कर्ण पर्व · अध्याय 100
मृत्यु में भी दीप्त कर्ण; कृष्ण और अर्जुन का शङ्खनाद
सञ्जय बताते हैं कि मृत्यु के बाद भी कर्ण का शरीर अपनी शोभा बनाए रहा, यहाँ तक कि सब प्राणी उसे जीवित ही समझते रहे, और वे उसकी दानशीलता — विशेषतः ब्राह्मणों के प्रति — की प्रशंसा करते हैं, जिसके बल पर वह परमगति को गया। उसके पतन पर भयंकर अपशकुन प्रकट होते हैं। वृत्र के वध के बाद इन्द्र की भाँति शोभित अर्जुन और कृष्ण अपने शङ्ख — पाञ्चजन्य और देवदत्त — बजाते हैं, जिनका नाद पृथ्वी और आकाश में भर जाता है। भयभीत कौरव शल्य और दुर्योधन को छोड़कर भाग जाते हैं, और दोनों वीर युधिष्ठिर को आनन्दित करने चल पड़ते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.100.1)
शरसङ्कृत्तवर्माणं रुधिरोक्षितवक्षसम् । गतासुमपि राधेयं नैव लक्ष्मीर्विमुञ्चति ॥
śarasaṅkṛttavarmāṇaṃ rudhirokṣitavakṣasam | gatāsumapi rādheyaṃ naiva lakṣmīrvimuñcati
बाणों से जिसका कवच कट गया था और जिसकी छाती रक्त से सनी थी, उस राधापुत्र को प्राणहीन हो जाने पर भी शोभा ने नहीं छोड़ा।
श्लोक 2 (8.100.2)
तप्तजाम्बूनदनिभं बालार्कसदृशद्युतिम् । जीवन्तमिव तं शूरं सर्वभूतानि मेनिरे ॥
taptajāmbūnadanibhaṃ bālārkasadṛśadyutim | jīvantamiva taṃ śūraṃ sarvabhūtāni menire
तपे सोने जैसे रंग और बालसूर्य जैसी दीप्ति वाले उस शूर को सब प्राणी जीवित-सा ही समझते रहे।
श्लोक 3 (8.100.3)
हतस्यापि महाराज सूतपुत्रस्य संयुगे । वित्रेसुः सर्वतो योधाः सिंहस्येवेतरे मृगाः ॥
hatasyāpi mahārāja sūtaputrasya saṃyuge | vitresuḥ sarvato yodhāḥ siṃhasyevetare mṛgāḥ
हे महाराज! युद्ध में मारे जाने पर भी सूतपुत्र को देखकर योद्धा सब ओर वैसे ही काँप उठे जैसे सिंह को देखकर दूसरे मृग।
श्लोक 4 (8.100.4)
हतोऽपि पुरुषव्याघ्रो व्याहरन्निव लक्ष्यते । नाभवद्विकृतिः काचिन्मृतस्यापि महात्मनः ॥
hato'pi puruṣavyāghro vyāharanniva lakṣyate | nābhavadvikṛtiḥ kācinmṛtasyāpi mahātmanaḥ
मर जाने पर भी वह पुरुषव्याघ्र मानो बोलता-सा दिखाई देता था; उस महात्मा के मृत शरीर में भी कोई विकार नहीं आया।
श्लोक 5 (8.100.5)
चारुवेषधरं राजंश्चारुमौलिशिरोधरम् । तन्मुखं सूतपुत्रस्य पूर्णचन्द्रसमद्युति ॥
cāruveṣadharaṃ rājaṃścārumauliśirodharam | tanmukhaṃ sūtaputrasya pūrṇacandrasamadyuti
हे राजन्! सुन्दर वेश धारण किए, सुन्दर मुकुट और ग्रीवा वाला सूतपुत्र का वह मुख पूर्णचन्द्र के समान दमक रहा था।
श्लोक 6 (8.100.6)
कनकोत्तमसङ्काशो ज्वलन्निव विभावसुः । स शान्तः पुरुषव्याघ्रः पार्थसायकवारिणा ॥
kanakottamasaṅkāśo jvalanniva vibhāvasuḥ | sa śāntaḥ puruṣavyāghraḥ pārthasāyakavāriṇā
उत्तम सोने जैसी आभा वाला और अग्नि की तरह जलता-सा वह पुरुषव्याघ्र पार्थ के बाणरूपी जल से शान्त हो गया था।
श्लोक 7 (8.100.7)
यथाऽग्निर्ज्वलनो दीप्तो जलमासाद्य शाम्यति । कर्णाग्निः समरे तद्वत्पार्थमेघेन शामितः ॥
yathā'gnirjvalano dīpto jalamāsādya śāmyati | karṇāgniḥ samare tadvatpārthameghena śāmitaḥ
जैसे प्रज्वलित अग्नि जल को पाकर बुझ जाती है, वैसे ही कर्णरूपी अग्नि को युद्ध में पार्थरूपी मेघ ने बुझा दिया।
श्लोक 8 (8.100.8)
आहृत्य स यशो दीप्तं सुयुद्धेनात्मनो भुवि । सपुत्रः समरे कर्णः प्रशान्तः पार्थतेजसा ॥
āhṛtya sa yaśo dīptaṃ suyuddhenātmano bhuvi | saputraḥ samare karṇaḥ praśāntaḥ pārthatejasā
पृथ्वी पर उत्तम युद्ध द्वारा उज्ज्वल यश कमाकर कर्ण अपने पुत्र सहित युद्ध में पार्थ के तेज से शान्त हो गया।
श्लोक 9 (8.100.9)
प्रताप्य पाण्डवान्सर्वान्पाञ्चालानस्त्रतेजसा । नानाभरणवान्राजंस्तप्तजाम्बूनदप्रभः ॥
pratāpya pāṇḍavānsarvānpāñcālānastratejasā | nānābharaṇavānrājaṃstaptajāmbūnadaprabhaḥ
अपने अस्त्रों के तेज से सब पाण्डवों और पाञ्चालों को तपाकर, हे राजन्! अनेक आभूषणों से सजे और तपे सोने जैसी आभा वाले —
श्लोक 10 (8.100.10)
वर्षित्वा शरवर्षाणि प्रताप्य रिपुवाहिनीम् । श्रीमानिव सहस्रांशुर्ज्वलन्सर्वान्प्रताप्य च । हतो वैकर्तनः कर्णः पादपोऽङ्कुरवानिव ॥
varṣitvā śaravarṣāṇi pratāpya ripuvāhinīm | śrīmāniva sahasrāṃśurjvalansarvānpratāpya ca | hato vaikartanaḥ karṇaḥ pādapo'ṅkuravāniva
बाणों की वर्षा करके और शत्रु-सेना को तपाकर, तेजस्वी सहस्रांशु सूर्य की तरह सबको जलाता-तपाता हुआ वैकर्तन कर्ण अंकुरित वृक्ष की भाँति मारा गया।
श्लोक 11 (8.100.11)
ददानीत्येव यः प्रादान्न नास्तीत्यर्थितोऽवदत् । सद्भिः सदा सत्पुरुषः स हतो द्वैरथे वृषा ॥
dadānītyeva yaḥ prādānna nāstītyarthito'vadat | sadbhiḥ sadā satpuruṣaḥ sa hato dvairathe vṛṣā
जो “देता हूँ” कहकर देता था, जिसने सज्जनों के माँगने पर कभी “नहीं है” नहीं कहा — वह सदा सत्पुरुष वृष द्वैरथ-युद्ध में मारा गया।
श्लोक 12 (8.100.12)
यस्य ब्राह्मणसात्सर्वं वित्तमासीन्महात्मनः । नादेयं ब्राह्मणेष्वासीद्यस्य स्वमपि जीवितम् ॥
yasya brāhmaṇasātsarvaṃ vittamāsīnmahātmanaḥ | nādeyaṃ brāhmaṇeṣvāsīdyasya svamapi jīvitam
जिस महात्मा का सारा धन ब्राह्मणों के लिए ही था; ब्राह्मणों को देने योग्य न हो ऐसा उसके लिए कुछ भी न था, अपना जीवन तक नहीं।
श्लोक 13 (8.100.13)
स दातॄणां प्रियो राजन्दाता चैव मनोरथान् । स पार्थास्त्रविनिर्दग्धो गतः परमिकां गतिम् ॥
sa dātṝṇāṃ priyo rājandātā caiva manorathān | sa pārthāstravinirdagdho gataḥ paramikāṃ gatim
हे राजन्! वह दाताओं का प्रिय था और स्वयं मनोरथ पूरे करने वाला दाता था; पार्थ के अस्त्रों से दग्ध होकर वह परमगति को चला गया।
श्लोक 14 (8.100.14)
यमाश्रित्याकरोद्वैरं सुतस्ते स गतो दिवम् । आदाय तव पुत्राणां जयाशां शर्म वर्म च ॥
yamāśrityākarodvairaṃ sutaste sa gato divam | ādāya tava putrāṇāṃ jayāśāṃ śarma varma ca
जिसके सहारे तुम्हारे पुत्र ने वैर ठाना था, वह स्वर्ग चला गया, और तुम्हारे पुत्रों की विजय की आशा, उनका कल्याण तथा उनका कवच भी साथ लेता गया।
श्लोक 15 (8.100.15)
हते च कर्णे सरितो न सस्रुः । जगाम चास्तं कलुषो दिवाकरः । श्वेतो ग्रहश्च ज्वलितार्कवर्णो । यमस्य पुत्रोऽभ्युदितः स तिर्यक् ॥
hate ca karṇe sarito na sasruḥ | jagāma cāstaṃ kaluṣo divākaraḥ | śveto grahaśca jvalitārkavarṇo | yamasya putro'bhyuditaḥ sa tiryak
कर्ण के मारे जाने पर नदियाँ बहना भूल गईं, मलिन सूर्य अस्त हो गया, और जलते सूर्य के रंग का वह श्वेत ग्रह, यम का पुत्र, तिरछा उदित हुआ।
श्लोक 16 (8.100.16)
नभश्चचालाथ ननाद चोर्वी । ववुश्च वाताः परुषाश्च घोराः । दिशो बभूवुर्ज्वलिताः सधूमा । महार्णवाः सस्वनुश्चुक्षुभुश्च ॥
nabhaścacālātha nanāda corvī | vavuśca vātāḥ paruṣāśca ghorāḥ | diśo babhūvurjvalitāḥ sadhūmā | mahārṇavāḥ sasvanuścukṣubhuśca
आकाश फट-सा गया, पृथ्वी चीत्कार कर उठी, कठोर और भयंकर वायु चलीं, दिशाएँ धुएँ सहित जल उठीं, और महासागर गरजते हुए उमड़ पड़े।
श्लोक 17 (8.100.17)
सकाननाश्चाद्रिवराश्चकम्पिरे । प्रविव्यथुर्भूतगणाश्च मारिष । बृहस्पतिः सम्परिवार्य रोहिणीं । बभूव चन्द्रार्कसमो विशाम्पते ॥
sakānanāścādrivarāścakampire | pravivyathurbhūtagaṇāśca māriṣa | bṛhaspatiḥ samparivārya rohiṇīṃ | babhūva candrārkasamo viśāmpate
वनों सहित श्रेष्ठ पर्वत काँप उठे और प्राणियों के समूह व्यथित हुए, हे मान्यवर! बृहस्पति रोहिणी को घेरकर चन्द्र और सूर्य के समान तेजस्वी हो गए, हे राजन्!
श्लोक 18 (8.100.18)
हते कर्णे न दिशो विप्रचाराः । सचन्द्रार्का द्यौर्विचचाल भूमिः । पपात चोल्का ज्वलनप्रभा च । निशाचरा हृष्टतरा बभूवुः ॥
hate karṇe na diśo vipracārāḥ | sacandrārkā dyaurvicacāla bhūmiḥ | papāta colkā jvalanaprabhā ca | niśācarā hṛṣṭatarā babhūvuḥ
कर्ण के मारे जाने पर दिशाओं का भेद न रहा, सूर्य-चन्द्र सहित आकाश और पृथ्वी डोल उठे; ज्वाला-सी चमकती उल्का गिरी, और निशाचर और भी हर्षित हुए।
श्लोक 19 (8.100.19)
शशिप्रकाशाननमर्जुनो यदा । जहार कर्णस्य शिरः शरेण । ततोऽन्तरिक्षे सहसैव शब्दो । बभूव हाहेति सुरैर्विमुक्तः ॥
śaśiprakāśānanamarjuno yadā | jahāra karṇasya śiraḥ śareṇa | tato'ntarikṣe sahasaiva śabdo | babhūva hāheti surairvimuktaḥ
जब अर्जुन ने चन्द्रमा जैसे प्रकाश वाले मुख वाले कर्ण का सिर बाण से हर लिया, तब आकाश में देवताओं के मुख से सहसा ‘हाय!’ की ध्वनि निकल पड़ी।
श्लोक 20 (8.100.20)
सदेवगन्धर्वमनुष्यपूजितं । निहत्य कर्णं रिपुमाहवेऽर्जुनः । रराज राजन्परमेण तेजसा । यथा पुरा वृत्रवधे शतक्रतुः ॥
sadevagandharvamanuṣyapūjitaṃ | nihatya karṇaṃ ripumāhave'rjunaḥ | rarāja rājanparameṇa tejasā | yathā purā vṛtravadhe śatakratuḥ
देवों, गन्धर्वों और मनुष्यों से पूजित शत्रु कर्ण को युद्ध में मारकर अर्जुन, हे राजन्! परम तेज से वैसे ही शोभित हुए जैसे प्राचीन काल में वृत्र के वध पर इन्द्र हुए थे।
श्लोक 21 (8.100.21)
पताकिना भीमनिनादकेतुना । रथेन शङ्खस्फटिकावभासिना । महेन्द्रवाहप्रतिमेन तावुभौ । महेन्द्रवीर्यप्रतिमानपौरुषौ ॥
patākinā bhīmaninādaketunā | rathena śaṅkhasphaṭikāvabhāsinā | mahendravāhapratimena tāvubhau | mahendravīryapratimānapauruṣau
महेन्द्र के पराक्रम के समान पौरुष वाले वे दोनों, पताकाओं से युक्त, भयंकर नाद वाली ध्वजा से सुशोभित, शङ्ख और स्फटिक की तरह चमकते, महेन्द्र के वाहन जैसे रथ पर —
श्लोक 22 (8.100.22)
सुवर्णमुक्तामणिवज्रविद्रुमैः । अलङ्कृतेनाप्रतिमानरंहसा । नरोत्तमौ पाण्डवकेशिमर्दनौ । उदाहितावग्निदिवाकरोपमौ । रणाजिरे वीतभयौ विरेजतुः । समानयोगाविव विष्णुवासवैः ॥
suvarṇamuktāmaṇivajravidrumaiḥ | alaṅkṛtenāpratimānaraṃhasā | narottamau pāṇḍavakeśimardanau | udāhitāvagnidivākaropamau | raṇājire vītabhayau virejatuḥ | samānayogāviva viṣṇuvāsavaiḥ
सोने, मोतियों, मणियों, हीरों और मूँगों से अलंकृत, अनुपम वेग वाले उस रथ पर वे दोनों नरश्रेष्ठ — पाण्डव और केशि का मर्दन करने वाले — जिन्हें अग्नि और सूर्य के समान कहा गया है, युद्धभूमि में निर्भय होकर विष्णु और इन्द्र के साथ एक ही कार्य में सहभागी-से शोभित हुए।
श्लोक 23 (8.100.23)
ततो धनुर्ज्यातलनेमिनिस्वनैः । प्रसह्य कृत्वा च रिपून्हतप्रभान् । संसाधयित्वैव कुरूञ्छरौघैः । कपिध्वजः पक्षिवरध्वजश्च । प्रसह्य शङ्खौ धमतुः सुघोषौ । मनांस्यरीणामुपतापयन्तौ ॥
tato dhanurjyātalaneminisvanaiḥ | prasahya kṛtvā ca ripūnhataprabhān | saṃsādhayitvaiva kurūñcharaughaiḥ | kapidhvajaḥ pakṣivaradhvajaśca | prasahya śaṅkhau dhamatuḥ sughoṣau | manāṃsyarīṇāmupatāpayantau
तब धनुष की प्रत्यञ्चा और तल की ध्वनि से शत्रुओं को निस्तेज करके, बाणों की झड़ी से कौरवों को वश में करके, कपिध्वज और गरुड़ध्वज दोनों ने शत्रुओं के मन को सन्ताप देते हुए अपने सुघोष शङ्ख बलपूर्वक बजाए।
श्लोक 24 (8.100.24)
सुवर्णजालावततौ महास्वनौ । हिमावदातौ परिगृह्य पाणिभिः । चुचुम्बतुः शङ्खवरौ नृणां वरौ । विघोषयन्तौ विजयं जगत्त्रये ॥
suvarṇajālāvatatau mahāsvanau | himāvadātau parigṛhya pāṇibhiḥ | cucumbatuḥ śaṅkhavarau nṛṇāṃ varau | vighoṣayantau vijayaṃ jagattraye
सोने की जाली से ढके, गम्भीर नाद वाले, हिम के समान श्वेत उन दोनों श्रेष्ठ शङ्खों को हाथों में लेकर उन दोनों नरश्रेष्ठों ने उन्हें चूमा और तीनों लोकों में अपनी विजय की घोषणा कर दी।
श्लोक 25 (8.100.25)
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषो देवदत्तस्य चोभयोः । पृथिवीमन्तरिक्षं च दिशश्च समपूरयत् ॥
pāñcajanyasya nirghoṣo devadattasya cobhayoḥ | pṛthivīmantarikṣaṃ ca diśaśca samapūrayat
पाञ्चजन्य और देवदत्त दोनों का घोष पृथ्वी, अन्तरिक्ष और दिशाओं में भर गया।
श्लोक 26 (8.100.26)
वित्रस्ताश्चाभवन्सर्वे कुरवो राजसत्तम । शूरयोः शङ्खशब्देन माधवस्यार्जुनस्य च ॥
vitrastāścābhavansarve kuravo rājasattama | śūrayoḥ śaṅkhaśabdena mādhavasyārjunasya ca
हे राजश्रेष्ठ! माधव और अर्जुन, उन दोनों वीरों के शङ्खनाद से सब कौरव भयभीत हो गए।
श्लोक 27 (8.100.27)
तौ शङ्खशब्देन निनादयन्तौ । वनानि शैलान्सरितो गुहाश्च । वित्रासयन्तौ तव पुत्रसेनां । युधिष्ठिरं नन्दयितुं प्रयातौ ॥
tau śaṅkhaśabdena ninādayantau | vanāni śailānsarito guhāśca | vitrāsayantau tava putrasenāṃ | yudhiṣṭhiraṃ nandayituṃ prayātau
शङ्खनाद से वनों, पर्वतों, नदियों और गुफाओं को गुँजाते तथा तुम्हारे पुत्र की सेना को डराते हुए वे दोनों युधिष्ठिर को आनन्दित करने चले।
श्लोक 28 (8.100.28)
ततः प्रजग्मुः कुरवो जवेन । श्रुत्वैव शङ्खस्वनमीर्यमाणम् । विहाय मद्राधिपतिं पतिं च । दुर्योधनं भारत भारतानाम् ॥
tataḥ prajagmuḥ kuravo javena | śrutvaiva śaṅkhasvanamīryamāṇam | vihāya madrādhipatiṃ patiṃ ca | duryodhanaṃ bhārata bhāratānām
शङ्खों की गूँजती ध्वनि सुनते ही कौरव मद्रराज और भरतवंशियों के स्वामी दुर्योधन को छोड़कर, हे भारत! तेज़ी से भाग निकले।
श्लोक 29 (8.100.29)
ततो रथेनाम्बुदबृन्दनादिना । शरदहर्मध्यदिवाकरत्विषा । धनञ्जयस्याधिरथेश्च विस्मिताः । प्रशंसमानाः प्रययुस्तदाऽर्जुनम् ॥
tato rathenāmbudabṛndanādinā | śaradaharmadhyadivākaratviṣā | dhanañjayasyādhiratheśca vismitāḥ | praśaṃsamānāḥ prayayustadā'rjunam
तब धनञ्जय और अधिरथपुत्र के पराक्रम से विस्मित लोग, मेघसमूह जैसी गड़गड़ाहट वाले और शरद् ऋतु के मध्याह्न-सूर्य जैसे दीप्तिमान् रथ पर बैठे अर्जुन की प्रशंसा करते हुए उनके पास पहुँचे।
श्लोक 30 (8.100.30)
महाहवे तं बहुशोभमानं । धनञ्जयं योधगणैः समेताः । तावन्वमोदंश्च जनाः प्रकामं । प्रभाकरावभ्युदितौ यथैव ॥
mahāhave taṃ bahuśobhamānaṃ | dhanañjayaṃ yodhagaṇaiḥ sametāḥ | tāvanvamodaṃśca janāḥ prakāmaṃ | prabhākarāvabhyuditau yathaiva
महायुद्ध में शोभायमान धनञ्जय के चारों ओर योद्धाओं के समूहों के साथ एकत्र हुए लोग उन दोनों को देखकर, उदित हुए दो सूर्यों की भाँति, अत्यन्त आनन्दित हुए।