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द्रोण पर्व · अध्याय 94

द्रोण द्वारा दुर्योधन को मन्त्रमय कवच बाँधना

अर्जुन को व्यूह भेदकर निकलते देख दुर्योधन द्रोण को उसे न रोक पाने और पाण्डवों के प्रति नरमी बरतने के लिए कठोर उलाहना देता है। द्रोण उत्तर देते हैं कि कृष्ण का वेगवान रथ उन्हें लाँघ गया, युधिष्ठिर को पकड़ने की उनकी प्रतिज्ञा है, और दुर्योधन को स्वयं अर्जुन के विरुद्ध जाना चाहिए। वे उसे लम्बे मंगल-पाठ से आशीर्वाद देते हैं, वृत्र के वध के लिए शिव द्वारा इन्द्र को दिए मन्त्रमय कवच की पुरानी कथा सुनाते हैं और वही कवच राजा को बाँध देते हैं। दुर्योधन विशाल सेना के साथ अर्जुन की ओर चल पड़ता है।

अध्याय 93अध्याय-सूचीअध्याय 95

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.94.1)

ततः प्रविष्टे कौन्तेये सिन्धुराजजिघांसया । द्रोणानीकं विनिर्भिद्य भोजानीकं च दुस्तरम् ॥

tataḥ praviṣṭe kaunteye sindhurājajighāṃsayā | droṇānīkaṃ vinirbhidya bhojānīkaṃ ca dustaram

जब कुन्तीपुत्र सिन्धुराज का वध करने की इच्छा से द्रोण की सेना और भोजों की दुर्भेद्य सेना को चीरकर भीतर घुस गया,

श्लोक 2 (7.94.2)

काम्भोजस्य च दायादे हते राजन्सुदक्षिणे । श्रुतायुषि च विक्रान्ते निहते सव्यसाचिना ॥

kāmbhojasya ca dāyāde hate rājansudakṣiṇe | śrutāyuṣi ca vikrānte nihate savyasācinā

और काम्भोज के उत्तराधिकारी सुदक्षिण तथा पराक्रमी श्रुतायुस् को, हे राजन्, सव्यसाची ने मार डाला,

श्लोक 3 (7.94.3)

विप्रद्रुतेष्वनीकेषु विध्वस्तेषु समन्ततः । प्रभग्नं स्वबलं दृष्ट्वा पुत्रस्ते द्रोणमभ्ययात् ॥

vipradruteṣvanīkeṣu vidhvasteṣu samantataḥ | prabhagnaṃ svabalaṃ dṛṣṭvā putraste droṇamabhyayāt

और सेनाएँ चारों ओर बिखरकर तितर-बितर हो गईं, तब अपनी सेना को टूटा देखकर आपका पुत्र द्रोण के पास गया।

श्लोक 4 (7.94.4)

त्वरन्नेकरथेनैव समेत्य द्रोणमब्रवीत् । गतः स पुरुषव्याघ्रः प्रमथ्यैतां महाचमूम् ॥

tvarannekarathenaiva sametya droṇamabravīt | gataḥ sa puruṣavyāghraḥ pramathyaitāṃ mahācamūm

वह एक ही रथ पर शीघ्रता से द्रोण के पास पहुँचा और बोला, "वह पुरुषसिंह इस विशाल सेना को रौंदकर आगे निकल गया है।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 5 (7.94.5)

अथ बुद्ध्या समीक्षस्व किन्नु कार्यमनन्तरम् । अर्जुनस्य विघाताय दारुणेऽस्मिञ्जनक्षये ॥

atha buddhyā samīkṣasva kinnu kāryamanantaram | arjunasya vighātāya dāruṇe'smiñjanakṣaye

अब इस भयंकर जन-संहार में अर्जुन को रोकने के लिए, विचार करके देखिए कि आगे क्या करना चाहिए,

श्लोक 6 (7.94.6)

यथा स पुरुषव्याघ्रो न हन्येत जयद्रथः । तथा विधत्स्व भद्रं ते त्वं हि नः परमा गतिः ॥

yathā sa puruṣavyāghro na hanyeta jayadrathaḥ | tathā vidhatsva bhadraṃ te tvaṃ hi naḥ paramā gatiḥ

जिससे वह पुरुषसिंह जयद्रथ न मारा जाए। आपका कल्याण हो, वैसा ही उपाय कीजिए; आप ही हमारी परम गति हैं।

श्लोक 7 (7.94.7)

असौ धनञ्जयाग्निर्हि कोपमारुतचोदितः । सेनाकक्षं दहति मे वह्निः कक्षमिवोत्थितः ॥

asau dhanañjayāgnirhi kopamārutacoditaḥ | senākakṣaṃ dahati me vahniḥ kakṣamivotthitaḥ

क्रोधरूपी वायु से प्रेरित यह धनञ्जयरूपी अग्नि मेरी सेना को वैसे ही जला रही है, जैसे उठी हुई आग सूखी घास के झुरमुट को जलाती है।

श्लोक 8 (7.94.8)

अतिक्रान्ते हि कौन्तेये भित्त्वा सैन्यं परन्तप । जयद्रथस्य गोप्तारः संशयं परमं गताः ॥

atikrānte hi kaunteye bhittvā sainyaṃ parantapa | jayadrathasya goptāraḥ saṃśayaṃ paramaṃ gatāḥ

हे परंतप! कुन्तीपुत्र के सेना को भेदकर आगे निकल जाने पर जयद्रथ के रक्षक भारी संशय में पड़ गए हैं।

श्लोक 9 (7.94.9)

स्थिरा बुद्धिर्नरेन्द्राणामासीद्ब्रह्मविदां वर । नातिक्रमिष्यति द्रोणं जातु जीवन्धनञ्जयः ॥

sthirā buddhirnarendrāṇāmāsīdbrahmavidāṃ vara | nātikramiṣyati droṇaṃ jātu jīvandhanañjayaḥ

हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ! राजाओं का दृढ़ विश्वास था कि धनञ्जय जीते-जी कभी द्रोण को पार नहीं कर सकेगा।

श्लोक 10 (7.94.10)

योऽसौ पार्थो व्यतिक्रान्तो मिषतस्ते महाद्युते । सर्वं ह्यद्यातुरं मन्ये नेदमस्ति बलं मम ॥

yo'sau pārtho vyatikrānto miṣataste mahādyute | sarvaṃ hyadyāturaṃ manye nedamasti balaṃ mama

फिर भी हे महातेजस्वी! आपके देखते-देखते वह पार्थ आगे निकल गया। मैं मानता हूँ कि आज सब कुछ संकट से पीड़ित है; यह सेना अब मेरा बल नहीं रही।

श्लोक 11 (7.94.11)

जानामि त्वां महाभाग पाण्डवानां हिते रतम् । ततो मुह्यामि च ब्रह्मन्कार्यवत्तां विचिन्तयन् ॥

jānāmi tvāṃ mahābhāga pāṇḍavānāṃ hite ratam | tato muhyāmi ca brahmankāryavattāṃ vicintayan

हे महाभाग! मैं जानता हूँ कि आप पाण्डवों के हित में लगे हैं; इसीलिए हे ब्रह्मन्! क्या करना उचित है, यह सोचते हुए मैं मोह में पड़ गया हूँ।

श्लोक 12 (7.94.12)

यथाशक्ति च ते ब्रह्मन्वर्धयन्वृत्तिमुत्तमाम् । प्रीणामि च यथाशक्ति तच्च त्वं नावबुध्यसे ॥

yathāśakti ca te brahmanvardhayanvṛttimuttamām | prīṇāmi ca yathāśakti tacca tvaṃ nāvabudhyase

हे ब्रह्मन्! मैंने यथाशक्ति आपकी उत्तम आजीविका बढ़ाई है और यथाशक्ति आपको प्रसन्न रखता हूँ; फिर भी आप इसे समझते नहीं।

श्लोक 13 (7.94.13)

अस्मान्न त्वं सदा भक्तानिच्छस्यमितविक्रम । पाण्डवान्सततं प्रीणास्यास्माकं विप्रिये रतान् ॥

asmānna tvaṃ sadā bhaktānicchasyamitavikrama | pāṇḍavānsatataṃ prīṇāsyāsmākaṃ vipriye ratān

हे अमित पराक्रमी! हम आपके सदा के भक्त हैं, फिर भी आप हमारा हित नहीं चाहते, और हमारा अहित करने में लगे पाण्डवों को सदा प्रसन्न करते हैं।

श्लोक 14 (7.94.14)

अस्मानेवोपजीवंस्त्वमस्माकं विप्रिये रतः । न ह्यहं त्वां विजानामि मधुदिग्धमिव क्षुरम् ॥

asmānevopajīvaṃstvamasmākaṃ vipriye rataḥ | na hyahaṃ tvāṃ vijānāmi madhudigdhamiva kṣuram

हमारे ही सहारे जीते हुए आप हमारा अहित करने में लगे हैं। मैं आपको पहचान नहीं सका; आप तो शहद लगे उस्तरे के समान हैं।

श्लोक 15 (7.94.15)

नह्यहं त्वां विजानामि सर्वं मण्डूकराविणम् । नादास्यच्चेद्वरं मह्यं भवान्पाण्डवनिग्रहे । नावारयिष्यं गच्छन्तमहं सिन्धुपतिं गृहान् ॥

nahyahaṃ tvāṃ vijānāmi sarvaṃ maṇḍūkarāviṇam | nādāsyaccedvaraṃ mahyaṃ bhavānpāṇḍavanigrahe | nāvārayiṣyaṃ gacchantamahaṃ sindhupatiṃ gṛhān

मैं आपको बिलकुल नहीं पहचान पाया; आप तो केवल टर्राने वाले मेंढक हैं। यदि आप पाण्डवों के निग्रह के विषय में मुझे वर न देते, तो मैं घर लौटते हुए सिन्धुपति को न रोकता।

श्लोक 16 (7.94.16)

मया त्वाशंसमानेन त्वत्तस्त्राणमबुद्धिना । आश्वासितः सिन्धुपतिर्मोहाद्दत्तश्च मृत्यवे ॥

mayā tvāśaṃsamānena tvattastrāṇamabuddhinā | āśvāsitaḥ sindhupatirmohāddattaśca mṛtyave

किन्तु मैंने मूर्खतावश आपसे रक्षा की आशा रखकर सिन्धुपति को आश्वासन दिया और मोह से उसे मृत्यु के हाथों सौंप दिया।

श्लोक 17 (7.94.17)

यमदंष्ट्रान्तरं प्राप्तो मुच्येतापि हि मानवः । नार्जुनस्य वशं प्राप्तो मुच्येताजौ जयद्रथः ॥

yamadaṃṣṭrāntaraṃ prāpto mucyetāpi hi mānavaḥ | nārjunasya vaśaṃ prāpto mucyetājau jayadrathaḥ

यमराज की दाढ़ों के बीच पहुँचा हुआ मनुष्य भी छूट सकता है, परन्तु अर्जुन के वश में पड़ा जयद्रथ युद्ध में नहीं छूट सकेगा।

श्लोक 18 (7.94.18)

स तथा कुरु शोणाश्व यथा मुच्येत सैन्धवः । मम चार्तप्रलापानां माक्रुधः पाहि सैन्धवम् ॥

sa tathā kuru śoṇāśva yathā mucyeta saindhavaḥ | mama cārtapralāpānāṃ mākrudhaḥ pāhi saindhavam

हे लाल घोड़ों वाले! आप ऐसा कीजिए कि सैन्धव बच जाए। मेरे दुःखभरे प्रलाप पर क्रोध न कीजिए; सैन्धव की रक्षा कीजिए।"

द्रोण उवाच

श्लोक 19 (7.94.19)

नाभ्यसूयामि ते वाक्यमश्वत्थाम्नाऽसि मे समः । सत्यं तु ते प्रवक्ष्यामि तज्जुषस्व विशाम्पते ॥

nābhyasūyāmi te vākyamaśvatthāmnā'si me samaḥ | satyaṃ tu te pravakṣyāmi tajjuṣasva viśāmpate

"मैं तुम्हारी बात का बुरा नहीं मानता; तुम मेरे लिए अश्वत्थामा के समान हो। किन्तु हे राजन्! मैं तुमसे सच कहूँगा, उसे सुनो।

श्लोक 20 (7.94.20)

सारथिः प्रवरः कृष्णः शीघ्राश्चास्य हयोत्तमाः । अल्पं च विवरं कृत्वा पूर्णं याति धनञ्जयः ॥

sārathiḥ pravaraḥ kṛṣṇaḥ śīghrāścāsya hayottamāḥ | alpaṃ ca vivaraṃ kṛtvā pūrṇaṃ yāti dhanañjayaḥ

कृष्ण श्रेष्ठ सारथि हैं और उनके घोड़े भी बहुत तेज हैं; थोड़ा-सा अवकाश बनाकर धनञ्जय पूरी तरह निकल जाता है।

श्लोक 21 (7.94.21)

किं न पश्यसि बाणौघान्क्रोशमात्रे किरीटिनः । पश्चाद्रथस्य पतितान्क्षिप्ताञ्शीघ्रं हि गच्छतः ॥

kiṃ na paśyasi bāṇaughānkrośamātre kirīṭinaḥ | paścādrathasya patitānkṣiptāñśīghraṃ hi gacchataḥ

क्या तुम किरीटधारी के रथ के पीछे एक कोस की दूरी पर गिरी हुई, उसके तेजी से जाते समय छोड़ी गई बाणों की उस बौछार को नहीं देखते?

श्लोक 22 (7.94.22)

न चाहं शीघ्रयानेऽद्य समर्थो वयसान्वितः । सेनामुखे च पार्थानामेतद्बलमुपस्थितम् ॥

na cāhaṃ śīghrayāne'dya samartho vayasānvitaḥ | senāmukhe ca pārthānāmetadbalamupasthitam

आयु में बढ़ा होने के कारण आज मैं इतनी तेजी से जाने में समर्थ नहीं हूँ; और पार्थों की यह सेना भी सेना के अग्रभाग में आ डटी है।

श्लोक 23 (7.94.23)

युधिष्ठिरश्च मे ग्राह्यो मिषतां सर्वधन्विनाम् । एवं मया प्रतिज्ञातं क्षत्रमध्ये महाभुज ॥

yudhiṣṭhiraśca me grāhyo miṣatāṃ sarvadhanvinām | evaṃ mayā pratijñātaṃ kṣatramadhye mahābhuja

और हे महाबाहो! सब धनुर्धारियों के देखते-देखते युधिष्ठिर को मैं पकड़ूँगा; यह प्रतिज्ञा मैंने क्षत्रियों के बीच की है।

श्लोक 24 (7.94.24)

धनञ्जयेन चोत्सृष्टो वर्तते प्रमुखे नृप । तस्माद्व्यूहमुखं हित्वा नाहं यास्यामि फल्गुनम् ॥

dhanañjayena cotsṛṣṭo vartate pramukhe nṛpa | tasmādvyūhamukhaṃ hitvā nāhaṃ yāsyāmi phalgunam

हे राजन्! धनञ्जय उसे छोड़ गया है और वह सामने ही खड़ा है। इसलिए व्यूह का मुख छोड़कर मैं फल्गुन के पास नहीं जाऊँगा।

श्लोक 25 (7.94.25)

तुल्याभिजनकर्माणं शत्रुमेकं सहायवान् । गत्वा योधय मा भैस्त्वं त्वं ह्यस्य जगतः पतिः ॥

tulyābhijanakarmāṇaṃ śatrumekaṃ sahāyavān | gatvā yodhaya mā bhaistvaṃ tvaṃ hyasya jagataḥ patiḥ

वह कुल और कर्म में तुम्हारे समान है, अकेला शत्रु है और तुम्हारे पास सहायक हैं। तुम जाकर उससे युद्ध करो, डरो मत; तुम इस पृथ्वी के स्वामी हो।

श्लोक 26 (7.94.26)

राजा शूरः कृती दक्षो वैरमुत्पाद्य पाण्डवैः । वीरः स्वयं प्रयाह्याशु यत्र पार्थो धनञ्जयः ॥

rājā śūraḥ kṛtī dakṣo vairamutpādya pāṇḍavaiḥ | vīraḥ svayaṃ prayāhyāśu yatra pārtho dhanañjayaḥ

तुम राजा हो, शूर, कुशल और दक्ष हो, और पाण्डवों से वैर तुमने ही उत्पन्न किया है; इसलिए हे वीर! जहाँ पार्थ धनञ्जय है, वहाँ तुम स्वयं शीघ्र जाओ।"

दुर्योधन उवाच

श्लोक 27 (7.94.27)

कथं त्वामप्यतिक्रान्तः सर्वशस्त्रभृतां वरम् । धनञ्जयो मया शक्य आचार्य प्रतिबाधितुम् ॥

kathaṃ tvāmapyatikrāntaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varam | dhanañjayo mayā śakya ācārya pratibādhitum

"आचार्य! जब सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ आपको भी लाँघकर धनञ्जय निकल गया, तब मैं उसे कैसे रोक सकता हूँ?

श्लोक 28 (7.94.28)

अपि शक्यो रणे जेतुं वज्रहस्तः पुरन्दरः । नार्जुनः समरे शक्यो जेतुं परपुरञ्जयः ॥

api śakyo raṇe jetuṃ vajrahastaḥ purandaraḥ | nārjunaḥ samare śakyo jetuṃ parapurañjayaḥ

वज्रधारी पुरन्दर को तो युद्ध में जीता जा सकता है, किन्तु शत्रुओं के नगर जीतने वाले अर्जुन को युद्ध में नहीं जीता जा सकता।

श्लोक 29 (7.94.29)

येन भोजश्च हार्दिक्यो भवांश्च त्रिदशोपमः । अस्त्रप्रतापेन जितौ श्रुतायुश्च निबर्हितः ॥

yena bhojaśca hārdikyo bhavāṃśca tridaśopamaḥ | astrapratāpena jitau śrutāyuśca nibarhitaḥ

जिसने अपने अस्त्र के प्रताप से भोज, हार्दिक्य (कृतवर्मा) और देवताओं के समान आपको भी हरा दिया तथा श्रुतायुस् को मार गिराया,

श्लोक 30 (7.94.30)

सुदक्षिणश्च निहतः स च राजा श्रुतायुधः । श्रुतायुश्चाश्रुतायुश्च म्लेच्छाश्चायुतशो हताः ॥

sudakṣiṇaśca nihataḥ sa ca rājā śrutāyudhaḥ | śrutāyuścāśrutāyuśca mlecchāścāyutaśo hatāḥ

सुदक्षिण को मार डाला, राजा श्रुतायुध को भी, तथा श्रुतायुस्, अश्रुतायुस् और दसियों हजार म्लेच्छों को मार दिया,

श्लोक 31 (7.94.31)

तं कथं पाण्डवं युद्धे दहन्तमिव पावकम् । प्रतियोत्स्यामि दुर्धर्षं तन्ममाचक्ष्व सत्तम ॥

taṃ kathaṃ pāṇḍavaṃ yuddhe dahantamiva pāvakam | pratiyotsyāmi durdharṣaṃ tanmamācakṣva sattama

उस आग के समान दहकते हुए दुर्धर्ष पाण्डव का सामना मैं युद्ध में कैसे करूँगा? हे श्रेष्ठ! यह मुझे बताइए।

श्लोक 32 (7.94.32)

क्षमं चेन्मन्यसे युद्धं मम तेनाद्य शाधि माम् । परवानस्मि भवतः प्रेष्यवद्रक्ष मे यशः ॥

kṣamaṃ cenmanyase yuddhaṃ mama tenādya śādhi mām | paravānasmi bhavataḥ preṣyavadrakṣa me yaśaḥ

यदि आप मेरे लिए युद्ध उचित समझते हैं, तो आज मुझे उसकी आज्ञा दीजिए। मैं आपके अधीन हूँ; सेवक की भाँति मेरे यश की रक्षा कीजिए।"

द्रोण उवाच

श्लोक 33 (7.94.33)

सत्यं वदसि कौरव्य दुराधर्षो धनञ्जयः । अहं तु तत्करिष्यामि यथैनं प्रसहिष्यसि ॥

satyaṃ vadasi kauravya durādharṣo dhanañjayaḥ | ahaṃ tu tatkariṣyāmi yathainaṃ prasahiṣyasi

"हे कौरव! तुम सच कहते हो, धनञ्जय को जीतना कठिन है। फिर भी मैं ऐसा उपाय करूँगा, जिससे तुम उसका सामना कर सकोगे।

श्लोक 34 (7.94.34)

अद्भुतं चाद्य पश्यन्तु लोके सर्वधनुर्धराः । विषक्तं त्वयि कौन्तेयं वासुदेवस्य पश्यतः ॥

adbhutaṃ cādya paśyantu loke sarvadhanurdharāḥ | viṣaktaṃ tvayi kaunteyaṃ vāsudevasya paśyataḥ

आज सब धनुर्धर संसार में यह अद्भुत बात देखें कि वासुदेव के देखते-देखते कुन्तीपुत्र तुमसे भिड़ गया।

श्लोक 35 (7.94.35)

एष ते कवचं राजंस्तथा बध्नामि काञ्चनम् । यथा न बाणा नास्त्राणि प्रहरिष्यन्ति ते रणे ॥

eṣa te kavacaṃ rājaṃstathā badhnāmi kāñcanam | yathā na bāṇā nāstrāṇi prahariṣyanti te raṇe

हे राजन्! मैं तुम्हारे लिए यह सोने का कवच इस प्रकार बाँधता हूँ कि युद्ध में न बाण और न अस्त्र तुम पर प्रहार कर सकेंगे।

श्लोक 36 (7.94.36)

यदि त्वां सासुरसुराः सयक्षोरगराक्षसाः । योधयन्ति त्रयो लोकाः सनरा नास्ति ते भयम् ॥

yadi tvāṃ sāsurasurāḥ sayakṣoragarākṣasāḥ | yodhayanti trayo lokāḥ sanarā nāsti te bhayam

यदि असुरों और सुरों, यक्षों, नागों और राक्षसों सहित तथा मनुष्यों सहित तीनों लोक भी तुमसे लड़ें, तो भी तुम्हें भय नहीं।

श्लोक 37 (7.94.37)

न कृष्णो न च कौन्तेयो न चान्यः शस्त्रभृद्रणे । शरानर्पयितुं कश्चित्कवचे तव शक्ष्यति ॥

na kṛṣṇo na ca kaunteyo na cānyaḥ śastrabhṛdraṇe | śarānarpayituṃ kaścitkavace tava śakṣyati

न कृष्ण, न कुन्तीपुत्र, न कोई और शस्त्रधारी युद्ध में तुम्हारे कवच पर बाण जमाने में समर्थ होगा।

श्लोक 38 (7.94.38)

स त्वं कवचमास्थाय क्रुद्धमद्य रणेऽर्जुनम् । त्वरमाणः स्वयं याहि न त्वाऽसौ विषहिष्यति ॥

sa tvaṃ kavacamāsthāya kruddhamadya raṇe'rjunam | tvaramāṇaḥ svayaṃ yāhi na tvā'sau viṣahiṣyati

इसलिए तुम कवच धारण करके आज क्रुद्ध अर्जुन के पास स्वयं शीघ्र जाओ; वह तुम्हारा सामना नहीं कर सकेगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 39 (7.94.39)

एवमुक्त्वा त्वरन्द्रोणः स्पृष्ट्वाम्भो वर्म भास्वरम् । आबबन्धाद्भुततमं जपन्मन्त्रं यथाविधि ॥

evamuktvā tvarandroṇaḥ spṛṣṭvāmbho varma bhāsvaram | ābabandhādbhutatamaṃ japanmantraṃ yathāvidhi

ऐसा कहकर द्रोण ने शीघ्रता से जल का स्पर्श किया और विधिपूर्वक मन्त्र जपते हुए वह चमकता हुआ, अत्यन्त अद्भुत कवच उसे बाँध दिया,

श्लोक 40 (7.94.40)

रणे तस्मिन्सुमहति विजयस्य सुतस्य ते । विसिष्मापयिषुर्लोकान्विद्यया ब्रह्मवित्तमः ॥

raṇe tasminsumahati vijayasya sutasya te | visiṣmāpayiṣurlokānvidyayā brahmavittamaḥ

उस महायुद्ध में आपके पुत्र की विजय के लिए; ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण अपनी विद्या से लोकों को चकित करना चाहते थे।

द्रोण उवाच

श्लोक 41 (7.94.41)

करोतु स्वस्ति ते ब्रह्मा स्वस्ति कुर्वन्तु ब्राह्मणाः । सरीसृपाश्च ये श्रेष्ठास्तेभ्यस्ते स्वस्ति भारत ॥

karotu svasti te brahmā svasti kurvantu brāhmaṇāḥ | sarīsṛpāśca ye śreṣṭhāstebhyaste svasti bhārata

ब्रह्मा तुम्हारा कल्याण करें, ब्राह्मण कल्याण करें; और जो श्रेष्ठ रेंगने वाले जीव हैं, हे भारत! उनसे भी तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 42 (7.94.42)

ययातिर्नहुषश्चैव धुन्धुमारो भगीरथः । तुभ्यं राजर्षयः सर्वे स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा ॥

yayātirnahuṣaścaiva dhundhumāro bhagīrathaḥ | tubhyaṃ rājarṣayaḥ sarve svasti kurvantu te sadā

ययाति, नहुष, धुन्धुमार, भगीरथ, ये सब राजर्षि सदा तुम्हारा कल्याण करें।

श्लोक 43 (7.94.43)

स्वस्ति तेऽस्त्वेकपादेभ्यो बहुपादेभ्य एव च । स्वस्त्यस्त्वपादकेभ्यश्च नित्यं तव महारणे ॥

svasti te'stvekapādebhyo bahupādebhya eva ca | svastyastvapādakebhyaśca nityaṃ tava mahāraṇe

एक पैर वालों से, बहुत पैर वालों से और बिना पैर वालों से भी इस महायुद्ध में तुम्हारा सदा कल्याण हो।

श्लोक 44 (7.94.44)

स्वाहा स्वधा शची चैव स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा । लक्ष्मीररुन्धती चैव कुरुतां स्वस्ति तेऽनघ ॥

svāhā svadhā śacī caiva svasti kurvantu te sadā | lakṣmīrarundhatī caiva kurutāṃ svasti te'nagha

स्वाहा, स्वधा और शची सदा तुम्हारा कल्याण करें; हे निष्पाप! लक्ष्मी और अरुन्धती भी तुम्हारा कल्याण करें।

श्लोक 45 (7.94.45)

असितो देवलश्चैव विश्वामित्रस्तथाङ्गिराः । वसिष्ठः कश्यपश्चैव स्वस्ति कुर्वन्तु ते नृप ॥

asito devalaścaiva viśvāmitrastathāṅgirāḥ | vasiṣṭhaḥ kaśyapaścaiva svasti kurvantu te nṛpa

असित, देवल, विश्वामित्र, अङ्गिरा, वसिष्ठ और कश्यप, हे राजन्! ये तुम्हारा कल्याण करें।

श्लोक 46 (7.94.46)

धाता विधाता लोकेशो दिशश्च सदिगीश्वराः । स्वस्ति तेऽद्य प्रयच्छन्तु कार्तिकेयश्च षण्मुखः ॥

dhātā vidhātā lokeśo diśaśca sadigīśvarāḥ | svasti te'dya prayacchantu kārtikeyaśca ṣaṇmukhaḥ

धाता, विधाता, लोकेश, दिशाएँ और उनके दिक्पाल तथा छः मुख वाले कार्तिकेय आज तुम्हें कल्याण प्रदान करें।

श्लोक 47 (7.94.47)

येन देवाः सकृद्भग्नाः सङ्ग्रामे तारकामये । धृताः स चाहतः शूरो ह्यवध्यो देवतागणैः ॥

yena devāḥ sakṛdbhagnāḥ saṅgrāme tārakāmaye | dhṛtāḥ sa cāhataḥ śūro hyavadhyo devatāgaṇaiḥ

जिसने तारकामय संग्राम में एक बार देवताओं के पराजित होने पर उन्हें सँभाला, और जो वह शूर अक्षत है तथा देवताओं के समूहों से भी अवध्य है,

श्लोक 48 (7.94.48)

विवस्वान्कुरुतां स्वस्ति तथा वैवस्वतो यमः । पार्षदा वशगा यस्य स्वस्ति तुभ्यं प्रयच्छतु ॥

vivasvānkurutāṃ svasti tathā vaivasvato yamaḥ | pārṣadā vaśagā yasya svasti tubhyaṃ prayacchatu

विवस्वान् तुम्हारा कल्याण करें, वैसे ही वैवस्वत यम भी; जिसके अधीन उसके अनुचर हैं, वह तुम्हें कल्याण प्रदान करे।

श्लोक 49 (7.94.49)

दिग्गजाश्चैव चत्वारः क्षितिश्च गगनं ग्रहाः । दिशश्च विदिशश्चैव सिद्धा लोकहिते रताः । स्वस्ति कुर्वन्तु ते नित्यं मन्त्रेणानेन संस्तुताः ॥

diggajāścaiva catvāraḥ kṣitiśca gaganaṃ grahāḥ | diśaśca vidiśaścaiva siddhā lokahite ratāḥ | svasti kurvantu te nityaṃ mantreṇānena saṃstutāḥ

चारों दिग्गज, पृथ्वी, आकाश, ग्रह, दिशाएँ-विदिशाएँ और लोकहित में लगे सिद्ध, इस मन्त्र से स्तुत होकर वे सदा तुम्हारा कल्याण करें।

श्लोक 50 (7.94.50)

अधस्ताद्धरणीं योऽसौ सदा धारयते नृप । शेषश्च पन्नगश्रेष्ठः स्वस्ति तुभ्यं प्रयच्छतु ॥

adhastāddharaṇīṃ yo'sau sadā dhārayate nṛpa | śeṣaśca pannagaśreṣṭhaḥ svasti tubhyaṃ prayacchatu

हे राजन्! जो नीचे सदा पृथ्वी को धारण किए हुए हैं, वे नागश्रेष्ठ शेष तुम्हें कल्याण प्रदान करें।

श्लोक 51 (7.94.51)

गान्धारे युधि विक्रम्य निर्जिते पाकशासनेः । पुरा वृत्रेण दैत्येन भिन्नदेहाः सहस्रशः ॥

gāndhāre yudhi vikramya nirjite pākaśāsaneḥ | purā vṛtreṇa daityena bhinnadehāḥ sahasraśaḥ

हे गान्धारीपुत्र! प्राचीन काल में जब इन्द्र की सेना को युद्ध में पराक्रम दिखाने पर भी दैत्य वृत्र ने हरा दिया, तब हजारों देवताओं के शरीर छिन्न-भिन्न हो गए थे,

श्लोक 52 (7.94.52)

हृततेजोबलाः सर्वे तदा सेन्द्रा दिवौकसः । ब्रह्माणं शरणं जग्मुर्वृत्राद्भीता महासुरात् ॥

hṛtatejobalāḥ sarve tadā sendrā divaukasaḥ | brahmāṇaṃ śaraṇaṃ jagmurvṛtrādbhītā mahāsurāt

उनका तेज और बल हर लिया गया था; तब इन्द्र सहित सब देवता महान असुर वृत्र से डरकर ब्रह्मा की शरण में गए।

देवा ऊचुः

श्लोक 53 (7.94.53)

प्रमार्दितानां वृत्रेण देवानां देवसत्तम । गतिर्भव सुरश्रेष्ठ त्राहि नो महतो भयात् ॥

pramārditānāṃ vṛtreṇa devānāṃ devasattama | gatirbhava suraśreṣṭha trāhi no mahato bhayāt

"हे देवश्रेष्ठ! वृत्र से पीड़ित हम देवताओं की गति बनिए। हे सुरश्रेष्ठ! इस महान भय से हमारी रक्षा कीजिए।"

द्रोण उवाच

श्लोक 54 (7.94.54)

अथ पार्श्वे स्थितं विष्णुं शक्रादींश्च सुरोत्तमान् । प्राह पथ्यमिदं वाक्यं विषण्णान्सुरसत्तमान् ॥

atha pārśve sthitaṃ viṣṇuṃ śakrādīṃśca surottamān | prāha pathyamidaṃ vākyaṃ viṣaṇṇānsurasattamān

तब ब्रह्मा ने अपने पास खड़े विष्णु तथा शक्र आदि दुःखी श्रेष्ठ देवताओं से यह हितकर वचन कहा:

ब्रह्मोवाच

श्लोक 55 (7.94.55)

रक्ष्या मे सततं देवाः सहेन्द्राः सद्विजातयः । त्वष्टुः सुदुर्धरं तेजो येन वृत्रो विनिर्मितः ॥

rakṣyā me satataṃ devāḥ sahendrāḥ sadvijātayaḥ | tvaṣṭuḥ sudurdharaṃ tejo yena vṛtro vinirmitaḥ

"इन्द्रसहित देवताओं और ब्राह्मणों की मुझे सदा रक्षा करनी चाहिए। त्वष्टा का तेज दुस्सह है, जिससे वृत्र बनाया गया है।

श्लोक 56 (7.94.56)

त्वष्ट्रा पुरा तपस्तप्त्वा वर्षायुतशतं तदा । वृत्रो विनिर्मितो देवाः प्राप्यानुज्ञां महेश्वरात् ॥

tvaṣṭrā purā tapastaptvā varṣāyutaśataṃ tadā | vṛtro vinirmito devāḥ prāpyānujñāṃ maheśvarāt

हे देवताओ! त्वष्टा ने पहले दस हजार वर्षों के सौ गुने समय तक तप करके महेश्वर की अनुमति पाकर वृत्र को रचा।

श्लोक 57 (7.94.57)

शंकरस्य प्रसादाद्वै हन्याद्देवरिपुर्बली । नागत्वा शंकरस्थानं भगवान्दृश्यते हरः ॥

śaṃkarasya prasādādvai hanyāddevaripurbalī | nāgatvā śaṃkarasthānaṃ bhagavāndṛśyate haraḥ

शंकर की कृपा से ही वह बलवान देवशत्रु मारने में समर्थ है। शंकर के स्थान पर गए बिना भगवान हर के दर्शन नहीं होते।

श्लोक 58 (7.94.58)

दृष्ट्वा जेष्यथ वृत्रं तं क्षिप्रं गच्छत मन्दरम् । यत्रास्ते तपसां योनिर्दक्षयज्ञविनाशनः ॥

dṛṣṭvā jeṣyatha vṛtraṃ taṃ kṣipraṃ gacchata mandaram | yatrāste tapasāṃ yonirdakṣayajñavināśanaḥ

उनके दर्शन करके तुम वृत्र को जीतोगे। शीघ्र मन्दर पर्वत जाओ, जहाँ तपस्याओं के उत्पत्ति-स्थान, दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले,

द्रोण उवाच

श्लोक 59 (7.94.59)

पिनाकी सर्वभूतेशो भगनेत्रनिपातनः । ते गत्वा सहिता देवा ब्रह्मणा सह मन्दरम् ॥

pinākī sarvabhūteśo bhaganetranipātanaḥ | te gatvā sahitā devā brahmaṇā saha mandaram

पिनाकधारी, सब प्राणियों के स्वामी, भग की आँखें फोड़ने वाले शिव रहते हैं।" वे देवता ब्रह्मा के साथ मिलकर मन्दर पर्वत पर गए,

श्लोक 60 (7.94.60)

अपश्यंस्तेजसां राशिं सूर्यकोटिसमप्रभम् । सोऽब्रवीत्स्वागतं देवा ब्रूत किं करवाण्यहम् ॥

apaśyaṃstejasāṃ rāśiṃ sūryakoṭisamaprabham | so'bravītsvāgataṃ devā brūta kiṃ karavāṇyaham

और वहाँ उन्होंने करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी तेज की राशि देखी। उसने कहा, "देवताओ, स्वागत है! बोलो, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?

श्लोक 61 (7.94.61)

अमोघं दर्शनं मह्यं कामप्राप्तिरतोऽस्तु वः । एवमुक्तास्तु ते सर्वे प्रत्यूचुस्तं दिवौकसः ॥

amoghaṃ darśanaṃ mahyaṃ kāmaprāptirato'stu vaḥ | evamuktāstu te sarve pratyūcustaṃ divaukasaḥ

मेरा दर्शन कभी निष्फल नहीं होता; अतः तुम्हारी इच्छा पूरी हो।" ऐसा कहे जाने पर उन सब स्वर्गवासियों ने उनसे कहा:

देवा ऊचुः

श्लोक 62 (7.94.62)

हृतौजसां नो वृत्रेण गतिर्भव दिवौकसाम् । मूर्तीरीक्षस्व नो देव प्रहारैर्जर्जरीकृताः । शरणं त्वां प्रपन्नाः स्म गतिर्भव महेश्वर ॥

hṛtaujasāṃ no vṛtreṇa gatirbhava divaukasām | mūrtīrīkṣasva no deva prahārairjarjarīkṛtāḥ | śaraṇaṃ tvāṃ prapannāḥ sma gatirbhava maheśvara

"वृत्र ने हमारा बल हर लिया है; हम स्वर्गवासियों की गति बनिए। हे देव! हमारे शरीर देखिए, जो प्रहारों से जर्जर हो गए हैं। हम आपकी शरण आए हैं; हे महेश्वर! हमारी गति बनिए।"

शर्व उवाच

श्लोक 63 (7.94.63)

विदितं वो यथा देवाः कृत्येयं सुमहाबला । त्वष्टुस्तेजोभवा घोरा दुर्निवार्याऽकृतात्मभिः ॥

viditaṃ vo yathā devāḥ kṛtyeyaṃ sumahābalā | tvaṣṭustejobhavā ghorā durnivāryā'kṛtātmabhiḥ

"हे देवताओ! आप जानते हैं कि यह कृत्या अत्यन्त बलवती है; यह त्वष्टा के तेज से उत्पन्न, भयंकर और असंयमी लोगों के लिए रोकना असम्भव है।

श्लोक 64 (7.94.64)

अवश्यं तु मया कार्यं साह्यं सर्वदिवौकसाम् । ममेदं गात्रजं शक्र कवचं गृह्य भास्वरम् ॥

avaśyaṃ tu mayā kāryaṃ sāhyaṃ sarvadivaukasām | mamedaṃ gātrajaṃ śakra kavacaṃ gṛhya bhāsvaram

फिर भी समस्त स्वर्गवासियों की सहायता मुझे अवश्य करनी है। हे शक्र! मेरे शरीर से उत्पन्न इस चमकते कवच को लो,

श्लोक 65 (7.94.65)

बधानानेन मन्त्रेण मानसेन सुरेश्वर । वधायासुरमुख्यस्य वृत्रस्य सुरघातिनः ॥

badhānānena mantreṇa mānasena sureśvara | vadhāyāsuramukhyasya vṛtrasya suraghātinaḥ

और हे सुरेश्वर! इस मन्त्र से, मन ही मन उच्चारण करके, इसे बाँध लो, देवताओं का संहार करने वाले असुरप्रमुख वृत्र के वध के लिए।"

द्रोण उवाच

श्लोक 66 (7.94.66)

इत्युक्त्वा वरदः प्रादाद्वर्म तन्मन्त्रमेव च । स तेन वर्मणा गुप्तः प्रायाद्वृत्रचमूं प्रति ॥

ityuktvā varadaḥ prādādvarma tanmantrameva ca | sa tena varmaṇā guptaḥ prāyādvṛtracamūṃ prati

ऐसा कहकर वरदाता ने कवच और उसका मन्त्र भी दे दिया। उस कवच से रक्षित होकर इन्द्र वृत्र की सेना की ओर चला।

श्लोक 67 (7.94.67)

नानाविधैश्च शस्त्रौघैः पात्यमानैर्महारणे । न सन्धिः शक्यते भेत्तुं वर्मबन्धस्य तस्य तु ॥

nānāvidhaiśca śastraughaiḥ pātyamānairmahāraṇe | na sandhiḥ śakyate bhettuṃ varmabandhasya tasya tu

महायुद्ध में अनेक प्रकार के शस्त्रों की वर्षा होने पर भी उस कवच के बन्धन की कोई सन्धि भेदी नहीं जा सकी।

श्लोक 68 (7.94.68)

स तेन वर्मणा गुप्तो वृत्रं देवरिपुं तदा । जघान समरेऽभीतः शक्रो देवाग्रणीस्तदा ॥

sa tena varmaṇā gupto vṛtraṃ devaripuṃ tadā | jaghāna samare'bhītaḥ śakro devāgraṇīstadā

उस कवच से रक्षित, निर्भय देवाग्रणी शक्र ने तब देवशत्रु वृत्र को मार डाला।

श्लोक 69 (7.94.69)

तं च मन्त्रमयं बन्धं वर्म चाङ्गिरसे ददौ । अङ्गिराः प्राह पुत्रस्य मन्त्रज्ञस्य बृहस्पतेः । बृहस्पतिरथोवाच अग्निवेश्याय धीमते ॥

taṃ ca mantramayaṃ bandhaṃ varma cāṅgirase dadau | aṅgirāḥ prāha putrasya mantrajñasya bṛhaspateḥ | bṛhaspatirathovāca agniveśyāya dhīmate

उस मन्त्रमय बन्धन और कवच को उन्होंने अङ्गिरा को दिया। अङ्गिरा ने अपने पुत्र मन्त्रज्ञ बृहस्पति को उसे बताया, और बृहस्पति ने बुद्धिमान अग्निवेश्य से कहा।

श्लोक 70 (7.94.70)

अग्निवेश्यो मम प्रादात्तेन बध्नामि वर्म ते । तवाह्य देहरक्षार्थं मन्त्रेण नृपसत्तम ॥

agniveśyo mama prādāttena badhnāmi varma te | tavāhya deharakṣārthaṃ mantreṇa nṛpasattama

अग्निवेश्य ने वह मुझे दिया; हे नृपश्रेष्ठ! उसी मन्त्र से मैं आज तुम्हारे शरीर की रक्षा के लिए तुम्हारा कवच बाँधता हूँ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 71 (7.94.71)

एवमुक्त्वा ततो द्रोणस्तव पुत्रं महाद्युतिम् । पुनरेव वचः प्राह शनैराचार्यपुङ्गवः ॥

evamuktvā tato droṇastava putraṃ mahādyutim | punareva vacaḥ prāha śanairācāryapuṅgavaḥ

ऐसा कहकर आचार्यश्रेष्ठ द्रोण ने आपके तेजस्वी पुत्र से फिर धीरे से यह वचन कहा:

द्रोण उवाच

श्लोक 72 (7.94.72)

ब्रह्मसूत्रेण बध्नामि कवचं तव भारत । हिरण्यगर्भेण यथा बद्धं विष्णोः पुरा रणे ॥

brahmasūtreṇa badhnāmi kavacaṃ tava bhārata | hiraṇyagarbheṇa yathā baddhaṃ viṣṇoḥ purā raṇe

"हे भारत! मैं ब्रह्मसूत्र से तुम्हारा कवच बाँधता हूँ, जैसे पूर्वकाल में युद्ध में हिरण्यगर्भ ने विष्णु का कवच बाँधा था,

श्लोक 73 (7.94.73)

यथा च ब्रह्मणा बद्धं सङ्ग्रामे तारकामये । शक्रस्य कवचं दिव्यं तथा बध्नाम्यहं तव ॥

yathā ca brahmaṇā baddhaṃ saṅgrāme tārakāmaye | śakrasya kavacaṃ divyaṃ tathā badhnāmyahaṃ tava

और जैसे तारकामय संग्राम में ब्रह्मा ने शक्र का दिव्य कवच बाँधा था, वैसे ही मैं तुम्हारा बाँधता हूँ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 74 (7.94.74)

बद्ध्वा तु कवचं तस्य मन्त्रेण विधिपूर्वकम् । प्रेषयामास राजानं युद्धाय महते द्विजः ॥

baddhvā tu kavacaṃ tasya mantreṇa vidhipūrvakam | preṣayāmāsa rājānaṃ yuddhāya mahate dvijaḥ

मन्त्र से विधिपूर्वक उसका कवच बाँधकर उस ब्राह्मण ने राजा को महायुद्ध के लिए भेज दिया।

श्लोक 75 (7.94.75)

स सन्नद्धो महाबाहुराचार्येण महात्मना । प्रस्थितः सहसा राजन्यत्र यातो धनञ्जयः ॥

sa sannaddho mahābāhurācāryeṇa mahātmanā | prasthitaḥ sahasā rājanyatra yāto dhanañjayaḥ

महात्मा आचार्य द्वारा कवचबद्ध वह महाबाहु, हे राजन्! तुरन्त वहाँ चल पड़ा जहाँ धनञ्जय गया था,

श्लोक 76 (7.94.76)

रथानां च सहस्रेण त्रिगर्तानां प्रहारिणाम् । तथा दन्तिसहस्रेण मत्तानां वीर्यशालिनाम् ॥

rathānāṃ ca sahasreṇa trigartānāṃ prahāriṇām | tathā dantisahasreṇa mattānāṃ vīryaśālinām

एक हजार प्रहार करने वाले त्रिगर्तों के रथों और पराक्रमी मतवाले एक हजार हाथियों के साथ,

श्लोक 77 (7.94.77)

अश्वानां नियुतेनैव तथाऽन्यैश्च महारथैः । वृतः प्रायान्महाबाहुरर्जुनस्य रथं प्रति ॥

aśvānāṃ niyutenaiva tathā'nyaiśca mahārathaiḥ | vṛtaḥ prāyānmahābāhurarjunasya rathaṃ prati

एक नियुत घोड़ों और अन्य महारथियों से घिरा हुआ वह महाबाहु अर्जुन के रथ की ओर बढ़ा,

श्लोक 78 (7.94.78)

नानावादित्रघोषेण यथा वैरोचनिस्तथा ॥

nānāvāditraghoṣeṇa yathā vairocanistathā

अनेक प्रकार के वाद्यों की ध्वनि के साथ, वैरोचनि बलि के समान।

श्लोक 79 (7.94.79)

ततः शब्दो महानासीत्सैन्यानां तव भारत । अगाधं प्रस्थितं दृष्ट्वा समुद्रमिव कौरवम् ॥

tataḥ śabdo mahānāsītsainyānāṃ tava bhārata | agādhaṃ prasthitaṃ dṛṣṭvā samudramiva kauravam

तब हे भारत! कौरव सेना को अथाह समुद्र के समान आगे बढ़ते देखकर आपकी सेनाओं में बड़ा कोलाहल उठा।

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