द्रोण पर्व · अध्याय 93
अर्जुन द्वारा श्रुतायु, अश्रुतायु और अम्बष्ठ का वध
सुदक्षिण और श्रुतायुध के मारे जाने पर कौरव-सैनिक अर्जुन पर टूट पड़ते हैं, और अर्जुन उन्हें बिखेर देते हैं। श्रुतायु और अश्रुतायु उन्हें घायल करके मूर्छित कर देते हैं; होश में आकर अर्जुन इन्द्रास्त्र प्रकट करते हैं और उन दोनों को, फिर उनके पुत्रों को मार डालते हैं, और अङ्ग, कलिङ्ग, द्रविड़, यवन, शक आदि म्लेच्छों की हाथियों पर सवार सेनाओं को रक्त की नदी बहाते हुए नष्ट कर देते हैं। तब गदा से केशव पर प्रहार करने वाला अम्बष्ठ मारा जाता है और कौरव-सेना टूट जाती है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.93.1)
हते सुदक्षिणे राजन्वीरे चैव श्रुतायुधे । जवेनाभ्यद्रवन्पार्थं कुपिताः सैनिकास्तव ॥
hate sudakṣiṇe rājanvīre caiva śrutāyudhe | javenābhyadravanpārthaṃ kupitāḥ sainikāstava
हे राजन्! सुदक्षिण और वीर श्रुतायुध के मारे जाने पर आपके क्रुद्ध सैनिक वेग से पार्थ पर टूट पड़े।
श्लोक 2 (7.93.2)
अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः । अभ्यवर्षंस्ततो राजञ्शरवर्षैर्धनञ्जयम् ॥
abhīṣāhāḥ śūrasenāḥ śibayo'tha vasātayaḥ | abhyavarṣaṃstato rājañśaravarṣairdhanañjayam
हे राजन्! तब अभीषाह, शूरसेन, शिबि और वसाति योद्धाओं ने धनञ्जय पर बाणों की वर्षा की।
श्लोक 3 (7.93.3)
तेषां षष्टिशतानन्यान्प्रामथ्नात्पाण्डवः शरैः । ते स्म भीताः पलायन्ते व्याघ्रात्क्षुद्रमृगा इव ॥
teṣāṃ ṣaṣṭiśatānanyānprāmathnātpāṇḍavaḥ śaraiḥ | te sma bhītāḥ palāyante vyāghrātkṣudramṛgā iva
पाण्डव ने उनमें से छह हज़ार और योद्धाओं को बाणों से कुचल डाला। वे डरकर इस प्रकार भागे जैसे बाघ से छोटे मृग भागते हैं।
श्लोक 4 (7.93.4)
ते निवृत्ताः पुनः पार्थं सर्वतः पर्यवारयन् । रणे सपत्नान्निघ्नन्तं जिगीषन्तं परान्युधि ॥
te nivṛttāḥ punaḥ pārthaṃ sarvataḥ paryavārayan | raṇe sapatnānnighnantaṃ jigīṣantaṃ parānyudhi
वे लौटकर फिर चारों ओर से पार्थ को घेरने लगे, जो रण में शत्रुओं को मार रहे थे और युद्ध में विपक्षियों को जीतना चाहते थे।
श्लोक 5 (7.93.5)
तेषामापततां तूर्णं गाण्डीवप्रेषितैः शरैः । शिरांसि पातयामास बाहूंश्चापि धनञ्जयः ॥
teṣāmāpatatāṃ tūrṇaṃ gāṇḍīvapreṣitaiḥ śaraiḥ | śirāṃsi pātayāmāsa bāhūṃścāpi dhanañjayaḥ
उनके तेज़ी से झपटते ही धनञ्जय ने गाण्डीव से छोड़े हुए बाणों से उनके सिर गिरा दिए, और भुजाएँ भी।
श्लोक 6 (7.93.6)
शिरोभिः पातितैस्तत्र भूमिरासीन्निरन्तरा । अभ्रच्छायेव चैवासीद्ध्वाङ्क्षगृध्रबलैर्युधि ॥
śirobhiḥ pātitaistatra bhūmirāsīnnirantarā | abhracchāyeva caivāsīddhvāṅkṣagṛdhrabalairyudhi
गिरे हुए सिरों से वहाँ की भूमि पट गई, कहीं खाली स्थान नहीं रहा; और रणभूमि कौओं और गिद्धों के झुण्डों से मानो बादलों की छाया से ढक गई।
श्लोक 7 (7.93.7)
तेषु तूत्साद्यमानेषु क्रोधामर्षसमन्वितौ । श्रुतायुश्चाश्रुतायुश्च धनञ्जयमयुध्यताम् ॥
teṣu tūtsādyamāneṣu krodhāmarṣasamanvitau | śrutāyuścāśrutāyuśca dhanañjayamayudhyatām
जब वे इस प्रकार काटे जा रहे थे, तब क्रोध और अमर्ष से भरे श्रुतायु और अश्रुतायु धनञ्जय से युद्ध करने लगे।
श्लोक 8 (7.93.8)
बलिनौ स्पर्धिनौ वीरौ कुलजौ बाहुशालिनौ । तावेनं शरवर्षाणि सव्यदक्षिणमस्यताम् ॥
balinau spardhinau vīrau kulajau bāhuśālinau | tāvenaṃ śaravarṣāṇi savyadakṣiṇamasyatām
वे दोनों वीर बलवान्, परस्पर स्पर्धा रखने वाले, उत्तम कुल में उत्पन्न और बाहुबल से सम्पन्न थे; वे उस पर बायीं और दायीं ओर से बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 9 (7.93.9)
त्वरायुक्तौ महाराज प्रार्थयानौ महद्यशः । अर्जुनस्य वधप्रेप्सू पुत्रार्थे तव धन्विनौ ॥
tvarāyuktau mahārāja prārthayānau mahadyaśaḥ | arjunasya vadhaprepsū putrārthe tava dhanvinau
हे महाराज! वे दोनों धनुर्धर उतावले थे, बड़े यश की कामना करते थे और आपके पुत्र के लिए अर्जुन का वध करना चाहते थे।
श्लोक 10 (7.93.10)
तावर्जुनं सहस्रेण पत्रिणां नतपर्वणाम् । पूरयामासतुः क्रुद्धौ तटाकं जलदौ यथा ॥
tāvarjunaṃ sahasreṇa patriṇāṃ nataparvaṇām | pūrayāmāsatuḥ kruddhau taṭākaṃ jaladau yathā
उन दोनों क्रुद्ध वीरों ने झुकी हुई गाँठों वाले एक सहस्र पंखदार बाणों से अर्जुन को भर दिया, जैसे दो मेघ किसी तालाब को भर देते हैं।
श्लोक 11 (7.93.11)
श्रुतायुश्च ततः क्रुद्धस्तोमरेण धनञ्जयम् । आजघान रथश्रेष्ठः पीतेन निशितेन च ॥
śrutāyuśca tataḥ kruddhastomareṇa dhanañjayam | ājaghāna rathaśreṣṭhaḥ pītena niśitena ca
तब क्रोध में भरे रथश्रेष्ठ श्रुतायु ने पीले रंग के तीखे तोमर से धनञ्जय पर प्रहार किया।
श्लोक 12 (7.93.12)
सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुकर्शनः । जगाम परमं मोहं मोहयन्केशवं रणे ॥
so'tividdho balavatā śatruṇā śatrukarśanaḥ | jagāma paramaṃ mohaṃ mohayankeśavaṃ raṇe
बलवान् शत्रु के द्वारा गहरे बिंध जाने पर शत्रुओं को सताने वाले अर्जुन गहरी मूर्छा में चले गए और रणभूमि में केशव को भी मोह में डाल दिया।
श्लोक 13 (7.93.13)
एतस्मिन्नेव काले तु सोऽश्रुतायुर्महारथः । शूलेन भृशतीक्ष्णेन ताडयामास पाण्डवम् ॥
etasminneva kāle tu so'śrutāyurmahārathaḥ | śūlena bhṛśatīkṣṇena tāḍayāmāsa pāṇḍavam
ठीक उसी समय महारथी अश्रुतायु ने अत्यन्त तीखे शूल से पाण्डव पर प्रहार किया।
श्लोक 14 (7.93.14)
क्षते क्षारं स हि ददौ पाण्डवस्य महात्मनः । पार्थोऽपि भृशसंविद्धो ध्वजयष्टिं समाश्रितः ॥
kṣate kṣāraṃ sa hi dadau pāṇḍavasya mahātmanaḥ | pārtho'pi bhṛśasaṃviddho dhvajayaṣṭiṃ samāśritaḥ
मानो उसने महात्मा पाण्डव के घाव पर क्षार छिड़क दिया हो। पार्थ भी गहरी चोट खाकर अपने रथ के ध्वजदण्ड का सहारा लेकर टिक गए।
श्लोक 15 (7.93.15)
ततः सर्वस्य सैन्यस्य तावकस्य विशाम्पते । सिंहनादो महानासीद्धतं मत्वा धनञ्जयम् ॥
tataḥ sarvasya sainyasya tāvakasya viśāmpate | siṃhanādo mahānāsīddhataṃ matvā dhanañjayam
तब हे प्रजानाथ! धनञ्जय को मारा गया मानकर आपकी सारी सेना में बड़ा सिंहनाद हुआ।
श्लोक 16 (7.93.16)
कृष्णश्च भृशसन्तप्तो दृष्ट्वा पार्थं विचेतनम् । आश्वासयत्सुहृद्याभिर्वाग्भिस्तत्र धनञ्जयम् ॥
kṛṣṇaśca bhṛśasantapto dṛṣṭvā pārthaṃ vicetanam | āśvāsayatsuhṛdyābhirvāgbhistatra dhanañjayam
पार्थ को अचेत देखकर कृष्ण अत्यन्त सन्तप्त हुए और उन्होंने वहाँ प्रिय, हृदय को भाने वाले वचनों से धनञ्जय को आश्वासन दिया।
श्लोक 17 (7.93.17)
ततस्तौ रथिनां श्रेष्ठौ लब्धलक्षौ धनञ्जयम् । वासुदेवं च वार्ष्णेयं शरवर्षैः समन्ततः ॥
tatastau rathināṃ śreṣṭhau labdhalakṣau dhanañjayam | vāsudevaṃ ca vārṣṇeyaṃ śaravarṣaiḥ samantataḥ
तब निशाना साध चुके उन दोनों रथिश्रेष्ठों ने धनञ्जय और वृष्णिवंशी वासुदेव को चारों ओर से बाणों की वर्षा से ढक दिया।
श्लोक 18 (7.93.18)
सचक्रकूबररथं साश्वध्वजपताकिनम् । अदृश्यं चक्रतुर्युद्धे तदद्भुतमिवाभवत् ॥
sacakrakūbararathaṃ sāśvadhvajapatākinam | adṛśyaṃ cakraturyuddhe tadadbhutamivābhavat
उन्होंने पहियों और रथ-दण्ड सहित, घोड़ों, ध्वज और पताकाओं सहित उस रथ को युद्ध में अदृश्य कर दिया; यह मानो एक अद्भुत बात हुई।
श्लोक 19 (7.93.19)
प्रत्याश्वस्तस्तु बीभत्सुः शनकैरिव भारत । प्रेतराजपुरं प्राप्य पुनः प्रत्यागतो यथा ॥
pratyāśvastastu bībhatsuḥ śanakairiva bhārata | pretarājapuraṃ prāpya punaḥ pratyāgato yathā
हे भारत! बीभत्सु धीरे-धीरे होश में आए, मानो यमराज की नगरी तक पहुँचकर फिर लौट आए हों।
श्लोक 20 (7.93.20)
सञ्छन्नं शरजालेन रथं दृष्ट्वा सकेशवम् । शत्रू चाभिमुखौ दृष्ट्वा दीप्यमानाविवानलौ ॥
sañchannaṃ śarajālena rathaṃ dṛṣṭvā sakeśavam | śatrū cābhimukhau dṛṣṭvā dīpyamānāvivānalau
बाणों के जाल से ढके हुए केशव सहित रथ को देखकर, और सामने खड़े दो प्रज्वलित अग्नियों जैसे उन दोनों शत्रुओं को देखकर,
श्लोक 21 (7.93.21)
प्रादुश्चक्रे ततः पार्थः शाक्रमस्त्रं महारथः । तस्मादासन्सहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ॥
prāduścakre tataḥ pārthaḥ śākramastraṃ mahārathaḥ | tasmādāsansahasrāṇi śarāṇāṃ nataparvaṇām
महारथी पार्थ ने तब इन्द्र का अस्त्र प्रकट किया। उससे झुकी हुई गाँठों वाले हज़ारों बाण निकल पड़े।
श्लोक 22 (7.93.22)
ते जघ्नुस्तौ महेष्वासौ ताभ्यां मुक्तांश्च सायकान् । विचेरुराकाशगताः पार्थचापविनिःसृताः ॥
te jaghnustau maheṣvāsau tābhyāṃ muktāṃśca sāyakān | vicerurākāśagatāḥ pārthacāpaviniḥsṛtāḥ
पार्थ के धनुष से छूटे हुए वे बाण आकाश में विचरते हुए उन दोनों महाधनुर्धरों पर और उनके छोड़े हुए बाणों पर भी जा लगे।
श्लोक 23 (7.93.23)
प्रतिहत्य शरांस्तूर्णं शरवेगेन पाण्डवः । प्रतस्थे तत्रतत्रैव योधयन्वै महारथान् ॥
pratihatya śarāṃstūrṇaṃ śaravegena pāṇḍavaḥ | pratasthe tatratatraiva yodhayanvai mahārathān
पाण्डव ने अपने बाणों के वेग से उनके बाणों को शीघ्र काटकर, जहाँ-तहाँ महारथियों से लड़ते हुए आगे बढ़ना जारी रखा।
श्लोक 24 (7.93.24)
तौ च फल्गुनबाणौघैर्विबाहुशिरसौ कृतौ । वसुधामन्वपद्येतां वातनुन्नाविव द्रुमौ ॥
tau ca phalgunabāṇaughairvibāhuśirasau kṛtau | vasudhāmanvapadyetāṃ vātanunnāviva drumau
फल्गुन के बाणसमूहों से भुजाएँ और सिर कट जाने पर वे दोनों हवा से उखड़े हुए दो वृक्षों की तरह पृथ्वी पर गिर पड़े।
श्लोक 25 (7.93.25)
श्रुतायुषश्च निधनं वधश्चैवाश्रुतायुषः । लोकविस्मापनमभूत्समुद्रस्येव शोषणम् ॥
śrutāyuṣaśca nidhanaṃ vadhaścaivāśrutāyuṣaḥ | lokavismāpanamabhūtsamudrasyeva śoṣaṇam
श्रुतायु का निधन और अश्रुतायु का वध समुद्र के सूख जाने के समान संसार को विस्मय में डालने वाला हुआ।
श्लोक 26 (7.93.26)
तयोः पदानुगान्हत्वा पुनः पञ्चशतं रथान् । प्रत्यगाद्भारतीं सेनां निघ्नन्पार्थो वरान्वरान् ॥
tayoḥ padānugānhatvā punaḥ pañcaśataṃ rathān | pratyagādbhāratīṃ senāṃ nighnanpārtho varānvarān
उन दोनों के पैदल अनुचरों को और फिर पाँच सौ रथों को मारकर पार्थ एक-एक करके श्रेष्ठ योद्धाओं को गिराते हुए भरतों की सेना की ओर बढ़े।
श्लोक 27 (7.93.27)
श्रुतायुषं च निहतं प्रेक्ष्य चैवाश्रुतायुषम् । नियतायुश्च सङ्क्रुद्धो दीर्घायुश्चैव भारत ॥
śrutāyuṣaṃ ca nihataṃ prekṣya caivāśrutāyuṣam | niyatāyuśca saṅkruddho dīrghāyuścaiva bhārata
श्रुतायु और अश्रुतायु को मरा हुआ देखकर, हे भारत! नियतायु और दीर्घायु अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे —
श्लोक 28 (7.93.28)
पुत्रौ तयोर्नरश्रेष्ठौ कौन्तेयं प्रति जग्मतुः । किरन्तौ विविधान्बाणान्पितृव्यसनकर्शितौ ॥
putrau tayornaraśreṣṭhau kaunteyaṃ prati jagmatuḥ | kirantau vividhānbāṇānpitṛvyasanakarśitau
और उन दोनों के वे पुत्र, नरश्रेष्ठ, पिता की मृत्यु के दुःख से पीड़ित होकर नाना प्रकार के बाण बरसाते हुए कौन्तेय की ओर बढ़े।
श्लोक 29 (7.93.29)
तावर्जुनो मुहूर्तेन शरैः सन्नतपर्वभिः । प्रैषयत्परमक्रुद्धो यमस्य सदनं प्रति ॥
tāvarjuno muhūrtena śaraiḥ sannataparvabhiḥ | praiṣayatparamakruddho yamasya sadanaṃ prati
अर्जुन ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर झुकी गाँठों वाले बाणों से क्षणभर में उन दोनों को यमलोक भेज दिया।
श्लोक 30 (7.93.30)
लोडयन्तमनीकानि द्विपं पद्मसरो यथा । नाशक्नुवन्वारयितुं पार्थं क्षत्रियपुङ्गवाः ॥
loḍayantamanīkāni dvipaṃ padmasaro yathā | nāśaknuvanvārayituṃ pārthaṃ kṣatriyapuṅgavāḥ
जैसे हाथी कमलों वाले सरोवर को मथ डालता है, वैसे ही सेनाओं को मथते हुए पार्थ को क्षत्रियों में श्रेष्ठ वीर रोक न सके।
श्लोक 31 (7.93.31)
अङ्गास्तु गजसङ्घैश्च पाण्डवं पर्यवारयन् । क्रुद्धाः सहस्रशो राजञ्शिक्षिता हस्तिसादिनः ॥
aṅgāstu gajasaṅghaiśca pāṇḍavaṃ paryavārayan | kruddhāḥ sahasraśo rājañśikṣitā hastisādinaḥ
हे राजन्! अङ्ग देश के क्रुद्ध, सुशिक्षित हाथीसवार हज़ारों की संख्या में हाथियों के झुण्डों के साथ पाण्डव को घेरने लगे।
श्लोक 32 (7.93.32)
दुर्योधनसमादिष्टाः कुञ्जरैः पर्वतोपमैः । प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च कलिङ्गप्रमुखा नृपाः ॥
duryodhanasamādiṣṭāḥ kuñjaraiḥ parvatopamaiḥ | prācyāśca dākṣiṇātyāśca kaliṅgapramukhā nṛpāḥ
दुर्योधन की आज्ञा पाकर पर्वत जैसे हाथियों के साथ कलिङ्गों को आगे करके पूर्व और दक्षिण के राजा भी आ पहुँचे।
श्लोक 33 (7.93.33)
तेषामापततां शीघ्रं गाण्डीवप्रेषितैः शरैः । निचकर्त शिरांस्युग्रो बाहूनपि सुभूषणान् ॥
teṣāmāpatatāṃ śīghraṃ gāṇḍīvapreṣitaiḥ śaraiḥ | nicakarta śirāṃsyugro bāhūnapi subhūṣaṇān
उनके झपटते ही उग्र अर्जुन ने गाण्डीव से छूटे बाणों से शीघ्र उनके सिर काट डाले, और सुन्दर आभूषणों से सजी भुजाएँ भी।
श्लोक 34 (7.93.34)
तैः शिरोभिर्मही कीर्णा बाहुभिश्च सहाङ्गदैः । बभौ कनकपाषाणा भुजगैरिव संवृता ॥
taiḥ śirobhirmahī kīrṇā bāhubhiśca sahāṅgadaiḥ | babhau kanakapāṣāṇā bhujagairiva saṃvṛtā
उन सिरों और बाजूबन्द सहित भुजाओं से बिछी हुई पृथ्वी ऐसी शोभित हुई मानो सर्पों से ढकी हुई सोने के पत्थरों वाली भूमि हो।
श्लोक 35 (7.93.35)
बाहवो विशिखैश्छिन्नाः शिरांस्युन्मथितानि च । पतमानान्यदृश्यन्त द्रुमेभ्य इव पक्षिणः ॥
bāhavo viśikhaiśchinnāḥ śirāṃsyunmathitāni ca | patamānānyadṛśyanta drumebhya iva pakṣiṇaḥ
बाणों से कटी भुजाएँ और कुचले हुए सिर गिरते हुए ऐसे दिखाई देते थे जैसे वृक्षों से पक्षी गिर रहे हों।
श्लोक 36 (7.93.36)
शरैः सहस्रशो विद्धा द्विपाः प्रसृतशोणिताः । अदृश्यन्ताद्रयः काले गैरिकाम्बुस्रवा इव ॥
śaraiḥ sahasraśo viddhā dvipāḥ prasṛtaśoṇitāḥ | adṛśyantādrayaḥ kāle gairikāmbusravā iva
हज़ारों बाणों से बिंधे और रक्त बहाते हुए हाथी उन पर्वतों के समान दिखाई देते थे जिनसे समय आने पर गेरू-मिला जल बहता है।
श्लोक 37 (7.93.37)
निहताः शेरते स्मान्ये बीभत्सोर्निशितैः शरैः । गजपृष्ठगता म्लेच्छा नानाविकृतदर्शनाः ॥
nihatāḥ śerate smānye bībhatsorniśitaiḥ śaraiḥ | gajapṛṣṭhagatā mlecchā nānāvikṛtadarśanāḥ
दूसरे लोग बीभत्सु के तीखे बाणों से मरे पड़े थे: हाथियों की पीठ पर बैठे, नाना प्रकार की विकृत आकृतियों वाले म्लेच्छ,
श्लोक 38 (7.93.38)
नानावेषधरा राजन्नानाशस्त्रौघसंवृताः । रुधिरेणानुलिप्ताङ्गा भान्ति चित्रैः शरैर्हताः ॥
nānāveṣadharā rājannānāśastraughasaṃvṛtāḥ | rudhireṇānuliptāṅgā bhānti citraiḥ śarairhatāḥ
हे राजन्! नाना प्रकार के वेश धारण किए, तरह-तरह के शस्त्रों के ढेर से घिरे, रक्त से सने अंगों वाले वे विचित्र बाणों से मारे जाने पर भी शोभित हो रहे थे।
श्लोक 39 (7.93.39)
शोणितं निर्वमन्ति स्म द्विपाः पार्थशराहताः । सहस्रशश्छिन्नगात्राः सारोहाः सपदानुगाः ॥
śoṇitaṃ nirvamanti sma dvipāḥ pārthaśarāhatāḥ | sahasraśaśchinnagātrāḥ sārohāḥ sapadānugāḥ
पार्थ के बाणों से मारे गए हाथी रक्त उगल रहे थे; हज़ारों के अंग कट गए थे, और वे अपने सवारों और पैदल अनुचरों सहित गिरे थे।
श्लोक 40 (7.93.40)
चुक्रुशुश्च निपेतुश्च बभ्रमुश्चापरे दिशः । भृशं त्रस्ताश्च बहवः स्वानेव ममृदुर्गजाः ॥
cukruśuśca nipetuśca babhramuścāpare diśaḥ | bhṛśaṃ trastāśca bahavaḥ svāneva mamṛdurgajāḥ
कुछ चिंघाड़कर गिर पड़े, दूसरे दिशाओं में भटकने लगे; और बहुत-से अत्यन्त भयभीत हाथियों ने अपने ही लोगों को कुचल डाला।
श्लोक 41 (7.93.41)
सोत्तरायुधिनश्चैव द्विपास्तीक्ष्णविषोपमाः । विदन्त्यसुरमायां ये सुघोरा घोरचक्षुषः ॥
sottarāyudhinaścaiva dvipāstīkṣṇaviṣopamāḥ | vidantyasuramāyāṃ ye sughorā ghoracakṣuṣaḥ
वहाँ आवरणों और शस्त्रों से सज्जित हाथी भी थे, जो तीक्ष्ण विष के समान थे; और वे भी थे जो असुरों की माया जानते हैं, अत्यन्त भयंकर और भयानक नेत्रों वाले:
श्लोक 42 (7.93.42)
यवनाः पारदाश्चैव शकाश्च सह बाह्लिकैः । काकवर्णा दुराचाराः स्त्रीलोलाः कलहप्रियाः ॥
yavanāḥ pāradāścaiva śakāśca saha bāhlikaiḥ | kākavarṇā durācārāḥ strīlolāḥ kalahapriyāḥ
यवन, पारद, और बाह्लीकों के साथ शक — कौओं जैसे काले रंग के, दुराचारी, स्त्रियों के लोलुप और कलहप्रिय;
श्लोक 43 (7.93.43)
द्राविडास्तत्र युध्यन्ते मत्तमातङ्गविक्रमाः । गोयोनिप्रभवा म्लेच्छाः कालकल्पाः प्रहारिणः ॥
drāviḍāstatra yudhyante mattamātaṅgavikramāḥ | goyoniprabhavā mlecchāḥ kālakalpāḥ prahāriṇaḥ
वहाँ द्रविड़ भी लड़ रहे थे, जिनका पराक्रम मतवाले हाथियों के समान था, और गाय की योनि से उत्पन्न म्लेच्छ भी, जो काल के समान प्रहार करने वाले थे;
श्लोक 44 (7.93.44)
दार्वाभिसारा दरदाः पुण्ड्राश्चैव सहस्रशः । ते न शक्याः स्म सङ्ख्यातुं व्राताः शतसहस्रशः ॥
dārvābhisārā daradāḥ puṇḍrāścaiva sahasraśaḥ | te na śakyāḥ sma saṅkhyātuṃ vrātāḥ śatasahasraśaḥ
दार्वाभिसार, दरद और पुण्ड्र, सहस्रों की संख्या में। वे दल लाखों-लाख थे और गिने नहीं जा सकते थे।
श्लोक 45 (7.93.45)
अभ्यवर्षन्त ते सर्वे पाण्डवं निशितैः शरैः । अवाकिरंश्च ते म्लेच्छा नानायुद्धविशारदाः ॥
abhyavarṣanta te sarve pāṇḍavaṃ niśitaiḥ śaraiḥ | avākiraṃśca te mlecchā nānāyuddhaviśāradāḥ
उन सब ने पाण्डव पर तीखे बाणों की वर्षा की, और नाना प्रकार के युद्ध में निपुण उन म्लेच्छों ने उन्हें बाणों से ढक दिया।
श्लोक 46 (7.93.46)
तेषामपि ससर्जाशु शरवृष्टिं धनञ्जयः । सृष्टिस्तथाविधा ह्यासीच्छलभानामिवायतिः ॥
teṣāmapi sasarjāśu śaravṛṣṭiṃ dhanañjayaḥ | sṛṣṭistathāvidhā hyāsīcchalabhānāmivāyatiḥ
धनञ्जय ने भी शीघ्र उन पर बाणों की वर्षा की। वह बाण-वर्षा टिड्डियों के झुण्ड के आक्रमण जैसी थी।
श्लोक 47 (7.93.47)
अभ्रच्छायामिव शरैः सैन्ये कृत्वा धनञ्जयः । मुण्डार्धमुण्डाञ्जटिलानशुचीञ्जटिलाननान् । म्लेच्छानशातयत्सर्वान्समेतानस्त्रतेजसा ॥
abhracchāyāmiva śaraiḥ sainye kṛtvā dhanañjayaḥ | muṇḍārdhamuṇḍāñjaṭilānaśucīñjaṭilānanān | mlecchānaśātayatsarvānsametānastratejasā
सेना पर बाणों से बादल जैसी छाया करके धनञ्जय ने अपने अस्त्र के तेज से वहाँ एकत्र हुए उन सब म्लेच्छों को गिरा दिया: जिनके सिर मुण्डित थे या आधे मुण्डित थे, जो जटाधारी और अपवित्र थे, और जिनके मुख बढ़ी हुई उलझी दाढ़ी-मूँछों से भरे थे।
श्लोक 48 (7.93.48)
शरैश्च शतशो विद्धास्ते सङ्घा गिरिचारिणः । प्राद्रवन्त रणे भीता गिरिगह्वरवासिनः ॥
śaraiśca śataśo viddhāste saṅghā giricāriṇaḥ | prādravanta raṇe bhītā girigahvaravāsinaḥ
सैकड़ों बाणों से बिंधे हुए, पर्वतों में विचरने वाले और गिरि-गुफाओं में रहने वाले वे दल भयभीत होकर रणभूमि से भाग खड़े हुए।
श्लोक 49 (7.93.49)
गजाश्वसादिम्लेच्छानां पतितानां शितैः शरैः । बकाः कङ्का वृका भूमावपिबन्रुधिरं मुदा ॥
gajāśvasādimlecchānāṃ patitānāṃ śitaiḥ śaraiḥ | bakāḥ kaṅkā vṛkā bhūmāvapibanrudhiraṃ mudā
तीखे बाणों से गिरे हुए हाथी और घोड़ों पर सवार म्लेच्छों का रक्त बगुले, कङ्क पक्षी और भेड़िये पृथ्वी पर आनन्द से पी रहे थे।
श्लोक 50 (7.93.50)
पत्त्यश्वरथनागैश्च प्रच्छन्नकृतसङ्क्रमाम् । शरवर्षप्लवां घोरां केशशैवलशाद्वलाम् । प्रावर्तयन्नदीमुग्रां शोणितौघतरङ्गिणीम् ॥
pattyaśvarathanāgaiśca pracchannakṛtasaṅkramām | śaravarṣaplavāṃ ghorāṃ keśaśaivalaśādvalām | prāvartayannadīmugrāṃ śoṇitaughataraṅgiṇīm
उसने एक भयंकर, उग्र नदी बहा दी, जिसमें रक्त की धाराएँ लहरों के समान थीं; पैदल सैनिकों, घोड़ों, रथों और हाथियों से ढका हुआ उसका पुल बना था, बाणों की वर्षा उसकी नावें थीं, और केश उसके सेवार और घास थे।
श्लोक 51 (7.93.51)
छिन्नाङ्गुलीक्षुद्रमत्स्यां युगान्ते कालसन्निभाम् । प्राकरोद्गजसम्बाधां नदीमुत्तरशोणिताम् ॥
chinnāṅgulīkṣudramatsyāṃ yugānte kālasannibhām | prākarodgajasambādhāṃ nadīmuttaraśoṇitām
उसने ऐसी नदी बहाई जिसमें कटी हुई उँगलियाँ छोटी मछलियाँ थीं, जो युग के अन्त में काल के समान भयानक थी, हाथियों से भरी हुई थी और जिसमें रक्त की ही प्रधानता थी।
श्लोक 52 (7.93.52)
देहेभ्यो राजपुत्राणां नागाश्वरथसादिनाम् । यथा स्थलं च निम्नं च न स्याद्वर्षति वासवे । तथाऽऽसीत्पृथिवी सर्वा शोणितेन परिप्लुता ॥
dehebhyo rājaputrāṇāṃ nāgāśvarathasādinām | yathā sthalaṃ ca nimnaṃ ca na syādvarṣati vāsave | tathā''sītpṛthivī sarvā śoṇitena pariplutā
जैसे इन्द्र के बरसने पर ऊँची और नीची भूमि का भेद नहीं रह जाता, वैसे ही राजकुमारों तथा हाथी, घोड़े और रथ पर सवार योद्धाओं के शरीरों से बहे रक्त से सारी पृथ्वी डूब गई।
श्लोक 53 (7.93.53)
षट्सहस्रान्हयान्वीरान्पुनर्दशशतान्वरान् । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय क्षत्रियान्क्षत्रियर्षभः ॥
ṣaṭsahasrānhayānvīrānpunardaśaśatānvarān | prāhiṇonmṛtyulokāya kṣatriyānkṣatriyarṣabhaḥ
उस क्षत्रियश्रेष्ठ ने छह हज़ार वीर घुड़सवारों को और फिर दस सौ और श्रेष्ठ क्षत्रियों को मृत्युलोक भेज दिया।
श्लोक 54 (7.93.54)
शरैः सहस्रशो विद्धा विधिवत्कल्पिता द्विपाः । शेरते भूमिमासाद्य शैला वज्रहता इव ॥
śaraiḥ sahasraśo viddhā vidhivatkalpitā dvipāḥ | śerate bhūmimāsādya śailā vajrahatā iva
विधिपूर्वक सजाए गए हाथी हज़ारों बाणों से बिंधकर वज्र से मारे गए पर्वतों की भाँति भूमि पर पड़े थे।
श्लोक 55 (7.93.55)
स वाजिरथमातङ्गान्निघ्नन्व्यचरदर्जुनः । प्रभिन्न इव मातङ्गो मृद्नन्नलवनं यथा ॥
sa vājirathamātaṅgānnighnanvyacaradarjunaḥ | prabhinna iva mātaṅgo mṛdnannalavanaṃ yathā
अर्जुन घोड़ों, रथों और हाथियों को मारते हुए वैसे ही विचरते रहे जैसे मदमत्त हाथी नरकटों के वन को रौंदता फिरता है।
श्लोक 56 (7.93.56)
भूरिद्रुमलतागुल्मं शुष्केन्धनतृणोलपम् । निर्दहेदनलोऽरण्यं यथा वायुसमीरितः ॥
bhūridrumalatāgulmaṃ śuṣkendhanatṛṇolapam | nirdahedanalo'raṇyaṃ yathā vāyusamīritaḥ
जैसे वायु से भड़की आग बहुत-से वृक्षों, लताओं और झाड़ियों से भरे, सूखे ईंधन और घास वाले वन को जला देती है,
श्लोक 57 (7.93.57)
सेनारण्यं तव तथा कृष्णानिलसमीरितः । शरार्चिरदहत्क्रुद्धः पाण्डवोऽग्निर्धनञ्जयः ॥
senāraṇyaṃ tava tathā kṛṣṇānilasamīritaḥ | śarārciradahatkruddhaḥ pāṇḍavo'gnirdhanañjayaḥ
वैसे ही कृष्णरूपी वायु से भड़की हुई अग्नि के समान पाण्डव धनञ्जय ने क्रुद्ध होकर अपनी बाणरूपी ज्वालाओं से आपकी सेना के वन को जला दिया।
श्लोक 58 (7.93.58)
शून्यान्कुर्वन्रथोपस्थान्मानवैः संस्तरन्महीम् । प्रानृत्यदिव सम्बाधे चापहस्तो धनञ्जयः । वज्रकल्पैः शरैर्भूमिं कुर्वन्नुत्तरशोणिताम् ॥
śūnyānkurvanrathopasthānmānavaiḥ saṃstaranmahīm | prānṛtyadiva sambādhe cāpahasto dhanañjayaḥ | vajrakalpaiḥ śarairbhūmiṃ kurvannuttaraśoṇitām
रथों के आसनों को सूना करते और पृथ्वी को मनुष्यों से पाटते हुए धनुष हाथ में लिए धनञ्जय उस घमासान में मानो नृत्य कर रहे थे; वज्र जैसे बाणों से वे भूमि को अधिकतर रक्त से भरी हुई बना रहे थे।
श्लोक 59 (7.93.59)
ततः प्रावर्तत नदी शोणितौघतरङ्गिणी । नराश्वद्विपकायेभ्यः पर्वतेभ्य इवापगा ॥
tataḥ prāvartata nadī śoṇitaughataraṅgiṇī | narāśvadvipakāyebhyaḥ parvatebhya ivāpagā
तब मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों के शरीरों से, पर्वतों से निकली नदियों की भाँति, रक्त की धाराओं की लहरों वाली एक नदी बह चली,
श्लोक 60 (7.93.60)
अस्थिशर्करसम्बाधा ध्वजवृक्षा रथह्रदा । सञ्छिन्नशीर्षपाषाणा हस्तिहस्तमहाग्रहा ॥
asthiśarkarasambādhā dhvajavṛkṣā rathahradā | sañchinnaśīrṣapāṣāṇā hastihastamahāgrahā
हड्डियाँ जिसमें कंकड़ थीं, ध्वज जिसके वृक्ष थे, रथ जिसके कुण्ड थे, कटे सिर जिसके पत्थर थे, और हाथियों की सूँड़ें जिसके बड़े ग्राह थीं,
श्लोक 61 (7.93.61)
मांसमज्जास्थिपङ्काढ्या हताश्वमकराकुला । उष्णीषफेनसञ्छन्ना शरघोरझषाकुला ॥
māṃsamajjāsthipaṅkāḍhyā hatāśvamakarākulā | uṣṇīṣaphenasañchannā śaraghorajhaṣākulā
मांस, मज्जा और हड्डियों के कीचड़ से भरपूर, मरे हुए घोड़ों रूपी मकरों से व्याप्त, पगड़ियों के झाग से ढकी और भयंकर बाणरूपी मछलियों से भरी हुई —
श्लोक 62 (7.93.62)
रुद्रस्याक्रीडसदृशीं भूमिं कुर्वन्विभीषणाम् । प्राविशद्भारतीं सेनां सङ्क्रुद्धो वै धनञ्जयः ॥
rudrasyākrīḍasadṛśīṃ bhūmiṃ kurvanvibhīṣaṇām | prāviśadbhāratīṃ senāṃ saṅkruddho vai dhanañjayaḥ
पृथ्वी को रुद्र की क्रीड़ाभूमि के समान भयानक बनाते हुए अत्यन्त क्रुद्ध धनञ्जय ने भारती सेना में प्रवेश किया।
श्लोक 63 (7.93.63)
तं श्रुतायुस्तथाम्बष्ठो व्रजमानं न्यवारयत् ॥
taṃ śrutāyustathāmbaṣṭho vrajamānaṃ nyavārayat
आगे बढ़ते हुए उन्हें श्रुतायु और अम्बष्ठ ने रोक लिया।
श्लोक 64 (7.93.64)
तस्यार्जुनः शरैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रपरिच्छदैः । न्यपातयद्धयाञ्शीघ्रं यतमानस्य मारिष । धनुश्चास्यापरैश्छित्त्वा शरैः पार्थो विचक्रमे ॥
tasyārjunaḥ śaraistīkṣṇaiḥ kaṅkapatraparicchadaiḥ | nyapātayaddhayāñśīghraṃ yatamānasya māriṣa | dhanuścāsyāparaiśchittvā śaraiḥ pārtho vicakrame
अर्जुन ने कङ्क पक्षी के पंखों से सजे तीखे बाणों से, उसके प्रयत्न करते रहने पर भी, उसके घोड़ों को शीघ्र गिरा दिया, हे माननीय! और दूसरे बाणों से उसका धनुष काटकर पार्थ आगे बढ़कर लड़ने लगे।
श्लोक 65 (7.93.65)
अम्बष्ठस्तु गदां गृह्य क्रोधपर्याकुलेक्षणः । आससाद रणे पार्थं केशवं च महारथम् ॥
ambaṣṭhastu gadāṃ gṛhya krodhaparyākulekṣaṇaḥ | āsasāda raṇe pārthaṃ keśavaṃ ca mahāratham
किन्तु अम्बष्ठ ने गदा उठाकर, क्रोध से व्याकुल नेत्रों के साथ, रण में पार्थ और महारथी केशव पर धावा किया।
श्लोक 66 (7.93.66)
ततः सम्प्रहरन्वीरो गदामुद्यम्य भारत । रथमावार्य गदया केशवं समताडयत् ॥
tataḥ sampraharanvīro gadāmudyamya bhārata | rathamāvārya gadayā keśavaṃ samatāḍayat
तब हे भारत! उस वीर ने गदा उठाकर प्रहार करते हुए रथ को रोका और गदा से केशव पर चोट की।
श्लोक 67 (7.93.67)
गदया ताडितं दृष्ट्वा केशवं परवीरहा । अर्जुनोऽथ भृशं क्रुद्धः सोऽम्बष्ठं प्रति भारत ॥
gadayā tāḍitaṃ dṛṣṭvā keśavaṃ paravīrahā | arjuno'tha bhṛśaṃ kruddhaḥ so'mbaṣṭhaṃ prati bhārata
केशव को गदा से घायल देखकर शत्रुवीरों का नाश करने वाले अर्जुन, हे भारत! अम्बष्ठ पर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे।
श्लोक 68 (7.93.68)
ततः शरैर्हेमपुङ्खैः सगदं रथिनां वरम् । छादयामास समरे मेघः सूर्यमिवोदितम् ॥
tataḥ śarairhemapuṅkhaiḥ sagadaṃ rathināṃ varam | chādayāmāsa samare meghaḥ sūryamivoditam
फिर उन्होंने स्वर्ण-पंख वाले बाणों से गदा सहित उस श्रेष्ठ रथी को रणभूमि में वैसे ही ढक दिया जैसे मेघ उगे हुए सूर्य को ढक लेता है।
श्लोक 69 (7.93.69)
अथापरैः शरैश्चापि गदां तस्य महात्मनः । अचूर्णयत्तदा पार्थस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
athāparaiḥ śaraiścāpi gadāṃ tasya mahātmanaḥ | acūrṇayattadā pārthastadadbhutamivābhavat
फिर दूसरे बाणों से पार्थ ने उस महात्मा की गदा को चूर-चूर कर दिया; वह मानो एक अद्भुत घटना थी।
श्लोक 70 (7.93.70)
अथ तां पतितां दृष्ट्वा गृह्यान्यां च महागदाम् । अर्जुनं वासुदेवं च पुनः पुनरताडयत् ॥
atha tāṃ patitāṃ dṛṣṭvā gṛhyānyāṃ ca mahāgadām | arjunaṃ vāsudevaṃ ca punaḥ punaratāḍayat
उस गदा को टूटकर गिरा देखकर उसने दूसरी बड़ी गदा उठाई और अर्जुन तथा वासुदेव पर बार-बार प्रहार किया।
श्लोक 71 (7.93.71)
तस्यार्जुनः क्षुरप्राभ्यां सगदावुद्यतौ भुजौ । चिच्छेदेन्द्रध्वजाकारौ शिरश्चान्येन पत्रिणा ॥
tasyārjunaḥ kṣuraprābhyāṃ sagadāvudyatau bhujau | cicchedendradhvajākārau śiraścānyena patriṇā
अर्जुन ने दो क्षुरप्र बाणों से उसकी इन्द्रध्वज जैसी उठी हुई भुजाओं को गदा सहित काट डाला और एक अन्य बाण से उसका सिर भी काट दिया।
श्लोक 72 (7.93.72)
स पपात हतो राजन्वसुधामनुनादयन् । इन्द्रध्वज इवोत्सृष्टो यन्त्रनिर्मुक्तबन्धनः ॥
sa papāta hato rājanvasudhāmanunādayan | indradhvaja ivotsṛṣṭo yantranirmuktabandhanaḥ
हे राजन्! पृथ्वी को गुँजाता हुआ वह मरकर गिरा, जैसे यन्त्र के बन्धन खुल जाने पर इन्द्रध्वज गिर पड़ता है।
श्लोक 73 (7.93.73)
अम्बष्ठे तु तदा भग्ने तव सैन्यमभज्यत ॥
ambaṣṭhe tu tadā bhagne tava sainyamabhajyata
अम्बष्ठ के इस प्रकार मारे जाने पर आपकी सेना भी टूटकर भाग खड़ी हुई।
श्लोक 74 (7.93.74)
रथानीकावगाढश्च वारणाश्वशतैर्वृतः । अदृश्यत तदा पार्थो घनैः सूर्य इवावृतः ॥
rathānīkāvagāḍhaśca vāraṇāśvaśatairvṛtaḥ | adṛśyata tadā pārtho ghanaiḥ sūrya ivāvṛtaḥ
रथों की पंक्तियों में घुसे हुए और सैकड़ों हाथी-घोड़ों से घिरे हुए पार्थ उस समय बादलों से ढके सूर्य के समान दिखाई देते थे।