Skip to main content

कर्ण पर्व · अध्याय 21

अर्जुन द्वारा कौरवों का संहार; सूर्यास्त से सोलहवें दिन के युद्ध का अन्त

कर्ण को आगे करके कौरव फिर युद्ध छेड़ते हैं और रणभूमि शीघ्र ही मृतकों से पट जाती है। कर्ण और सात्यकि में बाणों का आदान-प्रदान होता है, उधर अर्जुन और कृष्ण कौरव सेना में घुसते हैं और अर्जुन दुर्योधन की रक्षा करने वाले वीरों के धनुष एक-एक कर काट डालते हैं। कर्ण अर्जुन पर टूट पड़ता है और पाण्डवों के शूर कर्ण को घेर लेते हैं; कर्ण के अस्त्र उन्हें पीछे धकेल देते हैं, पर अर्जुन बाणों से आकाश को ढक देते हैं और कौरव सेना भागने लगती है। सूर्य अस्त होने और अँधेरा छा जाने पर कौरव लौट जाते हैं, पाण्डव विजय के हर्ष में शिविर को जाते हैं, और रात में राक्षस, पिशाच तथा मांसभक्षी जीव रणभूमि में उमड़ पड़ते हैं।

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.21.1)

ततः कर्णं पुरस्कृत्य त्वदीया युद्धदुर्मदाः । पुनरावृत्य सङ्ग्रामं चक्रुर्देवासुरोपमम् ॥

tataḥ karṇaṃ puraskṛtya tvadīyā yuddhadurmadāḥ | punarāvṛtya saṅgrāmaṃ cakrurdevāsuropamam

तब आपके युद्ध-मदमत्त योद्धा कर्ण को आगे करके लौट पड़े और देवासुर-संग्राम के समान युद्ध फिर करने लगे।

श्लोक 2 (8.21.2)

द्विरदनररथाश्वशङ्खशब्दैः । परिहृषिता विविधैश्च शस्त्रपातैः । द्विरदरथपदातिसादिसङ्घाः । परिकुपिताभिमुखाः प्रजघ्निरे ते ॥

dviradanararathāśvaśaṅkhaśabdaiḥ | parihṛṣitā vividhaiśca śastrapātaiḥ | dviradarathapadātisādisaṅghāḥ | parikupitābhimukhāḥ prajaghnire te

हाथियों, मनुष्यों, रथों, घोड़ों और शंखों के शब्द से तथा नाना प्रकार के शस्त्रों की वर्षा से उल्लसित, हाथियों, रथों, पैदलों और घुड़सवारों के दल क्रोध में भरकर आमने-सामने आ डटे और एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 3 (8.21.3)

शितपरश्वथसासिपट्टसैर् । इषुभिरनेकविधैश्च सूदिताः । द्विरदरथहया महाहवे । वरपुरुषैः पुरुषाश्च वाहनैः ॥

śitaparaśvathasāsipaṭṭasair | iṣubhiranekavidhaiśca sūditāḥ | dviradarathahayā mahāhave | varapuruṣaiḥ puruṣāśca vāhanaiḥ

उस महायुद्ध में हाथी, रथ और घोड़े शत्रुओं द्वारा तीखे कुल्हाड़ों, तलवारों, पट्टिशों और अनेक प्रकार के बाणों से काट डाले गए, और मनुष्य श्रेष्ठ योद्धाओं तथा वाहनों द्वारा मारे गए।

श्लोक 4 (8.21.4)

कमलदिनकरेन्दुसन्निभैः । सितदशनैः सुमुखाक्षिनासिकैः । रुचिरमकुटकुण्डलैर्मही । पुरुषशिरोभिरुपस्तृता बभौ ॥

kamaladinakarendusannibhaiḥ | sitadaśanaiḥ sumukhākṣināsikaiḥ | ruciramakuṭakuṇḍalairmahī | puruṣaśirobhirupastṛtā babhau

पृथ्वी पुरुषों के कटे हुए सिरों से पट गई और शोभित हुई; वे सिर कमलों, सूर्यों और चन्द्रमाओं के समान थे, उनके दाँत उजले, मुख, आँखें और नाक सुन्दर थे, और वे सुन्दर मुकुट-कुण्डल पहने थे।

श्लोक 5 (8.21.5)

परिघमुसलशक्तितौमरैर् । नखरभुशुण्डिगदाशतैर्हताः । द्विरदनरहयाः सहस्रशो । रुधिरनदीप्रवहास्तदाऽभवन् ॥

parighamusalaśaktitaumarair | nakharabhuśuṇḍigadāśatairhatāḥ | dviradanarahayāḥ sahasraśo | rudhiranadīpravahāstadā'bhavan

परिघों, मूसलों, शक्तियों, तोमरों, नखरों, भुशुण्डियों और सैकड़ों गदाओं से मारे गए हजारों हाथी, मनुष्य और घोड़े उस समय रक्त की नदियों के प्रवाह बन गए।

श्लोक 6 (8.21.6)

प्रहतरथनराश्वकुञ्जरं । प्रतिभयदर्शनमुल्बणव्रणम् । तदहितहतमाबभौ बलं । पितृपतिराष्ट्रमिव प्रजाक्षये ॥

prahatarathanarāśvakuñjaraṃ | pratibhayadarśanamulbaṇavraṇam | tadahitahatamābabhau balaṃ | pitṛpatirāṣṭramiva prajākṣaye

रथों, मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों के मारे जाने से भयंकर दिखाई देने वाली, गहरे घावों से भरी, शत्रुओं द्वारा मारी हुई वह सेना प्रलय के समय यमराज के राज्य जैसी लग रही थी।

श्लोक 7 (8.21.7)

अथ तव नरदेव सैनिकास् । तव च सुताः सुरसूनुसन्निभाः । अमितबलपुरः सरा रणे । कुरुवृषभाः शिनिपुत्रमभ्ययुः ॥

atha tava naradeva sainikās | tava ca sutāḥ surasūnusannibhāḥ | amitabalapuraḥ sarā raṇe | kuruvṛṣabhāḥ śiniputramabhyayuḥ

हे राजन्, तब आपके सैनिक और आपके देवपुत्रों जैसे पुत्र, अपार बल वाले योद्धाओं को आगे किए हुए कुरुश्रेष्ठ, युद्ध में शिनि के पुत्र सात्यकि पर चढ़ आए।

श्लोक 8 (8.21.8)

तदतिरुधिरभीममाबभौ । पुरुषवराश्वरथद्विपाकुलम् । लवणजलसमुद्धतस्वनं । बलमसुरामरसैन्यसप्रभम् ॥

tadatirudhirabhīmamābabhau | puruṣavarāśvarathadvipākulam | lavaṇajalasamuddhatasvanaṃ | balamasurāmarasainyasaprabham

रक्त से भयंकर, श्रेष्ठ पुरुषों, घोड़ों, रथों और हाथियों से भरी वह सेना खारे समुद्र की उमड़ती गर्जना के समान शब्द करती हुई असुरों और देवताओं की सेना की तरह दीप्त हो उठी।

श्लोक 9 (8.21.9)

सुरपतिसमविक्रमस्ततस् । त्रिदशवरावरजोपमं युधि । दिनकरकिरणप्रभैः पृषत्कै । रवितनयोऽभ्यहनच्छिनिप्रवीरम् ॥

surapatisamavikramastatas | tridaśavarāvarajopamaṃ yudhi | dinakarakiraṇaprabhaiḥ pṛṣatkai | ravitanayo'bhyahanacchinipravīram

तब इन्द्र के समान पराक्रमी सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यकिरणों जैसे चमकते बाणों से युद्ध में देवराज के अनुज (विष्णु) के समान शिनिवंश के वीर सात्यकि को घायल किया।

श्लोक 10 (8.21.10)

तमपि सरथवाजिसारथिं । शिनिवृषभो विविधैः शरैस्त्वरन् । भुजगविषसमप्रभै रणे । पुरुषवरं समवास्तृणोत्तदा ॥

tamapi sarathavājisārathiṃ | śinivṛṣabho vividhaiḥ śaraistvaran | bhujagaviṣasamaprabhai raṇe | puruṣavaraṃ samavāstṛṇottadā

बदले में शिनिवंश के उस वृषभ ने भी रथ, घोड़े और सारथि सहित उस श्रेष्ठ पुरुष को सर्प के विष के समान चमकते नाना प्रकार के बाणों से ढक दिया।

श्लोक 11 (8.21.11)

शिनिवृषभशरैर्निपीडितं । तव सुहृदो वसुषेणमभ्ययुः । त्वरितमतिरथा रथर्षभं । द्विरदरथाश्वपदातिभिः सह ॥

śinivṛṣabhaśarairnipīḍitaṃ | tava suhṛdo vasuṣeṇamabhyayuḥ | tvaritamatirathā ratharṣabhaṃ | dviradarathāśvapadātibhiḥ saha

शिनिवंश के वृषभ के बाणों से पीड़ित वसुषेण (कर्ण), उस रथश्रेष्ठ के पास आपके सुहृद् अतिरथी हाथियों, रथों, घोड़ों और पैदलों के साथ शीघ्र पहुँचे।

श्लोक 12 (8.21.12)

तदुदधिनिभमाद्रवद्बलं । त्वरिततरैः समभिद्रुतं परैः । द्रुपदसुतमुखैस्तदाऽभवत् । पुरुषरथाश्वगजक्षयो महान् ॥

tadudadhinibhamādravadbalaṃ | tvaritataraiḥ samabhidrutaṃ paraiḥ | drupadasutamukhaistadā'bhavat | puruṣarathāśvagajakṣayo mahān

समुद्र के समान वह सेना आगे बढ़ी, पर द्रुपद के पुत्रों के नेतृत्व में शीघ्रता से टूट पड़े शत्रुओं के हाथों उसमें मनुष्यों, रथों, घोड़ों और हाथियों का भारी संहार हुआ।

श्लोक 13 (8.21.13)

अथ पुरुषवरौ कृताह्निकौ । भवमभिपूज्य यथाविधि प्रभुम् । अरिवधकृतनिश्चयौ द्रुतं । तव बलमर्जुनकेशवौ सृतौ ॥

atha puruṣavarau kṛtāhnikau | bhavamabhipūjya yathāvidhi prabhum | arivadhakṛtaniścayau drutaṃ | tava balamarjunakeśavau sṛtau

तब पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन और केशव, नित्यकर्म पूरा करके, विधिपूर्वक प्रभु भव (शिव) की पूजा करके और शत्रुओं के वध का निश्चय करके शीघ्र आपकी सेना के पास आ पहुँचे।

श्लोक 14 (8.21.14)

जलदनिनदनिःस्वनं रथं । पवनविधूतपताककेतनम् । सितहयमुपयान्तमन्तिकं । कृतमनसो ददृशुस्तदाऽरयः ॥

jaladaninadaniḥsvanaṃ rathaṃ | pavanavidhūtapatākaketanam | sitahayamupayāntamantikaṃ | kṛtamanaso dadṛśustadā'rayaḥ

दृढ़ निश्चय किए हुए शत्रुओं ने बादल की गर्जना जैसी घरघराहट वाले, पवन से फहराती पताका और ध्वज वाले, श्वेत घोड़ों से जुते उस रथ को पास आते देखा।

श्लोक 15 (8.21.15)

अथ विष्फार्य गाण्डीवं रथे नृत्यन्निवार्जुनः । शरसम्बाधमकरोत्खं दिशः प्रदिशस्तथा ॥

atha viṣphārya gāṇḍīvaṃ rathe nṛtyannivārjunaḥ | śarasambādhamakarotkhaṃ diśaḥ pradiśastathā

तब अर्जुन ने रथ पर मानो नृत्य करते हुए गाण्डीव की टंकार की और आकाश, दिशाओं तथा उपदिशाओं को बाणों से भर दिया।

श्लोक 16 (8.21.16)

रथान्विमानप्रतिमान्मज्जयन्सायुधध्वजान् । ससारथींस्तदा बाणैरभ्राणीवानिलोऽवधीत् ॥

rathānvimānapratimānmajjayansāyudhadhvajān | sasārathīṃstadā bāṇairabhrāṇīvānilo'vadhīt

जैसे वायु बादलों को उड़ा देती है, वैसे ही उसने विमानों जैसे रथों को उनके शस्त्रों, ध्वजाओं और सारथियों सहित बाणों से नष्ट कर दिया।

श्लोक 17 (8.21.17)

गजान्गजप्रयन्तॄंश्च वैजयन्त्यायुधध्वजान् । सादिनोऽश्वांश्च पत्तींश्च शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥

gajāngajaprayantṝṃśca vaijayantyāyudhadhvajān | sādino'śvāṃśca pattīṃśca śarairninye yamakṣayam

हाथियों और उनके चालकों को, उनके पताकाओं, शस्त्रों और ध्वजाओं सहित, घुड़सवारों, घोड़ों और पैदलों को उसने बाणों से यमलोक पहुँचा दिया।

श्लोक 18 (8.21.18)

तमन्तकमिव क्रुद्धमनिवार्यं महारथम् । दुर्योधनोऽभ्ययादेको निघ्नन्बाणैरजिह्मगैः ॥

tamantakamiva kruddhamanivāryaṃ mahāratham | duryodhano'bhyayādeko nighnanbāṇairajihmagaiḥ

काल के समान क्रुद्ध, किसी से न रोके जा सकने वाले उस महारथी के सामने अकेला दुर्योधन सीधे जाने वाले बाणों की मार करता हुआ बढ़ा।

श्लोक 19 (8.21.19)

तस्यार्जुनो धनुः सूतमश्वान्केतुं च सायकैः । हत्वा सप्तभिरेकेन च्छत्रं चिच्छेद पत्रिणा ॥

tasyārjuno dhanuḥ sūtamaśvānketuṃ ca sāyakaiḥ | hatvā saptabhirekena cchatraṃ ciccheda patriṇā

अर्जुन ने सात बाणों से उसके धनुष, सारथि, घोड़ों और ध्वज को नष्ट कर दिया और एक और बाण से उसका छत्र काट डाला।

श्लोक 20 (8.21.20)

नवमं च समाधाय व्यसृजत्प्राणघातिनम् । दुर्योधनायेषुवरं तं द्रौणिः सप्तधाऽच्छिनत् ॥

navamaṃ ca samādhāya vyasṛjatprāṇaghātinam | duryodhanāyeṣuvaraṃ taṃ drauṇiḥ saptadhā'cchinat

फिर नौवाँ बाण चढ़ाकर उसने दुर्योधन पर प्राण हर लेने वाला वह उत्तम बाण छोड़ा, पर द्रोणपुत्र ने उसे सात टुकड़ों में काट दिया।

श्लोक 21 (8.21.21)

ततो द्रौणेर्धनुश्छित्वा हत्वा चाश्वरथाञ्शरैः । कृपस्यापि तदत्युग्रं धनुश्चिच्छेद पाण्डवः ॥

tato drauṇerdhanuśchitvā hatvā cāśvarathāñśaraiḥ | kṛpasyāpi tadatyugraṃ dhanuściccheda pāṇḍavaḥ

तब पाण्डव अर्जुन ने द्रोणपुत्र का धनुष काटकर बाणों से उसके घोड़े और रथ नष्ट कर दिए, और कृपाचार्य का भी भयंकर धनुष काट डाला।

श्लोक 22 (8.21.22)

हार्दिक्यस्य धनुश्छित्त्वा ध्वजं चाश्वांस्तदाऽवधीत् । दुःशासनस्येष्वसनं छित्त्वा राधेयमभ्ययात् ॥

hārdikyasya dhanuśchittvā dhvajaṃ cāśvāṃstadā'vadhīt | duḥśāsanasyeṣvasanaṃ chittvā rādheyamabhyayāt

हार्दिक्य (कृतवर्मा) का धनुष काटकर उसने उसकी ध्वजा और घोड़ों को मार गिराया, और दुःशासन का धनुष काटकर राधापुत्र कर्ण की ओर बढ़ा।

श्लोक 23 (8.21.23)

अथ सात्यकिमुत्सृज्य त्वरन्कर्णोऽर्जुनं त्रिभिः । विद्ध्वा विव्याध विंशत्या कृष्णं पार्थं पुनःपुनः ॥

atha sātyakimutsṛjya tvarankarṇo'rjunaṃ tribhiḥ | viddhvā vivyādha viṃśatyā kṛṣṇaṃ pārthaṃ punaḥpunaḥ

तब कर्ण सात्यकि को छोड़कर शीघ्र अर्जुन पर लपका, उसने तीन बाणों से अर्जुन को घायल किया, और घायल करके बीस बाणों से कृष्ण को और फिर पार्थ को बार-बार बेधा।

श्लोक 24 (8.21.24)

न ग्लानिरासीत्कर्णस्य क्षिपतः सायकान्बहून् । रणे विनिघ्नतः शत्रून्क्रुद्धस्येव शतक्रतोः ॥

na glānirāsītkarṇasya kṣipataḥ sāyakānbahūn | raṇe vinighnataḥ śatrūnkruddhasyeva śatakratoḥ

अनेक बाण छोड़ते हुए, युद्ध में शत्रुओं को क्रुद्ध इन्द्र की तरह मारते हुए कर्ण को थकान नहीं हुई।

श्लोक 25 (8.21.25)

अथ सात्यकिरागत्य कर्णं विद्ध्वा शितैः शरैः । नवत्या नवभिश्चोग्रैः शतेन पुनरार्पयत् ॥

atha sātyakirāgatya karṇaṃ viddhvā śitaiḥ śaraiḥ | navatyā navabhiścograiḥ śatena punarārpayat

तब सात्यकि ने आकर तीखे बाणों से कर्ण को बेधा, और फिर नब्बे, फिर नौ उग्र बाणों से और फिर सौ बाणों से उसे घायल किया।

श्लोक 26 (8.21.26)

ततः प्रवीराः पार्थानां सर्वे कर्णमपीडयन् । युधामन्युः शिखण्डी च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ॥

tataḥ pravīrāḥ pārthānāṃ sarve karṇamapīḍayan | yudhāmanyuḥ śikhaṇḍī ca draupadeyāḥ prabhadrakāḥ

तब पाण्डवों के सभी प्रमुख वीरों ने कर्ण को पीड़ित किया: युधामन्यु, शिखण्डी, द्रौपदी के पुत्र और प्रभद्रक,

श्लोक 27 (8.21.27)

उत्तमौजा युयुत्सुश्च यमौ पार्षत एव च । चेदिकारूषमात्स्यानां केकयानां च यद्बलं ॥

uttamaujā yuyutsuśca yamau pārṣata eva ca | cedikārūṣamātsyānāṃ kekayānāṃ ca yadbalaṃ

उत्तमौजा, युयुत्सु, दोनों जुड़वाँ (नकुल-सहदेव), पार्षत (धृष्टद्युम्न), और चेदियों, कारूषों, मात्स्यों तथा केकयों की जो सेना थी,

श्लोक 28 (8.21.28)

चेकितानश्च बलवान्धर्मराजश्च सुव्रतः । एते रथाश्वद्विरदैः पत्तिभिश्चोग्रविक्रमैः ॥

cekitānaśca balavāndharmarājaśca suvrataḥ | ete rathāśvadviradaiḥ pattibhiścogravikramaiḥ

और बलवान् चेकितान तथा दृढ़व्रती धर्मराज — ये सब रथों, घोड़ों, हाथियों और उग्र पराक्रम वाले पैदलों के साथ

श्लोक 29 (8.21.29)

परिवार्य रणे कर्णं नानाशस्त्रैरवाकिरन् । भाषन्तो वाग्भिरुग्राभिः सर्वे कर्णवधे धृताः ॥

parivārya raṇe karṇaṃ nānāśastrairavākiran | bhāṣanto vāgbhirugrābhiḥ sarve karṇavadhe dhṛtāḥ

युद्ध में कर्ण को घेरकर उस पर नाना प्रकार के शस्त्र बरसाने लगे; वे सब उग्र वाणी में ललकारते हुए कर्ण का वध करने पर तुले हुए थे।

श्लोक 30 (8.21.30)

तां शस्त्रवृष्टिं बहुधा कर्णश्छित्त्वा शितैः शरैः । अपोवाहास्त्रवीर्येण द्रुमं भङ्क्त्वेव मारुतः ॥

tāṃ śastravṛṣṭiṃ bahudhā karṇaśchittvā śitaiḥ śaraiḥ | apovāhāstravīryeṇa drumaṃ bhaṅktveva mārutaḥ

कर्ण ने तीखे बाणों से उस शस्त्र-वर्षा को अनेक प्रकार से काट डाला और अपने अस्त्र की शक्ति से उसे वैसे ही उड़ा दिया जैसे वायु वृक्ष को तोड़कर उड़ा ले जाती है।

श्लोक 31 (8.21.31)

रथिनः समहामात्रान्गजानश्वान्ससादिनः । पत्तिव्रातांश्च सङ्क्रुद्धो निघ्नन्कर्णो व्यदृश्यत ॥

rathinaḥ samahāmātrāngajānaśvānsasādinaḥ | pattivrātāṃśca saṅkruddho nighnankarṇo vyadṛśyata

क्रोध में भरा कर्ण रथियों, महावतों सहित हाथियों, सवारों सहित घोड़ों और पैदलों के झुण्डों को मारता हुआ दिखाई दिया।

श्लोक 32 (8.21.32)

तद्वध्यमानं पाण्डूनां बलं कर्णास्त्रतेजसा । विशस्त्रपत्रदेहासु प्राय आसीत्पराङ्मुखम् ॥

tadvadhyamānaṃ pāṇḍūnāṃ balaṃ karṇāstratejasā | viśastrapatradehāsu prāya āsītparāṅmukham

कर्ण के अस्त्रों के तेज से मारी जाती हुई पाण्डवों की सेना, शस्त्र खोकर और शरीर तथा प्राणों पर बाणों की मार झेलकर, प्रायः मुँह फेरने लगी।

श्लोक 33 (8.21.33)

अथ कर्णास्त्रमस्त्रेण प्रतिहत्यार्जुनः स्मयन् । दिशं खं चैव भूमिं च प्रावृणोच्छरवृष्टिभिः ॥

atha karṇāstramastreṇa pratihatyārjunaḥ smayan | diśaṃ khaṃ caiva bhūmiṃ ca prāvṛṇoccharavṛṣṭibhiḥ

तब अर्जुन ने मुस्कराते हुए कर्ण के अस्त्र को अपने अस्त्र से काटकर दिशाओं, आकाश और पृथ्वी को बाणों की वर्षा से ढक दिया।

श्लोक 34 (8.21.34)

मुसलानीव सम्पेतुः परिघा इव चेषवः । शतघ्न्य इव चाप्यन्ये वज्राण्युग्राणि चापरे ॥

musalānīva sampetuḥ parighā iva ceṣavaḥ | śataghnya iva cāpyanye vajrāṇyugrāṇi cāpare

बाण मूसलों की तरह गिरे, कुछ परिघों की तरह, कुछ शतघ्नियों की तरह और कुछ भयंकर वज्रों की तरह।

श्लोक 35 (8.21.35)

तैर्वध्यमानं तत्सैन्यं सपत्त्यश्वरथद्विपम् । निमीलिताक्षमत्यर्थं बभ्राम च ननाद च ॥

tairvadhyamānaṃ tatsainyaṃ sapattyaśvarathadvipam | nimīlitākṣamatyarthaṃ babhrāma ca nanāda ca

उनकी मार से पीड़ित वह सेना, पैदलों, घोड़ों, रथों और हाथियों सहित, आँखें मूँदकर चक्कर खाने लगी और चीत्कार करने लगी।

श्लोक 36 (8.21.36)

निष्कैवल्यं तदा युद्धं प्रापुरश्वनरद्विपाः । हन्यमानाः शरैरार्तास्तदा भीताः प्रदुद्रुवुः ॥

niṣkaivalyaṃ tadā yuddhaṃ prāpuraśvanaradvipāḥ | hanyamānāḥ śarairārtāstadā bhītāḥ pradudruvuḥ

घोड़े, मनुष्य और हाथी उस युद्ध में पहुँचे जहाँ मृत्यु निश्चित थी; बाणों से मारे जाते, पीड़ित और भयभीत होकर वे भाग खड़े हुए।

श्लोक 37 (8.21.37)

त्वदीयानां तदा युद्धे संसक्तानां जयैषिणाम् । गिरिमस्तं समासाद्य प्रत्यपद्यत भानुमान् ॥

tvadīyānāṃ tadā yuddhe saṃsaktānāṃ jayaiṣiṇām | girimastaṃ samāsādya pratyapadyata bhānumān

जब आपके योद्धा विजय की इच्छा से युद्ध में डटे हुए थे, तभी सूर्य अस्ताचल पर पहुँचकर अस्त हो गया।

श्लोक 38 (8.21.38)

तमसा च महाराज रजसा च विशेषतः । न किञ्चित्प्रत्यपश्याम शुभं वा यदि वाऽशुभम् ॥

tamasā ca mahārāja rajasā ca viśeṣataḥ | na kiñcitpratyapaśyāma śubhaṃ vā yadi vā'śubham

हे महाराज, तब अँधेरे और विशेषकर धूल के कारण हम शुभ या अशुभ कुछ भी नहीं देख सके।

श्लोक 39 (8.21.39)

ते त्रस्यन्तो महेष्वासा रात्रियुद्धस्य भारत । अपयानं ततश्चक्रुः सहिताः सर्वयोधिभिः ॥

te trasyanto maheṣvāsā rātriyuddhasya bhārata | apayānaṃ tataścakruḥ sahitāḥ sarvayodhibhiḥ

हे भारत, रात के युद्ध से डरे हुए उन महाधनुर्धरों ने सब योद्धाओं के साथ मिलकर पीछे हटना शुरू किया।

श्लोक 40 (8.21.40)

कौरवेष्वपयातेषु तदा राजन्दिनक्षये । जयं सुमनसः प्राप्य पार्थाः स्वशिबिरं ययुः ॥

kauraveṣvapayāteṣu tadā rājandinakṣaye | jayaṃ sumanasaḥ prāpya pārthāḥ svaśibiraṃ yayuḥ

हे राजन्, दिन ढलने पर कौरवों के चले जाने पर प्रसन्न मन वाले पार्थ विजय पाकर अपने शिविर को चले गए।

श्लोक 41 (8.21.41)

वादित्रशब्दैर्विविधैः सिंहनादैः सगर्जितैः । परानवहसन्तश्च स्तुवन्तश्चाच्युतार्जुनौ ॥

vāditraśabdairvividhaiḥ siṃhanādaiḥ sagarjitaiḥ | parānavahasantaśca stuvantaścācyutārjunau

नाना प्रकार के वाद्यों के शब्द, सिंहनादों और गर्जनाओं के साथ, शत्रुओं का उपहास करते हुए और अच्युत (कृष्ण) तथा अर्जुन की स्तुति करते हुए,

श्लोक 42 (8.21.42)

कृतेऽवहारे तैर्वीरैः सैनिकाः सर्व एव ते । आशीर्वाचः पाण्डवेषु प्रायुञ्जन्त नरेश्वराः ॥

kṛte'vahāre tairvīraiḥ sainikāḥ sarva eva te | āśīrvācaḥ pāṇḍaveṣu prāyuñjanta nareśvarāḥ

जब उन वीरों ने युद्ध समाप्त कर दिया, तब सभी सैनिकों और राजाओं ने पाण्डवों के लिए आशीर्वाद के वचन कहे।

श्लोक 43 (8.21.43)

ततः कृतेऽवहारे च प्रहृष्टास्तत्र पाण्डवाः । निशायां शिबिरं गत्वा न्यवसन्त नरेश्वराः ॥

tataḥ kṛte'vahāre ca prahṛṣṭāstatra pāṇḍavāḥ | niśāyāṃ śibiraṃ gatvā nyavasanta nareśvarāḥ

युद्ध समाप्त होने पर प्रसन्न पाण्डवों ने रात को अपने शिविर में जाकर, उन राजाओं के साथ, विश्राम किया।

श्लोक 44 (8.21.44)

ततो रक्षः पिशाचाश्च श्वापदाश्चैव सङ्घशः । जग्मुरायोधनं घोरं रुद्रस्याक्रीडसन्निभम् ॥

tato rakṣaḥ piśācāśca śvāpadāścaiva saṅghaśaḥ | jagmurāyodhanaṃ ghoraṃ rudrasyākrīḍasannibham

तब राक्षस, पिशाच और हिंस्र पशु झुण्ड-के-झुण्ड उस भयंकर रणभूमि में पहुँचे, जो रुद्र की क्रीड़ाभूमि जैसी थी।

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22