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कर्ण पर्व · अध्याय 19

दुर्योधन का रथहीन होना और महासंकुल युद्ध

दुर्योधन युधिष्ठिर की बाण-वर्षा का सामना करता है, पर युधिष्ठिर उसके घोड़ों और सारथि को मारकर उसका ध्वज, धनुष और खड्ग गिरा देते हैं और वह भूमि पर खड़ा रह जाता है। कर्ण, अश्वत्थामा, कृप आदि उसे बचाने दौड़ते हैं, पाण्डव युधिष्ठिर को घेरकर आगे बढ़ते हैं, और दोनों सेनाओं में मनुष्यों, घोड़ों, हाथियों तथा रथों का घमासान संकुल युद्ध छिड़ जाता है। हाथी पैदल सैनिकों को रौंदते और उछालते हैं, योद्धा घूँसों, केशग्रहण और बाहुयुद्ध से लड़ते हैं, कबन्ध उठ खड़े होते हैं, और अपने-पराये का भेद मिट जाता है। कर्ण पाञ्चालों को, अर्जुन त्रिगर्तों को और भीमसेन कौरवों को मारते हैं, और यह संहार दोपहर के बाद भी चलता रहता है।

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.19.1)

युधिष्ठिरं महाराज विसृजन्तं शरान्बहून् । स्वयं दुर्योधनो राजा प्रत्यगृह्णादभीतवत् ॥

yudhiṣṭhiraṃ mahārāja visṛjantaṃ śarānbahūn | svayaṃ duryodhano rājā pratyagṛhṇādabhītavat

हे महाराज, बहुत-से बाण बरसाते हुए युधिष्ठिर का राजा दुर्योधन ने स्वयं निर्भय होकर सामना किया।

श्लोक 2 (8.19.2)

तमापतन्तं सहसा तव पुत्रं महारथम् । धर्मराजो द्रुतं विद्ध्वा तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥

tamāpatantaṃ sahasā tava putraṃ mahāratham | dharmarājo drutaṃ viddhvā tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt

आपके उस महारथी पुत्र को सहसा झपटते देखकर धर्मराज ने शीघ्र उसे बेध दिया और कहा — "ठहर, ठहर!"

श्लोक 3 (8.19.3)

स तु तं प्रतिविव्याध नवभिर्निशितैः शरैः । सारथिं चास्य भल्लेन भृशं क्रुद्धोऽभ्यताडयत् ॥

sa tu taṃ prativivyādha navabhirniśitaiḥ śaraiḥ | sārathiṃ cāsya bhallena bhṛśaṃ kruddho'bhyatāḍayat

दुर्योधन ने भी नौ तीखे बाणों से उन्हें बदले में बेध दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर एक भल्ल से उनके सारथि को मारा।

श्लोक 4 (8.19.4)

ततो युधिष्ठिरो राजन्स्वर्णपुङ्खाञ्शिलीमुखान् । दुर्योधनाय चिक्षेप त्रयोदश शिलाशितान् ॥

tato yudhiṣṭhiro rājansvarṇapuṅkhāñśilīmukhān | duryodhanāya cikṣepa trayodaśa śilāśitān

हे राजन्, तब युधिष्ठिर ने दुर्योधन पर सोने के पंखवाले, पत्थर पर तेज़ किए हुए तेरह शिलीमुख बाण छोड़े।

श्लोक 5 (8.19.5)

चतुर्भिश्चतुरो वाहांस्तस्य हत्वा महारथः । पञ्चमेन शिरः कायात्सारथेश्च समाक्षिपत् ॥

caturbhiścaturo vāhāṃstasya hatvā mahārathaḥ | pañcamena śiraḥ kāyātsāratheśca samākṣipat

उन महारथी ने चार बाणों से उसके चारों घोड़े मार डाले और पाँचवें से सारथि का सिर धड़ से काट गिराया।

श्लोक 6 (8.19.6)

षष्ठेन तु ध्वजं राज्ञः सप्तमेन तु कार्मुकम् । अष्टमेन तथा खड्गं पातयामास भूतले । पञ्चभिर्नृपतिं चापि धर्मराजोऽर्दयद्भृशम् ॥

ṣaṣṭhena tu dhvajaṃ rājñaḥ saptamena tu kārmukam | aṣṭamena tathā khaḍgaṃ pātayāmāsa bhūtale | pañcabhirnṛpatiṃ cāpi dharmarājo'rdayadbhṛśam

छठे बाण से उन्होंने राजा का ध्वज, सातवें से धनुष और आठवें से खड्ग भूमि पर गिरा दिया, और पाँच बाणों से धर्मराज ने राजा को बुरी तरह पीड़ित किया।

श्लोक 7 (8.19.7)

हताश्वात्तु रथात्तस्मादवप्लुत्य सुतस्तव । उत्तमं व्यसनं प्राप्तो भूमावेवावतिष्ठत ॥

hatāśvāttu rathāttasmādavaplutya sutastava | uttamaṃ vyasanaṃ prāpto bhūmāvevāvatiṣṭhata

घोड़ों के मारे जाने पर उस रथ से कूदकर आपका पुत्र भारी संकट में पड़ा हुआ भूमि पर ही खड़ा रह गया।

श्लोक 8 (8.19.8)

तं तु कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा कर्णद्रौणिकृपादयः । अभ्यवर्तन्त सहसा परीप्सन्तो नराधिपम् ॥

taṃ tu kṛcchragataṃ dṛṣṭvā karṇadrauṇikṛpādayaḥ | abhyavartanta sahasā parīpsanto narādhipam

उसे संकट में पड़ा देखकर कर्ण, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, कृप आदि राजा को बचाने की इच्छा से सहसा दौड़ पड़े।

श्लोक 9 (8.19.9)

अथ पाण्डुसुताः सर्वे परिवार्य युधिष्ठिरम् । अन्वयुः समरे राजंस्ततो युद्धमवर्तत ॥

atha pāṇḍusutāḥ sarve parivārya yudhiṣṭhiram | anvayuḥ samare rājaṃstato yuddhamavartata

तब हे राजन्, सभी पाण्डवपुत्र युधिष्ठिर को घेरकर युद्ध में उनके पीछे चले, और उसके बाद संग्राम छिड़ गया।

श्लोक 10 (8.19.10)

ततस्तूर्यसहस्राणि प्रावाद्यन्त महामृधे ॥

tatastūryasahasrāṇi prāvādyanta mahāmṛdhe

तब उस महायुद्ध में हज़ारों तुरहियाँ बज उठीं।

श्लोक 11 (8.19.11)

क्ष्वेलाः किलकिलाशब्दाः प्रादुरासन्महीपते । यत्राभ्यगच्छन्समरे पाञ्चालाः कौरवैः सह ॥

kṣvelāḥ kilakilāśabdāḥ prādurāsanmahīpate | yatrābhyagacchansamare pāñcālāḥ kauravaiḥ saha

हे पृथ्वीपति, जहाँ पाञ्चाल कौरवों से भिड़ने गए, वहाँ सिंहनाद और कोलाहल की ध्वनियाँ उठने लगीं।

श्लोक 12 (8.19.12)

नरा नरैः समाजग्मुर्वारणा वरवारणैः । रथाश्च रथिभिः सार्धं हयाश्च हयसादिभिः ॥

narā naraiḥ samājagmurvāraṇā varavāraṇaiḥ | rathāśca rathibhiḥ sārdhaṃ hayāśca hayasādibhiḥ

मनुष्य मनुष्यों से, हाथी श्रेष्ठ हाथियों से, रथ रथियों से और घोड़े घुड़सवारों से जा भिड़े।

श्लोक 13 (8.19.13)

द्वन्द्वान्यासन्महाराज प्रेक्षणीयानि संयुगे । विविधान्यप्यचिन्त्यानि शस्त्रवन्त्युत्तमानि च ॥

dvandvānyāsanmahārāja prekṣaṇīyāni saṃyuge | vividhānyapyacintyāni śastravantyuttamāni ca

हे महाराज, युद्ध में द्वन्द्व-युद्ध हुए जो देखने योग्य थे — अनेक प्रकार के, कल्पना से परे, शस्त्रों से भरे और उत्कृष्ट।

श्लोक 14 (8.19.14)

ते शूराः समरे सर्वे चित्रं लघु च सुष्ठु च । अयुध्यन्त महावेगाः परस्परवधैषिणः ॥

te śūrāḥ samare sarve citraṃ laghu ca suṣṭhu ca | ayudhyanta mahāvegāḥ parasparavadhaiṣiṇaḥ

वे सब शूरवीर युद्ध में बड़े वेग से, अद्भुत, फुर्तीले और कुशल ढंग से, एक-दूसरे के वध की इच्छा से लड़ रहे थे।

श्लोक 15 (8.19.15)

अन्योन्यं समरे जघ्नुर्योधव्रतमनुष्ठिताः । न हि ते समरं चक्रुः पृष्ठतो वै कथञ्चन ॥

anyonyaṃ samare jaghnuryodhavratamanuṣṭhitāḥ | na hi te samaraṃ cakruḥ pṛṣṭhato vai kathañcana

वे योद्धा-धर्म का पालन करते हुए युद्ध में एक-दूसरे को मारते थे; उनमें से कोई भी कभी पीठ दिखाकर नहीं लड़ा।

श्लोक 16 (8.19.16)

मुहूर्तमेव तद्युद्धमासीन्मधुरदर्शनम् । तत उन्मत्तवद्राजन्निर्मर्यादमवर्तत ॥

muhūrtameva tadyuddhamāsīnmadhuradarśanam | tata unmattavadrājannirmaryādamavartata

वह युद्ध क्षणभर ही देखने में सुहावना रहा; फिर हे राजन्, वह उन्मत्त की भाँति सब मर्यादा तोड़कर चलने लगा।

श्लोक 17 (8.19.17)

रथी नागं समासाद्य दारयन्निशितैः शरैः । प्रेषयामास कालाय शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

rathī nāgaṃ samāsādya dārayanniśitaiḥ śaraiḥ | preṣayāmāsa kālāya śaraiḥ sannataparvabhiḥ

कोई रथी हाथी के निकट पहुँचकर तीखे बाणों से उसे चीरता हुआ सीधी गाँठोंवाले बाणों से उसे मृत्यु के पास भेज देता था।

श्लोक 18 (8.19.18)

नागा हयान्समासाद्य विक्षिपन्तो बहून्रणे । दारयामासुरत्युग्रं तत्रतत्र तदातदा ॥

nāgā hayānsamāsādya vikṣipanto bahūnraṇe | dārayāmāsuratyugraṃ tatratatra tadātadā

हाथी घोड़ों के पास पहुँचकर रणभूमि में बहुतों को उछालते हुए जहाँ-तहाँ बार-बार उन्हें अत्यन्त उग्रता से चीर डालते थे।

श्लोक 19 (8.19.19)

हयारोहाश्च बहवः परिवार्य हयोत्तमान् । तलशब्दरवांश्चक्रुः सम्पतन्तस्ततस्ततः ॥

hayārohāśca bahavaḥ parivārya hayottamān | talaśabdaravāṃścakruḥ sampatantastatastataḥ

और बहुत-से घुड़सवार उत्तम घोड़ों को घेरकर चारों ओर से टूटते हुए ताली बजाने का शोर करने लगे।

श्लोक 20 (8.19.20)

धावमानांस्ततस्तांस्तु द्रवमाणान्महागजान् । पार्श्वतः पृष्ठतश्चैव निजघ्नुर्हयसादिनः ॥

dhāvamānāṃstatastāṃstu dravamāṇānmahāgajān | pārśvataḥ pṛṣṭhataścaiva nijaghnurhayasādinaḥ

और भागते-दौड़ते उन महान हाथियों को घुड़सवार पार्श्व से और पीछे से मारने लगे।

श्लोक 21 (8.19.21)

विद्राव्य च बहूनश्वान्नागा राजन्मदोत्कटाः । विषाणैश्चापरे जघ्नुर्ममृदुश्चापरे भृशम् ॥

vidrāvya ca bahūnaśvānnāgā rājanmadotkaṭāḥ | viṣāṇaiścāpare jaghnurmamṛduścāpare bhṛśam

हे राजन्, मद से उन्मत्त हाथी बहुत-से घोड़ों को भगाकर कुछ को दाँतों से मारते और कुछ को बुरी तरह कुचलते थे।

श्लोक 22 (8.19.22)

साश्वारोहांश्च तुरगान्विषाणैर्विव्यधू रुषा । अपरे चिक्षिपुर्वेगात्प्रगृह्यातिबलास्तदा ॥

sāśvārohāṃśca turagānviṣāṇairvivyadhū ruṣā | apare cikṣipurvegātpragṛhyātibalāstadā

क्रोध से उन्होंने सवारों समेत घोड़ों को दाँतों से बेध डाला, और दूसरे अत्यन्त बलवान् हाथी उन्हें पकड़कर वेग से फेंकने लगे।

श्लोक 23 (8.19.23)

पादातैराहता नागा विवरेषु समन्ततः । चक्रुरार्तस्वरं घोरं दुद्रुवुश्च दिशो दश ॥

pādātairāhatā nāgā vivareṣu samantataḥ | cakrurārtasvaraṃ ghoraṃ dudruvuśca diśo daśa

पैदल सैनिकों द्वारा चारों ओर से बीच की खाली जगहों में मारे गए हाथी भयंकर चीत्कार करते हुए दसों दिशाओं में भाग चले।

श्लोक 24 (8.19.24)

पदातीनां तु सहसा प्रद्रुतानां महाहवे । उत्सृज्याभरणं तूर्णमववव्रुः रणाजिरे ॥

padātīnāṃ tu sahasā pradrutānāṃ mahāhave | utsṛjyābharaṇaṃ tūrṇamavavavruḥ raṇājire

महायुद्ध में जब पैदल सैनिक सहसा भाग निकले और अपने आभूषण फेंक गए, तो हाथियों ने रणभूमि में तुरन्त उन्हें उठा लिया।

श्लोक 25 (8.19.25)

निमित्तं मन्यमानास्तु परिणाम्य महागजाः । जगृहुर्बिभिदुश्चैव चित्राण्याभरणानि च ॥

nimittaṃ manyamānāstu pariṇāmya mahāgajāḥ | jagṛhurbibhiduścaiva citrāṇyābharaṇāni ca

उसे विजय का शकुन मानकर विशाल हाथी घूमकर उन रंग-बिरंगे आभूषणों को पकड़कर तोड़ने लगे।

श्लोक 26 (8.19.26)

तांस्तु तत्र प्रसक्तान्वै परिवार्य पदातयः । हस्त्यारोहान्निजघ्नुस्ते महावेगा बलोत्कटाः ॥

tāṃstu tatra prasaktānvai parivārya padātayaḥ | hastyārohānnijaghnuste mahāvegā balotkaṭāḥ

तब वहाँ उस काम में लगे हुए हाथियों को घेरकर बलवान् और वेगशाली पैदल सैनिकों ने उनके सवारों को मार गिराया।

श्लोक 27 (8.19.27)

अपरे हस्तिभिर्हस्तैः खं विक्षिप्ता महाहवे । निपतन्तो विषाणाग्रैर्भृशं विद्धाः सुशिक्षितैः ॥

apare hastibhirhastaiḥ khaṃ vikṣiptā mahāhave | nipatanto viṣāṇāgrairbhṛśaṃ viddhāḥ suśikṣitaiḥ

दूसरे योद्धा महायुद्ध में हाथियों की सूँड़ों से आकाश में उछाल दिए गए और गिरते हुए अच्छी तरह चलाए गए दाँतों की नोकों से गहरे बिंध गए।

श्लोक 28 (8.19.28)

अपरे सहसा गृह्य विषाणैरेव सूदिताः । सेनान्तरं समासाद्य केचित्तत्र महागजैः ॥

apare sahasā gṛhya viṣāṇaireva sūditāḥ | senāntaraṃ samāsādya kecittatra mahāgajaiḥ

दूसरे सहसा पकड़े जाकर केवल दाँतों से मार डाले गए, और कुछ बड़े हाथियों द्वारा सेना के बीच ले जाए गए —

श्लोक 29 (8.19.29)

क्षुण्णगात्रा महाराज विक्षिप्य च पुनःपुनः । अपरे व्यजनानीव विभ्राम्य निहता मृधे ॥

kṣuṇṇagātrā mahārāja vikṣipya ca punaḥpunaḥ | apare vyajanānīva vibhrāmya nihatā mṛdhe

हे महाराज, उनके शरीर कुचल दिए गए और उन्हें बार-बार फेंका गया; दूसरे पंखों की तरह घुमाकर युद्ध में मार डाले गए।

श्लोक 30 (8.19.30)

पुरःसराश्च नागानामपरेषां विशाम्पते । शरीराण्यतिविद्धानि तत्रतत्र रणाजिरे ॥

puraḥsarāśca nāgānāmapareṣāṃ viśāmpate | śarīrāṇyatividdhāni tatratatra raṇājire

हे प्रजानाथ, दूसरे हाथियों के आगे चलनेवालों के शरीर रणभूमि में जहाँ-तहाँ गहरे बिंध गए।

श्लोक 31 (8.19.31)

प्रतिमानेषु कुम्भेषु दन्तवेष्टेषु चापरे । निगृहीता भृशं नागाः प्रासतोमरशक्तिभिः ॥

pratimāneṣu kumbheṣu dantaveṣṭeṣu cāpare | nigṛhītā bhṛśaṃ nāgāḥ prāsatomaraśaktibhiḥ

अन्यत्र हाथी दाँतों के बीच के गड्ढों में, मस्तक के उभारों पर और दाँतों की पट्टियों पर प्रासों, तोमरों और शक्तियों से बुरी तरह जकड़ दिए गए।

श्लोक 32 (8.19.32)

निगृह्य च गजाः केचित् पार्श्वस्थैर्भृशदारुणैः । रथाश्वसादिभिस्तत्र सम्भिन्ना न्यपतन्भुवि ॥

nigṛhya ca gajāḥ kecit pārśvasthairbhṛśadāruṇaiḥ | rathāśvasādibhistatra sambhinnā nyapatanbhuvi

कुछ हाथियों को वहाँ पार्श्व में खड़े अत्यन्त भयंकर रथियों और घुड़सवारों ने पकड़कर रोक लिया, और वे बिंधकर भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 33 (8.19.33)

सहयाः सादिनस्तत्र तोमरेण महामृधे । भूमावमृद्नन्वेगेन सचर्माणं पदातिनम् ॥

sahayāḥ sādinastatra tomareṇa mahāmṛdhe | bhūmāvamṛdnanvegena sacarmāṇaṃ padātinam

वहाँ महायुद्ध में घोड़ों सहित घुड़सवारों ने तोमरों के साथ वेग से एक ढालधारी पैदल सैनिक को भूमि पर रौंद डाला।

श्लोक 34 (8.19.34)

तथा सावरणान्कांश्चित्तत्रतत्र विशाम्पते । रथान्नागाः समासाद्य परिगृह्य च मारिष । व्याक्षिपन्सहसा तत्र घोररूपे भयानके ॥

tathā sāvaraṇānkāṃścittatratatra viśāmpate | rathānnāgāḥ samāsādya parigṛhya ca māriṣa | vyākṣipansahasā tatra ghorarūpe bhayānake

और हे प्रजानाथ, जहाँ-तहाँ कवचधारी कुछ योद्धाओं को, तथा रथों को भी हाथियों ने पास पहुँचकर पकड़ लिया और, हे मान्यवर, उस भयंकर, डरावने संग्राम में सहसा इधर-उधर फेंक दिया।

श्लोक 35 (8.19.35)

नाराचैर्निहताश्चापि गजाः पेतुर्महाबलाः । पर्वतस्येव शिखरं वज्ररुग्णं महीतले ॥

nārācairnihatāścāpi gajāḥ peturmahābalāḥ | parvatasyeva śikharaṃ vajrarugṇaṃ mahītale

नाराच बाणों से मारे गए विशाल हाथी भी, वज्र से टूटे पर्वत-शिखर के समान, भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 36 (8.19.36)

योधा योधान्समासाद्य मुष्टिभिर्व्यहनन्युधि । केशेष्वन्योन्यमाक्षिप्य चिक्षिपुर्बिभिदुश्च ह ॥

yodhā yodhānsamāsādya muṣṭibhirvyahananyudhi | keśeṣvanyonyamākṣipya cikṣipurbibhiduśca ha

योद्धा योद्धाओं से भिड़कर युद्ध में घूँसों से एक-दूसरे को मारने लगे; एक-दूसरे के केश पकड़कर उन्होंने पटक दिया और चीर डाला।

श्लोक 37 (8.19.37)

उद्यम्य च भुजानन्ये निक्षिप्य च महीतले । पदा चोरः समाक्रम्य स्फुरतोऽपाहरच्छिरः ॥

udyamya ca bhujānanye nikṣipya ca mahītale | padā coraḥ samākramya sphurato'pāharacchiraḥ

कुछ ने भुजाएँ उठाकर शत्रुओं को भूमि पर पटक दिया और पैर से छाती दबाकर तड़पते हुए का सिर काट डाला।

श्लोक 38 (8.19.38)

पततश्चापरो राजन्विजहारासिना शिरः । मृतमन्यो महाराज पदा ताडितवांस्तदा ॥

patataścāparo rājanvijahārāsinā śiraḥ | mṛtamanyo mahārāja padā tāḍitavāṃstadā

हे राजन्, दूसरे ने गिरते हुए का सिर तलवार से काट डाला। हे महाराज, किसी और ने तब मरे हुए को पैरों से ठोकर मारी।

श्लोक 39 (8.19.39)

जीवतश्च तथैवान्यः शस्त्रं काये न्यमज्जयत् । मुष्टियुद्धं महच्चासीद्योधानां तत्र भारत । तथा केशग्रहश्चोग्रो बाहुयुद्धं च भैरवम् ॥

jīvataśca tathaivānyaḥ śastraṃ kāye nyamajjayat | muṣṭiyuddhaṃ mahaccāsīdyodhānāṃ tatra bhārata | tathā keśagrahaścogro bāhuyuddhaṃ ca bhairavam

हे भारत, किसी और ने वैसे ही जीवित मनुष्य के शरीर में शस्त्र गाड़ दिया। वहाँ योद्धाओं में भारी घूँसेबाज़ी हुई, भयंकर केश-ग्रहण हुआ और भीषण बाहुयुद्ध भी चला।

श्लोक 40 (8.19.40)

समासक्तस्य चान्येन अविज्ञातस्तथाऽपरः । जहार समरे प्राणान्नानाशस्त्रैरनेकधा ॥

samāsaktasya cānyena avijñātastathā'paraḥ | jahāra samare prāṇānnānāśastrairanekadhā

किसी और ने दूसरे से लड़ते हुए एक योद्धा को बिना दिखाई दिए रण में नाना शस्त्रों से अनेक प्रकार से मार डाला।

श्लोक 41 (8.19.41)

संसक्तेषु च योधेषु वर्तमाने च सङ्कुले । कबन्धान्युत्थितानि स्युः शतशोऽथ सहस्रशः ॥

saṃsakteṣu ca yodheṣu vartamāne ca saṅkule | kabandhānyutthitāni syuḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

योद्धाओं के परस्पर गुँथे रहने और भीड़ बढ़ते जाने पर सैकड़ों-हज़ारों कबन्ध (सिरकटे धड़) उठ खड़े हुए।

श्लोक 42 (8.19.42)

शोणितैः सिच्यमानानि शस्त्राणि कवचानि च । महारागानुरक्तानि वस्त्राणीव चकाशिरे ॥

śoṇitaiḥ sicyamānāni śastrāṇi kavacāni ca | mahārāgānuraktāni vastrāṇīva cakāśire

रक्त से सींचे हुए शस्त्र और कवच गहरे लाल रंग में रँगे वस्त्रों की तरह चमक रहे थे।

श्लोक 43 (8.19.43)

एवमेतन्महद्युद्धं दारुणं शस्त्रसङ्कुलम् । उन्मत्तगङ्गाप्रतिमं शब्देनापूरयज्जगत् ॥

evametanmahadyuddhaṃ dāruṇaṃ śastrasaṅkulam | unmattagaṅgāpratimaṃ śabdenāpūrayajjagat

इस प्रकार यह भयंकर, शस्त्रों से ठसाठस भरा महायुद्ध उफनती गंगा के समान अपने शब्द से सारे संसार को भर रहा था।

श्लोक 44 (8.19.44)

नैव स्वे न परे राजन्विज्ञायन्ते शरातुराः । योद्धव्यमिति युध्यन्ते राजानो जयगृद्धिनः ॥

naiva sve na pare rājanvijñāyante śarāturāḥ | yoddhavyamiti yudhyante rājāno jayagṛddhinaḥ

हे राजन्, बाणों से पीड़ित योद्धा न अपनों को पहचान पाते थे, न परायों को; विजय के लोभी राजा "लड़ना ही है" यह सोचकर लड़ते जा रहे थे।

श्लोक 45 (8.19.45)

स्वान्स्वे जघ्नुर्महाराज परांश्चैव समागतान् । उभयोः सेनयोर्वीरैर्व्याकुलं समपद्यत ॥

svānsve jaghnurmahārāja parāṃścaiva samāgatān | ubhayoḥ senayorvīrairvyākulaṃ samapadyata

हे महाराज, योद्धा अपनों को भी मारते थे और साथ आए शत्रुओं को भी; दोनों सेनाओं के वीरों में भारी गड़बड़ मच गई।

श्लोक 46 (8.19.46)

रथैर्भग्नैर्महाराज वारणैश्च निपातितैः । हयैश्च पतितैस्तत्र नरैश्च विनिपातितैः ॥

rathairbhagnairmahārāja vāraṇaiśca nipātitaiḥ | hayaiśca patitaistatra naraiśca vinipātitaiḥ

हे महाराज, टूटे हुए रथों, गिराए गए हाथियों, वहाँ पड़े घोड़ों और मारे गए मनुष्यों से —

श्लोक 47 (8.19.47)

अगम्यरूपा पृथिवी क्षणेन समपद्यत । क्षणेनासीन्महीपाल क्षतजौघप्रवर्तिनी ॥

agamyarūpā pṛthivī kṣaṇena samapadyata | kṣaṇenāsīnmahīpāla kṣatajaughapravartinī

पृथ्वी क्षण भर में दुर्गम हो गई; और हे पृथ्वीपति, क्षण भर में ही वह रक्त की बाढ़ बहानेवाली हो गई।

श्लोक 48 (8.19.48)

पाञ्चालानहनत्कर्णस्त्रिगर्तांश्च धनञ्जयः । भीमसेनः कुरून्राजन्हस्त्यनीकं च सर्वशः ॥

pāñcālānahanatkarṇastrigartāṃśca dhanañjayaḥ | bhīmasenaḥ kurūnrājanhastyanīkaṃ ca sarvaśaḥ

हे राजन्, कर्ण ने पाञ्चालों को मारा, धनञ्जय ने त्रिगर्तों को और भीमसेन ने कौरवों को, तथा हाथियों की सेना को चारों ओर से।

श्लोक 49 (8.19.49)

एवमेष क्षयो वृत्तः कुरुपाण्डवसेनयोः । अपराह्णे गते सूर्ये काङ्क्षतां विपुलं यशः ॥

evameṣa kṣayo vṛttaḥ kurupāṇḍavasenayoḥ | aparāhṇe gate sūrye kāṅkṣatāṃ vipulaṃ yaśaḥ

इस प्रकार कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं में यह संहार हुआ, जब सूर्य दोपहर के बाद ढल चुका था और दोनों विपुल यश की आकांक्षा कर रहे थे।

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