitāḥ
कटी हुई भुजाएँ दिखाई दे रही थीं, जो सोने के गहनों से सजी थीं और रणभूमि में धनुष, अँगुलित्र, तलवारों तथा बाजूबन्दों से युक्त थीं।
श्लोक 30 (7.90.30)
सूपस्करैरधिष्ठानैरीषादण्डकबन्धुरैः । चक्रैर्विमथितैरक्षैर्भग्नैश्च बहुधा युगैः ॥
sūpaskarairadhiṣṭhānairīṣādaṇḍakabandhuraiḥ | cakrairvimathitairakṣairbhagnaiśca bahudhā yugaiḥ
सब साज-सामान सहित रथ, उनके पटरे और सुन्दर ईषा-दण्ड बिखरे थे; पहिये कुचले हुए, धुरे टूटे हुए और जुए अनेक प्रकार से टूटे पड़े थे;
श्लोक 31 (7.90.31)
चर्मचापधरैश्चैव व्यवकीर्णैस्ततस्ततः । स्रग्भिराभरणैर्वस्त्रैः पतितैश्च महाध्वजैः ॥
carmacāpadharaiścaiva vyavakīrṇaistatastataḥ | sragbhirābharaṇairvastraiḥ patitaiśca mahādhvajaiḥ
इधर-उधर बिखरे हुए ढाल और धनुष धारण करने वाले योद्धा, मालाएँ, आभूषण, वस्त्र और गिरी हुई बड़ी ध्वजाएँ;
श्लोक 32 (7.90.32)
निहतैर्वारणैरश्वैः क्षत्रियैश्च निपातितैः । अदृश्यत मही तत्र दारुणप्रतिदर्शना ॥
nihatairvāraṇairaśvaiḥ kṣatriyaiśca nipātitaiḥ | adṛśyata mahī tatra dāruṇapratidarśanā
मारे गए हाथियों, घोड़ों और गिराए गए क्षत्रियों से वहाँ की भूमि देखने में भयंकर लग रही थी।
श्लोक 33 (7.90.33)
एवं दुःशासनबलं वध्यमानं किरीटिना । सम्प्राद्रवन्महाराज व्यथितं सहनायकम् ॥
evaṃ duḥśāsanabalaṃ vadhyamānaṃ kirīṭinā | samprādravanmahārāja vyathitaṃ sahanāyakam
इस प्रकार किरीटी के हाथों संहार होता देखकर, हे महाराज, दुःशासन की सेना अपने नायकों सहित व्यथित होकर भाग चली।
श्लोक 34 (7.90.34)
एवं बले द्रुते याते राजपुत्रं महारथम् । विव्याध दशभिर्बाणैस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
evaṃ bale drute yāte rājaputraṃ mahāratham | vivyādha daśabhirbāṇaistiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
इस प्रकार सेना के भाग जाने पर उन्होंने उस महारथी राजकुमार को दस बाणों से बींध डाला और कहा, "ठहर, ठहर!"
अर्जुन उवाच
श्लोक 35 (7.90.35)
जीवितेन कथं गन्ता दुरुक्तं यावदद्य ते । तद्वाक्यसदृशं कर्म कुरु त्वं यदि मन्यसे ॥
jīvitena kathaṃ gantā duruktaṃ yāvadadya te | tadvākyasadṛśaṃ karma kuru tvaṃ yadi manyase
"आज जो कठोर वचन तूने कहे हैं, उनके बाद तू जीवित कैसे जाएगा? यदि तुझमें साहस है तो अपने उन वचनों के अनुरूप ही अब काम कर।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 36 (7.90.36)
एवमुक्त्वा ततो राजा पार्थः पार्थिवमर्दनः । भृशं क्रुद्धो महाराज अविध्यत्तनयं तव ॥
evamuktvā tato rājā pārthaḥ pārthivamardanaḥ | bhṛśaṃ kruddho mahārāja avidhyattanayaṃ tava
ऐसा कहकर राजाओं का मर्दन करने वाले राजा पार्थ ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर, हे महाराज, आपके पुत्र को बींध डाला।
श्लोक 37 (7.90.37)
ततो दुःशासनस्त्रस्तः सहानीकः शरार्दितः । द्रोणं त्रातारमाकाङ्क्षञ्शकटव्यूहमभ्यगात् ॥
tato duḥśāsanastrastaḥ sahānīkaḥ śarārditaḥ | droṇaṃ trātāramākāṅkṣañśakaṭavyūhamabhyagāt
तब भयभीत और बाणों से पीड़ित दुःशासन अपनी सेना सहित रक्षक के रूप में द्रोण की कामना करता हुआ शकट-व्यूह की ओर चला गया।