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कर्ण पर्व · अध्याय 14

सहदेव द्वारा दुःशासन की पराजय

दुःशासन सहदेव पर चढ़ आता है और दोनों पहले बाणों से, फिर बारी-बारी से तलवार और धनुष से लड़ते हैं तथा एक-दूसरे के शस्त्र काटते जाते हैं। सहदेव का अन्तिम बाण दुःशासन का कवच भेदकर धरती में धँस जाता है, जिससे वह मूर्छित हो जाता है और उसका सारथि उसे रणभूमि से हटा ले जाता है। इसके बाद सहदेव दुर्योधन की सेना को चींटियों के घर की तरह रौंद डालता है।

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.14.1)

सहदेवं तथा क्रुद्धं निघ्नन्तं तव वाहिनीम् । दुःशासनो महाराज भ्राता भ्रातरमभ्ययात् ॥

sahadevaṃ tathā kruddhaṃ nighnantaṃ tava vāhinīm | duḥśāsano mahārāja bhrātā bhrātaramabhyayāt

सहदेव को क्रोधित होकर आपकी सेना का संहार करते देख, हे महाराज, दुःशासन भाई होकर भाई पर चढ़ आया।

श्लोक 2 (8.14.2)

तौ समेतौ महाराज दृष्ट्वा तत्र महारथाः । सिंहनादरवांश्चक्रुर्वासांस्यादुधुवुश्च ह ॥

tau sametau mahārāja dṛṣṭvā tatra mahārathāḥ | siṃhanādaravāṃścakrurvāsāṃsyādudhuvuśca ha

हे महाराज, उन दोनों को आमने-सामने देख वहाँ के महारथियों ने सिंहनाद किया और वस्त्र हिलाए।

श्लोक 3 (8.14.3)

ततो भारत रुष्टेन तव पुत्रेण धन्विना । पाण्डुपुत्रस्त्रिभिर्बाणैर्वक्षस्यभिहतो बली ॥

tato bhārata ruṣṭena tava putreṇa dhanvinā | pāṇḍuputrastribhirbāṇairvakṣasyabhihato balī

तब, हे भारत, आपके क्रुद्ध धनुर्धर पुत्र ने बलवान् पाण्डुपुत्र (सहदेव) की छाती में तीन बाण मारे।

श्लोक 4 (8.14.4)

सहदेवस्ततो राजन्नाराचेन तवात्मजम् । विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या सारथिं च त्रिभिः शरैः ॥

sahadevastato rājannārācena tavātmajam | viddhvā vivyādha saptatyā sārathiṃ ca tribhiḥ śaraiḥ

तब, हे राजन्, सहदेव ने आपके पुत्र को नाराच से बींधकर फिर सत्तर बाणों से बींधा और उसके सारथि को तीन बाणों से।

श्लोक 5 (8.14.5)

दुःशासनस्ततश्चापं छित्त्वा राजन्महाहवे । सहदेवं त्रिसप्तत्या बाहोरुरसि चार्पयत् ॥

duḥśāsanastataścāpaṃ chittvā rājanmahāhave | sahadevaṃ trisaptatyā bāhorurasi cārpayat

फिर, हे राजन्, दुःशासन ने उस महायुद्ध में सहदेव का धनुष काटकर उसकी भुजा और छाती में तिहत्तर बाण मारे।

श्लोक 6 (8.14.6)

सहदेवस्तु सङ्क्रुद्धः खड्गं गृह्य महाहवे । आविध्य प्रासृजत्तूर्णं तव पुत्ररथं प्रति ॥

sahadevastu saṅkruddhaḥ khaḍgaṃ gṛhya mahāhave | āvidhya prāsṛjattūrṇaṃ tava putrarathaṃ prati

सहदेव ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस महायुद्ध में तलवार उठाई और उसे घुमाकर आपके पुत्र के रथ की ओर तुरन्त फेंका।

श्लोक 7 (8.14.7)

समार्गणगुणं चापं छित्त्वा तस्य महानसिः । निपपात ततो भूमौ च्युतः सर्प इवाम्बरात् ॥

samārgaṇaguṇaṃ cāpaṃ chittvā tasya mahānasiḥ | nipapāta tato bhūmau cyutaḥ sarpa ivāmbarāt

वह विशाल तलवार बाणों और डोरी सहित उसका धनुष काटकर आकाश से गिरे सर्प की भाँति धरती पर जा गिरी।

श्लोक 8 (8.14.8)

अथान्यद्धनुरादाय सहदेवः प्रतापवान् । दुःशासनाय चिक्षेप बाणमन्तकरं ततः ॥

athānyaddhanurādāya sahadevaḥ pratāpavān | duḥśāsanāya cikṣepa bāṇamantakaraṃ tataḥ

तब प्रतापी सहदेव ने दूसरा धनुष लेकर दुःशासन पर मृत्यु लाने वाला बाण छोड़ा।

श्लोक 9 (8.14.9)

तमापतन्तं विशिखं यमदण्डोपमत्विषम् । खड्गेन शितधारेण द्विधा चिच्छेद कौरवः ॥

tamāpatantaṃ viśikhaṃ yamadaṇḍopamatviṣam | khaḍgena śitadhāreṇa dvidhā ciccheda kauravaḥ

यमदण्ड के समान आभा वाले उस आते हुए बाण को कौरव ने तेज धार वाली तलवार से दो टुकड़े कर दिया।

श्लोक 10 (8.14.10)

ततस्तं निशितं खड्गमाविध्य युधि सत्वरः । धनुश्चान्यत्समादाय शरं जग्राह वीर्यवान् ॥

tatastaṃ niśitaṃ khaḍgamāvidhya yudhi satvaraḥ | dhanuścānyatsamādāya śaraṃ jagrāha vīryavān

तब उस पराक्रमी ने उस तेज तलवार को घुमाकर और फेंककर युद्ध में शीघ्रता से दूसरा धनुष लिया और बाण उठाया।

श्लोक 11 (8.14.11)

तमापतन्तं सहसा निस्त्रिंशं निशितैः शरैः । पातयामास समरे सहदेवो हसन्निव ॥

tamāpatantaṃ sahasā nistriṃśaṃ niśitaiḥ śaraiḥ | pātayāmāsa samare sahadevo hasanniva

उस तलवार को अचानक अपनी ओर आते देख सहदेव ने मानो हँसते हुए तीखे बाणों से उसे युद्ध में गिरा दिया।

श्लोक 12 (8.14.12)

ततो बाणांश्चतुः षष्टिं तव पुत्रो महारणे । सहदेवरथं तूर्णं प्रेषयामास भारत ॥

tato bāṇāṃścatuḥ ṣaṣṭiṃ tava putro mahāraṇe | sahadevarathaṃ tūrṇaṃ preṣayāmāsa bhārata

तब, हे भारत, आपके पुत्र ने उस महायुद्ध में सहदेव के रथ की ओर तुरन्त चौंसठ बाण भेजे।

श्लोक 13 (8.14.13)

ताञ्छरान्समरे राजन्वेगेनापततो बहून् । एकैकं पञ्चभिर्बाणैः सहदेवो न्यकृन्तत ॥

tāñcharānsamare rājanvegenāpatato bahūn | ekaikaṃ pañcabhirbāṇaiḥ sahadevo nyakṛntata

हे राजन्, युद्ध में वेग से आते हुए उन बहुत-से बाणों में से प्रत्येक को सहदेव ने पाँच-पाँच बाणों से काट दिया।

श्लोक 14 (8.14.14)

सन्निवार्य महाबाणान्सहदेवः प्रतापवान् । अथास्मै सुबहून्बाणान्प्रेषयामास संयुगे ॥

sannivārya mahābāṇānsahadevaḥ pratāpavān | athāsmai subahūnbāṇānpreṣayāmāsa saṃyuge

उन महाबाणों को रोककर प्रतापी सहदेव ने युद्ध में उस पर बहुत-से और बाण भेजे।

श्लोक 15 (8.14.15)

तान्बाणांस्तव पुत्रोऽपि छित्त्वैकैकं त्रिभिः शरैः । ननाद सुमहानादं नादयानो वसुंधराम् ॥

tānbāṇāṃstava putro'pi chittvaikaikaṃ tribhiḥ śaraiḥ | nanāda sumahānādaṃ nādayāno vasuṃdharām

आपके पुत्र ने भी उन बाणों में से प्रत्येक को तीन-तीन बाणों से काटकर पृथ्वी को गुँजाते हुए बड़ा भारी नाद किया।

श्लोक 16 (8.14.16)

ततो दुःशासनो राजन्द्वाभ्यां पाण्डुसुतं रणे । सारथिं नवभिर्बाणैर्माद्रेयस्य समाचिनोत् ॥

tato duḥśāsano rājandvābhyāṃ pāṇḍusutaṃ raṇe | sārathiṃ navabhirbāṇairmādreyasya samācinot

तब, हे राजन्, दुःशासन ने रण में पाण्डुपुत्र को दो बाणों से और माद्री के पुत्र के सारथि को नौ बाणों से बींधा।

श्लोक 17 (8.14.17)

ततः क्रुद्धो महाराज सहदेवः प्रतापवान् । समाधत्त शरं घोरं मृत्युकालान्तकोपमम् ॥

tataḥ kruddho mahārāja sahadevaḥ pratāpavān | samādhatta śaraṃ ghoraṃ mṛtyukālāntakopamam

तब, हे महाराज, प्रतापी सहदेव ने क्रुद्ध होकर काल और अन्तक के समान एक भयंकर बाण सन्धान किया।

श्लोक 18 (8.14.18)

विकृष्य बलवच्चापं तव पुत्राय सोऽसृजत् । स तं निर्भिद्य वेगेन भित्त्वा च कवचं महत् ॥

vikṛṣya balavaccāpaṃ tava putrāya so'sṛjat | sa taṃ nirbhidya vegena bhittvā ca kavacaṃ mahat

धनुष को बलपूर्वक खींचकर उसने वह बाण आपके पुत्र पर छोड़ा। वह वेग से उसे भेदकर और उसका विशाल कवच फाड़कर

श्लोक 19 (8.14.19)

प्राविशद्धरणीं राजन्वल्मीकमिव पन्नगः । ततः सम्मुमुहे राजंस्तव पुत्रो महारथः ॥

prāviśaddharaṇīṃ rājanvalmīkamiva pannagaḥ | tataḥ sammumuhe rājaṃstava putro mahārathaḥ

पृथ्वी में घुस गया, हे राजन्, जैसे साँप बाँबी में घुसता है। तब, हे राजन्, आपका महारथी पुत्र मूर्छित हो गया।

श्लोक 20 (8.14.20)

मूढं चैनं समालोक्य सारथिस्त्वरितो रथम् । अपोवाह भृशं त्रस्तो वध्यमानं शितैः शरैः ॥

mūḍhaṃ cainaṃ samālokya sārathistvarito ratham | apovāha bhṛśaṃ trasto vadhyamānaṃ śitaiḥ śaraiḥ

उसे मूर्छित देख सारथि ने अत्यन्त भयभीत होकर शीघ्रता से रथ को दूर हटा लिया, जबकि उस पर तीखे बाण बरस रहे थे।

श्लोक 21 (8.14.21)

पराजित्य रणे तं तु कौरव्यं पाण्डुनन्दनः । दुर्योधनबलं दृष्ट्वा प्रममाथ समन्ततः ॥

parājitya raṇe taṃ tu kauravyaṃ pāṇḍunandanaḥ | duryodhanabalaṃ dṛṣṭvā pramamātha samantataḥ

उस कौरव को रण में हराकर पाण्डुपुत्र सहदेव ने दुर्योधन की सेना को देखा और चारों ओर से उसे रौंद डाला।

श्लोक 22 (8.14.22)

पिपीलिकपुटं राजन्यथा मृद्नन्नरो रुषा । तथा सा कौरवी सेना मृदिता तेन भारत ॥

pipīlikapuṭaṃ rājanyathā mṛdnannaro ruṣā | tathā sā kauravī senā mṛditā tena bhārata

हे राजन्, जैसे कोई मनुष्य क्रोध में चींटियों के घर को मसल दे, हे भारत, वैसे ही उसने कौरवों की उस सेना को मसल डाला।

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