कर्ण पर्व · अध्याय 27
ब्रह्मा द्वारा रुद्र के रथ का सारथ्य; त्रिपुर-दहन
दुर्योधन शल्य को अपनी कथा आगे सुनाता है। देवता ब्रह्मा से रुद्र के नए रथ का सारथि बनने की प्रार्थना करते हैं और वे मान जाते हैं। ब्रह्मा के चढ़ने पर दोनों महान् देवों के भार से वेदरूपी घोड़े घुटनों के बल गिर पड़ते हैं और फिर उठ खड़े होते हैं, और रुद्र दानवों के तीनों नगरों की ओर चल पड़ते हैं। नगरों के एक हो जाने पर एक ही बाण से त्रिपुर भस्म हो जाता है, और रुद्र अपने ही क्रोध की अग्नि को लोकों को जलाने से रोक देते हैं। अन्त में दुर्योधन शल्य से कहता है कि जैसे ब्रह्मा रुद्र के सारथि बने थे, वैसे ही वे कर्ण के सारथि बनें।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (8.27.1)
तमब्रुवन्देवगणा यं भवान्सन्नियोक्ष्यते । स भविष्यति देवेश सारथिस्ते न संशयः ॥
tamabruvandevagaṇā yaṃ bhavānsanniyokṣyate | sa bhaviṣyati deveśa sārathiste na saṃśayaḥ
देवगणों ने उनसे कहा, "हे देवेश, आप जिसे नियुक्त करेंगे, वही आपका सारथि होगा, इसमें सन्देह नहीं।"
श्लोक 2 (8.27.2)
तानब्रवीन्महादेवो मत्तः श्रेष्ठतरो हि यः । तं सारथिं कुरुध्वं वै स्वयं सञ्चिन्त्य मा चिरम् ॥
tānabravīnmahādevo mattaḥ śreṣṭhataro hi yaḥ | taṃ sārathiṃ kurudhvaṃ vai svayaṃ sañcintya mā ciram
महादेव ने उनसे कहा, "जो मुझसे श्रेष्ठ हो, उसी को मेरा सारथि बनाओ; स्वयं विचारकर शीघ्र निश्चय करो, देर मत करो।"
श्लोक 3 (8.27.3)
एतच्छ्रुत्वा वचो देवाः सर्वे गत्वा पितामहम् । प्रणिपत्योचुरेकाग्राः प्रसाद्यैनं महर्षिभिः ॥
etacchrutvā vaco devāḥ sarve gatvā pitāmaham | praṇipatyocurekāgrāḥ prasādyainaṃ maharṣibhiḥ
यह सुनकर सब देवता पितामह के पास गए और प्रणाम करके एकाग्र मन से महर्षियों के साथ उन्हें प्रसन्न करते हुए बोले—
देवा ऊचुः
श्लोक 4 (8.27.4)
त्वया यत्कथितं देव त्रिदशारिनिबर्हणे । तथा तत्कृतमस्माभिः प्रसन्नश्च वृषध्वजः ॥
tvayā yatkathitaṃ deva tridaśārinibarhaṇe | tathā tatkṛtamasmābhiḥ prasannaśca vṛṣadhvajaḥ
"हे देव, देवशत्रुओं के संहार के लिए आपने जैसा कहा था, हमने वैसा ही किया, और वृषभध्वज प्रसन्न हैं।"
श्लोक 5 (8.27.5)
रथश्च विहितोऽस्माभिर्विचित्रायुधसंवृतः । सारथिं च न जानीमः कः स्यात्तस्मिन्रथोत्तमे ॥
rathaśca vihito'smābhirvicitrāyudhasaṃvṛtaḥ | sārathiṃ ca na jānīmaḥ kaḥ syāttasminrathottame
"हमने विचित्र आयुधों से सज्जित रथ बना दिया है, पर उस श्रेष्ठ रथ का सारथि कौन हो, यह हम नहीं जानते।"
श्लोक 6 (8.27.6)
तस्माद्विधीयतां कश्चित्सारथिर्देवसत्तम । सफलां तां गिरं देव कर्तुमर्हसि नो विभो । एवमस्मासु हि पुरा भगवन्नुक्तवानसि ॥
tasmādvidhīyatāṃ kaścitsārathirdevasattama | saphalāṃ tāṃ giraṃ deva kartumarhasi no vibho | evamasmāsu hi purā bhagavannuktavānasi
"इसलिए हे देवश्रेष्ठ, कोई सारथि नियुक्त कीजिए। हे विभो, आप अपने वचन को सफल करें; क्योंकि हे भगवन्, आपने पहले हमसे ऐसा ही कहा था।"
श्लोक 7 (8.27.7)
सदैव युक्तो रथसत्तमो वै । दुराधर्षो द्रावणः शात्रवाणाम् । पिनाकधन्वा विहितोऽत्र योद्धा । विभीषयन्दानवानुद्यतोऽसौ ॥
sadaiva yukto rathasattamo vai | durādharṣo drāvaṇaḥ śātravāṇām | pinākadhanvā vihito'tra yoddhā | vibhīṣayandānavānudyato'sau
"यह श्रेष्ठ रथ सदा सज्ज है, दुर्धर्ष है और शत्रुओं को भगाने वाला है; इसमें पिनाकधारी योद्धा के रूप में स्थित हैं, जो दानवों को भयभीत करने के लिए उद्यत हैं।"
श्लोक 8 (8.27.8)
तथैव वेदाश्च हया रथाग्र्य । धरा सशैला च रथो महात्मनः । नक्षत्रवंशानुगतो वरूथी । यस्मिन्योद्धा सारथिनाऽभिरक्ष्यः ॥
tathaiva vedāśca hayā rathāgrya | dharā saśailā ca ratho mahātmanaḥ | nakṣatravaṃśānugato varūthī | yasminyoddhā sārathinā'bhirakṣyaḥ
"इसी प्रकार वेद श्रेष्ठ घोड़े हैं, और पर्वतों सहित पृथ्वी उन महात्मा का रथ है; नक्षत्र-परम्परा उसका आवरण है, और उसमें बैठे योद्धा की रक्षा सारथि को करनी है।"
श्लोक 9 (8.27.9)
तत्र सारथिरेष्टव्यः सर्वैरेतैर्विशेषवान् ॥
tatra sārathireṣṭavyaḥ sarvairetairviśeṣavān
"उसमें इन सबसे बढ़कर विशेष गुणों वाला सारथि चाहिए।"
श्लोक 10 (8.27.10)
तं प्रविष्टा रथं देवा रथयोद्धारमेव च । कवचानि च शस्त्राणि कार्मुकं च पितामह ॥
taṃ praviṣṭā rathaṃ devā rathayoddhārameva ca | kavacāni ca śastrāṇi kārmukaṃ ca pitāmaha
"हम देवता उस रथ में प्रविष्ट हो गए हैं, और रथ के योद्धा में भी; कवच, शस्त्र और धनुष में भी, हे पितामह।"
श्लोक 11 (8.27.11)
त्वामृते सारथिं तत्र नान्यं पश्यामहे वयम् । त्वं हि सर्वैर्गणैर्युक्तोदेवताभ्योऽधिकः प्रभो ॥
tvāmṛte sārathiṃ tatra nānyaṃ paśyāmahe vayam | tvaṃ hi sarvairgaṇairyuktodevatābhyo'dhikaḥ prabho
"उसके लिए हम आपके सिवा और किसी को सारथि नहीं देखते; क्योंकि हे प्रभो, आप सब गणों से युक्त हैं और देवताओं से भी बढ़कर हैं।"
श्लोक 12 (8.27.12)
त्वं देव शक्तो लोकेश नियन्तुं प्रद्रुतानिमान् । वेदांश्च सोपनिषदः सारथिर्भव नः स्वयम् ॥
tvaṃ deva śakto lokeśa niyantuṃ pradrutānimān | vedāṃśca sopaniṣadaḥ sārathirbhava naḥ svayam
"हे देव, हे लोकेश, आप इन भागते हुए वेदों और उपनिषदों को नियन्त्रित करने में समर्थ हैं। आप स्वयं हमारे सारथि बनिए।"
श्लोक 13 (8.27.13)
योद्धुं बलेन वीर्येण सत्वेन विनयेन च । अधिकःसारथिःकार्यो नास्ति चान्योऽधिको भवात् ॥
yoddhuṃ balena vīryeṇa satvena vinayena ca | adhikaḥsārathiḥkāryo nāsti cānyo'dhiko bhavāt
"युद्ध में बल, वीर्य, सत्त्व और विनय में बढ़कर सारथि रखना चाहिए; और भव से बढ़कर कोई दूसरा है नहीं।"
श्लोक 14 (8.27.14)
स भवांस्तारयत्वस्मान्कुरु सारथ्यमव्यय । भवानभ्यधिकस्त्वत्तो नान्योस्ति भविता त्विह ॥
sa bhavāṃstārayatvasmānkuru sārathyamavyaya | bhavānabhyadhikastvatto nānyosti bhavitā tviha
"इसलिए हे अव्यय, हमें तारिए और सारथ्य कीजिए। आप सर्वश्रेष्ठ हैं; आपसे बढ़कर यहाँ कोई दूसरा न है, न होगा।"
श्लोक 15 (8.27.15)
त्वं हि देवेश सर्वैस्तु विशिष्टो वदतां वर । तं रथं त्वं समारुह्य संयच्छ परमान्हयान् ॥
tvaṃ hi deveśa sarvaistu viśiṣṭo vadatāṃ vara | taṃ rathaṃ tvaṃ samāruhya saṃyaccha paramānhayān
"क्योंकि हे देवेश, हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, आप सबसे विशिष्ट हैं। उस रथ पर चढ़कर इन श्रेष्ठ घोड़ों को सँभालिए।"
श्लोक 16 (8.27.16)
तव प्रसादाद्वध्येयुर्देव दैवतकण्टकाः । स नो रक्ष महाबाहो दैत्येभ्यो महतो भयात् ॥
tava prasādādvadhyeyurdeva daivatakaṇṭakāḥ | sa no rakṣa mahābāho daityebhyo mahato bhayāt
"हे देव, आपकी कृपा से देवताओं के काँटे मारे जा सकें। हे महाबाहो, दैत्यों के महान् भय से हमारी रक्षा कीजिए।"
श्लोक 17 (8.27.17)
त्वं हि नो गतिरव्यग्र त्वं नो गोप्ता महाव्रत । त्वत्प्रसादात्सुराः सर्वे पूज्यन्ते त्रिदिवे प्रभो ॥
tvaṃ hi no gatiravyagra tvaṃ no goptā mahāvrata | tvatprasādātsurāḥ sarve pūjyante tridive prabho
"क्योंकि हे अविचल, आप हमारी गति हैं और हे महाव्रत, आप हमारे रक्षक हैं; हे प्रभो, आपकी कृपा से ही सब देवता स्वर्ग में पूजित होते हैं।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 18 (8.27.18)
इति ते शिरसाऽगच्छंस्त्रिलोकेशं पितामहम् । देवाः प्रसादयामासुः सारथ्यायेति नः श्रुतम् ॥
iti te śirasā'gacchaṃstrilokeśaṃ pitāmaham | devāḥ prasādayāmāsuḥ sārathyāyeti naḥ śrutam
इस प्रकार सिर झुकाकर देवता त्रिलोकेश पितामह के पास गए और उन्हें सारथि बनने के लिए मनाया—ऐसा हमने सुना है।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 19 (8.27.19)
एवमेतत्सुरास्तथ्यं नान्यस्त्वभ्यधिको भवात् । सारथित्वं करिष्यामि शङ्करस्य महात्मनः ॥
evametatsurāstathyaṃ nānyastvabhyadhiko bhavāt | sārathitvaṃ kariṣyāmi śaṅkarasya mahātmanaḥ
"हे देवताओ, यह ऐसा ही है और सत्य है; भव से बढ़कर कोई दूसरा नहीं है। मैं महात्मा शङ्कर का सारथि बनूँगा।"
श्लोक 20 (8.27.20)
सर्वथा रथिनः श्रेयान्कर्तव्यो रथसारथिः । तस्मादेतद्यथातत्त्वं ज्ञात्वा युष्मांश्च सङ्गतान् । संयच्छामि हयानेष विबुधाय कपर्दिने ॥
sarvathā rathinaḥ śreyānkartavyo rathasārathiḥ | tasmādetadyathātattvaṃ jñātvā yuṣmāṃśca saṅgatān | saṃyacchāmi hayāneṣa vibudhāya kapardine
"रथी के लिए सब प्रकार से उससे श्रेष्ठ सारथि रखना उचित है। इसलिए इसे यथार्थ रूप में जानकर और आप सबको एकत्र देखकर मैं ज्ञानी, जटाधारी देव के घोड़ों को सँभालूँगा।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 21 (8.27.21)
एवमुक्त्वा जटाभारं संयम्य प्रपितामहः । परिधायाजिनं गाढं सन्न्यस्य च कमण्डलुम् । प्रतोदपाणिर्भगवानारुरोह रथं तदा ॥
evamuktvā jaṭābhāraṃ saṃyamya prapitāmahaḥ | paridhāyājinaṃ gāḍhaṃ sannyasya ca kamaṇḍalum | pratodapāṇirbhagavānāruroha rathaṃ tadā
ऐसा कहकर प्रपितामह ने जटाभार को बाँधा, मृगचर्म कसकर लपेटा, कमण्डलु रख दिया और हाथ में चाबुक लिए भगवान् उस समय रथ पर चढ़ गए।
श्लोक 22 (8.27.22)
सारथौ कल्पिते देवैरीशानस्य महात्मनः । तस्मिन्नारोहति रथं कल्पितं लोकसम्भृतम् । शिरोभिः पतिता भूमौ तुरगा वेदसम्भृताः ॥
sārathau kalpite devairīśānasya mahātmanaḥ | tasminnārohati rathaṃ kalpitaṃ lokasambhṛtam | śirobhiḥ patitā bhūmau turagā vedasambhṛtāḥ
जब देवताओं ने महात्मा ईशान के सारथि को नियुक्त कर दिया और वे लोकों को धारण करने के लिए बने उस रथ पर चढ़ने लगे, तब वेदमय घोड़े सिर के बल भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 23 (8.27.23)
उभाभ्यां लोकनाथाभ्यामास्थितं रथसत्तमम् । ओढुं न शक्ता वेदाश्वा जानुभ्यामपतन्महीम् ॥
ubhābhyāṃ lokanāthābhyāmāsthitaṃ rathasattamam | oḍhuṃ na śaktā vedāśvā jānubhyāmapatanmahīm
दोनों लोकनाथों द्वारा अधिष्ठित उस श्रेष्ठ रथ को वेदमय घोड़े वहन न कर सके; वे घुटनों के बल धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 24 (8.27.24)
अभीशुभिस्तु भगवानुद्यम्य च हयान्विभुः । अस्तु वीर्यं च शौर्यं च वेदाश्वानामिति प्रभुः । रथं सञ्चोदयामास देवानां प्रभुरव्ययः ॥
abhīśubhistu bhagavānudyamya ca hayānvibhuḥ | astu vīryaṃ ca śauryaṃ ca vedāśvānāmiti prabhuḥ | rathaṃ sañcodayāmāsa devānāṃ prabhuravyayaḥ
भगवान् विभु ने लगामों से घोड़ों को उठाकर कहा, "वेदमय घोड़ों में बल और शौर्य हो," और देवों के अविनाशी प्रभु ने रथ को आगे हाँक दिया।
श्लोक 25 (8.27.25)
ततोऽधिरूढे वरदे रथं पशुपतिस्तदा । साधुसाध्विति देवेशं स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥
tato'dhirūḍhe varade rathaṃ paśupatistadā | sādhusādhviti deveśaṃ smayamāno'bhyabhāṣata
तब वरद ब्रह्मा के रथ पर चढ़ जाने पर पशुपति ने मुस्कराते हुए देवेश से कहा, "साधु, साधु!"
महादेव उवाच
श्लोक 26 (8.27.26)
याहि देव यतो दैत्याश्चोदयाश्वानरिन्दम । पश्य बाह्वोर्बलं मेऽद्य निघ्नतः शात्रवान्रणे ॥
yāhi deva yato daityāścodayāśvānarindama | paśya bāhvorbalaṃ me'dya nighnataḥ śātravānraṇe
"हे देव, जहाँ दैत्य हैं वहाँ चलो; हे शत्रुदमन, घोड़ों को हाँको। आज देखो, मेरी भुजाओं का बल, जब मैं रण में शत्रुओं को मारूँगा।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 27 (8.27.27)
ततोऽश्वांश्चोदयामास मनोमारुतरंहसः । पुराण्युद्दिश्य खस्थानि दानवानां तरस्विनाम् ॥
tato'śvāṃścodayāmāsa manomārutaraṃhasaḥ | purāṇyuddiśya khasthāni dānavānāṃ tarasvinām
तब उन्होंने मन और वायु के समान वेग वाले घोड़ों को आकाश में स्थित तेजस्वी दानवों के नगरों की ओर हाँका।
श्लोक 28 (8.27.28)
ततस्ते सहसोत्पत्य वेदाख्या रथवाजिनः । क्षणेन तेन दैत्यानां पुराणि प्रापयन्हरम् ॥
tataste sahasotpatya vedākhyā rathavājinaḥ | kṣaṇena tena daityānāṃ purāṇi prāpayanharam
तब वेद नाम के वे रथ के घोड़े सहसा उछलकर पल भर में हर को दैत्यों के नगरों तक ले आए।
श्लोक 29 (8.27.29)
अथर्वाङ्गिरसौ चास्तां चक्ररक्षौ महात्मनः । अथाधिज्यं धनुः कृत्वा शर्वः सन्धाय तं शरम् । युक्त्वा पाशुपतास्त्रेण त्रिपुरं समचिन्तयत् ॥
atharvāṅgirasau cāstāṃ cakrarakṣau mahātmanaḥ | athādhijyaṃ dhanuḥ kṛtvā śarvaḥ sandhāya taṃ śaram | yuktvā pāśupatāstreṇa tripuraṃ samacintayat
अथर्वा और अङ्गिरा उन महात्मा के चक्ररक्षक थे। तब शर्व ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उस बाण को सन्धान किया, उसे पाशुपत अस्त्र से युक्त किया और त्रिपुर का चिन्तन किया।
श्लोक 30 (8.27.30)
तस्मिन्स्थिते ततो राजन्रुद्रे सज्जितकार्मुके । पुराणि तेन कालेन जग्मुरेकत्वमाशु वै ॥
tasminsthite tato rājanrudre sajjitakārmuke | purāṇi tena kālena jagmurekatvamāśu vai
हे राजन्, जब रुद्र धनुष सज्जित किए इस प्रकार खड़े थे, उसी समय वे नगर शीघ्र ही एक हो गए।
श्लोक 31 (8.27.31)
एकीभावं गते चैव त्रिपुरत्वमुपागते । बभूव तुमुलो हर्षो देवतानां महात्मनाम् ॥
ekībhāvaṃ gate caiva tripuratvamupāgate | babhūva tumulo harṣo devatānāṃ mahātmanām
जब वे एक हो गए और एक ही त्रिपुर बन गया, तब महात्मा देवताओं में हर्ष का भारी कोलाहल उठा।
श्लोक 32 (8.27.32)
ततो देवगणाः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः । जयेति वाचो मुमुचुः संस्तुवन्तो महेश्वरम् ॥
tato devagaṇāḥ sarve siddhāśca paramarṣayaḥ | jayeti vāco mumucuḥ saṃstuvanto maheśvaram
तब सब देवगण, सिद्ध और महर्षि महेश्वर की स्तुति करते हुए "जय!" की ध्वनि करने लगे।
श्लोक 33 (8.27.33)
ततोऽग्रतः प्रादुरभूत्त्रिपुरं जघ्नुषोऽसुरान् । अनिर्देश्याग्र्यवपुषो देवस्यासह्यतेजसः ॥
tato'grataḥ prādurabhūttripuraṃ jaghnuṣo'surān | anirdeśyāgryavapuṣo devasyāsahyatejasaḥ
तब असुरों का संहार करते हुए उन देव के सामने, जिनका तेज असह्य था और जिनका श्रेष्ठ रूप वर्णन से परे था, त्रिपुर प्रकट हुआ।
श्लोक 34 (8.27.34)
त्रीणि दृष्ट्वैव संस्थानि पुराण्यथ पिनाकधृत् । स तद्विकृष्य भगवान्दिव्यं लोकेश्वरो धनुः । त्रैलोक्यसारं तमिषुं मुमोच त्रिपुरं प्रति ॥
trīṇi dṛṣṭvaiva saṃsthāni purāṇyatha pinākadhṛt | sa tadvikṛṣya bhagavāndivyaṃ lokeśvaro dhanuḥ | trailokyasāraṃ tamiṣuṃ mumoca tripuraṃ prati
तीनों नगरों को एक रूप में स्थित देखकर पिनाकधारी भगवान् लोकेश्वर ने उस दिव्य धनुष को खींचा और त्रिलोक के सार रूप उस बाण को त्रिपुर पर छोड़ दिया।
श्लोक 35 (8.27.35)
एकबाणेन तं देवस्त्रिपुरं परमेश्वरः । निजघ्ने सासुरगणं देवदेवो महेश्वरः ॥
ekabāṇena taṃ devastripuraṃ parameśvaraḥ | nijaghne sāsuragaṇaṃ devadevo maheśvaraḥ
एक ही बाण से परमेश्वर देवदेव महेश्वर ने असुरगण सहित उस त्रिपुर को मार गिराया।
श्लोक 36 (8.27.36)
बाणतेजोग्निदग्धं तद्विप्रकीर्णं सहस्रधा । महदार्तस्वरं कृत्वा नावशेषमुपागतम् । मद्रेश सासुरगणं प्रापतत्पश्चिमार्णवे ॥
bāṇatejognidagdhaṃ tadviprakīrṇaṃ sahasradhā | mahadārtasvaraṃ kṛtvā nāvaśeṣamupāgatam | madreśa sāsuragaṇaṃ prāpatatpaścimārṇave
बाण के तेज की अग्नि से जला हुआ वह सहस्र टुकड़ों में बिखर गया; बड़ी आर्त पुकार करके वह कुछ भी शेष नहीं रहा, और हे मद्रेश, असुरगण सहित पश्चिमी सागर में जा गिरा।
श्लोक 37 (8.27.37)
एवं हि त्रिपुरं दग्धं दानवाश्चाप्यशेषतः । महेश्वरेण क्रुद्धेन त्रैलोक्यस्य हितैषिणा ॥
evaṃ hi tripuraṃ dagdhaṃ dānavāścāpyaśeṣataḥ | maheśvareṇa kruddhena trailokyasya hitaiṣiṇā
इस प्रकार तीनों लोकों का हित चाहने वाले क्रुद्ध महेश्वर ने त्रिपुर को और दानवों को भी बिना शेष छोड़े जला डाला।
श्लोक 38 (8.27.38)
स चात्मक्रोधजो वह्निर्दहेत्युक्तो निवारितः । त्रैलोक्यमविशेषेण पुनर्दग्धुं प्रचक्रमे ॥
sa cātmakrodhajo vahnirdahetyukto nivāritaḥ | trailokyamaviśeṣeṇa punardagdhuṃ pracakrame
अपने ही क्रोध से उत्पन्न वह अग्नि, जिसे "जला" कहा गया था और फिर रोक दिया गया था, तीनों लोकों को बिना भेद के फिर जलाने लगी।
श्लोक 39 (8.27.39)
कालाग्निमिव निर्दग्धुमुत्थितं तं पुनः पुनः । माकार्षीर्भस्मसाल्लोकानिति त्र्यक्षोऽब्रवीद्वचः ॥
kālāgnimiva nirdagdhumutthitaṃ taṃ punaḥ punaḥ | mākārṣīrbhasmasāllokāniti tryakṣo'bravīdvacaḥ
प्रलयाग्नि के समान सब कुछ भस्म करने के लिए जब वह बार-बार उठी, तब त्र्यम्बक ने कहा, "लोकों को भस्म मत करो!"
श्लोक 40 (8.27.40)
ततः प्रकृतिमापन्ना देवा लोकास्तथर्षयः । तुष्टुवुर्वाग्भिरग्र्याभिः स्थाणुं त्रिपुरवैरिणम् ॥
tataḥ prakṛtimāpannā devā lokāstatharṣayaḥ | tuṣṭuvurvāgbhiragryābhiḥ sthāṇuṃ tripuravairiṇam
तब देवता, लोक और ऋषि अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त होकर उत्तम वाणियों से त्रिपुरारि स्थाणु की स्तुति करने लगे।
श्लोक 41 (8.27.41)
तेऽनुज्ञाता भगवता सर्वे जग्मुर्यथागतम् । कृतकामाः प्रसन्नेन प्रजापतिमुखाः सुराः ॥
te'nujñātā bhagavatā sarve jagmuryathāgatam | kṛtakāmāḥ prasannena prajāpatimukhāḥ surāḥ
भगवान् की अनुमति पाकर प्रजापति को आगे करके सब देवता कृतकाम होकर, उनके प्रसन्न रहते, जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।
श्लोक 42 (8.27.42)
एवं रुद्रस्य कृतवान्सारथ्यं तु पितामहः । संयच्छ तुरगानस्य राधेयस्य महात्मनः ॥
evaṃ rudrasya kṛtavānsārathyaṃ tu pitāmahaḥ | saṃyaccha turagānasya rādheyasya mahātmanaḥ
इस प्रकार पितामह ने रुद्र का सारथ्य किया था। उसी तरह तुम इन महात्मा राधेय के घोड़ों को सँभालो।
श्लोक 43 (8.27.43)
त्वं हि कृष्णाच्च कर्णाच्च फल्गुनाच्च गुणाधिकः । बलतो रूपतो योगादस्त्रसम्पद एव च ॥
tvaṃ hi kṛṣṇācca karṇācca phalgunācca guṇādhikaḥ | balato rūpato yogādastrasampada eva ca
क्योंकि तुम कृष्ण, कर्ण और अर्जुन से भी गुणों में बढ़कर हो—बल में, रूप में, कौशल में और अस्त्रों की सम्पदा में।
श्लोक 44 (8.27.44)
समासक्तं महीपाल कुरु मे हितमीप्सितम् । युद्धे ह्ययं रुद्रकल्पस्त्वं च ब्रह्मसमोऽनघ । तस्माच्छक्तौ युवां जेतुं मच्छत्रून्दिवि वा सुरान् ॥
samāsaktaṃ mahīpāla kuru me hitamīpsitam | yuddhe hyayaṃ rudrakalpastvaṃ ca brahmasamo'nagha | tasmācchaktau yuvāṃ jetuṃ macchatrūndivi vā surān
हे महीपाल, मेरा सब कुछ इसी पर निर्भर है; मेरा इच्छित हित करो। युद्ध में यह रुद्र के समान है और हे अनघ, तुम ब्रह्मा के समान हो। इसलिए तुम दोनों मेरे शत्रुओं को जीतने में समर्थ हो, चाहे वे स्वर्ग में देवता ही क्यों न हों।
श्लोक 45 (8.27.45)
स यथा शल्य कर्णोऽयं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् । प्रमथ्य हन्यात्कौन्तेयं तथा नीतिर्विधीयताम् ॥
sa yathā śalya karṇo'yaṃ śvetāśvaṃ kṛṣṇasārathim | pramathya hanyātkaunteyaṃ tathā nītirvidhīyatām
इसलिए हे शल्य, ऐसी नीति बनाओ जिससे यह कर्ण श्वेत अश्वों वाले, कृष्ण-सारथि कुन्तीपुत्र को कुचलकर मार डाले।
श्लोक 46 (8.27.46)
त्वयि राज्यं सुखं चैव जीवितं जयमेव च । समासक्तं महीपाल कुरु मे हितमीप्सितम् ॥
tvayi rājyaṃ sukhaṃ caiva jīvitaṃ jayameva ca | samāsaktaṃ mahīpāla kuru me hitamīpsitam
तुम्हीं पर मेरा राज्य, मेरा सुख, मेरा जीवन और मेरी विजय टिकी है। हे महीपाल, यह सब इसी पर निर्भर है; मेरा इच्छित हित करो।
श्लोक 47 (8.27.47)
संयच्छास्य हयान्राजन्मत्प्रियार्थं परन्तप ॥
saṃyacchāsya hayānrājanmatpriyārthaṃ parantapa
हे राजन्, इसके घोड़ों को सँभालो; हे परन्तप, मेरे प्रिय के लिए ऐसा करो।