कर्ण पर्व · अध्याय 101
कौरवों का पलायन, पाण्डवों का हर्ष और कर्णपर्व का समापन
कर्ण के गिरने पर कौरवसेना टूटकर भाग खड़ी होती है, और दुर्योधन शल्य की सम्मति से सेना लौटाकर पड़ाव डालता है। पाण्डव और पाञ्चाल युधिष्ठिर का अभिनन्दन करते हैं, कृष्ण और युधिष्ठिर एक-दूसरे की प्रशंसा करते हैं, और राजा रणभूमि में कर्ण को मरा हुआ देखने जाते हैं। सञ्जय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि यह विनाश उन्हीं की बुरी मन्त्रणा से हुआ; राजा और गान्धारी मूर्छित होकर सँभाले जाते हैं, सञ्जय फिर शिविर जाकर बाद में धृतराष्ट्र को रणभूमि का समाचार सुनाते हैं, और पर्व इस कथा के पाठ और श्रवण के फल के साथ समाप्त होता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.101.1)
हते वैकर्तने कर्णे कुरवो भयपीडिताः । वीक्षमाणा दिशः सर्वाः पलायन्त सहस्रशः ॥
hate vaikartane karṇe kuravo bhayapīḍitāḥ | vīkṣamāṇā diśaḥ sarvāḥ palāyanta sahasraśaḥ
वैकर्तन कर्ण के मारे जाने पर भय से पीड़ित कौरव सब दिशाओं की ओर ताकते हुए हज़ारों की संख्या में भाग खड़े हुए।
श्लोक 2 (8.101.2)
रावणं निहतं दृष्ट्वा राक्षसा राघवेण वा । दिशो भीता द्रवन्नेव तावका भयपीडिताः ॥
rāvaṇaṃ nihataṃ dṛṣṭvā rākṣasā rāghaveṇa vā | diśo bhītā dravanneva tāvakā bhayapīḍitāḥ
जैसे राघव के हाथों रावण को मरा देखकर राक्षस भाग खड़े हुए थे, वैसे ही भय से पीड़ित आपके योद्धा सब दिशाओं में भागने लगे।
श्लोक 3 (8.101.3)
ततो महारवं चक्रुर्योधा राजन्समन्ततः । वार्यमाणा भृशोद्विग्नास्तव पुत्रेण भारत ॥
tato mahāravaṃ cakruryodhā rājansamantataḥ | vāryamāṇā bhṛśodvignāstava putreṇa bhārata
तब हे राजन्, योद्धा चारों ओर बड़ा कोलाहल करने लगे; हे भारत, आपके पुत्र के रोकने पर भी वे अत्यन्त घबराए हुए थे।
श्लोक 4 (8.101.4)
तेषां तु मतमाज्ञाय पुत्रस्ते भरतर्षभ । अवहारं ततश्चक्रे शल्यस्यानुमतेन च ॥
teṣāṃ tu matamājñāya putraste bharatarṣabha | avahāraṃ tataścakre śalyasyānumatena ca
हे भरतश्रेष्ठ, उनका मन जानकर आपके पुत्र ने शल्य की सम्मति से सेना को लौटा लेने का आदेश दिया।
श्लोक 5 (8.101.5)
कृतवर्मा रणे तूर्णं वृतो भारत तावकैः । नारायणावशिष्टैश्च शिबिरायैव दुद्रुवे ॥
kṛtavarmā raṇe tūrṇaṃ vṛto bhārata tāvakaiḥ | nārāyaṇāvaśiṣṭaiśca śibirāyaiva dudruve
हे भारत, कृतवर्मा आपके योद्धाओं और नारायणी सेना के बचे हुए सैनिकों से घिरा हुआ रणभूमि से शीघ्र शिविर की ओर भाग चला।
श्लोक 6 (8.101.6)
अश्वत्थामा ततः शूरो विनिश्वस्य मुहुर्मुहुः । पाण्डवानां जयं दृष्ट्वा शिबिरायैव दुद्रुवे ॥
aśvatthāmā tataḥ śūro viniśvasya muhurmuhuḥ | pāṇḍavānāṃ jayaṃ dṛṣṭvā śibirāyaiva dudruve
तब शूरवीर अश्वत्थामा पाण्डवों की विजय देखकर बार-बार लम्बी साँसें लेता हुआ शिविर की ओर ही भाग गया।
श्लोक 7 (8.101.7)
कृपः शारद्वतो राजन्नागानीकेन भारत । महता मेघकल्पेन शिबिरायैव दुद्रुवे ॥
kṛpaḥ śāradvato rājannāgānīkena bhārata | mahatā meghakalpena śibirāyaiva dudruve
हे राजन्, शारद्वत कृप बादलों के समान विशाल गजसेना के साथ शिविर की ओर ही दौड़ पड़े।
श्लोक 8 (8.101.8)
गान्धाराणां सहस्रेण शकुनिः परिवारितः । सुशर्मा च ययौ राजन्वीक्षमाणो भयार्दितः ॥
gāndhārāṇāṃ sahasreṇa śakuniḥ parivāritaḥ | suśarmā ca yayau rājanvīkṣamāṇo bhayārditaḥ
हे राजन्, एक हज़ार गान्धारों से घिरा हुआ शकुनि चला गया, और भय से पीड़ित सुशर्मा भी इधर-उधर देखता हुआ चल पड़ा।
श्लोक 9 (8.101.9)
दुर्योधनोऽपि स ययौ हतसर्वस्व आतुरः । ज्ञातिशोकसमापन्नश्चिन्तयित्वा मुहुर्मुहुः ॥
duryodhano'pi sa yayau hatasarvasva āturaḥ | jñātiśokasamāpannaścintayitvā muhurmuhuḥ
दुर्योधन भी अपना सब कुछ खोकर व्याकुल हो, अपने बन्धुओं के शोक में डूबा हुआ और बार-बार सोचता हुआ चला गया।
श्लोक 10 (8.101.10)
छिन्नध्वजेन शल्यस्तु रथेन रथिनां वरः । प्रययौ शिबिरायैव वीक्षमाणो दिशो दश ॥
chinnadhvajena śalyastu rathena rathināṃ varaḥ | prayayau śibirāyaiva vīkṣamāṇo diśo daśa
रथियों में श्रेष्ठ शल्य भी कटी हुई ध्वजा वाले रथ से दसों दिशाओं की ओर देखता हुआ शिविर की ओर चला गया।
श्लोक 11 (8.101.11)
ततोऽपरे सुबहुशो भारतानां महारथाः । व्यद्रवन्त दिशो भीता भयविह्वलचेतसः ॥
tato'pare subahuśo bhāratānāṃ mahārathāḥ | vyadravanta diśo bhītā bhayavihvalacetasaḥ
तब भरतवंश के और भी बहुत-से महारथी भय से व्याकुल चित्त होकर इधर-उधर भाग चले।
श्लोक 12 (8.101.12)
अश्रूपूर्णा भयोद्विग्ना वेपमाना भयातुराः । कुरवः प्राद्रवन्सर्वे दृष्ट्वा कर्णं निपातितम् ॥
aśrūpūrṇā bhayodvignā vepamānā bhayāturāḥ | kuravaḥ prādravansarve dṛṣṭvā karṇaṃ nipātitam
आँसुओं से भरे, भय से उद्विग्न, काँपते और भय से आतुर सब कौरव कर्ण को गिरा हुआ देखकर भाग निकले।
श्लोक 13 (8.101.13)
प्रशंसन्तोऽर्जुनं केचित्केचित्कर्णं महारथाः । प्राद्रवन्त रणे भीताः कुरवः कुरुसत्तम ॥
praśaṃsanto'rjunaṃ kecitkecitkarṇaṃ mahārathāḥ | prādravanta raṇe bhītāḥ kuravaḥ kurusattama
हे कुरुश्रेष्ठ, कुछ महारथी अर्जुन की प्रशंसा करते और कुछ कर्ण की, और भयभीत होकर रण से भाग रहे थे।
श्लोक 14 (8.101.14)
तेषां योधसहस्राणां तावकानां महामृधे । नासीत्तत्र पुमान्कश्चिद्यस्तु युद्धे मनो दधे ॥
teṣāṃ yodhasahasrāṇāṃ tāvakānāṃ mahāmṛdhe | nāsīttatra pumānkaścidyastu yuddhe mano dadhe
उस महासंग्राम में आपके उन हज़ारों योद्धाओं में कोई एक भी पुरुष ऐसा नहीं था जिसने युद्ध में मन लगाया हो।
श्लोक 15 (8.101.15)
कर्णे हते महाराज निराशाः कुरवोऽभवन् । जीवनेषु च राज्येषु दारेषु च धनेषु च ॥
karṇe hate mahārāja nirāśāḥ kuravo'bhavan | jīvaneṣu ca rājyeṣu dāreṣu ca dhaneṣu ca
हे महाराज, कर्ण के मारे जाने पर कौरव अपने प्राणों, राज्यों, पत्नियों और धन से निराश हो गए।
श्लोक 16 (8.101.16)
तान्समानीय पुत्रस्ते यत्नेन महता विभो । निवेशाय मनो दध्रे दुःखशोकसमन्वितः ॥
tānsamānīya putraste yatnena mahatā vibho | niveśāya mano dadhre duḥkhaśokasamanvitaḥ
हे विभो, आपके पुत्र ने दुःख और शोक से भरे होने पर भी बड़े यत्न से उन्हें इकट्ठा किया और पड़ाव डालने का विचार किया।
श्लोक 17 (8.101.17)
तस्याज्ञां शिरसा दीनाः प्रतिगृह्य विशाम्पते । विषण्णमनसो भीत्या न्यविशन्त महारथाः ॥
tasyājñāṃ śirasā dīnāḥ pratigṛhya viśāmpate | viṣaṇṇamanaso bhītyā nyaviśanta mahārathāḥ
हे प्रजापालक, उसकी आज्ञा सिर पर धारण कर वे दीन महारथी भय से खिन्नमन होकर पड़ाव में ठहर गए।
श्लोक 18 (8.101.18)
चिन्तयन्तो वधं घोरं सूतपुत्रस्य संयुगे । अर्जुनस्य जयं युद्धे चिन्तयानाः पुनःपुनः ॥
cintayanto vadhaṃ ghoraṃ sūtaputrasya saṃyuge | arjunasya jayaṃ yuddhe cintayānāḥ punaḥpunaḥ
वे युद्ध में सूतपुत्र के भयंकर वध का चिन्तन करते और बार-बार अर्जुन की विजय को सोचते रहे।
श्लोक 19 (8.101.19)
पाण्डवाश्च महेष्वासा न्यविशन्त परन्तपाः । प्रहृष्टमनसः सर्वे जित्वा शत्रुं महारथाः ॥
pāṇḍavāśca maheṣvāsā nyaviśanta parantapāḥ | prahṛṣṭamanasaḥ sarve jitvā śatruṃ mahārathāḥ
और परन्तप, महाधनुर्धर पाण्डव महारथी शत्रु को जीतकर प्रसन्नचित्त हो अपने पड़ाव में ठहरे।
श्लोक 20 (8.101.20)
ततो युधिष्ठिरं तत्र निविष्टं वै मुदान्वितम् । समेत्य सर्वे पाञ्चाला वर्धयन्तो यथाविधि ॥
tato yudhiṣṭhiraṃ tatra niviṣṭaṃ vai mudānvitam | sametya sarve pāñcālā vardhayanto yathāvidhi
तब वहाँ प्रसन्न बैठे हुए युधिष्ठिर के पास सब पाञ्चाल एकत्र हुए और विधिपूर्वक उनका अभिनन्दन करने लगे।
श्लोक 21 (8.101.21)
अर्जुनस्तु रथात्तूर्णमवरुह्य महायशाः । धर्मराजस्य चरणौ पीडयामास हृष्टवत् ॥
arjunastu rathāttūrṇamavaruhya mahāyaśāḥ | dharmarājasya caraṇau pīḍayāmāsa hṛṣṭavat
महायशस्वी अर्जुन ने रथ से शीघ्र उतरकर हर्ष से धर्मराज के चरण पकड़ लिए।
श्लोक 22 (8.101.22)
तमुत्थाप्य महाराज धर्मपुत्रः प्रतापवान् । सस्वजे भरतश्रेष्ठमुपजिघ्रन्नुपस्पृशन् ॥
tamutthāpya mahārāja dharmaputraḥ pratāpavān | sasvaje bharataśreṣṭhamupajighrannupaspṛśan
हे महाराज, प्रतापी धर्मपुत्र ने उसे उठाकर उस भरतश्रेष्ठ को सूँघते और छूते हुए गले लगा लिया।
श्लोक 23 (8.101.23)
नकुलः सहदेवश्च पाण्डवश्च वृकोदरः । अभिवाद्य महाराजमस्वजन्त स्म फल्गुनम् ॥
nakulaḥ sahadevaśca pāṇḍavaśca vṛkodaraḥ | abhivādya mahārājamasvajanta sma phalgunam
नकुल, सहदेव और पाण्डुपुत्र वृकोदर ने महाराज को प्रणाम करके फाल्गुन को गले लगाया।
श्लोक 24 (8.101.24)
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च पाण्डवानां च ये रथाः । वर्धयन्ते स्म राजानं निहते सूतनन्दने ॥
dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca pāṇḍavānāṃ ca ye rathāḥ | vardhayante sma rājānaṃ nihate sūtanandane
धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और पाण्डवों के जो रथी थे, उन्होंने सूतपुत्र के मारे जाने पर राजा का अभिनन्दन किया।
श्लोक 25 (8.101.25)
ततः कृष्णो महाराज सात्यकिश्चापि सात्वतः । वर्धयन्ते स्म राजानं निहते सूतनन्दने ॥
tataḥ kṛṣṇo mahārāja sātyakiścāpi sātvataḥ | vardhayante sma rājānaṃ nihate sūtanandane
फिर हे महाराज, कृष्ण और सात्वतवंशी सात्यकि ने भी सूतपुत्र के मारे जाने पर राजा का अभिनन्दन किया।
श्लोक 26 (8.101.26)
वासुदेवश्च कौन्तेयं प्रणयादिदमब्रवीत् । अद्य राजन्हताः सर्वे धार्तराष्ट्राः सराजकाः । हते वैकर्तने कर्णे रथानां प्रवरे रथे ॥
vāsudevaśca kaunteyaṃ praṇayādidamabravīt | adya rājanhatāḥ sarve dhārtarāṣṭrāḥ sarājakāḥ | hate vaikartane karṇe rathānāṃ pravare rathe
तब वासुदेव ने स्नेहवश कुन्तीपुत्र से यह कहा: "हे राजन्, रथियों में श्रेष्ठ वैकर्तन कर्ण के रथ पर मारे जाने पर आज धृतराष्ट्र के सभी पुत्र अपने सहयोगी राजाओं सहित मारे गए।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 27 (8.101.27)
यदि लोकास्त्रयः सर्वे योधयेयुः सवासवाः । तथापि दुर्जयः सूतस्तव कोपात्तु सूदितः ॥
yadi lokāstrayaḥ sarve yodhayeyuḥ savāsavāḥ | tathāpi durjayaḥ sūtastava kopāttu sūditaḥ
"यदि इन्द्र सहित तीनों लोक भी लड़ते, तब भी सूतपुत्र अजेय था; पर वह आपके क्रोध से मारा गया।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 28 (8.101.28)
एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मराजो जनार्दनम् ॥
evamuktaḥ pratyuvāca dharmarājo janārdanam
ऐसा कहे जाने पर धर्मराज ने जनार्दन को उत्तर दिया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 29 (8.101.29)
तव प्रसादाद्गोविन्द हतः कर्णो महायशाः । पाण्डवाश्च जयं प्राप्ता नाशिताश्चापि शत्रवः ॥
tava prasādādgovinda hataḥ karṇo mahāyaśāḥ | pāṇḍavāśca jayaṃ prāptā nāśitāścāpi śatravaḥ
"हे गोविन्द, आपकी कृपा से महायशस्वी कर्ण मारा गया; पाण्डवों ने विजय पाई और शत्रु नष्ट हो गए।"
श्लोक 30 (8.101.30)
त्वं हि शक्तो भयात्त्रातुं यस्य कस्यचिदाहवे । त्वमस्य जगतो गोप्ता पाण्डवानां च सर्वदा ॥
tvaṃ hi śakto bhayāttrātuṃ yasya kasyacidāhave | tvamasya jagato goptā pāṇḍavānāṃ ca sarvadā
"आप ही युद्ध में किसी को भी भय से बचाने में समर्थ हैं; आप इस जगत् के रक्षक हैं और सदा पाण्डवों के भी।"
श्लोक 31 (8.101.31)
त्वां समासाद्य शक्रोऽपि मोदते दिवि नित्यशः । त्वं पाता पाण्डुपुत्राणां यथैव जगतस्तथा ॥
tvāṃ samāsādya śakro'pi modate divi nityaśaḥ | tvaṃ pātā pāṇḍuputrāṇāṃ yathaiva jagatastathā
"आपका आश्रय पाकर इन्द्र भी स्वर्ग में नित्य आनन्दित रहते हैं; आप पाण्डुपुत्रों के रक्षक हैं, जैसे सारे जगत् के।"
श्लोक 32 (8.101.32)
अनाश्चर्यो जयस्तेषां भक्तिर्येषां त्वयि प्रभो ॥
anāścaryo jayasteṣāṃ bhaktiryeṣāṃ tvayi prabho
"हे प्रभो, जिनकी आप में भक्ति है, उनकी विजय आश्चर्य की बात नहीं।"
श्लोक 33 (8.101.33)
त्वया नाथेन गोविन्द नाथवन्तो वयं युधि । यथेन्द्रेण पुरा देवास्त्वया चापि जनार्दन ॥
tvayā nāthena govinda nāthavanto vayaṃ yudhi | yathendreṇa purā devāstvayā cāpi janārdana
"हे गोविन्द, आप जैसे स्वामी के रहते हम युद्ध में सनाथ हैं, जैसे पूर्वकाल में इन्द्र से देवता सनाथ थे, और हे जनार्दन, आपसे भी।"
श्लोक 34 (8.101.34)
स्वप्स्याम्यद्य सुखं कृष्णनिद्रां लप्स्ये त्वहं क्षपाम् । विगतं हि भयं मेऽद्य त्वत्प्रसादान्न संशयः ॥
svapsyāmyadya sukhaṃ kṛṣṇanidrāṃ lapsye tvahaṃ kṣapām | vigataṃ hi bhayaṃ me'dya tvatprasādānna saṃśayaḥ
"हे कृष्ण, आज मैं सुख से सोऊँगा; रात भर नींद लूँगा। आपकी कृपा से आज मेरा भय दूर हो गया, इसमें संदेह नहीं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 35 (8.101.35)
एवमुक्तस्तु पार्थेन केशवः प्राह पाण्डवम् । निमित्तमात्रं हि वयं तवाप्यस्मिन्मुदागमे ॥
evamuktastu pārthena keśavaḥ prāha pāṇḍavam | nimittamātraṃ hi vayaṃ tavāpyasminmudāgame
पार्थ के ऐसा कहने पर केशव ने पाण्डुपुत्र से कहा: "इस आनन्द की प्राप्ति में हम तो केवल निमित्त मात्र हैं।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 36 (8.101.36)
यस्य ते भ्रातरः शूरा भीमसेनादयो नृप । सम्बन्धिनश्चेन्द्रवीर्याः पार्षतप्रमुखास्तथा ॥
yasya te bhrātaraḥ śūrā bhīmasenādayo nṛpa | sambandhinaścendravīryāḥ pārṣatapramukhāstathā
"हे राजन्, आपके भीमसेन आदि शूरवीर भाई हैं, और इन्द्र के समान पराक्रमी सम्बन्धी भी हैं, जिनमें धृष्टद्युम्न प्रमुख हैं।"
श्लोक 37 (8.101.37)
अर्हते च भवान्नित्यं प्रियं नित्यं च मद्धितम् । प्रियो हि मे त्वमेतेन वचनेन नरोत्तम ॥
arhate ca bhavānnityaṃ priyaṃ nityaṃ ca maddhitam | priyo hi me tvametena vacanena narottama
"आप सदा प्रिय की और सदा मेरे हित की बात के योग्य हैं; हे नरश्रेष्ठ, अपने इस वचन से आप मुझे प्रिय हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 38 (8.101.38)
इत्युक्तो धर्मराजस्तु स्वरथं हेमभूषितम् । दन्तवर्णैर्हयैर्युक्तं कालवालैर्महीपतिः ॥
ityukto dharmarājastu svarathaṃ hemabhūṣitam | dantavarṇairhayairyuktaṃ kālavālairmahīpatiḥ
ऐसा कहे जाने पर पृथ्वीपति धर्मराज अपने सोने से सजे उस रथ पर, जिसमें हाथी-दाँत जैसे श्वेत और काली पूँछ वाले घोड़े जुते थे,
श्लोक 39 (8.101.39)
आस्थाय पुरुषव्याघ्रः स्वबलेनापि संवृतः । प्रययौ बहुवृत्तान्तं द्रष्टुमायोधनं प्रति ॥
āsthāya puruṣavyāghraḥ svabalenāpi saṃvṛtaḥ | prayayau bahuvṛttāntaṃ draṣṭumāyodhanaṃ prati
सवार होकर अपनी सेना से घिरे हुए वे पुरुषसिंह उस रणभूमि को देखने चले जहाँ बहुत कुछ घट चुका था।
श्लोक 40 (8.101.40)
सम्भाषमाणौ तौ वीरावुभौ माधवपाण्डवौ ॥
sambhāṣamāṇau tau vīrāvubhau mādhavapāṇḍavau
माधव और पाण्डव, वे दोनों वीर आपस में बातें कर रहे थे;
श्लोक 41 (8.101.41)
स ददर्श रणे कर्णं शयानं पुरुषर्षभम् । गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैः सर्वतः सन्निपीडितम् ॥
sa dadarśa raṇe karṇaṃ śayānaṃ puruṣarṣabham | gāṇḍīvamuktairviśikhaiḥ sarvataḥ sannipīḍitam
उन्होंने रण में पुरुषश्रेष्ठ कर्ण को लेटा देखा, जो गाण्डीव से छूटे बाणों से चारों ओर बिंधा हुआ था।
श्लोक 42 (8.101.42)
सपुत्रं निहतं दृष्ट्वा कर्णं राजा युधिष्ठिरः । प्रशशंस नरव्याघ्रावुभौ माधवपाण्डवौ ॥
saputraṃ nihataṃ dṛṣṭvā karṇaṃ rājā yudhiṣṭhiraḥ | praśaśaṃsa naravyāghrāvubhau mādhavapāṇḍavau
पुत्र सहित कर्ण को मरा देखकर राजा युधिष्ठिर ने उन दोनों नरव्याघ्रों, माधव और पाण्डव, की प्रशंसा की।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 43 (8.101.43)
अद्य राजाऽस्मि सर्वस्यां पृथिव्यां मधुसूदन । दिष्ट्या जयसि गोविन्द दिष्ट्याशत्रुर्निपातितः ॥
adya rājā'smi sarvasyāṃ pṛthivyāṃ madhusūdana | diṣṭyā jayasi govinda diṣṭyāśatrurnipātitaḥ
"हे मधुसूदन, आज मैं समस्त पृथ्वी का राजा हूँ; हे गोविन्द, सौभाग्य से आपकी जय हुई, सौभाग्य से शत्रु मारा गया।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 44 (8.101.44)
एवं सुबहुशो राजन्प्रशशंस जनार्दनम् । अर्जुनं च कुरुश्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
evaṃ subahuśo rājanpraśaśaṃsa janārdanam | arjunaṃ ca kuruśreṣṭho dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ
हे राजन्, इस प्रकार कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर ने जनार्दन और अर्जुन की बहुत-बहुत प्रशंसा की।
श्लोक 45 (8.101.45)
दृष्ट्वा च निहतं कर्णं स पुत्रं पार्थसायकैः । पुनर्जातमिवात्मानं मेने कुरुकुलोद्वहः ॥
dṛṣṭvā ca nihataṃ karṇaṃ sa putraṃ pārthasāyakaiḥ | punarjātamivātmānaṃ mene kurukulodvahaḥ
पार्थ के बाणों से पुत्र सहित कर्ण को मरा देखकर कुरुकुल के उस धुरन्धर ने मानो अपना नया जन्म हुआ समझा।
श्लोक 46 (8.101.46)
समेत्य च कुरुश्रेष्ठं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । वर्धयन्ति स्म राजानो हर्षयुक्ता महारथाः ॥
sametya ca kuruśreṣṭhaṃ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | vardhayanti sma rājāno harṣayuktā mahārathāḥ
तब हर्ष से भरे महारथी राजा कुरुश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर के पास जाकर उनका अभिनन्दन करने लगे।
श्लोक 47 (8.101.47)
एवमेष क्षयो वृत्तः सुमहान्रोमहर्षणः । तव दुर्मन्त्रिते राजन्दिष्ट्या त्वमनुशोचसि ॥
evameṣa kṣayo vṛttaḥ sumahānromaharṣaṇaḥ | tava durmantrite rājandiṣṭyā tvamanuśocasi
"हे राजन्, आपकी बुरी मन्त्रणा से यह अत्यन्त भारी और रोमांचकारी संहार हुआ; सौभाग्य से आप अब इसका शोक कर रहे हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 48 (8.101.48)
श्रुत्वैतदप्रियं राजा धृतराष्ट्रो महीपतिः । पपात भूमौ निश्चेष्टः कौरव्यः परमासनात् । तथा सत्यव्रता देवी गान्धारी दिव्यदर्शना ॥
śrutvaitadapriyaṃ rājā dhṛtarāṣṭro mahīpatiḥ | papāta bhūmau niśceṣṭaḥ kauravyaḥ paramāsanāt | tathā satyavratā devī gāndhārī divyadarśanā
यह अप्रिय समाचार सुनकर पृथ्वीपति राजा धृतराष्ट्र अपने उच्च आसन से अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े; और सत्यव्रता, दिव्यदृष्टि वाली देवी गान्धारी भी वैसे ही गिर पड़ीं।
श्लोक 49 (8.101.49)
ततस्तूर्णं तु विदुरस्तं नृपं सञ्जयस्तथा । पर्याश्वासयतां चैतावुभावेव तु भूमिपम् ॥
tatastūrṇaṃ tu vidurastaṃ nṛpaṃ sañjayastathā | paryāśvāsayatāṃ caitāvubhāveva tu bhūmipam
तब विदुर और सञ्जय दोनों ने शीघ्र ही उन राजा को ढाढ़स बँधाया।
श्लोक 50 (8.101.50)
तथैवाश्वासयामासुर्गान्धारीं कुरुयोषितः ॥
tathaivāśvāsayāmāsurgāndhārīṃ kuruyoṣitaḥ
वैसे ही कुरुकुल की स्त्रियों ने गान्धारी को सँभाला।
श्लोक 51 (8.101.51)
स दैवं परमं मेने भवितव्यं च भारत । ताभ्यामाश्वासितो राजा तूष्णीमास्ते विशाम्पते ॥
sa daivaṃ paramaṃ mene bhavitavyaṃ ca bhārata | tābhyāmāśvāsito rājā tūṣṇīmāste viśāmpate
हे भारत, राजा ने दैव को ही सर्वोपरि माना और यह भी कि जो होना था वही हुआ; हे प्रजापालक, उन दोनों से धीरज पाकर वे चुप हो गए।
श्लोक 52 (8.101.52)
एवमाख्याय राज्ञे च सञ्जयो राजसत्तम । जगाम शिबिरं भूयो हते कर्णे महात्मनि ॥
evamākhyāya rājñe ca sañjayo rājasattama | jagāma śibiraṃ bhūyo hate karṇe mahātmani
हे राजाओं में श्रेष्ठ, इस प्रकार राजा को सब कहकर सञ्जय महात्मा कर्ण के मारे जाने पर फिर शिविर को गए।
श्लोक 53 (8.101.53)
स दृष्ट्वा निहतं शल्यं राजानं च सुयोधनम् । शकुनिं सुबहून्राजन्सैनिकांश्च सहस्रशः ॥
sa dṛṣṭvā nihataṃ śalyaṃ rājānaṃ ca suyodhanam | śakuniṃ subahūnrājansainikāṃśca sahasraśaḥ
वहाँ उन्होंने शल्य को मरा देखा, राजा सुयोधन को, शकुनि को, तथा हे राजन्, बहुत-से सैनिकों को, हज़ारों को।
श्लोक 54 (8.101.54)
तथैव पाण्डवीं सेनां निहतां प्रेक्ष्य सञ्जयः । सौप्तिके द्रौणिना राजन्हतवाजिनरद्विपाम् ॥
tathaiva pāṇḍavīṃ senāṃ nihatāṃ prekṣya sañjayaḥ | sauptike drauṇinā rājanhatavājinaradvipām
वैसे ही सञ्जय ने रात्रि के आक्रमण में द्रोणपुत्र के हाथों घोड़ों, मनुष्यों और हाथियों सहित मारी गई पाण्डवों की सेना को देखा।
श्लोक 55 (8.101.55)
स हि दृष्ट्वा हतान्सर्वान्समन्ताद्युधि सञ्जयः । प्रयातो हास्तिनपुरं शोकार्तो भयविह्वलः ॥
sa hi dṛṣṭvā hatānsarvānsamantādyudhi sañjayaḥ | prayāto hāstinapuraṃ śokārto bhayavihvalaḥ
सब को चारों ओर युद्ध में मरा हुआ देखकर सञ्जय शोक से पीड़ित और भय से विह्वल होकर हस्तिनापुर चल पड़े।
श्लोक 56 (8.101.56)
हतेषु पुनरेतेषु प्रभूतगजवाजिषु । योधैश्च तैर्महाराज नानादेशसमुद्भवैः ॥
hateṣu punareteṣu prabhūtagajavājiṣu | yodhaiśca tairmahārāja nānādeśasamudbhavaiḥ
हे महाराज, जब ये, अपने बहुत-से हाथी-घोड़ों और नाना देशों में उत्पन्न योद्धाओं सहित, फिर मारे जा चुके थे,
श्लोक 57 (8.101.57)
कुरुक्षेत्रं तु तत्सर्वं शून्यमासीद्विशाम्पते । निहतैः पाण्डवेयैश्च धार्तराष्ट्रैश्च संयुगे ॥
kurukṣetraṃ tu tatsarvaṃ śūnyamāsīdviśāmpate | nihataiḥ pāṇḍaveyaiśca dhārtarāṣṭraiśca saṃyuge
तब हे प्रजापालक, युद्ध में पाण्डवपक्ष और धृतराष्ट्रपक्ष के योद्धाओं के मारे जाने से वह सारा कुरुक्षेत्र सूना हो गया।
श्लोक 58 (8.101.58)
यथाहि विषयं वृत्तं धार्तराष्ट्रस्य सञ्जयः । निवेदयति तत्सर्वं यथावृत्तं यथाविधि ॥
yathāhi viṣayaṃ vṛttaṃ dhārtarāṣṭrasya sañjayaḥ | nivedayati tatsarvaṃ yathāvṛttaṃ yathāvidhi
धृतराष्ट्र के राज्य में जो कुछ घटा था, सञ्जय ने वह सब जैसा हुआ था वैसा ही क्रमपूर्वक निवेदन किया।
श्लोक 59 (8.101.59)
एवं महायुद्धमिदं महात्मनो । धनञ्जयस्याधिरथेश्च यः पठेत् । स सम्यगिष्टस्य मखस्य यत्फलं । तदाप्नुयाद्यः शृणुयाच्च नित्यशः ॥
evaṃ mahāyuddhamidaṃ mahātmano | dhanañjayasyādhiratheśca yaḥ paṭhet | sa samyagiṣṭasya makhasya yatphalaṃ | tadāpnuyādyaḥ śṛṇuyācca nityaśaḥ
इस प्रकार जो महात्मा धनञ्जय और अधिरथपुत्र के इस महायुद्ध का पाठ करेगा, और जो इसे नित्य सुनेगा, वह भलीभाँति किए यज्ञ का जो फल है उसे पाएगा।
श्लोक 60 (8.101.60)
मखो हि विष्णुर्भगवान्सनातनो । वहन्ति यं चाप्यनिलेन्दुभानवः । अतोऽनसूयुः शृणुयात्पठेच्च यः । स सर्वलोकांश्च जयेत्सुखी भवेत् ॥
makho hi viṣṇurbhagavānsanātano | vahanti yaṃ cāpyanilendubhānavaḥ | ato'nasūyuḥ śṛṇuyātpaṭhecca yaḥ | sa sarvalokāṃśca jayetsukhī bhavet
क्योंकि यज्ञ सनातन भगवान् विष्णु हैं, जिन्हें वायु, चन्द्र और सूर्य वहन करते हैं। इसलिए जो ईर्ष्या छोड़कर इसे सुने या पढ़े, वह सब लोकों को जीतेगा और सुखी होगा।