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द्रोण पर्व · अध्याय 91

अर्जुन का द्रोण से आशीर्वाद माँगना और उन्हें छोड़कर आगे बढ़ना

दुःशासन की सेना को तोड़कर अर्जुन व्यूह के मुख पर खड़े द्रोण के पास पहुँचते हैं और व्यूह में प्रवेश तथा जयद्रथ-वध के लिए उनसे आशीर्वाद माँगते हैं। द्रोण उत्तर देते हैं कि मुझे जीते बिना जयद्रथ को जीतना सम्भव नहीं; फिर लम्बा द्वन्द्व होता है, जिसमें आचार्य अर्जुन की प्रत्यंचा काट देते हैं और उन्हें बाणों से ढक देते हैं, जबकि अर्जुन के असंख्य बाण द्रोण की सेना का संहार करते हैं। कृष्ण के कहने पर अर्जुन द्रोण की प्रदक्षिणा करके यह कहते हुए आगे बढ़ जाते हैं कि मैं शिष्य हूँ, शत्रु नहीं; पाञ्चाल चक्ररक्षक उनके पीछे चलते हैं, और जय, कृतवर्मा, श्रुतायु, काम्भोज तथा उनके साथी उन्हें रोकने के लिए घेर लेते हैं।

अध्याय 90अध्याय-सूचीअध्याय 92

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.91.1)

दुःशासनबलं हत्वा सव्यसाची महारथः । सिन्धुराजं परीप्सन्वै द्रोणानीकमुपाद्रवत् ॥

duḥśāsanabalaṃ hatvā savyasācī mahārathaḥ | sindhurājaṃ parīpsanvai droṇānīkamupādravat

दुःशासन की सेना का संहार करके महारथी सव्यसाची अर्जुन सिन्धुराज जयद्रथ को पा लेने की इच्छा से द्रोण की सेना की ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 2 (7.91.2)

स तु द्रोणं समासाद्य व्यूहस्य प्रमुखे स्थितम् । कृताञ्जलिरिदं वाक्यं कृष्णस्यानुमतेऽब्रवीत् ॥

sa tu droṇaṃ samāsādya vyūhasya pramukhe sthitam | kṛtāñjaliridaṃ vākyaṃ kṛṣṇasyānumate'bravīt

व्यूह के अग्रभाग में खड़े द्रोण के पास पहुँचकर उन्होंने हाथ जोड़े और कृष्ण की सम्मति से ये वचन कहे।

अर्जुन उवाच

श्लोक 3 (7.91.3)

शिवेन ध्याहि मां ब्रह्मन्स्वस्ति चैव वदस्व मे । भवत्प्रसादादिच्छामि प्रवेष्टं दुर्भिदां चमूम् ॥

śivena dhyāhi māṃ brahmansvasti caiva vadasva me | bhavatprasādādicchāmi praveṣṭaṃ durbhidāṃ camūm

"ब्राह्मण! कल्याणकारी भाव से मेरा ध्यान कीजिए और मुझे मंगल का आशीर्वाद दीजिए। आपकी कृपा से मैं इस दुर्भेद्य सेना में प्रवेश करना चाहता हूँ।"

श्लोक 4 (7.91.4)

भवान्पितृसमो मह्यं धर्मराजसमोऽपि च । धौम्यकृष्णसमश्चैव सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

bhavānpitṛsamo mahyaṃ dharmarājasamo'pi ca | dhaumyakṛṣṇasamaścaiva satyametadbravīmi te

"आप मेरे लिए पिता के समान हैं, धर्मराज युधिष्ठिर के समान हैं और धौम्य तथा कृष्ण के भी समान हैं। यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ।"

श्लोक 5 (7.91.5)

अश्वत्थामा यथा तात रक्षणीयस्त्वयाऽनघ । तथाऽहमपि ते रक्ष्यः सदैव द्विजसत्तम ॥

aśvatthāmā yathā tāta rakṣaṇīyastvayā'nagha | tathā'hamapi te rakṣyaḥ sadaiva dvijasattama

"निष्पाप तात! द्विजश्रेष्ठ! जैसे आपको अश्वत्थामा की रक्षा करनी चाहिए, वैसे ही आपको सदा मेरी भी रक्षा करनी चाहिए।"

श्लोक 6 (7.91.6)

तव प्रसादादिच्छेयं सिन्धुराजानमाहवे । निहन्तुं द्विपदां श्रेष्ठ प्रतिज्ञां रक्ष मे प्रभो ॥

tava prasādādiccheyaṃ sindhurājānamāhave | nihantuṃ dvipadāṃ śreṣṭha pratijñāṃ rakṣa me prabho

"आपकी कृपा से मैं युद्ध में सिन्धुराज को मारना चाहता हूँ। हे नरश्रेष्ठ! हे प्रभो! मेरी प्रतिज्ञा की रक्षा कीजिए।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 7 (7.91.7)

एवमुक्तस्तदाऽऽचार्यः प्रत्युवाच स्मयन्निव । मामजित्वा न बीभत्सो शक्यो जेतुं जयद्रथः ॥

evamuktastadā''cāryaḥ pratyuvāca smayanniva | māmajitvā na bībhatso śakyo jetuṃ jayadrathaḥ

ऐसा कहे जाने पर आचार्य ने मानो मुस्कराते हुए उत्तर दिया, "बीभत्सु! मुझे जीते बिना तुम जयद्रथ को नहीं जीत सकते।"

श्लोक 8 (7.91.8)

एतावदुक्त्वा तं द्रोणः शरव्रातैरवाकिरत् । सरथाश्वध्वजं तीक्ष्णैः प्रहसन्वै ससारथिम् ॥

etāvaduktvā taṃ droṇaḥ śaravrātairavākirat | sarathāśvadhvajaṃ tīkṣṇaiḥ prahasanvai sasārathim

इतना कहकर द्रोण ने हँसते हुए तीखे बाणों की झड़ी से अर्जुन को रथ, घोड़ों, ध्वज और सारथि सहित ढक दिया।

श्लोक 9 (7.91.9)

ततोऽर्जुनः शरव्रातान्द्रोणस्यावार्य सायकैः । द्रोणमभ्यर्दयद्बाणैर्घोररूपैर्महत्तरैः ॥

tato'rjunaḥ śaravrātāndroṇasyāvārya sāyakaiḥ | droṇamabhyardayadbāṇairghorarūpairmahattaraiḥ

तब अर्जुन ने अपने बाणों से द्रोण की बाण-वर्षा को रोककर और भी भारी, भयंकर बाणों से द्रोण को पीड़ित किया।

श्लोक 10 (7.91.10)

विव्याध च रणे द्रोणमनुमान्य विशाम्पते । क्षत्रधर्मं समास्थाय नवभिः सायकैः पुनः ॥

vivyādha ca raṇe droṇamanumānya viśāmpate | kṣatradharmaṃ samāsthāya navabhiḥ sāyakaiḥ punaḥ

हे राजन्! पहले उनका सम्मान करके अर्जुन ने क्षत्रिय-धर्म का आश्रय लिया और युद्ध में फिर नौ बाणों से द्रोण को बींध दिया।

श्लोक 11 (7.91.11)

तस्येषूनिषुभिश्छित्त्वा द्रोणो विव्याध तावुभौ । विषाग्निज्वलितप्रख्यैरिषुभिः कृष्णपाण्डवौ ॥

tasyeṣūniṣubhiśchittvā droṇo vivyādha tāvubhau | viṣāgnijvalitaprakhyairiṣubhiḥ kṛṣṇapāṇḍavau

द्रोण ने अपने बाणों से उनके बाणों को काटकर विष और अग्नि के समान जलते बाणों से कृष्ण और अर्जुन दोनों को बींध दिया।

श्लोक 12 (7.91.12)

इयेष पाण्डवस्तस्य बाणैश्छेत्तुं शरासनम् । तस्य चिन्तयतस्त्वेव फल्गुनस्य महात्मनः ॥

iyeṣa pāṇḍavastasya bāṇaiśchettuṃ śarāsanam | tasya cintayatastveva phalgunasya mahātmanaḥ

पाण्डव अर्जुन अपने बाणों से द्रोण का धनुष काट डालना चाहते थे; और महात्मा फल्गुन जब इसी विचार में थे,

श्लोक 13 (7.91.13)

द्रोणः शरैरसम्भ्रान्तो ज्यां चिच्छेदाशु वीर्यवान् । विव्याध च हयानस्य ध्वजं सारथिमेव च ॥

droṇaḥ śarairasambhrānto jyāṃ cicchedāśu vīryavān | vivyādha ca hayānasya dhvajaṃ sārathimeva ca

तभी निश्चिन्त और पराक्रमी द्रोण ने बाणों से उनकी प्रत्यंचा झट काट दी और उनके घोड़ों, ध्वज तथा सारथि को भी बींध दिया।

श्लोक 14 (7.91.14)

अर्जुनं च शरैर्वीरः स्मयमानोऽभ्यवाकिरत् । एतस्मिन्नन्तरे पार्थः सज्यं कृत्वा महद्धनुः ॥

arjunaṃ ca śarairvīraḥ smayamāno'bhyavākirat | etasminnantare pārthaḥ sajyaṃ kṛtvā mahaddhanuḥ

उस वीर ने मुस्कराते हुए अर्जुन पर भी बाणों की वर्षा की। इसी बीच पार्थ ने एक विशाल धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर

श्लोक 15 (7.91.15)

विशेषयिष्यन्नाचार्यं सर्वास्त्रविदुषां वरः । मुमोच षट्शतान्बाणान्गृहीत्वैकमिव द्रुतम् ॥

viśeṣayiṣyannācāryaṃ sarvāstraviduṣāṃ varaḥ | mumoca ṣaṭśatānbāṇāngṛhītvaikamiva drutam

सब अस्त्र जानने वालों में श्रेष्ठ अर्जुन ने आचार्य से बढ़ जाने की इच्छा से छह सौ बाण इतनी शीघ्रता से छोड़े कि वे मानो एक ही बाण को लेकर छोड़े गए हों।

श्लोक 16 (7.91.16)

पुनः सप्तशतानन्यान्सहस्रं चानिवर्तिनः । चिक्षेपायुतशश्चान्यांस्तेऽघ्नन्द्रोणस्य तां चमूम् ॥

punaḥ saptaśatānanyānsahasraṃ cānivartinaḥ | cikṣepāyutaśaścānyāṃste'ghnandroṇasya tāṃ camūm

फिर उन्होंने सात सौ और बाण छोड़े, फिर एक हज़ार ऐसे बाण जो कभी लौटते नहीं थे, और फिर दस-दस हज़ार करके दूसरे बाण छोड़े; उन्होंने द्रोण की उस सेना को मार गिराया।

श्लोक 17 (7.91.17)

तैः सम्यगस्तैर्बलिना कृतिना चित्रयोधिना । मनुष्यवाजिमातङ्गा विद्धाः पेतुर्गतासवः ॥

taiḥ samyagastairbalinā kṛtinā citrayodhinā | manuṣyavājimātaṅgā viddhāḥ peturgatāsavaḥ

उस बलवान्, कुशल और विचित्र युद्ध करने वाले वीर द्वारा भली-भाँति छोड़े गए उन बाणों से बिंधे हुए मनुष्य, घोड़े और हाथी प्राणहीन होकर गिर पड़े।

श्लोक 18 (7.91.18)

विसूताश्वध्वजाः पेतुः सञ्छिन्नायुधजीविताः । रथिनो रथमुख्येभ्यः सहसा शरपीडिताः ॥

visūtāśvadhvajāḥ petuḥ sañchinnāyudhajīvitāḥ | rathino rathamukhyebhyaḥ sahasā śarapīḍitāḥ

सारथि, घोड़े और ध्वज से रहित रथी, जिनके शस्त्र और प्राण टूट चुके थे, बाणों से पीड़ित होकर अपने श्रेष्ठ रथों से सहसा गिर पड़े।

श्लोक 19 (7.91.19)

चूर्णिताक्षिप्तदग्धानां वज्रानिलहुताशनैः । तुल्यरूपा गजाः पेतुर्गिर्यग्राम्बुदवेश्मनाम् ॥

cūrṇitākṣiptadagdhānāṃ vajrānilahutāśanaiḥ | tulyarūpā gajāḥ peturgiryagrāmbudaveśmanām

पर्वत-शिखरों, मेघों और भवनों जैसे हाथी ऐसे गिरे मानो वज्र से कुचले गए हों, वायु से उड़ाकर फेंके गए हों और अग्नि से जलाए गए हों।

श्लोक 20 (7.91.20)

पेतुरश्वसहस्राणि प्रहतान्यर्जुनेषुभिः । हंसा हिमवतः पृष्ठे वारिविप्रहता इव ॥

peturaśvasahasrāṇi prahatānyarjuneṣubhiḥ | haṃsā himavataḥ pṛṣṭhe vāriviprahatā iva

अर्जुन के बाणों से मारे गए हज़ारों घोड़े ऐसे गिरे, जैसे हिमालय की ढलान पर जल की मार से हंस गिर पड़ते हैं।

श्लोक 21 (7.91.21)

रथाश्वद्विपपत्त्योघाः सलिलौघा इवाद्भुताः । युगान्तादित्यरश्म्याभैः पाण्डवास्त्रशरैर्हताः ॥

rathāśvadvipapattyoghāḥ salilaughā ivādbhutāḥ | yugāntādityaraśmyābhaiḥ pāṇḍavāstraśarairhatāḥ

रथों, घोड़ों, हाथियों और पैदलों के समूह, जो जल-प्रवाहों के समान अद्भुत थे, युगान्त के सूर्य की किरणों जैसे पाण्डव के बाणों से नष्ट हो गए।

श्लोक 22 (7.91.22)

तं पाण्डवादित्यशरांशुजालं । कुरुप्रवीरान्युधि निष्टपन्तम् । स द्रोणमेघः शरवृष्टिवेगैः । प्राच्छादयन्मेघ इवार्करश्मीन् ॥

taṃ pāṇḍavādityaśarāṃśujālaṃ | kurupravīrānyudhi niṣṭapantam | sa droṇameghaḥ śaravṛṣṭivegaiḥ | prācchādayanmegha ivārkaraśmīn

जैसे मेघ सूर्य की किरणों को ढक लेता है, वैसे ही उस द्रोण-रूपी मेघ ने बाणों की वर्षा के वेग से उस पाण्डव-रूपी सूर्य को, जो अपनी बाण-किरणों के जाल से युद्ध में कुरुओं के प्रमुख वीरों को तपा रहा था, ढक लिया।

श्लोक 23 (7.91.23)

अथात्यर्थं विसृष्टेन द्विषतामसुभोजिना । आजघ्ने वक्षसि द्रोणो नाराचेन धनञ्जयम् ॥

athātyarthaṃ visṛṣṭena dviṣatāmasubhojinā | ājaghne vakṣasi droṇo nārācena dhanañjayam

तब द्रोण ने शत्रुओं के प्राण पीने वाले, बड़े वेग से छोड़े गए एक नाराच बाण से धनञ्जय की छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 24 (7.91.24)

स विह्वलितसर्वाङ्गः क्षितिकम्पे यथाऽचलः । धैर्यमालम्ब्य बीभत्सुर्द्रोणं विव्याध पत्रिभिः ॥

sa vihvalitasarvāṅgaḥ kṣitikampe yathā'calaḥ | dhairyamālambya bībhatsurdroṇaṃ vivyādha patribhiḥ

भूकम्प में पर्वत की तरह जिनका सारा शरीर काँप उठा था, उन बीभत्सु ने धैर्य धारण करके द्रोण को पंखदार बाणों से बींध दिया।

श्लोक 25 (7.91.25)

द्रोणस्तु पञ्चभिर्बाणैर्वासुदेवमताडयत् । अर्जुनं च त्रिसप्तत्या ध्वजं चास्य त्रिभिः शरैः ॥

droṇastu pañcabhirbāṇairvāsudevamatāḍayat | arjunaṃ ca trisaptatyā dhvajaṃ cāsya tribhiḥ śaraiḥ

द्रोण ने पाँच बाणों से वासुदेव को, तिहत्तर से अर्जुन को और तीन बाणों से अर्जुन की ध्वजा को मारा।

श्लोक 26 (7.91.26)

विशेषयिष्यञ्शिष्यं च द्रोणो राजन्पराक्रमी । अदृश्यमर्जुनं चक्रे निमेषाच्छरवृष्टिभिः ॥

viśeṣayiṣyañśiṣyaṃ ca droṇo rājanparākramī | adṛśyamarjunaṃ cakre nimeṣāccharavṛṣṭibhiḥ

हे राजन्! अपने शिष्य से बढ़ जाने की इच्छा से पराक्रमी द्रोण ने बाणों की वर्षा से पल भर में अर्जुन को अदृश्य कर दिया।

श्लोक 27 (7.91.27)

प्रसक्तान्पततोऽद्राक्ष्म भारद्वाजस्य सायकान् । मण्डलीकृतमेवास्य धनुश्चादृश्यताद्भुतम् ॥

prasaktānpatato'drākṣma bhāradvājasya sāyakān | maṇḍalīkṛtamevāsya dhanuścādṛśyatādbhutam

हमने भारद्वाज-पुत्र द्रोण के बाणों को निरन्तर और घने गिरते देखा, और गोलाकार खिंचा हुआ उनका धनुष अद्भुत दिखाई दे रहा था।

श्लोक 28 (7.91.28)

तेऽभ्ययुः समरे राजन्वासुदेवधनञ्जयौ । द्रोणसृष्टाः सुबहवः कङ्कपत्रपरिच्छदाः ॥

te'bhyayuḥ samare rājanvāsudevadhanañjayau | droṇasṛṣṭāḥ subahavaḥ kaṅkapatraparicchadāḥ

हे राजन्! द्रोण के छोड़े हुए, कंक-पंखों से सजे बहुत-से बाण उस युद्ध में वासुदेव और धनञ्जय पर जा पड़े।

श्लोक 29 (7.91.29)

तत्राद्भुतमपश्याम शिलानामिव सर्पणम् । यद्द्रोणं तरसा पार्थो वृद्धं बालोऽपि नातरत् ॥

tatrādbhutamapaśyāma śilānāmiva sarpaṇam | yaddroṇaṃ tarasā pārtho vṛddhaṃ bālo'pi nātarat

वहाँ हमने ऐसा आश्चर्य देखा मानो शिलाएँ रेंग रही हों: युवा पार्थ भी वृद्ध द्रोण को बल से पार न कर सके।

श्लोक 30 (7.91.30)

चिन्तयामास वार्ष्णेयो दृष्ट्वा द्रोणस्य विक्रमम् । नातिवर्तिष्यते ह्येनं वेलामिव महार्णवः ॥

cintayāmāsa vārṣṇeyo dṛṣṭvā droṇasya vikramam | nātivartiṣyate hyenaṃ velāmiva mahārṇavaḥ

द्रोण का पराक्रम देखकर वृष्णिवंशी कृष्ण ने सोचा, "जैसे महासागर अपने तट को नहीं लाँघता, वैसे ही अर्जुन इन द्रोण को नहीं लाँघ सकेगा।"

श्लोक 31 (7.91.31)

ततः पार्थं समुद्विग्नं लक्ष्य चिन्तयतेऽच्युतः । द्रोणस्य चापि विक्रान्तं दृष्ट्वा मधुनिषूदनः । इत्यब्रवीद्वासुदेवो धनञ्जयमुदारधीः ॥

tataḥ pārthaṃ samudvignaṃ lakṣya cintayate'cyutaḥ | droṇasya cāpi vikrāntaṃ dṛṣṭvā madhuniṣūdanaḥ | ityabravīdvāsudevo dhanañjayamudāradhīḥ

तब अच्युत ने पार्थ को उद्विग्न देखा और द्रोण का पराक्रम भी देखा; मधुसूदन ने विचार किया, और उदार बुद्धि वासुदेव ने धनञ्जय से यह कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 32 (7.91.32)

पार्थपार्थ महाबाहो न नः कालात्ययो भवेत् । द्रोणमुत्सृज्य गच्छामो ब्राह्मणोऽसौ गतक्लमः ॥

pārthapārtha mahābāho na naḥ kālātyayo bhavet | droṇamutsṛjya gacchāmo brāhmaṇo'sau gataklamaḥ

"पार्थ! पार्थ! महाबाहो! हमारा समय व्यर्थ न जाए। द्रोण को छोड़कर आगे चलें; यह ब्राह्मण थका नहीं है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 33 (7.91.33)

पार्थश्चाप्यब्रवीत्कृष्णं यथेष्टमिति केशवम् ॥

pārthaścāpyabravītkṛṣṇaṃ yatheṣṭamiti keśavam

और पार्थ ने केशव कृष्ण से कहा, "जैसी आपकी इच्छा।"

श्लोक 34 (7.91.34)

ततः प्रदक्षिणं कृत्वा द्रोणं प्रायान्महाभुजम् । परिवृत्तश्च बीभत्सुरगच्छद्विसृजञ्शरान् ॥

tataḥ pradakṣiṇaṃ kṛtvā droṇaṃ prāyānmahābhujam | parivṛttaśca bībhatsuragacchadvisṛjañśarān

तब महाबाहु द्रोण की प्रदक्षिणा करके अर्जुन आगे चल पड़े, और मुड़ते हुए बाण बरसाते हुए आगे बढ़ते गए।

श्लोक 35 (7.91.35)

ततोऽब्रवीत्स्वयं द्रोणः क्वेदं पाण्डव गम्यते । ननु नाम रणे शत्रुमजित्वा न निवर्तसे ॥

tato'bravītsvayaṃ droṇaḥ kvedaṃ pāṇḍava gamyate | nanu nāma raṇe śatrumajitvā na nivartase

तब द्रोण ने स्वयं कहा, "पाण्डव! तुम कहाँ जा रहे हो? तुम तो युद्ध में शत्रु को जीते बिना लौटते नहीं हो न?"

अर्जुन उवाच

श्लोक 36 (7.91.36)

गुरुर्भवान्न मे शत्रुः शिष्यः पुत्रसमोऽस्मि ते । न चास्ति स पुमाँल्लोके यस्त्वां युधि पराजयेत् ॥

gururbhavānna me śatruḥ śiṣyaḥ putrasamo'smi te | na cāsti sa pumām̐lloke yastvāṃ yudhi parājayet

"आप मेरे गुरु हैं, मेरे शत्रु नहीं; मैं आपका शिष्य हूँ, पुत्र के समान हूँ। और संसार में ऐसा कोई पुरुष नहीं जो युद्ध में आपको हरा सके।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 37 (7.91.37)

एवं ब्रुवाणो बीभत्सुर्जयद्रथवधोत्सुकः । त्वरायुक्तो महाबाहुस्त्वत्सैन्यं समुपाद्रवत् ॥

evaṃ bruvāṇo bībhatsurjayadrathavadhotsukaḥ | tvarāyukto mahābāhustvatsainyaṃ samupādravat

यह कहते हुए जयद्रथ के वध के लिए उत्सुक महाबाहु बीभत्सु शीघ्रता से आपकी सेना पर टूट पड़े।

श्लोक 38 (7.91.38)

तं चक्ररक्षौ पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ । अन्वयातां महात्मानौ विशन्तं तावकं बलम् ॥

taṃ cakrarakṣau pāñcālyau yudhāmanyūttamaujasau | anvayātāṃ mahātmānau viśantaṃ tāvakaṃ balam

उनके रथ के पहियों की रक्षा करने वाले दोनों महात्मा पाञ्चाल, युधामन्यु और उत्तमौजा, आपकी सेना में घुसते हुए उनके पीछे चले।

श्लोक 39 (7.91.39)

ततो जयो महाराज कृतवर्मा च सात्वतः । काम्भोजश्च श्रुतायुश्च धनञ्जयमवारयन् ॥

tato jayo mahārāja kṛtavarmā ca sātvataḥ | kāmbhojaśca śrutāyuśca dhanañjayamavārayan

तब, हे महाराज! जय, सात्वत कृतवर्मा, काम्भोज और श्रुतायु ने धनञ्जय को रोक लिया।

श्लोक 40 (7.91.40)

तेषां दशसहस्राणि रथानामनुयायिनाम् । अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः ॥

teṣāṃ daśasahasrāṇi rathānāmanuyāyinām | abhīṣāhāḥ śūrasenāḥ śibayo'tha vasātayaḥ

उनके साथ उनके अनुयायियों के दस हज़ार रथ थे: अभीषाह, शूरसेन, शिबि और वसाति,

श्लोक 41 (7.91.41)

मावेल्लका ललित्थाश्च केकया मद्रकास्तथा । नारायणाश्च गोपालाः काम्भोजानां च ये गणाः ॥

māvellakā lalitthāśca kekayā madrakāstathā | nārāyaṇāśca gopālāḥ kāmbhojānāṃ ca ye gaṇāḥ

मावेल्लक, ललित्थ, केकय और मद्रक, नारायण और गोपाल, तथा काम्भोजों के जो गण थे,

श्लोक 42 (7.91.42)

कर्णेन विजिताः पूर्वं सङ्ग्रामे शूरसम्मताः । भारद्वाजं पुरस्कृत्य हृष्टात्मानोऽर्जुनं प्रति ॥

karṇena vijitāḥ pūrvaṃ saṅgrāme śūrasammatāḥ | bhāradvājaṃ puraskṛtya hṛṣṭātmāno'rjunaṃ prati

वे शूरों में गिने जाने वाले योद्धा, जिन्हें पहले कर्ण ने युद्ध में जीता था, प्रसन्न चित्त होकर द्रोण को आगे करके अर्जुन के सामने आए।

श्लोक 43 (7.91.43)

पुत्रशोकाभिसन्तप्तं क्रुद्धं मृत्युमिवान्तकम् । त्यजन्तं तुमुले प्राणान्सन्नद्धं चित्रयोधिनम् ॥

putraśokābhisantaptaṃ kruddhaṃ mṛtyumivāntakam | tyajantaṃ tumule prāṇānsannaddhaṃ citrayodhinam

वे उन अर्जुन को, जो पुत्र के शोक से जल रहे थे, अन्तक यमराज की तरह क्रुद्ध थे, उस घमासान में प्राण तक त्यागने को तैयार थे, कवच बाँधे हुए थे और विचित्र ढंग से लड़ते थे,

श्लोक 44 (7.91.44)

गाहमानमनीकानि मातङ्गमिव यूथपम् । महेष्वासं पराक्रान्तं नरव्याघ्रमवारयन् ॥

gāhamānamanīkāni mātaṅgamiva yūthapam | maheṣvāsaṃ parākrāntaṃ naravyāghramavārayan

सेनाओं में यूथपति हाथी की तरह घुसते हुए उन महान् धनुर्धर, पराक्रमी नरव्याघ्र को रोकने लगे।

श्लोक 45 (7.91.45)

ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । अन्योन्यं वै प्रार्थयतां योधानामर्जुनस्य च ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tumulaṃ romaharṣaṇam | anyonyaṃ vai prārthayatāṃ yodhānāmarjunasya ca

तब रोंगटे खड़े कर देने वाला भयंकर युद्ध छिड़ गया, उन योद्धाओं का, जो एक-दूसरे को चाहते थे, और अर्जुन का।

श्लोक 46 (7.91.46)

जयद्रथवधप्रेप्सुमायान्तं पुरुषर्षभम् । न्यवारयन्त सहिताः क्रिया व्याधिमिवोत्थितं ॥

jayadrathavadhaprepsumāyāntaṃ puruṣarṣabham | nyavārayanta sahitāḥ kriyā vyādhimivotthitaṃ

जयद्रथ को मारने की इच्छा से आते हुए उस पुरुषश्रेष्ठ को उन्होंने मिलकर रोका, जैसे उपचार उभरे हुए रोग को रोकता है।

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