कर्ण पर्व · अध्याय 23
दुर्योधन का शल्य से कर्ण का सारथि बनने का अनुरोध
दुर्योधन मद्रराज शल्य से विनयपूर्वक प्रार्थना करता है कि वे कर्ण के सारथि बनें, जैसे कृष्ण अर्जुन के रथ को चलाते हैं। शल्य क्रोध में कहते हैं कि उनके जैसा राजा सूतपुत्र की सेवा नहीं कर सकता; वे चारों वर्णों के कर्म गिनाकर उठकर चल देते हैं। दुर्योधन प्रशंसा करके उन्हें रोकता है और अश्व-विद्या में उन्हें कृष्ण से भी बढ़कर बताता है; तब शल्य इस शर्त पर मान जाते हैं कि कर्ण के सामने वे जैसा चाहें बोल सकेंगे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.23.1)
एवमुक्तो महाराज तव पुत्रः प्रतापवान् । मद्रेश्वरं प्रति रणे सुरसैन्यभयङ्करम् । सर्वं तथाऽकरोत्तूर्णं राधेयस्तद्यथाऽब्रवीत् ॥
evamukto mahārāja tava putraḥ pratāpavān | madreśvaraṃ prati raṇe surasainyabhayaṅkaram | sarvaṃ tathā'karottūrṇaṃ rādheyastadyathā'bravīt
हे महाराज, इस प्रकार कहे जाने पर आपके प्रतापी पुत्र ने रणभूमि में देवताओं की सेनाओं को भी भयभीत करने वाले मद्रराज के विषय में, जैसा राधेय कर्ण ने कहा था, वह सब तुरन्त वैसा ही किया।
श्लोक 2 (8.23.2)
मद्रराजं च समरे प्रणम्य च महारथम् । विनयेनोपसङ्गम्य प्रणयाद्वाक्यमब्रवीत् ॥
madrarājaṃ ca samare praṇamya ca mahāratham | vinayenopasaṅgamya praṇayādvākyamabravīt
रणभूमि में उसने महारथी मद्रराज के समीप जाकर उन्हें प्रणाम किया और विनय तथा स्नेह के साथ यह बात कही।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 3 (8.23.3)
सत्यव्रत महाभाग द्विषतां तापवर्धन । मद्रेश्वर रणेशूर परसैन्यभयङ्कर ॥
satyavrata mahābhāga dviṣatāṃ tāpavardhana | madreśvara raṇeśūra parasainyabhayaṅkara
हे सत्यव्रत, महाभाग, शत्रुओं का ताप बढ़ाने वाले, हे मद्रराज, रणशूर, शत्रुसेना को भयभीत करने वाले वीर —
श्लोक 4 (8.23.4)
मत्प्रियार्थं हितार्थं च तथा पार्थवधाय च । श्रुतवानसि कर्णस्य ब्रुवतो वदतां वर । यथा नृपतिसिंहानां मध्ये त्वां वरये स्वयम् ॥
matpriyārthaṃ hitārthaṃ ca tathā pārthavadhāya ca | śrutavānasi karṇasya bruvato vadatāṃ vara | yathā nṛpatisiṃhānāṃ madhye tvāṃ varaye svayam
मेरे प्रिय और हित के लिए तथा अर्जुन के वध के लिए — हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, तुमने कर्ण को कहते हुए सुना है कि इन सिंह-समान राजाओं के बीच मैं स्वयं तुम्हारा वरण करता हूँ।
श्लोक 5 (8.23.5)
तत्त्वामप्रतिवीर्याद्य शत्रुपक्षक्षयावह । मद्रेश्वर प्रयाचेऽहं शिरसा विनयेन च ॥
tattvāmaprativīryādya śatrupakṣakṣayāvaha | madreśvara prayāce'haṃ śirasā vinayena ca
इसलिए, हे अतुल पराक्रमी, शत्रुपक्ष का नाश करने वाले मद्रराज, मैं आज सिर झुकाकर विनयपूर्वक तुमसे याचना करता हूँ।
श्लोक 6 (8.23.6)
तस्मात्पार्थविनाशार्थं हितार्थं मम चैव हि । त्वं पाहि सर्वतः कर्णं भवं ब्रह्मेव सुव्रत ॥
tasmātpārthavināśārthaṃ hitārthaṃ mama caiva hi | tvaṃ pāhi sarvataḥ karṇaṃ bhavaṃ brahmeva suvrata
इसलिए अर्जुन के विनाश के लिए और मेरे हित के लिए भी, हे सुव्रत, तुम कर्ण की सब ओर से रक्षा करो, जैसे ब्रह्मा भव (शिव) की रक्षा करते हैं।
श्लोक 7 (8.23.7)
सारथ्यं रथिनां श्रेष्ठ प्रणयात्कर्तुमर्हसि । त्वयि यन्तरि राधेयो विद्विषो मे विजेष्यते ॥
sārathyaṃ rathināṃ śreṣṭha praṇayātkartumarhasi | tvayi yantari rādheyo vidviṣo me vijeṣyate
हे रथियों में श्रेष्ठ, स्नेह के कारण तुम्हें सारथि का कार्य करना चाहिए। तुम्हारे सारथि होने पर राधेय कर्ण मेरे शत्रुओं को जीत लेगा।
श्लोक 8 (8.23.8)
अभीषूणां हि कर्णस्य ग्रहीतान्यो न विद्यते । ऋते हि त्वां महाभाग वासुदेवसमं युधि ॥
abhīṣūṇāṃ hi karṇasya grahītānyo na vidyate | ṛte hi tvāṃ mahābhāga vāsudevasamaṃ yudhi
कर्ण की लगाम थामने वाला दूसरा कोई नहीं है — केवल तुम्हें छोड़कर, हे महाभाग, जो युद्ध में वासुदेव के समान हो।
श्लोक 9 (8.23.9)
स पाहि सर्वथा कर्णं यथा ब्रह्मा महेश्वरम् । यथा च सर्वथाऽऽपत्सु वार्ष्णेयः पाति पाण्डवम् । तथा मद्रेश्वराद्य त्वं राधेयं प्रतिपालय ॥
sa pāhi sarvathā karṇaṃ yathā brahmā maheśvaram | yathā ca sarvathā''patsu vārṣṇeyaḥ pāti pāṇḍavam | tathā madreśvarādya tvaṃ rādheyaṃ pratipālaya
तुम सब प्रकार से कर्ण की रक्षा करो, जैसे ब्रह्मा महेश्वर की रक्षा करते हैं; और जैसे वृष्णिवंशी कृष्ण सब संकटों में पाण्डव अर्जुन की रक्षा करते हैं, वैसे ही हे मद्रराज, आज तुम राधेय की रक्षा करो।
श्लोक 10 (8.23.10)
भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णो भवान्भोजश्च वीर्यवान् । शकुनिः सौबलो द्रौणिरहमेव च नो बलम् ॥
bhīṣmo droṇaḥ kṛpaḥ karṇo bhavānbhojaśca vīryavān | śakuniḥ saubalo drauṇirahameva ca no balam
भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, तुम, पराक्रमी भोज, सुबलपुत्र शकुनि, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा और मैं स्वयं — यही हमारा बल है।
श्लोक 11 (8.23.11)
एवमेष कृतो भागो नवधा पृथिवीपते । न च भागोऽत्र भीष्मस्य द्रोणस्य च महात्मनः ॥
evameṣa kṛto bhāgo navadhā pṛthivīpate | na ca bhāgo'tra bhīṣmasya droṇasya ca mahātmanaḥ
हे पृथ्वीपति, इस प्रकार यह बँटवारा नौ भागों में किया गया; और इसमें भीष्म तथा महात्मा द्रोण का कोई भाग नहीं है।
श्लोक 12 (8.23.12)
ताभ्यामतीत्य तौ भागौ निहता मम शत्रवः । वृद्धौ हि तौ महेष्वासौ छलेन निहतौ युधि ॥
tābhyāmatītya tau bhāgau nihatā mama śatravaḥ | vṛddhau hi tau maheṣvāsau chalena nihatau yudhi
उन दोनों ने अपने भाग से बढ़कर मेरे शत्रुओं को मारा; फिर भी वे दोनों वृद्ध महाधनुर्धर युद्ध में छल से मारे गए।
श्लोक 13 (8.23.13)
कृत्वा चासुकरं कर्म गतौ स्वर्गमितोऽनघ । तथान्ये पुरुषव्याघ्राः परैर्विनिहता युधि ॥
kṛtvā cāsukaraṃ karma gatau svargamito'nagha | tathānye puruṣavyāghrāḥ parairvinihatā yudhi
दुष्कर कर्म करके वे दोनों यहाँ से स्वर्ग चले गए, हे निष्पाप; और अन्य पुरुषव्याघ्र भी युद्ध में शत्रुओं द्वारा इसी प्रकार मारे गए।
श्लोक 14 (8.23.14)
अस्मदीयाश्च बहवः स्वर्गाय गमिताः परैः । त्यक्त्वा प्राणान्यथाशक्ति चेष्टां कृत्वा च पुष्कलाम् ॥
asmadīyāśca bahavaḥ svargāya gamitāḥ paraiḥ | tyaktvā prāṇānyathāśakti ceṣṭāṃ kṛtvā ca puṣkalām
हमारे भी बहुत से वीर, अपनी शक्ति भर पूरा प्रयत्न करके प्राण त्यागकर, शत्रुओं द्वारा स्वर्ग भेज दिए गए।
श्लोक 15 (8.23.15)
तदिदं हतभूयिष्ठं बलं मम नराधिप । पूर्वमप्यल्पकैः पार्थैर्हतं किमुत साम्प्रतम् ॥
tadidaṃ hatabhūyiṣṭhaṃ balaṃ mama narādhipa | pūrvamapyalpakaiḥ pārthairhataṃ kimuta sāmpratam
हे नराधिप, मेरी यह सेना अब अधिकतर मारी जा चुकी है; पहले भी थोड़े-से पार्थों ने इसे नष्ट किया था, फिर अब का तो कहना ही क्या?
श्लोक 16 (8.23.16)
बलवन्तो महात्मानः कौन्तेयाः सत्यविक्रमाः । बलं शेषं न हन्युर्मे यथा तत्कुरु पार्थिव ॥
balavanto mahātmānaḥ kaunteyāḥ satyavikramāḥ | balaṃ śeṣaṃ na hanyurme yathā tatkuru pārthiva
कुन्ती के पुत्र बलवान, महात्मा और सत्य पराक्रम वाले हैं; हे राजन्, ऐसा उपाय करो कि वे मेरी शेष सेना का नाश न कर सकें।
श्लोक 17 (8.23.17)
हतवीरमिदं सैन्यं पाण्डवैः समरे विभो । कर्णो ह्येको महाबाहुरस्मत्प्रियहिते रतः ॥
hatavīramidaṃ sainyaṃ pāṇḍavaiḥ samare vibho | karṇo hyeko mahābāhurasmatpriyahite rataḥ
हे प्रभो, पाण्डवों ने युद्ध में इस सेना के वीरों को मार डाला है; केवल महाबाहु कर्ण ही बचा है, जो हमारे प्रिय और हित में लगा रहता है।
श्लोक 18 (8.23.18)
भवांश्च पुरुषव्याघ्र सर्वलोकमहारथः । शल्य कर्णोऽर्जुनेनाद्य योद्धुमिच्छति संयुगे ॥
bhavāṃśca puruṣavyāghra sarvalokamahārathaḥ | śalya karṇo'rjunenādya yoddhumicchati saṃyuge
और हे पुरुषव्याघ्र, तुम सारे संसार के महारथी हो। हे शल्य, आज कर्ण युद्ध में अर्जुन से लड़ना चाहता है।
श्लोक 19 (8.23.19)
तस्मिञ्जयाशा विपुला मद्रराज नराधिप । तस्याभीषुग्रहवरो नान्योऽस्ति भुवि कश्चन ॥
tasmiñjayāśā vipulā madrarāja narādhipa | tasyābhīṣugrahavaro nānyo'sti bhuvi kaścana
हे मद्रराज, उसी में मेरी विजय की बड़ी आशा है; और पृथ्वी पर उसकी लगाम सँभालने वाला श्रेष्ठ सारथि तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नहीं है।
श्लोक 20 (8.23.20)
पार्थस्य समरे कृष्णो यथाऽभीषुग्रहो वरः । तथा त्वमपि कर्णस्य रथेऽभीषुग्रहो भव ॥
pārthasya samare kṛṣṇo yathā'bhīṣugraho varaḥ | tathā tvamapi karṇasya rathe'bhīṣugraho bhava
जैसे युद्ध में कृष्ण पार्थ के श्रेष्ठ सारथि हैं, वैसे ही तुम भी कर्ण के रथ में सारथि बनो।
श्लोक 21 (8.23.21)
तेन युक्तो रणे पार्थो रक्ष्यमाणश्च पार्थिव । यानि कर्माणि कुरुते प्रत्यक्षाणि तथैव तत् ॥
tena yukto raṇe pārtho rakṣyamāṇaśca pārthiva | yāni karmāṇi kurute pratyakṣāṇi tathaiva tat
उसके साथ जुतकर और उसी से रक्षित होकर पार्थ, हे राजन्, रणभूमि में प्रत्यक्ष दिखने वाले कर्म करता है; वैसा ही यहाँ भी होगा।
श्लोक 22 (8.23.22)
पूर्वं न समरे ह्येवमवधीदर्जुनो रिपून् । इदानीं विक्रमो ह्यस्य कृष्णेन सहितस्य च ॥
pūrvaṃ na samare hyevamavadhīdarjuno ripūn | idānīṃ vikramo hyasya kṛṣṇena sahitasya ca
पहले युद्ध में अर्जुन ने शत्रुओं को इस प्रकार नहीं मारा था; अब यह उसका पराक्रम कृष्ण के साथ होने से है।
श्लोक 23 (8.23.23)
कृष्णेन सहितः पार्थो धार्तराष्ट्रीं महाचमूम् । अहन्यहनि मद्रेश द्रावयन्दृश्यते युधि ॥
kṛṣṇena sahitaḥ pārtho dhārtarāṣṭrīṃ mahācamūm | ahanyahani madreśa drāvayandṛśyate yudhi
हे मद्रराज, कृष्ण के साथ पार्थ प्रतिदिन युद्ध में धृतराष्ट्र के पुत्रों की विशाल सेना को भगाता हुआ दिखाई देता है।
श्लोक 24 (8.23.24)
भागोऽवशिष्टः कर्णस्य तव चैव महाद्युते । तं भागं सह कर्णेन युगपन्नाशयाद्य हि ॥
bhāgo'vaśiṣṭaḥ karṇasya tava caiva mahādyute | taṃ bhāgaṃ saha karṇena yugapannāśayādya hi
जो भाग शेष रह गया है वह कर्ण का और तुम्हारा है, हे महातेजस्वी; उस भाग को आज कर्ण के साथ मिलकर एक साथ नष्ट कर दो।
श्लोक 25 (8.23.25)
अरुणेन यथा सार्धं तमः सूर्यो व्यपोहति । तथा कर्णेन सहितो जहि पार्थं महाहवे ॥
aruṇena yathā sārdhaṃ tamaḥ sūryo vyapohati | tathā karṇena sahito jahi pārthaṃ mahāhave
जैसे अरुण के साथ सूर्य अन्धकार को दूर कर देता है, वैसे ही तुम कर्ण के साथ मिलकर इस महायुद्ध में पार्थ को मार डालो।
श्लोक 26 (8.23.26)
उद्यन्तौ च यथा सूर्यौ बालसूर्यसमप्रभौ । कर्णशल्यौ रणे दृष्ट्वा विद्रवन्तु महारथाः ॥
udyantau ca yathā sūryau bālasūryasamaprabhau | karṇaśalyau raṇe dṛṣṭvā vidravantu mahārathāḥ
प्रातःकाल के सूर्य के समान तेजस्वी दो सूर्यों की तरह उदित हुए कर्ण और शल्य को युद्ध में देखकर महारथी भाग खड़े हों।
श्लोक 27 (8.23.27)
सूर्यारुषौ यथा दृष्ट्वा तमो नश्यति मारिष । तथा नश्यन्तु कौन्तेयाः सपाञ्चालाः ससृञ्जयाः ॥
sūryāruṣau yathā dṛṣṭvā tamo naśyati māriṣa | tathā naśyantu kaunteyāḥ sapāñcālāḥ sasṛñjayāḥ
हे मान्यवर, जैसे सूर्य और अरुण को देखकर अन्धकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही कुन्ती के पुत्र पाञ्चालों और सृञ्जयों सहित नष्ट हो जाएँ।
श्लोक 28 (8.23.28)
रथिनां प्रवरः कर्णो यन्तॄणां प्रवरो भवान् । संयोगो युवयोर्लोके नाभून्न च भविष्यति ॥
rathināṃ pravaraḥ karṇo yantṝṇāṃ pravaro bhavān | saṃyogo yuvayorloke nābhūnna ca bhaviṣyati
कर्ण रथियों में श्रेष्ठ है और तुम सारथियों में श्रेष्ठ हो; तुम दोनों का ऐसा संयोग संसार में न कभी हुआ और न कभी होगा।
श्लोक 29 (8.23.29)
यथा सर्वास्ववस्थासु वार्ष्णेयः पाति पाण्डवम् । तथा भवान्परित्रातु कर्णं वैकर्तनं रणे । सारथ्यं क्रियतां तस्य युध्यमानस्य संयुगे ॥
yathā sarvāsvavasthāsu vārṣṇeyaḥ pāti pāṇḍavam | tathā bhavānparitrātu karṇaṃ vaikartanaṃ raṇe | sārathyaṃ kriyatāṃ tasya yudhyamānasya saṃyuge
जैसे वृष्णिवंशी कृष्ण सब अवस्थाओं में पाण्डव अर्जुन की रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम युद्ध में वैकर्तन कर्ण की रक्षा करो; युद्ध करते हुए उसका सारथ्य तुम्हीं करो।
श्लोक 30 (8.23.30)
यथा च समरे कृष्णो रक्षते सर्वतोऽर्जुनम् । तथा त्वमपि राधेयं रक्षस्व च महारणे ॥
yathā ca samare kṛṣṇo rakṣate sarvato'rjunam | tathā tvamapi rādheyaṃ rakṣasva ca mahāraṇe
जैसे युद्ध में कृष्ण अर्जुन की सब ओर से रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम भी इस महायुद्ध में राधेय की रक्षा करो।
श्लोक 31 (8.23.31)
त्वया सारथिना ह्येष अप्रधृष्यो भविष्यति । देवतानामपि रणे सशक्राणां महीपते । किं पुनः पाण्डवेयानां मा विशङ्कीर्वचो मम ॥
tvayā sārathinā hyeṣa apradhṛṣyo bhaviṣyati | devatānāmapi raṇe saśakrāṇāṃ mahīpate | kiṃ punaḥ pāṇḍaveyānāṃ mā viśaṅkīrvaco mama
तुम्हारे सारथि होने पर वह इन्द्र सहित देवताओं के लिए भी अजेय हो जाएगा, हे पृथ्वीपति — फिर पाण्डवों की तो बात ही क्या! मेरे वचन पर शंका मत करो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 32 (8.23.32)
दुर्योधनवचः श्रुत्वा शल्यः क्रोधसमन्वितः । धार्तराष्ट्रमथोवाच सृक्विणी परिलेलिहन् ॥
duryodhanavacaḥ śrutvā śalyaḥ krodhasamanvitaḥ | dhārtarāṣṭramathovāca sṛkviṇī parilelihan
दुर्योधन की बात सुनकर क्रोध से भरे शल्य ने होंठों के कोने चाटते हुए धृतराष्ट्र के पुत्र से कहा।
श्लोक 33 (8.23.33)
त्रिशिखां भ्रुकुटिं कृत्वा धुन्वन्हस्तौ पुनःपुनः । क्रोधरक्ते महानेत्रे परिवृत्य महाभुजः । कुलैश्वर्यश्रुतबलैर्दृप्तः शल्योऽब्रवीदिदम् ॥
triśikhāṃ bhrukuṭiṃ kṛtvā dhunvanhastau punaḥpunaḥ | krodharakte mahānetre parivṛtya mahābhujaḥ | kulaiśvaryaśrutabalairdṛptaḥ śalyo'bravīdidam
भौंहों में तीन रेखाएँ डालकर, बार-बार हाथ झटकते और क्रोध से लाल अपनी बड़ी आँखें घुमाते हुए महाबाहु शल्य ने, जो कुल, ऐश्वर्य, शास्त्र-ज्ञान और बल के कारण गर्वित था, यह कहा।
शल्य उवाच
श्लोक 34 (8.23.34)
न मामर्हसि राजेन्द्र नियोक्तुं कर्मणीदृशे । न हि पापीयसः श्रेयान्प्रेष्यत्वं कर्तुमर्हति ॥
na māmarhasi rājendra niyoktuṃ karmaṇīdṛśe | na hi pāpīyasaḥ śreyānpreṣyatvaṃ kartumarhati
हे राजेन्द्र, तुम्हें मुझे ऐसे कार्य में नहीं लगाना चाहिए; क्योंकि जो श्रेष्ठ है वह किसी नीच का सेवक बनना स्वीकार नहीं कर सकता।
श्लोक 35 (8.23.35)
यो ह्यभ्युपगतं मित्रं गरीयांसं विशेषतः । वशे पापीयसो धत्ते तत्कार्यमधरोत्तरम् ॥
yo hyabhyupagataṃ mitraṃ garīyāṃsaṃ viśeṣataḥ | vaśe pāpīyaso dhatte tatkāryamadharottaram
जो मनुष्य शरण में आए हुए मित्र को, विशेषकर अपने से बड़े को, किसी नीच के वश में कर देता है, उसका वह कार्य सब कुछ उलट-पुलट कर देने वाला है।
श्लोक 36 (8.23.36)
ब्रह्मणा ब्राह्मणाः सृष्टा मुखात्क्षत्रं च बाहुतः । ऊरुभ्यामथ वैश्या वै शूद्राः पद्भ्यामिति श्रुतिः ॥
brahmaṇā brāhmaṇāḥ sṛṣṭā mukhātkṣatraṃ ca bāhutaḥ | ūrubhyāmatha vaiśyā vai śūdrāḥ padbhyāmiti śrutiḥ
ब्रह्मा ने मुख से ब्राह्मणों को, भुजाओं से क्षत्रियों को, जंघाओं से वैश्यों को और चरणों से शूद्रों को रचा — ऐसी श्रुति है।
श्लोक 37 (8.23.37)
तेभ्यो वर्णविशेषाश्च प्रतिलोमानुलोमजाः । अथान्योन्यस्य संयोगाच्चातुर्वर्ण्यस्य भारत ॥
tebhyo varṇaviśeṣāśca pratilomānulomajāḥ | athānyonyasya saṃyogāccāturvarṇyasya bhārata
उनसे प्रतिलोम और अनुलोम विवाहों से उत्पन्न विशिष्ट वर्ण हुए; और फिर, हे भारत, चारों वर्णों के आपसी संयोग से —
श्लोक 38 (8.23.38)
गोप्तारः सङ्गृहीतारो दातारः क्षत्रियाः स्मृताः ॥
goptāraḥ saṅgṛhītāro dātāraḥ kṣatriyāḥ smṛtāḥ
क्षत्रिय रक्षा करने वाले, धारण करने वाले और दान देने वाले माने गए हैं।
श्लोक 39 (8.23.39)
याजनाध्यापनैर्विप्रा विशुद्धैश्च प्रतिग्रहैः । लोकस्यानुग्रहार्थाय स्थापिता ब्राह्मणा भुवि ॥
yājanādhyāpanairviprā viśuddhaiśca pratigrahaiḥ | lokasyānugrahārthāya sthāpitā brāhmaṇā bhuvi
पृथ्वी पर ब्राह्मण संसार के कल्याण के लिए यज्ञ कराने, पढ़ाने और शुद्ध दान ग्रहण करने के कर्मों के साथ स्थापित किए गए हैं।
श्लोक 40 (8.23.40)
कृषिश्च पाशुपाल्यं च विशां दानं च धर्मतः । ब्रह्मक्षत्रविशां शूद्रा विहिताः परिचारकाः ॥
kṛṣiśca pāśupālyaṃ ca viśāṃ dānaṃ ca dharmataḥ | brahmakṣatraviśāṃ śūdrā vihitāḥ paricārakāḥ
खेती, पशुपालन और धर्मानुसार दान देना वैश्यों के कर्म हैं; और शूद्र ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों के सेवक नियत किए गए हैं।
श्लोक 41 (8.23.41)
ब्रह्मक्षत्रस्य विहिताः सूता वै परिचारकाः । न क्षत्रियो वै सूतानां शृणुयाच्च कथञ्चन ॥
brahmakṣatrasya vihitāḥ sūtā vai paricārakāḥ | na kṣatriyo vai sūtānāṃ śṛṇuyācca kathañcana
सूत ब्राह्मणों और क्षत्रियों के सेवक नियत किए गए हैं; क्षत्रिय को किसी भी प्रकार सूतों की बात नहीं सुननी चाहिए।
श्लोक 42 (8.23.42)
अहं मूर्धाभिषिक्तो हि राजर्षिकुलजो नृपः । महारथसमाख्यातः सेव्यः स्तुत्यश्च वन्दिनां ॥
ahaṃ mūrdhābhiṣikto hi rājarṣikulajo nṛpaḥ | mahārathasamākhyātaḥ sevyaḥ stutyaśca vandināṃ
मैं मूर्धाभिषिक्त राजा हूँ, राजर्षियों के कुल में उत्पन्न हुआ हूँ, महारथी के रूप में प्रसिद्ध हूँ, और बन्दीजनों के द्वारा सेवा और स्तुति के योग्य हूँ।
श्लोक 43 (8.23.43)
सोऽहमेतादृशो भूत्वा नेहारिबलसूदनः । सूतपुत्रस्य सङ्ग्रामे सारथ्यं कर्तुमुत्सहे ॥
so'hametādṛśo bhūtvā nehāribalasūdanaḥ | sūtaputrasya saṅgrāme sārathyaṃ kartumutsahe
ऐसा होकर, शत्रुसेना का संहार करने वाला मैं, यहाँ युद्ध में सूतपुत्र का सारथ्य करने का साहस नहीं करूँगा।
श्लोक 44 (8.23.44)
अवमन्यसे मां गान्धारे ध्रुवं चाप्यतिशङ्कसे । यस्माद्ब्रवीषि विस्रब्धः सारथ्यं क्रियतामिति ॥
avamanyase māṃ gāndhāre dhruvaṃ cāpyatiśaṅkase | yasmādbravīṣi visrabdhaḥ sārathyaṃ kriyatāmiti
हे गान्धारीपुत्र, तुम मेरा अनादर करते हो और निश्चय ही मुझ पर शंका भी करते हो, तभी तो निःसंकोच कहते हो कि "सारथि बन जाओ।"
श्लोक 45 (8.23.45)
अस्मत्तोऽभ्यधिकं कर्णं मन्वानस्तं प्रशंससि । न चाहं युधि राधेयं गणये तुल्यमात्मनः ॥
asmatto'bhyadhikaṃ karṇaṃ manvānastaṃ praśaṃsasi | na cāhaṃ yudhi rādheyaṃ gaṇaye tulyamātmanaḥ
कर्ण को हमसे बढ़कर मानकर तुम उसकी प्रशंसा करते हो; किन्तु मैं युद्ध में राधेय को अपने बराबर नहीं गिनता।
श्लोक 46 (8.23.46)
आदिश्यतामभ्यधिको ममांशः पृथिवीपते । तमहं समरे हत्वा गमिष्यामि यथागतम् ॥
ādiśyatāmabhyadhiko mamāṃśaḥ pṛthivīpate | tamahaṃ samare hatvā gamiṣyāmi yathāgatam
हे पृथ्वीपति, मुझे शत्रु का कोई अधिक बड़ा भाग सौंप दो; मैं उसे युद्ध में मारकर जैसा आया था वैसा ही लौट जाऊँगा।
श्लोक 47 (8.23.47)
अथवाप्येक एवाहं योत्स्यामि तव शत्रुभिः । पश्य वीर्यं ममाद्य त्वं सङ्ग्रामे दहतो रिपून् ॥
athavāpyeka evāhaṃ yotsyāmi tava śatrubhiḥ | paśya vīryaṃ mamādya tvaṃ saṅgrāme dahato ripūn
अथवा मैं अकेला ही तुम्हारे शत्रुओं से लडूँगा; आज युद्ध में शत्रुओं को जलाते हुए मेरा पराक्रम देखो।
श्लोक 48 (8.23.48)
न चापि कामान्कौरव्य निधाय हृदये पुमान् । अस्मद्विधः प्रवर्तेत मा मा त्वमतिशङ्किथाः ॥
na cāpi kāmānkauravya nidhāya hṛdaye pumān | asmadvidhaḥ pravarteta mā mā tvamatiśaṅkithāḥ
हे कौरव्य, मेरे जैसा पुरुष हृदय में कामनाएँ रखकर कर्म में प्रवृत्त नहीं होता; तुम मुझ पर शंका मत करो, मत करो।
श्लोक 49 (8.23.49)
अपि चाप्यवमानो मे न कर्तव्यः कथञ्चन । पश्य भीमौ मम भुजौ वज्रसंहननौ दृढौ ॥
api cāpyavamāno me na kartavyaḥ kathañcana | paśya bhīmau mama bhujau vajrasaṃhananau dṛḍhau
और मेरा किसी भी प्रकार अपमान नहीं होना चाहिए। मेरी इन दोनों भयंकर भुजाओं को देखो, जो वज्र के समान दृढ़ हैं।
श्लोक 50 (8.23.50)
धनुः पश्य च मे चित्रं शरांश्चाशीविषोपमान् । रथं च पश्य मे चित्रं सदश्वैर्वातवेगिभिः ॥
dhanuḥ paśya ca me citraṃ śarāṃścāśīviṣopamān | rathaṃ ca paśya me citraṃ sadaśvairvātavegibhiḥ
मेरा विचित्र धनुष देखो, और विषैले सर्पों के समान मेरे बाण देखो; वायु के समान वेगवान उत्तम घोड़ों से जुता मेरा अद्भुत रथ देखो।
श्लोक 51 (8.23.51)
गदां च पश्य गान्धारे हेमपट्टविभूषिताम् । दारयेयं महीं क्रुद्धो विकिरेयं च पर्वतान् । शोषयेयं समुद्रांश्च पातयेयं च भास्करम् ॥
gadāṃ ca paśya gāndhāre hemapaṭṭavibhūṣitām | dārayeyaṃ mahīṃ kruddho vikireyaṃ ca parvatān | śoṣayeyaṃ samudrāṃśca pātayeyaṃ ca bhāskaram
हे गान्धारीपुत्र, सोने की पट्टियों से सजी मेरी गदा भी देखो। क्रुद्ध होकर मैं पृथ्वी को चीर सकता हूँ, पर्वतों को बिखेर सकता हूँ, समुद्रों को सुखा सकता हूँ और सूर्य को गिरा सकता हूँ।
श्लोक 52 (8.23.52)
तं मामेवंविधं राजन्समर्थमरिनिग्रहे । कस्माद्युनङ्क्षि सारथ्ये सूतस्याधिरथेस्तु माम् ॥
taṃ māmevaṃvidhaṃ rājansamarthamarinigrahe | kasmādyunaṅkṣi sārathye sūtasyādhirathestu mām
हे राजन्, शत्रुओं का दमन करने में समर्थ ऐसे मुझ को, तुम अधिरथ सूत के पुत्र के सारथ्य में क्यों जोड़ते हो?
श्लोक 53 (8.23.53)
न चापि मम राधेयः कलामर्हति षोडशीम् ॥
na cāpi mama rādheyaḥ kalāmarhati ṣoḍaśīm
राधेय मेरी सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं है।
श्लोक 54 (8.23.54)
सकर्णा ये त्रयो लोकाः सार्जुनाः सजनार्दनाः । निबद्धांस्तन्त्रणे राजन्न गणेयं कथञ्चन ॥
sakarṇā ye trayo lokāḥ sārjunāḥ sajanārdanāḥ | nibaddhāṃstantraṇe rājanna gaṇeyaṃ kathañcana
कर्ण, अर्जुन और जनार्दन सहित तीनों लोक भी यदि एक ही बन्धन में बँधे हों, तो भी हे राजन्, मैं उन्हें कुछ नहीं गिनता।
श्लोक 55 (8.23.55)
न चाहं प्राकृतः कश्चिन्न चास्म्यधिगतः स्वयम् । अयं चाप्यवमानो मे न कर्तव्यः कथञ्चन ॥
na cāhaṃ prākṛtaḥ kaścinna cāsmyadhigataḥ svayam | ayaṃ cāpyavamāno me na kartavyaḥ kathañcana
मैं कोई साधारण पुरुष नहीं हूँ, और न बिना बुलाए स्वयं यहाँ आया हूँ; मेरा यह अपमान किसी भी प्रकार नहीं होना चाहिए।
श्लोक 56 (8.23.56)
आपृच्छे त्वाद्य गान्धारे यास्यामि विषयं प्रति । न चाहं सूतपुत्रस्य सारथ्यमुपजग्मिवान् ॥
āpṛcche tvādya gāndhāre yāsyāmi viṣayaṃ prati | na cāhaṃ sūtaputrasya sārathyamupajagmivān
हे गान्धारीपुत्र, मैं आज तुमसे विदा लेता हूँ; मैं अपने देश को लौट जाऊँगा। मैं सूतपुत्र का सारथ्य करने के लिए यहाँ नहीं आया था।
श्लोक 57 (8.23.57)
अवमानमहं प्राप्य न योत्स्यामि कथञ्चन । आपृच्छे त्वाऽद्य गान्धारे गमिष्यामि गृहाय वै ॥
avamānamahaṃ prāpya na yotsyāmi kathañcana | āpṛcche tvā'dya gāndhāre gamiṣyāmi gṛhāya vai
अपमान पाकर मैं किसी भी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। हे गान्धारीपुत्र, मैं आज तुमसे विदा लेता हूँ; मैं घर लौट जाऊँगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 58 (8.23.58)
एवमुक्त्वा महाराज शल्यः समितिशोभनः । उत्थाय प्रययौ तूर्णं राजमध्यादमर्षितः ॥
evamuktvā mahārāja śalyaḥ samitiśobhanaḥ | utthāya prayayau tūrṇaṃ rājamadhyādamarṣitaḥ
हे महाराज, ऐसा कहकर सभाओं की शोभा शल्य रोष से भरकर उठ खड़े हुए और राजाओं के बीच से तुरन्त चल दिए।
श्लोक 59 (8.23.59)
प्रणयाद्बहुमानाच्च तं निगृह्य सुतस्तव । अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साम्ना सर्वार्थसाधकम् ॥
praṇayādbahumānācca taṃ nigṛhya sutastava | abravīnmadhuraṃ vākyaṃ sāmnā sarvārthasādhakam
प्रेम और सम्मान के कारण आपके पुत्र ने उन्हें रोककर मधुर वचन कहे, जो मृदु थे और सब कार्यों को सिद्ध करने वाले थे।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 60 (8.23.60)
यथा शल्य त्वमात्थेदमेवमेतदसंशयम् । अभिप्रायस्तु मे कश्चित्तं निबोध जनेश्वर ॥
yathā śalya tvamātthedamevametadasaṃśayam | abhiprāyastu me kaścittaṃ nibodha janeśvara
हे शल्य, तुम जो कहते हो वह निःसन्देह वैसा ही है। पर मेरा एक अभिप्राय है; हे जनेश्वर, उसे सुनो।
श्लोक 61 (8.23.61)
न कर्णोऽभ्यधिकस्त्वत्तो न चान्ये चैव पार्थिवाः । न च मद्रेश्वर त्वां वै कृष्णः सोढुं च शक्ष्यति ॥
na karṇo'bhyadhikastvatto na cānye caiva pārthivāḥ | na ca madreśvara tvāṃ vai kṛṣṇaḥ soḍhuṃ ca śakṣyati
कर्ण तुमसे बढ़कर नहीं है, और न दूसरे राजा ही; हे मद्रराज, कृष्ण भी तुम्हारा सामना नहीं कर सकेगा।
श्लोक 62 (8.23.62)
ऋतमेव हि पूर्वास्ते वदन्ति पुरुषोत्तमाः । तस्मादार्तायनिः प्रोक्तो भवानिति मतिर्मम ॥
ṛtameva hi pūrvāste vadanti puruṣottamāḥ | tasmādārtāyaniḥ prokto bhavāniti matirmama
तुम्हारे पूर्वज, हे पुरुषोत्तम, केवल सत्य ही बोलते हैं; इसीलिए मेरी समझ में तुम्हें आर्तायनि कहा गया है।
श्लोक 63 (8.23.63)
शल्यभूतस्तु शत्रूणां यस्मात्त्वं युधि मानद । तस्माच्छल्येति ते नाम कथ्यते पृथिवीतले ॥
śalyabhūtastu śatrūṇāṃ yasmāttvaṃ yudhi mānada | tasmācchalyeti te nāma kathyate pṛthivītale
हे मानद, क्योंकि तुम युद्ध में शत्रुओं के लिए शल्य (काँटे या भाले) के समान हो, इसीलिए पृथ्वी पर तुम्हारा नाम शल्य कहा जाता है।
श्लोक 64 (8.23.64)
यदेतद्व्याहृतं पूर्वं भवता भूरिदक्षिण । तदेव कुरु धर्मज्ञ मदर्थं यद्यदुच्यते ॥
yadetadvyāhṛtaṃ pūrvaṃ bhavatā bhūridakṣiṇa | tadeva kuru dharmajña madarthaṃ yadyaducyate
हे भूरिदक्षिण, तुमने पहले जो कहा था, हे धर्मज्ञ, वही करो — मेरे लिए जो-जो कहा जाए।
श्लोक 65 (8.23.65)
न च त्वत्तो हि राधेयो न चाहमपि वीर्यवान् । वृणेऽहं त्वां हयाग्र्याणां यन्तारमिह संयुगे ॥
na ca tvatto hi rādheyo na cāhamapi vīryavān | vṛṇe'haṃ tvāṃ hayāgryāṇāṃ yantāramiha saṃyuge
न राधेय तुमसे अधिक बलवान है और न मैं ही; इसलिए मैं तुम्हें इस युद्ध में उत्तम घोड़ों का सारथि चुनता हूँ।
श्लोक 66 (8.23.66)
मन्ये चाभ्यधिकं शल्य गुणैः कर्णं धनञ्जयात् । भवन्तं वासुदेवाच्च लोकोऽयमतिमन्यते ॥
manye cābhyadhikaṃ śalya guṇaiḥ karṇaṃ dhanañjayāt | bhavantaṃ vāsudevācca loko'yamatimanyate
मैं कर्ण को गुणों में धनञ्जय से बढ़कर मानता हूँ, और यह संसार तुम्हें वासुदेव से भी बढ़कर मानता है।
श्लोक 67 (8.23.67)
कर्णो ह्यभ्यधिकः पार्थादस्त्रैरेव नरर्षभ । भवानभ्यधिकः कृष्णादश्वज्ञाने बले तथा ॥
karṇo hyabhyadhikaḥ pārthādastraireva nararṣabha | bhavānabhyadhikaḥ kṛṣṇādaśvajñāne bale tathā
हे नरश्रेष्ठ, कर्ण अस्त्रों में पार्थ से बढ़कर है; और तुम अश्व-विद्या में तथा बल में कृष्ण से बढ़कर हो।
श्लोक 68 (8.23.68)
यथाऽश्वहृदयं वेद वासुदेवो महामनाः । द्विगुणं त्वं तथा वेत्सि मद्रराजेश्वरात्मज ॥
yathā'śvahṛdayaṃ veda vāsudevo mahāmanāḥ | dviguṇaṃ tvaṃ tathā vetsi madrarājeśvarātmaja
जैसे महामना वासुदेव घोड़ों के हृदय को जानते हैं, वैसे ही तुम उससे दुगुना जानते हो, हे मद्रराजों के अधीश्वर के पुत्र।
शल्य उवाच
श्लोक 69 (8.23.69)
यन्मां ब्रवीषि गान्धारे मध्ये सैन्यस्य कौरव । विशिष्टं देवकीपुत्रात्प्रीतिमानस्म्यहं त्वयि ॥
yanmāṃ bravīṣi gāndhāre madhye sainyasya kaurava | viśiṣṭaṃ devakīputrātprītimānasmyahaṃ tvayi
हे गान्धारीपुत्र, तुम सेना के बीच मुझे देवकीपुत्र से बढ़कर कहते हो, इससे मैं तुम पर प्रसन्न हूँ।
श्लोक 70 (8.23.70)
एष सारथ्यमातिष्ठे राधेयस्य यशस्विनः । युध्यतः पाण्डवाग्र्येण यथा त्वं वीर मन्यसे ॥
eṣa sārathyamātiṣṭhe rādheyasya yaśasvinaḥ | yudhyataḥ pāṇḍavāgryeṇa yathā tvaṃ vīra manyase
हे वीर, जैसा तुम उचित समझते हो, वैसा ही मैं पाण्डवों के प्रधान वीर से लड़ने वाले यशस्वी राधेय का सारथ्य यहाँ स्वीकार करता हूँ।
श्लोक 71 (8.23.71)
समयश्च हि मे वीर कश्चिद्वैकर्तनं प्रति । उत्सृजेयं यथाश्रद्धमहं वाचोऽस्य सन्निधौ ॥
samayaśca hi me vīra kaścidvaikartanaṃ prati | utsṛjeyaṃ yathāśraddhamahaṃ vāco'sya sannidhau
पर हे वीर, वैकर्तन के विषय में मेरी एक शर्त है: उसके सामने मैं अपनी इच्छा के अनुसार जो चाहूँ बोल सकूँ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 72 (8.23.72)
तथेति राजन्पुत्रस्ते सह कर्णेन भारत । अब्रवीन्मद्रराजस्य मतं भरतसत्तम ॥
tatheti rājanputraste saha karṇena bhārata | abravīnmadrarājasya mataṃ bharatasattama
"ऐसा ही हो," कहकर, हे राजन्, आपके पुत्र ने कर्ण के साथ मिलकर, हे भारत, मद्रराज के मत को प्रकट किया, हे भरतश्रेष्ठ।