कर्ण पर्व · अध्याय 26
रुद्र के रथ की रचना
शल्य को अपनी कथा सुनाते हुए दुर्योधन बताता है कि देवताओं ने शिव को अपने तेज का आधा भाग दिया और विश्वकर्मा से उनके लिए रथ बनवाया। पृथ्वी, पर्वत, सूर्य-चन्द्र, नदियाँ, वेद, ऋतुएँ और यज्ञ उस रथ के अंग बने; वर्ष को धनुष और काल की रात्रि को उसकी प्रत्यंचा बनाया गया, तथा अग्नि, सोम और विष्णु को बाण। शस्त्र धारण किए, ऋषियों से स्तुत होते हुए शिव उस रथ पर चढ़ते हैं और पूछते हैं कि इसका सारथि कौन होगा।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (8.26.1)
तेजसोऽर्धं सुरा दत्त्वा शङ्कराय महात्मने । पशुत्वमपि चोपेत्य विश्वकर्माणमव्ययम् ॥
tejaso'rdhaṃ surā dattvā śaṅkarāya mahātmane | paśutvamapi copetya viśvakarmāṇamavyayam
देवताओं ने महात्मा शङ्कर को अपने तेज का आधा भाग दिया और स्वयं पशुभाव भी स्वीकार किया। फिर अविनाशी विश्वकर्मा के पास जाकर—
श्लोक 2 (8.26.2)
ऊचुः सर्वे समाभाष्य रथः सङ्कल्प्यतामिति । विश्वकर्माऽपि सञ्चिन्त्य रथं दिव्यमकल्पयत् ॥
ūcuḥ sarve samābhāṣya rathaḥ saṅkalpyatāmiti | viśvakarmā'pi sañcintya rathaṃ divyamakalpayat
सबने उनसे कहा, "एक रथ की रचना कीजिए।" विश्वकर्मा ने भी विचार करके एक दिव्य रथ बनाया।
श्लोक 3 (8.26.3)
समेतां पृथिवीं देवीं विशालां पुरमालिनीम् । सपर्वतवनद्वीपां चक्रे भूतधरां रथम् ॥
sametāṃ pṛthivīṃ devīṃ viśālāṃ puramālinīm | saparvatavanadvīpāṃ cakre bhūtadharāṃ ratham
उन्होंने प्राणियों को धारण करने वाली दिव्य पृथ्वी को—जो समतल, विशाल और नगरों की माला से सजी है, तथा पर्वतों, वनों और द्वीपों सहित है—रथ बना दिया।
श्लोक 4 (8.26.4)
ईषां नक्षत्रवंशं च छत्रं मेरुमहागिरिम् । अनेकद्रुसञ्छन्नं रत्नाकरमनुत्तमम् ॥
īṣāṃ nakṣatravaṃśaṃ ca chatraṃ merumahāgirim | anekadrusañchannaṃ ratnākaramanuttamam
नक्षत्रों की पंक्ति को रथ का ईषादण्ड और अनेक वृक्षों से ढके, रत्नों की अनुपम खान महागिरि मेरु को उसका छत्र बनाया।
श्लोक 5 (8.26.5)
हिमवन्तं च विन्ध्यं च नानाद्रुमलताकुलम् । अवस्करं प्रतिष्ठानं कल्पयामास वै तदा ॥
himavantaṃ ca vindhyaṃ ca nānādrumalatākulam | avaskaraṃ pratiṣṭhānaṃ kalpayāmāsa vai tadā
नाना वृक्षों और लताओं से भरे हिमालय और विन्ध्य को उन्होंने तब रथ का पिछला भाग और उसका आधार बनाया।
श्लोक 6 (8.26.6)
अस्तंगिरिमधिष्ठानं नानाद्विजगणायुतम् । चकार भगवांस्त्वष्टा उदयं रथकूबरम् ॥
astaṃgirimadhiṣṭhānaṃ nānādvijagaṇāyutam | cakāra bhagavāṃstvaṣṭā udayaṃ rathakūbaram
भगवान् त्वष्टा ने अनेक पक्षीगणों से भरे अस्ताचल को रथ का अधिष्ठान और उदयाचल को उसका कूबर बनाया।
श्लोक 7 (8.26.7)
मीननक्रझषावासं दानवालयमुत्तमम् । समुद्रमक्षं विदधे पत्तनाकरशोभितम् ॥
mīnanakrajhaṣāvāsaṃ dānavālayamuttamam | samudramakṣaṃ vidadhe pattanākaraśobhitam
मछलियों, मगरों और शिशुमारों के निवास, दानवों के श्रेष्ठ आलय तथा बन्दरगाहों और खानों से शोभित समुद्र को उन्होंने रथ की धुरी बनाया।
श्लोक 8 (8.26.8)
चक्रं चक्रे चन्द्रमसं तारकागणमण्डितम् । दिवाकरं चाप्यपरं चक्रं चक्रेऽंशुमालिनम् ॥
cakraṃ cakre candramasaṃ tārakāgaṇamaṇḍitam | divākaraṃ cāpyaparaṃ cakraṃ cakre'ṃśumālinam
उन्होंने तारों के समूह से मण्डित चन्द्रमा को एक चक्र बनाया और किरणों की माला पहने सूर्य को दूसरा चक्र।
श्लोक 9 (8.26.9)
गङ्गां सरस्वतीं तूणीं चक्रे विश्वकृदव्ययः । अलङ्कारा रथस्यासन्नापगाः सरितस्तथा ॥
gaṅgāṃ sarasvatīṃ tūṇīṃ cakre viśvakṛdavyayaḥ | alaṅkārā rathasyāsannāpagāḥ saritastathā
अविनाशी विश्वकर्मा ने गङ्गा और सरस्वती को तरकस बनाया; नदियाँ और सरिताएँ रथ के अलंकार बनीं।
श्लोक 10 (8.26.10)
त्रीनग्नीन्मन्त्रवच्चक्रे रथस्याथ त्रिवेणुकम् । अनुकर्षान्रथे दीप्तान्वरूथांश्चापि तारकाः ॥
trīnagnīnmantravaccakre rathasyātha triveṇukam | anukarṣānrathe dīptānvarūthāṃścāpi tārakāḥ
उन्होंने मन्त्रों सहित तीनों अग्नियों को रथ का त्रिवेणु बनाया; रथ में चमकते अनुकर्ष लगाए, और तारों को उसका वरूथ बनाया।
श्लोक 11 (8.26.11)
ओषधीर्वीरुधश्चैव घण्टाजालं च भानुमत् । अलञ्चकार च रथं मासपक्षर्तुभिर्विभुः ॥
oṣadhīrvīrudhaścaiva ghaṇṭājālaṃ ca bhānumat | alañcakāra ca rathaṃ māsapakṣartubhirvibhuḥ
ओषधियाँ और लताएँ तथा चमकता हुआ घण्टों का जाल उन्होंने बनाया, और उन प्रभु ने मास, पक्ष और ऋतुओं से रथ को सजाया।
श्लोक 12 (8.26.12)
अहोरात्रैः कलाभिश्च काष्ठाभिरयनैस्तथा । द्यां युगं युगपर्वाणि संवर्तकबलाहकान् ॥
ahorātraiḥ kalābhiśca kāṣṭhābhirayanaistathā | dyāṃ yugaṃ yugaparvāṇi saṃvartakabalāhakān
दिन-रात, कला, काष्ठा और अयनों से, तथा आकाश, युग (जुए), जुए की सन्धियों और संवर्तक मेघों से उन्होंने उसे सजाया।
श्लोक 13 (8.26.13)
शम्यां धृतिं च मेधां च स्थितिं सन्नतिमेव च । ऋग्वेदं सामवेदं च धुर्यावश्वावकल्पयत् ॥
śamyāṃ dhṛtiṃ ca medhāṃ ca sthitiṃ sannatimeva ca | ṛgvedaṃ sāmavedaṃ ca dhuryāvaśvāvakalpayat
शम्या, धृति, मेधा, स्थिति और सन्नति को भी उन्होंने रचा; ऋग्वेद और सामवेद को उन्होंने जुए में जुतने वाले दो घोड़े बनाया।
श्लोक 14 (8.26.14)
पृष्ठाश्वौ तु यजुर्वेदः कल्पितोऽथर्वणस्तथा । अश्वानां चाप्यलङ्कारं विदधे पदसञ्चयम् ॥
pṛṣṭhāśvau tu yajurvedaḥ kalpito'tharvaṇastathā | aśvānāṃ cāpyalaṅkāraṃ vidadhe padasañcayam
यजुर्वेद और अथर्ववेद को उन्होंने दोनों पिछले घोड़े बनाया; और घोड़ों के लिए पैरों के आभूषणों का समूह रचा।
श्लोक 15 (8.26.15)
सिनीवालीमनुमतिं कुहूं राकां च सुप्रभाम् । योक्त्राणि चक्रे चाश्वानां कूश्माण्डांश्चापि पन्नगान् ॥
sinīvālīmanumatiṃ kuhūṃ rākāṃ ca suprabhām | yoktrāṇi cakre cāśvānāṃ kūśmāṇḍāṃścāpi pannagān
सिनीवाली, अनुमति, कुहू और तेजस्विनी राका को उन्होंने घोड़ों की रस्सियाँ बनाया, और कूष्माण्डों तथा सर्पों को भी।
श्लोक 16 (8.26.16)
तालपृष्ठोऽथ नहुषः कार्कोटकधनञ्जयौ । इतरे चाभवन्नागा हयानां वाहबन्धनम् ॥
tālapṛṣṭho'tha nahuṣaḥ kārkoṭakadhanañjayau | itare cābhavannāgā hayānāṃ vāhabandhanam
तालपृष्ठ, नहुष, कर्कोटक और धनञ्जय तथा अन्य नाग घोड़ों के बन्धन बने।
श्लोक 17 (8.26.17)
अभीशवः षडङ्गानि कल्पितानि महीपते । ओङ्कारः कल्पितस्तस्य प्रतोदो विश्वकर्मणा ॥
abhīśavaḥ ṣaḍaṅgāni kalpitāni mahīpate | oṅkāraḥ kalpitastasya pratodo viśvakarmaṇā
हे महीपते, छहों वेदाङ्गों को लगाम बनाया गया, और विश्वकर्मा ने ओंकार को चाबुक बनाया।
श्लोक 18 (8.26.18)
यज्ञाः सर्वे पृथक्लृप्ता रथाङ्गानि च भागशः । अधिष्ठानं मनश्चासीत्परिरथ्या सरस्वती ॥
yajñāḥ sarve pṛthaklṛptā rathāṅgāni ca bhāgaśaḥ | adhiṣṭhānaṃ manaścāsītparirathyā sarasvatī
सब यज्ञ अलग-अलग रथ के अंगों के रूप में अपने-अपने स्थान पर रचे गए; मन उसका अधिष्ठान था और सरस्वती उसकी परिरथ्या (घेरने वाली बाड़)।
श्लोक 19 (8.26.19)
नानावर्णानि शस्त्राणि पताकाः पवनेरिताः । विद्युदिन्द्रधनुर्युक्तं रथं दीप्त्या व्यदीपयत् ॥
nānāvarṇāni śastrāṇi patākāḥ pavaneritāḥ | vidyudindradhanuryuktaṃ rathaṃ dīptyā vyadīpayat
नाना रंगों के शस्त्र उसकी पताकाएँ बने, जिन्हें वायु हिलाता था; और बिजली तथा इन्द्रधनुष से युक्त उस रथ को उन्होंने दीप्ति से जगमगा दिया।
श्लोक 20 (8.26.20)
वर्म योद्धुं च विहितं नभो ग्रहगणाकुलम् । अभेद्यं भानुमच्चित्रं कालचक्रपरिक्षतम् ॥
varma yoddhuṃ ca vihitaṃ nabho grahagaṇākulam | abhedyaṃ bhānumaccitraṃ kālacakraparikṣatam
योद्धा के लिए कवच भी बनाया गया—ग्रहगणों से भरा आकाश ही, जो अभेद्य, दीप्तिमान्, विचित्र रंगों वाला और कालचक्र से चारों ओर घिरा हुआ था।
श्लोक 21 (8.26.21)
एवमस्मिन्महाराज कल्पिते रथसत्तमे । त्वष्ट्रा मनुजशार्दूल द्विषतां भयवर्धने ॥
evamasminmahārāja kalpite rathasattame | tvaṣṭrā manujaśārdūla dviṣatāṃ bhayavardhane
हे महाराज, हे नरव्याघ्र, जब त्वष्टा ने शत्रुओं का भय बढ़ाने वाले इस श्रेष्ठ रथ को इस प्रकार रच दिया,
श्लोक 22 (8.26.22)
स्वान्यायुधानि दिव्यानि न्यदधाच्छङ्करो रथे । ध्वजयष्टिं वियत्कृत्वा स्थापयामास गोवृषम् ॥
svānyāyudhāni divyāni nyadadhācchaṅkaro rathe | dhvajayaṣṭiṃ viyatkṛtvā sthāpayāmāsa govṛṣam
तब शङ्कर ने अपने दिव्य आयुध रथ में रखे, और आकाश को ध्वजदण्ड बनाकर उस पर वृषभ को स्थापित किया।
श्लोक 23 (8.26.23)
ब्रह्मदण्डः कालदण्डो रुद्रदण्डश्च ते ज्वराः । परिष्कारा रथस्यासन्समन्ताद्दिशमुद्धताः ॥
brahmadaṇḍaḥ kāladaṇḍo rudradaṇḍaśca te jvarāḥ | pariṣkārā rathasyāsansamantāddiśamuddhatāḥ
ब्रह्मदण्ड, कालदण्ड, रुद्रदण्ड और ज्वर—ये रथ के साज-सामान बनकर चारों दिशाओं में ऊपर उठे खड़े थे।
श्लोक 24 (8.26.24)
विचित्रमृतुभिः षड्भिः कृत्वा संवत्सरं धनुः । छायामेवात्मनश्चक्रे धनुर्ज्यामक्षयां ध्रुवाम् ॥
vicitramṛtubhiḥ ṣaḍbhiḥ kṛtvā saṃvatsaraṃ dhanuḥ | chāyāmevātmanaścakre dhanurjyāmakṣayāṃ dhruvām
छह ऋतुओं से विचित्र वर्ष को धनुष बनाकर उन्होंने अपनी ही छाया को उसकी अक्षय और स्थिर प्रत्यंचा बनाया।
श्लोक 25 (8.26.25)
कालो हि भगवान्रुद्रस्तच्च संवत्सरं धनुः । तस्माद्रौद्री कालरात्री ज्या कृता धनुषोऽजरा ॥
kālo hi bhagavānrudrastacca saṃvatsaraṃ dhanuḥ | tasmādraudrī kālarātrī jyā kṛtā dhanuṣo'jarā
क्योंकि भगवान् रुद्र ही काल हैं और वह वर्ष ही उनका धनुष था; इसीलिए धनुष की प्रत्यंचा रुद्र की अजर कालरात्रि बनाई गई।
श्लोक 26 (8.26.26)
ततो रथे रथाश्वांस्तानृषयः समयोजयन् । एकैकशः सुसंहृष्टानादाय सुधृतव्रताः ॥
tato rathe rathāśvāṃstānṛṣayaḥ samayojayan | ekaikaśaḥ susaṃhṛṣṭānādāya sudhṛtavratāḥ
तब दृढ़ व्रत वाले ऋषियों ने रथ के घोड़ों को एक-एक करके, अत्यन्त हर्ष के साथ लाकर रथ में जोड़ा।
श्लोक 27 (8.26.27)
दक्षिणस्यां धुरि कृत ऋग्वेदो मन्त्रपारगैः । सव्यतः सामवेदश्च युक्तो राजन्महर्षिभिः ॥
dakṣiṇasyāṃ dhuri kṛta ṛgvedo mantrapāragaiḥ | savyataḥ sāmavedaśca yukto rājanmaharṣibhiḥ
मन्त्रों के पारंगतों ने दाहिनी ओर जुए की धुरी पर ऋग्वेद को लगाया; और हे राजन्, महर्षियों ने बाईं ओर सामवेद को जोता।
श्लोक 28 (8.26.28)
पार्ष्ठिदक्षिणतो युक्तो यजुर्वेदः सुरद्विजैः । इतरस्यां तथा पार्ष्ठ्यां युक्तो राजन्नथर्वणः ॥
pārṣṭhidakṣiṇato yukto yajurvedaḥ suradvijaiḥ | itarasyāṃ tathā pārṣṭhyāṃ yukto rājannatharvaṇaḥ
देवताओं और ब्राह्मणों ने दाहिनी पिछली ओर यजुर्वेद को जोता; और हे राजन्, दूसरी पिछली ओर अथर्ववेद जोता गया।
श्लोक 29 (8.26.29)
एवं ते वाजिनो युक्ता यज्ञविद्भिस्तथा रथे । अशोभन्त तथा युक्ता यथैवाध्वरमध्यगाः ॥
evaṃ te vājino yuktā yajñavidbhistathā rathe | aśobhanta tathā yuktā yathaivādhvaramadhyagāḥ
यज्ञ को जानने वालों द्वारा इस प्रकार रथ में जुते हुए वे घोड़े ऐसे शोभित हुए जैसे यज्ञ के मध्य में खड़े हों।
श्लोक 30 (8.26.30)
कल्पयित्वा रथं दिव्यं ततो बाणमकल्पयत् । चिन्तयित्वा हरिं विष्णुमव्ययं यज्ञवाहनम् ॥
kalpayitvā rathaṃ divyaṃ tato bāṇamakalpayat | cintayitvā hariṃ viṣṇumavyayaṃ yajñavāhanam
दिव्य रथ रचकर उन्होंने यज्ञ के वाहन, अविनाशी हरि विष्णु का ध्यान करते हुए फिर बाण की रचना की।
श्लोक 31 (8.26.31)
शरं सङ्कल्पयाञ्चक्रे विश्वकर्मा महामनाः । तस्य वाजांश्च पुङ्खं च कल्पयामास वै तदा ॥
śaraṃ saṅkalpayāñcakre viśvakarmā mahāmanāḥ | tasya vājāṃśca puṅkhaṃ ca kalpayāmāsa vai tadā
महामना विश्वकर्मा ने बाण की कल्पना की और फिर उसके पंख और पुङ्ख (पिछला भाग) बनाए।
श्लोक 32 (8.26.32)
पुण्यगन्धवहं राजञ्श्वसनं राजसत्तम । अग्नीषोमौ शरमुखे कल्पयामास वै तदा ॥
puṇyagandhavahaṃ rājañśvasanaṃ rājasattama | agnīṣomau śaramukhe kalpayāmāsa vai tadā
हे राजन्, राजाओं में श्रेष्ठ, पवित्र सुगन्ध ढोने वाली वायु को उन्होंने उसका श्वास बनाया और अग्नि तथा सोम को बाण की नोक पर स्थापित किया।
श्लोक 33 (8.26.33)
अग्नीषोमात्मकं कृत्स्नमुच्यते वैष्णवं जगत् । विष्णुरात्मा भगवतो भवस्यामिततेजसः ॥
agnīṣomātmakaṃ kṛtsnamucyate vaiṣṇavaṃ jagat | viṣṇurātmā bhagavato bhavasyāmitatejasaḥ
कहा जाता है कि सारा जगत् अग्नि और सोममय है और विष्णु का है; विष्णु अपार तेज वाले भगवान् भव की आत्मा हैं।
श्लोक 34 (8.26.34)
तस्माद्धनुर्ज्यासंस्पर्शं स विषेहे शरस्य वै । तस्मिञ्शरे तीक्ष्णमन्युममुञ्चद्दुःसहं प्रभुः ॥
tasmāddhanurjyāsaṃsparśaṃ sa viṣehe śarasya vai | tasmiñśare tīkṣṇamanyumamuñcadduḥsahaṃ prabhuḥ
इसी कारण वे बाण पर प्रत्यंचा का स्पर्श सह सके; और उस बाण में प्रभु ने तीखा, असह्य क्रोध छोड़ा।
श्लोक 35 (8.26.35)
भृग्वङ्गिरोमन्युभवः क्रोधाग्निरतिदुःसहः । स नीललोहितो धूम्रः कृत्तिवासा भयानकः ॥
bhṛgvaṅgiromanyubhavaḥ krodhāgniratiduḥsahaḥ | sa nīlalohito dhūmraḥ kṛttivāsā bhayānakaḥ
भृगु और अङ्गिरा के क्रोध से उत्पन्न वह क्रोधाग्नि अत्यन्त असह्य थी; वह नीललोहित, धूम्रवर्ण, चर्मवस्त्रधारी और भयानक थी।
श्लोक 36 (8.26.36)
आदित्यायुतसङ्काशस्तेजोज्वालावृतो भवः । दुश्चर्यच्यावको जेता हन्ता ब्रह्मद्विषां वरः ॥
ādityāyutasaṅkāśastejojvālāvṛto bhavaḥ | duścaryacyāvako jetā hantā brahmadviṣāṃ varaḥ
दस हज़ार सूर्यों के समान, तेज की ज्वाला से घिरे हुए भव, जो दुराचारियों को गिरा देने वाले, विजेता और संहारक हैं, ब्राह्मणद्रोहियों के श्रेष्ठ संहारक हैं—
श्लोक 37 (8.26.37)
तस्याङ्गानि समाश्रित्य स्थितं विश्वमिदं जगत् । जङ्गमाजङ्गमं राजञ्छुशुभेऽद्भुतदर्शनम् ॥
tasyāṅgāni samāśritya sthitaṃ viśvamidaṃ jagat | jaṅgamājaṅgamaṃ rājañchuśubhe'dbhutadarśanam
हे राजन्, उनके अङ्गों का आश्रय लेकर यह चर और अचर सारा जगत् स्थित था और अद्भुत दर्शन वाला होकर शोभित हुआ।
श्लोक 38 (8.26.38)
दृष्ट्वा तु तं रथं दिव्यं कवची स शरासनी । आददे स शरं दिव्यं सोमविष्ण्वग्निवायुजम् ॥
dṛṣṭvā tu taṃ rathaṃ divyaṃ kavacī sa śarāsanī | ādade sa śaraṃ divyaṃ somaviṣṇvagnivāyujam
उस दिव्य रथ को देखकर कवचधारी और धनुर्धारी उन्होंने सोम, विष्णु, अग्नि और वायु से उत्पन्न दिव्य बाण को उठा लिया।
श्लोक 39 (8.26.39)
तमादाय महादेवस्त्रासयन्दैत्यदानवान् । आरुरोह तदा यत्तः कम्पयन्निव रोदसी ॥
tamādāya mahādevastrāsayandaityadānavān | āruroha tadā yattaḥ kampayanniva rodasī
उसे लेकर महादेव दैत्यों और दानवों को भयभीत करते हुए तत्परता से रथ पर चढ़े, मानो द्युलोक और भूलोक को कँपा रहे हों।
श्लोक 40 (8.26.40)
महर्षिभिः स्तूयमानो वन्द्यमानश्च वन्दिभिः । उपनृत्तश्चाप्सरसां गणैर्नृत्तविशारदैः ॥
maharṣibhiḥ stūyamāno vandyamānaśca vandibhiḥ | upanṛttaścāpsarasāṃ gaṇairnṛttaviśāradaiḥ
महर्षि उनकी स्तुति कर रहे थे, वन्दीजन उनकी वन्दना कर रहे थे, और नृत्य में निपुण अप्सराओं के समूह उनके सामने नाच रहे थे।
श्लोक 41 (8.26.41)
स शोभमानो वरदः खड्गी बाणी शरासनी । हसन्निवाब्रवीद्देवः सारथिः को भवेदिति ॥
sa śobhamāno varadaḥ khaḍgī bāṇī śarāsanī | hasannivābravīddevaḥ sārathiḥ ko bhavediti
शोभायमान, वर देने वाले, खड्ग, बाण और धनुष धारण किए हुए देव ने मानो हँसते हुए कहा, "सारथि कौन होगा?"