कर्ण पर्व · अध्याय 28
परशुराम को शिव से अस्त्रों की प्राप्ति
दुर्योधन शल्य को एक ब्राह्मण से सुनी हुई दूसरी कथा सुनाता है। जमदग्नि के पुत्र राम ने तप से शिव को प्रसन्न किया और शिव ने वचन दिया कि शुद्ध होने पर वे उन्हें अस्त्र देंगे। जब दैत्य देवताओं को सताने लगे, तब शिव ने राम को उनके विरुद्ध भेजा; राम ने उन्हें जीता, शिव के स्पर्श से घाव-रहित हुए और उन्हें दिव्य अस्त्र मिले। दुर्योधन आगे कहता है कि राम ने सारी धनुर्विद्या कर्ण को दी, और तर्क देता है कि ऐसा पुरुष सूत का पुत्र नहीं हो सकता।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (8.28.1)
इमं चाप्यपरं भूय इतिहासं निबोध मे । पितुर्मम सकाशे वै ब्राह्मणः प्राह धर्मवित् ॥
imaṃ cāpyaparaṃ bhūya itihāsaṃ nibodha me | piturmama sakāśe vai brāhmaṇaḥ prāha dharmavit
अब मुझसे एक और इतिहास सुनो, जिसे धर्म के ज्ञाता एक ब्राह्मण ने मेरे पिता के समीप कहा था।
श्लोक 2 (8.28.2)
श्रुत्वा चैतद्वचश्चित्रं हेतुकार्यार्थतत्त्ववित् । कुरु शल्य विनिश्चित्य मा भूदत्र विचारणा ॥
śrutvā caitadvacaścitraṃ hetukāryārthatattvavit | kuru śalya viniścitya mā bhūdatra vicāraṇā
हेतु, कार्य और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले तुम इस विचित्र वचन को सुनकर, हे शल्य, निश्चय करो; इसमें अब कोई विचार-विमर्श न रहे।
श्लोक 3 (8.28.3)
भार्गवाणां कुले जातो जमदग्निर्महातपाः । तस्य रामेति विख्यातः पुत्रस्तेजोगुणान्वितः ॥
bhārgavāṇāṃ kule jāto jamadagnirmahātapāḥ | tasya rāmeti vikhyātaḥ putrastejoguṇānvitaḥ
भार्गवों के कुल में महातपस्वी जमदग्नि उत्पन्न हुए; उनके पुत्र राम नाम से प्रसिद्ध थे, जो तेज और गुणों से सम्पन्न थे।
श्लोक 4 (8.28.4)
स तीव्रं तप आस्थाय सम्प्रसादितवान्भवम् । अस्त्रहेतोः प्रसन्नात्मा नियतः संयतेन्द्रियः ॥
sa tīvraṃ tapa āsthāya samprasāditavānbhavam | astrahetoḥ prasannātmā niyataḥ saṃyatendriyaḥ
शान्त चित्त, नियम में स्थित और इन्द्रियों को वश में रखकर उसने कठोर तप का आश्रय लिया और अस्त्रों के लिए भव को प्रसन्न किया।
श्लोक 5 (8.28.5)
तस्मै तुष्टो महादेवो भक्त्या च प्रशमेन च । हृद्गतं चास्य विज्ञाय दर्शयामास शङ्करः । प्रत्यक्षेण महादेवः स्वां तनुं सर्वशङ्करः ॥
tasmai tuṣṭo mahādevo bhaktyā ca praśamena ca | hṛdgataṃ cāsya vijñāya darśayāmāsa śaṅkaraḥ | pratyakṣeṇa mahādevaḥ svāṃ tanuṃ sarvaśaṅkaraḥ
उसकी भक्ति और शान्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उसके मन की बात जानकर सर्वकल्याणकारी शङ्कर के रूप में प्रत्यक्ष अपना स्वरूप उसे दिखाया।
शङ्कर उवाच
श्लोक 6 (8.28.6)
राम तुष्टोऽस्मि भद्रं ते विदितं तव चेप्सितम् । कुरुष्व पूतमात्मानं सर्वमेतदवाप्स्यसि ॥
rāma tuṣṭo'smi bhadraṃ te viditaṃ tava cepsitam | kuruṣva pūtamātmānaṃ sarvametadavāpsyasi
"राम, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारी इच्छा मुझे ज्ञात है। अपने को पवित्र करो, तब यह सब प्राप्त कर लोगे।"
श्लोक 7 (8.28.7)
दास्यामि ते तदाऽस्त्राणि यदा पूतो भविष्यसि । अपात्रमसमर्थं च दहन्त्यस्त्राणि भार्गव ॥
dāsyāmi te tadā'strāṇi yadā pūto bhaviṣyasi | apātramasamarthaṃ ca dahantyastrāṇi bhārgava
"जब तुम शुद्ध हो जाओगे तब मैं तुम्हें अस्त्र दूँगा; क्योंकि हे भार्गव, अयोग्य और असमर्थ को अस्त्र जला डालते हैं।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 8 (8.28.8)
इत्युक्तो जामदग्न्यस्तु देवदेवेन शूलिना । प्रत्युवाच महात्मानं शिरसाऽवनतः प्रभुम् ॥
ityukto jāmadagnyastu devadevena śūlinā | pratyuvāca mahātmānaṃ śirasā'vanataḥ prabhum
देवदेव शूलपाणि के ऐसा कहने पर जमदग्नि के पुत्र ने सिर झुकाकर उन महात्मा प्रभु को उत्तर दिया।
परशुराम उवाच
श्लोक 9 (8.28.9)
यदा जानासि देवेश पात्रं मामस्त्रधारणे । तदा शुश्रूषतेऽस्त्राणि भवान्मे दातुमर्हति ॥
yadā jānāsi deveśa pātraṃ māmastradhāraṇe | tadā śuśrūṣate'strāṇi bhavānme dātumarhati
"हे देवेश, जब आप मुझे अस्त्र धारण करने के योग्य पात्र जान लें, तब आप मुझ सेवक को अस्त्र दें, यही उचित है।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 10 (8.28.10)
ततः स तपसा चैव व्रतेन नियमेन च । पूजोपहारबलिभिर्होममन्त्रपुरस्कृतैः ॥
tataḥ sa tapasā caiva vratena niyamena ca | pūjopahārabalibhirhomamantrapuraskṛtaiḥ
तब उसने तप, व्रत और नियम से, पूजा, उपहार, बलि, होम और मन्त्रों के साथ—
श्लोक 11 (8.28.11)
समाराधितवाञ्शर्वं बहुवर्षगणांस्तदा । प्रसन्नश्च महादेवो भार्गवस्य महात्मनः ॥
samārādhitavāñśarvaṃ bahuvarṣagaṇāṃstadā | prasannaśca mahādevo bhārgavasya mahātmanaḥ
बहुत वर्षों तक शर्व की आराधना की; और महादेव उन महात्मा भार्गव पर प्रसन्न हो गए।
श्लोक 12 (8.28.12)
असकृच्चाब्रवीत्तस्य गुणान्देव्याः सकाशतः । भक्तिमानेष सततं मयि रामो दृढव्रतः ॥
asakṛccābravīttasya guṇāndevyāḥ sakāśataḥ | bhaktimāneṣa satataṃ mayi rāmo dṛḍhavrataḥ
देवी के समीप वे बार-बार उसके गुणों का बखान करते थे: "यह राम सदा मेरा भक्त है और दृढ़ व्रत वाला है।"
श्लोक 13 (8.28.13)
एवमस्य गुणान्प्रीतो बहुशोऽकथयद्विभुः । देवतानां पितॄणां च समक्षमरिसूदन ॥
evamasya guṇānprīto bahuśo'kathayadvibhuḥ | devatānāṃ pitṝṇāṃ ca samakṣamarisūdana
इस प्रकार प्रसन्न होकर प्रभु ने देवताओं और पितरों के सामने भी उसके गुण अनेक बार कहे, हे शत्रुसूदन।
श्लोक 14 (8.28.14)
एतस्मिन्नेव काले तु दैत्या ह्यासन्महाबलाः । तैस्तदा दर्पमोहाद्वै अबाध्यन्त दिवौकसः ॥
etasminneva kāle tu daityā hyāsanmahābalāḥ | taistadā darpamohādvai abādhyanta divaukasaḥ
उसी समय महाबली दैत्य थे, और उन्होंने दर्प और मोह में आकर स्वर्गवासियों को सताया।
श्लोक 15 (8.28.15)
ततः सम्भूय विबुधास्तान्हन्तुं कृतनिश्चयाः । चक्रुः शत्रुवधे यत्नं दैत्याञ्जेतुमशक्नुवन् ॥
tataḥ sambhūya vibudhāstānhantuṃ kṛtaniścayāḥ | cakruḥ śatruvadhe yatnaṃ daityāñjetumaśaknuvan
तब देवता एकत्र होकर उन्हें मारने का निश्चय करके शत्रुओं के वध का प्रयत्न करने लगे, पर दैत्यों को जीत न सके।
श्लोक 16 (8.28.16)
अभिगम्य ततो देवा महेश्वरमुमापतिम् । प्रसादयंस्तदा भक्त्या जहि शत्रुगणानिति ॥
abhigamya tato devā maheśvaramumāpatim | prasādayaṃstadā bhaktyā jahi śatrugaṇāniti
तब देवताओं ने उमापति महेश्वर के पास जाकर भक्ति से उन्हें प्रसन्न किया और कहा, "शत्रुओं के समूह को मार डालिए!"
श्लोक 17 (8.28.17)
प्रतिज्ञाय ततो देवो देवतानां रिपुक्षयम् । रामं भार्गवमाहूय सोऽभ्यभाषत शङ्करः ॥
pratijñāya tato devo devatānāṃ ripukṣayam | rāmaṃ bhārgavamāhūya so'bhyabhāṣata śaṅkaraḥ
देवताओं के शत्रुओं के नाश की प्रतिज्ञा करके देव शङ्कर ने भार्गव राम को बुलाकर उससे कहा—
शङ्कर उवाच
श्लोक 18 (8.28.18)
रिपून्भार्गव देवानां जहि सर्वान्समागतान् । लोकानां हितकामार्थं मत्प्रियार्थं तथैव च ॥
ripūnbhārgava devānāṃ jahi sarvānsamāgatān | lokānāṃ hitakāmārthaṃ matpriyārthaṃ tathaiva ca
"भार्गव, एकत्र हुए देवताओं के सभी शत्रुओं को मार डालो—लोकों के हित के लिए और मेरे प्रिय के लिए भी।"
परशुराम उवाच
श्लोक 19 (8.28.19)
का शक्तिर्मम देवेश अकृतास्त्रस्य संयुगे । निहन्तुं दानवान्सर्वान्कृतास्त्रान्युद्धदुर्मदान् ॥
kā śaktirmama deveśa akṛtāstrasya saṃyuge | nihantuṃ dānavānsarvānkṛtāstrānyuddhadurmadān
"हे देवेश, मैं अस्त्र-विद्या में अकृतार्थ हूँ; युद्ध में उन सब अस्त्रविद् और युद्ध-मद से उन्मत्त दानवों को मारने की मुझमें क्या शक्ति है?"
ईश्वर उवाच
श्लोक 20 (8.28.20)
गच्छ त्वं मदनुज्ञानान्निहनिष्यसि शात्रवान् । विजित्य च रिपून्सर्वान्गुणान्प्राप्स्यसि पुष्कलान् ॥
gaccha tvaṃ madanujñānānnihaniṣyasi śātravān | vijitya ca ripūnsarvānguṇānprāpsyasi puṣkalān
"जाओ; मेरी अनुमति से तुम शत्रुओं को मार डालोगे, और सब शत्रुओं को जीतकर प्रचुर गुण प्राप्त करोगे।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 21 (8.28.21)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं प्रतिगृह्य च सर्वशः । रामः कृतस्वस्त्ययनः प्रययौ दानवान्प्रति ॥
etacchrutvā tu vacanaṃ pratigṛhya ca sarvaśaḥ | rāmaḥ kṛtasvastyayanaḥ prayayau dānavānprati
ये वचन सुनकर और सब प्रकार से स्वीकार करके राम स्वस्तिवाचन कर दानवों की ओर चल पड़े।
श्लोक 22 (8.28.22)
ततोऽजयद्देवशत्रून्महादर्पबलान्वितान् । वज्राशनिसमस्पर्शैः प्रहारैरेव भार्गवः ॥
tato'jayaddevaśatrūnmahādarpabalānvitān | vajrāśanisamasparśaiḥ prahāraireva bhārgavaḥ
तब भार्गव ने वज्र और अशनि के समान स्पर्श वाले प्रहारों से अत्यन्त दर्प और बल वाले देवशत्रुओं को जीत लिया।
श्लोक 23 (8.28.23)
स दानवैः क्षततनुर्जामदग्न्यो नृपोत्तम । संस्पृष्टः स्थाणुना सद्यो निर्व्रणः समपद्यत ॥
sa dānavaiḥ kṣatatanurjāmadagnyo nṛpottama | saṃspṛṣṭaḥ sthāṇunā sadyo nirvraṇaḥ samapadyata
हे नृपोत्तम, दानवों से क्षत-विक्षत शरीर वाले जमदग्निपुत्र स्थाणु के स्पर्श मात्र से तुरन्त घावरहित हो गए।
श्लोक 24 (8.28.24)
प्रीतश्च भगवान्देवः कर्मणा तेन तस्य वै । वरान्प्रादाद्बहुविधान्भार्गवाय महात्मने ॥
prītaśca bhagavāndevaḥ karmaṇā tena tasya vai | varānprādādbahuvidhānbhārgavāya mahātmane
उस कर्म से प्रसन्न होकर भगवान् देव ने महात्मा भार्गव को अनेक प्रकार के वर दिए।
श्लोक 25 (8.28.25)
उक्तश्च प्रीतियुक्तेन देवदेवेन शूलिना ॥
uktaśca prītiyuktena devadevena śūlinā
और प्रीति से भरे देवदेव शूलपाणि ने उससे कहा—
ईश्वर उवाच
श्लोक 26 (8.28.26)
निपातात्तव शस्त्राणां शरीरे याऽभवद्रुजा । तया ते मानुषं कर्म व्यपोढं भृगुनन्दन । गृहाणास्त्राणि दिव्यानि मत्सकाशाद्यथेप्सितं ॥
nipātāttava śastrāṇāṃ śarīre yā'bhavadrujā | tayā te mānuṣaṃ karma vyapoḍhaṃ bhṛgunandana | gṛhāṇāstrāṇi divyāni matsakāśādyathepsitaṃ
"शस्त्रों के गिरने से तुम्हारे शरीर में जो पीड़ा हुई, उससे तुम्हारा मानुषी कर्म धुल गया, हे भृगुनन्दन। मुझसे यथेच्छ दिव्य अस्त्र ग्रहण करो।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 27 (8.28.27)
ततोऽस्त्राणि समग्राणि वरांश्च मनसेप्सितान् । लब्ध्वा बहुविधान्रामः प्रणम्यशिरसा शिवम् । अनुज्ञां प्राप्य देवेशाज्जगाम स महातपाः ॥
tato'strāṇi samagrāṇi varāṃśca manasepsitān | labdhvā bahuvidhānrāmaḥ praṇamyaśirasā śivam | anujñāṃ prāpya deveśājjagāma sa mahātapāḥ
तब राम सब अस्त्र और मनचाहे अनेक वर पाकर शिव को सिर झुकाकर प्रणाम करके, देवेश की आज्ञा लेकर, वे महातपस्वी चले गए।
श्लोक 28 (8.28.28)
एवमेतत्पुरावृत्तं तथा कथितवानृषिः ॥
evametatpurāvṛttaṃ tathā kathitavānṛṣiḥ
इस प्रकार ऋषि ने यह पुरानी कथा कही।
श्लोक 29 (8.28.29)
भार्गवोऽपि ददौ सर्वं धनुर्वेदं महात्मने । कर्णाय पुरुषव्याघ्रः सुप्रीतेनान्तरात्मना ॥
bhārgavo'pi dadau sarvaṃ dhanurvedaṃ mahātmane | karṇāya puruṣavyāghraḥ suprītenāntarātmanā
और भार्गव ने भी अत्यन्त प्रसन्न हृदय से महात्मा कर्ण, उस पुरुषव्याघ्र को सम्पूर्ण धनुर्वेद दिया।
श्लोक 30 (8.28.30)
वृजिनं न भवेत्किञ्चिदस्य कर्णस्य पार्थिव । सूतेन वर्धितो नित्यं न सूतो नृप एव सः ॥
vṛjinaṃ na bhavetkiñcidasya karṇasya pārthiva | sūtena vardhito nityaṃ na sūto nṛpa eva saḥ
हे राजन्, इस कर्ण में कोई दोष हो ही नहीं सकता। सूत ने उसका पालन-पोषण किया, पर हे नृप, वह सूत है ही नहीं।
श्लोक 31 (8.28.31)
विशुद्धयोनिं विज्ञाय दिव्यान्यस्त्राण्यदाद्भृगुः । नापि सूतकुले जातं मन्ये कर्णं कथञ्चन । देवपुत्रमहं मन्ये क्षत्रियाणां कुलोद्भवम् ॥
viśuddhayoniṃ vijñāya divyānyastrāṇyadādbhṛguḥ | nāpi sūtakule jātaṃ manye karṇaṃ kathañcana | devaputramahaṃ manye kṣatriyāṇāṃ kulodbhavam
उसे शुद्ध योनि का जानकर भृगुवंशी राम ने उसे दिव्य अस्त्र दिए। मैं कर्ण को किसी भी तरह सूत-कुल में उत्पन्न नहीं मानता; मैं उसे देवपुत्र, क्षत्रियों के कुल में उत्पन्न मानता हूँ।
श्लोक 32 (8.28.32)
विसृष्टमविबोधार्थं कुलस्येति मतिर्मम । सर्वथा न ह्यसौ शल्य कर्णः सूतकुलोद्भवः ॥
visṛṣṭamavibodhārthaṃ kulasyeti matirmama | sarvathā na hyasau śalya karṇaḥ sūtakulodbhavaḥ
मेरी धारणा है कि उसे इसलिए त्याग दिया गया कि उसके कुल का पता न चले। हे शल्य, यह कर्ण किसी भी प्रकार सूतकुल में उत्पन्न नहीं है।
श्लोक 33 (8.28.33)
सकुण्डलं सकवचं दीर्घबाहुमरिन्दमम् । कथमादित्यसङ्काशं मृगी सिंहं प्रसूयते ॥
sakuṇḍalaṃ sakavacaṃ dīrghabāhumarindamam | kathamādityasaṅkāśaṃ mṛgī siṃhaṃ prasūyate
कुण्डल और कवच से युक्त, दीर्घबाहु, शत्रुदमन, सूर्य के समान तेजस्वी इस वीर को—भला हिरनी सिंह को कैसे जन सकती है?
श्लोक 34 (8.28.34)
पश्य ह्यस्य भुजौ पीनौ नागराजकरोपमौ । वक्षः पश्य विशालं च सर्वशस्त्रसहं रणे ॥
paśya hyasya bhujau pīnau nāgarājakaropamau | vakṣaḥ paśya viśālaṃ ca sarvaśastrasahaṃ raṇe
इसकी मोटी भुजाओं को देखो, जो गजराजों की सूँड़ जैसी हैं; इसकी चौड़ी छाती को देखो, जो युद्ध में सब शस्त्र सह लेती है।
श्लोक 35 (8.28.35)
न त्वेव प्राकृतः कश्चित्कर्णो वैकर्तनो वृषा । महात्माह्येष राजेन्द्र रामशिष्यः प्रतापवान् ॥
na tveva prākṛtaḥ kaścitkarṇo vaikartano vṛṣā | mahātmāhyeṣa rājendra rāmaśiṣyaḥ pratāpavān
यह वैकर्तन कर्ण, वृष, कोई साधारण पुरुष नहीं है; हे राजेन्द्र, यह महात्मा, राम का शिष्य और प्रतापी है।