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कर्ण पर्व · अध्याय 11

चित्रसेन और चित्र का वध

श्रुतकर्मा और चित्रसेन बाणों से लड़ते हैं; चित्रसेन मूर्च्छित होकर फिर होश में आता है, पर भल्ल के वार से उसका सिर कट जाता है, और उसके सैनिक श्रुतकर्मा पर व्यर्थ टूट पड़ते हैं। फिर प्रतिविन्ध्य और चित्र बाणों, शक्ति, गदा और दूसरी शक्ति से लड़ते हैं; प्रतिविन्ध्य की दाहिनी भुजा बिंध जाती है, पर उनका तोमर चित्र का कवच और हृदय चीरकर उसे मार डालता है। प्रतिविन्ध्य अपने ऊपर दौड़ी कौरव सेना को बिखेर देते हैं, और अश्वत्थामा अकेले भीमसेन की ओर बढ़ते हैं।

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.11.1)

श्रुतकर्मा ततो राजंश्चित्रसेनं महीपतिम् । आजघ्ने समरे क्रुद्धः पञ्चाशद्भिः शिलीमुखैः ॥

śrutakarmā tato rājaṃścitrasenaṃ mahīpatim | ājaghne samare kruddhaḥ pañcāśadbhiḥ śilīmukhaiḥ

तब हे राजन्, रण में क्रोध से भरे श्रुतकर्मा ने राजा चित्रसेन को पचास बाणों से बेध दिया।

श्लोक 2 (8.11.2)

चित्रसेनस्तु तं राजन्नवभिर्नतपर्वभिः । श्रुतकर्माणमाहत्य सूतं विव्याध पञ्चभिः ॥

citrasenastu taṃ rājannavabhirnataparvabhiḥ | śrutakarmāṇamāhatya sūtaṃ vivyādha pañcabhiḥ

पर हे राजन्, चित्रसेन ने नौ सीधी गाँठों वाले बाणों से उन पर प्रहार किया और श्रुतकर्मा को घायल करके उनके सारथि को पाँच बाणों से बेध दिया।

श्लोक 3 (8.11.3)

श्रुतकर्मा ततः क्रुद्धश्चित्रसेनं चमूमुखे । नाराचेन सुतीक्ष्णेन मर्मदेशे समार्पयत् ॥

śrutakarmā tataḥ kruddhaścitrasenaṃ camūmukhe | nārācena sutīkṣṇena marmadeśe samārpayat

तब क्रुद्ध श्रुतकर्मा ने सेना के अग्रभाग में चित्रसेन के मर्मस्थान पर एक अत्यन्त तीखे नाराच से प्रहार किया।

श्लोक 4 (8.11.4)

सोऽतिविद्धो महाराज नाराचेन महात्मना । मूर्च्छामभिययौ वीरः कश्मलं चाविवेश ह ॥

so'tividdho mahārāja nārācena mahātmanā | mūrcchāmabhiyayau vīraḥ kaśmalaṃ cāviveśa ha

महात्मा श्रुतकर्मा के उस नाराच से बुरी तरह बिंधकर वह वीर, हे महाराज, मूर्च्छित हो गया और अचेत हो गया।

श्लोक 5 (8.11.5)

एतस्मिन्नन्तरे चैनं श्रुतकीर्तिर्महायशाः । नवत्या जगतीपालं छादयामास पत्रिभिः ॥

etasminnantare cainaṃ śrutakīrtirmahāyaśāḥ | navatyā jagatīpālaṃ chādayāmāsa patribhiḥ

इसी बीच महायशस्वी श्रुतकीर्ति ने उस राजा को नब्बे बाणों से ढक दिया।

श्लोक 6 (8.11.6)

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां चित्रसेनो महारथः । धनुश्चिच्छेद भल्लेन तं च विव्याध सप्तभिः ॥

pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ citraseno mahārathaḥ | dhanuściccheda bhallena taṃ ca vivyādha saptabhiḥ

होश में आकर महारथी चित्रसेन ने भल्ल से उसका धनुष काट दिया और सात बाणों से उसे बेध दिया।

श्लोक 7 (8.11.7)

सोऽन्यत्कार्मुकमादाय वेगघ्नं रुक्मभूषितम् । चित्ररूपधरं चक्रे चित्रसेनं शरोर्मिभिः ॥

so'nyatkārmukamādāya vegaghnaṃ rukmabhūṣitam | citrarūpadharaṃ cakre citrasenaṃ śarormibhiḥ

दूसरा सोने से सजा हुआ प्रबल धनुष लेकर श्रुतकीर्ति ने अपनी बाण-तरंगों से चित्रसेन को विचित्र रूप वाला बना दिया।

श्लोक 8 (8.11.8)

स शरैश्चित्रितो राजा चित्रमाल्यधरो युवा । अशोभत महारङ्गे श्वाविच्छललो यथा ॥

sa śaraiścitrito rājā citramālyadharo yuvā | aśobhata mahāraṅge śvāvicchalalo yathā

बाणों से रंग-बिरंगा हुआ, चित्र-विचित्र मालाएँ धारण किए वह युवा राजा विशाल रंगभूमि में साही की भाँति काँटे-से बाणों से भरा शोभित हुआ।

श्लोक 9 (8.11.9)

श्रुतकर्माणमथ वै नाराचेन स्तनान्तरे । बिभेद तरसा शूरस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥

śrutakarmāṇamatha vai nārācena stanāntare | bibheda tarasā śūrastiṣṭhatiṣṭheti cābravīt

तब उस वीर ने शीघ्र ही श्रुतकर्मा की छाती में एक नाराच से प्रहार किया और कहा, "ठहरो, ठहरो!"

श्लोक 10 (8.11.10)

श्रुतकर्मापि समरे नाराचेन समर्पितः । सुस्राव रुधिरं तत्र गैरिकाम्बु यथाऽचलः ॥

śrutakarmāpi samare nārācena samarpitaḥ | susrāva rudhiraṃ tatra gairikāmbu yathā'calaḥ

श्रुतकर्मा भी रण में नाराच से बिंधकर रक्त बहाने लगे, जैसे पर्वत गेरू के रंग का जल बहाता है।

श्लोक 11 (8.11.11)

ततः स रुधिराक्ताङ्गो रुधिरेण कृतच्छविः । रराज समरे वीरः सपुष्प इव किंशुकः ॥

tataḥ sa rudhirāktāṅgo rudhireṇa kṛtacchaviḥ | rarāja samare vīraḥ sapuṣpa iva kiṃśukaḥ

तब रक्त से सने अंगों वाले, रक्त से ही आभा पाए हुए वह वीर रण में फूले हुए किंशुक वृक्ष की भाँति शोभित हुआ।

श्लोक 12 (8.11.12)

श्रुतकर्मा ततो राजञ्शत्रुणा समभिद्रुतः । शत्रुसंवारणं क्रुद्धो द्विधा चिच्छेद कार्मुकम् ॥

śrutakarmā tato rājañśatruṇā samabhidrutaḥ | śatrusaṃvāraṇaṃ kruddho dvidhā ciccheda kārmukam

तब हे राजन्, शत्रु के आक्रमण से घिरे श्रुतकर्मा ने क्रोध में अपने शत्रु को रोकने वाले उस धनुष को दो टुकड़े कर दिया।

श्लोक 13 (8.11.13)

अथैनं छिन्नधन्वानं नाराचानां शतैस्त्रिभिः । छादयन्समरे राजन्विव्याध च सुपत्रिभिः ॥

athainaṃ chinnadhanvānaṃ nārācānāṃ śataistribhiḥ | chādayansamare rājanvivyādha ca supatribhiḥ

फिर धनुष कट जाने पर खड़े हुए उस शत्रु को उसने तीन सौ नाराचों से ढक दिया और हे राजन्, सुन्दर पंखों वाले बाणों से भी बेध दिया।

श्लोक 14 (8.11.14)

ततोऽपरेण भल्लेन तीक्ष्णेन निशितेन च । जहार सशिरस्त्राणं शिरस्तस्य महात्मनः ॥

tato'pareṇa bhallena tīkṣṇena niśitena ca | jahāra saśirastrāṇaṃ śirastasya mahātmanaḥ

तब एक और तीखे, सान पर चढ़े भल्ल से उसने उस महात्मा का शिरस्त्राण सहित सिर काट लिया।

श्लोक 15 (8.11.15)

तच्छिरो न्यपतद्भूमौ चित्रसेनस्य दीप्तिमत् । यदृच्छया यथा चन्द्रश्च्युतः स्वर्गान्महीतलम् ॥

tacchiro nyapatadbhūmau citrasenasya dīptimat | yadṛcchayā yathā candraścyutaḥ svargānmahītalam

चित्रसेन का वह दमकता सिर भूमि पर गिर पड़ा, मानो चन्द्रमा संयोगवश स्वर्ग से धरती पर आ गिरा हो।

श्लोक 16 (8.11.16)

राजानं निहतं दृष्ट्वा तेऽभिसारं तु मारिष । अभ्यद्रवन्त वेगेन चित्रसेनस्य सैनिकाः ॥

rājānaṃ nihataṃ dṛṣṭvā te'bhisāraṃ tu māriṣa | abhyadravanta vegena citrasenasya sainikāḥ

राजा को मारा गया देखकर, हे मान्यवर, चित्रसेन के वे सैनिक बड़े वेग से धावा बोलकर आगे दौड़ पड़े।

श्लोक 17 (8.11.17)

ततः क्रुद्धो महेष्वासस्तत्सैन्यं प्राद्रवच्छरैः । अन्तकाले यथा क्रुद्धः सर्वभूतानि प्रेतराट् ॥

tataḥ kruddho maheṣvāsastatsainyaṃ prādravaccharaiḥ | antakāle yathā kruddhaḥ sarvabhūtāni pretarāṭ

तब उस महान धनुर्धर ने क्रुद्ध होकर बाणों से उस सेना को वैसे ही भगा दिया, जैसे प्रलयकाल में क्रोधित यमराज सब प्राणियों का संहार करते हैं।

श्लोक 18 (8.11.18)

ते वध्यमानाः समरे तव पौत्रेण धन्विना । व्यद्रवन्त दिशस्तूर्णं दावदग्धा इव द्विपाः ॥

te vadhyamānāḥ samare tava pautreṇa dhanvinā | vyadravanta diśastūrṇaṃ dāvadagdhā iva dvipāḥ

रण में तुम्हारे पौत्र धनुर्धर के द्वारा मारे जाते हुए वे दावानल से झुलसे हाथियों की भाँति दिशाओं में भाग खड़े हुए।

श्लोक 19 (8.11.19)

तांस्तु विद्रवतो दृष्ट्वा निरुत्साहान्द्विषज्जये । द्रावयन्निषुभिस्तीक्ष्णैः श्रुतकर्मा व्यरोचत ॥

tāṃstu vidravato dṛṣṭvā nirutsāhāndviṣajjaye | drāvayanniṣubhistīkṣṇaiḥ śrutakarmā vyarocata

शत्रुओं पर विजय की आशा खो चुके उन्हें भागते देखकर श्रुतकर्मा तीखे बाणों से उन्हें खदेड़ते हुए शोभित हुए।

श्लोक 20 (8.11.20)

प्रतिविन्ध्यस्ततश्चित्रं भित्त्वा पञ्चभिराशुगैः । सारथिं च त्रिभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेषुणापि च ॥

prativindhyastataścitraṃ bhittvā pañcabhirāśugaiḥ | sārathiṃ ca tribhirviddhvā dhvajamekeṣuṇāpi ca

फिर प्रतिविन्ध्य ने पाँच शीघ्रगामी बाणों से चित्र को बेधा, तीन से उसके सारथि को और एक बाण से उसकी ध्वजा को भी।

श्लोक 21 (8.11.21)

तं चित्रो नवभिर्भल्लैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् । स्वर्णपुङ्खैः प्रसन्नाग्रैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ॥

taṃ citro navabhirbhallairbāhvorurasi cārpayat | svarṇapuṅkhaiḥ prasannāgraiḥ kaṅkabarhiṇavājitaiḥ

चित्र ने सोने के पंखों वाले, चमकती नोकों वाले, कंक और मोर के पंखों से सजे नौ भल्लों से उनकी भुजाओं और छाती को बेध दिया।

श्लोक 22 (8.11.22)

प्रतिविन्ध्यो धनुश्छित्त्वा तस्य भारत सायकैः । पञ्चभिर्निशितैर्बाणैरथैनं स हि जघ्निवान् ॥

prativindhyo dhanuśchittvā tasya bhārata sāyakaiḥ | pañcabhirniśitairbāṇairathainaṃ sa hi jaghnivān

हे भारत, प्रतिविन्ध्य ने बाणों से उसका धनुष काट दिया और फिर पाँच तीखे बाणों से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 23 (8.11.23)

ततः शक्तिं महाराज स्वर्णघण्टां दुरासदाम् । प्राहिणोत्प्रतिविन्ध्याय विचिन्वन्तीमसूनिव ॥

tataḥ śaktiṃ mahārāja svarṇaghaṇṭāṃ durāsadām | prāhiṇotprativindhyāya vicinvantīmasūniva

तब हे महाराज, चित्र ने प्रतिविन्ध्य पर सोने की घण्टियों वाली दुर्निवार शक्ति चलाई, जो मानो उनके प्राणों को ढूँढ़ती हुई जा रही थी।

श्लोक 24 (8.11.24)

तामापतन्तीं सहसा शक्तिमुल्कामिवाम्बरे । द्विधा चिच्छेद समरे प्रतिविन्ध्यो हसन्निव ॥

tāmāpatantīṃ sahasā śaktimulkāmivāmbare | dvidhā ciccheda samare prativindhyo hasanniva

आकाश में उल्का की तरह सहसा गिरती हुई उस शक्ति को प्रतिविन्ध्य ने हँसते हुए रण में दो टुकड़े कर दिया।

श्लोक 25 (8.11.25)

सा पपात द्विधा छिन्ना प्रतिविन्ध्यशरैः शितैः । युगान्ते सर्वभूतानि त्रासयन्ती यथाऽशनिः ॥

sā papāta dvidhā chinnā prativindhyaśaraiḥ śitaiḥ | yugānte sarvabhūtāni trāsayantī yathā'śaniḥ

प्रतिविन्ध्य के तीखे बाणों से दो टुकड़े हुई वह ऐसे गिरी जैसे युगान्त में सब प्राणियों को भयभीत करने वाला वज्र गिरता है।

श्लोक 26 (8.11.26)

शक्तिं तां प्रहतां दृष्ट्वा चित्रो गृह्य महागदाम् । प्रतिविन्ध्याय चिक्षेप रुक्मजालविभूषिताम् ॥

śaktiṃ tāṃ prahatāṃ dṛṣṭvā citro gṛhya mahāgadām | prativindhyāya cikṣepa rukmajālavibhūṣitām

उस शक्ति को नष्ट हुआ देखकर चित्र ने सोने की जाली से सजी एक बड़ी गदा उठाकर प्रतिविन्ध्य पर फेंकी।

श्लोक 27 (8.11.27)

सा जघान हयांस्तस्य सारथिं च महारणे । रथं प्रमृद्य वेगेन धरणीमन्वपद्यत ॥

sā jaghāna hayāṃstasya sārathiṃ ca mahāraṇe | rathaṃ pramṛdya vegena dharaṇīmanvapadyata

उस गदा ने महायुद्ध में उनके घोड़ों और सारथि को मार डाला और वेग से रथ को चूर करके धरती पर आ गिरी।

श्लोक 28 (8.11.28)

एतस्मिन्नेव काले तु रथादाप्लुत्य भारत । शक्तिं चिक्षेप चित्राय स्वर्णदण्डामलङ्कृताम् ॥

etasminneva kāle tu rathādāplutya bhārata | śaktiṃ cikṣepa citrāya svarṇadaṇḍāmalaṅkṛtām

उसी समय, हे भारत, रथ से कूदकर उन्होंने चित्र पर सोने के दण्ड से सजी हुई शक्ति फेंकी।

श्लोक 29 (8.11.29)

तामापतन्तीं जग्राह चित्रो राजन्महामनाः । ततस्तामेव चिक्षेप प्रतिविन्ध्याय पार्थिवः ॥

tāmāpatantīṃ jagrāha citro rājanmahāmanāḥ | tatastāmeva cikṣepa prativindhyāya pārthivaḥ

महामना चित्र ने, हे राजन्, अपनी ओर आती उस शक्ति को पकड़ लिया और फिर उसी को राजा ने प्रतिविन्ध्य पर चला दिया।

श्लोक 30 (8.11.30)

समासाद्य रणे शूरं प्रतिविन्ध्यं महाप्रभा । निर्भिद्य दक्षिणं बाहुं निपपात महीतले । पतिताऽभासयच्चैव तं देशमशनिर्यथा ॥

samāsādya raṇe śūraṃ prativindhyaṃ mahāprabhā | nirbhidya dakṣiṇaṃ bāhuṃ nipapāta mahītale | patitā'bhāsayaccaiva taṃ deśamaśaniryathā

रण में वीर प्रतिविन्ध्य के पास पहुँचकर वह महातेजस्वी शक्ति उनकी दाहिनी भुजा को बेधती हुई धरती पर गिरी; और गिरकर उसने उस स्थान को वज्र के समान प्रकाशित कर दिया।

श्लोक 31 (8.11.31)

प्रतिविन्ध्यस्ततो राजंस्तोमरं हेमभूषितम् । प्रेषयामास सङ्क्रुद्धश्चित्रस्य वधकाङ्क्षया ॥

prativindhyastato rājaṃstomaraṃ hemabhūṣitam | preṣayāmāsa saṅkruddhaścitrasya vadhakāṅkṣayā

तब हे राजन्, प्रतिविन्ध्य ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर चित्र को मारने की इच्छा से सोने से सजा एक तोमर फेंका।

श्लोक 32 (8.11.32)

स तस्य गात्रावरणं भित्त्वा हृदयमेव च । जगाम धरणीं तूर्णं महोरग इवाशयम् ॥

sa tasya gātrāvaraṇaṃ bhittvā hṛdayameva ca | jagāma dharaṇīṃ tūrṇaṃ mahoraga ivāśayam

उसने उसके कवच और हृदय को भी चीर डाला और शीघ्र ही धरती में समा गया, जैसे बड़ा सर्प अपने बिल में घुसता है।

श्लोक 33 (8.11.33)

स पपात तदा राजा तोमरेण समाहतः । प्रसार्य विपुलौ बाहू पीनौ परिघसन्निभौ ॥

sa papāta tadā rājā tomareṇa samāhataḥ | prasārya vipulau bāhū pīnau parighasannibhau

तोमर से मारा गया वह राजा तब गिर पड़ा, लोहे की गदा जैसी अपनी दोनों मोटी, चौड़ी भुजाएँ फैलाकर।

श्लोक 34 (8.11.34)

चित्रं सम्प्रेक्ष्य निहतं तावका रणशोभिनः । अभ्यद्रवन्त वेगेन प्रतिविन्ध्यं समन्ततः ॥

citraṃ samprekṣya nihataṃ tāvakā raṇaśobhinaḥ | abhyadravanta vegena prativindhyaṃ samantataḥ

चित्र को मारा गया देखकर तुम्हारे रण-शोभी योद्धा चारों ओर से प्रतिविन्ध्य पर टूट पड़े।

श्लोक 35 (8.11.35)

सृजन्तो विविधान्बाणाञ्शतघ्नीश्च सकिङ्किणीः । तमवच्छादयामासुः सूर्यमभ्रगणा इव ॥

sṛjanto vividhānbāṇāñśataghnīśca sakiṅkiṇīḥ | tamavacchādayāmāsuḥ sūryamabhragaṇā iva

भाँति-भाँति के बाण और घण्टियों वाली शतघ्नियाँ बरसाते हुए उन्होंने उन्हें ऐसे ढक लिया जैसे बादलों के समूह सूर्य को ढक लेते हैं।

श्लोक 36 (8.11.36)

तान्विधम्य महाबाहुः शरजालेन संयुगे । व्यद्रावयत्तव चमूं वज्रहस्त इवासुरीम् ॥

tānvidhamya mahābāhuḥ śarajālena saṃyuge | vyadrāvayattava camūṃ vajrahasta ivāsurīm

महाबाहु प्रतिविन्ध्य ने रण में बाणों के जाल से उन्हें बिखेर दिया और तुम्हारी सेना को वैसे ही भगा दिया जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरों की सेना को भगाते हैं।

श्लोक 37 (8.11.37)

ते वध्यमानाः समरे तावकाः पाण्डवैर्नृप । विप्रकीर्यन्त सहसा वातनुन्ना घना इव ॥

te vadhyamānāḥ samare tāvakāḥ pāṇḍavairnṛpa | viprakīryanta sahasā vātanunnā ghanā iva

हे राजन्, रण में पाण्डवों के हाथों कटते हुए तुम्हारे सैनिक वायु से उड़ाए हुए बादलों की भाँति सहसा बिखर गए।

श्लोक 38 (8.11.38)

विप्रद्रुते बले तस्मिन्वध्यमाने समन्ततः । द्रौणिरेकोऽभ्ययात्तूर्णं भीमसेनं महाबलम् ॥

vipradrute bale tasminvadhyamāne samantataḥ | drauṇireko'bhyayāttūrṇaṃ bhīmasenaṃ mahābalam

उस सेना के भागने और चारों ओर कटने पर द्रोणपुत्र अकेले ही शीघ्रता से महाबली भीमसेन पर चढ़ आए।

श्लोक 39 (8.11.39)

ततः समागमो घोरो बभूव सहसा तयोः । यथा दैवासुरे युद्धे वृत्रवासवयोरिव ॥

tataḥ samāgamo ghoro babhūva sahasā tayoḥ | yathā daivāsure yuddhe vṛtravāsavayoriva

तब उन दोनों के बीच सहसा वैसा ही भयंकर संघर्ष छिड़ गया जैसा देवासुर-संग्राम में वृत्र और इन्द्र के बीच हुआ था।

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