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कर्ण पर्व · अध्याय 2

सञ्जय द्वारा मारे गए कौरव-पक्ष के वीरों के नाम

जनमेजय पूछते हैं कि कर्ण के वध की बात सुनकर धृतराष्ट्र ने क्या कहा, और वैशम्पायन बताते हैं कि शोक से मर्माहत राजा ने सञ्जय से पूछा कि कुरुओं और सृञ्जयों में कौन जीवित हैं और कौन मारे गए। सञ्जय कौरव-पक्ष के मारे गए वीरों के नाम, और उन्हें मारने वाले पाण्डव या पाञ्चाल वीर का नाम भी, गिनाते हैं — भीष्म, द्रोण, कर्ण, जयद्रथ, भगदत्त, भूरिश्रवा, दुःशासन, वृषसेन तथा और भी अनेक, साथ ही मारे गए जनपद और सेनाएँ। वे कर्ण के पतन की तुलना पुराकथाओं के महान वधों से करते हैं और अन्त में राजा को स्मरण कराते हैं कि यह उनके अपने कर्मों का फल है।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (8.2.1)

तच्छ्रुत्वा कर्णहननं पुत्रांश्चैव पलायितान् । धृतराष्ट्रो नृपश्चैव द्विजश्रेष्ठ किमब्रवीत् ॥

tacchrutvā karṇahananaṃ putrāṃścaiva palāyitān | dhṛtarāṣṭro nṛpaścaiva dvijaśreṣṭha kimabravīt

हे द्विजश्रेष्ठ! कर्ण के वध और अपने पुत्रों के भाग जाने की बात सुनकर राजा धृतराष्ट्र ने क्या कहा?

श्लोक 2 (8.2.2)

प्राप्तवान्व्यसनं घोरं पुत्रव्यसनजं महत् । काले यदुक्तवांस्तस्मिंस्तन्ममाचक्ष्व तत्त्वतः ॥

prāptavānvyasanaṃ ghoraṃ putravyasanajaṃ mahat | kāle yaduktavāṃstasmiṃstanmamācakṣva tattvataḥ

वे पुत्रों के संकट से उत्पन्न भयंकर और भारी विपत्ति में पड़े थे। उस समय उन्होंने जो कुछ कहा, वह मुझे यथार्थ रूप से बताइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (8.2.3)

एतच्छ्रुत्वा महाराज धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । अब्रवीत्सञ्जयं सूतं शोकसंविग्नमानसः ॥

etacchrutvā mahārāja dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | abravītsañjayaṃ sūtaṃ śokasaṃvignamānasaḥ

महाराज! यह सुनकर अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र ने शोक से व्याकुल मन से सूत सञ्जय से कहा।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 4 (8.2.4)

दुष्प्रणीतेन मे तात पुत्रस्यादीर्घजीविनः । हतं वैकर्तनं श्रुत्वा शोको मर्माणि कृन्तति ॥

duṣpraṇītena me tāta putrasyādīrghajīvinaḥ | hataṃ vaikartanaṃ śrutvā śoko marmāṇi kṛntati

तात सञ्जय! मेरे अल्पायु पुत्र के कुनीतिपूर्ण आचरण के कारण, और वैकर्तन कर्ण के मारे जाने की बात सुनकर, शोक मेरे मर्मस्थलों को काट रहा है।

श्लोक 5 (8.2.5)

तस्य मे संशयं छिन्धि दुःखपारं तितीर्षतः । कुरूणां सृञ्जयानां च के जीवन्ति के मृताः ॥

tasya me saṃśayaṃ chindhi duḥkhapāraṃ titīrṣataḥ | kurūṇāṃ sṛñjayānāṃ ca ke jīvanti ke mṛtāḥ

मैं इस दुःख के पार जाना चाहता हूँ; मेरा संशय दूर करो — कुरुओं और सृञ्जयों में कौन जीवित हैं और कौन मारे गए?

सञ्जय उवाच

श्लोक 6 (8.2.6)

हतः शान्तनवो राजन्दुराधर्षः प्रतापवान् । हत्वा पाण्डवयोधानामर्बुदं दशभिर्दिनैः ॥

hataḥ śāntanavo rājandurādharṣaḥ pratāpavān | hatvā pāṇḍavayodhānāmarbudaṃ daśabhirdinaiḥ

राजन्! शान्तनु-पुत्र दुराधर्ष और प्रतापी भीष्म मारे गए, जिन्होंने दस दिनों में पाण्डव-पक्ष के एक अर्बुद (दस करोड़) योद्धाओं को मारा था।

श्लोक 7 (8.2.7)

तथा द्रोणो महेष्वासः पाञ्चालानां रथव्रजान् । निहत्य युधि दुर्धर्षः पश्चाद्रुक्मरथो हतः ॥

tathā droṇo maheṣvāsaḥ pāñcālānāṃ rathavrajān | nihatya yudhi durdharṣaḥ paścādrukmaratho hataḥ

फिर महाधनुर्धर और दुर्धर्ष द्रोण ने युद्ध में पाञ्चालों के रथ-समूहों का संहार किया, और उसके बाद वे स्वर्ण-रथ वाले द्रोण स्वयं मारे गए।

श्लोक 8 (8.2.8)

हतशेषस्य भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना । अर्धं निहत्य सैन्यस्य कर्णो वैकर्तनो हतः ॥

hataśeṣasya bhīṣmeṇa droṇena ca mahātmanā | ardhaṃ nihatya sainyasya karṇo vaikartano hataḥ

भीष्म और महात्मा द्रोण से बची हुई सेना का आधा भाग मारकर वैकर्तन कर्ण स्वयं मारा गया।

श्लोक 9 (8.2.9)

विविंशतिर्महाराज राजपुत्रो महाबलः । आनर्तयोधाञ्शतशो निहत्य निहतो रणे ॥

viviṃśatirmahārāja rājaputro mahābalaḥ | ānartayodhāñśataśo nihatya nihato raṇe

महाराज! महाबली राजकुमार विविंशति आनर्त देश के सैकड़ों योद्धाओं को मारकर स्वयं युद्ध में मारे गए।

श्लोक 10 (8.2.10)

तथा पुत्रो विकर्णस्ते क्षत्रव्रतमनुस्मरन् । क्षीणबाणो हतः शूरः स्थितो ह्यभिमुखः परैः ॥

tathā putro vikarṇaste kṣatravratamanusmaran | kṣīṇabāṇo hataḥ śūraḥ sthito hyabhimukhaḥ paraiḥ

इसी प्रकार आपके पुत्र वीर विकर्ण भी क्षत्रिय के व्रत को स्मरण करते हुए, बाण समाप्त हो जाने पर, शत्रुओं के सामने डटे रहकर मारे गए।

श्लोक 11 (8.2.11)

घोररूपान्परिक्लेशान्दुर्योधनकृतान्बहून् । प्रतिज्ञां स्मरता तेन भीमसेनेन पातितः ॥

ghorarūpānparikleśānduryodhanakṛtānbahūn | pratijñāṃ smaratā tena bhīmasenena pātitaḥ

अपनी प्रतिज्ञा को और दुर्योधन द्वारा दिए गए अनेक भयंकर कष्टों को स्मरण करते हुए भीमसेन ने उन्हें गिरा दिया।

श्लोक 12 (8.2.12)

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ राजपुत्रौ महारथौ । कृत्वा नसुकरं कर्म गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥

vindānuvindāvāvantyau rājaputrau mahārathau | kṛtvā nasukaraṃ karma gatau vaivasvatakṣayam

अवन्ती के राजकुमार महारथी विन्द और अनुविन्द दुष्कर कर्म करके यमलोक चले गए।

श्लोक 13 (8.2.13)

सिन्धुराष्ट्रमुखानीह दश राष्ट्राणि यानिह । यस्य तिष्ठन्ति वचने यः स्थितस्तव शासने ॥

sindhurāṣṭramukhānīha daśa rāṣṭrāṇi yāniha | yasya tiṣṭhanti vacane yaḥ sthitastava śāsane

सिन्धु देश को आदि लेकर जो दस राष्ट्र यहाँ उनके आदेश में रहते थे, और जो स्वयं आपके शासन में स्थित थे —

श्लोक 14 (8.2.14)

अक्षौहिणीर्दशैकां च विनिर्जित्य शितैः शरैः । सोऽर्जुनेन हतो राजन्महावीर्यो जयद्रथः ॥

akṣauhiṇīrdaśaikāṃ ca vinirjitya śitaiḥ śaraiḥ | so'rjunena hato rājanmahāvīryo jayadrathaḥ

वे महापराक्रमी जयद्रथ ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओं को तीखे बाणों से जीतकर भी, राजन्! अर्जुन के हाथों मारे गए।

श्लोक 15 (8.2.15)

तथा दुर्योधनसुतस्तरस्वी युद्धदुर्मदः । वर्तमानः पितुः शास्त्रे सौभद्रेण निपातितः ॥

tathā duryodhanasutastarasvī yuddhadurmadaḥ | vartamānaḥ pituḥ śāstre saubhadreṇa nipātitaḥ

इसी प्रकार दुर्योधन का तेजस्वी पुत्र, जो युद्ध में उन्मत्त-सा था और पिता के मार्ग पर चलता था, सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु के हाथों मारा गया।

श्लोक 16 (8.2.16)

तथा दौःशासनिः शूरो बाहुशाली रणोत्कटः । द्रौपदेयेन सङ्गम्य गमितो यमसादनम् ॥

tathā dauḥśāsaniḥ śūro bāhuśālī raṇotkaṭaḥ | draupadeyena saṅgamya gamito yamasādanam

इसी प्रकार दुःशासन का पुत्र, भुजबल से सम्पन्न और रण में प्रचण्ड वह वीर, द्रौपदी के एक पुत्र से भिड़कर यमलोक भेज दिया गया।

श्लोक 17 (8.2.17)

किरातानामधिपतिः सागरानूपवासिनाम् । देवराजस्य धर्मात्मा प्रियो बहुमतः सखा ॥

kirātānāmadhipatiḥ sāgarānūpavāsinām | devarājasya dharmātmā priyo bahumataḥ sakhā

समुद्र के तट और दलदली प्रदेशों में रहने वाले किरातों के अधिपति, धर्मात्मा, जो देवराज इन्द्र के प्रिय और माननीय मित्र थे —

श्लोक 18 (8.2.18)

भगदत्तो महीपालः क्षत्रधर्मरतः सदा । धनञ्जयेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥

bhagadatto mahīpālaḥ kṣatradharmarataḥ sadā | dhanañjayena vikramya gamito yamasādanam

वे राजा भगदत्त, जो सदा क्षत्रिय-धर्म में लगे रहते थे, धनञ्जय के पराक्रम से यमलोक भेज दिए गए।

श्लोक 19 (8.2.19)

तथा कौरवदायादो न्यस्तशस्त्रो महायशाः । हतो भूरिश्रवा राजञ्शूरः सात्यकिना युधि ॥

tathā kauravadāyādo nyastaśastro mahāyaśāḥ | hato bhūriśravā rājañśūraḥ sātyakinā yudhi

इसी प्रकार कुरुवंश के उत्तराधिकारी, महायशस्वी शूर भूरिश्रवा, जिन्होंने शस्त्र रख दिए थे, राजन्! युद्ध में सात्यकि के हाथों मारे गए।

श्लोक 20 (8.2.20)

श्रुतायुरपि चाम्बष्ठः क्षत्रियाणां धुरन्धरः । चरन्नभीतवत्सङ्ख्ये निहतः सव्यसाचिना ॥

śrutāyurapi cāmbaṣṭhaḥ kṣatriyāṇāṃ dhurandharaḥ | carannabhītavatsaṅkhye nihataḥ savyasācinā

क्षत्रियों में अग्रणी अम्बष्ठ-नरेश श्रुतायु भी युद्ध में निर्भय होकर विचरते हुए सव्यसाची अर्जुन के हाथों मारे गए।

श्लोक 21 (8.2.21)

तव पुत्रः सदामर्षी कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः । दुःशासनो महाराज भीमसेनेन पातितः ॥

tava putraḥ sadāmarṣī kṛtāstro yuddhadurmadaḥ | duḥśāsano mahārāja bhīmasenena pātitaḥ

महाराज! आपका पुत्र दुःशासन, जो सदा अमर्षशील, अस्त्रों में कुशल और युद्ध में उन्मत्त-सा था, भीमसेन के हाथों मारा गया।

श्लोक 22 (8.2.22)

यस्य राजन्गजानीकं बहुसाहस्रमद्भुतम् । सुदक्षिणः स सङ्ग्रामे निहतः सव्यसाचिना ॥

yasya rājangajānīkaṃ bahusāhasramadbhutam | sudakṣiṇaḥ sa saṅgrāme nihataḥ savyasācinā

राजन्! सुदक्षिण, जिसकी हाथियों की सेना कई हज़ार की और अद्भुत थी, युद्ध में सव्यसाची के हाथों मारा गया।

श्लोक 23 (8.2.23)

कोसलानामधिपतिर्हत्वा बहुमतान्परान् । सौभद्रेणेह विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥

kosalānāmadhipatirhatvā bahumatānparān | saubhadreṇeha vikramya gamito yamasādanam

कोसल देश के अधिपति ने बहुत-से सम्मानित शत्रुओं को मारकर भी यहाँ सुभद्रा-पुत्र के पराक्रम से यमलोक की राह पकड़ी।

श्लोक 24 (8.2.24)

बहुशो योधयित्वा तु भीमसेनं महारथम् । चित्रसेनस्तव सुतो भीमसेनेन पातितः ॥

bahuśo yodhayitvā tu bhīmasenaṃ mahāratham | citrasenastava suto bhīmasenena pātitaḥ

आपका पुत्र चित्रसेन महारथी भीमसेन से अनेक बार युद्ध करके अन्त में भीमसेन के ही हाथों गिरा दिया गया।

श्लोक 25 (8.2.25)

मद्रराजात्मजः शूरः परेषां भयवर्धनः । असिचर्मधरः श्रीमान्सौभद्रेण निपातितः ॥

madrarājātmajaḥ śūraḥ pareṣāṃ bhayavardhanaḥ | asicarmadharaḥ śrīmānsaubhadreṇa nipātitaḥ

मद्रराज का पुत्र, शत्रुओं में भय बढ़ाने वाला वह शूर और तेजस्वी वीर, जो तलवार और ढाल धारण करता था, सुभद्रा-पुत्र के हाथों मारा गया।

श्लोक 26 (8.2.26)

समः कर्णस्य समरे यः स कर्णस्य पश्यतः । वृषसेनो महातेजाः शीघ्रास्त्रो दृढविक्रमः ॥

samaḥ karṇasya samare yaḥ sa karṇasya paśyataḥ | vṛṣaseno mahātejāḥ śīghrāstro dṛḍhavikramaḥ

वृषसेन, जो महातेजस्वी, शीघ्र अस्त्र चलाने वाला और दृढ़ पराक्रमी था तथा युद्ध में कर्ण के समान था — वह कर्ण के देखते-देखते मारा गया —

श्लोक 27 (8.2.27)

अभिमन्योर्वधं स्मृत्वा प्रतिज्ञामपि चात्मनः । धनञ्जयेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥

abhimanyorvadhaṃ smṛtvā pratijñāmapi cātmanaḥ | dhanañjayena vikramya gamito yamasādanam

अभिमन्यु के वध को और अपनी प्रतिज्ञा को स्मरण करके धनञ्जय ने पराक्रम दिखाकर उसे यमलोक पहुँचा दिया।

श्लोक 28 (8.2.28)

नित्यं प्रसक्तवैरो यः पाण्डवैः पृथिवीपतिः । विश्राव्य वैरं पार्थेन श्रुतायुः स निपातितः ॥

nityaṃ prasaktavairo yaḥ pāṇḍavaiḥ pṛthivīpatiḥ | viśrāvya vairaṃ pārthena śrutāyuḥ sa nipātitaḥ

राजा श्रुतायु, जो सदा पाण्डवों से वैर बाँधे रहते थे, अपना वैर घोषित करके पार्थ के हाथों गिरा दिए गए।

श्लोक 29 (8.2.29)

शल्यपुत्रस्तु विक्रान्तः सहदेवेन मारिष । हतो रुक्मरथो राजञ्श्यालो मातुलजो युधि ॥

śalyaputrastu vikrāntaḥ sahadevena māriṣa | hato rukmaratho rājañśyālo mātulajo yudhi

और शल्य का पराक्रमी पुत्र रुक्मरथ, हे मान्यवर! राजन्! युद्ध में सहदेव के हाथों मारा गया — जो उनका सम्बन्धी था, उनके मामा का पुत्र।

श्लोक 30 (8.2.30)

राजा भागीरथो वृद्धो बृहत्क्षत्रश्च केकयः । पराक्रमन्तौ विक्रान्तौ निहतौ वीर्यवत्तरौ ॥

rājā bhāgīratho vṛddho bṛhatkṣatraśca kekayaḥ | parākramantau vikrāntau nihatau vīryavattarau

वृद्ध राजा भगीरथ और केकय-नरेश बृहत्क्षत्र, जो पराक्रमी और अत्यन्त बलशाली थे, पराक्रम दिखाते हुए मारे गए।

श्लोक 31 (8.2.31)

भगदत्तसुतो राजन्कृतप्रज्ञो महाबलः । श्येनवच्चरता सङ्ख्ये नकुलेन निपातितः ॥

bhagadattasuto rājankṛtaprajño mahābalaḥ | śyenavaccaratā saṅkhye nakulena nipātitaḥ

राजन्! भगदत्त का पुत्र, जो बुद्धिमान और महाबली था, बाज की तरह रणभूमि में विचरने वाले नकुल के हाथों मारा गया।

श्लोक 32 (8.2.32)

पितामहस्तव तथा बाह्लीकः सह बाह्लिकैः । निहतो भीमसेनेन महाबलपराक्रमः ॥

pitāmahastava tathā bāhlīkaḥ saha bāhlikaiḥ | nihato bhīmasenena mahābalaparākramaḥ

इसी प्रकार आपके पितामह बाह्लीक, जो महान बल और पराक्रम वाले थे, बाह्लिकों के साथ भीमसेन के हाथों मारे गए।

श्लोक 33 (8.2.33)

जयत्सेनस्तथा राजञ्जारासन्धिर्महाबलः । मागधो निहतः सङ्ख्ये सौभद्रेण महात्मना ॥

jayatsenastathā rājañjārāsandhirmahābalaḥ | māgadho nihataḥ saṅkhye saubhadreṇa mahātmanā

राजन्! जरासन्ध का पुत्र महाबली मगधराज जयत्सेन युद्ध में महात्मा सुभद्रा-पुत्र के हाथों मारा गया।

श्लोक 34 (8.2.34)

पुत्रस्ते दुर्मुखो राजन्दुःसहश्च महारथः । गदया भीमसेनेन निहतौ शूरमानिनौ ॥

putraste durmukho rājanduḥsahaśca mahārathaḥ | gadayā bhīmasenena nihatau śūramāninau

राजन्! आपका पुत्र दुर्मुख और महारथी दुःसह, जो अपने को शूर मानते थे, भीमसेन की गदा से मारे गए।

श्लोक 35 (8.2.35)

दुर्मर्षणो दुर्विषहो दुर्जयश्च महारथः । कृत्वा त्वसुकरं कर्म गता वैवस्वतक्षयम् ॥

durmarṣaṇo durviṣaho durjayaśca mahārathaḥ | kṛtvā tvasukaraṃ karma gatā vaivasvatakṣayam

दुर्मर्षण, दुर्विषह और महारथी दुर्जय — ये दुष्कर कर्म करके यमलोक चले गए।

श्लोक 36 (8.2.36)

उभौ कलिङ्गवृषकौ भ्रातरौ युद्धदुर्मदौ । कृत्वा चासुकरं कर्म गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥

ubhau kaliṅgavṛṣakau bhrātarau yuddhadurmadau | kṛtvā cāsukaraṃ karma gatau vaivasvatakṣayam

कलिङ्ग के वे दोनों भाई, बैल-जैसे वीर, जो युद्ध में उन्मत्त-से थे, दुष्कर कर्म करके यमलोक चले गए।

श्लोक 37 (8.2.37)

सचिवो वृषपर्वा ते शूरः परमवीर्यवान् । भीमसेनेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥

sacivo vṛṣaparvā te śūraḥ paramavīryavān | bhīmasenena vikramya gamito yamasādanam

आपके मन्त्री वृषपर्वा, जो परम पराक्रमी शूर थे, भीमसेन के पराक्रम से यमलोक भेज दिए गए।

श्लोक 38 (8.2.38)

तथैव पौरवो राजा नागायुतबलो महान् । समरे पाण्डुपुत्रेण निहतः सव्यसाचिना ॥

tathaiva pauravo rājā nāgāyutabalo mahān | samare pāṇḍuputreṇa nihataḥ savyasācinā

इसी प्रकार दस हज़ार हाथियों के बल वाले महान पौरव राजा को पाण्डुपुत्र सव्यसाची ने युद्ध में मार डाला।

श्लोक 39 (8.2.39)

वसातयो महाराज द्विसाहस्राः प्रहारिणः । शूरसेनाश्च विक्रान्ताः सर्वे युधि निपातिताः ॥

vasātayo mahārāja dvisāhasrāḥ prahāriṇaḥ | śūrasenāśca vikrāntāḥ sarve yudhi nipātitāḥ

महाराज! वसाति, जो दो हज़ार प्रहार करने वाले योद्धा थे, और पराक्रमी शूरसेन — सब युद्ध में मार गिराए गए।

श्लोक 40 (8.2.40)

अभीषाहाः कवचिनः प्रहरन्तो रणोत्कटाः । शिबयश्च रथोदाराः कालिङ्गसहिता हताः ॥

abhīṣāhāḥ kavacinaḥ praharanto raṇotkaṭāḥ | śibayaśca rathodārāḥ kāliṅgasahitā hatāḥ

कवचधारी, प्रहार करने वाले और रण में उग्र अभीषाह, उत्तम रथों वाले शिबि तथा कलिङ्ग — सब मारे गए।

श्लोक 41 (8.2.41)

गोकुले नित्यसंवृद्धा युद्धे परमकोपनाः । गोपालाः कृतवीरास्ते निहताः सव्यसाचिना ॥

gokule nityasaṃvṛddhā yuddhe paramakopanāḥ | gopālāḥ kṛtavīrāste nihatāḥ savyasācinā

गोकुल में सदा पले हुए, युद्ध में अत्यन्त क्रोधी और पराक्रम सिद्ध कर चुके वे गोपाल सव्यसाची के हाथों मारे गए।

श्लोक 42 (8.2.42)

श्रेणयो बहुसाहस्राः संशप्तकगणाश्च ये । ते सर्वे पार्थमासाद्य गता वैवस्वतक्षयम् ॥

śreṇayo bahusāhasrāḥ saṃśaptakagaṇāśca ye | te sarve pārthamāsādya gatā vaivasvatakṣayam

श्रेणी-सैनिक, जो कई हज़ार थे, और संशप्तकों के गण — वे सब पार्थ का सामना करके यमलोक चले गए।

श्लोक 43 (8.2.43)

श्यालौ तव महाराज राजानौ वृषकाचलौ । त्वदर्थमतिविक्रान्तौ निहतौ सव्यसाचिना ॥

śyālau tava mahārāja rājānau vṛṣakācalau | tvadarthamativikrāntau nihatau savyasācinā

महाराज! आपके दोनों साले, राजा वृषक और अचल, जिन्होंने आपके लिए अत्यन्त पराक्रम दिखाया, सव्यसाची के हाथों मारे गए।

श्लोक 44 (8.2.44)

उग्रकर्मा महेष्वासो नामतः कर्मतस्तथा । साल्वराजो महाबाहुर्भीमसेनेन पातितः ॥

ugrakarmā maheṣvāso nāmataḥ karmatastathā | sālvarājo mahābāhurbhīmasenena pātitaḥ

साल्व देश का राजा, महाधनुर्धर और महाबाहु, जो नाम से और कर्म से भी उग्रकर्मा था, भीमसेन के हाथों मारा गया।

श्लोक 45 (8.2.45)

ओघवांश्च महाराज बृहन्तः सहितौ रणे । पराक्रमन्तौ मित्रार्थे गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥

oghavāṃśca mahārāja bṛhantaḥ sahitau raṇe | parākramantau mitrārthe gatau vaivasvatakṣayam

महाराज! ओघवान् और बृहन्त युद्ध में साथ-साथ मित्र के लिए पराक्रम दिखाते हुए यमलोक चले गए।

श्लोक 46 (8.2.46)

तथैव रथिनां श्रेष्ठः क्षेमधूर्तिर्विशाम्पते । निहतो गदया राजन्भीमसेनेन संयुगे ॥

tathaiva rathināṃ śreṣṭhaḥ kṣemadhūrtirviśāmpate | nihato gadayā rājanbhīmasenena saṃyuge

हे प्रजापति! इसी प्रकार रथियों में श्रेष्ठ क्षेमधूर्ति को भीमसेन ने युद्ध में गदा से मार डाला।

श्लोक 47 (8.2.47)

तथा राजन्महेष्वासो जलसन्धो महाबलः । सुमहत्कदनं कृत्वा हतः सात्यकिना रणे ॥

tathā rājanmaheṣvāso jalasandho mahābalaḥ | sumahatkadanaṃ kṛtvā hataḥ sātyakinā raṇe

और राजन्! महाधनुर्धर तथा महाबली जलसन्ध बहुत बड़ा संहार करके युद्ध में सात्यकि के हाथों मारा गया।

श्लोक 48 (8.2.48)

अलम्बुसो राक्षसेन्द्रः खरबन्धुरयानवान् । घटोत्कचेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥

alambuso rākṣasendraḥ kharabandhurayānavān | ghaṭotkacena vikramya gamito yamasādanam

राक्षसों का स्वामी अलम्बुष, जो गधों से जुते रथ पर चलता था, घटोत्कच के पराक्रम से यमलोक भेज दिया गया।

श्लोक 49 (8.2.49)

राधेयः सूतपुत्रश्च भ्रातरश्च महारथाः । केकयाः सर्वशश्चापि निहताः सव्यसाचिना ॥

rādheyaḥ sūtaputraśca bhrātaraśca mahārathāḥ | kekayāḥ sarvaśaścāpi nihatāḥ savyasācinā

सूतपुत्र राधेय (कर्ण) और उसके भाई महारथी, तथा सभी केकय भी, सव्यसाची के हाथों मारे गए।

श्लोक 50 (8.2.50)

मालवा मद्रकाश्चैव द्राविडाश्चोग्रकर्मिणः । यौधेयाश्च ललित्थाश्च क्षुद्रकाश्चाप्युशीनराः ॥

mālavā madrakāścaiva drāviḍāścograkarmiṇaḥ | yaudheyāśca lalitthāśca kṣudrakāścāpyuśīnarāḥ

मालव, मद्रक और उग्र कर्म करने वाले द्रविड, यौधेय, ललित्थ, क्षुद्रक और उशीनर,

श्लोक 51 (8.2.51)

मावेल्लकास्तुण्डिकेराः सावित्रीपुत्रकाश्च ये । प्राच्योदीच्याः प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च मारिष ॥

māvellakāstuṇḍikerāḥ sāvitrīputrakāśca ye | prācyodīcyāḥ pratīcyāśca dākṣiṇātyāśca māriṣa

मावेल्लक, तुण्डिकेर और सावित्रीपुत्रक, तथा, हे मान्यवर! पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण के योद्धा —

श्लोक 52 (8.2.52)

पत्तीनां निहताः सङ्घा हयानां प्रयुतानि च । रथव्रजाश्च निहता हताश्च वरवारणाः ॥

pattīnāṃ nihatāḥ saṅghā hayānāṃ prayutāni ca | rathavrajāśca nihatā hatāśca varavāraṇāḥ

पैदल सैनिकों के समूह मारे गए, लाखों घोड़े मारे गए, रथों के समूह नष्ट हुए और श्रेष्ठ हाथी भी मारे गए।

श्लोक 53 (8.2.53)

सध्वजाः सायुधाः शूराः सवर्माम्बरभूषणाः । कालेन महताऽऽयस्ताः कुशलैर्ये च वर्धिताः ॥

sadhvajāḥ sāyudhāḥ śūrāḥ savarmāmbarabhūṣaṇāḥ | kālena mahatā''yastāḥ kuśalairye ca vardhitāḥ

ध्वजा, शस्त्र, कवच, वस्त्र और आभूषणों से सज्जित वे शूर, जिन्हें दीर्घ काल तक परिश्रम से तैयार किया गया था और जिन्हें कुशल लोगों ने पाला-पोसा था —

श्लोक 54 (8.2.54)

ते हताः समरे राजन्पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । अन्ये तथाऽमितबलाः परस्परवधैषिणः ॥

te hatāḥ samare rājanpārthenākliṣṭakarmaṇā | anye tathā'mitabalāḥ parasparavadhaiṣiṇaḥ

राजन्! वे सब अथक कर्म वाले पार्थ के हाथों युद्ध में मारे गए; और अपार बलशाली अन्य लोग भी एक-दूसरे का वध चाहते हुए आपस में मारे गए।

श्लोक 55 (8.2.55)

एते चान्ये च बहवो राजानः सगणा रणे । हताः सहस्रशो राजन्यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥

ete cānye ca bahavo rājānaḥ sagaṇā raṇe | hatāḥ sahasraśo rājanyanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi

राजन्! ये और दूसरे बहुत-से राजा अपनी सेनाओं के साथ युद्ध में हज़ारों की संख्या में मारे गए हैं — जिनके विषय में आप मुझसे पूछ रहे हैं।

श्लोक 56 (8.2.56)

एवमेष क्षयो वृत्तः कर्णार्जुनसमागमे । महेन्द्रेण यथा वृत्रो यथा रामेण रावणः ॥

evameṣa kṣayo vṛttaḥ karṇārjunasamāgame | mahendreṇa yathā vṛtro yathā rāmeṇa rāvaṇaḥ

इस प्रकार कर्ण और अर्जुन की भिड़न्त में यह विनाश हुआ — जैसे महेन्द्र के हाथों वृत्र मारा गया, जैसे राम के हाथों रावण,

श्लोक 57 (8.2.57)

यथा कृष्णेन नरको मुरुश्च निहतो रणे । कार्तवीर्यश्च रामेण भार्गवेण यथा हतः ॥

yathā kṛṣṇena narako muruśca nihato raṇe | kārtavīryaśca rāmeṇa bhārgaveṇa yathā hataḥ

जैसे कृष्ण ने युद्ध में नरक और मुर को मारा, और जैसे भृगुवंशी राम ने कार्तवीर्य को मारा।

श्लोक 58 (8.2.58)

सज्ञातिबान्धवः शूरः समरे युद्धदुर्मदः । रणे कृत्वा महद्युद्धं घोरं त्रैलोक्यमोहनम् ॥

sajñātibāndhavaḥ śūraḥ samare yuddhadurmadaḥ | raṇe kṛtvā mahadyuddhaṃ ghoraṃ trailokyamohanam

वह शूर अपने जाति-भाइयों और बन्धुओं के साथ, रण में उन्मत्त-सा, तीनों लोकों को मोहित कर देने वाला घोर और महान युद्ध करके,

श्लोक 59 (8.2.59)

यथा स्कन्देन महिषो यथा रुद्रेण चान्धकः । तथाऽर्जुनेन स हतो द्वैरथे युद्धदुर्मदः ॥

yathā skandena mahiṣo yathā rudreṇa cāndhakaḥ | tathā'rjunena sa hato dvairathe yuddhadurmadaḥ

द्वैरथ युद्ध में अर्जुन के हाथों वैसे ही मारा गया, जैसे स्कन्द के हाथों महिष और रुद्र के हाथों अन्धक मारे गए थे।

श्लोक 60 (8.2.60)

सामात्यबान्धवो राजन्कर्णः प्रहरतां वरः । जयाशा धार्तराष्ट्राणां वैरस्य च मुखं नृप ॥

sāmātyabāndhavo rājankarṇaḥ praharatāṃ varaḥ | jayāśā dhārtarāṣṭrāṇāṃ vairasya ca mukhaṃ nṛpa

राजन्! मन्त्रियों और बन्धुओं के साथ वह योद्धाओं में श्रेष्ठ कर्ण — जो धृतराष्ट्र-पुत्रों की विजय की आशा और वैर का मुख्य कारण था, हे राजन्! —

श्लोक 61 (8.2.61)

तीर्णं तत्पाण्डवै राजन्यत्पुरा नावबुध्यसे । उच्यमानो महाराज बन्धुभिर्हितकाङ्क्षिभिः ॥

tīrṇaṃ tatpāṇḍavai rājanyatpurā nāvabudhyase | ucyamāno mahārāja bandhubhirhitakāṅkṣibhiḥ

उसे पाण्डवों ने पार कर लिया है, राजन्! यह बात आप पहले नहीं समझे, महाराज! यद्यपि आपके हितैषी बन्धु आपसे कहते रहे।

श्लोक 62 (8.2.62)

न कृतं च त्वया पूर्वं दैवेन विधिना बलात् । तदिदं समनुप्राप्तं व्यसनं सुमहात्ययम् ॥

na kṛtaṃ ca tvayā pūrvaṃ daivena vidhinā balāt | tadidaṃ samanuprāptaṃ vyasanaṃ sumahātyayam

आपने पहले वह नहीं किया जो करना चाहिए था, क्योंकि दैव के विधान ने आपको बलपूर्वक विवश कर रखा था; इसी से अपार विनाश वाली यह विपत्ति अब आप पर आ पड़ी है।

श्लोक 63 (8.2.63)

पुत्राणां राज्यकामानां त्वया राजन्हितैषिणा । अहितान्येव चीर्णानि तेषां ते फलमागतम् ॥

putrāṇāṃ rājyakāmānāṃ tvayā rājanhitaiṣiṇā | ahitānyeva cīrṇāni teṣāṃ te phalamāgatam

राजन्! राज्य की कामना करने वाले अपने पुत्रों का हित चाहते हुए आपने केवल अहितकारी कर्म ही किए; उन्हीं का फल अब आपके सामने आया है।

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