कर्ण पर्व · अध्याय 16
उलूक और शकुनि का युयुत्सु और सुतसोम से युद्ध
उलूक युयुत्सु पर टूट पड़ता है, उसका ध्वज काट देता है और उसके सारथि को मार डालता है; युयुत्सु को दूसरे रथ पर जाना पड़ता है, और उलूक पाञ्चालों और सृञ्जयों के बीच बढ़ता चला जाता है। श्रुतकर्मा और शतानीक एक-दूसरे के रथ नष्ट कर देते हैं, और शकुनि सुतसोम से लड़ता है, जो रथहीन होकर तलवार लेकर पैदल उसका सामना करता है। शकुनि तलवार काट देता है, सुतसोम उसका बचा हुआ भाग फेंककर श्रुतकीर्ति के रथ पर चला जाता है, और शकुनि नया धनुष लेकर पाण्डव सेना को वैसे ही बिखेर देता है जैसे इन्द्र दैत्यों की सेना को कुचलता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.16.1)
युयुत्सुं तव पुत्रस्य द्रावयन्तं बलं महत् । उलूको न्यपतत्तूर्णं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
yuyutsuṃ tava putrasya drāvayantaṃ balaṃ mahat | ulūko nyapatattūrṇaṃ tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
आपके पुत्र की विशाल सेना को भगाते हुए युयुत्सु पर उलूक शीघ्र ही टूट पड़ा और बोला, “ठहर, ठहर!”
श्लोक 2 (8.16.2)
युयुत्सुश्च ततो राजञ्शितधारेण पत्रिणा । उलूकं ताडयामास वज्रेणेव महाबलम् ॥
yuyutsuśca tato rājañśitadhāreṇa patriṇā | ulūkaṃ tāḍayāmāsa vajreṇeva mahābalam
तब हे राजन्, युयुत्सु ने तेज़ धार वाले बाण से महाबली उलूक को मानो वज्र से मारा।
श्लोक 3 (8.16.3)
उलूकस्तु ततः क्रुद्धस्तव पुत्रस्य संयुगे । क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा ताडयामास कर्णिना ॥
ulūkastu tataḥ kruddhastava putrasya saṃyuge | kṣurapreṇa dhanuśchittvā tāḍayāmāsa karṇinā
तब क्रुद्ध उलूक ने युद्ध में आपके उस पुत्र का धनुष क्षुरप्र बाण से काट दिया और कर्णी बाण से उसे मारा।
श्लोक 4 (8.16.4)
तदपास्य धनुश्छिन्नं युयुत्सुर्वेगवत्तरम् । अन्यदादत्त सुमहच्चापं संरक्तलोचनः ॥
tadapāsya dhanuśchinnaṃ yuyutsurvegavattaram | anyadādatta sumahaccāpaṃ saṃraktalocanaḥ
कटे हुए धनुष को फेंककर युयुत्सु ने क्रोध से लाल आँखें किए शीघ्र ही दूसरा बहुत बड़ा धनुष उठा लिया।
श्लोक 5 (8.16.5)
शाकुनिं तु ततः षष्ट्या विव्याध भरतर्षभ । सारथिं त्रिभिरानर्च्छत्तं च भूयो व्यविध्यत ॥
śākuniṃ tu tataḥ ṣaṣṭyā vivyādha bharatarṣabha | sārathiṃ tribhirānarcchattaṃ ca bhūyo vyavidhyata
फिर हे भरतश्रेष्ठ, उसने शकुनि के पुत्र को साठ बाणों से बींधा, उसके सारथि को तीन बाणों से मारा और उसे फिर बींध दिया।
श्लोक 6 (8.16.6)
उलूकस्तं तु विंशत्या विद्ध्वा स्वर्णविभूषितैः । अथास्य समरे क्रुद्धो ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ॥
ulūkastaṃ tu viṃśatyā viddhvā svarṇavibhūṣitaiḥ | athāsya samare kruddho dhvajaṃ ciccheda kāñcanam
उलूक ने उसे सोने से सजे बीस बाणों से बींधकर क्रोध में युद्ध के बीच उसका सोने का ध्वज काट डाला।
श्लोक 7 (8.16.7)
स च्छिन्नयष्टिः सुमहाञ्शीर्यमाणो महाध्वजः । पपात प्रमुखे राजन्युयुत्सोः काञ्चनध्वजः ॥
sa cchinnayaṣṭiḥ sumahāñśīryamāṇo mahādhvajaḥ | papāta pramukhe rājanyuyutsoḥ kāñcanadhvajaḥ
डंडा कट जाने से टूटता हुआ वह विशाल सोने का ध्वज, हे राजन्, युयुत्सु के सामने गिर पड़ा।
श्लोक 8 (8.16.8)
ध्वजमुन्मथितं दृष्ट्वा युयुत्सुः क्रोधमूर्च्छितः । उलूकं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे ॥
dhvajamunmathitaṃ dṛṣṭvā yuyutsuḥ krodhamūrcchitaḥ | ulūkaṃ pañcabhirbāṇairājaghāna stanāntare
अपने ध्वज को गिरा देखकर क्रोध से मूर्च्छित-सा हुआ युयुत्सु ने पाँच बाणों से उलूक की छाती के बीच प्रहार किया।
श्लोक 9 (8.16.9)
उलूकस्तस्य समरे तैलधौतेन मारिष । शिरश्चिच्छेद भल्लेन यन्तुर्भरतसत्तम ॥
ulūkastasya samare tailadhautena māriṣa | śiraściccheda bhallena yanturbharatasattama
हे माननीय, उलूक ने तेल से धुले चमकते भल्ल बाण से युद्ध में उसके सारथि का सिर काट डाला, हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक 10 (8.16.10)
तच्छिन्नमपतद्भूमौ युयुत्सोः सारथेस्तदा । तारारूपं यथा चित्रं निपपात महीतले ॥
tacchinnamapatadbhūmau yuyutsoḥ sārathestadā | tārārūpaṃ yathā citraṃ nipapāta mahītale
युयुत्सु के सारथि का वह कटा हुआ सिर तब भूमि पर गिरा, जैसे कोई चमकता तारा धरती पर गिरे।
श्लोक 11 (8.16.11)
जघान चतुरोऽश्वांश्च तं च विव्याध पञ्चभिः । सोऽतिविद्धो बलवता प्रत्यपायाद्रथान्तरम् ॥
jaghāna caturo'śvāṃśca taṃ ca vivyādha pañcabhiḥ | so'tividdho balavatā pratyapāyādrathāntaram
उसने चारों घोड़ों को भी मार डाला और युयुत्सु को पाँच बाणों से बींध दिया। उस बलवान् से बुरी तरह घायल होकर युयुत्सु दूसरे रथ में चला गया।
श्लोक 12 (8.16.12)
तं निर्जित्य रणे राजन्नुलूकस्त्वरितो ययौ । पाञ्चालान्सृञ्जयांश्चैव विनिघ्नन्निशितैः शरैः ॥
taṃ nirjitya raṇe rājannulūkastvarito yayau | pāñcālānsṛñjayāṃścaiva vinighnanniśitaiḥ śaraiḥ
रण में उसे हराकर, हे राजन्, उलूक तीखे बाणों से पाञ्चालों और सृञ्जयों को मारता हुआ शीघ्र आगे बढ़ गया।
श्लोक 13 (8.16.13)
शतानीकं महाराज श्रुतकर्मा सुतस्तव । व्यश्वसूतरथं चक्रे निमेषार्धादसम्भ्रमः ॥
śatānīkaṃ mahārāja śrutakarmā sutastava | vyaśvasūtarathaṃ cakre nimeṣārdhādasambhramaḥ
हे महाराज, आपके पुत्र श्रुतकर्मा ने बिना घबराए आधे क्षण में शतानीक को घोड़ों, सारथि और रथ से रहित कर दिया।
श्लोक 14 (8.16.14)
हताश्वे तु रथे तिष्ठञ्शतानीको महारथः । गदां चिक्षेप सङ्क्रुद्धस्तव पुत्रस्य मारिष ॥
hatāśve tu rathe tiṣṭhañśatānīko mahārathaḥ | gadāṃ cikṣepa saṅkruddhastava putrasya māriṣa
घोड़े मारे जाने पर भी रथ में खड़े महारथी शतानीक ने, हे माननीय, क्रोध में आपके पुत्र पर गदा फेंकी।
श्लोक 15 (8.16.15)
सा कृत्वा स्यन्दनं भस्म हयांश्चैव ससारथीन् । पपात धरणीं तूर्णं दारयन्तीव भारत ॥
sā kṛtvā syandanaṃ bhasma hayāṃścaiva sasārathīn | papāta dharaṇīṃ tūrṇaṃ dārayantīva bhārata
उसने रथ को और सारथि सहित घोड़ों को भस्म कर दिया और, हे भारत, धरती को मानो चीरती हुई शीघ्र ही भूमि पर गिर पड़ी।
श्लोक 16 (8.16.16)
तावुभौ विरथौ वीरौ कुरूणां कीर्तिवर्धनौ । व्यपाक्रमेतां युद्धात्तु प्रेक्षमाणौ परस्परम् ॥
tāvubhau virathau vīrau kurūṇāṃ kīrtivardhanau | vyapākrametāṃ yuddhāttu prekṣamāṇau parasparam
रथहीन हुए वे दोनों वीर, जो कुरुओं की कीर्ति बढ़ाने वाले थे, एक-दूसरे को देखते हुए युद्ध से हट गए।
श्लोक 17 (8.16.17)
पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तो विविंशो रथमारुहत् । शतानीकोऽपि त्वरितः प्रतिविन्ध्यरथं गतः ॥
putrastu tava sambhrānto viviṃśo rathamāruhat | śatānīko'pi tvaritaḥ prativindhyarathaṃ gataḥ
आपका पुत्र विविंश घबराकर रथ पर चढ़ गया; और शतानीक भी शीघ्र प्रतिविन्ध्य के रथ पर चला गया।
श्लोक 18 (8.16.18)
सुतसोमं तु शकुनिर्विद्ध्वा तु निशितैः शरैः । नाकम्पयत सङ्क्रुद्धो वार्योघ इव पर्वतम् ॥
sutasomaṃ tu śakunirviddhvā tu niśitaiḥ śaraiḥ | nākampayata saṅkruddho vāryogha iva parvatam
शकुनि ने सुतसोम को तीखे बाणों से बींधा, पर अत्यन्त क्रुद्ध होने पर भी वह उसे हिला न सका, जैसे जल का प्रवाह पर्वत को नहीं हिला पाता।
श्लोक 19 (8.16.19)
सुतसोमस्तु तं दृष्ट्वा पितुरत्यन्तवैरिणम् । शरैरनेकसाहस्रैश्छादयामास भारत ॥
sutasomastu taṃ dṛṣṭvā pituratyantavairiṇam | śarairanekasāhasraiśchādayāmāsa bhārata
सुतसोम ने अपने पिता के घोर शत्रु को देखकर, हे भारत, हजारों बाणों से उसे ढक दिया।
श्लोक 20 (8.16.20)
ताञ्शराञ्शकुनिस्तूर्णं चिच्छेदान्यैः पतत्रिभिः । लघ्वस्त्रश्चित्रयोधी च जितकाशी च संयुगे ॥
tāñśarāñśakunistūrṇaṃ cicchedānyaiḥ patatribhiḥ | laghvastraścitrayodhī ca jitakāśī ca saṃyuge
शस्त्र चलाने में फुर्तीले, विचित्र ढंग से लड़ने वाले और रण में सदा विजयी शकुनि ने उन बाणों को दूसरे बाणों से तुरन्त काट डाला।
श्लोक 21 (8.16.21)
निवार्य समरे चापि शरांस्तान्निशितैः शरैः । आजघान सुसङ्क्रुद्धः सुतसोमं त्रिभिः शरैः ॥
nivārya samare cāpi śarāṃstānniśitaiḥ śaraiḥ | ājaghāna susaṅkruddhaḥ sutasomaṃ tribhiḥ śaraiḥ
रण में उन बाणों को तीखे बाणों से रोककर उसने अत्यन्त क्रोध में सुतसोम को तीन बाणों से मारा।
श्लोक 22 (8.16.22)
नाकम्पयत सङ्क्रुद्धो वार्योघ इव पर्वतम् । तस्याश्वान्केतनं सूतं तिलशो व्यधमच्छरैः । श्यालस्तव महाराज तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ॥
nākampayata saṅkruddho vāryogha iva parvatam | tasyāśvānketanaṃ sūtaṃ tilaśo vyadhamaccharaiḥ | śyālastava mahārāja tata uccukruśurjanāḥ
क्रुद्ध होकर भी वह उसे हिला न सका, जैसे जल का प्रवाह पर्वत को नहीं हिलाता। आपके साले ने, हे महाराज, बाणों से उसके घोड़े, ध्वज और सारथि के टुकड़े-टुकड़े कर दिए, और तब लोग चिल्ला उठे।
श्लोक 23 (8.16.23)
हताश्वो विरथश्चैव छिन्नकेतुश्च मारिष । धन्वी धनुर्वरं गृह्य रथाद्भूमावतिष्ठत ॥
hatāśvo virathaścaiva chinnaketuśca māriṣa | dhanvī dhanurvaraṃ gṛhya rathādbhūmāvatiṣṭhata
घोड़े मारे जाने, रथ से रहित होने और ध्वज कट जाने पर, हे माननीय, वह धनुर्धर श्रेष्ठ धनुष लेकर रथ से उतरकर भूमि पर खड़ा हो गया।
श्लोक 24 (8.16.24)
व्यसृजत्सायकांश्चैव स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् । छादयामासुरथ ते तव श्यालस्य तं रथम् । शलभानामिव व्राताः शरव्राता महारथम् ॥
vyasṛjatsāyakāṃścaiva svarṇapuṅkhāñśilāśitān | chādayāmāsuratha te tava śyālasya taṃ ratham | śalabhānāmiva vrātāḥ śaravrātā mahāratham
उसने सोने के पंखों वाले, पत्थर पर तेज़ किए बाण छोड़े, और बाणों के वे समूह टिड्डियों के झुण्डों की तरह आपके साले के उस महान् रथ पर छा गए।
श्लोक 25 (8.16.25)
सञ्छाद्यमानोऽपि दृढं विव्यथे नैव सौबलः । प्रममाथ शरांस्तस्य शरव्रातैर्महायशाः ॥
sañchādyamāno'pi dṛḍhaṃ vivyathe naiva saubalaḥ | pramamātha śarāṃstasya śaravrātairmahāyaśāḥ
घने ढक जाने पर भी सौबल ज़रा भी विचलित नहीं हुआ; उस महायशस्वी ने अपने बाणों के समूहों से उन बाणों को कुचल डाला।
श्लोक 26 (8.16.26)
तत्रातुष्यन्त योधाश्च सिद्धाश्चापि दिवि स्थिताः । सुतसोमस्य तत्कर्म दृष्ट्वाऽश्रद्धेयमद्भुतम् । रथस्थं शकुनिं यत्तु पदातिः समयोधयत् ॥
tatrātuṣyanta yodhāśca siddhāścāpi divi sthitāḥ | sutasomasya tatkarma dṛṣṭvā'śraddheyamadbhutam | rathasthaṃ śakuniṃ yattu padātiḥ samayodhayat
वहाँ योद्धा प्रसन्न हुए और आकाश में स्थित सिद्ध भी, जब उन्होंने सुतसोम का वह अद्भुत और अविश्वसनीय कर्म देखा कि पैदल होकर भी उसने रथ पर बैठे शकुनि से युद्ध किया।
श्लोक 27 (8.16.27)
तस्य तीक्ष्णैर्महावेगैर्भल्लैः सन्नतपर्वभिः । व्यहनत्कार्मुकं राजंस्तूणीरांश्चैव सर्वशः ॥
tasya tīkṣṇairmahāvegairbhallaiḥ sannataparvabhiḥ | vyahanatkārmukaṃ rājaṃstūṇīrāṃścaiva sarvaśaḥ
तीखे, अत्यन्त वेग वाले और सीधे जोड़ वाले भल्ल बाणों से उसने, हे राजन्, उसका धनुष और तरकश सब ओर से नष्ट कर दिए।
श्लोक 28 (8.16.28)
स च्छिन्नधन्वा विरथः खड्गमुद्यम्य चानदत् । वैदूर्योत्पलवर्णाभं दन्तिदन्तमयत्सरुम् ॥
sa cchinnadhanvā virathaḥ khaḍgamudyamya cānadat | vaidūryotpalavarṇābhaṃ dantidantamayatsarum
धनुष कट जाने और रथ न रहने पर उसने वैदूर्य और नीलकमल के रंग की, हाथीदाँत की मूठ वाली तलवार उठाई और गरज उठा।
श्लोक 29 (8.16.29)
भ्राम्यमाणं ततस्तं तु विमलाम्बरवर्चसम् । कालदण्डोपमं मेने सुतसोमस्य धीमतः ॥
bhrāmyamāṇaṃ tatastaṃ tu vimalāmbaravarcasam | kāladaṇḍopamaṃ mene sutasomasya dhīmataḥ
बुद्धिमान् सुतसोम की वह तलवार जब घुमाई गई, तो निर्मल आकाश जैसी चमकती हुई वह काल के दण्ड के समान मानी गई।
श्लोक 30 (8.16.30)
सोऽचरत्सहसा खड्गी मण्डलानि सहस्रशः । चतुर्दश महाराज शिक्षाबलसमन्वितः ॥
so'caratsahasā khaḍgī maṇḍalāni sahasraśaḥ | caturdaśa mahārāja śikṣābalasamanvitaḥ
तलवार हाथ में लिए उसने, हे महाराज, अपनी शिक्षा के बल से सहसा हजारों मण्डल, चौदह प्रकार के, घूमकर दिखाए।
श्लोक 31 (8.16.31)
भ्रान्तमुद्धान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं सृतम् । सम्पातसमुदीर्णे च दर्शयामास संयुगे ॥
bhrāntamuddhāntamāviddhamāplutaṃ viplutaṃ sṛtam | sampātasamudīrṇe ca darśayāmāsa saṃyuge
उसने रण में भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, सृत, सम्पात और समुदीर्ण नामक तलवार के हाथ दिखाए।
श्लोक 32 (8.16.32)
सौबलस्तु ततस्तस्य शरांश्चिक्षेप वीर्यवान् । तानापतत एवाशु चिच्छेद परमासिना ॥
saubalastu tatastasya śarāṃścikṣepa vīryavān | tānāpatata evāśu ciccheda paramāsinā
तब पराक्रमी सौबल ने उस पर बाण फेंके, परन्तु उन्हें आते-आते ही सुतसोम ने अपनी उत्तम तलवार से तुरन्त काट डाला।
श्लोक 33 (8.16.33)
ततः क्रुद्धो महाराज सौबलः परवीरहा । प्राहिणोत्सुतसोमाय शरानाशीविषोपमान् ॥
tataḥ kruddho mahārāja saubalaḥ paravīrahā | prāhiṇotsutasomāya śarānāśīviṣopamān
तब हे महाराज, शत्रुवीरों के संहारक सौबल ने क्रुद्ध होकर सुतसोम की ओर विषैले सर्पों जैसे बाण भेजे।
श्लोक 34 (8.16.34)
चिच्छेद तांस्तु खड्गेन शिक्षया च बलेन च । दर्शयँल्लाघवं युद्धे तार्क्ष्यतुल्यपराक्रमः ॥
ciccheda tāṃstu khaḍgena śikṣayā ca balena ca | darśayam̐llāghavaṃ yuddhe tārkṣyatulyaparākramaḥ
उसने कौशल और बल से उन्हें तलवार से काट दिया, युद्ध में अपनी फुर्ती दिखाते हुए, जो गरुड़ के समान पराक्रमी था।
श्लोक 35 (8.16.35)
तस्य सञ्चरतो राजन्मण्डलावर्तने तदा । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन खड्गं चिच्छेद सुप्रभम् ॥
tasya sañcarato rājanmaṇḍalāvartane tadā | kṣurapreṇa sutīkṣṇena khaḍgaṃ ciccheda suprabham
जब वह, हे राजन्, मण्डल बनाकर घूमते हुए चल रहा था, तब शकुनि ने अत्यन्त तीखे क्षुरप्र बाण से उसकी चमकती तलवार काट दी।
श्लोक 36 (8.16.36)
स च्छिन्नः सहसा भूमौ निपपात महानसिः । अवशस्य स्थितं हस्ते सुत्सरोस्तत्र भारत ॥
sa cchinnaḥ sahasā bhūmau nipapāta mahānasiḥ | avaśasya sthitaṃ haste sutsarostatra bhārata
वह महान् तलवार कटकर अचानक भूमि पर गिर पड़ी; उस सुन्दर मूठ वाली तलवार का जो भाग बचा, वह वहाँ उस असहाय के हाथ में ही रह गया, हे भारत।
श्लोक 37 (8.16.37)
छिन्नमाज्ञाय निस्त्रिंशमवप्लुत्य पदानि षट् । प्राविध्यत ततः शेषं सुतसोमो महारथः ॥
chinnamājñāya nistriṃśamavaplutya padāni ṣaṭ | prāvidhyata tataḥ śeṣaṃ sutasomo mahārathaḥ
तलवार को कटी जानकर महारथी सुतसोम छह पग आगे कूदा और उसके बचे हुए भाग को फेंक दिया।
श्लोक 38 (8.16.38)
तच्छित्त्वा सगुणं चापं रणे तस्य महात्मनः । पपात धरणीं तूर्णं स्वर्णवज्रविभूषितम् ॥
tacchittvā saguṇaṃ cāpaṃ raṇe tasya mahātmanaḥ | papāta dharaṇīṃ tūrṇaṃ svarṇavajravibhūṣitam
उस महात्मा के डोरी चढ़े धनुष को रण में काटकर वह सोने और हीरों से सजा हुआ शीघ्र ही भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 39 (8.16.39)
सुतसोमस्ततोऽगच्छच्छ्रुतकीर्तेर्महारथम् । सौबलोऽपि धनुर्गृह्य घोरमन्यत्सुदुर्जयम् ॥
sutasomastato'gacchacchrutakīrtermahāratham | saubalo'pi dhanurgṛhya ghoramanyatsudurjayam
तब सुतसोम श्रुतकीर्ति के महान् रथ के पास चला गया। और सौबल ने भी दूसरा भयंकर और अत्यन्त दुर्जय धनुष लेकर,
श्लोक 40 (8.16.40)
अभ्ययात्पाण्डवानीकं निघ्नञ्शत्रुगणान्बहून् । तत्र नादो महानासीत्पाण्डवानां विशाम्पते ॥
abhyayātpāṇḍavānīkaṃ nighnañśatrugaṇānbahūn | tatra nādo mahānāsītpāṇḍavānāṃ viśāmpate
बहुत-से शत्रुओं को मारता हुआ पाण्डवों की सेना की ओर बढ़ा। वहाँ पाण्डवों में बड़ा कोलाहल हुआ, हे प्रजापति,
श्लोक 41 (8.16.41)
सौबलं समरे दृष्ट्वा विचरन्तमभीतवत् । तान्यनीकानि दृप्तानि शस्त्रवन्ति महान्ति च । द्राव्यमाणान्यदृश्यन्त सौबलेन महात्मना ॥
saubalaṃ samare dṛṣṭvā vicarantamabhītavat | tānyanīkāni dṛptāni śastravanti mahānti ca | drāvyamāṇānyadṛśyanta saubalena mahātmanā
रण में निर्भय विचरते सौबल को देखकर; और वे घमण्डी, विशाल, शस्त्रधारी सेनाएँ महात्मा सौबल द्वारा खदेड़ी जाती दिखाई दीं।
श्लोक 42 (8.16.42)
यथा दैत्यचमूं राजन्देवराजो ममर्द ह । तथैव पाण्डवीं सेनां सौबलेयो व्यनाशयत् ॥
yathā daityacamūṃ rājandevarājo mamarda ha | tathaiva pāṇḍavīṃ senāṃ saubaleyo vyanāśayat
जैसे देवराज ने दैत्यों की सेना को कुचल डाला था, हे राजन्, वैसे ही सौबल-पुत्र ने पाण्डवों की सेना का नाश कर दिया।