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कर्ण पर्व · अध्याय 30

शल्य के सारथि बनने पर कर्ण का रथारोहण

दुर्योधन कर्ण से कहता है कि शल्य उसका सारथ्य वैसे ही करेंगे जैसे मातलि इन्द्र का करता है, और शल्य से फिर कहता है कि वे कर्ण के घोड़े सँभालें; शल्य मान जाते हैं। कर्ण रथ का पूजन करता और सूर्य की उपासना करता है, फिर शल्य और कर्ण सूर्य और अग्नि की तरह चमकते हुए रथ पर चढ़ते हैं। दुर्योधन कर्ण से वह कर्म करने को कहता है जो भीष्म और द्रोण न कर सके, और कर्ण घोड़े हाँकने को कहता है; शल्य उसे पाण्डवों का अपमान न करने की चेतावनी देते हैं, पर कर्ण उसे अनसुना कर देता है।

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

दुर्योधन उवाच

श्लोक 1 (8.30.1)

अयं ते कर्ण सारथ्यं मद्रराजः करिष्यति । कृष्णादभ्यधिको यन्ता देवेशस्येव मातलिः ॥

ayaṃ te karṇa sārathyaṃ madrarājaḥ kariṣyati | kṛṣṇādabhyadhiko yantā deveśasyeva mātaliḥ

हे कर्ण! ये मद्रराज तुम्हारा सारथ्य करेंगे; ये कृष्ण से भी श्रेष्ठ सारथि हैं, जैसे देवेश्वर इन्द्र के लिए मातलि हैं।

श्लोक 2 (8.30.2)

यथा हरिहयैर्युक्तं सङ्गृह्णाति स मातलिः । शल्यस्तथा तवाद्यायं संयन्ता रथवाजिनाम् ॥

yathā harihayairyuktaṃ saṅgṛhṇāti sa mātaliḥ | śalyastathā tavādyāyaṃ saṃyantā rathavājinām

जैसे मातलि इन्द्र के घोड़ों से जुते रथ की रास सँभालता है, वैसे ही आज शल्य तुम्हारे रथ के घोड़ों को सँभालने वाले होंगे।

श्लोक 3 (8.30.3)

योधे त्वयि रथस्थे च मद्रराजे च सारथौ । रथश्रेष्ठो ध्रुवं सङ्ख्ये पार्थानभिभविष्यति ॥

yodhe tvayi rathasthe ca madrarāje ca sārathau | rathaśreṣṭho dhruvaṃ saṅkhye pārthānabhibhaviṣyati

तुम योद्धा के रूप में रथ पर होगे और मद्रराज सारथि होंगे; तब तुम रथियों में श्रेष्ठ निश्चय ही युद्ध में पार्थों को परास्त करोगे।

सञ्जय उवाच

श्लोक 4 (8.30.4)

ततो दुर्योधनो भूयो मद्रराजं तरस्विनम् । उवाच राजन्सङ्ग्रामेऽध्युषिते पर्युपस्थिते ॥

tato duryodhano bhūyo madrarājaṃ tarasvinam | uvāca rājansaṅgrāme'dhyuṣite paryupasthite

तब हे राजन्! प्रभात होने पर, युद्ध सामने आ जाने पर, दुर्योधन ने फिर पराक्रमी मद्रराज से कहा—

दुर्योधन उवाच

श्लोक 5 (8.30.5)

कर्णस्य यच्छ सङ्ग्रामे मद्रराज हयोत्तमान् । त्वयाऽभिगुप्तो राधेयो विजेष्यति धनञ्जयम् ॥

karṇasya yaccha saṅgrāme madrarāja hayottamān | tvayā'bhigupto rādheyo vijeṣyati dhanañjayam

“हे मद्रराज! युद्ध में कर्ण के उत्तम घोड़ों को सँभालिए; आपसे रक्षित होकर राधेय धनञ्जय को जीतेगा।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 6 (8.30.6)

इत्युक्तो रथमास्थाय तथेति प्राह भारत । शल्येऽभ्युपगते कर्णः सारथिं सुमनाऽब्रवीत् ॥

ityukto rathamāsthāya tatheti prāha bhārata | śalye'bhyupagate karṇaḥ sārathiṃ sumanā'bravīt

यह कहे जाने पर उसने रथ सँभाला और हे भारत! “ऐसा ही हो” कहा। शल्य के मान लेने पर कर्ण ने प्रसन्न मन से अपने सारथि से कहा—

श्लोक 7 (8.30.7)

त्वं सूत स्यन्दनं मह्यं कल्पयेत्यसकृत्त्वरन् ॥

tvaṃ sūta syandanaṃ mahyaṃ kalpayetyasakṛttvaran

उतावली से वह बार-बार बोला—“सूत! मेरा रथ तैयार करो।”

श्लोक 8 (8.30.8)

ततो जैत्रं रथवरं गन्धर्वनगरोपमम् । विधिवत्कल्पितं भद्रं जयेत्युक्त्वा न्यवेदयत् ॥

tato jaitraṃ rathavaraṃ gandharvanagaropamam | vidhivatkalpitaṃ bhadraṃ jayetyuktvā nyavedayat

तब उसने गन्धर्वनगर के समान विजयी, विधिपूर्वक सजाया हुआ कल्याणकारी श्रेष्ठ रथ “जय हो” कहकर प्रस्तुत किया।

श्लोक 9 (8.30.9)

तं रथं रथिनां श्रेष्ठः कर्णोऽभ्यर्च्य यथाविधि । सम्पादितं ब्रह्मविदा पूर्वमेव पुरोधसा ॥

taṃ rathaṃ rathināṃ śreṣṭhaḥ karṇo'bhyarcya yathāvidhi | sampāditaṃ brahmavidā pūrvameva purodhasā

रथियों में श्रेष्ठ कर्ण ने उस रथ का विधिपूर्वक पूजन किया, जिसे ब्रह्मवेत्ता पुरोहित ने पहले ही तैयार कर रखा था।

श्लोक 10 (8.30.10)

कृत्वा प्रदक्षिणं यत्नादुपस्थाय च भास्करम् । समीपस्थं मद्रराजमारोह त्वमथाब्रवीत् ॥

kṛtvā pradakṣiṇaṃ yatnādupasthāya ca bhāskaram | samīpasthaṃ madrarājamāroha tvamathābravīt

यत्नपूर्वक उसकी प्रदक्षिणा करके और सूर्य की उपासना करके उसने पास खड़े मद्रराज से कहा—“आप चढ़िए।”

श्लोक 11 (8.30.11)

ततः कर्णस्य दुर्धर्षं स्यन्दनप्रवरं महत् । आरुरोह महातेजाः शल्यः सिंह इवाचलम् ॥

tataḥ karṇasya durdharṣaṃ syandanapravaraṃ mahat | āruroha mahātejāḥ śalyaḥ siṃha ivācalam

तब महातेजस्वी शल्य कर्ण के उस दुर्धर्ष, विशाल, श्रेष्ठ रथ पर चढ़े, जैसे सिंह पर्वत पर चढ़ता है।

श्लोक 12 (8.30.12)

ततः शल्याश्रितं दृष्ट्वा कर्णः स्वं रथमुत्तमम् । अध्यतिष्ठद्यथाऽम्भोदं विद्युत्वन्तं दिवाकरः ॥

tataḥ śalyāśritaṃ dṛṣṭvā karṇaḥ svaṃ rathamuttamam | adhyatiṣṭhadyathā'mbhodaṃ vidyutvantaṃ divākaraḥ

तब अपने उत्तम रथ को शल्य से अधिष्ठित देखकर कर्ण उस पर चढ़ा, जैसे सूर्य बिजली से भरे बादल पर चढ़ता है।

श्लोक 13 (8.30.13)

तावेकरथमारूढावादित्याग्निसमत्विषौ । अभ्राजेतां यथा मेघं सूर्याग्नी सहितौ दिवि ॥

tāvekarathamārūḍhāvādityāgnisamatviṣau | abhrājetāṃ yathā meghaṃ sūryāgnī sahitau divi

एक ही रथ पर आरूढ़ वे दोनों, सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, ऐसे चमके जैसे आकाश में बादल पर सूर्य और अग्नि साथ-साथ चमकते हों।

श्लोक 14 (8.30.14)

संस्तूयमानौ तौ वीरौ तदास्तां द्युतिमत्तमौ । ऋत्विक्सदस्यैरिन्द्राग्नी स्तूयमानाविवाध्वरे ॥

saṃstūyamānau tau vīrau tadāstāṃ dyutimattamau | ṛtviksadasyairindrāgnī stūyamānāvivādhvare

स्तुति किए जाते हुए वे दोनों वीर अत्यन्त दीप्तिमान् दिखे, जैसे यज्ञ में ऋत्विजों और सदस्यों द्वारा स्तुति किए जाते इन्द्र और अग्नि।

श्लोक 15 (8.30.15)

स शल्यसङ्गृहीताश्वे रथे कर्णः स्थितो बभौ । धनुर्विष्फारयन्घोरं परिवेषीव भास्करः ॥

sa śalyasaṅgṛhītāśve rathe karṇaḥ sthito babhau | dhanurviṣphārayanghoraṃ pariveṣīva bhāskaraḥ

शल्य के घोड़े सँभाले हुए रथ पर खड़ा कर्ण भयंकर धनुष को तानता हुआ परिधि से घिरे सूर्य के समान शोभित हुआ।

श्लोक 16 (8.30.16)

आस्थितः स रथश्रेष्ठं कर्णः शरगभस्तिमान् । प्रबभौ पुरुषव्याघ्रो मन्दरस्थ इवांशुमान् ॥

āsthitaḥ sa rathaśreṣṭhaṃ karṇaḥ śaragabhastimān | prababhau puruṣavyāghro mandarastha ivāṃśumān

श्रेष्ठ रथ पर स्थित, बाणरूपी किरणों वाला वह पुरुषव्याघ्र कर्ण मन्दर पर्वत पर स्थित सूर्य के समान चमका।

श्लोक 17 (8.30.17)

तं रथस्थं महाबाहुं युद्धायामिततेजसम् । दुर्योधनस्तु राधेयमिदं वचनमब्रवीत् ॥

taṃ rathasthaṃ mahābāhuṃ yuddhāyāmitatejasam | duryodhanastu rādheyamidaṃ vacanamabravīt

तब दुर्योधन ने रथ पर स्थित, महाबाहु, युद्ध के लिए अपार तेज वाले राधेय से यह बात कही—

दुर्योधन उवाच

श्लोक 18 (8.30.18)

अकृतं द्रोणभीष्माभ्यां दुष्करं कर्म संयुगे । कुरुष्वाधिरथे वीर मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥

akṛtaṃ droṇabhīṣmābhyāṃ duṣkaraṃ karma saṃyuge | kuruṣvādhirathe vīra miṣatāṃ sarvadhanvinām

हे वीर अधिरथपुत्र! सब धनुर्धारियों के देखते-देखते युद्ध में वह कठिन कर्म करो जो द्रोण और भीष्म ने नहीं किया।

श्लोक 19 (8.30.19)

मनोगतं मम ह्यासीद्भीष्मद्रोणौ महारथौ । अर्जुनं भीमसेनं च निहन्ताराविति ध्रुवम् ॥

manogataṃ mama hyāsīdbhīṣmadroṇau mahārathau | arjunaṃ bhīmasenaṃ ca nihantārāviti dhruvam

मेरे मन में यही था कि महारथी भीष्म और द्रोण अर्जुन और भीमसेन को अवश्य मार डालेंगे।

श्लोक 20 (8.30.20)

ताभ्यां यदकृतं वीर वीरकर्म महामृधे । तत्कर्म कुरु राधेय वज्रपाणिरिवापरः ॥

tābhyāṃ yadakṛtaṃ vīra vīrakarma mahāmṛdhe | tatkarma kuru rādheya vajrapāṇirivāparaḥ

हे वीर राधेय! उन दोनों ने महायुद्ध में जो वीरकर्म नहीं किया, वही तुम करो—दूसरे वज्रपाणि इन्द्र के समान।

श्लोक 21 (8.30.21)

गृहाण धर्मराजं वा जहि वा त्वं धनञ्जयम् । भीमसेनं च राधेय माद्रीपुत्रौ यमावपि ॥

gṛhāṇa dharmarājaṃ vā jahi vā tvaṃ dhanañjayam | bhīmasenaṃ ca rādheya mādrīputrau yamāvapi

हे राधेय! या तो धर्मराज को पकड़ लो या धनञ्जय को मार डालो; भीमसेन को और माद्री के दोनों जुड़वाँ पुत्रों को भी।

श्लोक 22 (8.30.22)

जयश्च तेऽस्तु भद्रं ते प्रयाहि पुरुषर्षभ । पाण्डुपुत्रस्य सैन्यानि कुरु सर्वाणि भस्मसात् ॥

jayaśca te'stu bhadraṃ te prayāhi puruṣarṣabha | pāṇḍuputrasya sainyāni kuru sarvāṇi bhasmasāt

तुम्हारी जय हो, तुम्हारा कल्याण हो; हे पुरुषश्रेष्ठ! आगे बढ़ो और पाण्डुपुत्र की सब सेनाओं को भस्म कर दो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 23 (8.30.23)

ततस्तूर्यसहस्राणि भेरीणामयुतानि च । वाद्यमानान्यरोचन्त मेघशब्दो यथा दिवि ॥

tatastūryasahasrāṇi bherīṇāmayutāni ca | vādyamānānyarocanta meghaśabdo yathā divi

तब हजारों तुरहियाँ और दसियों हजार भेरियाँ बजीं और आकाश में मेघगर्जन के समान गूँज उठीं।

श्लोक 24 (8.30.24)

प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं रथस्थो रथसत्तमः । अभ्यभाषत राधेयः शल्यं युद्धविशारदम् ॥

pratigṛhya tu tadvākyaṃ rathastho rathasattamaḥ | abhyabhāṣata rādheyaḥ śalyaṃ yuddhaviśāradam

उन वचनों को ग्रहण करके रथ पर खड़े रथियों में श्रेष्ठ राधेय ने युद्ध-कुशल शल्य से कहा।

कर्ण उवाच

श्लोक 25 (8.30.25)

चोदयाश्वान्महाबाहो यावद्धन्मि धनञ्जयम् । भीमसेनं यमौ चोभौ राजानं च युधिष्ठिरम् ॥

codayāśvānmahābāho yāvaddhanmi dhanañjayam | bhīmasenaṃ yamau cobhau rājānaṃ ca yudhiṣṭhiram

हे महाबाहो! घोड़ों को हाँकिए, जिससे मैं धनञ्जय, भीमसेन, दोनों जुड़वाँ भाइयों और राजा युधिष्ठिर को मार सकूँ।

श्लोक 26 (8.30.26)

अद्य पश्यतु मे शल्य बाहुवीर्यं धनञ्जयः । अस्यतः कङ्कपत्राणां सहस्राणि शतानि च ॥

adya paśyatu me śalya bāhuvīryaṃ dhanañjayaḥ | asyataḥ kaṅkapatrāṇāṃ sahasrāṇi śatāni ca

हे शल्य! आज धनञ्जय मेरे बाहुबल को देखे, जब मैं सैकड़ों-हजारों कंकपत्र वाले बाण छोड़ूँगा।

श्लोक 27 (8.30.27)

अद्य क्षेप्स्याम्यहं शल्य शरान्परमतेजनान् । पाण्डवानां विनाशाय दुर्योधनजयाय च ॥

adya kṣepsyāmyahaṃ śalya śarānparamatejanān | pāṇḍavānāṃ vināśāya duryodhanajayāya ca

हे शल्य! आज मैं पाण्डवों के विनाश और दुर्योधन की विजय के लिए अत्यन्त तीक्ष्ण बाण छोड़ूँगा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 28 (8.30.28)

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य शल्यः कर्णं वचोऽब्रवीत् । कथं नु तान्महावीर्यान्पाण्डवानवमन्यसे ॥

etacchrutvā vacastasya śalyaḥ karṇaṃ vaco'bravīt | kathaṃ nu tānmahāvīryānpāṇḍavānavamanyase

उसके वचन सुनकर शल्य ने कर्ण से कहा—“तुम उन महापराक्रमी पाण्डवों का अपमान कैसे करते हो,

शल्य उवाच

श्लोक 29 (8.30.29)

सर्वास्त्रज्ञान्महेष्वासान्सर्वानेव महाबलान् । अनिवर्तिनो महाभागानजय्यान्सत्यविक्रमान् । अपि सञ्जनयेयुर्ये भयं साक्षाच्छतक्रतोः ॥

sarvāstrajñānmaheṣvāsānsarvāneva mahābalān | anivartino mahābhāgānajayyānsatyavikramān | api sañjanayeyurye bhayaṃ sākṣācchatakratoḥ

जो सब अस्त्रों के ज्ञाता, महाधनुर्धर, महाबली, पीछे न हटने वाले, महाभाग, अजेय और सत्य पराक्रम वाले हैं, जो साक्षात् शतक्रतु (इन्द्र) में भी भय उत्पन्न कर सकते हैं?

श्लोक 30 (8.30.30)

यदा श्रोष्यसि निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । राधेय पार्थधनुषस्तदा नैवं वदिष्यसि ॥

yadā śroṣyasi nirghoṣaṃ visphūrjitamivāśaneḥ | rādheya pārthadhanuṣastadā naivaṃ vadiṣyasi

हे राधेय! जब तुम पार्थ के धनुष की वज्र जैसी टंकार सुनोगे, तब ऐसा नहीं कहोगे।

श्लोक 31 (8.30.31)

यदा द्रक्ष्यसि भीमेन कुञ्जरानीकमाहवे । विशीर्णदन्तं निहतं तदा नैवं वदिष्यसि ॥

yadā drakṣyasi bhīmena kuñjarānīkamāhave | viśīrṇadantaṃ nihataṃ tadā naivaṃ vadiṣyasi

जब तुम युद्ध में भीम के हाथों मारी गई, टूटे दाँतों वाली गजसेना को देखोगे, तब ऐसा नहीं कहोगे।

श्लोक 32 (8.30.32)

यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे धर्मपुत्रं यमौ तथा । शितैः पृषत्कैः कुर्वाणानभ्रच्छायामिवाम्बरे ॥

yadā drakṣyasi saṅgrāme dharmaputraṃ yamau tathā | śitaiḥ pṛṣatkaiḥ kurvāṇānabhracchāyāmivāmbare

जब तुम युद्ध में धर्मपुत्र को और दोनों जुड़वाँ भाइयों को तीखे बाणों से आकाश में बादलों की छाया-सी रचते देखोगे,

श्लोक 33 (8.30.33)

अस्यतः क्षिण्वतश्चारीँल्लघुहस्तान्दुरासदान् । पार्थिवानपि चान्यांस्त्वं तदा नैवं वदिष्यसि ॥

asyataḥ kṣiṇvataścārīm̐llaghuhastāndurāsadān | pārthivānapi cānyāṃstvaṃ tadā naivaṃ vadiṣyasi

जब वे शत्रुओं को बाण मारते और गिराते हैं—फुर्तीले हाथों वाले और दुर्जेय—और दूसरे राजाओं को भी, तब तुम ऐसा नहीं कहोगे।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 34 (8.30.34)

अनादृत्य तु तद्वाक्यं मद्रराजेन भाषितम् । द्रक्ष्यस्यद्येत्यवोचत्तं शल्यं कर्णो जनेश्वर ॥

anādṛtya tu tadvākyaṃ madrarājena bhāṣitam | drakṣyasyadyetyavocattaṃ śalyaṃ karṇo janeśvara

मद्रराज के कहे उन वचनों की उपेक्षा करके कर्ण ने, हे राजन्! शल्य से कहा—“आज देख लेना।”

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