कर्ण पर्व · अध्याय 20
युधिष्ठिर और दुर्योधन का युद्ध; दुर्योधन का मूर्च्छित होना
संजय के समाचारों से व्यथित धृतराष्ट्र पूछते हैं कि दुर्योधन के रथहीन हो जाने के बाद अपराह्न में युद्ध कैसे चला। संजय बताते हैं कि दुर्योधन नया रथ लेकर युधिष्ठिर पर टूट पड़ता है; दोनों एक-दूसरे के धनुष काटते और बाणों की वर्षा करते हैं, यहाँ तक कि दुर्योधन की शक्ति युधिष्ठिर के बाणों से कट जाती है। युधिष्ठिर का बाण दुर्योधन को मूर्च्छित कर देता है, और जब वह गदा उठाकर आगे बढ़ता है तो युधिष्ठिर की महाशक्ति उसे बेध देती है और वह अचेत होकर गिर पड़ता है। कृतवर्मा राजा की रक्षा को पहुँचता है और भीम कृतवर्मा पर टूट पड़ते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (8.20.1)
अतितीव्राणि दुःखानि दुःसहानि बहूनि च । त्वत्तोऽहं सञ्जयाश्रौषं पुत्राणां चैव सङ्क्षयम् ॥
atitīvrāṇi duḥkhāni duḥsahāni bahūni ca | tvatto'haṃ sañjayāśrauṣaṃ putrāṇāṃ caiva saṅkṣayam
संजय, मैंने तुमसे अनेक अत्यन्त तीव्र और असह्य दुःखों की बातें सुनी हैं, और अपने पुत्रों के विनाश का समाचार भी सुना है।
श्लोक 2 (8.20.2)
यथा त्वं मे कथयसे यथा युद्धमवर्तत । न सन्ति सूत कौरव्या इति मे निश्चिता मतिः ॥
yathā tvaṃ me kathayase yathā yuddhamavartata | na santi sūta kauravyā iti me niścitā matiḥ
हे सूत, तुम जिस प्रकार मुझे बताते हो कि युद्ध कैसे चला, उससे मेरा यह निश्चय हो गया है कि अब कौरव नहीं रहे।
श्लोक 3 (8.20.3)
दुर्योधनश्च विरथः कृतस्तत्र महारथः । धर्मपुत्रः कथं चक्रे तस्य वा नृपतिः कथम् ॥
duryodhanaśca virathaḥ kṛtastatra mahārathaḥ | dharmaputraḥ kathaṃ cakre tasya vā nṛpatiḥ katham
वहाँ महारथी दुर्योधन को रथहीन कर दिया गया था। धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने उसके साथ क्या किया, और राजा दुर्योधन ने उसका सामना कैसे किया?
श्लोक 4 (8.20.4)
अपराह्णे कथं युद्धमभवद्रोमहर्षणम् । तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन कुशलो ह्यसि सञ्जय ॥
aparāhṇe kathaṃ yuddhamabhavadromaharṣaṇam | tanmamācakṣva tattvena kuśalo hyasi sañjaya
अपराह्न में वह रोमांचकारी युद्ध कैसे हुआ? संजय, मुझे ठीक-ठीक बताओ, क्योंकि तुम इसमें कुशल हो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 5 (8.20.5)
संसक्तेषु तु सैन्येषु वध्यमानेषु भागशः । रथमन्यं समास्थाय पुत्रस्तव विशाम्पते ॥
saṃsakteṣu tu sainyeṣu vadhyamāneṣu bhāgaśaḥ | rathamanyaṃ samāsthāya putrastava viśāmpate
हे प्रजापति, जब परस्पर भिड़ी हुई सेनाएँ टुकड़ों-टुकड़ों में कट रही थीं, तब आपके पुत्र ने दूसरे रथ पर चढ़कर
श्लोक 6 (8.20.6)
क्रोधेन महता युक्तः सविषो भुजगो यथा । दुर्योधनः समालक्ष्य धर्मराजं युधिष्ठिरम् । प्रोवाच सूतं त्वरितो याहियाहीति भारत ॥
krodhena mahatā yuktaḥ saviṣo bhujago yathā | duryodhanaḥ samālakṣya dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | provāca sūtaṃ tvarito yāhiyāhīti bhārata
महान् क्रोध से भरकर विषैले सर्प की तरह फुफकारते हुए युधिष्ठिर को, उस धर्मराज को, देखा। हे भारत, दुर्योधन ने शीघ्रता से सारथि से कहा — "चलो, चलो!"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 7 (8.20.7)
तत्र मां प्रापय क्षिप्रं सारथे यत्र पाण्डवः । ध्रियमाणातपत्रेण राजा राजति दंशितः ॥
tatra māṃ prāpaya kṣipraṃ sārathe yatra pāṇḍavaḥ | dhriyamāṇātapatreṇa rājā rājati daṃśitaḥ
"सारथि, मुझे शीघ्र वहाँ ले चलो जहाँ पाण्डव है, जहाँ कवच पहने वह राजा सिर पर छत्र धारण किए शोभित हो रहा है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 8 (8.20.8)
स सूतश्चोदितो राज्ञा राज्ञः स्यन्दनमुत्तमम् । युधिष्ठिरस्याभिमुखं प्रेषयामास संयुगे ॥
sa sūtaścodito rājñā rājñaḥ syandanamuttamam | yudhiṣṭhirasyābhimukhaṃ preṣayāmāsa saṃyuge
राजा के प्रेरित करने पर सारथि ने राजा के उत्तम रथ को युद्ध में युधिष्ठिर के सामने बढ़ा दिया।
श्लोक 9 (8.20.9)
ततो युधिष्ठिरः क्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः । सारथिं चोदयामास याहि यत्र सुयोधनः ॥
tato yudhiṣṭhiraḥ kruddhaḥ prabhinna iva kuñjaraḥ | sārathiṃ codayāmāsa yāhi yatra suyodhanaḥ
तब मदमत्त हाथी की तरह क्रुद्ध युधिष्ठिर ने अपने सारथि को आगे बढ़ाया — "जहाँ सुयोधन है, वहाँ चलो।"
श्लोक 10 (8.20.10)
तौ समाजग्मतुर्वीरौ भ्रातरौ रथसत्तमौ ॥
tau samājagmaturvīrau bhrātarau rathasattamau
वे दोनों भाई, श्रेष्ठ रथी, एक-दूसरे के सामने आ पहुँचे।
श्लोक 11 (8.20.11)
समेत्य च महावीरौ संरब्धौ युद्धदुर्मदौ । ववर्षतुर्महेष्वासौ शरैरन्योन्यमाहवे ॥
sametya ca mahāvīrau saṃrabdhau yuddhadurmadau | vavarṣaturmaheṣvāsau śarairanyonyamāhave
मिलते ही वे दोनों महावीर, क्रोध से भरे और युद्ध के मद में चूर, महाधनुर्धर, संग्राम में एक-दूसरे पर बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 12 (8.20.12)
ततो दुर्योधनो राजा धर्मशीलस्य मारिष । शिलाशितेन भल्लेन धनुश्चिच्छेद संयुगे ॥
tato duryodhano rājā dharmaśīlasya māriṣa | śilāśitena bhallena dhanuściccheda saṃyuge
हे मान्यवर, तब राजा दुर्योधन ने युद्ध में शिला पर तेज किए हुए भल्ल से धर्मशील युधिष्ठिर का धनुष काट दिया।
श्लोक 13 (8.20.13)
तं नामृष्यत सङ्क्रुद्धो ह्यवमानं युधिष्ठिरः । अपविध्य धनुश्छिन्नं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥
taṃ nāmṛṣyata saṅkruddho hyavamānaṃ yudhiṣṭhiraḥ | apavidhya dhanuśchinnaṃ krodhasaṃraktalocanaḥ
क्रोध से भरे युधिष्ठिर उस अपमान को सह न सके। टूटे हुए धनुष को फेंककर, क्रोध से लाल आँखें किए हुए,
श्लोक 14 (8.20.14)
अन्यत्कार्मुकमादाय धर्मपुत्रश्चमूमुखे । दुर्योधनस्य चिच्छेद ध्वजं कार्मुकमेव च ॥
anyatkārmukamādāya dharmaputraścamūmukhe | duryodhanasya ciccheda dhvajaṃ kārmukameva ca
धर्मपुत्र ने दूसरा धनुष लेकर सेना के अग्रभाग में दुर्योधन की ध्वजा और उसके धनुष को भी काट डाला।
श्लोक 15 (8.20.15)
अथान्यद्धनुरादाय पुत्रस्ते भरतर्षभ । युधिष्ठिरस्य चिक्षेप शरान्कनकभूषणान् । रुक्मपुङ्खान्प्रसन्नाग्रान्सविषानिव पन्नगान् ॥
athānyaddhanurādāya putraste bharatarṣabha | yudhiṣṭhirasya cikṣepa śarānkanakabhūṣaṇān | rukmapuṅkhānprasannāgrānsaviṣāniva pannagān
हे भरतश्रेष्ठ, तब आपके पुत्र ने दूसरा धनुष उठाकर युधिष्ठिर पर सोने से सजे, सुनहरे पंखों वाले, चमकती नोकों वाले बाण छोड़े, जो विषैले सर्पों जैसे थे।
श्लोक 16 (8.20.16)
तावन्योन्यं सुसङ्क्रुद्धौ शस्त्रवर्षाण्यमुञ्चताम् । सिंहाविव सुसंरब्धौ परस्परजिगीषया ॥
tāvanyonyaṃ susaṅkruddhau śastravarṣāṇyamuñcatām | siṃhāviva susaṃrabdhau parasparajigīṣayā
अत्यन्त क्रुद्ध होकर वे दोनों एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से सिंहों की तरह परस्पर शस्त्रों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 17 (8.20.17)
जघ्नतुस्तौ रणेऽन्योन्यं नर्दमानौ वृषाविव । अन्तरं मार्गमाणौ च चेरतुस्तौ महारथौ ॥
jaghnatustau raṇe'nyonyaṃ nardamānau vṛṣāviva | antaraṃ mārgamāṇau ca ceratustau mahārathau
वे दोनों साँड़ों की तरह गरजते हुए एक-दूसरे पर प्रहार करते थे, और वे दोनों महारथी एक-दूसरे का छिद्र खोजते हुए रणभूमि में विचरते थे।
श्लोक 18 (8.20.18)
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैस्तौ तु कृतव्रणौ । विरेजतुर्महाराज किंशुकाविव पुष्पितौ ॥
tataḥ pūrṇāyatotsṛṣṭaiḥ śaraistau tu kṛtavraṇau | virejaturmahārāja kiṃśukāviva puṣpitau
हे महाराज, तब पूरी तरह खींचे हुए धनुषों से छोड़े गए बाणों से घायल होकर वे दोनों फूले हुए किंशुक वृक्षों की तरह शोभा पाने लगे।
श्लोक 19 (8.20.19)
ततो राजन्विमुञ्चन्तौ सिंहनादान्मुहुर्मुहुः । तलयोश्च तथा शब्दान्धनुषश्च महाहवे ॥
tato rājanvimuñcantau siṃhanādānmuhurmuhuḥ | talayośca tathā śabdāndhanuṣaśca mahāhave
हे राजन्, तब उन दोनों ने बार-बार सिंहनाद किया और उस महायुद्ध में हथेलियों की थाप तथा धनुषों की टंकार भी गुँजा दी।
श्लोक 20 (8.20.20)
शङ्खशब्दवरांश्चैव चक्रतुस्तौ नरेश्वरौ । अन्योन्यं तौ महाराज पीडयांचक्रतुर्भृशम् ॥
śaṅkhaśabdavarāṃścaiva cakratustau nareśvarau | anyonyaṃ tau mahārāja pīḍayāṃcakraturbhṛśam
उन दोनों नरेश्वरों ने श्रेष्ठ शंखध्वनि भी की, और हे महाराज, एक-दूसरे को बहुत पीड़ा पहुँचाई।
श्लोक 21 (8.20.21)
ततो युधिष्ठिरो राजा पुत्रं तव शरैस्त्रिभिः । आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रवेगैर्दुरासदैः ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā putraṃ tava śaraistribhiḥ | ājaghānorasi kruddho vajravegairdurāsadaiḥ
तब राजा युधिष्ठिर ने क्रुद्ध होकर आपके पुत्र की छाती में तीन बाण मारे, जो वज्र के समान वेगवान् और दुःसह थे।
श्लोक 22 (8.20.22)
प्रतिविव्याध तं तूर्णं तव पुत्रो महीपतिः । पञ्चभिर्निशितैर्बाणैः स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ॥
prativivyādha taṃ tūrṇaṃ tava putro mahīpatiḥ | pañcabhirniśitairbāṇaiḥ svarṇapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ
आपके पुत्र राजा दुर्योधन ने भी शीघ्र ही उसे पाँच तीखे, सोने के पंखों वाले और शिला पर तेज किए हुए बाणों से बदले में बेध दिया।
श्लोक 23 (8.20.23)
ततो दुर्योधनो राजा शक्तिं चिक्षेप भारत । सर्वपारशवीं तीक्ष्णां महोल्काप्रतिमां तदा ॥
tato duryodhano rājā śaktiṃ cikṣepa bhārata | sarvapāraśavīṃ tīkṣṇāṃ maholkāpratimāṃ tadā
हे भारत, तब राजा दुर्योधन ने एक तीखी, सबका नाश करने वाली, महान् उल्का के समान शक्ति फेंकी।
श्लोक 24 (8.20.24)
तामापतन्तीं सहसा धर्मराजः शितैः शरैः । त्रिभिश्चिच्छेद सहसा तं च विव्याध पञ्चभिः ॥
tāmāpatantīṃ sahasā dharmarājaḥ śitaiḥ śaraiḥ | tribhiściccheda sahasā taṃ ca vivyādha pañcabhiḥ
उसे सहसा आते देख धर्मराज ने तीखे बाणों से उसके तीन टुकड़े कर दिए और दुर्योधन को पाँच बाणों से बेध डाला।
श्लोक 25 (8.20.25)
निपपात ततः साऽथ स्वर्णदण्डा महास्वना । निपतन्ती महोल्केव व्यराजच्छिखिसन्निभा ॥
nipapāta tataḥ sā'tha svarṇadaṇḍā mahāsvanā | nipatantī maholkeva vyarājacchikhisannibhā
तब वह सोने की डण्डी वाली, जोर की आवाज करने वाली शक्ति गिर पड़ी; गिरती हुई वह महान् उल्का की तरह अग्नि के समान चमक उठी।
श्लोक 26 (8.20.26)
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशाम्पते । नवभिर्निशितैर्भल्लैर्निजघान युधिष्ठिरम् ॥
śaktiṃ vinihatāṃ dṛṣṭvā putrastava viśāmpate | navabhirniśitairbhallairnijaghāna yudhiṣṭhiram
हे प्रजापति, अपनी शक्ति को कटी हुई देखकर आपके पुत्र ने नौ तीखे भल्लों से युधिष्ठिर को घायल कर दिया।
श्लोक 27 (8.20.27)
सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुतापनः । दुर्योधनं समुद्दिश्य बाणं जग्राह सत्वरः ॥
so'tividdho balavatā śatruṇā śatrutāpanaḥ | duryodhanaṃ samuddiśya bāṇaṃ jagrāha satvaraḥ
बलवान् शत्रु के प्रहार से गहरे घायल हुए, शत्रुओं को तपाने वाले युधिष्ठिर ने दुर्योधन को लक्ष्य करके शीघ्रता से एक बाण उठाया।
श्लोक 28 (8.20.28)
समाधत्त च तं बाणं धनुर्मध्ये महाबलः । चिक्षेप च महाराज ततः क्रुद्धः पराक्रमी ॥
samādhatta ca taṃ bāṇaṃ dhanurmadhye mahābalaḥ | cikṣepa ca mahārāja tataḥ kruddhaḥ parākramī
उस महाबली ने उस बाण को धनुष के बीच चढ़ाया और हे महाराज, तब क्रोध में भरे उस पराक्रमी ने उसे छोड़ दिया।
श्लोक 29 (8.20.29)
स तु बाणः समासाद्य तव पुत्रं महारथम् । व्यामोहयत राजानं धरणीं च ददार ह ॥
sa tu bāṇaḥ samāsādya tava putraṃ mahāratham | vyāmohayata rājānaṃ dharaṇīṃ ca dadāra ha
वह बाण आपके पुत्र महारथी दुर्योधन तक पहुँचा, उस राजा को मूर्च्छित कर गया और धरती को भी चीरता हुआ घुस गया।
श्लोक 30 (8.20.30)
ततो दुर्योधनः क्रुद्धो गदामुद्यम्य वेगितः । विधित्सुः कलहस्यान्तं धर्मराजमुपाद्रवत् ॥
tato duryodhanaḥ kruddho gadāmudyamya vegitaḥ | vidhitsuḥ kalahasyāntaṃ dharmarājamupādravat
तब क्रुद्ध दुर्योधन गदा उठाकर, इस झगड़े का अन्त कर देने की इच्छा से, वेग के साथ धर्मराज युधिष्ठिर की ओर झपटा।
श्लोक 31 (8.20.31)
तमुद्यतगदं दृष्ट्वा दण्डहस्तमिवान्तकम् । धर्मराजो महाशक्तिं प्राहिणोत्तव सूनवे ॥
tamudyatagadaṃ dṛṣṭvā daṇḍahastamivāntakam | dharmarājo mahāśaktiṃ prāhiṇottava sūnave
उसे गदा उठाए, दण्ड हाथ में लिए हुए यमराज की तरह आता देख धर्मराज ने आपके पुत्र पर एक महाशक्ति फेंकी।
श्लोक 32 (8.20.32)
दीप्यमानां महावेगां महोल्कां ज्वलितामिव । यमदण्डनिभां घोरां कालरात्रिमिवापराम् ॥
dīpyamānāṃ mahāvegāṃ maholkāṃ jvalitāmiva | yamadaṇḍanibhāṃ ghorāṃ kālarātrimivāparām
वह जलती हुई, अत्यन्त वेगवती, प्रज्वलित महान् उल्का के समान थी; यमदण्ड के समान भयंकर, मानो दूसरी कालरात्रि हो।
श्लोक 33 (8.20.33)
रथस्थः स तया विद्धो वर्म भित्त्वा स्तनान्तरे । भृशं संविग्नहृदयः पपात च मुमोह च ॥
rathasthaḥ sa tayā viddho varma bhittvā stanāntare | bhṛśaṃ saṃvignahṛdayaḥ papāta ca mumoha ca
रथ पर खड़ा वह उससे बिंध गया; वह शक्ति उसके कवच को चीरकर छाती के बीच लगी, और अत्यन्त व्याकुल हृदय वाला वह गिर पड़ा और अचेत हो गया।
श्लोक 34 (8.20.34)
नभस्तमाह च ततः प्रतिज्ञामनुपालय । नायं वध्यस्तव नृप इत्युक्तः स न्यवर्तत ॥
nabhastamāha ca tataḥ pratijñāmanupālaya | nāyaṃ vadhyastava nṛpa ityuktaḥ sa nyavartata
तब आकाश से उसके प्रति ये वचन कहे गए — "अपनी प्रतिज्ञा का पालन करो। हे राजन्, यह तुम्हारे द्वारा वध्य नहीं है।" ऐसा कहे जाने पर वह लौट पड़ा।
श्लोक 35 (8.20.35)
ततस्त्वरितमागम्य कृतवर्मा तवात्मजम् । प्रत्यपद्यत राजानं निम्नं व्यसनार्णवे ॥
tatastvaritamāgamya kṛtavarmā tavātmajam | pratyapadyata rājānaṃ nimnaṃ vyasanārṇave
तब कृतवर्मा शीघ्र आकर आपके पुत्र राजा दुर्योधन की रक्षा के लिए पहुँच गया, जो मानो विपत्ति के सागर में डूब गया था।
श्लोक 36 (8.20.36)
गदामादाय भीमोऽपि हेमपट्टपरिष्कृताम् । अभिदुद्राव वेगेन कृतवर्माणमाहवे ॥
gadāmādāya bhīmo'pi hemapaṭṭapariṣkṛtām | abhidudrāva vegena kṛtavarmāṇamāhave
भीम ने भी सोने की पट्टियों से सजी हुई गदा उठाकर युद्ध में वेग के साथ कृतवर्मा पर धावा बोल दिया।
श्लोक 37 (8.20.37)
एवं तदभवद्युद्धं त्वदीयानां परैः सह । अपराह्णे महाराज काङ्क्षतां विजयं युधि ॥
evaṃ tadabhavadyuddhaṃ tvadīyānāṃ paraiḥ saha | aparāhṇe mahārāja kāṅkṣatāṃ vijayaṃ yudhi
हे महाराज, इस प्रकार अपराह्न में आपके योद्धाओं और शत्रुओं के बीच वह युद्ध हुआ, जब दोनों पक्ष युद्ध में विजय चाहते थे।