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कर्ण पर्व · अध्याय 13

शल्य द्वारा श्रुतकीर्ति की पराजय

सञ्जय मद्रराज शल्य और पाण्डव-पक्ष के योद्धा श्रुतकीर्ति के द्वन्द्व का वर्णन करते हैं। दोनों बाणों की झड़ी लगाते और एक-दूसरे का धनुष काटते हैं; फिर शल्य श्रुतकीर्ति की गदा और शक्ति को रोक देते हैं, उसके सारथि को मार डालते हैं और उसके घोड़ों को रथ सहित रणभूमि से भागने पर विवश कर देते हैं। इसके बाद शल्य पाण्डव-सेना में पशुओं के बीच सिंह की भाँति विचरते और धूम-रहित अग्नि की तरह दमकते हैं।

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सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.13.1)

श्रुतकीर्तिमथायान्तं किरन्तं निशिताञ्शरान् । मद्रराजो महाराज वारयामास हृष्टवत् ॥

śrutakīrtimathāyāntaṃ kirantaṃ niśitāñśarān | madrarājo mahārāja vārayāmāsa hṛṣṭavat

श्रुतकीर्ति को तीखे बाण बरसाते हुए आते देख, हे महाराज, मद्रराज (शल्य) ने प्रसन्न होकर उसे रोक दिया।

श्लोक 2 (8.13.2)

मद्रराजं समासाद्य श्रुतकीर्तिर्महारथः । विव्याध भल्लैर्विंशत्या कार्तस्वरविभूषितैः ॥

madrarājaṃ samāsādya śrutakīrtirmahārathaḥ | vivyādha bhallairviṃśatyā kārtasvaravibhūṣitaiḥ

मद्रराज के निकट पहुँचकर महारथी श्रुतकीर्ति ने सोने से सजे बीस भल्लों से उन्हें बींध दिया।

श्लोक 3 (8.13.3)

प्रतिविव्याध तं शल्यं त्रिभिस्तूर्णमजिह्मगैः । सारथिं चास्य भल्लेन भृशं विव्याध भारत ॥

prativivyādha taṃ śalyaṃ tribhistūrṇamajihmagaiḥ | sārathiṃ cāsya bhallena bhṛśaṃ vivyādha bhārata

शल्य ने भी तुरन्त सीधे जाने वाले तीन बाणों से उसे बींधा, और, हे भारत, एक भल्ल से उसके सारथि को गहरी चोट पहुँचाई।

श्लोक 4 (8.13.4)

स शल्यं शरवर्षेण च्छादयामास संयुगे । मुमोच निशितान्बाणान्मद्रराजरथं प्रति ॥

sa śalyaṃ śaravarṣeṇa cchādayāmāsa saṃyuge | mumoca niśitānbāṇānmadrarājarathaṃ prati

श्रुतकीर्ति ने युद्ध में बाणों की वर्षा से शल्य को ढक दिया और मद्रराज के रथ पर तीखे बाण छोड़े।

श्लोक 5 (8.13.5)

ततः शल्यो महाराज श्रुतकीर्तिभुजच्युतान् । चिच्छेद समरे बाणान्बाणैः सन्नतपर्वभिः ॥

tataḥ śalyo mahārāja śrutakīrtibhujacyutān | ciccheda samare bāṇānbāṇaiḥ sannataparvabhiḥ

तब, हे महाराज, शल्य ने श्रुतकीर्ति की भुजाओं से छूटे उन बाणों को रण में सीधे झुके हुए जोड़ों वाले बाणों से काट डाला।

श्लोक 6 (8.13.6)

श्रुतकीर्तिस्ततः शल्यं भित्त्वा नवभिरायसैः । सारथिं त्रिभिरानर्च्छत्पुनः शल्यं च पञ्चभिः ॥

śrutakīrtistataḥ śalyaṃ bhittvā navabhirāyasaiḥ | sārathiṃ tribhirānarcchatpunaḥ śalyaṃ ca pañcabhiḥ

फिर श्रुतकीर्ति ने लोहे के नौ बाणों से शल्य को बींधा, तीन से सारथि को मारा, और फिर पाँच से शल्य को।

श्लोक 7 (8.13.7)

तस्य शल्यो धनुश्छित्त्वा हस्तावापं निकृत्य च । विव्याध समरे तूर्णं सप्तभिस्तं शरोत्तमैः ॥

tasya śalyo dhanuśchittvā hastāvāpaṃ nikṛtya ca | vivyādha samare tūrṇaṃ saptabhistaṃ śarottamaiḥ

शल्य ने उसका धनुष काटकर और उसका दस्ताना भी काटकर युद्ध में तुरन्त सात उत्तम बाणों से उसे बींध दिया।

श्लोक 8 (8.13.8)

अथान्यद्धनुरादाय श्रुतकीर्तिर्महारथः । मद्रेश्वरं चतुःषष्ट्या बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥

athānyaddhanurādāya śrutakīrtirmahārathaḥ | madreśvaraṃ catuḥṣaṣṭyā bāhvorurasi cārpayat

तब दूसरा धनुष लेकर महारथी श्रुतकीर्ति ने मद्रराज की भुजाओं और छाती में चौंसठ बाण मारे।

श्लोक 9 (8.13.9)

ततस्तु समरे राजंस्तेन विद्धः शिलीमुखैः । प्रतिविव्याध तं चापि नवत्या निशितैः शरैः ॥

tatastu samare rājaṃstena viddhaḥ śilīmukhaiḥ | prativivyādha taṃ cāpi navatyā niśitaiḥ śaraiḥ

तब, हे राजन्, उन बाणों से युद्ध में बिंधे हुए शल्य ने भी उसे नब्बे तीखे बाणों से बदले में बींध दिया।

श्लोक 10 (8.13.10)

तस्य मद्रेश्वरश्चापं पुनश्चिच्छेद मारिष । स च्छिन्नधन्वा समरे गदां चिक्षेप सत्वरः ॥

tasya madreśvaraścāpaṃ punaściccheda māriṣa | sa cchinnadhanvā samare gadāṃ cikṣepa satvaraḥ

हे माननीय, मद्रराज ने उसका धनुष फिर काट दिया, और धनुष कट जाने पर उसने तुरन्त गदा फेंकी।

श्लोक 11 (8.13.11)

पट्टैर्जाम्बूनदैर्बद्धां रुप्यपट्टैश्च भारत । भ्राजमानां यथा नारीं दिव्यवस्त्रविभूषिताम् ॥

paṭṭairjāmbūnadairbaddhāṃ rupyapaṭṭaiśca bhārata | bhrājamānāṃ yathā nārīṃ divyavastravibhūṣitām

हे भारत, वह गदा सोने और चाँदी की पट्टियों से कसी हुई थी और दिव्य वस्त्रों से सजी स्त्री की भाँति चमक रही थी।

श्लोक 12 (8.13.12)

तामापतन्तीं सहसा दीप्यमानाशनिप्रभाम् । शरैरनेकसाहस्रैर्व्यष्टम्भयत मद्रराट् ॥

tāmāpatantīṃ sahasā dīpyamānāśaniprabhām | śarairanekasāhasrairvyaṣṭambhayata madrarāṭ

वज्र के समान दमकती हुई उस गदा को अचानक अपने ऊपर आते देख मद्रराज ने कई हजार बाणों से रोक दिया।

श्लोक 13 (8.13.13)

विष्टभ्य च गदां वीरः पातयित्वा च भूतले । श्रुतकीर्तिमथायत्तो राजन्विव्याध पञ्चभिः ॥

viṣṭabhya ca gadāṃ vīraḥ pātayitvā ca bhūtale | śrutakīrtimathāyatto rājanvivyādha pañcabhiḥ

गदा को रोककर और भूमि पर गिराकर उस वीर ने, हे राजन्, श्रुतकीर्ति पर ध्यान जमाकर उसे पाँच बाणों से बींध दिया।

श्लोक 14 (8.13.14)

तस्य शक्तिं रणे भूयश्चिक्षेप भुजगोपमाम् । तां द्विधा चाच्छिनच्छल्यो मेदिन्यां सा त्वशीर्यत ॥

tasya śaktiṃ raṇe bhūyaścikṣepa bhujagopamām | tāṃ dvidhā cācchinacchalyo medinyāṃ sā tvaśīryata

उसने रण में फिर उस पर सर्प के समान शक्ति फेंकी; परन्तु शल्य ने उसे दो टुकड़े कर दिया और वह धरती पर बिखर गई।

श्लोक 15 (8.13.15)

तस्य शल्यः क्षुरप्रेण यन्तुः कायाच्छिरोऽहरत् । बालहस्ताद्यथा श्येन आमिषं वै नरोत्तम ॥

tasya śalyaḥ kṣurapreṇa yantuḥ kāyācchiro'harat | bālahastādyathā śyena āmiṣaṃ vai narottama

हे नरश्रेष्ठ, शल्य ने क्षुरप्र बाण से उसके सारथि का सिर धड़ से काट लिया, जैसे बाज बालक के हाथ से मांस छीन ले।

श्लोक 16 (8.13.16)

स पपात रथोपस्थात्सारथिस्तस्य भारत । ततस्ते प्राद्रवन्सङ्ख्ये हयास्तस्य महात्मनः ॥

sa papāta rathopasthātsārathistasya bhārata | tataste prādravansaṅkhye hayāstasya mahātmanaḥ

हे भारत, उसका सारथि रथ के पिछले भाग से गिर पड़ा, और तब उस महात्मा के घोड़े रण में भाग खड़े हुए।

श्लोक 17 (8.13.17)

पलायमानैस्तैरश्वैः सोऽपनीतो रणाजिरात् । श्रुतकीर्तिर्महाराज पश्यतां सर्वयोधिनाम् ॥

palāyamānaistairaśvaiḥ so'panīto raṇājirāt | śrutakīrtirmahārāja paśyatāṃ sarvayodhinām

हे महाराज, भागते हुए उन घोड़ों द्वारा श्रुतकीर्ति सब योद्धाओं के देखते-देखते रणभूमि से दूर ले जाया गया।

श्लोक 18 (8.13.18)

ततो मद्रेश्वरो राजा पाण्डवानामनीकिनीम् । व्यगाहत मुदा युक्तो नलिनीं द्विरदो यथा ॥

tato madreśvaro rājā pāṇḍavānāmanīkinīm | vyagāhata mudā yukto nalinīṃ dvirado yathā

तब मद्रराज ने आनन्द से भरकर पाण्डवों की सेना में वैसे ही प्रवेश किया जैसे हाथी कमलिनी वाले सरोवर में घुसता है।

श्लोक 19 (8.13.19)

लोलयामास स बलं सिंहः पशुगणानिव । शल्यस्तत्र महारङ्गे पाण्डवानां महात्मनाम् ॥

lolayāmāsa sa balaṃ siṃhaḥ paśugaṇāniva | śalyastatra mahāraṅge pāṇḍavānāṃ mahātmanām

उस महायुद्ध-क्षेत्र में शल्य ने महात्मा पाण्डवों की सेना को ऐसे मथ डाला जैसे सिंह पशुओं के झुण्डों को।

श्लोक 20 (8.13.20)

निपात्य पाण्डुपाञ्चालान्पृतनासु व्यवस्थितः । अशोभत रणे शल्यो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥

nipātya pāṇḍupāñcālānpṛtanāsu vyavasthitaḥ | aśobhata raṇe śalyo vidhūmo'gniriva jvalan

पाण्डवों और पांचालों को गिराकर वह सेनाओं के बीच डटा रहा; रण में शल्य धूम-रहित जलती आग के समान शोभित हुआ।

श्लोक 21 (8.13.21)

सेनाकक्षं महद्दग्ध्वा कक्षमग्निरिवोत्थितः । स्थितो रराज समरे पुरं दग्ध्वेव शङ्करः ॥

senākakṣaṃ mahaddagdhvā kakṣamagnirivotthitaḥ | sthito rarāja samare puraṃ dagdhveva śaṅkaraḥ

सेना रूपी घास-फूस के विशाल झुरमुट को जलाकर वह रण में खड़ा चमक रहा था, जैसे जंगल में भड़की आग, जैसे नगर को जलाकर खड़े शंकर।

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