कर्ण पर्व · अध्याय 25
देवताओं द्वारा शिव को आधा तेज देना
ब्रह्मा शिव से कहते हैं कि वे उन असुरों का संहार करें जिनके नगर लोकों को दबा रहे हैं। शिव कहते हैं कि वे अकेले यह नहीं कर सकते; देवता उनके आधे बल को भी नहीं सह सकते, इसलिए प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हीं का आधा बल ले लें। शिव प्रत्येक देवता से आधा बल और सब लोकों से अपना पशु बन जाना माँगते हैं, ताकि वे पशुपति होकर बिना पाप के असुरों को मार सकें; फिर वे भयभीत देवताओं को पाशुपत व्रत द्वारा पशुभाव से मुक्ति का वचन देते हैं। उनका आधा तेज लेकर वे देवताओं में सबसे श्रेष्ठ, पशुपति, भव और महादेव बनते हैं, और देवता उनका अभिषेक करते हैं।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (8.25.1)
पितृदेवर्षिसङ्घेभ्योऽभये दत्ते महात्मना । सत्कृत्य शंकरं प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः ॥
pitṛdevarṣisaṅghebhyo'bhaye datte mahātmanā | satkṛtya śaṃkaraṃ prāha brahmā lokapitāmahaḥ
जब महात्मा शिव ने पितरों, देवताओं और ऋषियों के समूहों को अभय दे दिया, तब लोकपितामह ब्रह्मा ने शंकर का सत्कार करके उनसे कहा।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 2 (8.25.2)
इमान्यसुरदुर्गाणि लोकांस्त्रीनाक्रमन्ति हि । कश्च प्रजापतिर्घोरांस्तान्सर्वाञ्जहि मा चिरम् ॥
imānyasuradurgāṇi lokāṃstrīnākramanti hi | kaśca prajāpatirghorāṃstānsarvāñjahi mā ciram
"ये असुर-दुर्ग तीनों लोकों को दबाए जा रहे हैं, और उनके आगे कोई प्रजापति भी क्या है? उन सब भयंकर असुरों को बिना देर किए मार डालिए।
श्लोक 3 (8.25.3)
वरातिसर्गाद्देवेश प्राजापत्यमिदं परम् । मयाऽधितिष्ठता दत्तो दानवेभ्यो महान्वरः ॥
varātisargāddeveśa prājāpatyamidaṃ param | mayā'dhitiṣṭhatā datto dānavebhyo mahānvaraḥ
हे देवेश, वरदान के प्रदान से मुझे यह परम प्रजापति-पद प्राप्त है; इस पद पर रहते हुए मैंने दानवों को महान वर दे दिया।
श्लोक 4 (8.25.4)
नास्त्यन्यो युधि तेषां वै निहन्ता इति नः श्रुतम् । तानतिक्रान्तमर्यादान्नान्यः संहर्तुमर्हति । त्वामृते सर्वभूतेश त्वं ह्येषां प्रत्यरिर्वधे ॥
nāstyanyo yudhi teṣāṃ vai nihantā iti naḥ śrutam | tānatikrāntamaryādānnānyaḥ saṃhartumarhati | tvāmṛte sarvabhūteśa tvaṃ hyeṣāṃ pratyarirvadhe
'युद्ध में उनका वध करने वाला दूसरा कोई नहीं है' — ऐसा हमने सुना है। मर्यादा लाँघ चुके उन असुरों का संहार करने में, हे सर्वभूतों के ईश, आपके सिवा दूसरा कोई समर्थ नहीं; आप ही उनके वध में उनके प्रतिद्वन्द्वी हैं।
श्लोक 5 (8.25.5)
स त्वं देव प्रपन्नानां याचतां च दिवोकसाम् । कुरु प्रसादं वरद दानवाञ्जहि संयुगे ॥
sa tvaṃ deva prapannānāṃ yācatāṃ ca divokasām | kuru prasādaṃ varada dānavāñjahi saṃyuge
इसलिए हे देव, हे वरद, शरण में आए हुए और याचना करते हुए स्वर्गवासियों पर कृपा कीजिए; युद्ध में दानवों को मार डालिए।
श्लोक 6 (8.25.6)
त्वत्प्रसादाज्जगत्सर्वं सुखमैधत मानद । शरण्यस्त्वं हि देवानां वयं त्वां शरणं गताः ॥
tvatprasādājjagatsarvaṃ sukhamaidhata mānada | śaraṇyastvaṃ hi devānāṃ vayaṃ tvāṃ śaraṇaṃ gatāḥ
हे मान देने वाले, आपकी कृपा से सारा जगत् सुखपूर्वक फलता-फूलता है। आप देवताओं के शरणदाता हैं; हम आपकी शरण में आए हैं।"
ईश्वर उवाच
श्लोक 7 (8.25.7)
हन्तव्याः शत्रवः सर्वे युष्माकमिति मे मतिः । न त्वेकश्चोत्सहे हन्तुं बलिनः सुरविद्विषः ॥
hantavyāḥ śatravaḥ sarve yuṣmākamiti me matiḥ | na tvekaścotsahe hantuṃ balinaḥ suravidviṣaḥ
"तुम्हारे सब शत्रु मारे जाने योग्य हैं, यही मेरा मत है; पर बलवान् देवद्रोहियों को मारने का साहस मैं अकेला नहीं कर सकता।
श्लोक 8 (8.25.8)
ते यूयं सहिताः सर्वे मदीयेनापि तेजसा । जयध्वं युधि तान्सर्वान्सङ्घातेन महाबलान् ॥
te yūyaṃ sahitāḥ sarve madīyenāpi tejasā | jayadhvaṃ yudhi tānsarvānsaṅghātena mahābalān
इसलिए तुम सब मिलकर, मेरे तेज के साथ भी, संगठित होकर युद्ध में उन सब महाबलियों को जीत लो।"
देवा ऊचुः
श्लोक 9 (8.25.9)
अस्मत्तेजोबलं यावत्तावद्द्विगुणमेव वा । तत्तेषामिति मन्यामो दृष्टतेजोबला हि ते ॥
asmattejobalaṃ yāvattāvaddviguṇameva vā | tatteṣāmiti manyāmo dṛṣṭatejobalā hi te
"हमारा जितना तेज और बल है, उनका उससे दुगुना है, ऐसा हम मानते हैं; क्योंकि हमने उनके तेज और बल को देखा है।"
ईश्वर उवाच
श्लोक 10 (8.25.10)
वध्यास्ते सर्वथा पापा ये युष्मास्वपराधिनः । मम तेजोबलार्धेन सर्वे घ्नत शात्रवान् ॥
vadhyāste sarvathā pāpā ye yuṣmāsvaparādhinaḥ | mama tejobalārdhena sarve ghnata śātravān
"जिन्होंने तुम्हारा अपराध किया है, वे पापी हर प्रकार से वध के योग्य हैं। तुम सब मेरे तेज और बल के आधे भाग से उन सब शत्रुओं को मारो।"
देवा ऊचुः
श्लोक 11 (8.25.11)
बिभर्तुं तव तेजोर्धं न शक्ष्याम सुरेश्वर । सर्वेषां नो बलार्धेन त्वमेव जहि शात्रवान् ॥
bibhartuṃ tava tejordhaṃ na śakṣyāma sureśvara | sarveṣāṃ no balārdhena tvameva jahi śātravān
"हे सुरेश्वर, हम आपके आधे तेज को धारण नहीं कर सकेंगे। हम सबके आधे बल से आप ही शत्रुओं को मारिए।
श्लोक 12 (8.25.12)
वयं च सर्वथा देव रक्षणीयास्तथैव च । स नो रक्ष महादेव त्वमेव जहि शात्रवान् ॥
vayaṃ ca sarvathā deva rakṣaṇīyāstathaiva ca | sa no rakṣa mahādeva tvameva jahi śātravān
हे देव, हमारी भी सब प्रकार से रक्षा होनी चाहिए। इसलिए हे महादेव, हमारी रक्षा कीजिए और आप ही शत्रुओं को मारिए।"
ईश्वर उवाच
श्लोक 13 (8.25.13)
मम तेजो न शक्ता हि सर्वे धारयितुं यदि । अहमेनान्वधिष्यामि युष्मत्तेजोर्धसंयुतः ॥
mama tejo na śaktā hi sarve dhārayituṃ yadi | ahamenānvadhiṣyāmi yuṣmattejordhasaṃyutaḥ
"यदि तुम सब मेरे तेज को धारण नहीं कर सकते, तो मैं तुम्हारे आधे तेज से युक्त होकर इन्हें स्वयं मारूँगा।
श्लोक 14 (8.25.14)
बलार्धं यदि मे देवा न धारयितुमाहवे । शक्ताः सर्वे हि सङ्गम्य यूयं तत्प्रब्रवीमि वः ॥
balārdhaṃ yadi me devā na dhārayitumāhave | śaktāḥ sarve hi saṅgamya yūyaṃ tatprabravīmi vaḥ
हे देवो, यदि तुम सब मिलकर भी युद्ध में मेरे आधे बल को धारण न कर सको, तो मैं तुमसे यह कहता हूँ —
श्लोक 15 (8.25.15)
समा भवन्ति मे सर्वे दानवाश्चामराश्च ये । शिवोऽस्मि सर्वभूतानां शिवत्वं तेन मे सुराः ॥
samā bhavanti me sarve dānavāścāmarāśca ye | śivo'smi sarvabhūtānāṃ śivatvaṃ tena me surāḥ
दानव हों या देवता, वे सब मेरे लिए समान हैं। मैं सब प्राणियों के लिए शिव (कल्याणकारी) हूँ; हे देवो, इसी से मेरा नाम शिव है।
श्लोक 16 (8.25.16)
किन्त्वधर्मेण वर्तन्ते यस्मात्ते सुरशत्रवः । तस्माद्वध्या मयाप्येते युष्माकं च हितेप्सया ॥
kintvadharmeṇa vartante yasmātte suraśatravaḥ | tasmādvadhyā mayāpyete yuṣmākaṃ ca hitepsayā
किन्तु ये देवशत्रु अधर्म से चलते हैं, इसलिए तुम्हारे हित की इच्छा से मैं भी इन्हें मारने योग्य मानता हूँ।
श्लोक 17 (8.25.17)
शरणं वः प्रपन्नानां धर्मेण च जिगीषताम् । साहाय्यं वः करिष्यामि निहनिष्यामि वो रिपून् ॥
śaraṇaṃ vaḥ prapannānāṃ dharmeṇa ca jigīṣatām | sāhāyyaṃ vaḥ kariṣyāmi nihaniṣyāmi vo ripūn
तुम शरण में आए हो और धर्म से विजय चाहते हो; मैं तुम्हारी सहायता करूँगा और तुम्हारे शत्रुओं को मारूँगा।
श्लोक 18 (8.25.18)
दीयतां च बलार्धं मे सर्वैरपि पृथक्पृथक् । पशुत्वं चैव मे लोकाः सर्वे कल्पन्तु पीडिताः ॥
dīyatāṃ ca balārdhaṃ me sarvairapi pṛthakpṛthak | paśutvaṃ caiva me lokāḥ sarve kalpantu pīḍitāḥ
तुम सब अलग-अलग मुझे अपना आधा बल दो; और पीड़ित सब लोक मेरे प्रति पशुभाव को स्वीकार करें।
श्लोक 19 (8.25.19)
पशूनां तु पतित्वं मे भवत्वद्य दिवौकसः । एवं न पापं प्राप्स्यामि पशून्हत्वा सुरद्विषः ॥
paśūnāṃ tu patitvaṃ me bhavatvadya divaukasaḥ | evaṃ na pāpaṃ prāpsyāmi paśūnhatvā suradviṣaḥ
हे स्वर्गवासियो, आज मैं पशुओं का पति हो जाऊँ। इस प्रकार देवताओं के शत्रु उन पशुओं को मारकर मैं पाप का भागी नहीं होऊँगा।
श्लोक 20 (8.25.20)
कल्पयध्वं रथं दिव्यं रथाश्वांश्चैव पारगान् । धनुः शरं सारथिं च ततो जेष्यामि वो रिपून् ॥
kalpayadhvaṃ rathaṃ divyaṃ rathāśvāṃścaiva pāragān | dhanuḥ śaraṃ sārathiṃ ca tato jeṣyāmi vo ripūn
एक दिव्य रथ, पार ले जाने वाले रथ-घोड़े, धनुष, बाण और सारथी की व्यवस्था करो; तब मैं तुम्हारे शत्रुओं को जीतूँगा।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 21 (8.25.21)
इति श्रुत्वा वचो देवा देवदेवस्य भूपतेः । विषादमगमन्सर्वे पशुत्वं प्रति शङ्किताः ॥
iti śrutvā vaco devā devadevasya bhūpateḥ | viṣādamagamansarve paśutvaṃ prati śaṅkitāḥ
भूमि के स्वामी देवाधिदेव का यह वचन सुनकर पशु बनने की शंका से सब देवता खिन्न हो गए।
श्लोक 22 (8.25.22)
तेषां भावं भवो ज्ञात्वा देवस्तानब्रवीदिदम् । मा वोस्तु पशुभावेऽस्मिन्भयं विबुधसत्तमाः ॥
teṣāṃ bhāvaṃ bhavo jñātvā devastānabravīdidam | mā vostu paśubhāve'sminbhayaṃ vibudhasattamāḥ
उनके मन की बात जानकर भव देव ने उनसे यह कहा — "हे श्रेष्ठ देवो, इस पशुभाव से तुम्हें भय न हो।
ईश्वर उवाच
श्लोक 23 (8.25.23)
श्रूयतां पशुभावस्य विमोक्षः क्रियतां च सः ॥
śrūyatāṃ paśubhāvasya vimokṣaḥ kriyatāṃ ca saḥ
पशुभाव से छुटकारे का उपाय सुनो और उसे करो।
श्लोक 24 (8.25.24)
यो वः पशुपतेश्चर्यां चरिष्यति स मोक्ष्यते । पशुत्वादिति सत्यं वः प्रतिजाने समागमे ॥
yo vaḥ paśupateścaryāṃ cariṣyati sa mokṣyate | paśutvāditi satyaṃ vaḥ pratijāne samāgame
जो तुममें से पशुपति के आचरण का पालन करेगा, वह पशुत्व से मुक्त हो जाएगा; इस सभा में मैं तुम्हें यह सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ।
श्लोक 25 (8.25.25)
ये चाप्यन्ये चरिष्यन्ति व्रतं मोक्ष्यन्ति तेऽपि च ॥
ye cāpyanye cariṣyanti vrataṃ mokṣyanti te'pi ca
और जो दूसरे भी इस व्रत का पालन करेंगे, वे भी मुक्त हो जाएँगे।
श्लोक 26 (8.25.26)
नैष्ठिकं द्वादशाब्दं वा अर्धमब्दमृतुत्रयम् । मासं द्वादशरात्रं गुह्यं व्रतं दिव्यं चरिष्यथ ॥
naiṣṭhikaṃ dvādaśābdaṃ vā ardhamabdamṛtutrayam | māsaṃ dvādaśarātraṃ guhyaṃ vrataṃ divyaṃ cariṣyatha
तुम इस गुप्त दिव्य व्रत का पालन करोगे — आजीवन, या बारह वर्ष, या आधा वर्ष, या तीन ऋतुएँ, या एक मास, या बारह रात।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 27 (8.25.27)
तं तथेत्यब्रुवन्देवा देवदेवनमस्कृतम् । ऊचुश्चेदं गृहाणेदं तेजसोऽर्धमिति प्रभुम् ॥
taṃ tathetyabruvandevā devadevanamaskṛtam | ūcuścedaṃ gṛhāṇedaṃ tejaso'rdhamiti prabhum
देवताओं ने, देवाधिदेव द्वारा भी नमस्कृत उन प्रभु से "ऐसा ही हो" कहा और बोले — "हमारे तेज का यह आधा भाग लीजिए।"
श्लोक 28 (8.25.28)
प्रत्युवाच तथेत्येव शूलधृद्राजसत्तम । ततस्ते प्रददुः सर्वे तेजसोऽर्धं महात्मने ॥
pratyuvāca tathetyeva śūladhṛdrājasattama | tataste pradaduḥ sarve tejaso'rdhaṃ mahātmane
हे राजाओं में श्रेष्ठ, शूलधारी ने "ऐसा ही" कहकर उत्तर दिया, और तब सबने उन महात्मा को अपने तेज का आधा भाग दे दिया।
श्लोक 29 (8.25.29)
सर्वमादाय सर्वेषां तेजसोऽर्धं दिवौकसाम् । तेजसाप्यधिको भूत्वा भूयोऽप्यतिबलोऽभवत् ॥
sarvamādāya sarveṣāṃ tejaso'rdhaṃ divaukasām | tejasāpyadhiko bhūtvā bhūyo'pyatibalo'bhavat
स्वर्गवासी सब देवताओं के तेज का आधा भाग लेकर वे तेज में सबसे बढ़कर हो गए और पहले से भी अधिक बलवान् हो उठे।
श्लोक 30 (8.25.30)
ततः प्रभृति देवानां देवदेवोऽभवद्भवः । पतिश्च सर्वभूतानां पशूनां चाभवत्तदा ॥
tataḥ prabhṛti devānāṃ devadevo'bhavadbhavaḥ | patiśca sarvabhūtānāṃ paśūnāṃ cābhavattadā
तभी से देवाधिदेव भव हुए, और समस्त प्राणियों के तथा पशुओं के भी स्वामी बने।
श्लोक 31 (8.25.31)
तस्मात्पशुपतिश्चोक्तो भवत्वाच्च भवेति वै । अर्धमादाय सर्वेषां तेजसा प्रज्वलन्निव ॥
tasmātpaśupatiścokto bhavatvācca bhaveti vai | ardhamādāya sarveṣāṃ tejasā prajvalanniva
इसीलिए वे पशुपति कहलाए, और भवत्व (होने) के कारण भव; सबके तेज का आधा भाग लेकर वे मानो अपने तेज से जल उठे।
श्लोक 32 (8.25.32)
भासयामास तान्सर्वान्देवदेवो महाद्युतिः । ततोऽभिषिषिच्युः सर्वे सुरा रुद्रं पुरारिणम् ॥
bhāsayāmāsa tānsarvāndevadevo mahādyutiḥ | tato'bhiṣiṣicyuḥ sarve surā rudraṃ purāriṇam
महाद्युतिमान् देवाधिदेव ने उन सबको प्रकाशित कर दिया; तब सब देवताओं ने पुरारि रुद्र का अभिषेक किया।
श्लोक 33 (8.25.33)
महादेव इति ह्यासीद्देवदेवो महेश्वरः ॥
mahādeva iti hyāsīddevadevo maheśvaraḥ
इस प्रकार देवाधिदेव महेश्वर महादेव कहलाए।