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कर्ण पर्व · अध्याय 18

अर्जुन द्वारा संशप्तकों की पराजय

श्वेतवाहन अर्जुन कौरव-सेना को वैसे ही बिखेर देते हैं जैसे हवा रुई के ढेर को। त्रिगर्त, शिबि, शाल्व तथा उनके साथी — सत्यदेव, मित्रदेव, चन्द्रदेव आदि के नेतृत्व में — एक साथ उन पर टूट पड़ते हैं; अर्जुन एक-एक को बाणों से बेधते हैं और श्रुतञ्जय, सौश्रुति तथा चन्द्रदेव को मार गिराते हैं। सत्यदेव का तोमर कृष्ण को घायल कर देता है तो क्रोध में अर्जुन उसका सिर काट डालते हैं, फिर मित्रदेव को मारते और सुशर्मा को घायल करते हैं। संशप्तकों से घिरने पर वे ऐन्द्र अस्त्र प्रकट करते हैं; रणभूमि गिरे हुओं से पट जाती है और रथ के पहिये रक्त में धँसने लगते हैं, और अन्त में संशप्तकों के दलों को जीतकर अर्जुन धूमरहित अग्नि की तरह दमक उठते हैं।

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.18.1)

श्वेताश्वोऽपि महाराज व्यधमत्तावकं बलम् । यथा वायुः समासाद्य तूलराशिं समन्ततः ॥

śvetāśvo'pi mahārāja vyadhamattāvakaṃ balam | yathā vāyuḥ samāsādya tūlarāśiṃ samantataḥ

हे महाराज, श्वेताश्व (अर्जुन) ने भी आपकी सेना को वैसे ही नष्ट कर दिया, जैसे हवा रुई के ढेर पर पहुँचकर उसे चारों ओर उड़ा देती है।

श्लोक 2 (8.18.2)

प्रत्युद्ययुस्त्रिगर्तास्तं शिबयः कौरवैः सह । वसातयोऽथ साल्वाश्च गोपालाश्च यशस्विनः ॥

pratyudyayustrigartāstaṃ śibayaḥ kauravaiḥ saha | vasātayo'tha sālvāśca gopālāśca yaśasvinaḥ

त्रिगर्त, शिबि, कौरवों के साथ वसाति, शाल्व और यशस्वी गोपाल उनका सामना करने आगे बढ़े।

श्लोक 3 (8.18.3)

सत्यदेवः सत्यकीर्तिर्मित्रदेवः श्रुतञ्जयः । सौश्रुतिश्चन्द्रदेवश्च मित्रवर्मा च भारत ॥

satyadevaḥ satyakīrtirmitradevaḥ śrutañjayaḥ | sauśrutiścandradevaśca mitravarmā ca bhārata

हे भारत, सत्यदेव, सत्यकीर्ति, मित्रदेव, श्रुतञ्जय, सौश्रुति, चन्द्रदेव और मित्रवर्मा —

श्लोक 4 (8.18.4)

त्रिगर्तराजः समरे भ्रातृभिः परिवारितः । पुत्रैश्चैव महेष्वासैर्नानाशस्त्रविशारदैः ॥

trigartarājaḥ samare bhrātṛbhiḥ parivāritaḥ | putraiścaiva maheṣvāsairnānāśastraviśāradaiḥ

तथा त्रिगर्तों के राजा (सुशर्मा), जो युद्ध में अपने भाइयों और नाना शस्त्रों में निपुण महाधनुर्धर पुत्रों से घिरे हुए थे —

श्लोक 5 (8.18.5)

व्यसृजन्त शस्त्रपातान्किरन्तोऽर्जुनमाहवे । अभ्यवर्तन्त सहसा वार्योघा इव सागरम् ॥

vyasṛjanta śastrapātānkiranto'rjunamāhave | abhyavartanta sahasā vāryoghā iva sāgaram

युद्ध में अर्जुन पर शस्त्रों की वर्षा करते हुए उन्होंने अस्त्रों की झड़ी लगा दी और जैसे जल की धाराएँ समुद्र की ओर दौड़ती हैं, वैसे ही सहसा उन पर टूट पड़े।

श्लोक 6 (8.18.6)

ते त्वर्जुनं समासाद्य योधाः शतसहस्रशः । अगच्छन्विलयं सर्वे तार्क्ष्यं दृष्ट्वेव पन्नगाः ॥

te tvarjunaṃ samāsādya yodhāḥ śatasahasraśaḥ | agacchanvilayaṃ sarve tārkṣyaṃ dṛṣṭveva pannagāḥ

परन्तु अर्जुन के निकट पहुँचते ही वे लाखों योद्धा सब के सब वैसे ही नष्ट हो गए, जैसे गरुड़ को देखकर साँप।

श्लोक 7 (8.18.7)

ते हन्यमानाः समरे न जहुः पाण्डवं रणे । हन्यमाना महाराज शलभा इव पावकम् ॥

te hanyamānāḥ samare na jahuḥ pāṇḍavaṃ raṇe | hanyamānā mahārāja śalabhā iva pāvakam

युद्ध में मारे जाते हुए भी उन्होंने पाण्डव (अर्जुन) का साथ नहीं छोड़ा; हे महाराज, वे आग में पतंगों की तरह मरते ही गए।

श्लोक 8 (8.18.8)

सत्यदेवस्त्रिभिर्बाणैर्विव्याध युधि पाण्डवम् । मित्रदेवस्त्रिषष्ट्या तु चन्द्रदेवस्तु सप्तभिः ॥

satyadevastribhirbāṇairvivyādha yudhi pāṇḍavam | mitradevastriṣaṣṭyā tu candradevastu saptabhiḥ

सत्यदेव ने युद्ध में पाण्डव को तीन बाणों से बेधा, मित्रदेव ने तिरसठ से और चन्द्रदेव ने सात से।

श्लोक 9 (8.18.9)

मित्रवर्मा त्रिसप्तत्या सौश्रुतिश्चापि सप्तभिः । श्रुतंजयस्तु विंशत्या सुशर्मा नवभिः शरैः ॥

mitravarmā trisaptatyā sauśrutiścāpi saptabhiḥ | śrutaṃjayastu viṃśatyā suśarmā navabhiḥ śaraiḥ

मित्रवर्मा ने तिहत्तर बाणों से, सौश्रुति ने सात से, श्रुतञ्जय ने बीस से और सुशर्मा ने नौ बाणों से उन्हें बेधा।

श्लोक 10 (8.18.10)

स विद्धो बहुभिः सङ्ख्ये प्रतिविव्याध तान्नृपान् । सौश्रुतिं सप्तभिर्विद्ध्वा चन्द्रदेवं त्रिभिः शरैः ॥

sa viddho bahubhiḥ saṅkhye prativivyādha tānnṛpān | sauśrutiṃ saptabhirviddhvā candradevaṃ tribhiḥ śaraiḥ

युद्ध में इतने वीरों से बिंधकर उन्होंने भी उन राजाओं को बाणों से बेध दिया — सौश्रुति को सात बाणों से और चन्द्रदेव को तीन बाणों से,

श्लोक 11 (8.18.11)

श्रुतंजयं च विंशत्या चन्द्रदेवं तथाऽष्टभिः । मित्रदेवं शतेनैव सत्यदेवं त्रिभिः शरैः ॥

śrutaṃjayaṃ ca viṃśatyā candradevaṃ tathā'ṣṭabhiḥ | mitradevaṃ śatenaiva satyadevaṃ tribhiḥ śaraiḥ

श्रुतञ्जय को बीस से, चन्द्रदेव को फिर आठ से, मित्रदेव को पूरे सौ से और सत्यदेव को तीन बाणों से,

श्लोक 12 (8.18.12)

नवभिर्मित्रवर्माणं सुशर्माणं तथाऽष्टभिः । श्रुतञ्जयं च राजानं हत्वा तत्र शिलाशितैः ॥

navabhirmitravarmāṇaṃ suśarmāṇaṃ tathā'ṣṭabhiḥ | śrutañjayaṃ ca rājānaṃ hatvā tatra śilāśitaiḥ

मित्रवर्मा को नौ से और सुशर्मा को आठ से — और राजा श्रुतञ्जय को वहाँ पत्थर पर तेज़ किए हुए बाणों से मारकर,

श्लोक 13 (8.18.13)

सौश्रुतेः सशिरस्त्राणं शिरः कायादपाहरत् । त्वरितश्चन्द्रदेवं च शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥

sauśruteḥ saśirastrāṇaṃ śiraḥ kāyādapāharat | tvaritaścandradevaṃ ca śarairninye yamakṣayam

उन्होंने सौश्रुति का सिर शिरस्त्राण सहित उसके धड़ से काट गिराया और शीघ्रता से बाणों द्वारा चन्द्रदेव को यमलोक पहुँचा दिया।

श्लोक 14 (8.18.14)

तथेतरान्महाराज यतमानान्महारथान् । पञ्चभिः पञ्चभिर्बाणैरेकैकं प्रत्यवारयत् ॥

tathetarānmahārāja yatamānānmahārathān | pañcabhiḥ pañcabhirbāṇairekaikaṃ pratyavārayat

हे महाराज, फिर उन्होंने प्रयत्न करते हुए अन्य महारथियों में से हर एक को पाँच-पाँच बाणों से रोक दिया।

श्लोक 15 (8.18.15)

सत्यदेवस्तु सङ्क्रुद्धस्तोमरं व्यसृजन्महत् । समुद्दिश्य रणे कृष्णं सिंहनादं ननाद च ॥

satyadevastu saṅkruddhastomaraṃ vyasṛjanmahat | samuddiśya raṇe kṛṣṇaṃ siṃhanādaṃ nanāda ca

क्रोध में भरे सत्यदेव ने युद्ध में कृष्ण को लक्ष्य करके एक बड़ा तोमर फेंका और सिंह के समान गर्जना की।

श्लोक 16 (8.18.16)

स निर्भिद्य भुजं सव्यं माधवस्य महात्मनः । अयस्मयः स्वर्णदण्डो जगाम धरणीं तदा ॥

sa nirbhidya bhujaṃ savyaṃ mādhavasya mahātmanaḥ | ayasmayaḥ svarṇadaṇḍo jagāma dharaṇīṃ tadā

महात्मा माधव की बाईं भुजा को बेधकर वह लोहे का, सोने की डण्डीवाला तोमर तब भूमि पर जा गिरा।

श्लोक 17 (8.18.17)

माधवस्य तु विद्धस्य तोमरेण महारणे । प्रतोदः प्रापतद्वस्ताद्रश्मयश्च विशाम्पते ॥

mādhavasya tu viddhasya tomareṇa mahāraṇe | pratodaḥ prāpatadvastādraśmayaśca viśāmpate

हे प्रजानाथ, उस महायुद्ध में तोमर से माधव के बिंध जाने पर उनके हाथ से चाबुक गिर पड़ा और लगाम भी छूट गई।

श्लोक 18 (8.18.18)

वासुदेवं विभिन्नाङ्गं दृष्ट्वा पार्थो धनञ्जयः । क्रोधमाहारयत्तीव्रं कृष्णं चेदमुवाच ह ॥

vāsudevaṃ vibhinnāṅgaṃ dṛṣṭvā pārtho dhanañjayaḥ | krodhamāhārayattīvraṃ kṛṣṇaṃ cedamuvāca ha

वासुदेव को घायल अंगोंवाला देखकर पार्थ धनञ्जय तीव्र क्रोध से भर उठे और उन्होंने कृष्ण से यह कहा —

अर्जुन उवाच

श्लोक 19 (8.18.19)

प्रापयाश्वान्महाबाहो सत्यदेवं प्रति प्रभो । यावदेनं शरैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥

prāpayāśvānmahābāho satyadevaṃ prati prabho | yāvadenaṃ śaraistīkṣṇairnayāmi yamasādanam

"हे महाबाहु प्रभो, घोड़ों को सत्यदेव की ओर ले चलिए, जिससे मैं तीखे बाणों से इसे यमलोक पहुँचा दूँ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 20 (8.18.20)

प्रतोदं गृह्य सोऽन्यत्तु रश्मीन्सङ्गृह्य च द्रुतम् । वाहयामास तानश्वान्सत्यदेवरथं प्रति ॥

pratodaṃ gṛhya so'nyattu raśmīnsaṅgṛhya ca drutam | vāhayāmāsa tānaśvānsatyadevarathaṃ prati

दूसरा चाबुक लेकर और लगाम को शीघ्रता से थामकर उन्होंने घोड़ों को सत्यदेव के रथ की ओर हाँक दिया।

श्लोक 21 (8.18.21)

विष्वक्सेनं सुनिर्विद्धं दृष्ट्वा पार्थो धनञ्जयः । सत्यदेवं शरैस्तीक्ष्णैर्वारयित्वा महारथः ॥

viṣvaksenaṃ sunirviddhaṃ dṛṣṭvā pārtho dhanañjayaḥ | satyadevaṃ śaraistīkṣṇairvārayitvā mahārathaḥ

विष्वक्सेन (कृष्ण) को गहरा घायल देखकर महारथी पार्थ धनञ्जय ने तीखे बाणों से सत्यदेव को रोक लिया।

श्लोक 22 (8.18.22)

ततः सुनिशितैर्भल्लै राज्ञस्तस्य महच्छिरः । कुण्डलोपचितं कायाच्चकर्त पृतनान्तरे ॥

tataḥ suniśitairbhallai rājñastasya mahacchiraḥ | kuṇḍalopacitaṃ kāyāccakarta pṛtanāntare

तब उन्होंने अत्यन्त तीखे भल्लों से सेना के बीच उस राजा का कुण्डलों से सजा हुआ विशाल सिर उसके धड़ से काट डाला।

श्लोक 23 (8.18.23)

तन्निकृत्य शितैर्बाणैर्मित्रवर्माणमाक्षिपत् । वत्सदन्तेन तीक्ष्णेन सारथिं चास्य मारिष ॥

tannikṛtya śitairbāṇairmitravarmāṇamākṣipat | vatsadantena tīkṣṇena sārathiṃ cāsya māriṣa

उसे तीखे बाणों से काट गिराकर उन्होंने मित्रवर्मा पर प्रहार किया और हे मान्यवर, एक तीखे वत्सदन्त बाण से उसके सारथि पर भी।

श्लोक 24 (8.18.24)

ततः शरशतैर्भूयः संशप्तकगणान्बली । पातयामास सङ्क्रुद्धः शतशोऽथ सहस्रशः ॥

tataḥ śaraśatairbhūyaḥ saṃśaptakagaṇānbalī | pātayāmāsa saṅkruddhaḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

फिर क्रोध से भरे बलवान् अर्जुन ने सैकड़ों बाणों से संशप्तकों के दलों को सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में मार गिराया।

श्लोक 25 (8.18.25)

ततो रजतपुङ्खेन राजञ्शीर्षं महात्मनः । मित्रदेवस्य चिच्छेद क्षुरप्रेण महारथः । सुशर्माणं सुसङ्क्रुद्धो जत्रुदेशे समाहनत् ॥

tato rajatapuṅkhena rājañśīrṣaṃ mahātmanaḥ | mitradevasya ciccheda kṣurapreṇa mahārathaḥ | suśarmāṇaṃ susaṅkruddho jatrudeśe samāhanat

हे राजन्, फिर उस महारथी ने चाँदी के पंखवाले क्षुरप्र बाण से महात्मा मित्रदेव का सिर काट डाला और अत्यन्त क्रुद्ध होकर सुशर्मा की हँसली पर प्रहार किया।

श्लोक 26 (8.18.26)

ततः संशप्तकाः सर्वे परिवार्य धनञ्जयम् । शस्त्रौघैर्ममृदुः क्रुद्धा नादयन्तो दिशो दश ॥

tataḥ saṃśaptakāḥ sarve parivārya dhanañjayam | śastraughairmamṛduḥ kruddhā nādayanto diśo daśa

तब सभी संशप्तकों ने धनञ्जय को घेरकर क्रोध में शस्त्रों की बाढ़ से उन्हें दबा दिया और दसों दिशाओं को अपनी गर्जना से गुँजा दिया।

श्लोक 27 (8.18.27)

अभ्यर्दितस्तु तज्जिष्णुः शक्रतुल्यपराक्रमः । ऐन्द्रमस्त्रममेयात्मा प्रादुश्चक्रे महारथः ॥

abhyarditastu tajjiṣṇuḥ śakratulyaparākramaḥ | aindramastramameyātmā prāduścakre mahārathaḥ

उनसे पीड़ित होकर इन्द्र के समान पराक्रमी, अमित आत्मबलवाले महारथी जिष्णु (अर्जुन) ने ऐन्द्र अस्त्र प्रकट किया।

श्लोक 28 (8.18.28)

ततः शरसहस्राणि प्रादुरासन्विशाम्पते । कार्मुकात्पाण्डुपुत्रस्य पार्थस्यामिततेजसः ॥

tataḥ śarasahasrāṇi prādurāsanviśāmpate | kārmukātpāṇḍuputrasya pārthasyāmitatejasaḥ

हे प्रजानाथ, तब पाण्डुपुत्र अमित तेजस्वी पार्थ के धनुष से हज़ारों बाण प्रकट हुए।

श्लोक 29 (8.18.29)

ततस्तु च्छिद्यमानानां ध्वजानां धनुषां तथा । रथानां सपताकानां तूणीराणां युगैः सह ॥

tatastu cchidyamānānāṃ dhvajānāṃ dhanuṣāṃ tathā | rathānāṃ sapatākānāṃ tūṇīrāṇāṃ yugaiḥ saha

जब ध्वज और धनुष कटने लगे, पताकाओं सहित रथ और जुओं सहित तूणीर कटने लगे,

श्लोक 30 (8.18.30)

अक्षाणामथ चक्राणां योक्त्राणां रश्मिभिः सह । कूबराणां वरूथानां पृषत्कानां च संयुगे ॥

akṣāṇāmatha cakrāṇāṃ yoktrāṇāṃ raśmibhiḥ saha | kūbarāṇāṃ varūthānāṃ pṛṣatkānāṃ ca saṃyuge

धुरे और पहिये, जोतों और लगामों सहित, रथ के कूबर और आवरण, तथा उस युद्ध में बाण भी —

श्लोक 31 (8.18.31)

अश्वानां पततां चापि प्रासानामृष्टिभिः सह । गदानां परिघानां च शक्तितोमरपट्टसैः ॥

aśvānāṃ patatāṃ cāpi prāsānāmṛṣṭibhiḥ saha | gadānāṃ parighānāṃ ca śaktitomarapaṭṭasaiḥ

गिरते हुए घोड़े, खड्गों सहित प्रास, गदाएँ और परिघ, तथा शक्तियाँ, तोमर और पट्टिश —

श्लोक 32 (8.18.32)

शतघ्नीनां सचक्राणां भुजानां चोरुभिः सह । कण्ठसूत्राङ्गदानां च केयूराणां च मारिष ॥

śataghnīnāṃ sacakrāṇāṃ bhujānāṃ corubhiḥ saha | kaṇṭhasūtrāṅgadānāṃ ca keyūrāṇāṃ ca māriṣa

पहियोंसहित शतघ्नियाँ, जंघाओं सहित भुजाएँ, कण्ठसूत्र, अंगद और केयूर, हे मान्यवर —

श्लोक 33 (8.18.33)

हाराणामथ निष्काणां तनुत्राणां च भारत । छत्राणां व्यजनानां च शिरसां मुकुटैः सह । राशयश्चात्र दृश्यन्ते पतितानां महीतले ॥

hārāṇāmatha niṣkāṇāṃ tanutrāṇāṃ ca bhārata | chatrāṇāṃ vyajanānāṃ ca śirasāṃ mukuṭaiḥ saha | rāśayaścātra dṛśyante patitānāṃ mahītale

हार, निष्क और कवच, हे भारत, छत्र और चँवर, तथा मुकुटों सहित सिर — इन सबके गिरे हुए ढेर वहाँ भूमि पर दिखाई देते थे।

श्लोक 34 (8.18.34)

सकुण्डलानि स्वक्षीणि पूर्णचन्द्रनिभानि च । शिरांस्युर्व्यामदृश्यन्त ताराजालमिवाम्बरे ॥

sakuṇḍalāni svakṣīṇi pūrṇacandranibhāni ca | śirāṃsyurvyāmadṛśyanta tārājālamivāmbare

कुण्डलों और सुन्दर नेत्रोंवाले, पूर्णचन्द्र के समान सिर पृथ्वी पर ऐसे दिखाई देते थे जैसे आकाश में तारों का जाल।

श्लोक 35 (8.18.35)

सुस्रग्वीणि सुवासांसि चन्दनेनोक्षितानि च । शरीराणि व्यदृश्यन्त निहतानां महीतले ॥

susragvīṇi suvāsāṃsi candanenokṣitāni ca | śarīrāṇi vyadṛśyanta nihatānāṃ mahītale

सुन्दर मालाओं और सुन्दर वस्त्रोंवाले, चन्दन से लिप्त मृतकों के शरीर भूमि पर दिखाई दे रहे थे।

श्लोक 36 (8.18.36)

रुद्रस्याक्रीडसदृशं घोरमायोधनं तदा ॥

rudrasyākrīḍasadṛśaṃ ghoramāyodhanaṃ tadā

वह भयंकर रणभूमि उस समय रुद्र की क्रीड़ास्थली के समान दिखाई देती थी।

श्लोक 37 (8.18.37)

निहतै राजपुत्रैश्च क्षत्रियैश्च महाबलैः । अर्जुनेन महाराज तत्रतत्र महारणे ॥

nihatai rājaputraiśca kṣatriyaiśca mahābalaiḥ | arjunena mahārāja tatratatra mahāraṇe

हे महाराज, उस महायुद्ध में जहाँ-तहाँ अर्जुन के हाथों मारे गए राजकुमारों और महाबली क्षत्रियों से,

श्लोक 38 (8.18.38)

हस्तिभिः पतितैश्चैव तुरङ्गैश्चाभवन्मही । अगम्यरूपा समरे विशीर्णैरिव पर्वतैः ॥

hastibhiḥ patitaiścaiva turaṅgaiścābhavanmahī | agamyarūpā samare viśīrṇairiva parvataiḥ

तथा गिरे हुए हाथियों और घोड़ों से वह भूमि युद्ध में ऐसी अगम्य हो गई, मानो टूटे हुए पर्वतों से पट गई हो।

श्लोक 39 (8.18.39)

नासीद्रथपथस्तस्य पाण्डवस्य महात्मनः । निघ्नतः शात्रवान्भल्लैर्हस्त्यश्वं चास्यतो महत् ॥

nāsīdrathapathastasya pāṇḍavasya mahātmanaḥ | nighnataḥ śātravānbhallairhastyaśvaṃ cāsyato mahat

भल्लों से शत्रुओं को मारते और हाथी-घोड़ों के विशाल समूहों को गिराते हुए उस महात्मा पाण्डव के रथ के चलने के लिए मार्ग ही नहीं रह गया।

श्लोक 40 (8.18.40)

स्वानुगा इव सीदन्ति रथचक्राणि मारिष । चरतस्तस्य सङ्ग्रामे तस्मिंल्लोहितकर्दमे ॥

svānugā iva sīdanti rathacakrāṇi māriṣa | caratastasya saṅgrāme tasmiṃllohitakardame

हे मान्यवर, रक्त के उस कीचड़ में युद्ध करते हुए उनके रथ के पहिये मानो साथ चलनेवाले अनुचरों की तरह उसमें धँसते जाते थे।

श्लोक 41 (8.18.41)

सीदमानानि चक्राणि समूहुस्तुरगा भृशम् । श्रमेण महता युक्ता मनोमारुतरंहसः ॥

sīdamānāni cakrāṇi samūhusturagā bhṛśam | śrameṇa mahatā yuktā manomārutaraṃhasaḥ

मन और वायु के समान वेगवाले घोड़े भारी परिश्रम से थके होने पर भी धँसते हुए पहियों को पूरे बल से खींचते रहे।

श्लोक 42 (8.18.42)

वध्यमानं तु तत्सैन्यं पाण्डुपुत्रेण धन्विना । प्रायशो विमुखं सर्वं नावतिष्ठत भारत ॥

vadhyamānaṃ tu tatsainyaṃ pāṇḍuputreṇa dhanvinā | prāyaśo vimukhaṃ sarvaṃ nāvatiṣṭhata bhārata

धनुर्धर पाण्डुपुत्र के हाथों मारी जाती वह सेना प्रायः विमुख होकर भाग चली, हे भारत, और टिक न सकी।

श्लोक 43 (8.18.43)

ताञ्जित्वा समरे जिष्णुः संशप्तकगणान्बहून् । विरराज तदा पार्थो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥

tāñjitvā samare jiṣṇuḥ saṃśaptakagaṇānbahūn | virarāja tadā pārtho vidhūmo'gniriva jvalan

युद्ध में संशप्तकों के उन अनेक दलों को जीतकर जिष्णु पार्थ उस समय धूमरहित अग्नि की तरह देदीप्यमान हुए।

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