कर्ण पर्व · अध्याय 24
असुरों के तीन नगर
शल्य से अपनी बात जारी रखते हुए दुर्योधन वह कथा सुनाते हैं जो मार्कण्डेय ने उनके पिता से कही थी। तारक के तीन पुत्र ब्रह्मा से वर पाते हैं कि उनके तीन नगर केवल एक ही बाण से नष्ट हो सकेंगे, जब हज़ार वर्ष बाद वे एक हो जाएँ; मय सोने, चाँदी और लोहे के नगर रचता है और हरि की बावड़ी मृतकों को जिला देती है, जिससे असुर लोकों को सताते हैं। इन्द्र उन नगरों को तोड़ नहीं पाते, और ब्रह्मा की सलाह पर देवता शिव की शरण जाकर उनकी स्तुति करते हैं, और शिव उनसे उनकी इच्छा पूछते हैं।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (8.24.1)
भूय एव तु मद्रेश यत्त्वा वक्ष्यामि तच्छृणु । यथा पुरावृत्तमिदं युद्धे देवासुरे प्रभो ॥
bhūya eva tu madreśa yattvā vakṣyāmi tacchṛṇu | yathā purāvṛttamidaṃ yuddhe devāsure prabho
हे मद्रराज, मैं आपसे जो और कहने जा रहा हूँ, उसे सुनिए — प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के युद्ध में यह घटना जिस प्रकार घटी थी, हे प्रभो।
श्लोक 2 (8.24.2)
यदुक्तवान्पितुर्मह्यं मार्कण्डेयो महातपाः । ब्रुवतस्तदशेषेण मम राजर्षिसत्तम । निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा ॥
yaduktavānpiturmahyaṃ mārkaṇḍeyo mahātapāḥ | bruvatastadaśeṣeṇa mama rājarṣisattama | nibodha manasā cātra na te kāryā vicāraṇā
महातपस्वी मार्कण्डेय ने मेरे पिता से जो कहा था, उसे मैं पूरा-पूरा सुनाता हूँ; हे राजर्षिश्रेष्ठ, आप उसे मन लगाकर सुनिए, इसमें कोई शंका न कीजिए।
श्लोक 3 (8.24.3)
समुत्पन्ना हि राजानः प्रमोह इति निश्चयम् । कृत्वा चैव व्यवस्यन्ति सर्वे धर्मार्थनिश्चयान् ॥
samutpannā hi rājānaḥ pramoha iti niścayam | kṛtvā caiva vyavasyanti sarve dharmārthaniścayān
यह निश्चित है कि सत्ता पाए हुए राजा मोह में पड़ जाते हैं; फिर भी मन में निश्चय कर लेने के बाद वे सब धर्म और अर्थ के विषयों का निर्णय करते हैं।
श्लोक 4 (8.24.4)
देवानामसुराणां च महानासीत्समुच्छ्रयः । सैंहिकेयास्तदोद्वृत्ता विबुधानवसूदयन् । ते निरस्ताः कृता देवैर्दानवा बलगर्विताः ॥
devānāmasurāṇāṃ ca mahānāsītsamucchrayaḥ | saiṃhikeyāstadodvṛttā vibudhānavasūdayan | te nirastāḥ kṛtā devairdānavā balagarvitāḥ
देवताओं और असुरों के बीच एक बड़ा संघर्ष उठ खड़ा हुआ। तब उद्दण्ड हो उठे सिंहिका के पुत्र देवताओं का संहार करने लगे; पर अपने बल के अभिमानी वे दानव देवताओं द्वारा पीछे धकेल दिए गए।
श्लोक 5 (8.24.5)
तत्रासीत्प्रथमो राजन्सङ्ग्रामस्तारकामयः । निर्जिताश्च ततो दैत्या दैवतैरिति नः श्रुतिः ॥
tatrāsītprathamo rājansaṅgrāmastārakāmayaḥ | nirjitāśca tato daityā daivatairiti naḥ śrutiḥ
हे राजन्, तब पहला संग्राम हुआ, जो तारक को लेकर था; और हमने सुना है कि उसमें दैत्य देवताओं से हार गए।
श्लोक 6 (8.24.6)
भग्नदर्पा निरुत्साहाः पातालं विविशुस्तदा ॥
bhagnadarpā nirutsāhāḥ pātālaṃ viviśustadā
उनका अभिमान टूट गया और उत्साह जाता रहा; तब वे पाताल में चले गए।
श्लोक 7 (8.24.7)
निर्जितेषु च दैत्येषु तारकस्य सुतास्त्रयः । ताराक्षः कमलाक्षश्च विद्युन्माली च पार्थिव ॥
nirjiteṣu ca daityeṣu tārakasya sutāstrayaḥ | tārākṣaḥ kamalākṣaśca vidyunmālī ca pārthiva
दैत्यों के हार जाने पर तारक के तीन पुत्र थे — तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली, हे राजन्।
श्लोक 8 (8.24.8)
तप उग्रं समास्थाय नियमे परमे स्थिताः । तपसा कर्शयामासुर्देहांस्ताञ्शत्रुकर्शनाः ॥
tapa ugraṃ samāsthāya niyame parame sthitāḥ | tapasā karśayāmāsurdehāṃstāñśatrukarśanāḥ
शत्रुओं को सताने वाले उन तीनों ने कठोर तप अपनाया और कड़े नियमों में स्थित रहकर तपस्या से अपने शरीरों को क्षीण कर दिया।
श्लोक 9 (8.24.9)
दमेन तपसा चैव नियमेन समाधिना । तेषां पितामहः प्रीतो वरदः प्रददौ वरम् ॥
damena tapasā caiva niyamena samādhinā | teṣāṃ pitāmahaḥ prīto varadaḥ pradadau varam
उनके संयम, तप, नियम और समाधि से प्रसन्न होकर वरदाता पितामह ने उन्हें वर दिया।
श्लोक 10 (8.24.10)
अवध्यत्वं च ते सर्वे सर्वभूतेषु सर्वदा । सहिता वरयामासुः सर्वलोकपितामहम् ॥
avadhyatvaṃ ca te sarve sarvabhūteṣu sarvadā | sahitā varayāmāsuḥ sarvalokapitāmaham
उन सबने मिलकर समस्त लोकों के पितामह से यह वर माँगा कि वे सब प्राणियों से सदा अवध्य रहें।
श्लोक 11 (8.24.11)
तानब्रवीत्तदा देवः सर्वलोकगुरुः प्रभुः । नास्ति सर्वामरत्वं वै निवर्तध्वमितोऽसुराः । अन्यं वरं वृणीध्वं वै रोचते यादृशो हि वः ॥
tānabravīttadā devaḥ sarvalokaguruḥ prabhuḥ | nāsti sarvāmaratvaṃ vai nivartadhvamito'surāḥ | anyaṃ varaṃ vṛṇīdhvaṃ vai rocate yādṛśo hi vaḥ
तब सब लोकों के गुरु और स्वामी देव ने उनसे कहा — "सबके लिए अमरता नहीं होती; हे असुरो, इस माँग से लौट आओ। कोई दूसरा वर माँगो, जो तुम्हें रुचे।"
श्लोक 12 (8.24.12)
ततस्ते सहिता राजन्सम्प्रधार्यासकृद्बहु । सर्वलोकेश्वरं वाक्यं प्रणम्यैनमथाऽब्रुवन् ॥
tataste sahitā rājansampradhāryāsakṛdbahu | sarvalokeśvaraṃ vākyaṃ praṇamyainamathā'bruvan
हे राजन्, तब उन्होंने साथ मिलकर बार-बार विचार किया और सब लोकों के स्वामी को प्रणाम करके उनसे यह कहा।
दैत्या ऊचुः
श्लोक 13 (8.24.13)
वस्तुमिच्छाम नगरं कर्तुं कामगमं शुभम् । सर्वकामसमृद्धार्थमवध्यं देवदानवैः ॥
vastumicchāma nagaraṃ kartuṃ kāmagamaṃ śubham | sarvakāmasamṛddhārthamavadhyaṃ devadānavaiḥ
"हम एक सुन्दर नगर में रहना चाहते हैं, जो इच्छानुसार कहीं भी जा सके, जिसमें सब मनचाही वस्तुएँ भरी हों और जिसे देवता और दानव न मार सकें,"
श्लोक 14 (8.24.14)
यक्षरक्षोरगगणैर्नानाजातिभिरेव च । न कृत्याभिर्न शस्त्रैश्च न शापैर्ब्रह्मवादिनाम् । वध्येत त्रिपुरं देव प्रयच्छेः प्रपितामह ॥
yakṣarakṣoragagaṇairnānājātibhireva ca | na kṛtyābhirna śastraiśca na śāpairbrahmavādinām | vadhyeta tripuraṃ deva prayaccheḥ prapitāmaha
"न यक्षों, राक्षसों और नागों के समूह, न किसी भी जाति के प्राणी, न अभिचार, न शस्त्र और न ब्रह्मज्ञानियों के शाप ही उस त्रिपुर का नाश कर सकें। हे देव, हे प्रपितामह, यह वर आप दीजिए।"
श्लोक 15 (8.24.15)
वयं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय महीमिमाम् । विचरिष्याम लोकेऽस्मिंस्त्वत्प्रसादपुरस्कृताः ॥
vayaṃ purāṇi trīṇyeva samāsthāya mahīmimām | vicariṣyāma loke'smiṃstvatprasādapuraskṛtāḥ
"हम केवल तीन नगरों में रहकर इस पृथ्वी पर, इस लोक में, आपकी कृपा से सम्मानित होकर विचरते रहेंगे।
श्लोक 16 (8.24.16)
ततो वर्षसहस्रेषु समेष्यामः परस्परम् । एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि चानघ ॥
tato varṣasahasreṣu sameṣyāmaḥ parasparam | ekībhāvaṃ gamiṣyanti purāṇyetāni cānagha
फिर हज़ारों वर्षों के बाद हम आपस में मिलेंगे, और हे निष्पाप, ये तीनों नगर एक हो जाएँगे।
श्लोक 17 (8.24.17)
समागतानि चैतानि यो हन्याद्भगवांस्तदा । एकेषुणा देववरः स नो मृत्युर्भविष्यति ॥
samāgatāni caitāni yo hanyādbhagavāṃstadā | ekeṣuṇā devavaraḥ sa no mṛtyurbhaviṣyati
उस समय एकत्र हुए इन नगरों को जो देवश्रेष्ठ भगवान् एक ही बाण से नष्ट करे, वही हमारी मृत्यु हो।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 18 (8.24.18)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा दानवानां पितामहः । एवमस्त्विति तान्देवः प्रत्युक्त्वा प्राविशद्दिवम् ॥
teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā dānavānāṃ pitāmahaḥ | evamastviti tāndevaḥ pratyuktvā prāviśaddivam
दानवों की वह बात सुनकर पितामह ने "ऐसा ही हो" कहकर उन्हें उत्तर दिया और स्वर्ग में लौट गए।
श्लोक 19 (8.24.19)
ते तु लब्धवराः प्रीताः सम्प्रधार्य परस्परम् । पुरत्रयविसृष्ट्यर्थं मयं वव्रुर्महारथाः । विश्वकर्माणमजरं दैत्यदानवपूजितम् ॥
te tu labdhavarāḥ prītāḥ sampradhārya parasparam | puratrayavisṛṣṭyarthaṃ mayaṃ vavrurmahārathāḥ | viśvakarmāṇamajaraṃ daityadānavapūjitam
वर पाकर वे प्रसन्न हुए; आपस में विचार करके उन महारथियों ने तीन नगरों की रचना के लिए मय को चुना, जो अजर विश्वकर्मा थे और दैत्यों-दानवों द्वारा पूजित थे।
श्लोक 20 (8.24.20)
ततो मयः स्वतपसा चक्रे धीमान्पुराणि च । त्रीणि काञ्चनमेकं वै रौप्यं कार्ष्णायसं तथा ॥
tato mayaḥ svatapasā cakre dhīmānpurāṇi ca | trīṇi kāñcanamekaṃ vai raupyaṃ kārṣṇāyasaṃ tathā
तब बुद्धिमान मय ने अपने तपोबल से नगर बनाए — तीन नगर: एक सोने का, एक चाँदी का और एक काले लोहे का।
श्लोक 21 (8.24.21)
काञ्चनं दिवि तत्रासीदन्तरिक्षे च राजतम् । आयसं चाभवद्भौमं तदा तेषां परन्तप ॥
kāñcanaṃ divi tatrāsīdantarikṣe ca rājatam | āyasaṃ cābhavadbhaumaṃ tadā teṣāṃ parantapa
हे शत्रुओं को तपाने वाले, उस समय उनके लिए सोने का नगर स्वर्ग में था, चाँदी का अन्तरिक्ष में और लोहे का पृथ्वी पर।
श्लोक 22 (8.24.22)
एकैकं योजनशतं विस्तृतं तावदायतम् । दृढं चाट्टालकयुतं बृहत्प्राकारतोरणम् ॥
ekaikaṃ yojanaśataṃ vistṛtaṃ tāvadāyatam | dṛḍhaṃ cāṭṭālakayutaṃ bṛhatprākāratoraṇam
प्रत्येक नगर सौ योजन चौड़ा और उतना ही लम्बा था; वह सुदृढ़ था और अटारियों, विशाल परकोटों तथा तोरणों से युक्त था।
श्लोक 23 (8.24.23)
गृहप्रवरसम्बाधमसम्बाधमहापथम् । प्रासादैर्विविधैश्चापि द्वारैश्चैवोपशोभितम् ॥
gṛhapravarasambādhamasambādhamahāpatham | prāsādairvividhaiścāpi dvāraiścaivopaśobhitam
उत्तम भवनों से भरे होने पर भी उनके राजमार्ग चौड़े और भीड़ से रहित थे; अनेक प्रकार के महलों और द्वारों से वे सुशोभित थे।
श्लोक 24 (8.24.24)
त्रिपुरं तेषु चाप्यासन्राजानो वै पृथक्पृथक् । दिव्यमाल्याम्बरधरा दैतेया राजसत्तम ॥
tripuraṃ teṣu cāpyāsanrājāno vai pṛthakpṛthak | divyamālyāmbaradharā daiteyā rājasattama
हे राजाओं में श्रेष्ठ, उन तीनों नगरों में अलग-अलग राजा थे — दिव्य माला और वस्त्र धारण करने वाले दैत्य।
श्लोक 25 (8.24.25)
काञ्चनं तारकाक्षस्य दिव्यमासीन्महात्मनः । राजतं कमलाक्षस्य विद्युन्मालिन आयसम् ॥
kāñcanaṃ tārakākṣasya divyamāsīnmahātmanaḥ | rājataṃ kamalākṣasya vidyunmālina āyasam
सोने का दिव्य नगर महात्मा तारकाक्ष का था, चाँदी का कमलाक्ष का और लोहे का विद्युन्माली का।
श्लोक 26 (8.24.26)
त्रयस्ते दैत्यराजानस्त्रीँल्लोकानाशु तेजसा । आक्रम्य तस्थुरूचुश्च कश्च नाम प्रजापतिः ॥
trayaste daityarājānastrīm̐llokānāśu tejasā | ākramya tasthurūcuśca kaśca nāma prajāpatiḥ
वे तीनों दैत्यराज अपने तेज से तीनों लोकों को शीघ्र दबाकर बैठ गए, और बोले — "प्रजापति भला कौन है?"
श्लोक 27 (8.24.27)
तेषां दानवमुख्यानां प्रयुतान्यर्बुदानि च । कोट्याश्चाप्रतिवीराणां समाजग्मुस्ततस्ततः ॥
teṣāṃ dānavamukhyānāṃ prayutānyarbudāni ca | koṭyāścāprativīrāṇāṃ samājagmustatastataḥ
उन प्रमुख दानवों के पास सब ओर से प्रयुतों, अर्बुदों और करोड़ों की संख्या में अप्रतिम वीर आ पहुँचे।
श्लोक 28 (8.24.28)
मांसाशिनः सुदृप्ताश्च सुरैर्विनिकृताः पुरा । महदैश्वर्यमिच्छन्तस्त्रिपुरं दुर्गमाश्रिताः ॥
māṃsāśinaḥ sudṛptāśca surairvinikṛtāḥ purā | mahadaiśvaryamicchantastripuraṃ durgamāśritāḥ
मांस खाने वाले, अत्यन्त घमण्डी और पहले देवताओं से अपमानित वे दानव बड़े ऐश्वर्य की इच्छा से उस दुर्गम त्रिपुर में आ बसे।
श्लोक 29 (8.24.29)
सर्वेषां च पुनश्चैषां सर्वयोगवहो मयः । तमाश्रित्य हि ते सर्वेऽवर्तयन्नकुतोभयाः ॥
sarveṣāṃ ca punaścaiṣāṃ sarvayogavaho mayaḥ | tamāśritya hi te sarve'vartayannakutobhayāḥ
और उन सबके लिए सब उपाय जुटाने वाला मय ही था; उसी के सहारे वे सब निर्भय होकर रहते थे।
श्लोक 30 (8.24.30)
यो हि यं मनसा कामं दध्यौ त्रिपुरसंश्रयः । तस्मै तस्मै मयस्तं तं विदधे मायया तदा ॥
yo hi yaṃ manasā kāmaṃ dadhyau tripurasaṃśrayaḥ | tasmai tasmai mayastaṃ taṃ vidadhe māyayā tadā
त्रिपुर में रहने वाला जो कोई जिस वस्तु की कामना मन में करता, मय अपनी माया से उसे वही वस्तु तुरन्त जुटा देता।
श्लोक 31 (8.24.31)
तारकाक्षसुतश्चासीद्धरिर्नाम महाबलः । तपस्तेपे परमकं येनातुष्यत्पितामहः ॥
tārakākṣasutaścāsīddharirnāma mahābalaḥ | tapastepe paramakaṃ yenātuṣyatpitāmahaḥ
तारकाक्ष का हरि नाम का एक महाबली पुत्र था। उसने कठोर तप किया, जिससे पितामह प्रसन्न हुए।
श्लोक 32 (8.24.32)
सन्तुष्टमवृणोद्देवं वापी भवतु नः पुरे । शस्त्रैर्विनिहता यत्र क्षिप्ताः स्युर्बलवत्तराः ॥
santuṣṭamavṛṇoddevaṃ vāpī bhavatu naḥ pure | śastrairvinihatā yatra kṣiptāḥ syurbalavattarāḥ
सन्तुष्ट हुए देव से उसने माँगा — "हमारे नगर में एक बावड़ी हो, जिसमें शस्त्रों से मारे गए योद्धा डाले जाने पर और भी बलवान हो उठें।"
श्लोक 33 (8.24.33)
स तु लब्ध्वा वरं वीरस्तारकाक्षसुतो हरिः । ससृजे तत्र वापीं तां मृतसञ्जीविनीं प्रभो ॥
sa tu labdhvā varaṃ vīrastārakākṣasuto hariḥ | sasṛje tatra vāpīṃ tāṃ mṛtasañjīvinīṃ prabho
हे प्रभो, वर पाकर तारकाक्ष के उस वीर पुत्र हरि ने वहाँ मृतकों को जिला देने वाली वह बावड़ी बना दी।
श्लोक 34 (8.24.34)
येन रूपेण यो दैत्यो येन वेषेण चाप्यथ । क्षिप्यते निहतो वाप्यां तादृशेनैव जायते । सम्पूर्णबलवीर्यस्तु राजञ्छौर्यसमन्वितः ॥
yena rūpeṇa yo daityo yena veṣeṇa cāpyatha | kṣipyate nihato vāpyāṃ tādṛśenaiva jāyate | sampūrṇabalavīryastu rājañchauryasamanvitaḥ
हे राजन्, जिस रूप और जिस वेश में कोई दैत्य मारा जाकर उस बावड़ी में डाला जाता, वह ठीक वैसे ही रूप में, पूरे बल-वीर्य और शौर्य से युक्त होकर फिर जी उठता।
श्लोक 35 (8.24.35)
एवं वीर्येण संयुक्तां कृतां तेन महात्मना । तां प्राप्य त्रैपुरा वापीं लोकान्सर्वान्बबाधिरे ॥
evaṃ vīryeṇa saṃyuktāṃ kṛtāṃ tena mahātmanā | tāṃ prāpya traipurā vāpīṃ lokānsarvānbabādhire
उस महात्मा द्वारा ऐसी शक्ति से सम्पन्न की गई उस बावड़ी को पाकर त्रिपुर-वासियों ने सब लोकों को पीड़ित किया।
श्लोक 36 (8.24.36)
महता तपसा सिद्धाः सुराणां भयवर्धनाः । एकस्मिन्निहते दैत्ये सृजन्ति स्म दशासुरान् । न तेषां विद्यते युद्धे क्षयो राजन्कथञ्चन ॥
mahatā tapasā siddhāḥ surāṇāṃ bhayavardhanāḥ | ekasminnihate daitye sṛjanti sma daśāsurān | na teṣāṃ vidyate yuddhe kṣayo rājankathañcana
महान तप से सिद्ध और देवताओं का भय बढ़ाने वाले वे एक दैत्य के मारे जाने पर दस असुर रच देते थे; हे राजन्, युद्ध में उनका किसी प्रकार क्षय नहीं होता था।
श्लोक 37 (8.24.37)
ततस्ते लोभमोहाभ्यामभिभूता विचेतसः । निर्भीकाः सहिताः सर्वे स्थापिताः समलोलुपाः ॥
tataste lobhamohābhyāmabhibhūtā vicetasaḥ | nirbhīkāḥ sahitāḥ sarve sthāpitāḥ samalolupāḥ
तब लोभ और मोह से अभिभूत, विवेकहीन, निर्भय वे सब एक साथ बसे हुए, समान रूप से लालची बन गए।
श्लोक 38 (8.24.38)
विद्राव्य सगणान्देवांस्तत्रतत्र तदातदा । विचेरुः स्वेन कामेन वरदानेन दर्पिताः ॥
vidrāvya sagaṇāndevāṃstatratatra tadātadā | viceruḥ svena kāmena varadānena darpitāḥ
देवताओं को उनके गणों सहित जहाँ-तहाँ, जब-तब खदेड़कर वे वरदान के घमण्ड में अपनी इच्छा से विचरते थे।
श्लोक 39 (8.24.39)
देवोद्यानानि सर्वाणि स्थानानि च दिवौकसाम् । ऋषीणामाश्रमान्पुण्यान्रम्याञ्जनपदांस्तथा । उत्सादयन्त मर्यादां दानवा दुष्टचारिणः ॥
devodyānāni sarvāṇi sthānāni ca divaukasām | ṛṣīṇāmāśramānpuṇyānramyāñjanapadāṃstathā | utsādayanta maryādāṃ dānavā duṣṭacāriṇaḥ
वे दुराचारी दानव देवताओं के सब उद्यानों, स्वर्गवासियों के स्थानों, ऋषियों के पवित्र आश्रमों और सुन्दर जनपदों को उजाड़ने और सब मर्यादाओं को तोड़ने लगे।
श्लोक 40 (8.24.40)
निःस्थानाश्च कृता देवा ऋषयः पितृभिः सह । दैत्यैस्त्रिभिस्त्रयो लोका ह्याक्रान्तास्तैः सुरेतरैः ॥
niḥsthānāśca kṛtā devā ṛṣayaḥ pitṛbhiḥ saha | daityaistribhistrayo lokā hyākrāntāstaiḥ suretaraiḥ
देवता और ऋषि पितरों सहित अपने स्थानों से निकाल दिए गए; उन तीन देवशत्रु दैत्यों ने तीनों लोकों को दबोच लिया।
श्लोक 41 (8.24.41)
पीड्यमानेषु लोकेषु ततः शक्रो मरुद्वृतः । पुराण्यायोधयाञ्चक्रे वज्रहस्तः समन्ततः ॥
pīḍyamāneṣu lokeṣu tataḥ śakro marudvṛtaḥ | purāṇyāyodhayāñcakre vajrahastaḥ samantataḥ
लोकों के पीड़ित होने पर मरुद्गणों से घिरे इन्द्र ने हाथ में वज्र लेकर सब ओर से उन नगरों पर आक्रमण किया।
श्लोक 42 (8.24.42)
नाशकत्तान्यभेद्यानि यदा भेत्तुं पुरन्दरः । पुराणि वरदत्तानि धात्रा तेन नराधिप ॥
nāśakattānyabhedyāni yadā bhettuṃ purandaraḥ | purāṇi varadattāni dhātrā tena narādhipa
किन्तु हे नरेश, जब पुरन्दर उन अभेद्य नगरों को, जिन्हें विधाता ने वर में दिया था, तोड़ न सके,
श्लोक 43 (8.24.43)
तदा भीतः सुरपतिर्मुक्त्वा तानि पुराण्यथ । तैरेव विबुधैः सार्धं पितामहमरिन्दम । जगामाथ तदाख्यातुं विप्रकारं सुरेतरैः ॥
tadā bhītaḥ surapatirmuktvā tāni purāṇyatha | taireva vibudhaiḥ sārdhaṃ pitāmahamarindama | jagāmātha tadākhyātuṃ viprakāraṃ suretaraiḥ
तब भयभीत देवराज उन नगरों को छोड़कर उन्हीं देवताओं के साथ पितामह के पास गए, हे शत्रुदमन, ताकि असुरों द्वारा किए गए अपकार की बात उन्हें बताएँ।
श्लोक 44 (8.24.44)
ते तत्त्वं सर्वमाख्याय शिरोभिः सम्प्रणम्य च । तद्वधोपायमाचक्ष्व भगवन्निति चाब्रुवन् ॥
te tattvaṃ sarvamākhyāya śirobhiḥ sampraṇamya ca | tadvadhopāyamācakṣva bhagavanniti cābruvan
सब वृत्तान्त बताकर और सिर झुकाकर प्रणाम करके उन्होंने कहा — "भगवन्, इनके वध का उपाय बताइए।"
श्लोक 45 (8.24.45)
श्रुत्वा तद्भगवान्देवो देवानिदमुवाच ह । श्रूयतां त्रिदशाः सर्वे यथेदं वाक्यगौरवम् ॥
śrutvā tadbhagavāndevo devānidamuvāca ha | śrūyatāṃ tridaśāḥ sarve yathedaṃ vākyagauravam
यह सुनकर भगवान् देव ने देवताओं से कहा — "हे देवो, आप सब सुनिए, मेरी बात बड़ी गम्भीर है।"
ब्रह्मोवाच
श्लोक 46 (8.24.46)
दुरात्मानोऽसुरा नित्यं ते चापि विबुधा मम । न शक्नुवन्ति ते सर्वे युष्मान्वै पीडयन्ति ते ॥
durātmāno'surā nityaṃ te cāpi vibudhā mama | na śaknuvanti te sarve yuṣmānvai pīḍayanti te
"असुर सदा दुष्ट हृदय के हैं, और देवता भी मेरे ही हैं। वे सब इसे सह नहीं पाते, इसीलिए तुम्हें पीड़ा देते हैं।
श्लोक 47 (8.24.47)
अहं समस्तु सर्वेषां भूतानां नात्र संशयः । अविनीता निहन्तव्या इत्येवं प्रब्रवीमि वः ॥
ahaṃ samastu sarveṣāṃ bhūtānāṃ nātra saṃśayaḥ | avinītā nihantavyā ityevaṃ prabravīmi vaḥ
मैं सब प्राणियों के लिए समान हूँ, इसमें संदेह नहीं; पर उद्दण्डों का वध करना ही चाहिए — यही मैं तुमसे कहता हूँ।
श्लोक 48 (8.24.48)
एकेषुणा विभेद्यानि तानि दुर्गाणि नान्यथा । शक्तस्तु तानि बाणेन भेत्तुं कामं त्रिलोचनः ॥
ekeṣuṇā vibhedyāni tāni durgāṇi nānyathā | śaktastu tāni bāṇena bhettuṃ kāmaṃ trilocanaḥ
उन दुर्गों को एक ही बाण से भेदा जा सकता है, अन्यथा नहीं; और उन्हें अपनी इच्छा से बाण द्वारा भेदने में केवल त्रिनेत्रधारी ही समर्थ हैं।
श्लोक 49 (8.24.49)
ते यूयं स्थाणुमीशानं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् । योद्धारं वृणुत क्षिप्रं स तान्हन्ता सुरेतरान् ॥
te yūyaṃ sthāṇumīśānaṃ jiṣṇumakliṣṭakāriṇam | yoddhāraṃ vṛṇuta kṣipraṃ sa tānhantā suretarān
इसलिए तुम सब शीघ्र ही विजयशील, सहज कर्म करने वाले स्थाणु ईशान को अपना योद्धा चुन लो; वे उन देवशत्रुओं का संहार करेंगे।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 50 (8.24.50)
ते देवास्तेन वाक्येन चोदिताः प्रणताः स्थिताः । दिव्यं वर्षसहस्रं वै तपस्तप्त्वा सुरर्षभाः । शुभात्मानो महात्मानो जग्मुर्वै वृषभध्वजम् ॥
te devāstena vākyena coditāḥ praṇatāḥ sthitāḥ | divyaṃ varṣasahasraṃ vai tapastaptvā surarṣabhāḥ | śubhātmāno mahātmāno jagmurvai vṛṣabhadhvajam
उस वचन से प्रेरित होकर देवता विनम्र भाव से खड़े हुए। फिर एक दिव्य हज़ार वर्ष तप करके वे शुद्धात्मा, महात्मा देवश्रेष्ठ वृषभध्वज शिव के पास गए।
श्लोक 51 (8.24.51)
ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा शरण्यं शरणागताः । तपः परममाजग्मुर्गृणन्तो ब्रह्म शाश्वतम् ॥
brahmāṇamagrataḥ kṛtvā śaraṇyaṃ śaraṇāgatāḥ | tapaḥ paramamājagmurgṛṇanto brahma śāśvatam
ब्रह्मा को आगे करके, शरणदाता की शरण में आए हुए वे सनातन ब्रह्म का जप करते हुए परम तप में लगे।
श्लोक 52 (8.24.52)
अनङ्गमथनं सर्वे भवं सर्वात्मना गताः । देवदेवं परं स्थाणुं वरदं त्र्यम्बकं शिवम् ॥
anaṅgamathanaṃ sarve bhavaṃ sarvātmanā gatāḥ | devadevaṃ paraṃ sthāṇuṃ varadaṃ tryambakaṃ śivam
वे सब पूरे मन से भव की शरण गए — कामदेव का नाश करने वाले, देवों के देव, परम स्थाणु, वरदाता, त्र्यम्बक, शिव की।
श्लोक 53 (8.24.53)
शर्वमीड्यमजं रुद्रं शशाङ्काङ्कितमूर्धजम् । तुष्टुवुर्वाग्भिरुग्राभिर्भयेष्वभयमच्युतम् । सर्वात्मानं महात्मानं येनाप्तं विश्वमात्मना ॥
śarvamīḍyamajaṃ rudraṃ śaśāṅkāṅkitamūrdhajam | tuṣṭuvurvāgbhirugrābhirbhayeṣvabhayamacyutam | sarvātmānaṃ mahātmānaṃ yenāptaṃ viśvamātmanā
उन्होंने ओजस्वी वाणी से शर्व की स्तुति की — जो स्तुति के योग्य हैं, अजन्मा हैं, रुद्र हैं, जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का चिह्न है, जो भय के समय अभय देने वाले अच्युत हैं, सबके आत्मा और महात्मा हैं, जिन्होंने अपने ही आत्मा से सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त कर रखा है।
श्लोक 54 (8.24.54)
तपोविशेषैर्विविधैर्योगं यो वेद चात्मनः । यः साङ्ख्यमात्मना वेत्ति यस्य चात्मा वशे सदा ॥
tapoviśeṣairvividhairyogaṃ yo veda cātmanaḥ | yaḥ sāṅkhyamātmanā vetti yasya cātmā vaśe sadā
जो अनेक प्रकार की विशेष तपस्याओं से आत्मा के योग को जानते हैं, जो अपने आत्मा से सांख्य को जानते हैं, और जिनका आत्मा सदा उनके वश में है।
श्लोक 55 (8.24.55)
तं ते ददृशुरीशानं तेजोराशिमुमापतिम् । परेण यत्नेन भवं त्रिदशाः शर्वमीश्वरम् । अनन्यसदृशं लोके प्रतपन्तमकल्मषम् ॥
taṃ te dadṛśurīśānaṃ tejorāśimumāpatim | pareṇa yatnena bhavaṃ tridaśāḥ śarvamīśvaram | ananyasadṛśaṃ loke pratapantamakalmaṣam
उन्होंने ईशान को देखा — तेज की राशि, उमा के पति; बड़े प्रयत्न से देवताओं ने भव, शर्व, ईश्वर को देखा, जो संसार में अनुपम, देदीप्यमान और निष्कलंक हैं।
श्लोक 56 (8.24.56)
एकश्च भगवांस्तत्र नानारूपमकल्पयत् । आत्मनः प्रतिरूपाणि रूपाण्यथ महात्मनि । परस्परस्य चापश्यन्सर्वे परमविस्मिताः ॥
ekaśca bhagavāṃstatra nānārūpamakalpayat | ātmanaḥ pratirūpāṇi rūpāṇyatha mahātmani | parasparasya cāpaśyansarve paramavismitāḥ
तब वहाँ उन एक ही भगवान् ने अनेक रूप रच लिए — अपने ही प्रतिरूप; और उन महात्मा में सबने एक-दूसरे के रूप देखे और परम विस्मित हुए।
श्लोक 57 (8.24.57)
सर्वभूतमयं दृष्ट्वा तमजं जगतः पतिम् । देवा ब्रह्मर्षयश्चैव शिरोभिर्धरणीं गताः ॥
sarvabhūtamayaṃ dṛṣṭvā tamajaṃ jagataḥ patim | devā brahmarṣayaścaiva śirobhirdharaṇīṃ gatāḥ
सर्वभूतमय, अजन्मा, जगत्पति को देखकर देवता और ब्रह्मर्षि सिर से पृथ्वी पर झुक गए।
श्लोक 58 (8.24.58)
तान्स्वस्तिवाच्य चाभ्यर्च्य समुत्थाप्य च शङ्करः । ब्रूतब्रूतेति भगवान्स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥
tānsvastivācya cābhyarcya samutthāpya ca śaṅkaraḥ | brūtabrūteti bhagavānsmayamāno'bhyabhāṣata
शंकर ने स्वस्तिवचन से उनका सत्कार किया, उन्हें उठाया, और भगवान् ने मुस्कराते हुए कहा — "कहो, कहो!"
श्लोक 59 (8.24.59)
त्र्यम्बकेणाभ्यनुज्ञातास्ततस्ते स्वस्थचेतसः । नमो नमो नमस्तेऽस्तु प्रभो इत्यब्रुवन्भवम् ॥
tryambakeṇābhyanujñātāstataste svasthacetasaḥ | namo namo namaste'stu prabho ityabruvanbhavam
त्र्यम्बक की अनुमति पाकर वे स्वस्थ चित्त हो गए और भव से बोले — "प्रभो, आपको नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार!"
देवा ऊचुः
श्लोक 60 (8.24.60)
नमो देवाधिदेवाय प्रियाधाघ्नेऽतिमन्यवे । प्रजापतिमखघ्नाय प्रजापतिभिरीड्यते ॥
namo devādhidevāya priyādhāghne'timanyave | prajāpatimakhaghnāya prajāpatibhirīḍyate
"देवों के देव को नमस्कार, उन धनुर्धर को जो अत्यन्त क्रोधी हैं, प्रजापति के यज्ञ को नष्ट करने वाले को, जिनकी स्तुति प्रजापति करते हैं।
श्लोक 61 (8.24.61)
नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तूयमानाय शम्भवे । विलोहिताय रुद्राय नीलग्रीवाय शूलिने ॥
namaḥ stutāya stutyāya stūyamānāya śambhave | vilohitāya rudrāya nīlagrīvāya śūline
स्तुत, स्तुत्य और स्तुति पाते हुए शम्भु को नमस्कार; गहरे लाल रंग वाले रुद्र को, नीलकण्ठ को, शूलधारी को नमस्कार।
श्लोक 62 (8.24.62)
अमोघाय मृगाक्षाय प्रवरायुधयोधिने । अर्हाय चैव शुद्धाय क्षयाय क्रथनाय च ॥
amoghāya mṛgākṣāya pravarāyudhayodhine | arhāya caiva śuddhāya kṣayāya krathanāya ca
अमोघ, मृगनयन, श्रेष्ठ आयुधों से लड़ने वाले को; पूज्य और शुद्ध को; संहारक और विनाशकर्ता को नमस्कार।
श्लोक 63 (8.24.63)
दुर्वारणाय शुक्राय ब्रह्मणे ब्रह्मचारिणे । ईशानायाप्रमेयाय निहन्त्रे चर्मवाससे ॥
durvāraṇāya śukrāya brahmaṇe brahmacāriṇe | īśānāyāprameyāya nihantre carmavāsase
दुर्निवार, तेजस्वी, ब्रह्म-स्वरूप, ब्रह्मचारी को; ईशान, अप्रमेय, संहारकर्ता और चर्मवस्त्रधारी को नमस्कार।
श्लोक 64 (8.24.64)
तपोरताय पिङ्गाय व्रतिने कृत्तिवाससे । कुमारपित्रे त्र्यक्षाय प्रवरायुधधारिणे ॥
taporatāya piṅgāya vratine kṛttivāsase | kumārapitre tryakṣāya pravarāyudhadhāriṇe
तपस्या में रत, पिंगल वर्ण वाले, व्रतधारी, खाल पहनने वाले को; कुमार के पिता, त्रिनेत्र और श्रेष्ठ आयुध धारण करने वाले को नमस्कार।
श्लोक 65 (8.24.65)
प्रपन्नार्तिविनाशाय ब्रह्मद्विट्सङ्घघातिने । वनस्पतीनां पतये वनानां पतये नमः ॥
prapannārtivināśāya brahmadviṭsaṅghaghātine | vanaspatīnāṃ pataye vanānāṃ pataye namaḥ
शरण में आए दुखियों का दुःख हरने वाले को, ब्राह्मण-द्रोहियों के समूह का संहार करने वाले को नमस्कार; वनस्पतियों के स्वामी को, वनों के स्वामी को नमस्कार।
श्लोक 66 (8.24.66)
गवां च पतये नित्यं यज्ञानां पतये नमः । नमोस्तु ते ससैन्याय त्र्यम्बकायामितौजसे । मनोवाक्कर्मभिर्देव त्वां प्रपन्नान्भजस्व नः ॥
gavāṃ ca pataye nityaṃ yajñānāṃ pataye namaḥ | namostu te sasainyāya tryambakāyāmitaujase | manovākkarmabhirdeva tvāṃ prapannānbhajasva naḥ
गौओं के नित्य स्वामी को, यज्ञों के स्वामी को नमस्कार; अपने गणों सहित त्र्यम्बक, अमित तेजस्वी, आपको नमस्कार। हे देव, हम मन, वाणी और कर्म से आपकी शरण में आए हैं — हमें स्वीकार कीजिए।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 67 (8.24.67)
ततः प्रसन्नो भगवान्स्वागतेनाभिनन्द्य च । प्रोवाच व्येतु वस्त्रासो ब्रूत किं करवाणि वः ॥
tataḥ prasanno bhagavānsvāgatenābhinandya ca | provāca vyetu vastrāso brūta kiṃ karavāṇi vaḥ
तब प्रसन्न होकर भगवान् ने स्वागत करके उनका अभिनन्दन किया और कहा — "तुम्हारा भय दूर हो; कहो, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?"
श्लोक 68 (8.24.68)
देवाः शर्वस्य वचनं श्रुत्वा हर्षमुपागताः ॥
devāḥ śarvasya vacanaṃ śrutvā harṣamupāgatāḥ
शर्व की बात सुनकर देवता हर्ष से भर उठे।