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कर्ण पर्व · अध्याय 12

भीम और अश्वत्थामा का युद्ध, दोनों का मूर्छित होना

सञ्जय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अश्वत्थामा और भीमसेन एक-दूसरे पर बाणों की झड़ी लगाते हैं, पर कोई किसी को डिगा नहीं पाता; फिर वे एक-दूसरे के चारों ओर बाईं ओर से घेरे लगाते हैं। यह द्वन्द्व दिव्यास्त्रों के युद्ध में बदल जाता है, जिससे आकाश में आग भड़क उठती है, और सिद्ध कहते हैं कि ऐसा युद्ध फिर कभी नहीं होगा। अन्त में दोनों बाणों से आहत होकर रथों में मूर्छित गिर पड़ते हैं और उनके सारथि उन्हें रणभूमि से हटा ले जाते हैं।

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.12.1)

भीमसेनं ततो द्रौणी राजन्विव्याध पत्रिणा । परया त्वरया युक्तो दर्शयन्नस्त्रलाघवम् ॥

bhīmasenaṃ tato drauṇī rājanvivyādha patriṇā | parayā tvarayā yukto darśayannastralāghavam

तब, हे राजन्, द्रोणपुत्र ने अत्यन्त शीघ्रता से अस्त्र-चालन की अपनी फुर्ती दिखाते हुए भीमसेन को बाण से बींध दिया।

श्लोक 2 (8.12.2)

अथैनं पुनराजघ्ने नवत्या निशितैः शरैः । सर्वमर्माणि सम्प्रेक्ष्य मर्मज्ञो लघुहस्तवत् ॥

athainaṃ punarājaghne navatyā niśitaiḥ śaraiḥ | sarvamarmāṇi samprekṣya marmajño laghuhastavat

फिर मर्मों को जानने वाले उस फुर्तीले हाथ वाले ने उसके सब मर्मस्थल देखकर उसे नब्बे तीखे बाणों से दोबारा मारा।

श्लोक 3 (8.12.3)

भीमसेनः समाकीर्णो द्रौणिना निशितैः शरैः । रराज समरे राजन्रश्मिवानिव भास्करः ॥

bhīmasenaḥ samākīrṇo drauṇinā niśitaiḥ śaraiḥ | rarāja samare rājanraśmivāniva bhāskaraḥ

द्रोणपुत्र के तीखे बाणों से ढके हुए भीमसेन युद्ध में, हे राजन्, किरणों वाले सूर्य के समान शोभित हुए।

श्लोक 4 (8.12.4)

ततः शरसहस्रेण सुप्रयुक्तेन पाण्डवः । द्रोणपुत्रमवच्छाद्य सिंहनादममुञ्चत ॥

tataḥ śarasahasreṇa suprayuktena pāṇḍavaḥ | droṇaputramavacchādya siṃhanādamamuñcata

तब पाण्डुपुत्र भीम ने भली-भाँति चलाए हुए हजार बाणों से द्रोणपुत्र को ढककर सिंहनाद किया।

श्लोक 5 (8.12.5)

शरैः शरांस्ततो द्रौणिः संवार्य युधि पाण्डवम् । ललाटेऽभ्याहनद्राजन्नाराचेन स्मयन्निव ॥

śaraiḥ śarāṃstato drauṇiḥ saṃvārya yudhi pāṇḍavam | lalāṭe'bhyāhanadrājannārācena smayanniva

तब द्रोणपुत्र ने उन बाणों को अपने बाणों से रोककर, हे राजन्, मानो मुस्कराते हुए पाण्डुपुत्र के ललाट पर नाराच से प्रहार किया।

श्लोक 6 (8.12.6)

ललाटस्थं ततो बाणं धारयामास पाण्डवः । यथा शृङ्गं वने दृप्तः खड्गो धारयते नृप ॥

lalāṭasthaṃ tato bāṇaṃ dhārayāmāsa pāṇḍavaḥ | yathā śṛṅgaṃ vane dṛptaḥ khaḍgo dhārayate nṛpa

पाण्डुपुत्र भीम ने ललाट में धँसे उस बाण को वैसे ही धारण किए रखा, हे राजन्, जैसे वन में मदमत्त गैंडा अपना सींग धारण करता है।

श्लोक 7 (8.12.7)

ततो द्रौणिं रणे भीमो यतमानं पराक्रमी । त्रिभिर्विव्याध नाराचैर्ललाटे विस्मयन्निव ॥

tato drauṇiṃ raṇe bhīmo yatamānaṃ parākramī | tribhirvivyādha nārācairlalāṭe vismayanniva

तब पराक्रमी भीम ने रण में प्रयत्न करते हुए द्रोणपुत्र के ललाट में, मानो विस्मय से भरकर, तीन नाराच मारे।

श्लोक 8 (8.12.8)

ललाटस्थैस्ततो बाणैर्ब्राह्मणोऽसौ व्यशोभत । प्रावृषीव यथा सिक्तस्त्रिशृङ्गः पर्वतोत्तमः ॥

lalāṭasthaistato bāṇairbrāhmaṇo'sau vyaśobhata | prāvṛṣīva yathā siktastriśṛṅgaḥ parvatottamaḥ

ललाट में गड़े उन बाणों से वह ब्राह्मण ऐसा शोभित हुआ जैसे वर्षा ऋतु में जल से सींचा हुआ तीन शिखरों वाला श्रेष्ठ पर्वत।

श्लोक 9 (8.12.9)

ततः शरशतैर्द्रौणिरर्दयामास पाण्डवम् । न चैनं कम्पयामास मातरिश्वेव पर्वतम् ॥

tataḥ śaraśatairdrauṇirardayāmāsa pāṇḍavam | na cainaṃ kampayāmāsa mātariśveva parvatam

तब द्रोणपुत्र ने सैकड़ों बाणों से पाण्डुपुत्र को पीड़ित किया, परन्तु उसे डिगा न सका, जैसे वायु पर्वत को नहीं डिगा पाती।

श्लोक 10 (8.12.10)

तथैव पाण्डवो युद्धे द्रौणिं शरशतैः शितैः । नाकम्पयत संहृष्टो वार्योध इव पर्वतम् ॥

tathaiva pāṇḍavo yuddhe drauṇiṃ śaraśataiḥ śitaiḥ | nākampayata saṃhṛṣṭo vāryodha iva parvatam

वैसे ही पाण्डुपुत्र ने भी प्रसन्न होकर युद्ध में सैकड़ों तीखे बाणों से द्रोणपुत्र को नहीं डिगाया, जैसे जल का प्रवाह पर्वत को नहीं डिगा पाता।

श्लोक 11 (8.12.11)

तावन्योन्यं शरैर्घोरैश्छादयानौ महारथौ । रथवर्यगतौ वीरौ शुशुभाते बलोत्कटौ ॥

tāvanyonyaṃ śarairghoraiśchādayānau mahārathau | rathavaryagatau vīrau śuśubhāte balotkaṭau

भयंकर बाणों से एक-दूसरे को ढकते हुए वे दोनों महारथी, श्रेष्ठ रथों पर आरूढ़ बल से उन्मत्त वीर, शोभा पा रहे थे।

श्लोक 12 (8.12.12)

आदित्याविव सन्दीप्तौ लोकक्षयकरावुभौ । स्वरश्मिभिरिवान्योन्यं तापयन्तौ शरोत्तमैः ॥

ādityāviva sandīptau lokakṣayakarāvubhau | svaraśmibhirivānyonyaṃ tāpayantau śarottamaiḥ

लोकों का संहार करने वाले दो प्रज्वलित सूर्यों के समान वे दोनों अपने उत्तम बाणों से, मानो अपनी ही किरणों से, एक-दूसरे को तपा रहे थे।

श्लोक 13 (8.12.13)

ततः प्रविकृते यत्नं कुर्वाणौ तौ महारणे । कृतप्रतिकृते यत्तौ शरसङ्घैरभीतवत् ॥

tataḥ pravikṛte yatnaṃ kurvāṇau tau mahāraṇe | kṛtapratikṛte yattau śarasaṅghairabhītavat

तब उस महायुद्ध में वे दोनों प्रहार और प्रतिप्रहार का यत्न करते हुए, एक-दूसरे के शस्त्रों को काटते हुए, बाणों की झड़ियों से मानो निर्भय होकर जूझते रहे।

श्लोक 14 (8.12.14)

व्याघ्राविव च सङ्ग्रामे चेरतुस्तौ नरोत्तमौ । शरदंष्ट्रौ दुराधर्षौ चापवक्रौ भयङ्करौ ॥

vyāghrāviva ca saṅgrāme ceratustau narottamau | śaradaṃṣṭrau durādharṣau cāpavakrau bhayaṅkarau

वे दोनों नरश्रेष्ठ संग्राम में बाघों के समान विचरते थे; बाण ही जिनकी दाढ़ें थीं, जिन्हें कोई दबा नहीं सकता था, जिनके धनुष तने हुए थे और जो भयंकर थे।

श्लोक 15 (8.12.15)

अभूतां तावदृश्यौ च शरजालैः समन्ततः । मेघजालैरिव च्छन्नौ गगने चन्द्रभास्करौ ॥

abhūtāṃ tāvadṛśyau ca śarajālaiḥ samantataḥ | meghajālairiva cchannau gagane candrabhāskarau

चारों ओर बाणों के जाल से ढके हुए वे अदृश्य हो गए, जैसे आकाश में मेघों के समूह से ढके चन्द्रमा और सूर्य।

श्लोक 16 (8.12.16)

चकाशेते मुहूर्तेन ततस्तावप्यरिन्दमौ । विमुक्तावभ्रजालेन अङ्गारकबुधाविव ॥

cakāśete muhūrtena tatastāvapyarindamau | vimuktāvabhrajālena aṅgārakabudhāviva

क्षणभर बाद वे दोनों शत्रुदमन फिर प्रकट होकर चमके, बादलों के जाल से मुक्त हुए मंगल और बुध ग्रहों के समान।

श्लोक 17 (8.12.17)

अथ तत्रैव सङ्ग्रामे वर्तमाने सुदारुणे । अपसव्यं ततश्चक्रे द्रौणिस्तत्र वृकोदरम् ॥

atha tatraiva saṅgrāme vartamāne sudāruṇe | apasavyaṃ tataścakre drauṇistatra vṛkodaram

फिर उसी अति भयंकर संग्राम के चलते हुए द्रोणपुत्र ने वृकोदर (भीम) के चारों ओर बाईं ओर से घेरा लगाया।

श्लोक 18 (8.12.18)

किरञ्छरशतैरुग्रैर्धाराभिरिव पर्वतम् । न तु तन्ममृषे भीमः शत्रोर्विजयलक्षणम् ॥

kirañcharaśatairugrairdhārābhiriva parvatam | na tu tanmamṛṣe bhīmaḥ śatrorvijayalakṣaṇam

वह उस पर पर्वत पर बरसती धाराओं की भाँति सैकड़ों उग्र बाण बरसा रहा था; परन्तु भीम शत्रु की उस विजय-सूचक चाल को सह न सके।

श्लोक 19 (8.12.19)

प्रतिचक्रे ततो राजन्पाण्डवोऽप्यपसव्यतः । मण्डलानां विभागेन गतप्रत्यागतेन च ॥

praticakre tato rājanpāṇḍavo'pyapasavyataḥ | maṇḍalānāṃ vibhāgena gatapratyāgatena ca

तब, हे राजन्, पाण्डुपुत्र ने भी मण्डलों के विभाग के अनुसार, आगे जाकर और लौटकर, उसी प्रकार बाईं ओर से घेरा लगाकर उत्तर दिया।

श्लोक 20 (8.12.20)

बभूव तुमुलं युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः । चरित्वा विविधान्मार्गान्मण्डलस्थानमेव च ॥

babhūva tumulaṃ yuddhaṃ tayoḥ puruṣasiṃhayoḥ | caritvā vividhānmārgānmaṇḍalasthānameva ca

उन दोनों पुरुषसिंहों में घमासान युद्ध छिड़ गया; वे अनेक मार्गों से घूमे और मण्डल बनाकर तथा खड़े होकर भी लड़े।

श्लोक 21 (8.12.21)

शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः । अन्योन्यस्य वधे चैव चक्रतुर्यत्नमुत्तमम् ॥

śaraiḥ pūrṇāyatotsṛṣṭairanyonyamabhijaghnatuḥ | anyonyasya vadhe caiva cakraturyatnamuttamam

वे पूरी खिंची हुई डोरी से छोड़े हुए बाणों से एक-दूसरे को मारते थे और एक-दूसरे का वध करने का परम प्रयत्न करते थे।

श्लोक 22 (8.12.22)

ईषतुर्विरथं चैव कर्तुमन्योन्यमाहवे । ततो द्रौणिर्महास्त्राणि प्रादुश्चक्रे महारथः ॥

īṣaturvirathaṃ caiva kartumanyonyamāhave | tato drauṇirmahāstrāṇi prāduścakre mahārathaḥ

दोनों युद्ध में एक-दूसरे को रथहीन करना चाहते थे। तब महारथी द्रोणपुत्र ने अपने महान् अस्त्र प्रकट किए,

श्लोक 23 (8.12.23)

तान्यस्त्रैरेव समरे प्रतिजघ्नेऽथ पाण्डवः । ततो घोरं महाराज अस्त्रयुद्धमवर्तत ॥

tānyastraireva samare pratijaghne'tha pāṇḍavaḥ | tato ghoraṃ mahārāja astrayuddhamavartata

और पाण्डुपुत्र ने युद्ध में उनका अस्त्रों से ही प्रतिकार किया। तब, हे महाराज, भयंकर अस्त्र-युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 24 (8.12.24)

ग्रहयुद्धं यथा घोरं प्रजासंहरणे ह्यभूत् । ते बाणाः समसज्जन्त मुक्तास्ताभ्यां तु भारत ॥

grahayuddhaṃ yathā ghoraṃ prajāsaṃharaṇe hyabhūt | te bāṇāḥ samasajjanta muktāstābhyāṃ tu bhārata

वह प्राणियों के संहार-काल में होने वाले ग्रहयुद्ध जैसा भयावह था। हे भारत, उन दोनों के छोड़े हुए वे बाण आपस में टकराते थे,

श्लोक 25 (8.12.25)

द्योतयन्तो दिशः सर्वास्तव सैन्यं समन्ततः । बाणसङ्घैर्वृतं घोरमाकाशं समपद्यत ॥

dyotayanto diśaḥ sarvāstava sainyaṃ samantataḥ | bāṇasaṅghairvṛtaṃ ghoramākāśaṃ samapadyata

और सब दिशाओं तथा आपकी सेना को चारों ओर से प्रकाशित करते थे। बाणों के समूहों से ढका आकाश भयावह हो उठा,

श्लोक 26 (8.12.26)

उल्कापातावृतं युद्धं प्रजानां संक्षये नृप । बाणाभिघातात्सञ्जज्ञे तत्र भारत पावकः ॥

ulkāpātāvṛtaṃ yuddhaṃ prajānāṃ saṃkṣaye nṛpa | bāṇābhighātātsañjajñe tatra bhārata pāvakaḥ

मानो प्राणियों के संहार के समय की भाँति वह युद्ध गिरती उल्काओं से घिरा हो, हे राजन्। बाणों के आघात से, हे भारत, वहाँ आग उत्पन्न हो गई,

श्लोक 27 (8.12.27)

सविस्फुलिङ्गो दीप्तार्चिर्योऽदहद्वाहिनीद्वयम् । तत्र सिद्धा महाराज सम्पतन्तोऽब्रुवन्वचः ॥

savisphuliṅgo dīptārciryo'dahadvāhinīdvayam | tatra siddhā mahārāja sampatanto'bruvanvacaḥ

जो चिनगारियों से भरी और दीप्त ज्वालाओं वाली थी और जिसने दोनों सेनाओं को जला डाला। तब, हे महाराज, ऊपर उड़ते हुए सिद्ध वहाँ ये वचन कहने लगे,

सिद्धा ऊचुः

श्लोक 28 (8.12.28)

युद्धानामति सर्वेषां युद्धमेतदिति प्रभो । सर्वयुद्धानि चैतस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥

yuddhānāmati sarveṣāṃ yuddhametaditi prabho | sarvayuddhāni caitasya kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm

हे प्रभो, यह युद्ध सब युद्धों से बढ़कर है। दूसरे सारे युद्ध इसकी सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं।

श्लोक 29 (8.12.29)

नेदृशं च पुनर्युद्धं भविष्यति कदाचन । अहो ज्ञानेन सम्पन्नावुभौ ब्राह्मणक्षत्रियौ ॥

nedṛśaṃ ca punaryuddhaṃ bhaviṣyati kadācana | aho jñānena sampannāvubhau brāhmaṇakṣatriyau

ऐसा युद्ध फिर कभी नहीं होगा। अहो! ये ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों कैसे ज्ञान से सम्पन्न हैं!

श्लोक 30 (8.12.30)

अहो शौर्येण सम्पन्नावुभौ चोग्रपराक्रमौ । अहो भीमबलो भीम एतस्य च कृतास्त्रता ॥

aho śauryeṇa sampannāvubhau cograparākramau | aho bhīmabalo bhīma etasya ca kṛtāstratā

अहो! दोनों शौर्य से सम्पन्न और उग्र पराक्रम वाले हैं। अहो, भीम का बल कैसा भयंकर है, और इस द्रोणपुत्र की अस्त्र-निपुणता कैसी!

श्लोक 31 (8.12.31)

अहो वीर्यस्य सारत्वमहो सौष्ठवमेतयोः । स्थितावेतौ हि समरे कालान्तकयमोपमौ ॥

aho vīryasya sāratvamaho sauṣṭhavametayoḥ | sthitāvetau hi samare kālāntakayamopamau

अहो, इनके पराक्रम का सार! अहो, इनकी दक्षता! युद्ध में खड़े ये दोनों काल, अन्तक और यम के समान हैं।

श्लोक 32 (8.12.32)

रुद्रौ द्वाविव सम्भूतौ यथा द्वाविव भास्करौ । यमौ वा पुरुषव्याघ्रौ घोररूपावुभौ रणे ॥

rudrau dvāviva sambhūtau yathā dvāviva bhāskarau | yamau vā puruṣavyāghrau ghorarūpāvubhau raṇe

ये दोनों पुरुषश्रेष्ठ मानो दो रुद्र उत्पन्न हो गए हों, या दो सूर्य हों, या दो यम; रण में दोनों का रूप भयंकर है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 33 (8.12.33)

इति वाचः स्म श्रूयन्ते सिद्धानां वै मुहुर्मुहुः । सिंहनादश्च सञ्जज्ञे समेतानां दिवौकसाम् ॥

iti vācaḥ sma śrūyante siddhānāṃ vai muhurmuhuḥ | siṃhanādaśca sañjajñe sametānāṃ divaukasām

सिद्धों की ऐसी वाणियाँ बार-बार सुनाई देती थीं, और एकत्र हुए देवताओं ने सिंहनाद किया।

श्लोक 34 (8.12.34)

अद्भुतं चाप्यचिन्त्यं च दृष्ट्वा कर्म तयो रणे । सिद्धचारणसङ्घानां विस्मयः समपद्यत ॥

adbhutaṃ cāpyacintyaṃ ca dṛṣṭvā karma tayo raṇe | siddhacāraṇasaṅghānāṃ vismayaḥ samapadyata

रण में उन दोनों का वह अद्भुत और अचिन्त्य कर्म देखकर सिद्धों और चारणों के समूहों को विस्मय हुआ।

श्लोक 35 (8.12.35)

प्रशंसन्ति तदा देवाः सिद्धाश्च परमर्षयः । साधु द्रौणे महाबाहो साधु भीमेति चाब्रुवन् ॥

praśaṃsanti tadā devāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ | sādhu drauṇe mahābāho sādhu bhīmeti cābruvan

तब देवता, सिद्ध और परमर्षि उनकी प्रशंसा करने लगे; वे पुकार उठे, "साधु, महाबाहु द्रोणपुत्र! साधु, भीम!"

श्लोक 36 (8.12.36)

तौ शूरौ समरे राजन्परस्परकृतागसौ । परस्परमुदीक्षेतां क्रोधादुद्वृत्य चक्षुषी ॥

tau śūrau samare rājanparasparakṛtāgasau | parasparamudīkṣetāṃ krodhādudvṛtya cakṣuṣī

हे राजन्, एक-दूसरे के प्रति अपराध किए हुए वे दोनों शूर क्रोध से आँखें चढ़ाकर एक-दूसरे को देखते रहे।

श्लोक 37 (8.12.37)

क्रोधरक्तेक्षणौ तौ तु क्रोधात्प्रस्फुरिताधरौ । क्रोधात्संदष्टदशनौ तथैव दशनच्छदौ ॥

krodharaktekṣaṇau tau tu krodhātprasphuritādharau | krodhātsaṃdaṣṭadaśanau tathaiva daśanacchadau

क्रोध से उनकी आँखें लाल थीं, क्रोध से होंठ फड़क रहे थे, क्रोध से दाँत भिंचे थे, और वैसे ही वे होंठ चबा रहे थे।

श्लोक 38 (8.12.38)

अन्योन्यं छादयन्तौ स्म शरवृष्ट्या महारथौ । शराम्बुधारौ समरे शस्त्रविद्युत्प्रकाशिनौ ॥

anyonyaṃ chādayantau sma śaravṛṣṭyā mahārathau | śarāmbudhārau samare śastravidyutprakāśinau

वे दोनों महारथी बाणों की वर्षा से एक-दूसरे को ढक रहे थे; रण में वे बाणरूपी जल की धाराओं वाले और शस्त्ररूपी बिजली से चमकते दो मेघों के समान थे।

श्लोक 39 (8.12.39)

तावन्योन्यं ध्वजं विद्ध्वा सारथिं च महारणे । अन्योन्यस्य हयान्विद्ध्वा बिभिदाते परस्परम् ॥

tāvanyonyaṃ dhvajaṃ viddhvā sārathiṃ ca mahāraṇe | anyonyasya hayānviddhvā bibhidāte parasparam

उस महायुद्ध में एक-दूसरे के ध्वज और सारथि को बींधकर, और एक-दूसरे के घोड़ों को बींधकर, उन्होंने परस्पर घायल किया।

श्लोक 40 (8.12.40)

ततः क्रुद्धौ महाराज बाणौ गृह्य महाहवे । उभौ चिक्षिपतुस्तूर्ममन्योन्यस्य वधैषिणौ ॥

tataḥ kruddhau mahārāja bāṇau gṛhya mahāhave | ubhau cikṣipatustūrmamanyonyasya vadhaiṣiṇau

तब, हे महाराज, क्रोध में भरे हुए दोनों ने उस महायुद्ध में एक-एक बाण लेकर, एक-दूसरे के वध की इच्छा से, तुरन्त चलाए।

श्लोक 41 (8.12.41)

तौ सायकौ महाराज द्योतमानौ चमूमुखे । आजघ्नतुः समासाद्य वज्रवेगौ दुरासदौ ॥

tau sāyakau mahārāja dyotamānau camūmukhe | ājaghnatuḥ samāsādya vajravegau durāsadau

हे महाराज, सेना के अग्रभाग में दमकते हुए वे दोनों बाण, वज्र के समान वेग वाले और दुर्धर्ष, उन दोनों के पास पहुँचकर उन्हें लगे।

श्लोक 42 (8.12.42)

तौ परस्परवेगाच्च शराभ्यां च भृशाहतौ । निपेततुर्महावीर्यौ रथोपस्थे तयोस्तदा ॥

tau parasparavegācca śarābhyāṃ ca bhṛśāhatau | nipetaturmahāvīryau rathopasthe tayostadā

एक-दूसरे के वेग से और उन दोनों बाणों से अत्यन्त आहत वे दोनों महापराक्रमी तब अपने रथों के पिछले भाग में गिर पड़े।

श्लोक 43 (8.12.43)

ततस्तु सारथिर्ज्ञात्वा द्रोणपुत्रमचेतनम् । अपोवाह रणाद्राजन्सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥

tatastu sārathirjñātvā droṇaputramacetanam | apovāha raṇādrājansarvasainyasya paśyataḥ

तब सारथि ने द्रोणपुत्र को अचेत जानकर, हे राजन्, सारी सेना के देखते-देखते उसे रणभूमि से हटा लिया।

श्लोक 44 (8.12.44)

तथैव पाण्डवं राजन्विह्वलन्तं मुहुर्मुहुः । अपोवाह रथेनाजौ विशोकः शत्रुतापनम् ॥

tathaiva pāṇḍavaṃ rājanvihvalantaṃ muhurmuhuḥ | apovāha rathenājau viśokaḥ śatrutāpanam

वैसे ही, हे राजन्, बार-बार मूर्छित होते शत्रुतापन पाण्डुपुत्र को विशोक अपने रथ में रणभूमि से ले गया।

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