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कर्ण पर्व · अध्याय 29

शल्य का कर्ण का सारथि बनना स्वीकार करना

दुर्योधन शल्य को स्मरण कराता है कि ब्रह्मा ने रुद्र का सारथ्य किया था और उनसे कर्ण का सारथि बनने को कहता है। शल्य पुरानी कथा याद करके चेताता है कि अर्जुन के गिरने पर कृष्ण स्वयं युद्ध करेंगे; दुर्योधन कर्ण के पराक्रम और शल्य के बल की प्रशंसा करता है। शल्य इस शर्त पर मान जाता है कि वह कर्ण से खुलकर बोल सकेगा, और दुर्योधन कर्ण का आलिंगन करता है; फिर एक और अनुरोध पर शल्य मातलि जैसी सारथि-कुशलता का दावा करते हुए कर्ण के घोड़े हाँकने का वचन देता है।

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

दुर्योधन उवाच

श्लोक 1 (8.29.1)

एवं स भगवान्देवः सर्वलोकपितामहः । सारथ्यमकरोत्तत्र ब्रह्मा रुद्रोऽभवद्रथी ॥

evaṃ sa bhagavāndevaḥ sarvalokapitāmahaḥ | sārathyamakarottatra brahmā rudro'bhavadrathī

इस प्रकार सब लोकों के पितामह भगवान् ब्रह्मा ने वहाँ सारथि का काम किया और रुद्र रथी बने।

श्लोक 2 (8.29.2)

रथिनोऽभ्यधिको वीर कर्तव्यो रथसारथिः । तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र नियच्छ तुरगान्युधि ॥

rathino'bhyadhiko vīra kartavyo rathasārathiḥ | tasmāttvaṃ puruṣavyāghra niyaccha turagānyudhi

हे वीर! रथ का सारथि रथी से भी बढ़कर होना चाहिए। इसलिए हे पुरुषव्याघ्र! आप इस युद्ध में घोड़ों को सँभालिए।

श्लोक 3 (8.29.3)

यथा देवगणैस्तत्र वृतो यत्नात्पितामहः । तथाऽस्माभिर्भवान्यत्नात्कर्णादभ्यधिको वृतः ॥

yathā devagaṇaistatra vṛto yatnātpitāmahaḥ | tathā'smābhirbhavānyatnātkarṇādabhyadhiko vṛtaḥ

जैसे देवताओं ने वहाँ यत्नपूर्वक पितामह को चुना था, वैसे ही हमने यत्नपूर्वक आपको कर्ण से बढ़कर चुना है।

श्लोक 4 (8.29.4)

यथा देवैर्महाराज ईश्वरादधिको वृतः । तथा देवैर्महाराज क्षिप्रं रुद्रस्येव पितामहः । नियच्छ तुरगान्युद्धे राधेयस्य महाद्युते ॥

yathā devairmahārāja īśvarādadhiko vṛtaḥ | tathā devairmahārāja kṣipraṃ rudrasyeva pitāmahaḥ | niyaccha turagānyuddhe rādheyasya mahādyute

हे महाराज! जैसे देवताओं ने ईश्वर (शिव) से भी बढ़कर पितामह को चुना था, वैसे ही अब शीघ्र, रुद्र के लिए पितामह की भाँति, हे महातेजस्वी! युद्ध में राधेय के घोड़ों को सँभालिए।

शल्य उवाच

श्लोक 5 (8.29.5)

मयाप्येतन्नरश्रेष्ठ बहुशो नरसिंहयोः । कथ्यमानं श्रुतं दिव्यमाख्यानमतिमानुषम् ॥

mayāpyetannaraśreṣṭha bahuśo narasiṃhayoḥ | kathyamānaṃ śrutaṃ divyamākhyānamatimānuṣam

हे नरश्रेष्ठ! उन दोनों नरसिंहों के विषय में कही जाती यह दिव्य और अलौकिक कथा मैंने भी अनेक बार सुनी है—

श्लोक 6 (8.29.6)

यथा च चक्रे सारथ्यं भवस्य प्रपितामहः । यथाऽसुराश्च निहता इषुणैकेन भारत ॥

yathā ca cakre sārathyaṃ bhavasya prapitāmahaḥ | yathā'surāśca nihatā iṣuṇaikena bhārata

कि भव के प्रपितामह ने किस प्रकार सारथ्य किया, और हे भारत! किस प्रकार असुर एक ही बाण से मारे गए।

श्लोक 7 (8.29.7)

कृष्णस्य चापि विदितं सर्वमेतत्पुरा ह्यभूत् ॥

kṛṣṇasya cāpi viditaṃ sarvametatpurā hyabhūt

यह सब कृष्ण को भी ज्ञात था, क्योंकि यह बहुत पहले घट चुका था।

श्लोक 8 (8.29.8)

यथा पितामहो जज्ञे भगवान्सारथिस्तदा । अनागतमतिक्रान्तं वेद कृष्णोऽपि तत्त्वतः ॥

yathā pitāmaho jajñe bhagavānsārathistadā | anāgatamatikrāntaṃ veda kṛṣṇo'pi tattvataḥ

पितामह भगवान् उस समय किस प्रकार सारथि बने—यह कृष्ण भी यथार्थ रूप से जानते हैं; वे भविष्य और अतीत, दोनों को जानते हैं।

श्लोक 9 (8.29.9)

एतदर्थं विदित्वाऽपि सारथ्यमुपजग्मिवान् । स्वयम्भूरिव रुद्रस्य कृष्णः पार्थस्य भारत ॥

etadarthaṃ viditvā'pi sārathyamupajagmivān | svayambhūriva rudrasya kṛṣṇaḥ pārthasya bhārata

इसी प्रयोजन को जानकर कृष्ण ने, हे भारत! पार्थ का सारथ्य स्वीकार किया, जैसे स्वयम्भू ब्रह्मा ने रुद्र का किया था।

श्लोक 10 (8.29.10)

यदि हन्याच्च कौन्तेयं सूतपुत्रः कथञ्चन । दृष्ट्वा पार्थं हि निहतं स्वयं योत्स्यति केशवः ॥

yadi hanyācca kaunteyaṃ sūtaputraḥ kathañcana | dṛṣṭvā pārthaṃ hi nihataṃ svayaṃ yotsyati keśavaḥ

यदि सूतपुत्र किसी प्रकार कुन्तीपुत्र को मार डाले, तो पार्थ को मरा देखकर केशव स्वयं युद्ध करेंगे।

श्लोक 11 (8.29.11)

शङ्खचक्रगदापाणिर्धक्ष्यते तव वाहिनीम् । न चापि तस्य क्रुद्धस्य वार्ष्णेयस्य महात्मनः । स्थास्यते प्रत्यनीकेषु कश्चिदत्र नृपस्तव ॥

śaṅkhacakragadāpāṇirdhakṣyate tava vāhinīm | na cāpi tasya kruddhasya vārṣṇeyasya mahātmanaḥ | sthāsyate pratyanīkeṣu kaścidatra nṛpastava

शंख, चक्र और गदा हाथ में लिए वे आपकी सेना को भस्म कर देंगे; क्रुद्ध हुए उन महात्मा वार्ष्णेय के सामने आपका कोई भी राजा आपकी सेना में टिक नहीं सकेगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 12 (8.29.12)

तं तथा भाषमाणं तु मद्रराजमरिन्दमः । प्रत्युवाच महाबाहुरदीनात्मा सुतस्तव ॥

taṃ tathā bhāṣamāṇaṃ tu madrarājamarindamaḥ | pratyuvāca mahābāhuradīnātmā sutastava

इस प्रकार बोलते हुए मद्रराज को आपके शत्रुदमन, महाबाहु और अविचल मन वाले पुत्र ने उत्तर दिया।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 13 (8.29.13)

मावमंस्था महाबाहो कर्णं वैकर्तनं रणे । सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं सर्वशास्त्रार्थपारगम् ॥

māvamaṃsthā mahābāho karṇaṃ vaikartanaṃ raṇe | sarvaśastrabhṛtāṃ śreṣṭhaṃ sarvaśāstrārthapāragam

हे महाबाहो! युद्ध में वैकर्तन कर्ण का अपमान मत कीजिए; वह सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ है और सब शास्त्रों के अर्थ का पारगामी है।

श्लोक 14 (8.29.14)

यस्य ज्यातलनिर्घोषं श्रुत्वा भयकरं महत् । पाण्डवेयानि सैन्यानि विद्रवन्ति दिशो दश ॥

yasya jyātalanirghoṣaṃ śrutvā bhayakaraṃ mahat | pāṇḍaveyāni sainyāni vidravanti diśo daśa

जिसकी प्रत्यंचा की भयंकर महान् टंकार सुनकर पाण्डवों की सेनाएँ दसों दिशाओं में भाग खड़ी होती हैं।

श्लोक 15 (8.29.15)

प्रत्यक्षं ते महाबाहो यथा रात्रौ घटोत्कचः । मायाशतानि कुर्वाणो हतो मायापुरस्कृतः ॥

pratyakṣaṃ te mahābāho yathā rātrau ghaṭotkacaḥ | māyāśatāni kurvāṇo hato māyāpuraskṛtaḥ

हे महाबाहो! आपने स्वयं देखा कि रात में सैकड़ों मायाएँ रचता हुआ, माया को आगे किए हुए घटोत्कच किस प्रकार मारा गया।

श्लोक 16 (8.29.16)

न चातिष्ठत बीभत्सुः प्रत्यनीके कथञ्चन । एतांश्च दिवसान्सर्वान्भयेन महता वृतः ॥

na cātiṣṭhata bībhatsuḥ pratyanīke kathañcana | etāṃśca divasānsarvānbhayena mahatā vṛtaḥ

इन सब दिनों में बीभत्सु (अर्जुन) बड़े भय से घिरा रहकर उसके सामने शत्रु-सेना में किसी भी प्रकार नहीं टिका।

श्लोक 17 (8.29.17)

भीमसेनश्च बलवान्धनुष्कोट्याभिचोदितः । उक्तश्च संज्ञया राजन्मूढ औदरिको यथा ॥

bhīmasenaśca balavāndhanuṣkoṭyābhicoditaḥ | uktaśca saṃjñayā rājanmūḍha audariko yathā

बलवान् भीमसेन को भी धनुष की नोक से कोंचा गया और, हे राजन्! किसी मूढ़ पेटू की तरह एक चिढ़ाने वाले नाम से पुकारा गया।

श्लोक 18 (8.29.18)

माद्रीपुत्रौ तथा शूरौ येन जित्वा महारणे । कमप्यर्थं पुरस्कृत्य न हतौ युधि मारिष ॥

mādrīputrau tathā śūrau yena jitvā mahāraṇe | kamapyarthaṃ puraskṛtya na hatau yudhi māriṣa

और हे मान्यवर! माद्री के उन दोनों शूर पुत्रों को भी उसने महायुद्ध में जीतकर किसी प्रयोजन को सामने रखकर युद्ध में मारा नहीं।

श्लोक 19 (8.29.19)

येन वृष्णिप्रवीरस्तु सात्यकिः सात्वतां वरः । निर्जित्य समरे शूरो विरथश्च बलात्कृतः ॥

yena vṛṣṇipravīrastu sātyakiḥ sātvatāṃ varaḥ | nirjitya samare śūro virathaśca balātkṛtaḥ

जिसने वृष्णियों के प्रमुख वीर, सात्वतों में श्रेष्ठ शूर सात्यकि को युद्ध में हराकर बलपूर्वक रथहीन कर दिया।

श्लोक 20 (8.29.20)

सृञ्जयाश्चेतरे सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । असकृन्निर्जिताः सङ्ख्ये स्मयमानेन संयुगे ॥

sṛñjayāścetare sarve dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ | asakṛnnirjitāḥ saṅkhye smayamānena saṃyuge

धृष्टद्युम्न को आगे रखने वाले सृञ्जयों तथा अन्य सभी को उसने मुस्कराते हुए युद्ध में बार-बार हराया है।

श्लोक 21 (8.29.21)

तं कथं पाण्डवा युद्धे विजेष्यन्ति महारथम् । यो हन्यात्समरे क्रुद्धो वज्रहस्तं पुरन्दरम् ॥

taṃ kathaṃ pāṇḍavā yuddhe vijeṣyanti mahāratham | yo hanyātsamare kruddho vajrahastaṃ purandaram

जो क्रुद्ध होकर युद्ध में वज्रधारी पुरन्दर (इन्द्र) को भी मार सकता है, उस महारथी को पाण्डव युद्ध में कैसे जीतेंगे?

श्लोक 22 (8.29.22)

त्वं च सर्वास्त्रविद्वीरः सर्वविद्यास्त्रपारगः । बाहुवीर्येण ते तुल्यः पृथिव्यां नास्ति कश्चन ॥

tvaṃ ca sarvāstravidvīraḥ sarvavidyāstrapāragaḥ | bāhuvīryeṇa te tulyaḥ pṛthivyāṃ nāsti kaścana

और आप सब अस्त्रों के ज्ञाता वीर हैं, सब विद्याओं और अस्त्रों में पारंगत हैं; बाहुबल में पृथ्वी पर आपके समान कोई नहीं है।

श्लोक 23 (8.29.23)

त्वं शल्यभूतः शत्रूणामविषह्यः पराक्रमे । ततस्त्वमुच्यसे राजञ्शल्य इत्यरिसूदन ॥

tvaṃ śalyabhūtaḥ śatrūṇāmaviṣahyaḥ parākrame | tatastvamucyase rājañśalya ityarisūdana

आप शत्रुओं के लिए शल्य (काँटा) हैं, पराक्रम में असह्य हैं; इसीलिए हे राजन्! हे शत्रुसूदन! आप शल्य कहलाते हैं।

श्लोक 24 (8.29.24)

तव बाहुबलं प्राप्य न शेकुः सर्वसात्वताः । तव बाहुबलाद्राजन्किं नु कृष्णो बलाधिकः ॥

tava bāhubalaṃ prāpya na śekuḥ sarvasātvatāḥ | tava bāhubalādrājankiṃ nu kṛṣṇo balādhikaḥ

आपके बाहुबल का सामना होने पर सब सात्वत टिक न सके; और हे राजन्! आपके बाहुबल से क्या कृष्ण कुछ अधिक बलवान् हैं?

श्लोक 25 (8.29.25)

यथा हि कृष्णेन बलं धार्यं वै फल्गुने हते । तथा कर्णात्ययीभावे त्वया धार्यं महद्बलम् ॥

yathā hi kṛṣṇena balaṃ dhāryaṃ vai phalgune hate | tathā karṇātyayībhāve tvayā dhāryaṃ mahadbalam

जैसे फल्गुन (अर्जुन) के मारे जाने पर कृष्ण को सेना सँभालनी पड़ेगी, वैसे ही कर्ण के न रहने पर आपको इस विशाल सेना को सँभालना होगा।

श्लोक 26 (8.29.26)

किमर्थं समरे सैन्यं वासुदेवो न्यवारयत् । किमर्थं च भवान्सैन्यं न हनिष्यति मारिष ॥

kimarthaṃ samare sainyaṃ vāsudevo nyavārayat | kimarthaṃ ca bhavānsainyaṃ na haniṣyati māriṣa

वासुदेव ने युद्ध में सेना को क्यों रोका? और हे मान्यवर! आप भी सेना का संहार क्यों नहीं करेंगे?

श्लोक 27 (8.29.27)

त्वत्कृते पदवीं गन्तुमिच्छेयं युधि मारिष । सोदराणां च वीराणां सर्वेषां च महीक्षिताम् ॥

tvatkṛte padavīṃ gantumiccheyaṃ yudhi māriṣa | sodarāṇāṃ ca vīrāṇāṃ sarveṣāṃ ca mahīkṣitām

हे मान्यवर! आपके लिए मैं युद्ध में उस मार्ग पर चलना चाहता हूँ जिससे ऋण चुकता हो—अपने भाइयों, वीरों और सब राजाओं के लिए भी।

शल्य उवाच

श्लोक 28 (8.29.28)

यन्मां ब्रवीषि गान्धारे अग्रे सैन्यस्य मानद । विशिष्टं देवकीपुत्रात्प्रीतिमानस्म्यहं त्वयि ॥

yanmāṃ bravīṣi gāndhāre agre sainyasya mānada | viśiṣṭaṃ devakīputrātprītimānasmyahaṃ tvayi

हे गान्धारीपुत्र! हे मानद! आप सेना के सामने मुझे देवकीपुत्र से बढ़कर बता रहे हैं, इससे मैं आप पर प्रसन्न हूँ।

श्लोक 29 (8.29.29)

एष सारथ्यमातिष्ठे राधेयस्य यशस्विनः । युध्यतः पाण्डवाग्र्येण यथा त्वं वीर मन्यसे ॥

eṣa sārathyamātiṣṭhe rādheyasya yaśasvinaḥ | yudhyataḥ pāṇḍavāgryeṇa yathā tvaṃ vīra manyase

हे वीर! जैसा आप ठीक समझते हैं, उसी प्रकार पाण्डवों के प्रमुख वीर से लड़ने वाले यशस्वी राधेय का सारथ्य मैं स्वीकार करता हूँ।

श्लोक 30 (8.29.30)

समयश्च हि मे वीर कश्चिद्वैकर्तनं प्रति । उत्सृजेयं यथाश्रद्धमहं वाचोऽस्य सन्निधौ ॥

samayaśca hi me vīra kaścidvaikartanaṃ prati | utsṛjeyaṃ yathāśraddhamahaṃ vāco'sya sannidhau

हे वीर! वैकर्तन के विषय में मेरी एक शर्त है—कि उसके सामने मैं अपनी इच्छा के अनुसार जो चाहूँ कह सकूँ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 31 (8.29.31)

तथेति राजन्पुत्रस्ते सह कर्णेन मारिष । अब्रवीत्मद्रराजानं सर्वक्षत्रस्य सन्निधौ ॥

tatheti rājanputraste saha karṇena māriṣa | abravītmadrarājānaṃ sarvakṣatrasya sannidhau

हे राजन्! आपके पुत्र ने कर्ण के साथ सब क्षत्रियों के सामने मद्रराज से कहा—“ऐसा ही हो।”

श्लोक 32 (8.29.32)

सारथ्यस्याभ्युपगमाच्छल्येनाश्वासितस्तदा । दुर्योधनस्तदा हृष्टः कर्णं तमभिषस्वजे ॥

sārathyasyābhyupagamācchalyenāśvāsitastadā | duryodhanastadā hṛṣṭaḥ karṇaṃ tamabhiṣasvaje

शल्य के सारथि बनना स्वीकार कर लेने से आश्वस्त होकर दुर्योधन ने हर्षित हो कर्ण का आलिंगन किया।

श्लोक 33 (8.29.33)

अब्रवीच्च पुनः कर्णं स्तूयमानः सुतस्तव । जहि पार्थान्रणे सर्वान्महेन्द्रो दानवानिव ॥

abravīcca punaḥ karṇaṃ stūyamānaḥ sutastava | jahi pārthānraṇe sarvānmahendro dānavāniva

प्रशंसित होते हुए आपके पुत्र ने फिर कर्ण से कहा—“जैसे महेन्द्र ने दानवों को मारा, वैसे ही तुम युद्ध में सब पार्थों को मार डालो।”

श्लोक 34 (8.29.34)

स शल्येनाभ्युपगते हयानां सन्नियच्छने । कर्णो हृष्टमना भूयो दुर्योधनमभाषत ॥

sa śalyenābhyupagate hayānāṃ sanniyacchane | karṇo hṛṣṭamanā bhūyo duryodhanamabhāṣata

शल्य के घोड़ों को सँभालना स्वीकार कर लेने पर कर्ण ने प्रसन्न मन से फिर दुर्योधन से कहा।

कर्ण उवाच

श्लोक 35 (8.29.35)

नातिहृष्टमना ह्येष मद्रराजोऽभिभाषते । राजन्मधुरया वाचा पुनरेनं ब्रवीहि वै ॥

nātihṛṣṭamanā hyeṣa madrarājo'bhibhāṣate | rājanmadhurayā vācā punarenaṃ bravīhi vai

ये मद्रराज बहुत प्रसन्न मन से नहीं बोल रहे हैं। हे राजन्! मधुर वाणी में इनसे फिर कहिए।

सञ्जय उवाच

श्लोक 36 (8.29.36)

ततो राजा महाप्राज्ञः सर्वास्त्रकुशलो बली । दुर्योधनोऽब्रवीच्छल्यं मद्रराजं महीपतिम् ॥

tato rājā mahāprājñaḥ sarvāstrakuśalo balī | duryodhano'bravīcchalyaṃ madrarājaṃ mahīpatim

तब महाप्राज्ञ, बलवान् और सब अस्त्रों में कुशल राजा दुर्योधन ने पृथ्वीपति मद्रराज शल्य से कहा,

श्लोक 37 (8.29.37)

पूरयन्निव घोषेण मेघगम्भीरया गिरा । शल्य कर्णोऽर्जुनेनाद्य योद्धव्यमिति मन्यते ॥

pūrayanniva ghoṣeṇa meghagambhīrayā girā | śalya karṇo'rjunenādya yoddhavyamiti manyate

मानो मेघ के समान गम्भीर वाणी की गूँज से सब दिशाएँ भरते हुए—“शल्य! कर्ण मानता है कि आज उसे अर्जुन से युद्ध करना है।”

दुर्योधन उवाच

श्लोक 38 (8.29.38)

तस्य त्वं पुरुषव्याघ्र नियच्छ तुरगान्युधि । कर्णो हत्वेतरान्सर्वान्फल्गुनं हन्तुमिच्छति । तस्याभीषुग्रहे राजन्प्रयाचे त्वां पुनः पुनः ॥

tasya tvaṃ puruṣavyāghra niyaccha turagānyudhi | karṇo hatvetarānsarvānphalgunaṃ hantumicchati | tasyābhīṣugrahe rājanprayāce tvāṃ punaḥ punaḥ

इसलिए हे पुरुषव्याघ्र! युद्ध में उसके घोड़ों को सँभालिए। कर्ण दूसरे सबको मारकर फल्गुन को मारना चाहता है; हे राजन्! उसके सारथ्य के लिए मैं आपसे बार-बार प्रार्थना करता हूँ।

श्लोक 39 (8.29.39)

पार्थस्य सचिवः कृष्णो यथाऽभीषुग्रहो वरः । तथा त्वमपि राधेयं सर्वतः परिपालय ॥

pārthasya sacivaḥ kṛṣṇo yathā'bhīṣugraho varaḥ | tathā tvamapi rādheyaṃ sarvataḥ paripālaya

जैसे पार्थ के सचिव कृष्ण श्रेष्ठ सारथि हैं, वैसे ही आप भी राधेय की सब ओर से रक्षा कीजिए।

सञ्जय उवाच

श्लोक 40 (8.29.40)

ततः शल्यः परिष्वज्य सुतं ते वाक्यमब्रवीत् । दुर्योधनममित्रघ्नं प्रीतो मद्राधिपस्तदा ॥

tataḥ śalyaḥ pariṣvajya sutaṃ te vākyamabravīt | duryodhanamamitraghnaṃ prīto madrādhipastadā

तब शल्य ने आपके पुत्र का आलिंगन करके प्रसन्न होकर शत्रुनाशक दुर्योधन से यह बात कही।

शल्य उवाच

श्लोक 41 (8.29.41)

एवं चेन्मन्यसे राजन्गान्धारे प्रियदर्शन । तस्मात्ते यत्प्रियं किञ्चित्तत्सर्वं करवाण्यहम् ॥

evaṃ cenmanyase rājangāndhāre priyadarśana | tasmātte yatpriyaṃ kiñcittatsarvaṃ karavāṇyaham

हे प्रियदर्शन गान्धारीपुत्र राजन्! यदि आप ऐसा मानते हैं, तो आपका जो कुछ प्रिय है, वह सब मैं करूँगा।

श्लोक 42 (8.29.42)

यत्रास्मि भरतश्रेष्ठ योग्यः कर्मणि कर्हिचित् । तत्र सर्वात्मना युक्तो वक्ष्ये कार्यं परन्तप ॥

yatrāsmi bharataśreṣṭha yogyaḥ karmaṇi karhicit | tatra sarvātmanā yukto vakṣye kāryaṃ parantapa

हे भरतश्रेष्ठ! जिस किसी कार्य में मैं योग्य होऊँ, उसमें पूरे मन से लगकर, हे परन्तप! मैं करणीय कार्य सँभालूँगा।

श्लोक 43 (8.29.43)

यत्तु कर्णमहं ब्रूयां हितकामः प्रियाप्रिये । मम तत्क्षमतां सर्वं भवान्कर्णश्च सर्वशः ॥

yattu karṇamahaṃ brūyāṃ hitakāmaḥ priyāpriye | mama tatkṣamatāṃ sarvaṃ bhavānkarṇaśca sarvaśaḥ

किन्तु उसके हित की इच्छा से मैं कर्ण से जो कुछ प्रिय या अप्रिय कहूँ, उस सबको आप और कर्ण सर्वथा क्षमा करें।

कर्ण उवाच

श्लोक 44 (8.29.44)

ईशानस्य यथा ब्रह्मा यथा पार्थस्य केशवः । तथा नित्यं हिते युक्तो मद्रराज भवस्व नः ॥

īśānasya yathā brahmā yathā pārthasya keśavaḥ | tathā nityaṃ hite yukto madrarāja bhavasva naḥ

जैसे ब्रह्मा ईशान के और केशव पार्थ के हितैषी हैं, वैसे ही हे मद्रराज! आप भी सदा हमारे हित में लगे रहिए।

शल्य उवाच

श्लोक 45 (8.29.45)

आत्मनिन्दात्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः । अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम् ॥

ātmanindātmapūjā ca paranindā parastavaḥ | anācaritamāryāṇāṃ vṛttametaccaturvidham

अपनी निन्दा, अपनी प्रशंसा, दूसरों की निन्दा और दूसरों की स्तुति—ये चार प्रकार के आचरण श्रेष्ठ पुरुषों के नहीं होते।

श्लोक 46 (8.29.46)

यत्तु विद्वन्प्रवक्ष्यामि प्रत्ययार्थमहं तव । आत्मनः स्तवसंयुक्तं तन्निबोध यथातथम् ॥

yattu vidvanpravakṣyāmi pratyayārthamahaṃ tava | ātmanaḥ stavasaṃyuktaṃ tannibodha yathātatham

किन्तु हे विद्वन्! आपको विश्वास दिलाने के लिए मैं जो अपनी प्रशंसा से जुड़ी बात कहूँगा, उसे ज्यों-की-त्यों सुनिए।

श्लोक 47 (8.29.47)

अहं शक्रस्य सारथ्ये योग्यो मातलिवत्प्रभो । अप्रमादात्प्रयोगाच्च ज्ञानविद्याचिकित्सनैः ॥

ahaṃ śakrasya sārathye yogyo mātalivatprabho | apramādātprayogācca jñānavidyācikitsanaiḥ

हे प्रभो! सावधानी, घोड़े हाँकने की कुशलता, ज्ञान, विद्या और दोष-निवारण की सामर्थ्य के कारण मैं मातलि की तरह इन्द्र का सारथि बनने योग्य हूँ।

श्लोक 48 (8.29.48)

ततः पार्थेन सङ्ग्रामे युध्यमानस्य तेऽनघ । वाहयिष्यामि तुरगान्विज्वरो भव सूतज ॥

tataḥ pārthena saṅgrāme yudhyamānasya te'nagha | vāhayiṣyāmi turagānvijvaro bhava sūtaja

इसलिए हे निष्पाप सूतपुत्र! जब आप संग्राम में पार्थ से लड़ेंगे, तब मैं आपके घोड़े हाँकूँगा; आप चिन्ता-मुक्त रहिए।

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30