कर्ण पर्व · अध्याय 22
कर्ण द्वारा शल्य को सारथि बनाने की माँग
धृतराष्ट्र अर्जुन के अकेले किए पराक्रमों को गिनाकर पूछते हैं कि दुर्योधन ने आगे क्या किया, और अपनी भूल पर विलाप करते हैं; सञ्जय उन्हें याद दिलाते हैं कि उन्होंने हर चेतावनी की अनसुनी की। सत्रहवें दिन की सुबह कर्ण प्रतिज्ञा करता है कि आज या तो वह अर्जुन को मारेगा या स्वयं मरेगा; वह परशुराम के दिए दिव्य धनुष विजय का वर्णन करता है और मानता है कि अर्जुन के पास गाण्डीव, सारथि कृष्ण तथा अग्नि का दिया वानर-ध्वज वाला रथ है। इस कमी को पूरा करने के लिए वह दुर्योधन से कहता है कि अश्व-विद्या के ज्ञाता शल्य उसके सारथि बनें; दुर्योधन मान जाता है और मद्रराज के पास जाता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (8.22.1)
स्वेन च्छन्देन नः सर्वानवधीद्व्यक्तमर्जुनः । न ह्यस्य समरे मुच्येदन्तकोऽप्याततायिनः ॥
svena cchandena naḥ sarvānavadhīdvyaktamarjunaḥ | na hyasya samare mucyedantako'pyātatāyinaḥ
अर्जुन ने अपनी इच्छा से हम सब को स्पष्ट ही मार डाला है; शस्त्र उठाए हुए इस अर्जुन के हाथ से युद्ध में तो यमराज भी नहीं छूट सकता।
श्लोक 2 (8.22.2)
पार्थो ह्येकोऽहरद्भद्रामेकश्चाग्निमतर्पयत् । एकश्चेमां महीं जित्वा चक्रे बलिभृतो नृपान् ॥
pārtho hyeko'haradbhadrāmekaścāgnimatarpayat | ekaścemāṃ mahīṃ jitvā cakre balibhṛto nṛpān
पार्थ ने अकेले ही भद्रा (सुभद्रा) का हरण किया, अकेले ही अग्नि को तृप्त किया, और अकेले ही इस पृथ्वी को जीतकर राजाओं से कर दिलवाया।
श्लोक 3 (8.22.3)
एको निवातकवचानहनद्दिव्यकार्मुकः । एकः किरातरूपेण स्थितं शर्वमयोधयत् ॥
eko nivātakavacānahanaddivyakārmukaḥ | ekaḥ kirātarūpeṇa sthitaṃ śarvamayodhayat
अकेले ही उस दिव्य धनुषधारी ने निवातकवचों को मारा; अकेले ही उसने किरात का रूप धरकर खड़े शर्व (शिव) से युद्ध किया।
श्लोक 4 (8.22.4)
एको ह्यरक्षद्भरतानेको भवमतोषयत् । तेनैकेन जिताः सर्वे मदीया ह्युग्रतेजसः ॥
eko hyarakṣadbharatāneko bhavamatoṣayat | tenaikena jitāḥ sarve madīyā hyugratejasaḥ
अकेले ही उसने भरतवंशियों की रक्षा की, अकेले ही भव (शिव) को प्रसन्न किया। उसी एक ने मेरे उग्र तेज वाले सब योद्धाओं को जीत लिया।
श्लोक 5 (8.22.5)
न ते निन्द्याः प्रशस्यास्ते यत्ते चक्रुर्ब्रवीहि तत् । ततो दुर्योधनः सूत पश्चात्किमकरोत्तदा ॥
na te nindyāḥ praśasyāste yatte cakrurbravīhi tat | tato duryodhanaḥ sūta paścātkimakarottadā
वे (पाण्डव) निन्दा के योग्य नहीं हैं; उन्होंने जो कुछ किया उसके लिए वे प्रशंसा के योग्य हैं। वह मुझे बताओ। हे सूत, तब उसके बाद दुर्योधन ने क्या किया?
सञ्जय उवाच
श्लोक 6 (8.22.6)
हतप्रहतविध्वस्ता विवर्मायुधवाहनाः । दीनस्वरा दूयमाना मानिनः शत्रुनिर्जिताः ॥
hataprahatavidhvastā vivarmāyudhavāhanāḥ | dīnasvarā dūyamānā māninaḥ śatrunirjitāḥ
अभिमानी कौरव मार खाए, घायल और बिखरे हुए थे; कवच, आयुध और वाहनों से रहित थे; उनके स्वर दीन थे और मन व्यथित थे, और वे शत्रुओं से हार चुके थे।
श्लोक 7 (8.22.7)
शिबिरस्थाः पुनर्मन्त्रं मन्त्रयन्ति स्म कौरवाः । भग्नदंष्ट्रा हतविषाः पादाक्रान्ता इवोरगाः ॥
śibirasthāḥ punarmantraṃ mantrayanti sma kauravāḥ | bhagnadaṃṣṭrā hataviṣāḥ pādākrāntā ivoragāḥ
शिविर में बैठे कौरव फिर से मन्त्रणा करने लगे—टूटे दाँतों वाले, विषहीन और पैरों तले कुचले हुए साँपों के समान।
श्लोक 8 (8.22.8)
तानब्रवीत्ततः कर्णः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् । करं करेण निष्पीड्य प्रेक्षमाणस्तवात्मजम् ॥
tānabravīttataḥ karṇaḥ kruddhaḥ sarpa iva śvasan | karaṃ kareṇa niṣpīḍya prekṣamāṇastavātmajam
तब क्रोध से भरे कर्ण ने साँप की तरह फुफकारते हुए, एक हाथ को दूसरे हाथ से मसलते और आपके पुत्र की ओर देखते हुए उनसे कहा।
कर्ण उवाच
श्लोक 9 (8.22.9)
यत्तो दृढश्च दक्षश्च धृतिमानर्जुनः सदा । सम्बोधयति चाप्येनं यथाकालमधोक्षजः ॥
yatto dṛḍhaśca dakṣaśca dhṛtimānarjunaḥ sadā | sambodhayati cāpyenaṃ yathākālamadhokṣajaḥ
अर्जुन सदा सावधान, दृढ़, कुशल और धैर्यवान् है, और अधोक्षज (कृष्ण) समय-समय पर उसे चेताते और जगाते रहते हैं।
श्लोक 10 (8.22.10)
सहसाऽस्त्रविसर्गेण वयं तेनाद्य वञ्चिताः । श्वस्त्वहं तस्य सङ्कल्पं सर्वं हन्ता महीपते ॥
sahasā'stravisargeṇa vayaṃ tenādya vañcitāḥ | śvastvahaṃ tasya saṅkalpaṃ sarvaṃ hantā mahīpate
अपने अस्त्रों की अचानक वर्षा से उसने आज हमें छल लिया; किन्तु हे महीपते, कल मैं उसके सारे संकल्प को नष्ट कर दूँगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 11 (8.22.11)
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सोऽनुजज्ञे नृपोत्तमान् । तेऽनुज्ञाता नृपाः सर्वे स्वानि वेश्मानि भेजिरे ॥
evamuktastathetyuktvā so'nujajñe nṛpottamān | te'nujñātā nṛpāḥ sarve svāni veśmāni bhejire
ऐसा कहे जाने पर उसने "ऐसा ही हो" कहकर श्रेष्ठ राजाओं को जाने की अनुमति दी, और अनुमति पाकर वे सब राजा अपने-अपने आवासों में चले गए।
श्लोक 12 (8.22.12)
सुखोषितास्तां रजनीं हृष्टा युद्धाय निर्ययुः । तेऽपश्यन्विहितं व्यूहं धर्मराजेन दुर्जयम् । प्रयत्नात्कुरुमुख्येन बृहस्पत्युशनोमतात् ॥
sukhoṣitāstāṃ rajanīṃ hṛṣṭā yuddhāya niryayuḥ | te'paśyanvihitaṃ vyūhaṃ dharmarājena durjayam | prayatnātkurumukhyena bṛhaspatyuśanomatāt
उस रात सुखपूर्वक विश्राम करके वे हर्षित होकर युद्ध के लिए निकले। उन्होंने देखा कि कुरुओं के प्रमुख धर्मराज ने बृहस्पति और उशना के मत के अनुसार बड़े यत्न से दुर्जेय व्यूह रचा है।
श्लोक 13 (8.22.13)
अथ प्रतीपकर्तारं प्रवीरं परवीरहा । सस्मार वृषभस्कन्धं कर्णं दुर्योधनस्तदा ॥
atha pratīpakartāraṃ pravīraṃ paravīrahā | sasmāra vṛṣabhaskandhaṃ karṇaṃ duryodhanastadā
तब शत्रुवीरों का संहार करने वाले दुर्योधन को वृषभ के समान कन्धों वाले, शत्रुओं के प्रतिकूल खड़े होने वाले महावीर कर्ण का स्मरण हुआ।
श्लोक 14 (8.22.14)
पुरन्दरसमं युद्धे मरुद्गणसमं बले । कार्तवीर्यसमं वीर्ये कर्णं राज्ञोऽगमन्मनः ॥
purandarasamaṃ yuddhe marudgaṇasamaṃ bale | kārtavīryasamaṃ vīrye karṇaṃ rājño'gamanmanaḥ
राजा का मन कर्ण की ओर गया, जो युद्ध में इन्द्र के, बल में मरुद्गणों के और पराक्रम में कार्तवीर्य के समान था।
श्लोक 15 (8.22.15)
सर्वेषां चैव सैन्यानां कर्णमेवागमन्मनः । सूतपुत्रं महेष्वासं बन्धुमात्ययिकेष्विव ॥
sarveṣāṃ caiva sainyānāṃ karṇamevāgamanmanaḥ | sūtaputraṃ maheṣvāsaṃ bandhumātyayikeṣviva
और सारी सेनाओं का मन भी केवल कर्ण की ओर गया—उस महान् धनुर्धर सूतपुत्र की ओर, जैसे प्राणसंकट की घड़ी में अपने बन्धु की ओर मन जाता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 16 (8.22.16)
ततो दुर्योधनः सूत पश्चात्किमकरोत्तदा । यद्वोऽगमन्मनो मन्दाः कर्णं वैकर्तनं प्रति ॥
tato duryodhanaḥ sūta paścātkimakarottadā | yadvo'gamanmano mandāḥ karṇaṃ vaikartanaṃ prati
हे सूत, तब दुर्योधन ने उसके बाद क्या किया, जब तुम मन्दबुद्धियों का मन वैकर्तन कर्ण की ओर गया?
श्लोक 17 (8.22.17)
अप्यपश्यत राधेयं शीतार्ता इव भास्करम् । कृतेऽवहारे सैन्यानां प्रवृत्ते च रणे पुनः ॥
apyapaśyata rādheyaṃ śītārtā iva bhāskaram | kṛte'vahāre sainyānāṃ pravṛtte ca raṇe punaḥ
जब सेनाएँ लौटा ली गई थीं और युद्ध फिर आरम्भ हुआ, तब क्या तुमने राधापुत्र की ओर वैसे ही देखा, जैसे जाड़े से ठिठुरे लोग सूर्य की ओर देखते हैं?
श्लोक 18 (8.22.18)
दुर्योधनं च तत्राजौ पाण्डवेन भृशार्दितम् । पराक्रान्तान्पाण्डुसुतान्दृष्ट्वाऽपि भृशार्दितम् ॥
duryodhanaṃ ca tatrājau pāṇḍavena bhṛśārditam | parākrāntānpāṇḍusutāndṛṣṭvā'pi bhṛśārditam
वहाँ युद्ध में दुर्योधन एक पाण्डव से बुरी तरह पीड़ित हुआ, और पराक्रम से बढ़ते हुए पाण्डुपुत्रों को देखकर भी वह अत्यन्त व्यथित था।
श्लोक 19 (8.22.19)
कथं वैकर्तनः कर्णस्तत्रायुध्यत सञ्जय । कथं च पाण्डवाः सर्वे युयुधुस्तत्र सूतजम् ॥
kathaṃ vaikartanaḥ karṇastatrāyudhyata sañjaya | kathaṃ ca pāṇḍavāḥ sarve yuyudhustatra sūtajam
हे सञ्जय, वैकर्तन कर्ण वहाँ कैसे लड़ा, और सब पाण्डवों ने उस सूतपुत्र से कैसे युद्ध किया?
श्लोक 20 (8.22.20)
कर्णो ह्येको महाबाहुर्हन्यात्पार्थान्ससृञ्जयान् । कर्णस्य भुजयोर्वीर्यं शक्रविष्णुसमं युधि ॥
karṇo hyeko mahābāhurhanyātpārthānsasṛñjayān | karṇasya bhujayorvīryaṃ śakraviṣṇusamaṃ yudhi
महाबाहु कर्ण अकेला ही पार्थों को सृञ्जयों सहित मार सकता है; युद्ध में कर्ण की दोनों भुजाओं का बल इन्द्र और विष्णु के समान माना जाता है।
श्लोक 21 (8.22.21)
तस्य शस्त्राणि घोराणि विक्रमश्च महात्मनः । कर्णमाश्रित्य सङ्ग्रामे मत्तो दुर्योधनो नृपः ॥
tasya śastrāṇi ghorāṇi vikramaśca mahātmanaḥ | karṇamāśritya saṅgrāme matto duryodhano nṛpaḥ
उस महात्मा के शस्त्र भयंकर हैं और उसका पराक्रम भी; और रण में कर्ण का आश्रय लेकर राजा दुर्योधन मद से चूर हो रहा है।
श्लोक 22 (8.22.22)
दुर्योधनं ततो दृष्ट्वा पाण्डवेन भृशार्दितम् । पराक्रान्तान्पाण्डुसुतान्दृष्ट्वा चापि महारथः ॥
duryodhanaṃ tato dṛṣṭvā pāṇḍavena bhṛśārditam | parākrāntānpāṇḍusutāndṛṣṭvā cāpi mahārathaḥ
उस महारथी ने दुर्योधन को पाण्डव से बुरी तरह पीड़ित होते देखा था और पराक्रम से बढ़ते पाण्डुपुत्रों को भी देखा था,
श्लोक 23 (8.22.23)
कर्णमाश्रित्य सङ्ग्रामे मन्दो दुर्योधनः पुनः । जेतुमुत्सहते पार्थान्सपुत्रान्सहकेशवान् ॥
karṇamāśritya saṅgrāme mando duryodhanaḥ punaḥ | jetumutsahate pārthānsaputrānsahakeśavān
फिर भी युद्ध में कर्ण के सहारे वह मूर्ख दुर्योधन पुत्रों और केशव सहित पार्थों को जीतने का साहस फिर करता है।
श्लोक 24 (8.22.24)
यः सौबलं तथा तात नीतिमानिति मन्यते । कर्णं चाप्रतिमं युद्धे देवैरपि दुरुत्सहम् ॥
yaḥ saubalaṃ tathā tāta nītimāniti manyate | karṇaṃ cāpratimaṃ yuddhe devairapi durutsaham
जो सौबल (शकुनि) को नीतिमान् मानता है और कर्ण को युद्ध में अप्रतिम तथा देवताओं के लिए भी असह्य समझता है,
श्लोक 25 (8.22.25)
मन्यतेऽभ्यधिकं पार्थादेवं चास्य हृदि स्थितम् । विजेष्यति रणे कर्ण एकः पार्थान्ससोमकान् । मम चैव सदा मन्दः शंसते नित्यमग्रतः ॥
manyate'bhyadhikaṃ pārthādevaṃ cāsya hṛdi sthitam | vijeṣyati raṇe karṇa ekaḥ pārthānsasomakān | mama caiva sadā mandaḥ śaṃsate nityamagrataḥ
वह उसे पार्थ से बढ़कर मानता है, और उसके मन में यही बैठा है—"रण में अकेला कर्ण ही पार्थों को सोमकों सहित जीत लेगा।" वह मूढ़ यही बात सदा मेरे सामने कहता रहता है।
श्लोक 26 (8.22.26)
अहो बत महद्दुःखं यत्र पाण्डुसुतान्रणे । नातरद्रभसः कर्णो दैवं नूनं परायणम् ॥
aho bata mahadduḥkhaṃ yatra pāṇḍusutānraṇe | nātaradrabhasaḥ karṇo daivaṃ nūnaṃ parāyaṇam
हाय, कितना बड़ा दुःख है कि वेगशाली कर्ण भी रण में पाण्डवों को पार न कर सका। निश्चय ही दैव ही अन्तिम आश्रय है।
श्लोक 27 (8.22.27)
अहो द्यूतस्य निष्ठेयं घोरा सम्प्रति वर्तते ॥
aho dyūtasya niṣṭheyaṃ ghorā samprati vartate
हाय, उस द्यूत का यह परिणाम अब कितना भयंकर होकर सामने आ रहा है!
श्लोक 28 (8.22.28)
अहो तीव्राणि दुःखानि दुर्योधनकृतान्यहम् । सोढा घोराणि बहुशः शल्यभूतानि सञ्जय ॥
aho tīvrāṇi duḥkhāni duryodhanakṛtānyaham | soḍhā ghorāṇi bahuśaḥ śalyabhūtāni sañjaya
हाय सञ्जय, दुर्योधन के किए हुए तीखे और भयंकर दुःखों को, जो काँटों की तरह हृदय में चुभते रहे, मैंने बार-बार सहा है।
श्लोक 29 (8.22.29)
सौबलं च तदा तात नीतिमानिति मन्यते । कर्णश्च रभसो नित्यं राजानं चाप्यनुव्रतः ॥
saubalaṃ ca tadā tāta nītimāniti manyate | karṇaśca rabhaso nityaṃ rājānaṃ cāpyanuvrataḥ
और हे तात, वह उस समय सौबल को नीतिमान् मानता था, तथा कर्ण को भी, जो सदा वेगशाली और राजा के प्रति समर्पित है।
श्लोक 30 (8.22.30)
यदेवं वर्तमानेषु महायुद्धेषु सञ्जय । अश्रौषं निहतान्पुत्रान्नित्यमेव विनिर्जितान् ॥
yadevaṃ vartamāneṣu mahāyuddheṣu sañjaya | aśrauṣaṃ nihatānputrānnityameva vinirjitān
हे सञ्जय, ऐसे महायुद्धों के चलते रहने पर भी मैं बराबर यही सुनता रहा कि मेरे पुत्र मारे जा रहे हैं और सदा हारते ही जा रहे हैं।
श्लोक 31 (8.22.31)
न पाण्डवानां समरे कश्चिदस्ति हतः किल । स्त्रीमध्यमिव गाहन्ते दैवं तु बलवत्तरम् ॥
na pāṇḍavānāṃ samare kaścidasti hataḥ kila | strīmadhyamiva gāhante daivaṃ tu balavattaram
निश्चय ही पाण्डवों में से एक भी रण में मारा नहीं गया; वे हमारी सेना में ऐसे घुसते हैं मानो स्त्रियों की भीड़ में घुस रहे हों। दैव ही अधिक बलवान् है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 32 (8.22.32)
राजन्पूर्वनिमित्तानि धर्मिष्ठानि विचिन्तय ॥
rājanpūrvanimittāni dharmiṣṭhāni vicintaya
हे राजन्, पहले के उन निमित्तों पर विचार कीजिए, जो अत्यन्त धर्ममय थे।
श्लोक 33 (8.22.33)
अतिक्रान्तं हि यत्कार्यं पश्चाच्चिन्तयते नरः । तच्चास्य न भवेत्कार्यं चिन्तया च विनश्यति ॥
atikrāntaṃ hi yatkāryaṃ paścāccintayate naraḥ | taccāsya na bhavetkāryaṃ cintayā ca vinaśyati
जो मनुष्य बीते हुए कार्य के विषय में बाद में सोचता है, वह कार्य फिर उसके हाथ का नहीं रह जाता, और वह चिन्ता से ही नष्ट होता है।
श्लोक 34 (8.22.34)
तदिदं तव कार्यं तु दूरप्राप्तं विजानता । न कृतं यत्त्वया पूर्वं प्राप्ताप्राप्तविचारणम् ॥
tadidaṃ tava kāryaṃ tu dūraprāptaṃ vijānatā | na kṛtaṃ yattvayā pūrvaṃ prāptāprāptavicāraṇam
आपका यह कार्य अब बहुत दूर तक बढ़ चुका है, जैसा आप जानते हैं; किन्तु आपने पहले उचित और अनुचित का विचार नहीं किया।
श्लोक 35 (8.22.35)
उक्तोऽसि बहुधा राजन्मा युध्यस्वेति पाण्डवैः । न च तत्त्वग्रहीर्द्वेषात्पाण्डवेषु विशाम्पते ॥
ukto'si bahudhā rājanmā yudhyasveti pāṇḍavaiḥ | na ca tattvagrahīrdveṣātpāṇḍaveṣu viśāmpate
हे राजन्, पाण्डवों ने आपसे बहुत बार कहा था कि "युद्ध मत कीजिए"; पर हे विशाम्पते, पाण्डवों के प्रति द्वेष के कारण आपने उसे नहीं माना।
श्लोक 36 (8.22.36)
त्वया पापानि घोराणि समाचीर्णानि पाण्डुषु । त्वत्कृते वर्तते घोरः पार्थिवानां जनक्षयः ॥
tvayā pāpāni ghorāṇi samācīrṇāni pāṇḍuṣu | tvatkṛte vartate ghoraḥ pārthivānāṃ janakṣayaḥ
आपने पाण्डवों के प्रति भयंकर पाप किए; आपके ही कारण राजाओं का यह घोर संहार हो रहा है।
श्लोक 37 (8.22.37)
तत्त्विदानीमतिक्रान्तं मा शुचो भरतर्षभ । शृणु सर्वं यथावृत्तं घोरं वैशसमुच्यते ॥
tattvidānīmatikrāntaṃ mā śuco bharatarṣabha | śṛṇu sarvaṃ yathāvṛttaṃ ghoraṃ vaiśasamucyate
पर जो बीत चुका सो बीत चुका; हे भरतश्रेष्ठ, शोक न कीजिए। जैसा हुआ वैसा सब सुनिए—वह भयंकर संहार अब कहा जा रहा है।
श्लोक 38 (8.22.38)
प्रभातायां रजन्यां तु कर्णो राजानमभ्ययात् । समेत्य च महाबाहुर्दुर्योधनमथाब्रवीत् ॥
prabhātāyāṃ rajanyāṃ tu karṇo rājānamabhyayāt | sametya ca mahābāhurduryodhanamathābravīt
रात बीतकर प्रभात होने पर कर्ण राजा के पास गया, और उससे मिलकर उस महाबाहु ने दुर्योधन से कहा।
कर्ण उवाच
श्लोक 39 (8.22.39)
अद्य राजन्समेष्यामि पाण्डवेन यशस्विना । निहनिष्यामि तं वीरं स वा मां निहनिष्यति ॥
adya rājansameṣyāmi pāṇḍavena yaśasvinā | nihaniṣyāmi taṃ vīraṃ sa vā māṃ nihaniṣyati
हे राजन्, आज मैं यशस्वी पाण्डव से भिड़ूँगा; या तो मैं उस वीर को मारूँगा, या वह मुझे मारेगा।
श्लोक 40 (8.22.40)
बहुत्वान्मम कार्याणां तथा पार्थस्य भारत । नाभूत्समागमो राजन्मम चैवार्जुनस्य च ॥
bahutvānmama kāryāṇāṃ tathā pārthasya bhārata | nābhūtsamāgamo rājanmama caivārjunasya ca
हे भारत, मेरे और पार्थ के भी बहुत-से कार्य होने के कारण, हे राजन्, मेरी और अर्जुन की भेंट अब तक नहीं हो पाई।
श्लोक 41 (8.22.41)
इदं तु मे यथाप्रज्ञं शृणु वाक्यं विशाम्पते । अनिहत्य रणे पार्थं नाहमेष्यामि भारत ॥
idaṃ tu me yathāprajñaṃ śṛṇu vākyaṃ viśāmpate | anihatya raṇe pārthaṃ nāhameṣyāmi bhārata
हे विशाम्पते, मेरी समझ के अनुसार जो मेरी बात है, उसे सुनिए: हे भारत, रण में पार्थ को मारे बिना मैं नहीं लौटूँगा।
श्लोक 42 (8.22.42)
हतप्रवीरे सैन्येऽस्मिन्मयि चावस्थिते युधि । अभियास्यति मां पार्थः शक्रशक्तिविनाकृतम् ॥
hatapravīre sainye'sminmayi cāvasthite yudhi | abhiyāsyati māṃ pārthaḥ śakraśaktivinākṛtam
इस सेना के प्रमुख वीर मारे जा चुकने पर और मेरे युद्धभूमि में डटे रहने पर, पार्थ मुझ पर चढ़ आएगा—उस समय जब मेरे पास इन्द्र की शक्ति नहीं रहेगी।
श्लोक 43 (8.22.43)
ततः श्रेयस्करं यच्च तन्निबोध जनेश्वर । आयुधानां च मे वीर्यं दिव्यानामर्जुनस्य च ॥
tataḥ śreyaskaraṃ yacca tannibodha janeśvara | āyudhānāṃ ca me vīryaṃ divyānāmarjunasya ca
हे जनेश्वर, अब वह सुनिए जो आपके लिए सबसे हितकर है—मेरे आयुधों का बल, और अर्जुन के दिव्य आयुधों का भी।
श्लोक 44 (8.22.44)
कार्यस्य महतो भेदे लाघवे दूरपातने । सौष्ठवे चास्त्रपाते च सव्यसाची न मत्समः ॥
kāryasya mahato bhede lāghave dūrapātane | sauṣṭhave cāstrapāte ca savyasācī na matsamaḥ
किसी बड़े लक्ष्य को भेदने में, फुर्ती में, दूर तक मार करने में, कौशल में और अस्त्र छोड़ने में सव्यसाची मेरे बराबर नहीं है।
श्लोक 45 (8.22.45)
प्राणे शौर्येऽथ विज्ञाने विक्रमे चापि भारत । निमित्तज्ञानयोगे च सव्यसाची न मत्समः ॥
prāṇe śaurye'tha vijñāne vikrame cāpi bhārata | nimittajñānayoge ca savyasācī na matsamaḥ
हे भारत, देह-बल में, शौर्य में, विज्ञान में, पराक्रम में और लक्ष्य के सही निर्णय की कला में सव्यसाची मेरे बराबर नहीं है।
श्लोक 46 (8.22.46)
सर्वायुधमहामात्रं विजयं नाम तद्धनुः । इन्द्रार्थं प्रियकामेन निर्मितं विश्वकर्मणा ॥
sarvāyudhamahāmātraṃ vijayaṃ nāma taddhanuḥ | indrārthaṃ priyakāmena nirmitaṃ viśvakarmaṇā
विजय नाम का एक धनुष है, जो सब आयुधों में श्रेष्ठ है; इन्द्र के लिए, उनका प्रिय करने की इच्छा से, विश्वकर्मा ने उसे बनाया था।
श्लोक 47 (8.22.47)
येन दैत्यगणान्राजञ्जितवान्वै शतक्रतुः । यस्य घोषेण दैत्यानां व्यामुह्यन्त दिशो दश ॥
yena daityagaṇānrājañjitavānvai śatakratuḥ | yasya ghoṣeṇa daityānāṃ vyāmuhyanta diśo daśa
हे राजन्, उसी से शतक्रतु इन्द्र ने दैत्यगणों को जीता था; उसकी टंकार से दैत्यों के लिए दसों दिशाएँ भ्रम में पड़ गई थीं।
श्लोक 48 (8.22.48)
तद्भार्गवाय प्रायच्छच्छक्रः परमसम्मतम् । तद्दिव्यं भार्गवो मह्यमददद्धनुरुत्तमम् ॥
tadbhārgavāya prāyacchacchakraḥ paramasammatam | taddivyaṃ bhārgavo mahyamadadaddhanuruttamam
शक्र (इन्द्र) ने उस परम माननीय धनुष को भार्गव (परशुराम) को दिया, और भार्गव ने वही दिव्य उत्तम धनुष मुझे दे दिया।
श्लोक 49 (8.22.49)
तेन योत्स्ये महाबाहुमर्जुनं जयतां वरम् । यथेन्द्रः समरे सर्वान्दैतेयान्वै समागतान् । निजघान तथा सर्वाञ्जेष्यामि युधि पाण्डवान् ॥
tena yotsye mahābāhumarjunaṃ jayatāṃ varam | yathendraḥ samare sarvāndaiteyānvai samāgatān | nijaghāna tathā sarvāñjeṣyāmi yudhi pāṇḍavān
उसी से मैं महाबाहु अर्जुन से, जो विजेताओं में श्रेष्ठ है, युद्ध करूँगा; और जैसे इन्द्र ने रण में एकत्र हुए सब दैत्यों को मार गिराया था, वैसे ही मैं युद्ध में सब पाण्डवों को जीतूँगा।
श्लोक 50 (8.22.50)
धनुर्घोरं रामदत्तं गाण्डीवात्तद्विशिष्यते । त्रिस्सप्तकृत्वः पृथिवी धनुषा येन निर्जिता ॥
dhanurghoraṃ rāmadattaṃ gāṇḍīvāttadviśiṣyate | trissaptakṛtvaḥ pṛthivī dhanuṣā yena nirjitā
परशुराम का दिया हुआ वह भयंकर धनुष गाण्डीव से भी बढ़कर है; उसी धनुष से पृथ्वी इक्कीस बार जीती गई थी।
श्लोक 51 (8.22.51)
धनुषो ह्यस्य कर्माणि दिव्यानि प्राह भार्गवः । तद्रामो ह्यददन्मह्यं तेन योत्स्यामि पाण्डवम् ॥
dhanuṣo hyasya karmāṇi divyāni prāha bhārgavaḥ | tadrāmo hyadadanmahyaṃ tena yotsyāmi pāṇḍavam
भार्गव ने इस धनुष के दिव्य कर्मों का वर्णन किया था; राम ने वही मुझे दिया, और उसी से मैं पाण्डव से युद्ध करूँगा।
श्लोक 52 (8.22.52)
अद्य दुर्योधनाहं त्वां नन्दयिष्ये सबान्धवम् । निहत्य समरे वीरमर्जुनं जयतां वरम् ॥
adya duryodhanāhaṃ tvāṃ nandayiṣye sabāndhavam | nihatya samare vīramarjunaṃ jayatāṃ varam
हे दुर्योधन, आज मैं विजेताओं में श्रेष्ठ वीर अर्जुन को रण में मारकर तुम्हें और तुम्हारे बन्धुओं को आनन्दित करूँगा।
श्लोक 53 (8.22.53)
सपर्वतवनद्वीपा हतवीरा ससागरा । पुत्रपौत्रप्रतिष्ठा ते भविष्यत्यद्य पार्थिव ॥
saparvatavanadvīpā hatavīrā sasāgarā | putrapautrapratiṣṭhā te bhaviṣyatyadya pārthiva
हे राजन्, आज पर्वत, वन, द्वीप और सागरों सहित यह पृथ्वी, अपने वीरों के मारे जाने पर, तुम्हारे पुत्रों और पौत्रों के लिए स्थिर हो जाएगी।
श्लोक 54 (8.22.54)
नाशक्यं विद्यते मेऽद्य त्वत्प्रियार्थं विशेषतः । सम्यग्धर्मानुरक्तस्य सिद्धिरात्मवतो यथा ॥
nāśakyaṃ vidyate me'dya tvatpriyārthaṃ viśeṣataḥ | samyagdharmānuraktasya siddhirātmavato yathā
आज मेरे लिए कुछ भी असाध्य नहीं है, विशेषकर तुम्हारा प्रिय करने के लिए; जैसे धर्म में भली-भाँति अनुरक्त संयमी पुरुष को सिद्धि मिलती है।
श्लोक 55 (8.22.55)
न हि मे विक्रमं सोढुं स शक्तोऽग्निं तरुर्यथा । अवश्यं तु मया वाच्यं येन हीनोऽस्मि फल्गुनात् ॥
na hi me vikramaṃ soḍhuṃ sa śakto'gniṃ taruryathā | avaśyaṃ tu mayā vācyaṃ yena hīno'smi phalgunāt
जैसे वृक्ष अग्नि को नहीं सह सकता, वैसे ही वह मेरे पराक्रम को सहने में समर्थ नहीं है। किन्तु मुझे यह अवश्य कहना है कि मैं फल्गुन से किस बात में हीन हूँ।
श्लोक 56 (8.22.56)
ज्या तस्य धनुषो दिव्या तथाऽक्षय्ये महेषुधी । सारथिस्तस्य गोविन्दो मम तादृङ् न विद्यते ॥
jyā tasya dhanuṣo divyā tathā'kṣayye maheṣudhī | sārathistasya govindo mama tādṛṅ na vidyate
उसके धनुष की डोरी दिव्य है, उसके दोनों महान् तरकस कभी खाली नहीं होते, और उसके सारथि स्वयं गोविन्द हैं। मेरे पास वैसा कोई नहीं है।
श्लोक 57 (8.22.57)
तस्य दिव्यं धनुः श्रेष्ठं गाण्डीवमजितं युधि । विजयं च महद्दिव्यं ममापि धनुरुत्तमम् ॥
tasya divyaṃ dhanuḥ śreṣṭhaṃ gāṇḍīvamajitaṃ yudhi | vijayaṃ ca mahaddivyaṃ mamāpi dhanuruttamam
उसके पास युद्ध में अजेय दिव्य और श्रेष्ठ धनुष गाण्डीव है; पर मेरे पास भी विजय नाम का महान् दिव्य उत्तम धनुष है।
श्लोक 58 (8.22.58)
तत्राहमधिकः पार्थाद्धनुषा तेन पार्थिव । येन चाप्यधिको वीरः पाण्डवस्तन्निबोध मे ॥
tatrāhamadhikaḥ pārthāddhanuṣā tena pārthiva | yena cāpyadhiko vīraḥ pāṇḍavastannibodha me
हे राजन्, उस धनुष के कारण मैं पार्थ से बढ़कर हूँ; अब मुझसे सुनिए कि किस बात में वह पाण्डव वीर बढ़कर है।
श्लोक 59 (8.22.59)
रश्मिग्राहश्च दाशार्हः सर्वलोकनमस्कृतः । अग्निदत्तश्च वै दिव्यो रथः काञ्चनभूषणः ॥
raśmigrāhaśca dāśārhaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ | agnidattaśca vai divyo rathaḥ kāñcanabhūṣaṇaḥ
उसकी लगाम सँभालने वाले दाशार्ह (कृष्ण) हैं, जिन्हें सब लोक नमस्कार करते हैं; और अग्नि का दिया हुआ उसका रथ दिव्य है तथा सोने से सजा है।
श्लोक 60 (8.22.60)
अच्छेद्याः सर्वतो वीर वाजिनश्च मनोजवाः । ध्वजश्च दिव्यो द्युतिमान्वानरोपि भयङ्करः ॥
acchedyāḥ sarvato vīra vājinaśca manojavāḥ | dhvajaśca divyo dyutimānvānaropi bhayaṅkaraḥ
हे वीर, उसके मन के समान वेग वाले घोड़े किसी ओर से भी काटे नहीं जा सकते; और उसकी ध्वजा दिव्य और तेजस्वी है, जिस पर भयंकर वानर बना है।
श्लोक 61 (8.22.61)
कृष्णश्च जगतः स्रष्टा रथं तमभिरक्षति । एभिस्त्रिभिरहं हीनो योद्धुमिच्छामि पाण्डवम् ॥
kṛṣṇaśca jagataḥ sraṣṭā rathaṃ tamabhirakṣati | ebhistribhirahaṃ hīno yoddhumicchāmi pāṇḍavam
और जगत् के स्रष्टा कृष्ण उस रथ की रक्षा करते हैं। इन तीनों से रहित होकर मुझे पाण्डव से युद्ध करना है।
श्लोक 62 (8.22.62)
अयं तु सदृशः शौरेः शल्यः समितिशोभनः । सारथ्यं यदि मे कुर्याद्ध्रुवस्ते विजयो भवेत् ॥
ayaṃ tu sadṛśaḥ śaureḥ śalyaḥ samitiśobhanaḥ | sārathyaṃ yadi me kuryāddhruvaste vijayo bhavet
यह शल्य शौरि (कृष्ण) के समान है और युद्ध की शोभा है; यदि वह मेरा सारथ्य करे, तो तुम्हारी विजय निश्चित हो जाएगी।
श्लोक 63 (8.22.63)
तस्य मे सारथिः शल्यो भवत्वसुकरः परैः । नाराचान्गार्ध्रपत्रांश्च शकटानि वहन्तु मे ॥
tasya me sārathiḥ śalyo bhavatvasukaraḥ paraiḥ | nārācāngārdhrapatrāṃśca śakaṭāni vahantu me
शत्रुओं के लिए जिनसे निपटना कठिन है, वे शल्य मेरे सारथि बनें; और गाड़ियाँ मेरे नाराच और गृध्र-पंख वाले बाण ढोएँ।
श्लोक 64 (8.22.64)
रथाश्च मुख्या राजेन्द्र युक्ता वाजिभिरुत्तमैः । आयान्तु पश्चात्सततं मामेव भरतर्षभ ॥
rathāśca mukhyā rājendra yuktā vājibhiruttamaiḥ | āyāntu paścātsatataṃ māmeva bharatarṣabha
हे राजेन्द्र, हे भरतश्रेष्ठ, उत्तम घोड़ों से जुते हुए मुख्य रथ सदा मेरे ही पीछे-पीछे चलें।
श्लोक 65 (8.22.65)
एवमभ्यधिकः पार्थाद्भविष्यामि गुणैरहम् । शल्योप्यभ्यधिकः कृष्णादर्जुनादपिचाप्यहम् ॥
evamabhyadhikaḥ pārthādbhaviṣyāmi guṇairaham | śalyopyabhyadhikaḥ kṛṣṇādarjunādapicāpyaham
इस प्रकार मैं गुणों में पार्थ से बढ़ जाऊँगा; शल्य कृष्ण से बढ़कर होंगे, और मैं अर्जुन से भी बढ़कर रहूँगा।
श्लोक 66 (8.22.66)
यथाऽश्वहृदयं वेद दाशार्हः परवीरहा । तथा शल्यो विजानीते हयज्ञानं महारथः ॥
yathā'śvahṛdayaṃ veda dāśārhaḥ paravīrahā | tathā śalyo vijānīte hayajñānaṃ mahārathaḥ
जैसे शत्रुवीरों के संहारक दाशार्ह अश्वों का हृदय जानते हैं, वैसे ही महारथी शल्य घोड़ों के विषय का ज्ञान रखते हैं।
श्लोक 67 (8.22.67)
बाहुवीर्ये समो नास्ति मद्रराजस्य कश्चन । तथाऽस्त्रे मत्समो नास्ति कश्चिदेव धनुर्धरः ॥
bāhuvīrye samo nāsti madrarājasya kaścana | tathā'stre matsamo nāsti kaścideva dhanurdharaḥ
भुजबल में मद्रराज के बराबर कोई नहीं है, और अस्त्र-विद्या में मेरे समान कोई धनुर्धर नहीं है।
श्लोक 68 (8.22.68)
तथा शल्यसमो नास्ति हयज्ञाने हि कश्चन । सोऽयमभ्यधिकः कृष्णाद्भविष्यति रथो मम ॥
tathā śalyasamo nāsti hayajñāne hi kaścana | so'yamabhyadhikaḥ kṛṣṇādbhaviṣyati ratho mama
और अश्व-ज्ञान में शल्य के समान कोई नहीं है; इस प्रकार मेरा यह रथ कृष्ण के रथ से बढ़कर होगा।
श्लोक 69 (8.22.69)
एवं कृते रथस्थोऽहं गुणैरभ्यधिकोऽर्जुनात् । विजयेयमहं सङ्ख्ये फल्गुनं कुरुसत्तम ॥
evaṃ kṛte rathastho'haṃ guṇairabhyadhiko'rjunāt | vijayeyamahaṃ saṅkhye phalgunaṃ kurusattama
ऐसा करने पर रथ पर खड़ा मैं गुणों में अर्जुन से बढ़ा रहूँगा, और हे कुरुश्रेष्ठ, युद्ध में फल्गुन को जीत लूँगा।
श्लोक 70 (8.22.70)
समुद्यातुं न शक्ष्यन्ति देवा अपि सवासवाः । एतत्कृतं महाराज त्वयेच्छामि परन्तप ॥
samudyātuṃ na śakṣyanti devā api savāsavāḥ | etatkṛtaṃ mahārāja tvayecchāmi parantapa
इन्द्र सहित देवता भी मेरे सामने उठ नहीं सकेंगे। हे महाराज, हे शत्रुतापन, मैं तुमसे यही करवाना चाहता हूँ।
श्लोक 71 (8.22.71)
क्रियतामेष कामो मे मा वः कालोऽत्यगादयम् । एवं कृते कृतं मह्यं त्वया सर्वं भविष्यति ॥
kriyatāmeṣa kāmo me mā vaḥ kālo'tyagādayam | evaṃ kṛte kṛtaṃ mahyaṃ tvayā sarvaṃ bhaviṣyati
मेरी यह इच्छा पूरी की जाए; तुम लोगों का यह समय बीत न जाए। ऐसा कर देने पर तुम्हारे द्वारा मेरा सब कुछ पूर्ण हो जाएगा।
श्लोक 72 (8.22.72)
ततो द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे यत्करिष्यामि भारत । सर्वथा पाण्डवान्सङ्ख्ये विजेष्ये वै समागतान् ॥
tato drakṣyasi saṅgrāme yatkariṣyāmi bhārata | sarvathā pāṇḍavānsaṅkhye vijeṣye vai samāgatān
तब हे भारत, तुम रण में देखोगे कि मैं क्या करता हूँ; मैं हर प्रकार से इकट्ठे हुए पाण्डवों को युद्ध में जीत लूँगा।
श्लोक 73 (8.22.73)
न हि मे समरे शक्ताः समुद्यातुं सुरासुराः । किमु पाण्डुसुता राजन्रणे मानुषयोनयः ॥
na hi me samare śaktāḥ samudyātuṃ surāsurāḥ | kimu pāṇḍusutā rājanraṇe mānuṣayonayaḥ
रण में देवता और असुर भी मेरे सामने नहीं टिक सकते; फिर हे राजन्, मनुष्य-योनि में जन्मे पाण्डुपुत्रों की तो बात ही क्या?
सञ्जय उवाच
श्लोक 74 (8.22.74)
एवमुक्तस्तव सुतः कर्णेनाहवशोभिना । सम्पूज्य सम्प्रहृष्टात्मा ततो राधेयमब्रवीत् ॥
evamuktastava sutaḥ karṇenāhavaśobhinā | sampūjya samprahṛṣṭātmā tato rādheyamabravīt
युद्ध की शोभा कर्ण के ऐसा कहने पर आपके पुत्र ने उसका सम्मान किया और प्रसन्नचित्त होकर राधापुत्र से कहा।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 75 (8.22.75)
एवमेतत्करिष्यामि यथा त्वं कर्ण मन्यसे । सोपासङ्गा रथाः साश्वाः स्वनुयास्यन्ति संयुगे ॥
evametatkariṣyāmi yathā tvaṃ karṇa manyase | sopāsaṅgā rathāḥ sāśvāḥ svanuyāsyanti saṃyuge
हे कर्ण, जैसा तुम उचित समझते हो, मैं वैसा ही करूँगा। तरकसों और घोड़ों सहित रथ युद्ध में तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे।
श्लोक 76 (8.22.76)
नाराचान्गार्ध्रपत्रांश्च शकटानि वहन्तु ते । अनुयास्याम कर्ण त्वां वयं सर्वे च पार्थिवाः ॥
nārācāngārdhrapatrāṃśca śakaṭāni vahantu te | anuyāsyāma karṇa tvāṃ vayaṃ sarve ca pārthivāḥ
गाड़ियाँ तुम्हारे नाराच और गृध्र-पंख वाले बाण ढोएँ; हे कर्ण, हम सब और सब राजा तुम्हारे पीछे चलेंगे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 77 (8.22.77)
एवमुक्त्वा महाराज तव पुत्रः प्रतापवान् । अभिगम्याब्रवीद्राजा मद्रराजमिदं वचः ॥
evamuktvā mahārāja tava putraḥ pratāpavān | abhigamyābravīdrājā madrarājamidaṃ vacaḥ
हे महाराज, ऐसा कहकर आपके प्रतापी पुत्र राजा दुर्योधन ने मद्रराज के पास जाकर उनसे यह वचन कहा।