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कर्ण पर्व · अध्याय 17

कृप और कृतवर्मा द्वारा धृष्टद्युम्न और शिखण्डी की पराजय

कृपाचार्य युद्ध में धृष्टद्युम्न को ऐसा रोक लेते हैं कि पाण्डव योद्धा उसके प्राणों के लिए आशंकित हो उठते हैं, और भयभीत धृष्टद्युम्न सारथि से कहकर अर्जुन और भीम की ओर चल देता है। उधर कृतवर्मा और शिखण्डी एक-दूसरे को घायल करते हुए दोनों रक्त से नहा उठते हैं; कृतवर्मा का भयंकर बाण शिखण्डी को मूर्च्छित कर देता है और उसका सारथि उसे रणभूमि से हटा ले जाता है। द्रुपदपुत्र के हार जाने पर पाण्डवों की सेना चारों ओर से मार खाती हुई भाग खड़ी होती है।

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.17.1)

धृष्टद्युम्नं कृपो राजन्वारयामास संयुगे । यथा दृष्ट्वा वने सिंहं शरभो वारयेद्युधि ॥

dhṛṣṭadyumnaṃ kṛpo rājanvārayāmāsa saṃyuge | yathā dṛṣṭvā vane siṃhaṃ śarabho vārayedyudhi

हे राजन्, युद्ध में कृपाचार्य ने धृष्टद्युम्न को उसी तरह रोक लिया, जैसे वन में सिंह को देखकर शरभ उसे रणभूमि में रोक देता है।

श्लोक 2 (8.17.2)

निरुद्वः पार्षतस्तेन गौतमेन बलीयसा । पदात्पदं विचलितुं नाशकत्तत्र भारत ॥

nirudvaḥ pārṣatastena gautamena balīyasā | padātpadaṃ vicalituṃ nāśakattatra bhārata

हे भरतवंशी, बलवान् गौतम (कृप) के रोक लेने से पार्षत (धृष्टद्युम्न) वहाँ एक पग भी आगे नहीं बढ़ सका।

श्लोक 3 (8.17.3)

गौतमस्य रथं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नरथं प्रति । वित्रेसुः सर्वभूतानि क्षयं प्राप्तं च मेनिरे ॥

gautamasya rathaṃ dṛṣṭvā dhṛṣṭadyumnarathaṃ prati | vitresuḥ sarvabhūtāni kṣayaṃ prāptaṃ ca menire

धृष्टद्युम्न के रथ के सामने गौतम का रथ देखकर सभी प्राणी काँप उठे और उन्होंने मान लिया कि उसका विनाश आ पहुँचा है।

श्लोक 4 (8.17.4)

तदा जल्पन्ति पाण्डूनां रथिनः सादिनस्तथा । द्रोणस्य निधनान्नूनं सङ्क्रुद्धो द्विपदां वरः ॥

tadā jalpanti pāṇḍūnāṃ rathinaḥ sādinastathā | droṇasya nidhanānnūnaṃ saṅkruddho dvipadāṃ varaḥ

तब पाण्डवों के रथी और घुड़सवार कहने लगे — "निश्चय ही द्रोण के वध से वह नरश्रेष्ठ क्रोध से भर उठा है।"

योधा ऊचुः

श्लोक 5 (8.17.5)

शारद्वतो महातेजा दिव्यास्त्रविदुदारधीः । अपि स्वस्ति भवेदद्य धृष्टद्युम्नस्य गौतमात् ॥

śāradvato mahātejā divyāstravidudāradhīḥ | api svasti bhavedadya dhṛṣṭadyumnasya gautamāt

"क्या दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता, उदार बुद्धिवाले, परम तेजस्वी शारद्वत आज गौतम के हाथों धृष्टद्युम्न का कुशल रहने देंगे?"

श्लोक 6 (8.17.6)

अपीयं वाहिनी कृत्स्ना मुच्येत महतो भयात् । अप्ययं ब्राह्मणः सर्वान्न नो हन्यात्समागतान् ॥

apīyaṃ vāhinī kṛtsnā mucyeta mahato bhayāt | apyayaṃ brāhmaṇaḥ sarvānna no hanyātsamāgatān

"क्या यह सारी सेना इस भारी भय से बच सकेगी? क्या यह ब्राह्मण यहाँ एकत्र हुए हम सब का संहार नहीं कर डालेगा?"

श्लोक 7 (8.17.7)

यादृशं दृश्यते रूपमन्तकप्रतिमं रणे । गमिष्यत्यद्य पदवीं भारद्वाजस्य गौतमः ॥

yādṛśaṃ dṛśyate rūpamantakapratimaṃ raṇe | gamiṣyatyadya padavīṃ bhāradvājasya gautamaḥ

"रणभूमि में उसका रूप यमराज जैसा दिखाई दे रहा है। आज गौतम भारद्वाज (द्रोण) के ही मार्ग पर चलेगा।"

श्लोक 8 (8.17.8)

आचार्यः क्षिप्रहस्तश्च विजयी च सदा युधि । अस्त्रवान्वीर्यसम्पन्नः क्रोधेन च समन्वितः ॥

ācāryaḥ kṣiprahastaśca vijayī ca sadā yudhi | astravānvīryasampannaḥ krodhena ca samanvitaḥ

"आचार्य शीघ्र हाथ चलानेवाले हैं, युद्ध में सदा विजयी रहते हैं, अस्त्रों में निपुण और पराक्रम से सम्पन्न हैं, और अब क्रोध से भी भरे हुए हैं।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 9 (8.17.9)

पार्षतश्च महायुद्धे विमुखोऽद्याभिलक्ष्यते । इत्येवं विविधा वाचस्तावकानां परैः सह । व्यश्रूयन्त महाराज तयोस्तत्र समागमे ॥

pārṣataśca mahāyuddhe vimukho'dyābhilakṣyate | ityevaṃ vividhā vācastāvakānāṃ paraiḥ saha | vyaśrūyanta mahārāja tayostatra samāgame

"और महायुद्ध में पार्षत आज पीठ फेरता हुआ दिखाई दे रहा है।" हे महाराज, उन दोनों की उस भिड़न्त के समय आपके पक्ष के लोगों और शत्रुओं के मुख से इसी प्रकार की अनेक बातें सुनाई पड़ रही थीं।

श्लोक 10 (8.17.10)

विनिःश्वस्य ततः क्रोधात्कृपः शारद्वतो नृप । पार्षतं चार्दयामास निश्चेष्टं सर्वमर्मसु ॥

viniḥśvasya tataḥ krodhātkṛpaḥ śāradvato nṛpa | pārṣataṃ cārdayāmāsa niśceṣṭaṃ sarvamarmasu

हे राजन्, तब क्रोध से लम्बी साँस खींचकर शारद्वत कृप ने पार्षत को सब मर्मस्थानों में ऐसा पीड़ित किया कि वह निश्चेष्ट हो गया।

श्लोक 11 (8.17.11)

स हन्यमानः समरे गौतमेन महात्मना । कर्तव्यं न स्म जानाति मोहेन महता वृतः ॥

sa hanyamānaḥ samare gautamena mahātmanā | kartavyaṃ na sma jānāti mohena mahatā vṛtaḥ

महात्मा गौतम की मार खाकर वह भारी मोह में डूब गया और उसे यह भी सूझ नहीं रहा था कि अब क्या करना चाहिए।

श्लोक 12 (8.17.12)

तमब्रवीत्ततो यन्ता कञ्चित्क्षेमं तु पार्षत । ईदृशं व्यसनं युद्धे न ते दृष्टं मया क्वचित् ॥

tamabravīttato yantā kañcitkṣemaṃ tu pārṣata | īdṛśaṃ vyasanaṃ yuddhe na te dṛṣṭaṃ mayā kvacit

तब उसके सारथि ने उससे कहा — "पार्षत, कहो, तुम कुशल से तो हो? युद्ध में ऐसा संकट मैंने तुम पर पहले कभी नहीं देखा था।

सारथिरुवाच

श्लोक 13 (8.17.13)

दैवयोगात्तु ते बाणा नापतन्मर्मभेदिनः । प्रेषिता द्विजमुख्येन मर्माण्युद्दिश्य सर्वतः ॥

daivayogāttu te bāṇā nāpatanmarmabhedinaḥ | preṣitā dvijamukhyena marmāṇyuddiśya sarvataḥ

भाग्य के योग से ही उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के चारों ओर से तुम्हारे मर्मस्थानों को लक्ष्य करके छोड़े हुए मर्मभेदी बाण तुम पर नहीं गिरे।

श्लोक 14 (8.17.14)

व्यावर्तये रथं तूर्णं नदीवेगमिवार्णवात् । अवध्यं ब्राह्मणं मन्ये येन ते विक्रमो हतः ॥

vyāvartaye rathaṃ tūrṇaṃ nadīvegamivārṇavāt | avadhyaṃ brāhmaṇaṃ manye yena te vikramo hataḥ

मैं रथ को तुरन्त लौटाए लेता हूँ, जैसे नदी का वेग समुद्र की ओर से लौटा दिया जाए। मैं इस ब्राह्मण को अवध्य मानता हूँ, क्योंकि इसने तुम्हारा पराक्रम तोड़ डाला है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 15 (8.17.15)

धृष्टद्युम्नस्ततो राजञ्शनकैरब्रवीद्वचः । मुह्यते मे मनस्तात गात्रस्वेदश्च जायते ॥

dhṛṣṭadyumnastato rājañśanakairabravīdvacaḥ | muhyate me manastāta gātrasvedaśca jāyate

हे राजन्, तब धृष्टद्युम्न ने धीमे स्वर में कहा — "तात, मेरा मन घूम रहा है और अंगों से पसीना छूट रहा है।

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 16 (8.17.16)

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च सारथे । वर्जयन्ब्राह्मणं युद्धे शनैर्याहि यतोऽर्जुनः ॥

vepathuśca śarīre me romaharṣaśca sārathe | varjayanbrāhmaṇaṃ yuddhe śanairyāhi yato'rjunaḥ

सारथे, मेरे शरीर में कँपकँपी हो रही है और रोएँ खड़े हो गए हैं। युद्ध में इस ब्राह्मण से बचकर धीरे-धीरे वहाँ चलो जहाँ अर्जुन है।

श्लोक 17 (8.17.17)

अर्जुनं भीमसेनं वा समरे प्राप्य सारथे । क्षेममद्य भवेन्मह्यमिति मे नैष्ठिकी मतिः ॥

arjunaṃ bhīmasenaṃ vā samare prāpya sārathe | kṣemamadya bhavenmahyamiti me naiṣṭhikī matiḥ

सारथे, युद्ध में अर्जुन या भीमसेन के पास पहुँच जाने पर आज मेरा कुशल होगा — यही मेरा दृढ़ निश्चय है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 18 (8.17.18)

ततः प्रायान्महाराज सारथिस्त्वरयन्हयान् । यतो भीमो महेष्वासो युयुधे तव सैनिकैः ॥

tataḥ prāyānmahārāja sārathistvarayanhayān | yato bhīmo maheṣvāso yuyudhe tava sainikaiḥ

तब हे महाराज, सारथि घोड़ों को हाँकता हुआ वहाँ चल पड़ा, जहाँ महाधनुर्धर भीम आपके सैनिकों से लड़ रहे थे।

श्लोक 19 (8.17.19)

प्रद्रुतं च रथं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नस्य मारिष । किरञ्शरशतान्येव गौतमोऽनुययौ तदा ॥

pradrutaṃ ca rathaṃ dṛṣṭvā dhṛṣṭadyumnasya māriṣa | kirañśaraśatānyeva gautamo'nuyayau tadā

हे मान्यवर, धृष्टद्युम्न के रथ को भागता देखकर गौतम सैकड़ों बाण बरसाते हुए उसके पीछे दौड़े।

श्लोक 20 (8.17.20)

शङ्खं च पूरयामास मुहुर्मुहुररिन्दमः । पार्षतं त्रासयामास महेन्द्रो नमुचिं यथा ॥

śaṅkhaṃ ca pūrayāmāsa muhurmuhurarindamaḥ | pārṣataṃ trāsayāmāsa mahendro namuciṃ yathā

शत्रुओं का दमन करनेवाले कृप ने बार-बार शंख बजाया और पार्षत को उसी तरह भयभीत कर दिया जैसे महेन्द्र ने नमुचि को किया था।

श्लोक 21 (8.17.21)

शिखण्डिनं तु समरे भीष्ममृत्युं दुरासदम् । हार्दिक्यो वारयामास स्मयन्निव मुहुर्मुहुः ॥

śikhaṇḍinaṃ tu samare bhīṣmamṛtyuṃ durāsadam | hārdikyo vārayāmāsa smayanniva muhurmuhuḥ

भीष्म की मृत्यु के कारण बने दुर्जेय शिखण्डी को हार्दिक्य (कृतवर्मा) ने बार-बार मुस्कराते हुए युद्ध में रोक लिया।

श्लोक 22 (8.17.22)

शिखण्डी तु समासाद्य हृदिकानां महारथम् । पञ्चभिर्निशितैर्भल्लैर्जत्रुदेशे समाहनत् ॥

śikhaṇḍī tu samāsādya hṛdikānāṃ mahāratham | pañcabhirniśitairbhallairjatrudeśe samāhanat

शिखण्डी ने हृदिकवंशी महारथी (कृतवर्मा) के निकट पहुँचकर पाँच तीखे भल्लों से उनके कन्धे के पास (हँसली के स्थान में) प्रहार किया।

श्लोक 23 (8.17.23)

कृतवर्मा तु सङ्क्रुद्धो भित्त्वा षष्ट्या पतत्रिभिः । धनुरेकेन चिच्छेद हसन्राजन्महारथः ॥

kṛtavarmā tu saṅkruddho bhittvā ṣaṣṭyā patatribhiḥ | dhanurekena ciccheda hasanrājanmahārathaḥ

हे राजन्, क्रुद्ध कृतवर्मा ने साठ बाणों से उसे बेध दिया, और उस महारथी ने हँसते हुए एक बाण से उसका धनुष काट डाला।

श्लोक 24 (8.17.24)

अथान्यद्धनुरादाय द्रुपदस्यात्मजो बली । तिष्ठतिष्ठेति सङ्क्रुद्धो हार्दिक्यं प्रत्यभाषत ॥

athānyaddhanurādāya drupadasyātmajo balī | tiṣṭhatiṣṭheti saṅkruddho hārdikyaṃ pratyabhāṣata

तब द्रुपद के बलवान् पुत्र ने दूसरा धनुष लेकर क्रोध से हार्दिक्य से कहा — "ठहर, ठहर!"

श्लोक 25 (8.17.25)

ततोऽस्य नवतिं बाणान्रुक्मपुङ्खान्सुतेजनान् । प्रेषयामास राजेन्द्र तेऽस्याभ्रश्यन्त वर्मणः ॥

tato'sya navatiṃ bāṇānrukmapuṅkhānsutejanān | preṣayāmāsa rājendra te'syābhraśyanta varmaṇaḥ

हे राजेन्द्र, तब शिखण्डी ने सोने के पंखवाले नब्बे तेज़ बाण उस पर छोड़े, परन्तु वे उसके कवच से फिसलकर गिर पड़े।

श्लोक 26 (8.17.26)

वितथांस्तान्समालक्ष्य पतितांश्च महीतले । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन कार्मुकं चिच्छिदे भृशम् ॥

vitathāṃstānsamālakṣya patitāṃśca mahītale | kṣurapreṇa sutīkṣṇena kārmukaṃ cicchide bhṛśam

उन बाणों को निष्फल और भूमि पर गिरा देखकर कृतवर्मा ने अत्यन्त तीखे क्षुरप्र बाण से उसका धनुष भी काट डाला।

श्लोक 27 (8.17.27)

अथैनं छिन्नधन्वानं भग्नशृङ्गमिवर्षभम् । अशीत्या मार्गणैः क्रुद्धो बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥

athainaṃ chinnadhanvānaṃ bhagnaśṛṅgamivarṣabham | aśītyā mārgaṇaiḥ kruddho bāhvorurasi cārpayat

फिर धनुष कट जाने से सींग टूटे हुए बैल के समान दीखनेवाले शिखण्डी की भुजाओं और छाती में उसने क्रोध से अस्सी बाण गड़ा दिए।

श्लोक 28 (8.17.28)

कृतवर्मा तु सङ्क्रुद्धो मार्गणैः क्षतविक्षतः । ववाम रुधिरं गात्रैः कुम्भवक्रादिवोदकम् ॥

kṛtavarmā tu saṅkruddho mārgaṇaiḥ kṣatavikṣataḥ | vavāma rudhiraṃ gātraiḥ kumbhavakrādivodakam

कृतवर्मा क्रोध में था, फिर भी बाणों से घायल और क्षत-विक्षत होकर उसके अंगों से रक्त ऐसे बहने लगा जैसे घड़े के मुँह से पानी बहता है।

श्लोक 29 (8.17.29)

रुधिरेण परिक्लिन्नः कृतवर्मा त्वराजत । वर्षेण क्लेदितो राजन्यथा गैरिकपर्वतः ॥

rudhireṇa pariklinnaḥ kṛtavarmā tvarājata | varṣeṇa kledito rājanyathā gairikaparvataḥ

हे राजन्, रक्त से भीगा हुआ कृतवर्मा ऐसा शोभित हुआ जैसे वर्षा से भीगा हुआ गेरू का पर्वत।

श्लोक 30 (8.17.30)

अथान्यद्धनुरादाय समार्गणगुणं प्रभुः । शिखण्डिनं बाणगणैः स्कन्धदेशे व्यताडयत् ॥

athānyaddhanurādāya samārgaṇaguṇaṃ prabhuḥ | śikhaṇḍinaṃ bāṇagaṇaiḥ skandhadeśe vyatāḍayat

तब उस प्रभु (कृतवर्मा) ने बाणों और प्रत्यंचा सहित दूसरा धनुष उठाकर शिखण्डी के कन्धे पर बाणों की झड़ी लगा दी।

श्लोक 31 (8.17.31)

स्कन्धदेशस्थितैर्बाणैः शिखण्डी तु व्यराजत । शाखाप्रशाखाविपुलः सुमहान्पादपो यथा ॥

skandhadeśasthitairbāṇaiḥ śikhaṇḍī tu vyarājata | śākhāpraśākhāvipulaḥ sumahānpādapo yathā

कन्धों में धँसे बाणों से शिखण्डी ऐसा शोभित हुआ जैसे शाखाओं और टहनियों से फैला हुआ कोई विशाल वृक्ष।

श्लोक 32 (8.17.32)

तावन्योन्यं भृशं विद्ध्वा रुधिरेण समुक्षितौ । पोप्लूयमानौ हि यथा महान्तौ शोणितहदे । तद्वद्विरेजतुर्वीरौ शोणितेन परिप्लुतौ ॥

tāvanyonyaṃ bhṛśaṃ viddhvā rudhireṇa samukṣitau | poplūyamānau hi yathā mahāntau śoṇitahade | tadvadvirejaturvīrau śoṇitena pariplutau

एक-दूसरे को गहरा बेधकर, रक्त से लथपथ वे दोनों वीर ऐसे शोभित हुए जैसे रक्त के सरोवर में तैरते हुए दो महाकाय प्राणी।

श्लोक 33 (8.17.33)

यथा च किंशुकौ फुल्लौ पुष्पमासे समागते । रुधिरोक्षितसर्वाङ्गौ रक्तचन्दनरूषितौ । भुजगाविव सङ्क्रुद्धौ रेजतुस्तौ नरोत्तमौ ॥

yathā ca kiṃśukau phullau puṣpamāse samāgate | rudhirokṣitasarvāṅgau raktacandanarūṣitau | bhujagāviva saṅkruddhau rejatustau narottamau

जिनके सारे अंग रक्त से भीगे थे, मानो लाल चन्दन का लेप किया गया हो, वे दोनों नरश्रेष्ठ फूलों के महीने (वसन्त) के आने पर खिले हुए दो पलाश-वृक्षों के समान और क्रुद्ध दो सर्पों के समान शोभित हुए।

श्लोक 34 (8.17.34)

तावुभौ शरनुन्नाङ्गौ परस्परशरक्षतौ । अन्योन्यशृङ्गाभिहतौ रेजतुर्वृषभाविव ॥

tāvubhau śaranunnāṅgau parasparaśarakṣatau | anyonyaśṛṅgābhihatau rejaturvṛṣabhāviva

बाणों से बिंधे अंगोंवाले, एक-दूसरे के बाणों से घायल वे दोनों वीर एक-दूसरे के सींगों से चोट खाए हुए दो साँड़ों के समान शोभित हुए।

श्लोक 35 (8.17.35)

अन्योन्यस्य वधे यत्नं कुर्वाणौ तौ महारथौ । रथाभ्यां चेरतुस्तत्र मण्डलानि सहस्रशः ॥

anyonyasya vadhe yatnaṃ kurvāṇau tau mahārathau | rathābhyāṃ ceratustatra maṇḍalāni sahasraśaḥ

एक-दूसरे के वध का यत्न करते हुए वे दोनों महारथी वहाँ अपने रथों से हज़ारों मण्डल बनाकर घूमते रहे।

श्लोक 36 (8.17.36)

कृतवर्मा महाराज पार्षतं निशितैः शरैः । रणे विव्याध सप्तत्या स्वर्णपुङ्गैः शिलाशितैः ॥

kṛtavarmā mahārāja pārṣataṃ niśitaiḥ śaraiḥ | raṇe vivyādha saptatyā svarṇapuṅgaiḥ śilāśitaiḥ

हे महाराज, कृतवर्मा ने युद्ध में पार्षत को शिला पर तेज़ किए हुए, सोने के पंखवाले सत्तर पैने बाणों से बेध दिया।

श्लोक 37 (8.17.37)

ततोऽस्य समरे बाणं भोजः प्रहरतां वरः । जीवितान्तकरं घोरं व्यसृजत्त्वरयाऽन्वितः ॥

tato'sya samare bāṇaṃ bhojaḥ praharatāṃ varaḥ | jīvitāntakaraṃ ghoraṃ vyasṛjattvarayā'nvitaḥ

तब योद्धाओं में श्रेष्ठ भोज (कृतवर्मा) ने युद्ध में उतावली से उस पर प्राण लेने में समर्थ एक भयानक बाण छोड़ा।

श्लोक 38 (8.17.38)

स तेनाभिहतो राजन्मूर्च्छामाशु समाविशत् । ध्वजयष्टिं च सहसा शिश्रिये कश्मलावृतः ॥

sa tenābhihato rājanmūrcchāmāśu samāviśat | dhvajayaṣṭiṃ ca sahasā śiśriye kaśmalāvṛtaḥ

हे राजन्, उस बाण से घायल होकर वह तुरन्त मूर्च्छित हो गया और मोह से घिरकर सहसा ध्वजदण्ड का सहारा लेकर टिक गया।

श्लोक 39 (8.17.39)

अपोवाह रणात्तूर्णं सारथी रथिनां वरम् । हार्दिक्यशरसन्तप्तं निःश्वसन्तं पुनःपुनः ॥

apovāha raṇāttūrṇaṃ sārathī rathināṃ varam | hārdikyaśarasantaptaṃ niḥśvasantaṃ punaḥpunaḥ

हार्दिक्य के बाणों से जले हुए और बार-बार लम्बी साँस लेते हुए उस श्रेष्ठ रथी को सारथि तुरन्त रणभूमि से हटा ले गया।

श्लोक 40 (8.17.40)

पराजिते ततः शूरे द्रुपदस्यात्मजे प्रभो । व्यद्रवत्पाण्डवी सेना व्यधमाना समन्ततः ॥

parājite tataḥ śūre drupadasyātmaje prabho | vyadravatpāṇḍavī senā vyadhamānā samantataḥ

हे प्रभो, द्रुपद के शूर पुत्र के हार जाने पर पाण्डवों की सेना चारों ओर मार खाती हुई भाग निकली।

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