कर्ण पर्व · अध्याय 15
कर्ण द्वारा नकुल की पराजय और उसे छोड़ देना
कौरव सेना को पीछे धकेलते हुए नकुल को कर्ण रोकता है; दोनों पहले कटु वचन कहते हैं और फिर बाणों की ऐसी वर्षा करते हैं कि आकाश ढक जाता है। कर्ण नकुल के धनुष बार-बार काटता है, उसके घोड़े, सारथि, रथ और शस्त्र नष्ट कर देता है और पैदल खड़े नकुल का लोहे का परिघ भी तोड़ डालता है। फिर वह नकुल का धनुष उसके गले में डालकर उसका उपहास करता है और कुन्ती का वचन स्मरण कर उसे जीवित छोड़ देता है। नकुल युधिष्ठिर के रथ पर लौट जाता है, और कर्ण दोपहर के समय पाञ्चाल सेना का संहार करता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.15.1)
नकुलं रभसं युद्धे द्रावयन्तं वरूथिनीम् । कर्णो वैकर्तनो राजन्वारयामास वै रुषा ॥
nakulaṃ rabhasaṃ yuddhe drāvayantaṃ varūthinīm | karṇo vaikartano rājanvārayāmāsa vai ruṣā
युद्ध में वेग से सेना को भगाते हुए नकुल को, हे राजन्, वैकर्तन कर्ण ने क्रोध से रोक लिया।
श्लोक 2 (8.15.2)
नकुलस्तु ततः कर्णं प्रहसन्निदमब्रवीत् । चिरस्य बत दृष्टोऽहं दैवतैः सौम्यचक्षुषा ॥
nakulastu tataḥ karṇaṃ prahasannidamabravīt | cirasya bata dṛṣṭo'haṃ daivataiḥ saumyacakṣuṣā
तब नकुल ने हँसते हुए कर्ण से यह कहा, “बहुत समय बाद आज देवताओं ने मुझे प्रसन्न दृष्टि से देखा है,
नकुल उवाच
श्लोक 3 (8.15.3)
यस्य मे त्वं रणे पाप चक्षुर्विषयमागतः । त्वं हि मूलमनर्थानां वैरस्य कलहस्य च ॥
yasya me tvaṃ raṇe pāpa cakṣurviṣayamāgataḥ | tvaṃ hi mūlamanarthānāṃ vairasya kalahasya ca
क्योंकि हे पापी, तू इस युद्ध में मेरी आँखों के सामने आ गया है। तू ही सब अनर्थों की जड़ है, और वैर तथा कलह की भी।
श्लोक 4 (8.15.4)
त्वद्दोषात्कुरवः क्षीणाः समासाद्य परस्परम् । त्वामद्य समरे हत्वा कृतकृत्योऽस्मि विज्वरः ॥
tvaddoṣātkuravaḥ kṣīṇāḥ samāsādya parasparam | tvāmadya samare hatvā kṛtakṛtyo'smi vijvaraḥ
तेरे ही दोष से कौरव आपस में भिड़कर नष्ट हुए हैं। आज युद्ध में तुझे मारकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा और मेरा यह ताप शान्त हो जाएगा।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 5 (8.15.5)
एवमुक्तः प्रत्युवाच नकुलं सूतनन्दनः । सदृशं राजपुत्रस्य धन्विनश्च विशेषतः ॥
evamuktaḥ pratyuvāca nakulaṃ sūtanandanaḥ | sadṛśaṃ rājaputrasya dhanvinaśca viśeṣataḥ
ऐसा कहे जाने पर सूतपुत्र कर्ण ने नकुल को ऐसा उत्तर दिया जो एक राजपुत्र और विशेषकर एक धनुर्धर के योग्य था:
कर्ण उवाच
श्लोक 6 (8.15.6)
प्रहरस्व च मे वीर पश्यामस्तव पौरुषम् । कर्म कृत्वा रणे शूर ततः कत्थितुमर्हसि ॥
praharasva ca me vīra paśyāmastava pauruṣam | karma kṛtvā raṇe śūra tataḥ katthitumarhasi
“वीर, मुझ पर प्रहार करो, हम तुम्हारा पौरुष देखें। हे शूर, पहले रण में पराक्रम कर दिखाओ, तभी तुम्हें डींग हाँकना उचित है।
श्लोक 7 (8.15.7)
अनुक्त्वा समरे तात शूरा युध्यन्ति शक्तितः । प्रयुध्यस्व मया शक्त्या हनिष्ये दर्पमेव ते ॥
anuktvā samare tāta śūrā yudhyanti śaktitaḥ | prayudhyasva mayā śaktyā haniṣye darpameva te
तात, शूरवीर पहले से डींग हाँके बिना अपनी शक्ति के अनुसार लड़ते हैं। तुम अपनी पूरी शक्ति से मुझसे लड़ो; मैं तुम्हारे घमण्ड को ही चूर कर दूँगा।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 8 (8.15.8)
इत्युक्त्वा प्राहरत्तूर्णं पाण्डुपुत्राय सूतजः । विव्याध चैनं समरे त्रिसप्तत्या शिलीमुखैः ॥
ityuktvā prāharattūrṇaṃ pāṇḍuputrāya sūtajaḥ | vivyādha cainaṃ samare trisaptatyā śilīmukhaiḥ
यह कहकर सूतपुत्र ने तुरन्त पाण्डुपुत्र पर प्रहार किया और युद्ध में तिहत्तर बाणों से उसे बींध दिया।
श्लोक 9 (8.15.9)
नकुलस्तु ततो विद्धः सूतपुत्रेण भारत । अशीत्याऽऽशीविषप्रख्यैः सूतपुत्रमविध्यत ॥
nakulastu tato viddhaḥ sūtaputreṇa bhārata | aśītyā''śīviṣaprakhyaiḥ sūtaputramavidhyata
हे भारत, सूतपुत्र के बाणों से बिंधा हुआ नकुल विषैले सर्पों जैसे अस्सी बाणों से सूतपुत्र को बींधने लगा।
श्लोक 10 (8.15.10)
तस्य कर्णो धनुश्छित्त्वा स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः । त्रिंशता परमेष्वासः शरैः पाण्डवमर्दयत् ॥
tasya karṇo dhanuśchittvā svarṇapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ | triṃśatā parameṣvāsaḥ śaraiḥ pāṇḍavamardayat
परम धनुर्धर कर्ण ने उसका धनुष काट दिया और सोने के पंखों वाले, पत्थर पर तेज़ किए हुए तीस बाणों से पाण्डव को पीड़ित किया।
श्लोक 11 (8.15.11)
ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे । आशीविषा यथा नागा भित्त्वा गां सलिलं पपुः ॥
te tasya kavacaṃ bhittvā papuḥ śoṇitamāhave | āśīviṣā yathā nāgā bhittvā gāṃ salilaṃ papuḥ
उन बाणों ने उसका कवच भेदकर युद्ध में उसका रक्त पी लिया, जैसे विषैले सर्प धरती को भेदकर जल पी लेते हैं।
श्लोक 12 (8.15.12)
अथान्यद्धनुरादाय हेमपृष्ठं दुरासदम् । कर्णं विव्याध सप्तत्या सारथिञ्च त्रिभिः शरैः ॥
athānyaddhanurādāya hemapṛṣṭhaṃ durāsadam | karṇaṃ vivyādha saptatyā sārathiñca tribhiḥ śaraiḥ
तब नकुल ने सोने की पीठ वाला, दुर्धर्ष दूसरा धनुष उठाया और कर्ण को सत्तर बाणों से तथा उसके सारथि को तीन बाणों से बींध दिया।
श्लोक 13 (8.15.13)
ततः क्रुद्धो महाराज नकुलः परवीरहा । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन कर्णस्य धनुराच्छिनत् ॥
tataḥ kruddho mahārāja nakulaḥ paravīrahā | kṣurapreṇa sutīkṣṇena karṇasya dhanurācchinat
तब हे महाराज, शत्रुवीरों का संहार करने वाले नकुल ने क्रुद्ध होकर अत्यन्त तीखे क्षुरप्र बाण से कर्ण का धनुष काट दिया।
श्लोक 14 (8.15.14)
अथैनं छिन्नधन्वानं सायकानां शतैस्त्रिभिः । आजघ्ने प्रहसन्वीरः सर्वलोकमहारथम् ॥
athainaṃ chinnadhanvānaṃ sāyakānāṃ śataistribhiḥ | ājaghne prahasanvīraḥ sarvalokamahāratham
फिर हँसते हुए उस वीर ने धनुष कट जाने पर सब लोकों में प्रसिद्ध महारथी कर्ण को तीन सौ बाणों से मारा।
श्लोक 15 (8.15.15)
कर्णमभ्यर्दितं दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रेण मारिष । विस्मयं परमं जग्मुर्ऋषयः सह दैवतैः ॥
karṇamabhyarditaṃ dṛṣṭvā pāṇḍuputreṇa māriṣa | vismayaṃ paramaṃ jagmurṛṣayaḥ saha daivataiḥ
पाण्डुपुत्र से कर्ण को पीड़ित होते देखकर, हे माननीय, देवताओं सहित ऋषि परम विस्मय में पड़ गए।
श्लोक 16 (8.15.16)
अथान्यद्धनुरादाय कर्णो वैकर्तनस्तदा । नकुलं पञ्चभिर्बाणैर्जत्रुदेशे समार्पयत् ॥
athānyaddhanurādāya karṇo vaikartanastadā | nakulaṃ pañcabhirbāṇairjatrudeśe samārpayat
तब वैकर्तन कर्ण ने दूसरा धनुष लेकर नकुल के कण्ठ-अस्थि के स्थान पर पाँच बाण गाड़ दिए।
श्लोक 17 (8.15.17)
उरस्थैरथ तैर्बाणैर्माद्रीपुत्रो व्यरोचत । स्वरश्मिभिरिवादित्यो भुवने विसृजन्प्रभाम् ॥
urasthairatha tairbāṇairmādrīputro vyarocata | svaraśmibhirivādityo bhuvane visṛjanprabhām
छाती में गड़े उन बाणों से माद्री का पुत्र ऐसा शोभित हुआ जैसे सूर्य अपनी किरणों से संसार में प्रकाश बिखेर रहा हो।
श्लोक 18 (8.15.18)
नकुलस्तु ततः कर्णं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । अथास्य धनुषः कोटिं पुनश्चिच्छेद मारिष ॥
nakulastu tataḥ karṇaṃ viddhvā saptabhirāśugaiḥ | athāsya dhanuṣaḥ koṭiṃ punaściccheda māriṣa
और नकुल ने कर्ण को सात तेज़ बाणों से बींधकर, हे माननीय, फिर उसके धनुष की नोक काट डाली।
श्लोक 19 (8.15.19)
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय समरे वेगवत्तरम् । नकुलस्य ततो बाणैः समन्ताच्छादयद्दिशः ॥
so'nyatkārmukamādāya samare vegavattaram | nakulasya tato bāṇaiḥ samantācchādayaddiśaḥ
कर्ण ने युद्ध में और भी वेगवान दूसरा धनुष लेकर नकुल पर बाण बरसाते हुए सब दिशाओं को ढक दिया।
श्लोक 20 (8.15.20)
सञ्छाद्यमानः सहसा कर्णचापच्युतैः शरैः । चिच्छेद स शरांस्तूर्णं शरैरेव महारथः ॥
sañchādyamānaḥ sahasā karṇacāpacyutaiḥ śaraiḥ | ciccheda sa śarāṃstūrṇaṃ śaraireva mahārathaḥ
कर्ण के धनुष से छूटे बाणों से अचानक ढक जाने पर उस महारथी ने अपने बाणों से ही उन बाणों को तुरन्त काट डाला।
श्लोक 21 (8.15.21)
ततो बाणमयं जालं विततं व्योम्न्यदृश्यत । खद्योतानामिव व्रातैः सम्पतद्भिर्यथा नभः ॥
tato bāṇamayaṃ jālaṃ vitataṃ vyomnyadṛśyata | khadyotānāmiva vrātaiḥ sampatadbhiryathā nabhaḥ
तब आकाश में बाणों का बना हुआ एक जाल फैला दिखाई दिया, मानो उड़ते हुए जुगनुओं के झुण्डों से आकाश भर गया हो।
श्लोक 22 (8.15.22)
तैर्विमुक्तैः शरशतैश्छादितं गगनं तदा । शलभानां यथा व्रातैस्तद्वदासीद्विशाम्पते ॥
tairvimuktaiḥ śaraśataiśchāditaṃ gaganaṃ tadā | śalabhānāṃ yathā vrātaistadvadāsīdviśāmpate
उनके छोड़े हुए सैकड़ों बाणों से ढका आकाश वैसा ही हो गया जैसा टिड्डियों के झुण्डों से भर जाने पर होता है, हे प्रजापति।
श्लोक 23 (8.15.23)
ते शरा हेमविकृताः सम्पतन्तो मुहुर्मुहुः । श्रेणीकृता व्यकाशान्त क्रौञ्चाः श्रेणीकृता इव ॥
te śarā hemavikṛtāḥ sampatanto muhurmuhuḥ | śreṇīkṛtā vyakāśānta krauñcāḥ śreṇīkṛtā iva
सोने से सजे वे बाण बार-बार उड़ते हुए पंक्तियों में चमक रहे थे, जैसे क्रौञ्च पक्षी पंक्ति बाँधकर उड़ते हैं।
श्लोक 24 (8.15.24)
बाणजालवृते व्योम्नि च्छादिते च दिवाकरे । न स्म सम्पतते भूतं किञ्चिदप्यन्तरिक्षगम् ॥
bāṇajālavṛte vyomni cchādite ca divākare | na sma sampatate bhūtaṃ kiñcidapyantarikṣagam
बाणों के जाल से आकाश के घिर जाने और सूर्य के ढक जाने पर आकाश में चलने वाला कोई भी प्राणी वहाँ से उड़कर पार नहीं जा सका।
श्लोक 25 (8.15.25)
निरुद्धे तत्र मार्गे च शरसङ्घैः समन्ततः । व्यरोचेतां महात्मानौ कालसूर्याविवोदितौ ॥
niruddhe tatra mārge ca śarasaṅghaiḥ samantataḥ | vyarocetāṃ mahātmānau kālasūryāvivoditau
चारों ओर बाणों के समूहों से मार्ग रुक जाने पर वे दोनों महात्मा योद्धा प्रलयकाल के दो उदित सूर्यों के समान शोभित हुए।
श्लोक 26 (8.15.26)
कर्णचापच्युतैर्बाणैर्वध्यमानास्तु सोमकाः । अवालीयन्त राजेन्द्र वेदनार्ता भृशार्दिताः ॥
karṇacāpacyutairbāṇairvadhyamānāstu somakāḥ | avālīyanta rājendra vedanārtā bhṛśārditāḥ
कर्ण के धनुष से छूटे बाणों से मारे जाते हुए सोमक, हे राजेन्द्र, पीड़ा से व्याकुल और अत्यन्त त्रस्त होकर पीछे हटने लगे।
श्लोक 27 (8.15.27)
नकुलस्य तथा बाणैर्हन्यमाना चमूस्तव । व्यशीर्यत दिशो राजन्वातनुन्ना इवाम्बुदाः ॥
nakulasya tathā bāṇairhanyamānā camūstava | vyaśīryata diśo rājanvātanunnā ivāmbudāḥ
इसी प्रकार नकुल के बाणों से मारी जाती हुई आपकी सेना, हे राजन्, हवा से उड़ाए गए बादलों की तरह चारों दिशाओं में बिखर गई।
श्लोक 28 (8.15.28)
ते सेने हन्यमाने तु ताभ्यां दिव्यैर्महाशरैः । शरपातमपाक्रम्य तस्थतुः प्रेक्षिके तदा ॥
te sene hanyamāne tu tābhyāṃ divyairmahāśaraiḥ | śarapātamapākramya tasthatuḥ prekṣike tadā
उन दोनों योद्धाओं के दिव्य और प्रबल बाणों से मारी जाती हुई वे दोनों सेनाएँ बाणों की पहुँच से हटकर दर्शक बनकर खड़ी हो गईं।
श्लोक 29 (8.15.29)
प्रोत्सारितजने तस्मिन्कर्णपाण्डवयोः शरैः । अविध्येतां महात्मानावन्योन्यं शरवृष्टिभिः ॥
protsāritajane tasminkarṇapāṇḍavayoḥ śaraiḥ | avidhyetāṃ mahātmānāvanyonyaṃ śaravṛṣṭibhiḥ
कर्ण और पाण्डव के बाणों से वहाँ के लोगों को हटा दिए जाने पर वे दोनों महात्मा एक-दूसरे को बाणों की वर्षा से बींधने लगे।
श्लोक 30 (8.15.30)
विदर्शयन्तौ दिव्यानि शस्त्राणि रणमूर्धनि । छादयन्तौ च सहसा परस्परवधैषिणौ ॥
vidarśayantau divyāni śastrāṇi raṇamūrdhani | chādayantau ca sahasā parasparavadhaiṣiṇau
रणभूमि के अग्रभाग में दिव्य अस्त्र-शस्त्र दिखाते हुए और अचानक एक-दूसरे को ढकते हुए, एक-दूसरे का वध चाहने वाले वे दोनों,
श्लोक 31 (8.15.31)
नकुलेन शरा मुक्ताः कङ्कबर्हिणवाससः । सूतपुत्रमवच्छाद्य व्यतिष्ठन्त यथाऽम्बरे ॥
nakulena śarā muktāḥ kaṅkabarhiṇavāsasaḥ | sūtaputramavacchādya vyatiṣṭhanta yathā'mbare
नकुल के छोड़े हुए, कङ्क और मोर के पंखों वाले बाण सूतपुत्र को ढककर आकाश में ठहर गए।
श्लोक 32 (8.15.32)
तथैव सूतपुत्रेण प्रेषिताः परमाहवे । पाण्डुपुत्रमवच्छाद्य व्यतिष्ठन्ताम्बरे शराः ॥
tathaiva sūtaputreṇa preṣitāḥ paramāhave | pāṇḍuputramavacchādya vyatiṣṭhantāmbare śarāḥ
उसी प्रकार उस घोर युद्ध में सूतपुत्र के भेजे हुए बाण पाण्डुपुत्र को ढककर आकाश में ठहर गए।
श्लोक 33 (8.15.33)
शरवेश्मप्रविष्टौ तौ ददृशाते न कैश्चन । सूर्याचन्द्रमसौ राजञ्छाद्यमानौ घनैरिव ॥
śaraveśmapraviṣṭau tau dadṛśāte na kaiścana | sūryācandramasau rājañchādyamānau ghanairiva
बाणों के घर में घिरे हुए वे दोनों किसी को दिखाई नहीं दिए, जैसे बादलों से ढके हुए सूर्य और चन्द्रमा, हे राजन्।
श्लोक 34 (8.15.34)
ततः क्रुद्धो रणे कर्णः कृत्वा घोरतरं वपुः । पाण्डवं छादयामास समन्ताच्छरवृष्टिभिः ॥
tataḥ kruddho raṇe karṇaḥ kṛtvā ghorataraṃ vapuḥ | pāṇḍavaṃ chādayāmāsa samantāccharavṛṣṭibhiḥ
तब रण में क्रुद्ध कर्ण ने और भी भयंकर रूप धारण करके पाण्डव को चारों ओर से बाणों की वर्षा से ढक दिया।
श्लोक 35 (8.15.35)
सोऽतिच्छन्नो महाराज सूतपुत्रेण पाण्डवः । न चकार व्यथां राजन्भास्करो जलदैर्यथा ॥
so'ticchanno mahārāja sūtaputreṇa pāṇḍavaḥ | na cakāra vyathāṃ rājanbhāskaro jaladairyathā
सूतपुत्र के बाणों से घने ढक जाने पर भी, हे महाराज, पाण्डव को कोई पीड़ा नहीं हुई, जैसे बादलों से घिरे सूर्य को नहीं होती।
श्लोक 36 (8.15.36)
ततः प्रहस्याधिरथिः शरजालानि मारिष । प्रेषयामास समरे शतशोऽथ सहस्रशः ॥
tataḥ prahasyādhirathiḥ śarajālāni māriṣa | preṣayāmāsa samare śataśo'tha sahasraśaḥ
तब अधिरथ के पुत्र ने हँसते हुए, हे माननीय, युद्ध में सैकड़ों और फिर हजारों बाणों के जाल छोड़े।
श्लोक 37 (8.15.37)
एकच्छायमभूत्सर्वं तस्य बाणैर्महात्मनः । अभ्रच्छायेव सञ्जज्ञे सम्पतद्भिः शरोत्तमैः ॥
ekacchāyamabhūtsarvaṃ tasya bāṇairmahātmanaḥ | abhracchāyeva sañjajñe sampatadbhiḥ śarottamaiḥ
उस महात्मा के बाणों से सब कुछ एक ही छाया में डूब गया; गिरते हुए उत्तम बाणों से मानो बादलों की छाया छा गई हो।
श्लोक 38 (8.15.38)
ततः कर्णो महाराज धनुश्छित्त्वा महात्मनः । सारथिं पातयामास रथनीडाद्धसन्निव ॥
tataḥ karṇo mahārāja dhanuśchittvā mahātmanaḥ | sārathiṃ pātayāmāsa rathanīḍāddhasanniva
तब हे महाराज, कर्ण ने महात्मा नकुल का धनुष काटकर मानो हँसते हुए उसके सारथि को रथ के आसन से गिरा दिया।
श्लोक 39 (8.15.39)
ततोऽश्वांश्चतुरश्चास्य चतुर्भिर्निशितैः शरैः । यमस्य भवनं तूर्णं प्रेषयामास भारत ॥
tato'śvāṃścaturaścāsya caturbhirniśitaiḥ śaraiḥ | yamasya bhavanaṃ tūrṇaṃ preṣayāmāsa bhārata
फिर चार तीखे बाणों से उसने उसके चारों घोड़ों को तुरन्त यमलोक भेज दिया, हे भारत।
श्लोक 40 (8.15.40)
अथास्य तं रथं दिव्यं तिलशो व्यधमच्छरैः । पताकां चक्ररक्षांश्च गदां खड्गं च मारिष ॥
athāsya taṃ rathaṃ divyaṃ tilaśo vyadhamaccharaiḥ | patākāṃ cakrarakṣāṃśca gadāṃ khaḍgaṃ ca māriṣa
फिर उसने अपने बाणों से उसके दिव्य रथ को टुकड़े-टुकड़े कर दिया, उसकी पताका, चक्ररक्षक, गदा और खड्ग सहित, हे माननीय,
श्लोक 41 (8.15.41)
शतचन्द्रं च तच्चर्म सर्वोपकरणानि च । सुवर्णविकृतं तच्च धनुः शरमाहवे ॥
śatacandraṃ ca taccarma sarvopakaraṇāni ca | suvarṇavikṛtaṃ tacca dhanuḥ śaramāhave
और सैकड़ों चन्द्रों वाली उसकी ढाल, उसके सारे उपकरण और सोने से बना वह धनुष-बाण भी युद्ध में नष्ट कर दिया।
श्लोक 42 (8.15.42)
हताश्वो विरथश्चैव विवर्मा च विशाम्पते । अवतीर्य रथात्तूर्णं परिघं गृह्य विष्ठितः ॥
hatāśvo virathaścaiva vivarmā ca viśāmpate | avatīrya rathāttūrṇaṃ parighaṃ gṛhya viṣṭhitaḥ
घोड़े मारे जाने, रथ और कवच से रहित हो जाने पर, हे प्रजापति, वह तुरन्त रथ से उतरकर लोहे का परिघ हाथ में लिए खड़ा हो गया।
श्लोक 43 (8.15.43)
तमुद्यतं महाघोरं परिघं तस्य सूतजः । व्यहनत्सायकै राजन्सुतीक्ष्णैर्भारसाधनैः ॥
tamudyataṃ mahāghoraṃ parighaṃ tasya sūtajaḥ | vyahanatsāyakai rājansutīkṣṇairbhārasādhanaiḥ
उसके उठाए हुए उस अत्यन्त भयंकर परिघ को सूतपुत्र ने, हे राजन्, तीखे और भारी वेग वाले बाणों से तोड़ डाला।
श्लोक 44 (8.15.44)
व्यायुधं चैनमालक्ष्य शरैः सन्नतपर्वभिः । आर्पयद्बहुभिः कर्णो न चैनं समपीडयत् ॥
vyāyudhaṃ cainamālakṣya śaraiḥ sannataparvabhiḥ | ārpayadbahubhiḥ karṇo na cainaṃ samapīḍayat
उसे शस्त्रहीन देखकर कर्ण ने उसे अनेक सीधे जोड़ वाले बाणों से मारा, पर उसे अधिक पीड़ित नहीं किया।
श्लोक 45 (8.15.45)
स हन्यमानः समरे कृतास्त्रेण बलीयसा । प्राद्रवत्सहसा राजन्नकुलो व्याकुलेन्द्रियः ॥
sa hanyamānaḥ samare kṛtāstreṇa balīyasā | prādravatsahasā rājannakulo vyākulendriyaḥ
अस्त्रविद्या में निपुण और अधिक बलवान् कर्ण से युद्ध में मारा जाता हुआ नकुल, हे राजन्, व्याकुल इन्द्रियों के साथ सहसा भाग निकला।
श्लोक 46 (8.15.46)
तमभिद्रुत्य राधेयः प्रहसन्वै पुनःपुनः । सज्यमस्य धनुः कण्ठे व्यवासृजत भारत ॥
tamabhidrutya rādheyaḥ prahasanvai punaḥpunaḥ | sajyamasya dhanuḥ kaṇṭhe vyavāsṛjata bhārata
उसके पीछे दौड़कर राधापुत्र ने बार-बार हँसते हुए, हे भारत, नकुल का चढ़ा हुआ धनुष उसके गले में डाल दिया।
श्लोक 47 (8.15.47)
ततः स शुशुभे राजन्कण्ठासक्तमहाधनुः । परिवेषमनुप्राप्तो यथा स्याद्व्योम्नि चन्द्रमाः ॥
tataḥ sa śuśubhe rājankaṇṭhāsaktamahādhanuḥ | pariveṣamanuprāpto yathā syādvyomni candramāḥ
तब, हे राजन्, गले में लटके उस महान् धनुष से वह ऐसा शोभित हुआ जैसे आकाश में परिधि से घिरा चन्द्रमा,
श्लोक 48 (8.15.48)
यथैव चासितो मेघः शक्रचापेन शोभितः । अशोभत महाराज पाण्डुपुत्रस्तथा रणे ॥
yathaiva cāsito meghaḥ śakracāpena śobhitaḥ | aśobhata mahārāja pāṇḍuputrastathā raṇe
अथवा इन्द्रधनुष से सजे काले बादल की तरह; वैसे ही, हे महाराज, उस युद्ध में पाण्डुपुत्र शोभित हुआ।
श्लोक 49 (8.15.49)
तमब्रवीत्ततः कर्णो व्यर्थं व्याहृतवानसि । वदेदानीं पुनर्हृष्टो वध्यमानः पुनःपुनः ॥
tamabravīttataḥ karṇo vyarthaṃ vyāhṛtavānasi | vadedānīṃ punarhṛṣṭo vadhyamānaḥ punaḥpunaḥ
तब कर्ण ने उससे कहा, “तुमने जो कहा था वह व्यर्थ ही कहा। बार-बार मारे जाने पर भी अब फिर प्रसन्न होकर बोलो।
कर्ण उवाच
श्लोक 50 (8.15.50)
मा योत्सीः कुरुभिः सार्धं बलवद्भिश्च पाण्डव । सदृशैस्तात युध्यस्व व्रीडां मा कुरु पाण्डव ॥
mā yotsīḥ kurubhiḥ sārdhaṃ balavadbhiśca pāṇḍava | sadṛśaistāta yudhyasva vrīḍāṃ mā kuru pāṇḍava
हे पाण्डव, बलवान् कौरवों के साथ मत लड़ो। तात, अपने समान लोगों से लड़ो; हे पाण्डव, लज्जा मत करो,
सञ्जय उवाच
श्लोक 51 (8.15.51)
गृहं वा गच्छ माद्रेय यत्र वा कृष्णफल्गुनौ । एवमुक्त्वा महाराज विससर्ज स तं तदा ॥
gṛhaṃ vā gaccha mādreya yatra vā kṛṣṇaphalgunau | evamuktvā mahārāja visasarja sa taṃ tadā
या हे माद्रीपुत्र, घर लौट जाओ, अथवा वहाँ जाओ जहाँ कृष्ण और फाल्गुन हैं।” हे महाराज, यह कहकर उसने तब उसे छोड़ दिया।
श्लोक 52 (8.15.52)
वधप्राप्तं तु तं शूरो नाहनद्धर्मवित्तदा । स्मृत्वा कुन्त्या वचो राजंस्तत एनं व्यसर्जयत् ॥
vadhaprāptaṃ tu taṃ śūro nāhanaddharmavittadā | smṛtvā kuntyā vaco rājaṃstata enaṃ vyasarjayat
वध के योग्य स्थिति में आए नकुल को उस धर्मज्ञ वीर ने तब नहीं मारा; हे राजन्, कुन्ती का वचन स्मरण करके उसने उसे छोड़ दिया।
श्लोक 53 (8.15.53)
विसृष्टः पाण्डवो राजन्सूतपुत्रेण धन्विना । व्रीडन्निव जगामाथ युधिष्ठिररथं प्रति ॥
visṛṣṭaḥ pāṇḍavo rājansūtaputreṇa dhanvinā | vrīḍanniva jagāmātha yudhiṣṭhirarathaṃ prati
धनुर्धर सूतपुत्र के छोड़ देने पर पाण्डव, हे राजन्, मानो लज्जित होकर युधिष्ठिर के रथ की ओर चला गया।
श्लोक 54 (8.15.54)
आरुरोह रथं चापि सूतपुत्रप्रतापितः । निःश्वसन्दुःखसन्तप्तः कुम्भक्षिप्त इवोरगः ॥
āruroha rathaṃ cāpi sūtaputrapratāpitaḥ | niḥśvasanduḥkhasantaptaḥ kumbhakṣipta ivoragaḥ
सूतपुत्र से सताया हुआ वह दुःख से जलता और आहें भरता हुआ रथ पर चढ़ गया, जैसे घड़े में डाला हुआ साँप।
श्लोक 55 (8.15.55)
तं विजित्याथ कर्णोऽपि पाञ्चालांस्त्वरितो ययौ । रथेनातिपताकेन चन्द्रवर्णहयेन च ॥
taṃ vijityātha karṇo'pi pāñcālāṃstvarito yayau | rathenātipatākena candravarṇahayena ca
उसे जीतकर कर्ण भी शीघ्र ही पाञ्चालों की ओर चला, अनेक पताकाओं वाले और चन्द्रमा के समान श्वेत घोड़ों वाले रथ में।
श्लोक 56 (8.15.56)
तत्राक्रन्दो महानासीत्पाण्डवानां विशाम्पते । दृष्ट्वा सेनापतिं यान्तं पाञ्चालानां रथव्रजान् ॥
tatrākrando mahānāsītpāṇḍavānāṃ viśāmpate | dṛṣṭvā senāpatiṃ yāntaṃ pāñcālānāṃ rathavrajān
वहाँ पाण्डवों में बड़ा हाहाकार उठा, हे प्रजापति, जब उन्होंने सेनापति को पाञ्चालों के रथ-समूहों की ओर जाते देखा।
श्लोक 57 (8.15.57)
तत्राकरोन्महाराज कदनं सूतनन्दनः । मध्यं प्राप्ते दिनकरे चक्रवद्विचरन्प्रभुः ॥
tatrākaronmahārāja kadanaṃ sūtanandanaḥ | madhyaṃ prāpte dinakare cakravadvicaranprabhuḥ
वहाँ, हे महाराज, सूतपुत्र ने संहार मचाया; सूर्य के दोपहर पर आने पर वह प्रभु चक्र की तरह घूमता हुआ विचर रहा था।
श्लोक 58 (8.15.58)
भग्नचक्रै रथैः कैश्चिच्छिन्नध्वजपताकिभिः । हताश्वैर्हतसूतैश्च भग्नाक्षैश्चैव मारिष । ह्रियमाणानपश्याम पाञ्चालानां रथव्रजान् ॥
bhagnacakrai rathaiḥ kaiścicchinnadhvajapatākibhiḥ | hatāśvairhatasūtaiśca bhagnākṣaiścaiva māriṣa | hriyamāṇānapaśyāma pāñcālānāṃ rathavrajān
हे माननीय, हमने पाञ्चालों के रथ-समूहों को भागते हुए देखा: कुछ रथों के पहिये टूटे थे, ध्वज और पताकाएँ कटी थीं, घोड़े और सारथि मारे जा चुके थे और धुरे टूट गए थे।
श्लोक 59 (8.15.59)
तत्रतत्र च सम्भ्रान्ता विचेरुरथ कुञ्जराः । दावाग्न्यभिपरीताङ्गा यथैव स्युर्महावने ॥
tatratatra ca sambhrāntā viceruratha kuñjarāḥ | dāvāgnyabhiparītāṅgā yathaiva syurmahāvane
जहाँ-तहाँ हाथी घबराकर घूम रहे थे, उनके शरीर ऐसे झुलसे थे जैसे किसी विशाल वन में दावानल से घिर गए हों।
श्लोक 60 (8.15.60)
भिन्नकुम्भाः सरुधिराश्छिन्नहस्ताश्च वारणाः । छिन्नगात्रावराश्चैव च्छिन्नवालधयोऽपरे । छिन्नाभ्राणीव सम्पेतुर्हन्यमाना महात्मना ॥
bhinnakumbhāḥ sarudhirāśchinnahastāśca vāraṇāḥ | chinnagātrāvarāścaiva cchinnavāladhayo'pare | chinnābhrāṇīva sampeturhanyamānā mahātmanā
जिनके गण्डस्थल फट गए थे, जो खून से लथपथ थे और जिनकी सूँड़ें कट गई थीं, ऐसे हाथी, कुछ पिछले अंग कटे हुए और कुछ पूँछ कटी हुई, उस महात्मा के प्रहार से फटे बादलों की तरह गिर रहे थे।
श्लोक 61 (8.15.61)
अपरे त्रासिता नागा नाराचशरतोमरैः । तमेवाभिमुखं जग्मुः शलभा इव पावकम् ॥
apare trāsitā nāgā nārācaśaratomaraiḥ | tamevābhimukhaṃ jagmuḥ śalabhā iva pāvakam
नाराच, बाणों और तोमरों से डरे हुए दूसरे हाथी उसी की ओर दौड़ पड़े, जैसे पतंगे आग की ओर।
श्लोक 62 (8.15.62)
अपरे निष्टनन्तश्च व्यदृश्यन्त महाद्विपाः । क्षरन्तः शोणितं गात्रैर्नगा इव जलस्रवाः ॥
apare niṣṭanantaśca vyadṛśyanta mahādvipāḥ | kṣarantaḥ śoṇitaṃ gātrairnagā iva jalasravāḥ
दूसरे विशाल हाथी कराहते दिखाई देते थे, जिनके शरीरों से खून बह रहा था, जैसे जल की धाराएँ बहाते पर्वत।
श्लोक 63 (8.15.63)
उरश्छदैर्वियुक्तांश्च वालबन्धैश्च वाजिनः । राजतैश्च तथा कांस्यैः सौवर्णैश्चैव भूषणैः ॥
uraśchadairviyuktāṃśca vālabandhaiśca vājinaḥ | rājataiśca tathā kāṃsyaiḥ sauvarṇaiścaiva bhūṣaṇaiḥ
हमने घोड़ों को देखा जिनके वक्ष-कवच और पूँछ के बन्धन उतर गए थे, और जिनके चाँदी, काँसे और सोने के आभूषण छिन गए थे,
श्लोक 64 (8.15.64)
हीनांश्चाभरणैश्चैव खलीनैश्च विवर्जितान् । चामरैश्च कुथाभिश्च तूणीरैः पतितैरपि ॥
hīnāṃścābharaṇaiścaiva khalīnaiśca vivarjitān | cāmaraiśca kuthābhiśca tūṇīraiḥ patitairapi
जो गहनों से रहित थे, जिनके लगाम नहीं थे, और जिनके चँवर, झूलें और तरकश गिर चुके थे,
श्लोक 65 (8.15.65)
निहतैः सादिभिश्चैव शूरैराहवशोभितैः । अपश्याम रणे तत्र भ्राम्यमाणान्हयोत्तमान् ॥
nihataiḥ sādibhiścaiva śūrairāhavaśobhitaiḥ | apaśyāma raṇe tatra bhrāmyamāṇānhayottamān
जिनके सवार, युद्ध की शोभा बढ़ाने वाले वीर, मारे जा चुके थे; ऐसे उत्तम घोड़ों को हमने वहाँ रण में भटकते देखा।
श्लोक 66 (8.15.66)
प्रासैः खड्गैश्च रहितानृष्टिभिश्चापि भारत । हयसादीनपश्याम कञ्चुकोष्णीषधारिणः ॥
prāsaiḥ khaḍgaiśca rahitānṛṣṭibhiścāpi bhārata | hayasādīnapaśyāma kañcukoṣṇīṣadhāriṇaḥ
हे भारत, हमने कवच और पगड़ी पहने घुड़सवारों को देखा, जो अपने प्रास, खड्ग और ऋष्टि से रहित हो चुके थे।
श्लोक 67 (8.15.67)
निहतान्वध्यमानांश्च वेपमानांश्च भारत । नानाङ्गावयवैर्हीनांस्तत्रतत्रैव भारत ॥
nihatānvadhyamānāṃśca vepamānāṃśca bhārata | nānāṅgāvayavairhīnāṃstatratatraiva bhārata
हे भारत, मरे हुए, मारे जाते हुए और काँपते हुए लोग, जगह-जगह अपने अनेक अंगों से रहित हुए।
श्लोक 68 (8.15.68)
रथान्हेमपरिष्कारान्संयुक्ताञ्जवनैर्हयैः । भ्राम्यमाणानपश्याम हतेषु रथिषु द्रुतम् ॥
rathānhemapariṣkārānsaṃyuktāñjavanairhayaiḥ | bhrāmyamāṇānapaśyāma hateṣu rathiṣu drutam
हमने सोने से सजे, तेज़ घोड़ों से जुते रथों को देखा जो उनके रथियों के मारे जाने पर तेज़ी से इधर-उधर भटक रहे थे।
श्लोक 69 (8.15.69)
भग्नाक्षकूबरान्कांश्चिद्भग्नचक्रांश्च भारत । विपताकध्वजांश्चान्याञ्छिन्नेषादण्डबन्धुरान् ॥
bhagnākṣakūbarānkāṃścidbhagnacakrāṃśca bhārata | vipatākadhvajāṃścānyāñchinneṣādaṇḍabandhurān
हे भारत, कुछ रथों के धुरे और जुए टूट गए थे, कुछ के पहिये टूट गए थे, दूसरे बिना पताका और ध्वज के थे, जिनके ईषादण्ड कटकर टेढ़े पड़े थे।
श्लोक 70 (8.15.70)
विहीनान्रथिनस्तत्र धावमानांस्ततस्ततः । सूतपुत्रशरैस्तीक्ष्णैर्हन्यमानान्विशाम्पते ॥
vihīnānrathinastatra dhāvamānāṃstatastataḥ | sūtaputraśaraistīkṣṇairhanyamānānviśāmpate
हे प्रजापति, हमने रथियों को इधर-उधर भागते देखा, जो सब कुछ खोकर सूतपुत्र के तीखे बाणों से मारे जा रहे थे।
श्लोक 71 (8.15.71)
विशस्त्रांश्च तथैवान्यान्सशस्त्रांश्च हतान्बहून् । तारकाजालसञ्छन्नान्वरघण्टाविशोभितान् ॥
viśastrāṃśca tathaivānyānsaśastrāṃśca hatānbahūn | tārakājālasañchannānvaraghaṇṭāviśobhitān
कुछ शस्त्रहीन थे और बहुत से शस्त्र लिए हुए ही मारे गए थे; और तारों के आकार के आभूषणों के जालों से ढके, उत्तम घण्टियों से सजे हाथी भी थे,
श्लोक 72 (8.15.72)
नानावर्णविचित्राभिः पताकाभिरलङ्कृतान् । वारणाननुपश्याम धावमानान्समन्ततः ॥
nānāvarṇavicitrābhiḥ patākābhiralaṅkṛtān | vāraṇānanupaśyāma dhāvamānānsamantataḥ
जो अनेक रंगों की विचित्र पताकाओं से सजे थे; उन हाथियों को हमने चारों ओर दौड़ते देखा।
श्लोक 73 (8.15.73)
शिरांसि बाहूनूरूंश्च च्छिन्नानन्यांस्तथैव च । कर्णचापच्युतैर्बाणैरपश्याम समन्ततः ॥
śirāṃsi bāhūnūrūṃśca cchinnānanyāṃstathaiva ca | karṇacāpacyutairbāṇairapaśyāma samantataḥ
कर्ण के धनुष से छूटे बाणों से कटे हुए सिर, भुजाएँ और जाँघें, और वैसे ही दूसरे अंग भी, हमने चारों ओर देखे।
श्लोक 74 (8.15.74)
महान्व्यतिकरो रौद्रो योधानामन्वपद्यत । कर्णसायकनुन्नानां युध्यतां च शितैः शरैः ॥
mahānvyatikaro raudro yodhānāmanvapadyata | karṇasāyakanunnānāṃ yudhyatāṃ ca śitaiḥ śaraiḥ
कर्ण के बाणों से खदेड़े गए और तीखे बाणों से लड़ते हुए योद्धाओं में बड़ी भयानक अव्यवस्था फैल गई।
श्लोक 75 (8.15.75)
ते वध्यमानाः समरे सूतपुत्रेण सृञ्जयाः । तमेवाभिमुखं यान्ति पतङ्गा इव पावकम् ॥
te vadhyamānāḥ samare sūtaputreṇa sṛñjayāḥ | tamevābhimukhaṃ yānti pataṅgā iva pāvakam
रण में सूतपुत्र से मारे जाते हुए भी सृञ्जय उसी के सामने जाते थे, जैसे पतंगे आग की ओर।
श्लोक 76 (8.15.76)
तं दहन्तमनीकानि तत्रतत्र महारथम् । क्षत्रिया वर्जयामासुर्युगान्ताग्निमिवोल्बणम् ॥
taṃ dahantamanīkāni tatratatra mahāratham | kṣatriyā varjayāmāsuryugāntāgnimivolbaṇam
जहाँ-तहाँ सेनाओं को जलाते हुए उस महारथी से क्षत्रिय ऐसे बचते थे जैसे युगान्त की प्रचण्ड अग्नि से।
श्लोक 77 (8.15.77)
हतशेषास्तु ये वीराः पाञ्चालानां महारथाः । तान्प्रभग्नान्द्रुतान्वीरः पृष्ठतो विकिरञ्छरैः । अभ्यधावत तेजस्वी विशीर्णकवचध्वजान् ॥
hataśeṣāstu ye vīrāḥ pāñcālānāṃ mahārathāḥ | tānprabhagnāndrutānvīraḥ pṛṣṭhato vikirañcharaiḥ | abhyadhāvata tejasvī viśīrṇakavacadhvajān
पाञ्चालों के जो महारथी वीर बच गए थे, वे टूटकर भाग रहे थे; उनके कवच और ध्वज बिखर चुके थे; उनके पीछे बाण बरसाता हुआ वह तेजस्वी वीर दौड़ा।
श्लोक 78 (8.15.78)
तापयामास तान्बाणैः सूतपुत्रो महाबलः । मध्यन्दिनमनुप्राप्तो भूतानीव तमोनुदः ॥
tāpayāmāsa tānbāṇaiḥ sūtaputro mahābalaḥ | madhyandinamanuprāpto bhūtānīva tamonudaḥ
मध्याह्न को पहुँचे हुए महाबली सूतपुत्र ने उन्हें अपने बाणों से तपाया, जैसे अन्धकार हटाने वाला सूर्य प्राणियों को तपाता है।