कर्ण पर्व · अध्याय 1
कर्ण का सेनापतित्व; सञ्जय द्वारा धृतराष्ट्र को समाचार
जनमेजय पूछते हैं कि कर्ण के पतन का समाचार सुनकर धृतराष्ट्र ने कैसे प्राण धारण किए, और वैशम्पायन पूर्व-घटनाएँ सुनाते हैं: द्रोण के मरने पर राजा अश्वत्थामा के पास एकत्र होते हैं, दुर्योधन के भवन में पाण्डवों को दिए कष्टों का चिन्तन करते हुए रात बिताते हैं और प्रभात में कर्ण को सेनापति बनाते हैं; दो दिन के युद्ध के बाद अर्जुन उसे गिरा देते हैं। सञ्जय हस्तिनापुर पहुँचते हैं, धृतराष्ट्र का शोक पूछते हैं, और राजा द्रोण-भीष्म तथा सेनाओं के हाल के बारे में पूछते हैं; सञ्जय बताते हैं कि निराश सेना को देखकर दुर्योधन ने कर्ण को सेनापति बनाया। फिर सञ्जय राजा को कर्ण और दुःशासन की मृत्यु का समाचार देते हैं; धृतराष्ट्र मूर्च्छित हो जाते हैं, स्त्रियाँ विलाप करती हैं, और होश आने पर वे पूछते हैं कि दुर्योधन जीवित है या नहीं, फिर सञ्जय को रुकने को कहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (8.1.1)
ततो द्रोणे हते राजन्दुर्योधनमुखा नृपाः । भृशमुद्विग्नमनसो द्रोणपुत्रमुपागमन् ॥
tato droṇe hate rājanduryodhanamukhā nṛpāḥ | bhṛśamudvignamanaso droṇaputramupāgaman
हे राजन्! तब द्रोण के मारे जाने पर दुर्योधन को आगे रखने वाले राजा अत्यन्त उद्विग्न मन से द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा के पास गए।
श्लोक 2 (8.1.2)
ते द्रोणमनुशोचन्तः कश्मलाभिहतौजसः । पर्युपासन्त शोकार्तास्ततः शारद्वतीसुतम् ॥
te droṇamanuśocantaḥ kaśmalābhihataujasaḥ | paryupāsanta śokārtāstataḥ śāradvatīsutam
द्रोण के लिए शोक करते, उदासी से तेज खोए हुए और शोक से पीड़ित वे राजा शारद्वती-पुत्र अश्वत्थामा की सेवा में बैठे रहे।
श्लोक 3 (8.1.3)
ते मुहूर्तं समाश्वस्य हेतुभिः शास्त्रसम्मितैः । रात्र्यागमे महीपालाः स्वानि वेश्मानि भेजिरे ॥
te muhūrtaṃ samāśvasya hetubhiḥ śāstrasammitaiḥ | rātryāgame mahīpālāḥ svāni veśmāni bhejire
शास्त्र-सम्मत युक्तियों से कुछ देर सान्त्वना पाकर वे राजा रात होने पर अपने-अपने भवनों को चले गए।
श्लोक 4 (8.1.4)
ते वेश्मस्वपि कौरव्य पृथ्वीशा नाप्नुवन्सुखम् । चिन्तयन्तः क्षयं तीव्रं दुःखशोकसमन्विताः ॥
te veśmasvapi kauravya pṛthvīśā nāpnuvansukham | cintayantaḥ kṣayaṃ tīvraṃ duḥkhaśokasamanvitāḥ
हे कौरव्य! अपने भवनों में भी वे राजा सुख न पा सके; भयंकर विनाश का चिन्तन करते हुए वे दुःख और शोक से भरे थे।
श्लोक 5 (8.1.5)
विशेषतः सूतपुत्रो राजा चैव सुयोधनः । दुःशासनश्च शकुनिः सौबलश्च महाबलः ॥
viśeṣataḥ sūtaputro rājā caiva suyodhanaḥ | duḥśāsanaśca śakuniḥ saubalaśca mahābalaḥ
विशेष रूप से सूतपुत्र कर्ण, राजा सुयोधन, दुःशासन और सुबल-पुत्र महाबली शकुनि —
श्लोक 6 (8.1.6)
उषितास्ते निशां तां तु दुर्योधननिवेशने । चिन्तयन्तः परिक्लेशान्पाण्डवानां महात्मनाम् ॥
uṣitāste niśāṃ tāṃ tu duryodhananiveśane | cintayantaḥ parikleśānpāṇḍavānāṃ mahātmanām
उस रात दुर्योधन के भवन में रहे और महात्मा पाण्डवों को दिए गए कष्टों का चिन्तन करते रहे।
श्लोक 7 (8.1.7)
यत्तद्द्यूते परिक्लिष्टा कृष्णा चानायिता सभाम् । तत्स्मरन्तोऽनुशोचन्तो भृशमुद्विग्नचेतसः ॥
yattaddyūte parikliṣṭā kṛṣṇā cānāyitā sabhām | tatsmaranto'nuśocanto bhṛśamudvignacetasaḥ
जुए में द्रौपदी को जो कष्ट दिया गया और उसे सभा में लाया गया, उसे स्मरण करके वे शोक करते रहे; उनके मन अत्यन्त उद्विग्न थे।
श्लोक 8 (8.1.8)
तथा तु सञ्चिन्तयतां तान्क्लेशान्द्यूतकारितान् । दुःखेन क्षणदा राजञ्जगामाब्दशतोपमा ॥
tathā tu sañcintayatāṃ tānkleśāndyūtakāritān | duḥkhena kṣaṇadā rājañjagāmābdaśatopamā
जुए से उत्पन्न उन कष्टों का चिन्तन करते हुए उनकी वह रात, हे राजन्! दुःख में सौ वर्षों के समान बीती।
श्लोक 9 (8.1.9)
ततः प्रभाते विमले स्थिता दिष्टस्य शासने । चक्रुरावश्यकं सर्वे विधिदृष्टेन कर्मणा ॥
tataḥ prabhāte vimale sthitā diṣṭasya śāsane | cakrurāvaśyakaṃ sarve vidhidṛṣṭena karmaṇā
फिर निर्मल प्रभात होने पर दैव के विधान को मानते हुए उन सबने विधि के अनुसार आवश्यक कर्म किए।
श्लोक 10 (8.1.10)
ते कृत्वाऽवश्यकार्याणि समाश्वस्य च भारत । योगमाज्ञापयामासुर्युद्धाय च विनिर्ययुः ॥
te kṛtvā'vaśyakāryāṇi samāśvasya ca bhārata | yogamājñāpayāmāsuryuddhāya ca viniryayuḥ
हे भारत! आवश्यक कार्य पूरे करके और धैर्य धारण करके उन्होंने सेना को सजने की आज्ञा दी और युद्ध के लिए निकल पड़े।
श्लोक 11 (8.1.11)
कर्णं सेनापतिं कृत्वा कृतकौतुकमङ्गलाः । पूजयित्वा द्विजश्रेष्ठान्दधिपात्रघृताक्षतैः ॥
karṇaṃ senāpatiṃ kṛtvā kṛtakautukamaṅgalāḥ | pūjayitvā dvijaśreṣṭhāndadhipātraghṛtākṣataiḥ
कर्ण को सेनापति बनाकर, मङ्गल-रक्षा के कृत्य करके और दही के पात्रों, घी तथा अक्षत से श्रेष्ठ ब्राह्मणों का पूजन करके,
श्लोक 12 (8.1.12)
गोभिरश्वैश्च निष्कैश्च वासोभिश्च महाधनैः । वन्द्यमाना जयाशीर्भिः सूतमागधबन्दिभिः ॥
gobhiraśvaiśca niṣkaiśca vāsobhiśca mahādhanaiḥ | vandyamānā jayāśīrbhiḥ sūtamāgadhabandibhiḥ
गायों, घोड़ों, स्वर्ण-मुद्राओं और बहुमूल्य वस्त्रों के दान के साथ, और सूत, मागध तथा बन्दीजनों द्वारा विजय के आशीर्वादों से अभिनन्दित होते हुए —
श्लोक 13 (8.1.13)
तथैव पाण्डवा राजन्कृतपूर्वाह्णिकक्रियाः । शिबिरान्निर्ययुस्तूर्णं युद्धाय कृतनिश्चयाः ॥
tathaiva pāṇḍavā rājankṛtapūrvāhṇikakriyāḥ | śibirānniryayustūrṇaṃ yuddhāya kṛtaniścayāḥ
हे राजन्! उसी प्रकार पाण्डव भी प्रातःकाल के कर्म करके युद्ध का निश्चय किए हुए शीघ्र ही शिविरों से बाहर निकले।
श्लोक 14 (8.1.14)
ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । कुरूणां पाण्डवानां च परस्परजयैषिणाम् ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tumulaṃ romaharṣaṇam | kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca parasparajayaiṣiṇām
तब कुरुओं और पाण्डवों के बीच, जो एक-दूसरे को जीतना चाहते थे, रोमाञ्चकारी तुमुल युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 15 (8.1.15)
तयोर्द्वौ दिवसौ युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः । कर्णे सेनापतौ राजन्बभूवाद्भुतदर्शनम् ॥
tayordvau divasau yuddhaṃ kurupāṇḍavasenayoḥ | karṇe senāpatau rājanbabhūvādbhutadarśanam
हे राजन्! कर्ण के सेनापति रहते कुरु और पाण्डव सेनाओं का वह युद्ध दो दिन तक चला और अद्भुत दिखाई देता रहा।
श्लोक 16 (8.1.16)
ततः शत्रुक्षयं कृत्वा सुमहान्तं रणे वृषः । पश्यतां धार्तराष्ट्राणां फल्गुनेन निपातितः ॥
tataḥ śatrukṣayaṃ kṛtvā sumahāntaṃ raṇe vṛṣaḥ | paśyatāṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ phalgunena nipātitaḥ
तब रण में शत्रुओं का बहुत बड़ा संहार करके वृष (कर्ण) धृतराष्ट्र-पुत्रों के देखते-देखते फल्गुन अर्जुन के हाथों गिरा दिया गया।
श्लोक 17 (8.1.17)
ततस्तु सञ्जयः सर्वं गत्वा नागपुरं द्रुतम् । आचष्ट धृतराष्ट्राय यद्वृत्तं कुरुजाङ्गले ॥
tatastu sañjayaḥ sarvaṃ gatvā nāgapuraṃ drutam | ācaṣṭa dhṛtarāṣṭrāya yadvṛttaṃ kurujāṅgale
तब सञ्जय शीघ्र ही नागपुर (हस्तिनापुर) गए और कुरुजाङ्गल में जो कुछ हुआ था, वह सब धृतराष्ट्र को बता दिया।
जनमेजय उवाच
श्लोक 18 (8.1.18)
आपगेयं हतं श्रुत्वा द्रोणं चापि महारथम् । आजगाम परामार्तिं वृद्धो राजाऽम्बिकासुतः ॥
āpageyaṃ hataṃ śrutvā droṇaṃ cāpi mahāratham | ājagāma parāmārtiṃ vṛddho rājā'mbikāsutaḥ
गङ्गा-पुत्र भीष्म और महारथी द्रोण के मारे जाने की बात सुनकर वृद्ध राजा अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र अत्यन्त पीड़ा में पड़ गए थे।
श्लोक 19 (8.1.19)
स श्रुत्वा निहतं कर्णं दुर्योधनहितैषिणम् । कथं द्विजवर प्राणानधारयत दुःखितः ॥
sa śrutvā nihataṃ karṇaṃ duryodhanahitaiṣiṇam | kathaṃ dvijavara prāṇānadhārayata duḥkhitaḥ
दुर्योधन के हितैषी कर्ण को मारा गया सुनकर, हे द्विजश्रेष्ठ! उन दुःखी राजा ने अपने प्राण कैसे धारण किए?
श्लोक 20 (8.1.20)
यस्मिञ्जयाशां पुत्राणां सममन्यत पार्थिवः । तस्मिन्हते स कौरव्यः कथं प्राणानधारयत् ॥
yasmiñjayāśāṃ putrāṇāṃ samamanyata pārthivaḥ | tasminhate sa kauravyaḥ kathaṃ prāṇānadhārayat
राजा ने अपने पुत्रों की विजय की आशा जिस पर टिका रखी थी, उसके मारे जाने पर वे कुरुवंशी राजा प्राण कैसे धारण कर सके?
श्लोक 21 (8.1.21)
दुर्मरं तदहं मन्ये नृणां कृच्छ्रेऽपि वर्तताम् । यत्र कर्णं हतं श्रुत्वा नात्यजज्जीवितं नृपः ॥
durmaraṃ tadahaṃ manye nṛṇāṃ kṛcchre'pi vartatām | yatra karṇaṃ hataṃ śrutvā nātyajajjīvitaṃ nṛpaḥ
मैं समझता हूँ कि घोर कष्ट में पड़े मनुष्यों के लिए भी मरना कठिन है, क्योंकि कर्ण के मारे जाने की बात सुनकर भी राजा ने प्राण नहीं छोड़े।
श्लोक 22 (8.1.22)
तथा शान्तनवं वृद्धं ब्रह्मन्बाह्लीकमेव च । द्रोणं च सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च ॥
tathā śāntanavaṃ vṛddhaṃ brahmanbāhlīkameva ca | droṇaṃ ca somadattaṃ ca bhūriśravasameva ca
और हे ब्रह्मन्! शान्तनु के वृद्ध पुत्र भीष्म, बाह्लीक, द्रोण, सोमदत्त और भूरिश्रवा —
श्लोक 23 (8.1.23)
तथैव चान्यान्सुहृदः पुत्रान्पौत्रांश्च पातितान् । श्रुत्वा यन्नाजहात्प्राणांस्तन्मन्ये दुष्करं द्विज ॥
tathaiva cānyānsuhṛdaḥ putrānpautrāṃśca pātitān | śrutvā yannājahātprāṇāṃstanmanye duṣkaraṃ dvija
और उसी प्रकार अन्य मित्रों, पुत्रों और पौत्रों को मारा गया सुनकर भी उन्होंने प्राण नहीं छोड़े — हे द्विज! मैं इसे अत्यन्त कठिन मानता हूँ।
श्लोक 24 (8.1.24)
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामुने । न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥
etanme sarvamācakṣva vistareṇa mahāmune | na hi tṛpyāmi pūrveṣāṃ śṛṇvānaścaritaṃ mahat
हे महामुने! यह सब मुझे विस्तार से सुनाइए; अपने पूर्वजों के महान चरित सुनते हुए मैं कभी तृप्त नहीं होता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (8.1.25)
हते कर्णे महाराज निशि गावल्गणिस्तदा । दीनो ययौ नागपुरमश्वैर्वातसमैर्जवे ॥
hate karṇe mahārāja niśi gāvalgaṇistadā | dīno yayau nāgapuramaśvairvātasamairjave
महाराज! कर्ण के मारे जाने पर उसी रात गवल्गण-पुत्र सञ्जय उदास होकर वायु के समान वेग वाले घोड़ों से नागपुर की ओर चल पड़े।
श्लोक 26 (8.1.26)
स हास्तिनपुरं गत्वा भृशमुद्विग्नचेतनः । जगाम धृतराष्ट्रस्य क्षयं प्रक्षीणबान्धवम् ॥
sa hāstinapuraṃ gatvā bhṛśamudvignacetanaḥ | jagāma dhṛtarāṣṭrasya kṣayaṃ prakṣīṇabāndhavam
अत्यन्त उद्विग्न चित्त से हस्तिनापुर पहुँचकर वे धृतराष्ट्र के उस भवन में गए जिसके बन्धु नष्ट हो चुके थे।
श्लोक 27 (8.1.27)
स तमुद्वीक्ष्य राजानं कश्मलाभिहतौजसम् । ववन्दे प्राञ्जलिर्भूत्वा मूर्ध्ना पादौ नृपस्य ह ॥
sa tamudvīkṣya rājānaṃ kaśmalābhihataujasam | vavande prāñjalirbhūtvā mūrdhnā pādau nṛpasya ha
उदासी से तेजहीन हुए राजा को देखकर उन्होंने हाथ जोड़े और सिर झुकाकर राजा के चरणों में प्रणाम किया।
श्लोक 28 (8.1.28)
सम्पूज्य च यथान्यायं धृतराष्ट्रं महीपतिम् । हा कष्टमिति चोक्त्वा स ततो वचनमाददे ॥
sampūjya ca yathānyāyaṃ dhṛtarāṣṭraṃ mahīpatim | hā kaṣṭamiti coktvā sa tato vacanamādade
पृथ्वीपति धृतराष्ट्र का यथोचित सम्मान करके और "हाय, कैसा कष्ट!" कहकर उन्होंने फिर बोलना आरम्भ किया।
सञ्जय उवाच
श्लोक 29 (8.1.29)
सञ्जयोऽहं क्षितिपते कच्चिदास्ते सुखं भवान् । स्वदोषैरापदं प्राप्य कच्चिन्नाद्य विमुह्यति ॥
sañjayo'haṃ kṣitipate kaccidāste sukhaṃ bhavān | svadoṣairāpadaṃ prāpya kaccinnādya vimuhyati
पृथ्वीपते! मैं सञ्जय हूँ। आशा है आप कुशल से हैं? अपने ही दोषों से विपत्ति में पड़कर आज आप मोहित तो नहीं हो रहे?
श्लोक 30 (8.1.30)
हितान्युक्तानि विदुरद्रोणगाङ्गेयकेशवैः । अगृहीतान्यनुस्मृत्य कच्चिन्न कुरुषे व्यथाम् ॥
hitānyuktāni viduradroṇagāṅgeyakeśavaiḥ | agṛhītānyanusmṛtya kaccinna kuruṣe vyathām
विदुर, द्रोण, गाङ्गेय भीष्म और केशव ने जो हितकारी बातें कही थीं और जिन्हें आपने नहीं माना, उन्हें स्मरण करके आप पीड़ित तो नहीं हो रहे?
श्लोक 31 (8.1.31)
रामनारदकण्वाद्यैर्हितमुक्तं सभातले । न गृहीतमनुस्मृत्य कच्चिन्न कुरुषे व्यथाम् ॥
rāmanāradakaṇvādyairhitamuktaṃ sabhātale | na gṛhītamanusmṛtya kaccinna kuruṣe vyathām
राम, नारद, कण्व आदि ने सभा में जो हित की बात कही थी और जो नहीं मानी गई, उसे स्मरण करके आप पीड़ित तो नहीं हो रहे?
श्लोक 32 (8.1.32)
सुहृदस्त्वद्धिते युक्तान्भीष्मद्रोणमुखान्परैः । निहतान्युधि संस्मृत्य कच्चिन्न कुरुषे व्यथाम् ॥
suhṛdastvaddhite yuktānbhīṣmadroṇamukhānparaiḥ | nihatānyudhi saṃsmṛtya kaccinna kuruṣe vyathām
आपके हित में लगे हुए और शत्रुओं द्वारा युद्ध में मारे गए भीष्म, द्रोण आदि अपने मित्रों को स्मरण करके आप पीड़ित तो नहीं हो रहे?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (8.1.33)
तमेवंवादिनं राजा सूतपुत्रं कृताञ्जलिम् । सुदीर्घमथ निःश्वस्य दुःखार्त इदमब्रवीत् ॥
tamevaṃvādinaṃ rājā sūtaputraṃ kṛtāñjalim | sudīrghamatha niḥśvasya duḥkhārta idamabravīt
हाथ जोड़कर इस प्रकार बोलते हुए उन सूतपुत्र से राजा ने दुःख से पीड़ित होकर, लम्बी साँस भरकर यह कहा।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 34 (8.1.34)
आपगेये हते शूरे दिव्यास्त्रवति सञ्जय । द्रोणे च परमेष्वासे भृशं मे व्यथितं मनः ॥
āpageye hate śūre divyāstravati sañjaya | droṇe ca parameṣvāse bhṛśaṃ me vyathitaṃ manaḥ
सञ्जय! दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता शूर भीष्म और परम धनुर्धर द्रोण के मारे जाने से मेरा मन अत्यन्त व्यथित है।
श्लोक 35 (8.1.35)
यो रथानां सहस्राणि दंशितानां दशैव तु । अहन्यहनि तेजस्वी निजघ्ने वसुसम्भवः ॥
yo rathānāṃ sahasrāṇi daṃśitānāṃ daśaiva tu | ahanyahani tejasvī nijaghne vasusambhavaḥ
जिन तेजस्वी वसु-अंशजात भीष्म ने प्रतिदिन कवचधारी दस हज़ार रथियों का वध किया —
श्लोक 36 (8.1.36)
तं हतं यज्ञसेनस्य पुत्रेणेह शिखण्डिना । पाण्डवेयाभिगुप्तेन श्रुत्वा मे व्यथितं मनः ॥
taṃ hataṃ yajñasenasya putreṇeha śikhaṇḍinā | pāṇḍaveyābhiguptena śrutvā me vyathitaṃ manaḥ
उन्हें पाण्डवों से रक्षित यज्ञसेन-पुत्र शिखण्डी द्वारा मारा गया सुनकर मेरा मन व्यथित है।
श्लोक 37 (8.1.37)
भार्गवः प्रददौ यस्मै परमास्त्रं महाहवे । साक्षाद्रामेण यो बाल्ये धनुर्वेद उपाकृतः ॥
bhārgavaḥ pradadau yasmai paramāstraṃ mahāhave | sākṣādrāmeṇa yo bālye dhanurveda upākṛtaḥ
जिन्हें भार्गव ने महायुद्ध में परम अस्त्र प्रदान किया, और जिन्हें बाल्यावस्था में स्वयं राम ने धनुर्वेद की दीक्षा दी —
श्लोक 38 (8.1.38)
यस्य प्रसादात्कौन्तेया राजपुत्रा महारथाः । महारथत्वं सम्प्राप्तास्तथाऽन्ये वसुधाधिपाः ॥
yasya prasādātkaunteyā rājaputrā mahārathāḥ | mahārathatvaṃ samprāptāstathā'nye vasudhādhipāḥ
जिनकी कृपा से कुन्ती-पुत्र राजकुमार तथा अन्य पृथ्वीपति भी महारथी पद को प्राप्त हुए —
श्लोक 39 (8.1.39)
तं द्रोणं निहतं श्रुत्वा धृष्टद्युम्नेन संयुगे । सत्यसन्धं महेष्वासं भृशं मे व्यथितं मनः ॥
taṃ droṇaṃ nihataṃ śrutvā dhṛṣṭadyumnena saṃyuge | satyasandhaṃ maheṣvāsaṃ bhṛśaṃ me vyathitaṃ manaḥ
उन सत्यप्रतिज्ञ महाधनुर्धर द्रोण को युद्ध में धृष्टद्युम्न के हाथों मारा गया सुनकर मेरा मन अत्यन्त व्यथित है।
श्लोक 40 (8.1.40)
ययोर्लोके पुमानस्त्रे न समोऽस्ति चतुर्विधे । तौ द्रोणभीष्मौ श्रुत्वा तु हतौ मे व्यथितं मनः ॥
yayorloke pumānastre na samo'sti caturvidhe | tau droṇabhīṣmau śrutvā tu hatau me vyathitaṃ manaḥ
चारों प्रकार की अस्त्र-विद्या में संसार में जिनके समान कोई पुरुष नहीं था, उन द्रोण और भीष्म को मारा गया सुनकर मेरा मन व्यथित है।
श्लोक 41 (8.1.41)
त्रैलोक्ये यस्य चास्त्रेषु न पुमान्विद्यते समः । तं द्रोणं निहतं श्रुत्वा किमकुर्वत मामकाः ॥
trailokye yasya cāstreṣu na pumānvidyate samaḥ | taṃ droṇaṃ nihataṃ śrutvā kimakurvata māmakāḥ
तीनों लोकों में अस्त्र-विद्या में जिनके समान कोई पुरुष नहीं था, उन द्रोण को मारा गया सुनकर मेरे पक्ष के लोगों ने क्या किया?
श्लोक 42 (8.1.42)
संशप्तकानां च बले पाण्डवेन महात्मना । धनञ्जयेन विक्रम्य गमिते यमसादनम् ॥
saṃśaptakānāṃ ca bale pāṇḍavena mahātmanā | dhanañjayena vikramya gamite yamasādanam
और जब महात्मा पाण्डव धनञ्जय ने पराक्रम से संशप्तकों की सेना को यमलोक पहुँचा दिया —
श्लोक 43 (8.1.43)
नारायणास्त्रे च हते द्रोणपुत्रस्य धीमतः । विप्रद्रुतानहं मन्ये निमग्नाञ्शोकसागरे । प्लवमानान्हते द्रोणे सन्ननौकानिवार्णवे ॥
nārāyaṇāstre ca hate droṇaputrasya dhīmataḥ | vipradrutānahaṃ manye nimagnāñśokasāgare | plavamānānhate droṇe sannanaukānivārṇave
और जब बुद्धिमान द्रोण-पुत्र का नारायणास्त्र निष्फल हो गया, तब द्रोण के मारे जाने पर शोक-सागर में डूबे, भागे हुए और बहते हुए उन लोगों को मैं समुद्र में टूटी नौकाओं वाले यात्रियों के समान मानता हूँ —
श्लोक 44 (8.1.44)
दुर्योधनस्य कर्णस्य भोजस्य कृतवर्मणः । मद्रराजस्य शल्यस्य द्रौणेश्चैव कृपस्य च ॥
duryodhanasya karṇasya bhojasya kṛtavarmaṇaḥ | madrarājasya śalyasya drauṇeścaiva kṛpasya ca
दुर्योधन, कर्ण, भोज कृतवर्मा, मद्रराज शल्य, द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा और कृप —
श्लोक 45 (8.1.45)
मत्पुत्रस्य च शेषस्य तथाऽन्येषां च सञ्जय । विप्रद्रुतेष्वनीकेषु मुखवर्णोऽभवत्कथम् ॥
matputrasya ca śeṣasya tathā'nyeṣāṃ ca sañjaya | vipradruteṣvanīkeṣu mukhavarṇo'bhavatkatham
और मेरे शेष बचे पुत्र का तथा अन्य लोगों का भी, सञ्जय! सेनाओं के भाग खड़े होने पर मुख का रंग कैसा हो गया था?
श्लोक 46 (8.1.46)
एतत्सर्वं यथावृत्तं तथा गावल्गणे मम । आचक्ष्व पाण्डवेयानां मामकानां च विक्रमम् ॥
etatsarvaṃ yathāvṛttaṃ tathā gāvalgaṇe mama | ācakṣva pāṇḍaveyānāṃ māmakānāṃ ca vikramam
हे गवल्गण-पुत्र! यह सब जैसा हुआ था वैसा ही मुझे बताओ — पाण्डवों का और मेरे पक्ष के लोगों का पराक्रम।
सञ्जय उवाच
श्लोक 47 (8.1.47)
तवापराधाद्यद्वृत्तं कौरवेयेषु मारिष । तच्छ्रुत्वा मा व्यथां कार्षीर्दिष्टे न व्यथते बुधः ॥
tavāparādhādyadvṛttaṃ kauraveyeṣu māriṣa | tacchrutvā mā vyathāṃ kārṣīrdiṣṭe na vyathate budhaḥ
मान्यवर! आपके अपराध से कौरवों पर जो बीती, उसे सुनकर शोक मत कीजिए; बुद्धिमान लोग दैव-निश्चित बात पर दुःखी नहीं होते।
श्लोक 48 (8.1.48)
यस्मादभावी भावी वा भवेदर्थो नरं प्रति । अप्राप्तौ तस्य वा प्राप्तौ न कश्चिद्व्यथते बुधः ॥
yasmādabhāvī bhāvī vā bhavedartho naraṃ prati | aprāptau tasya vā prāptau na kaścidvyathate budhaḥ
मनुष्य के लिए जो बात होने वाली हो या न होने वाली, उसके प्राप्त होने या न होने पर कोई बुद्धिमान दुःखी नहीं होता।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 49 (8.1.49)
न व्यथाऽभ्यधिका काचिद्विद्यते मम सञ्जय । दिष्टमेतत्पुरा मन्ये कथयस्व यथेच्छकम् ॥
na vyathā'bhyadhikā kācidvidyate mama sañjaya | diṣṭametatpurā manye kathayasva yathecchakam
सञ्जय! अब मेरे लिए इससे बढ़कर कोई पीड़ा नहीं है; मैं मानता हूँ कि यह पहले से दैव-निश्चित था। जैसे चाहो, वैसे कहो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 50 (8.1.50)
हते द्रोणे महेष्वासे तव पुत्रा महारथाः । बभूवुरस्वस्थमुखा विषण्णा गतचेतसः ॥
hate droṇe maheṣvāse tava putrā mahārathāḥ | babhūvurasvasthamukhā viṣaṇṇā gatacetasaḥ
महाधनुर्धर द्रोण के मारे जाने पर आपके महारथी पुत्र विषाद में डूब गए; उनके मुख अशान्त थे और चेतना जाती रही थी।
श्लोक 51 (8.1.51)
अवाङ्मुखाः शस्त्रभृतः सर्व एव विशाम्पते । अवेक्षमाणाः शोकार्ता नाभ्यभाषन्परस्परम् ॥
avāṅmukhāḥ śastrabhṛtaḥ sarva eva viśāmpate | avekṣamāṇāḥ śokārtā nābhyabhāṣanparasparam
हे प्रजापति! सभी शस्त्रधारी मुख नीचे किए, शोक से पीड़ित, इधर-उधर देखते हुए, एक-दूसरे से कुछ नहीं बोले।
श्लोक 52 (8.1.52)
तान्दृष्ट्वा व्यथिताकारान्सैन्यानि तव भारत । ऊर्ध्वमेव निरैक्षन्त दुःखत्रस्तान्यनेकशः ॥
tāndṛṣṭvā vyathitākārānsainyāni tava bhārata | ūrdhvameva niraikṣanta duḥkhatrastānyanekaśaḥ
हे भारत! उन्हें इस प्रकार व्यथित देखकर आपकी सेनाएँ दुःख और भय से त्रस्त होकर बार-बार ऊपर आकाश की ओर देखने लगीं।
श्लोक 53 (8.1.53)
शस्त्राण्येषां तु राजेन्द्र शोणिताक्तानि सर्वशः । प्राभ्रश्यन्त कराग्रेभ्यो दृष्ट्वा द्रोणं हतं युधि ॥
śastrāṇyeṣāṃ tu rājendra śoṇitāktāni sarvaśaḥ | prābhraśyanta karāgrebhyo dṛṣṭvā droṇaṃ hataṃ yudhi
हे राजेन्द्र! युद्ध में द्रोण को मारा गया देखकर उनके रक्त से सने सभी शस्त्र हाथों की उँगलियों से छूटकर गिरने लगे।
श्लोक 54 (8.1.54)
तानि बद्धान्यरिष्टानि लम्बमानानि भारत । अदृश्यन्त महाराज नक्षत्राणि यथा दिवि ॥
tāni baddhānyariṣṭāni lambamānāni bhārata | adṛśyanta mahārāja nakṣatrāṇi yathā divi
हे भारत! बँधे हुए और लटकते हुए वे अशुभ-से शस्त्र, हे महाराज! आकाश में तारों के समान दिखाई देते थे।
श्लोक 55 (8.1.55)
तथा तु स्तिमितं दृष्ट्वा गतसत्वमवस्थितम् । बलं तव महाराज राजा दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥
tathā tu stimitaṃ dṛṣṭvā gatasatvamavasthitam | balaṃ tava mahārāja rājā duryodhano'bravīt
महाराज! आपकी सेना को इस प्रकार स्तब्ध और निस्तेज खड़ा देखकर राजा दुर्योधन ने कहा।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 56 (8.1.56)
भवतां बाहुवीर्यं हि समाश्रित्य मया युधि । पाण्डवेयाः समाहूता युद्धं चेदं प्रवर्तितम् ॥
bhavatāṃ bāhuvīryaṃ hi samāśritya mayā yudhi | pāṇḍaveyāḥ samāhūtā yuddhaṃ cedaṃ pravartitam
आप लोगों के बाहुबल का आश्रय लेकर ही मैंने युद्ध में पाण्डवों को ललकारा और यह युद्ध आरम्भ किया।
श्लोक 57 (8.1.57)
तदिदं निहते द्रोणे विषण्णमिव लक्ष्यते । युध्यमानाश्च समरे योधा वध्यन्ति सर्वशः ॥
tadidaṃ nihate droṇe viṣaṇṇamiva lakṣyate | yudhyamānāśca samare yodhā vadhyanti sarvaśaḥ
अब द्रोण के मारे जाने पर यह सब विषाद में डूबा-सा दिखाई देता है; किन्तु युद्ध करने वाले योद्धा तो चारों ओर मारे ही जाते हैं।
श्लोक 58 (8.1.58)
जयो वाऽपि वधो वाऽपि युध्यमानस्य संयुगे । भवेत्किमत्र चित्रं वै युध्यध्वं सर्वतोमुखाः ॥
jayo vā'pi vadho vā'pi yudhyamānasya saṃyuge | bhavetkimatra citraṃ vai yudhyadhvaṃ sarvatomukhāḥ
युद्ध करने वाले को विजय मिलती है या मृत्यु; इसमें आश्चर्य क्या है? सब ओर मुख करके लड़ो।
श्लोक 59 (8.1.59)
पश्यध्वं च महात्मानं कर्णं वैकर्तनं युधि । प्रचरन्तं महेष्वासं दिव्यैरस्त्रैर्महाबलम् ॥
paśyadhvaṃ ca mahātmānaṃ karṇaṃ vaikartanaṃ yudhi | pracarantaṃ maheṣvāsaṃ divyairastrairmahābalam
और महात्मा वैकर्तन कर्ण को देखो, जो महाबली महाधनुर्धर दिव्य अस्त्रों के साथ युद्ध में विचर रहा है।
श्लोक 60 (8.1.60)
यस्य वै युधि सन्त्रासात्कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । निवर्तते सदा मन्दः सिंहात्क्षुद्रमृगो यथा ॥
yasya vai yudhi santrāsātkuntīputro dhanañjayaḥ | nivartate sadā mandaḥ siṃhātkṣudramṛgo yathā
युद्ध में जिसके भय से मूढ़ कुन्ती-पुत्र धनञ्जय सदा पीछे हट जाता है, जैसे सिंह के सामने से छोटा पशु।
श्लोक 61 (8.1.61)
येन नागायुतप्राणो भीमसेनो महाबलः । मानुषेणैव युद्धेन तामवस्थां प्रवेशितः ॥
yena nāgāyutaprāṇo bhīmaseno mahābalaḥ | mānuṣeṇaiva yuddhena tāmavasthāṃ praveśitaḥ
जिसने दस हज़ार हाथियों के बल वाले महाबली भीमसेन को केवल मनुष्य-योग्य युद्ध से उस दशा में पहुँचा दिया।
श्लोक 62 (8.1.62)
येन दिव्यास्त्रविच्छूरो मायावी स घटोत्कचः । अमोघया रणे शक्त्या निहतो भैरवं नदन् ॥
yena divyāstravicchūro māyāvī sa ghaṭotkacaḥ | amoghayā raṇe śaktyā nihato bhairavaṃ nadan
जिसने दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता और मायावी शूर घटोत्कच को, भयंकर गर्जना करते हुए, अमोघ शक्ति से युद्ध में मार डाला।
श्लोक 63 (8.1.63)
तस्य दुर्वारवीर्यस्य सत्यसन्धस्य धीमतः । बाह्वोर्द्रविणमक्षय्यमद्य द्रक्ष्यथ संयुगे ॥
tasya durvāravīryasya satyasandhasya dhīmataḥ | bāhvordraviṇamakṣayyamadya drakṣyatha saṃyuge
आज युद्ध में तुम उस बुद्धिमान और सत्यप्रतिज्ञ वीर की भुजाओं का अक्षय बल देखोगे, जिसके पराक्रम को रोका नहीं जा सकता।
श्लोक 64 (8.1.64)
द्रोणपुत्रस्य विक्रान्तं राधेयस्यैव चोभयोः । पश्यन्तु पाण्डुपुत्रास्ते विष्णुवासवयोरिव ॥
droṇaputrasya vikrāntaṃ rādheyasyaiva cobhayoḥ | paśyantu pāṇḍuputrāste viṣṇuvāsavayoriva
द्रोण-पुत्र और राधेय दोनों का पराक्रम पाण्डु के पुत्र देखें, जैसे विष्णु और इन्द्र का पराक्रम।
श्लोक 65 (8.1.65)
सर्व एव भवन्तश्च शक्ताः प्रत्येकशोऽपि वा । पाण्डुपुत्रान्रणे हन्तुं ससैन्यान्किमु संहताः । वीर्यवन्तः कृतास्त्राश्च द्रक्ष्यथाद्य परस्परम् ॥
sarva eva bhavantaśca śaktāḥ pratyekaśo'pi vā | pāṇḍuputrānraṇe hantuṃ sasainyānkimu saṃhatāḥ | vīryavantaḥ kṛtāstrāśca drakṣyathādya parasparam
आप सभी अकेले-अकेले भी सेना-सहित पाण्डु-पुत्रों को युद्ध में मारने में समर्थ हैं, फिर संगठित होकर तो कहना ही क्या! आप पराक्रमी और अस्त्र-कुशल हैं; आज एक-दूसरे का पराक्रम देखेंगे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 66 (8.1.66)
एवमुक्त्वा ततः कर्णं चक्रे सेनापतिं तदा । तव पुत्रो महावीर्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ ॥
evamuktvā tataḥ karṇaṃ cakre senāpatiṃ tadā | tava putro mahāvīryo bhrātṛbhiḥ sahito'nagha
ऐसा कहकर आपके महापराक्रमी पुत्र ने, हे निष्पाप! भाइयों के साथ उसी समय कर्ण को सेनापति बनाया।
श्लोक 67 (8.1.67)
सैनापत्यमथावाप्य कर्णो राजन्महारथः । सिंहनादं विनद्योच्चैः प्रायुध्यत रणोत्कटः ॥
saināpatyamathāvāpya karṇo rājanmahārathaḥ | siṃhanādaṃ vinadyoccaiḥ prāyudhyata raṇotkaṭaḥ
सेनापति-पद पाकर महारथी कर्ण, हे राजन्! ऊँचे स्वर में सिंहनाद करके रण में उग्र होकर लड़ने लगा।
श्लोक 68 (8.1.68)
ससृञ्जयानां सर्वेषां पाञ्चालानां च मारिष । केकयानां विदेहानां चकार कदनं महत् ॥
sasṛñjayānāṃ sarveṣāṃ pāñcālānāṃ ca māriṣa | kekayānāṃ videhānāṃ cakāra kadanaṃ mahat
मान्यवर! उसने सब सृञ्जयों के, पाञ्चालों, केकयों और विदेहों के बीच भारी संहार किया।
श्लोक 69 (8.1.69)
तस्येषुधाराः शतशः प्रादुरासञ्छरासनात् । अग्रे पुङ्खेषु संसक्ता यथा भ्रमरपङ्क्तयः ॥
tasyeṣudhārāḥ śataśaḥ prādurāsañcharāsanāt | agre puṅkheṣu saṃsaktā yathā bhramarapaṅktayaḥ
उसके धनुष से बाणों की धाराएँ सैकड़ों की संख्या में निकलीं, जो आगे-पीछे पंखों से जुड़ी हुई भौंरों की पंक्तियों जैसी लगती थीं।
श्लोक 70 (8.1.70)
स पीडयित्वा पाञ्चालान्पाण्डवांश्च तरस्विनः । हत्वा सहस्रशो योधानर्जुनेन निपातितः ॥
sa pīḍayitvā pāñcālānpāṇḍavāṃśca tarasvinaḥ | hatvā sahasraśo yodhānarjunena nipātitaḥ
पाञ्चालों और वेगवान् पाण्डवों को पीड़ित करके और हज़ारों योद्धाओं को मारकर वह अर्जुन के हाथों गिरा दिया गया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 71 (8.1.71)
शिबिराद्धास्तिनपुरं प्राप्य भारत सञ्जयः । प्रविवेश महाबाहुर्धृतराष्ट्रनिवेशनम् ॥
śibirāddhāstinapuraṃ prāpya bhārata sañjayaḥ | praviveśa mahābāhurdhṛtarāṣṭraniveśanam
हे भारत! शिविर से हस्तिनापुर पहुँचकर महाबाहु सञ्जय ने धृतराष्ट्र के भवन में प्रवेश किया।
श्लोक 72 (8.1.72)
शोकेनापहतः सूतो विलपन्भृशदुःखितः । चिन्तयन्निधनं घोरं सूतपुत्रस्य पाण्डवैः ॥
śokenāpahataḥ sūto vilapanbhṛśaduḥkhitaḥ | cintayannidhanaṃ ghoraṃ sūtaputrasya pāṇḍavaiḥ
शोक से व्याकुल, विलाप करते और अत्यन्त दुःखी वह सूत सञ्जय पाण्डवों के हाथों सूतपुत्र कर्ण के हुए भयंकर वध का चिन्तन कर रहे थे।
श्लोक 73 (8.1.73)
अन्तःपुरं प्रविश्यैव सञ्जयो राजसत्तमम् । अश्रुपूर्णो भृशं त्रस्तो राजानमुपजग्मिवान् ॥
antaḥpuraṃ praviśyaiva sañjayo rājasattamam | aśrupūrṇo bhṛśaṃ trasto rājānamupajagmivān
अन्तःपुर में प्रवेश करके अश्रुओं से भरे और अत्यन्त भयभीत सञ्जय राजाओं में श्रेष्ठ धृतराष्ट्र के पास पहुँचे।
श्लोक 74 (8.1.74)
उपस्थाय च राजानं विनिश्वस्य च सूतजः । नातिहृष्टमना राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥
upasthāya ca rājānaṃ viniśvasya ca sūtajaḥ | nātihṛṣṭamanā rājannidaṃ vacanamabravīt
राजा के सामने खड़े होकर और गहरी साँस लेकर सूतपुत्र सञ्जय ने, हे राजन्! उदास मन से यह वचन कहा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 75 (8.1.75)
सञ्जयोऽहं महाराज नमस्ते भरतर्षभ । हतो वैकर्तनः कर्णः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥
sañjayo'haṃ mahārāja namaste bharatarṣabha | hato vaikartanaḥ karṇaḥ kṛtvā karma suduṣkaram
महाराज! मैं सञ्जय हूँ; भरतश्रेष्ठ! आपको प्रणाम। अत्यन्त दुष्कर कर्म करके वैकर्तन कर्ण मारा गया।
श्लोक 76 (8.1.76)
चेदिकाशिकरूशानां मत्स्यानां सोमकैः सह । कृत्वाऽसौ कदनं शेते वातनुन्न इव द्रुमः ॥
cedikāśikarūśānāṃ matsyānāṃ somakaiḥ saha | kṛtvā'sau kadanaṃ śete vātanunna iva drumaḥ
चेदि, काशि, करूष और मत्स्य योद्धाओं तथा सोमकों का भारी संहार करके वह वायु से गिराए हुए वृक्ष के समान पड़ा है।
श्लोक 77 (8.1.77)
गोष्ठमध्येव ऋषभो गोव्रजैः परिवारितः । व्यालेन निहतो यद्वत्तथाऽसौ निहतः परैः ॥
goṣṭhamadhyeva ṛṣabho govrajaiḥ parivāritaḥ | vyālena nihato yadvattathā'sau nihataḥ paraiḥ
जैसे गोशाला के बीच गायों के झुण्डों से घिरा हुआ बैल किसी हिंस्र पशु के हाथों मारा जाता है, वैसे ही वह शत्रुओं द्वारा मारा गया है।
श्लोक 78 (8.1.78)
निराशान्पाण्डवान्कृत्वा दृढं राजन्ससात्यकान् । पाञ्चालानां रथांश्चैव विनिहत्य सहस्रशः ॥
nirāśānpāṇḍavānkṛtvā dṛḍhaṃ rājansasātyakān | pāñcālānāṃ rathāṃścaiva vinihatya sahasraśaḥ
हे राजन्! सात्यकि-सहित पाण्डवों को पूरी तरह निराश करके और पाञ्चालों के हज़ारों रथों का संहार करके,
श्लोक 79 (8.1.79)
जित्वा शूरान्महेष्वासान्विद्राव्य च दिशोदश । हतो वैकर्तनः कर्णः पाण्डवेन किरीटिना ॥
jitvā śūrānmaheṣvāsānvidrāvya ca diśodaśa | hato vaikartanaḥ karṇaḥ pāṇḍavena kirīṭinā
शूर महाधनुर्धरों को जीतकर और दसों दिशाओं में भगाकर वैकर्तन कर्ण किरीटधारी पाण्डव अर्जुन के हाथों मारा गया।
श्लोक 80 (8.1.80)
वैरस्य गत आनृण्यं दुर्गमस्य दुरात्मभिः । हत्वा कर्णं महाराज विशल्यः पाण्डवोऽभवत् ॥
vairasya gata ānṛṇyaṃ durgamasya durātmabhiḥ | hatvā karṇaṃ mahārāja viśalyaḥ pāṇḍavo'bhavat
महाराज! कर्ण को मारकर पाण्डव उस वैर के ऋण से उऋण हो गया, जिसे पार करना दुरात्माओं के लिए कठिन था, और अब वह काँटे से मुक्त हो गया।
श्लोक 81 (8.1.81)
शोषणं सागराणां वा पतनं वा विवस्वतः । विशीर्णत्वं यथा मेरोस्तथा कर्णस्य पातनम् ॥
śoṣaṇaṃ sāgarāṇāṃ vā patanaṃ vā vivasvataḥ | viśīrṇatvaṃ yathā merostathā karṇasya pātanam
कर्ण का पतन समुद्रों के सूख जाने, सूर्य के गिर पड़ने अथवा मेरु पर्वत के टूटकर बिखर जाने के समान था।
श्लोक 82 (8.1.82)
योधाश्च बहवो राजन्हतास्तत्र जयैषिणः । राजानो राजपुत्राश्च शूराः परिघबाहवः ॥
yodhāśca bahavo rājanhatāstatra jayaiṣiṇaḥ | rājāno rājaputrāśca śūrāḥ parighabāhavaḥ
हे राजन्! विजय चाहने वाले बहुत-से योद्धा वहाँ मारे गए — राजा और राजकुमार, वे शूर जिनकी भुजाएँ परिघ के समान थीं।
श्लोक 83 (8.1.83)
रथौघाश्च नरौघाश्च हता राजन्सहस्रशः । वारणा निहतास्तत्र वाजिनश्च महाहवे ॥
rathaughāśca naraughāśca hatā rājansahasraśaḥ | vāraṇā nihatāstatra vājinaśca mahāhave
हे राजन्! रथों के समूह और मनुष्यों के समूह हज़ारों की संख्या में मारे गए; उस महायुद्ध में हाथी और घोड़े भी मारे गए।
श्लोक 84 (8.1.84)
क्षत्रियाश्च महाराज सेनयोरुभयोर्हताः । परस्परं वै वीक्ष्यात्र परस्परकृतागसः ॥
kṣatriyāśca mahārāja senayorubhayorhatāḥ | parasparaṃ vai vīkṣyātra parasparakṛtāgasaḥ
महाराज! दोनों सेनाओं के क्षत्रिय वहाँ मारे गए, जो एक-दूसरे को घूरते रह गए और जिन्होंने परस्पर अपराध किए थे।
श्लोक 85 (8.1.85)
किञ्चिच्छेषान्परान्कृत्वा तीर्त्वा पाण्डववाहिनीम् । पार्थवेलां समासाद्य हतो वैकर्तनो वृषा ॥
kiñciccheṣānparānkṛtvā tīrtvā pāṇḍavavāhinīm | pārthavelāṃ samāsādya hato vaikartano vṛṣā
थोड़े-से शत्रुओं को ही शेष छोड़कर, पाण्डवों की सेना को पार करके, अर्जुनरूपी तट पर पहुँचकर वैकर्तन वृष (कर्ण) मारा गया।
श्लोक 86 (8.1.86)
जयाशा धार्तराष्ट्राणां वैरस्य च मुखं नृप । तीर्णं तत्पाण्डवै राजन्यत्पुरा नावबुध्यसे ॥
jayāśā dhārtarāṣṭrāṇāṃ vairasya ca mukhaṃ nṛpa | tīrṇaṃ tatpāṇḍavai rājanyatpurā nāvabudhyase
राजन्! धृतराष्ट्र-पुत्रों की विजय की आशा तथा वैर का मुख्य कारण जो था, उसे पाण्डवों ने पार कर लिया है — यह बात आप पहले नहीं समझ सके।
श्लोक 87 (8.1.87)
प्रोच्यमानं महाराज बन्धुभिर्हितबुद्धिभिः । तदिदं समनुप्राप्तं व्यसनं त्वां महाभयम् ॥
procyamānaṃ mahārāja bandhubhirhitabuddhibhiḥ | tadidaṃ samanuprāptaṃ vyasanaṃ tvāṃ mahābhayam
महाराज! आपके हितैषी बन्धु आपसे बार-बार कहते रहे; वही यह महान और भयंकर संकट अब आप पर आ पड़ा है।
श्लोक 88 (8.1.88)
पुत्राणां राज्यकामेन त्वया राजन्हितैषिणा । चरितान्यहितान्येव तेषां ते फलमागतम् ॥
putrāṇāṃ rājyakāmena tvayā rājanhitaiṣiṇā | caritānyahitānyeva teṣāṃ te phalamāgatam
राजन्! पुत्रों के लिए राज्य की इच्छा से, उनका हित चाहते हुए आपने जो कुछ किया, वह सब अहितकारी ही था; उसी का फल अब आपके सामने आया है।
श्लोक 89 (8.1.89)
हतो दुःशासनो राजन्यथोक्तं पाण्डवेन तु । प्रतिज्ञा भीमसेनेन निस्तीर्णा सा चमूमुखे ॥
hato duḥśāsano rājanyathoktaṃ pāṇḍavena tu | pratijñā bhīmasenena nistīrṇā sā camūmukhe
राजन्! जैसा पाण्डव भीमसेन ने कहा था, वैसे ही दुःशासन मारा गया; सेना के मुहाने पर भीमसेन ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दी।
श्लोक 90 (8.1.90)
पीतं च क्षतजं तस्य धार्तराष्ट्रस्य संयुगे । पाण्डवेन महाराज कर्म कृत्वा सुदुष्करम् ॥
pītaṃ ca kṣatajaṃ tasya dhārtarāṣṭrasya saṃyuge | pāṇḍavena mahārāja karma kṛtvā suduṣkaram
महाराज! उस धृतराष्ट्र-पुत्र का रक्त भी उस पाण्डव ने युद्ध में पी लिया — अत्यन्त दुष्कर कर्म करके।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 91 (8.1.91)
एतच्छ्रुत्वा महाराज धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । शोकस्यान्तमपश्यन्वै हतं मत्वा सुयोधनम् । विह्वलः पतितो भूमौ नष्टचेता इव द्विपः ॥
etacchrutvā mahārāja dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | śokasyāntamapaśyanvai hataṃ matvā suyodhanam | vihvalaḥ patito bhūmau naṣṭacetā iva dvipaḥ
महाराज! यह सुनकर अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र को अपने शोक का अन्त दिखाई न दिया; सुयोधन को मरा हुआ मानकर वे व्याकुल हो गए और होश खोए हुए हाथी की तरह भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 92 (8.1.92)
तस्मिन्निपतिते भूमौ विह्वले राजसत्तमे । आर्तनादो महानासीत्स्त्रीणां भरतसत्तम ॥
tasminnipatite bhūmau vihvale rājasattame | ārtanādo mahānāsītstrīṇāṃ bharatasattama
जब वे श्रेष्ठ राजा व्याकुल होकर भूमि पर गिर पड़े, तब हे भरतश्रेष्ठ! स्त्रियों में बड़ा आर्तनाद उठा।
श्लोक 93 (8.1.93)
स शब्दः पृथिवीं कृत्स्नां पूरयामास सर्वशः ॥
sa śabdaḥ pṛthivīṃ kṛtsnāṃ pūrayāmāsa sarvaśaḥ
वह शब्द सारी पृथ्वी में चारों ओर गूँज उठा।
श्लोक 94 (8.1.94)
शोकार्णवे महाघोरे निमग्ना भरतस्त्रियः । रुरुदुर्दुःखशोकार्ता भृशमुद्विग्नचेतसः ॥
śokārṇave mahāghore nimagnā bharatastriyaḥ | rurudurduḥkhaśokārtā bhṛśamudvignacetasaḥ
भयंकर शोक-सागर में डूबी हुई भरतवंश की स्त्रियाँ दुःख और शोक से पीड़ित तथा अत्यन्त उद्विग्न मन से रोने लगीं।
श्लोक 95 (8.1.95)
राजानं च समासाद्य गान्धारी भरतर्षभ । निःसंज्ञा पतिता भूमौ सर्वाण्यन्तःपुराणि च ॥
rājānaṃ ca samāsādya gāndhārī bharatarṣabha | niḥsaṃjñā patitā bhūmau sarvāṇyantaḥpurāṇi ca
हे भरतश्रेष्ठ! गान्धारी भी राजा के पास आकर अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ीं, और अन्तःपुर की सारी स्त्रियाँ भी।
श्लोक 96 (8.1.96)
ततस्ताः सञ्जयो राजन्समाश्वासयदातुराः । मुह्यमानाः सुबहुशो मुञ्चन्तीर्वारि नेत्रजम् ॥
tatastāḥ sañjayo rājansamāśvāsayadāturāḥ | muhyamānāḥ subahuśo muñcantīrvāri netrajam
हे राजन्! तब सञ्जय ने उन व्याकुल स्त्रियों को ढाढ़स बँधाया, जो बार-बार मूर्च्छित हो जाती थीं और आँखों से आँसू बहा रही थीं।
श्लोक 97 (8.1.97)
समाश्वस्ताः स्त्रियस्तास्तु वेपमाना मुहुर्मुहुः । कदल्य इव वातेन धूयमानाः समन्ततः ॥
samāśvastāḥ striyastāstu vepamānā muhurmuhuḥ | kadalya iva vātena dhūyamānāḥ samantataḥ
सान्त्वना पाकर भी वे स्त्रियाँ बार-बार काँपती रहीं, जैसे चारों ओर से हवा में झकझोरे जाते केले के वृक्ष।
श्लोक 98 (8.1.98)
राजानं विदुरश्चापि प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । आश्वासयामास तदा सिञ्चंस्तोयेन कौरवम् ॥
rājānaṃ viduraścāpi prajñācakṣuṣamīśvaram | āśvāsayāmāsa tadā siñcaṃstoyena kauravam
विदुर ने भी प्रज्ञा को ही नेत्र रखने वाले कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र पर जल छिड़ककर उन्हें होश में लाने का प्रयत्न किया।
श्लोक 99 (8.1.99)
स लब्ध्वा शनकैः संज्ञां ताश्च दृष्ट्वा स्त्रियो नृपः । उन्मत्त इव राजेन्द्र स्थितस्तूष्णीं विशाम्पते ॥
sa labdhvā śanakaiḥ saṃjñāṃ tāśca dṛṣṭvā striyo nṛpaḥ | unmatta iva rājendra sthitastūṣṇīṃ viśāmpate
धीरे-धीरे होश में आकर और उन स्त्रियों को देखकर राजा, हे विशाम्पते! पागल की तरह चुपचाप खड़े रह गए।
श्लोक 100 (8.1.100)
ततो ध्यात्वा चिरं कालं निःश्वस्य च पुनःपुनः । स्वान्पुत्रान्गर्हयामास बहुमेने च पाण्डवान् ॥
tato dhyātvā ciraṃ kālaṃ niḥśvasya ca punaḥpunaḥ | svānputrāngarhayāmāsa bahumene ca pāṇḍavān
तब बहुत देर तक सोचकर और बार-बार दीर्घ श्वास लेकर उन्होंने अपने पुत्रों की निन्दा की और पाण्डवों को बहुत माना।
श्लोक 101 (8.1.101)
गर्हयंश्चात्मनो बुद्धिं शकुनेः सौबलस्य च । ध्यात्वा तु सुचिरं कालं वेपमानो मुहुर्मुहुः ॥
garhayaṃścātmano buddhiṃ śakuneḥ saubalasya ca | dhyātvā tu suciraṃ kālaṃ vepamāno muhurmuhuḥ
अपनी बुद्धि की तथा सुबलपुत्र शकुनि की बुद्धि की भी निन्दा करते हुए वे बहुत देर तक सोचते रहे और बार-बार काँपते रहे।
श्लोक 102 (8.1.102)
संस्तभ्य च मनो भूयो राजा धैर्यसमन्वितः । पुनर्गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छत सञ्जयम् ॥
saṃstabhya ca mano bhūyo rājā dhairyasamanvitaḥ | punargāvalgaṇiṃ sūtaṃ paryapṛcchata sañjayam
फिर मन को स्थिर करके और धैर्य धारण करके राजा ने गवल्गण-पुत्र सूत सञ्जय से पुनः पूछा।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 103 (8.1.103)
न त्वया कथितं वाक्यं श्रुतं सञ्जय तन्मया ॥
na tvayā kathitaṃ vākyaṃ śrutaṃ sañjaya tanmayā
सञ्जय! तुमने जो कहा वह मैंने सुन लिया, परन्तु यह बात तुमने नहीं बताई —
श्लोक 104 (8.1.104)
कच्चिद्दुर्योधनः सूत न गतो वै यमक्षयम् । जये निराशः पुत्रो मे सततं जयकामुकः । ब्रूहि सञ्जय तत्त्वेन पुनरुक्तां कथामिमाम् ॥
kaccidduryodhanaḥ sūta na gato vai yamakṣayam | jaye nirāśaḥ putro me satataṃ jayakāmukaḥ | brūhi sañjaya tattvena punaruktāṃ kathāmimām
सूत! कहीं दुर्योधन यमलोक तो नहीं चला गया? मेरा पुत्र, जो सदा विजय की कामना करता था, अब विजय से निराश है। सञ्जय! यही कथा फिर से ठीक-ठीक सुनाओ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 105 (8.1.105)
एवमुक्तोऽब्रवीत्सूतो राजानं जनमेजय । हतो वैकर्तनो राजन्सहपुत्रैर्महारथः । भ्रातृभिश्च महेष्वासैः सूतपुत्रैस्तनुत्यजैः ॥
evamukto'bravītsūto rājānaṃ janamejaya | hato vaikartano rājansahaputrairmahārathaḥ | bhrātṛbhiśca maheṣvāsaiḥ sūtaputraistanutyajaiḥ
इस प्रकार पूछे जाने पर सूत ने राजा से कहा — हे जनमेजय! — 'राजन्! महारथी वैकर्तन कर्ण अपने पुत्रों तथा महाधनुर्धर भाइयों के साथ मारा गया, जो सूतपुत्र अपने प्राण देने को तैयार थे।'
सञ्जय उवाच
श्लोक 106 (8.1.106)
दुःशासनश्च निहतः पाण्डवेन यशस्विना । पीतं च रुधिरं कोपाद्भीमसेनेन संयुगे ॥
duḥśāsanaśca nihataḥ pāṇḍavena yaśasvinā | pītaṃ ca rudhiraṃ kopādbhīmasenena saṃyuge
यशस्वी पाण्डव भीमसेन ने दुःशासन को भी मार डाला और युद्ध में क्रोधवश उसका रक्त पी लिया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 107 (8.1.107)
एतच्छ्रुत्वा महाराज धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । दह्यमानोऽब्रवीत्सूतं मुहूर्तं तिष्ठ सञ्जय । व्याकुलं मे मनस्तात मा तावत्किंचिदुच्यताम् ॥
etacchrutvā mahārāja dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | dahyamāno'bravītsūtaṃ muhūrtaṃ tiṣṭha sañjaya | vyākulaṃ me manastāta mā tāvatkiṃciducyatām
महाराज! यह सुनकर अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र शोक से जलते हुए सूत से बोले — 'सञ्जय! क्षण भर ठहरो। तात! मेरा मन व्याकुल है; अभी कुछ भी मत कहो।'
श्लोक 108 (8.1.108)
राजापि नाब्रवीत्किञ्चित्सञ्जयो विदुरस्तथा । तूष्णीम्भूतस्तदा सोऽथ बभूव जगतीपतिः ॥
rājāpi nābravītkiñcitsañjayo vidurastathā | tūṣṇīmbhūtastadā so'tha babhūva jagatīpatiḥ
राजा ने भी कुछ नहीं कहा, और न सञ्जय ने, न विदुर ने; वह पृथ्वीपति तब मौन हो गया।