कर्ण पर्व · अध्याय 31
कर्ण की डींग और शल्य का उपहास
अपशकुनों के बीच कर्ण युद्ध के लिए निकलता है और भाग्य से मोहित कौरव उसका जयघोष करते हैं। वह शल्य से कहता है कि द्रोण के गिर जाने पर वह अर्जुन से लड़ेगा और या तो उसे मारेगा या द्रोण के पीछे यम के पास जाएगा। शल्य हँसकर उसकी डींग का उपहास करते हैं और अर्जुन के पराक्रम तथा कर्ण के पहले के पलायन याद दिलाते हैं; कर्ण क्रुद्ध होकर उत्तर देता है, और फिर दोनों पाण्डव-सेना की ओर बढ़ते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.31.1)
दृष्ट्वा कर्णं महावीर्यं युयुत्सुं समास्थितम् । चुक्रुशुः कुरवः सर्वे हृष्टरूपाः समन्ततः ॥
dṛṣṭvā karṇaṃ mahāvīryaṃ yuyutsuṃ samāsthitam | cukruśuḥ kuravaḥ sarve hṛṣṭarūpāḥ samantataḥ
महावीर कर्ण को युद्ध के लिए उत्सुक खड़ा देखकर सब कौरव हर्ष से खिले मुख लिए चारों ओर जयघोष करने लगे।
श्लोक 2 (8.31.2)
ततो दुन्दुभिनिर्घोषैर्भेरीणां निनदेन च । कोणशब्दैश्च विविधैर्गर्जितैश्च तरस्विनाम् । निर्ययुस्तावकाः सर्वे मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥
tato dundubhinirghoṣairbherīṇāṃ ninadena ca | koṇaśabdaiśca vividhairgarjitaiśca tarasvinām | niryayustāvakāḥ sarve mṛtyuṃ kṛtvā nivartanam
तब दुन्दुभियों के घोष, भेरियों के नाद, कोणों (वाद्य बजाने की डंडियों) की अनेक ध्वनियों और वीरों की हुंकारों के बीच आपके सब योद्धा मृत्यु को ही लौटने की सीमा बनाकर निकल पड़े।
श्लोक 3 (8.31.3)
प्रयाते तु ततः कर्णे रथेषु मुदितेषु च । चचाल च मही सर्वा ररास च सुविस्वरम् ॥
prayāte tu tataḥ karṇe ratheṣu muditeṣu ca | cacāla ca mahī sarvā rarāsa ca suvisvaram
जब कर्ण ने प्रस्थान किया और रथों में बैठे योद्धा हर्षित थे, तब सारी पृथ्वी काँप उठी और बेसुरी, कर्कश ध्वनि से चीख उठी।
श्लोक 4 (8.31.4)
निःसरन्तो व्यदृश्यन्त सूर्यात्सप्ता महाग्रहाः ॥
niḥsaranto vyadṛśyanta sūryātsaptā mahāgrahāḥ
सूर्य से सात महाग्रह निकलते हुए दिखाई दिए।
श्लोक 5 (8.31.5)
उल्कापाताश्च संजज्ञुर्दिग्दाहाश्चैव दारुणाः । तथाशन्यश्च संपेतुर्ववुर्वाताश्च भैरवाः ॥
ulkāpātāśca saṃjajñurdigdāhāścaiva dāruṇāḥ | tathāśanyaśca saṃpeturvavurvātāśca bhairavāḥ
उल्कापात हुए और दिशाओं में भयंकर दाह फैल उठा; वज्र आकर गिरने लगे और भीषण हवाएँ चलीं।
श्लोक 6 (8.31.6)
मृगपक्षिगणाश्चैव पृतनां बहुशस्तव । अपसव्यं तदा चक्रुर्वेदयन्तो महाभयम् ॥
mṛgapakṣigaṇāścaiva pṛtanāṃ bahuśastava | apasavyaṃ tadā cakrurvedayanto mahābhayam
पशुओं और पक्षियों के झुंड बार-बार आपकी सेना की अशुभ (अपसव्य) दिशा से परिक्रमा करने लगे, मानो महान् भय की सूचना दे रहे हों।
श्लोक 7 (8.31.7)
प्रस्थितस्य च कर्णस्य निपेतुस्तुरगा भुवि । अस्थिवर्षं च पतितमन्तरिक्षाद्भयानकम् ॥
prasthitasya ca karṇasya nipetusturagā bhuvi | asthivarṣaṃ ca patitamantarikṣādbhayānakam
कर्ण के प्रस्थान करते ही उसके घोड़े धरती पर गिर पड़े और आकाश से हड्डियों की भयानक वर्षा हुई।
श्लोक 8 (8.31.8)
जज्वलुश्चैव शस्त्राणि ध्वजाश्चैव चकम्पिरे । अश्रूणि च व्यमुञ्चन्त वाहनानि विशांपते ॥
jajvaluścaiva śastrāṇi dhvajāścaiva cakampire | aśrūṇi ca vyamuñcanta vāhanāni viśāṃpate
शस्त्र जल उठे, ध्वज काँपने लगे और वाहन (घोड़े-हाथी आदि) आँसू बहाने लगे, हे राजन्।
श्लोक 9 (8.31.9)
एते चान्ये च बहव उत्पातास्तत्र मारिष । समुत्पेतुर्विनाशाय कौरवाणां सुदारुणाः ॥
ete cānye ca bahava utpātāstatra māriṣa | samutpeturvināśāya kauravāṇāṃ sudāruṇāḥ
हे मान्यवर, ये और इनके अतिरिक्त और भी अनेक अत्यन्त भयंकर उत्पात वहाँ कौरवों के विनाश के लिए प्रकट हुए।
श्लोक 10 (8.31.10)
न च तान्गणयामासुः सर्वे दैवेन मोहिताः । प्रस्थितं सूतपुत्रं च जयेत्यूचुर्नराधिपाः ॥
na ca tāngaṇayāmāsuḥ sarve daivena mohitāḥ | prasthitaṃ sūtaputraṃ ca jayetyūcurnarādhipāḥ
पर भाग्य से मोहित हुए सबने इन अपशकुनों की ओर ध्यान ही नहीं दिया; प्रस्थान करते हुए सूतपुत्र को राजा लोग "जय हो" कहकर पुकारने लगे।
श्लोक 11 (8.31.11)
शल्येन सहितं दृष्ट्वा कर्णमाहवशोभिनम् । निर्जितान्पाण्डवांश्चैव मेनिरे तत्र कौरवाः ॥
śalyena sahitaṃ dṛṣṭvā karṇamāhavaśobhinam | nirjitānpāṇḍavāṃścaiva menire tatra kauravāḥ
युद्ध की शोभा कर्ण को शल्य के साथ देखकर वहाँ कौरवों ने पाण्डवों को पहले ही पराजित मान लिया।
श्लोक 12 (8.31.12)
ततो रथस्थः परवीरहन्ता भीष्मद्रोणावतिवीर्यौ समीक्ष्य । समुज्ज्वलन्भास्करपावकाभो वैकर्तनोऽसौ रथकुञ्जरो वृषः ॥
tato rathasthaḥ paravīrahantā bhīṣmadroṇāvativīryau samīkṣya | samujjvalanbhāskarapāvakābho vaikartano'sau rathakuñjaro vṛṣaḥ
तब शत्रुवीरों का संहार करने वाला वह रथियों में गजराज वैकर्तन कर्ण, जिसे वृष भी कहते हैं, रथ पर खड़ा हुआ सूर्य और अग्नि के समान जगमगाता हुआ अत्यन्त पराक्रमी भीष्म और द्रोण का स्मरण करने लगा।
श्लोक 13 (8.31.13)
स शल्यमाभाष्य जगाद वाक्यं पार्थस्य दृष्ट्वाऽप्रतिमं च कर्म । मानेन दर्पेण विदह्यमानः क्रोधेन दीप्यन्निव निःश्वसंश्च ॥
sa śalyamābhāṣya jagāda vākyaṃ pārthasya dṛṣṭvā'pratimaṃ ca karma | mānena darpeṇa vidahyamānaḥ krodhena dīpyanniva niḥśvasaṃśca
पार्थ का अनुपम पराक्रम देखकर, मान और दर्प से जलता हुआ, मानो क्रोध से दहकता और लम्बी साँसें लेता हुआ वह शल्य को सम्बोधित करके बोला:
कर्ण उवाच
श्लोक 14 (8.31.14)
नाहं महेन्द्रादपि वज्रपाणेः क्रुद्धाद्विभेम्यात्तधनू रथस्थः । दृष्ट्वाऽपि भीष्मप्रमुखाञ्शयानान्नत्वेव मां सा स्थिरता जहाति ॥
nāhaṃ mahendrādapi vajrapāṇeḥ kruddhādvibhemyāttadhanū rathasthaḥ | dṛṣṭvā'pi bhīṣmapramukhāñśayānānnatveva māṃ sā sthiratā jahāti
मैं धनुष हाथ में लेकर रथ पर खड़ा हूँ; तब वज्रधारी महेन्द्र भी क्रुद्ध होकर आए तो उनसे मुझे भय नहीं लगता। भीष्म आदि को भूमि पर पड़ा देखकर भी मेरी वह दृढ़ता मुझे नहीं छोड़ती।
श्लोक 15 (8.31.15)
महेन्द्रविष्णुप्रतिमावनिन्दितौ रथाश्वनागप्रवरप्रमाथिनौ । अवध्यकल्पौ निहतौ यदा परैस्तथापि मे नास्ति रणेऽद्य साध्वसम् ॥
mahendraviṣṇupratimāvaninditau rathāśvanāgapravarapramāthinau | avadhyakalpau nihatau yadā paraistathāpi me nāsti raṇe'dya sādhvasam
महेन्द्र और विष्णु के समान, निन्दारहित, श्रेष्ठ रथों, घोड़ों और हाथियों को कुचल डालने वाले वे दोनों लगभग अवध्य थे; फिर भी शत्रुओं ने उन्हें मार गिराया, तब भी आज मुझे युद्ध में कोई भय नहीं है।
श्लोक 16 (8.31.16)
समीक्ष्य सङ्ख्येऽतिबलान्नराधिपान् ससूतमातङ्गरथान्परैर्हतान् । कथं न सर्वानहितान्रणेऽवधीन्महास्त्रविद्ब्राह्मणपुङ्गवो गुरुः ॥
samīkṣya saṅkhye'tibalānnarādhipān sasūtamātaṅgarathānparairhatān | kathaṃ na sarvānahitānraṇe'vadhīnmahāstravidbrāhmaṇapuṅgavo guruḥ
प्रबल राजाओं को सारथियों, हाथियों और रथों सहित शत्रुओं के हाथों मरा देखकर भी महान् अस्त्रवेत्ता, ब्राह्मणश्रेष्ठ आचार्य ने रण में अपने सब शत्रुओं का संहार क्यों नहीं कर डाला?
श्लोक 17 (8.31.17)
स संस्मरन्द्रोणमहं महाहवे ब्रवीमि सत्यं कुरवो निबोधत । न वो मदन्यः प्रसहेद्रणेऽर्जुनं समागतं मृत्युमिवोग्ररूपिणम् ॥
sa saṃsmarandroṇamahaṃ mahāhave bravīmi satyaṃ kuravo nibodhata | na vo madanyaḥ prasahedraṇe'rjunaṃ samāgataṃ mṛtyumivograrūpiṇam
इस महायुद्ध में द्रोण का स्मरण करते हुए मैं सत्य कहता हूँ, कौरवो, सुनो: मृत्यु के समान भयंकर रूप से आते हुए अर्जुन का सामना रण में तुममें मेरे सिवा कोई नहीं कर सकता।
श्लोक 18 (8.31.18)
शिक्षा प्रसादश्च बलं धृतिश्च द्रोणे महास्त्राणि च संनतिश्च । स चेदगान्मृत्युवशं महात्मा सर्वानन्यानातुरानद्य मन्ये ॥
śikṣā prasādaśca balaṃ dhṛtiśca droṇe mahāstrāṇi ca saṃnatiśca | sa cedagānmṛtyuvaśaṃ mahātmā sarvānanyānāturānadya manye
शिक्षा, प्रसन्नता, बल, धैर्य, महान् अस्त्र और विनय, ये सब द्रोण में थे। यदि वे महात्मा भी मृत्यु के वश में चले गए, तो आज मैं और सबको असहाय ही मानता हूँ।
श्लोक 19 (8.31.19)
नेह ध्रुवं किंचिदपि प्रचिन्तयन् वदामि लोके कर्मणो नित्ययोगात् । सूर्योदये को हि विमुक्तसंशयो भावं कुर्वीताद्य गुरौ निपातिते ॥
neha dhruvaṃ kiṃcidapi pracintayan vadāmi loke karmaṇo nityayogāt | sūryodaye ko hi vimuktasaṃśayo bhāvaṃ kurvītādya gurau nipātite
सोचकर मैं कहता हूँ कि इस लोक में कुछ भी स्थिर नहीं है, क्योंकि कर्म का क्रम निरन्तर चलता रहता है। आज सूर्योदय के समय, गुरु के गिर जाने पर, कौन संशयरहित होकर किसी बात पर भरोसा बाँध सकता है?
श्लोक 20 (8.31.20)
न नूनमस्त्राणि बलं पराक्रमः क्रियाः सुनीतं परमायुधानि वा । अलं मनुष्यस्य सुखाय वर्तितुं तथाहि युद्धे निहतः परैर्गुरुः ॥
na nūnamastrāṇi balaṃ parākramaḥ kriyāḥ sunītaṃ paramāyudhāni vā | alaṃ manuṣyasya sukhāya vartituṃ tathāhi yuddhe nihataḥ parairguruḥ
निश्चय ही अस्त्र, बल, पराक्रम, कुशल कर्म, उत्तम नीति और श्रेष्ठ शस्त्र भी मनुष्य को सुख देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि गुरु द्रोण युद्ध में शत्रुओं के हाथों मारे गए।
श्लोक 21 (8.31.21)
हुताशनादित्यसमानतेजसं पराक्रमे विष्णुपुरंदरोपमम् । नये बृहस्पत्युशनःसमं सदा न चैनमस्त्रं तदुपास्त दुःसहम् ॥
hutāśanādityasamānatejasaṃ parākrame viṣṇupuraṃdaropamam | naye bṛhaspatyuśanaḥsamaṃ sadā na cainamastraṃ tadupāsta duḥsaham
जिनका तेज अग्नि और सूर्य के समान था, पराक्रम में जो विष्णु और इन्द्र के तुल्य थे और नीति में सदा बृहस्पति तथा शुक्र के बराबर थे, उनके भी काम वह दुःसह अस्त्र नहीं आया।
श्लोक 22 (8.31.22)
संप्रक्रुष्टे रुदितस्त्रीकुमारे पराभूते पौरुषे धार्तराष्ट्रे । कृत्यं मया नाद्य जानामि शल्य प्रयाहि तस्माद्विषतामनीकम् ॥
saṃprakruṣṭe ruditastrīkumāre parābhūte pauruṣe dhārtarāṣṭre | kṛtyaṃ mayā nādya jānāmi śalya prayāhi tasmādviṣatāmanīkam
स्त्रियाँ और बालक रोते-चीखते हैं और धृतराष्ट्र के पुत्रों का पौरुष दब गया है; शल्य, आज मुझे अपने लिए कोई और कर्तव्य नहीं सूझता। इसलिए शत्रुओं की सेना की ओर चलो।
श्लोक 23 (8.31.23)
स यत्र राजा पाण्डवः सत्यसन्धो व्यवस्थितो भीमसेनार्जुनौ च । स वासुदेवः सात्यकिः सृञ्जयाश्च यमौ च कस्तान्विषहेन्मदन्यः ॥
sa yatra rājā pāṇḍavaḥ satyasandho vyavasthito bhīmasenārjunau ca | sa vāsudevaḥ sātyakiḥ sṛñjayāśca yamau ca kastānviṣahenmadanyaḥ
जहाँ सत्यप्रतिज्ञ राजा पाण्डव युधिष्ठिर भीमसेन और अर्जुन के साथ डटे हैं, जहाँ वासुदेव, सात्यकि, सृंजय और दोनों जुड़वाँ भाई हैं, वहाँ मेरे सिवा उनका सामना कौन कर सकता है?
श्लोक 24 (8.31.24)
तस्मात्क्षिप्रं मद्रपते प्रयाहि रणे पाञ्चालान्पाण्डवान्सृञ्जयांश्च । तान्वा हनिष्यामि समेत्य सङ्ख्ये यास्यामि वा द्रोणमुखो यमाय ॥
tasmātkṣipraṃ madrapate prayāhi raṇe pāñcālānpāṇḍavānsṛñjayāṃśca | tānvā haniṣyāmi sametya saṅkhye yāsyāmi vā droṇamukho yamāya
इसलिए, मद्रराज, शीघ्र ही रण में पाञ्चालों, पाण्डवों और सृंजयों की ओर चलो। या तो मैं युद्ध में उनसे भिड़कर उन्हें मारूँगा, या द्रोण को आगे रखकर यमलोक चला जाऊँगा।
श्लोक 25 (8.31.25)
नत्वेवाहं न गमिष्यामि मध्ये तेषां शूराणामिति शल्याद्य विद्धि । मित्रद्रोहो मर्षणीयो न मेऽयं त्यक्त्वा प्राणाननुयास्यामि द्रोणम् ॥
natvevāhaṃ na gamiṣyāmi madhye teṣāṃ śūrāṇāmiti śalyādya viddhi | mitradroho marṣaṇīyo na me'yaṃ tyaktvā prāṇānanuyāsyāmi droṇam
शल्य, आज यह जान लो कि मैं उन शूरवीरों के बीच न जाऊँ, ऐसा नहीं हो सकता। मित्र के साथ यह द्रोह मुझसे सहा नहीं जाएगा; मैं प्राण त्यागकर द्रोण के पीछे जाऊँगा।
श्लोक 26 (8.31.26)
प्राज्ञस्य मूढस्य च जीवितान्ते नास्ति प्रमोक्षोऽन्तकसन्निभस्य । अतो विद्वन्नभियोत्स्यामि पार्थं दिष्टं न शक्यं व्यतिवर्तितुं वै ॥
prājñasya mūḍhasya ca jīvitānte nāsti pramokṣo'ntakasannibhasya | ato vidvannabhiyotsyāmi pārthaṃ diṣṭaṃ na śakyaṃ vyativartituṃ vai
चाहे ज्ञानी हो या मूढ़, जीवन के अन्त में मृत्यु-तुल्य काल से कोई नहीं बचता। इसलिए, हे विद्वान्, मैं पार्थ से युद्ध करूँगा; विधाता का लिखा टाला नहीं जा सकता।
श्लोक 27 (8.31.27)
कल्याणवृत्तः सततं हि राजा वैचित्रवीर्यस्य सुतो ममासीत् । तस्यार्थसिद्ध्यर्थमहं त्यजामि प्रियान्भोगान्दुस्त्यजं जीवितं च ॥
kalyāṇavṛttaḥ satataṃ hi rājā vaicitravīryasya suto mamāsīt | tasyārthasiddhyarthamahaṃ tyajāmi priyānbhogāndustyajaṃ jīvitaṃ ca
विचित्रवीर्य के पुत्र धृतराष्ट्र के पुत्र वह राजा सदा मेरे साथ भला व्यवहार करते रहे हैं। उनका प्रयोजन सिद्ध करने के लिए मैं प्रिय भोगों को और कठिनाई से छूटने वाले अपने प्राण को भी त्यागता हूँ।
श्लोक 28 (8.31.28)
वैयाघ्रचर्माणमकूजनाक्षं हैमं त्रिकोशं रजतत्रिवेणुम् । रथप्रवर्हं तुरगप्रवर्हैर्युक्तं प्रादान्मह्यमिमं हि रामः ॥
vaiyāghracarmāṇamakūjanākṣaṃ haimaṃ trikośaṃ rajatatriveṇum | rathapravarhaṃ turagapravarhairyuktaṃ prādānmahyamimaṃ hi rāmaḥ
व्याघ्रचर्म से ढका, बिना आवाज़ के घूमने वाली धुरियों वाला, सोने का बना, तीन कोशों और चाँदी की तीन बाँसों वाला, श्रेष्ठ घोड़ों से जुता हुआ यही श्रेष्ठ रथ मुझे परशुराम ने दिया था।
श्लोक 29 (8.31.29)
धनूंषि चित्राणि निरीक्ष्य शल्य ध्वजान्गदाः सायकांश्चोग्ररूपान् । असिं च दीप्तं परमायुधं च शङ्खं च शुभ्रं स्वनवन्तमुग्रम् ॥
dhanūṃṣi citrāṇi nirīkṣya śalya dhvajāngadāḥ sāyakāṃścograrūpān | asiṃ ca dīptaṃ paramāyudhaṃ ca śaṅkhaṃ ca śubhraṃ svanavantamugram
शल्य, देखो, ये रंग-बिरंगे धनुष, ध्वज, गदाएँ, भयंकर बाण, चमकती तलवार, यह परम शस्त्र और यह श्वेत, गूँजने वाला उग्र शंख।
श्लोक 30 (8.31.30)
पताकिनं वज्रनिपातनिःस्वनं सिताश्वयुक्तं शुभतूणशोभितम् । इमं समास्थाय रथर्षभं रणे दृढं हनिष्याम्यहमर्जुनं बलात् ॥
patākinaṃ vajranipātaniḥsvanaṃ sitāśvayuktaṃ śubhatūṇaśobhitam | imaṃ samāsthāya ratharṣabhaṃ raṇe dṛḍhaṃ haniṣyāmyahamarjunaṃ balāt
पताका से सुशोभित, वज्र गिरने जैसी घर्घर ध्वनि वाले, श्वेत घोड़ों से जुते और सुन्दर तूणीरों से सजे इस श्रेष्ठ रथ पर चढ़कर मैं रण में बलपूर्वक दृढ़ता से अर्जुन का वध करूँगा।
श्लोक 31 (8.31.31)
तं चेन्मृत्युः सर्वहरोऽभिरक्षेत्सदाऽप्रमत्तः समरे पाण्डुपुत्रम् । तं वा हनिष्यामि रणे समेत्य यास्यामि वा द्रोणमुखो यमाय ॥
taṃ cenmṛtyuḥ sarvaharo'bhirakṣetsadā'pramattaḥ samare pāṇḍuputram | taṃ vā haniṣyāmi raṇe sametya yāsyāmi vā droṇamukho yamāya
यदि सबको हर लेने वाली मृत्यु भी सदा सावधान रहकर रण में उस पाण्डुपुत्र की रक्षा करे, तो भी मैं उससे भिड़कर उसे मारूँगा, अथवा द्रोण को आगे करके यम के पास चला जाऊँगा।
श्लोक 32 (8.31.32)
यमवारुणकुबेरवासवा वा यदि युगपत्सगणा महाहवे । जुगुपुरिह समेत्य फल्गुनं किमु बहुना सह तैर्जयामि तम् ॥
yamavāruṇakuberavāsavā vā yadi yugapatsagaṇā mahāhave | jugupuriha sametya phalgunaṃ kimu bahunā saha tairjayāmi tam
यदि यम, वरुण, कुबेर और इन्द्र अपने-अपने गणों सहित इस महायुद्ध में एक साथ आकर फल्गुन की रक्षा करें, तो अधिक कहने से क्या? मैं उनके साथ ही उसे जीत लूँगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 33 (8.31.33)
इति रणरभसस्य कत्थतस्तदुपनिशम्य वचः स मद्रराट् । अवहसदवमन्य वीर्यवान् प्रतिषिषिधे च जगाद चोत्तरम् ॥
iti raṇarabhasasya katthatastadupaniśamya vacaḥ sa madrarāṭ | avahasadavamanya vīryavān pratiṣiṣidhe ca jagāda cottaram
युद्ध के लिए उतावले कर्ण की यह डींग सुनकर पराक्रमी मद्रराज ने हँसकर उसका तिरस्कार किया, उसे रोका और उत्तर दिया:
शल्य उवाच
श्लोक 34 (8.31.34)
विरम विरम कर्ण कत्थनादतिरभसोऽप्यतिवाचमुक्तवान् । क्व च हि नरवरो धनंजयः क्व पुनरिह त्वमहो नराधमः ॥
virama virama karṇa katthanādatirabhaso'pyativācamuktavān | kva ca hi naravaro dhanaṃjayaḥ kva punariha tvamaho narādhamaḥ
कर्ण, बस करो, बस करो अपनी डींग! तुम बहुत उतावले हो और तुमने बहुत अधिक बक दिया। कहाँ नरश्रेष्ठ धनंजय, और कहाँ यहाँ तुम, अरे अधम पुरुष!
श्लोक 35 (8.31.35)
यदुसदनमुपेन्द्रपालितं त्रिदिवमिवामरराजरक्षितम् । प्रसभमतिविलोड्य को हरेत्पुरुषवरावरजामृतेऽर्जुनात् ॥
yadusadanamupendrapālitaṃ tridivamivāmararājarakṣitam | prasabhamativiloḍya ko haretpuruṣavarāvarajāmṛte'rjunāt
यादवों का भवन उपेन्द्र (कृष्ण) से वैसे ही रक्षित था जैसे स्वर्ग देवराज से। अर्जुन को छोड़कर कौन बलपूर्वक उसे उथल-पुथल करके पुरुषश्रेष्ठ कृष्ण की छोटी बहन का हरण कर सकता था?
श्लोक 36 (8.31.36)
त्रिभुवनसृजमीश्वरेश्वरं क इह पुमान्भवमाह्वयेद्युधि । मृगवधकलहे ऋतेऽर्जुनात् सुरपतिवीर्यसमप्रभावतः ॥
tribhuvanasṛjamīśvareśvaraṃ ka iha pumānbhavamāhvayedyudhi | mṛgavadhakalahe ṛte'rjunāt surapativīryasamaprabhāvataḥ
देवराज के समान प्रभाव वाले अर्जुन को छोड़कर कौन पुरुष मृग-वध के झगड़े में तीनों लोकों के रचयिता, ईश्वरों के भी ईश्वर भव (शिव) को युद्ध के लिए ललकार सकता था?
श्लोक 37 (8.31.37)
असुरसुरमहोरगान्नरान् गरुडपिशाचसयक्षराक्षसान् । इषुभिरजयदग्निगौरवात् स्वभिलषितं च हविर्ददौ जयः ॥
asurasuramahoragānnarān garuḍapiśācasayakṣarākṣasān | iṣubhirajayadagnigauravāt svabhilaṣitaṃ ca havirdadau jayaḥ
अग्नि के प्रति गौरव से जय (अर्जुन) ने अपने बाणों से असुरों, देवताओं, महानागों, मनुष्यों, गरुड़ों, पिशाचों, यक्षों और राक्षसों को जीता और अग्नि को उसकी मनचाही हवि प्रदान की।
श्लोक 38 (8.31.38)
स्मरसि ननु यदा परैर्हृतः सहधृतराष्ट्रसुतो विमोक्षितः । अधिरथज नरोत्तमैर्युतान् कुरुषु बहून्विनिहत्य तानरीन् ॥
smarasi nanu yadā parairhṛtaḥ sahadhṛtarāṣṭrasuto vimokṣitaḥ | adhirathaja narottamairyutān kuruṣu bahūnvinihatya tānarīn
अधिरथ के पुत्र, क्या तुम्हें याद नहीं, जब शत्रुओं द्वारा धृतराष्ट्र-पुत्र के साथ वह हर लिया गया था और फिर छुड़ाया गया, जब नरश्रेष्ठों ने कौरवों के बीच उन बहुत-से शत्रुओं को मारा था?
श्लोक 39 (8.31.39)
प्रथममपि पलायिते त्वयि प्रियकलहा धृतराष्ट्रसूनवः । स्मरसि ननु यदा प्रमोचिताः खचरगणानवजित्य पाण्डवैः ॥
prathamamapi palāyite tvayi priyakalahā dhṛtarāṣṭrasūnavaḥ | smarasi nanu yadā pramocitāḥ khacaragaṇānavajitya pāṇḍavaiḥ
जब तुम पहले ही भाग खड़े हुए थे, तब कलह-प्रिय धृतराष्ट्र-पुत्रों को पाण्डवों ने आकाशचारी गन्धर्वगण को जीतकर छुड़ाया था। क्या तुम्हें याद नहीं?
श्लोक 40 (8.31.40)
समुदितबलवाहनाः पुनः पुरुषवरेण जिताः स्थ गोग्रहे । सगुरुगुरुसुताः सभीष्मकाः किमु न जितः स तदा त्वयाऽर्जुनः ॥
samuditabalavāhanāḥ punaḥ puruṣavareṇa jitāḥ stha gograhe | sagurugurusutāḥ sabhīṣmakāḥ kimu na jitaḥ sa tadā tvayā'rjunaḥ
फिर गोहरण के समय सब सेना और वाहनों सहित एकत्र होने पर भी तुम सब, द्रोण, अश्वत्थामा और भीष्म के साथ, उस पुरुषश्रेष्ठ से हार गए थे। तब तुमने अर्जुन को क्यों नहीं जीत लिया?
श्लोक 41 (8.31.41)
इदमपरमुपस्थितं पुनस्तव निधनाय सुयुद्धमद्य वै । यदि न रिपुभयात्पलायसे समरगतोऽद्य हतोऽसि सूतज ॥
idamaparamupasthitaṃ punastava nidhanāya suyuddhamadya vai | yadi na ripubhayātpalāyase samaragato'dya hato'si sūtaja
यह एक और घमासान युद्ध अब तुम्हारे सामने है, जो तुम्हारे विनाश का कारण बनेगा। यदि तुम शत्रु के भय से भाग न गए, तो हे सूतपुत्र, आज रण में मारे जाओगे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 42 (8.31.42)
इति बहुपरुषं प्रभाषति प्रमनसि मद्रपतौ रिपुस्तवम् । भृशमभिरुषितः परंतपः कुरुपृतनापतिराह मद्रपम् ॥
iti bahuparuṣaṃ prabhāṣati pramanasi madrapatau ripustavam | bhṛśamabhiruṣitaḥ paraṃtapaḥ kurupṛtanāpatirāha madrapam
जब प्रसन्नचित्त मद्रराज इस प्रकार कठोर शब्दों में शत्रु की स्तुति करते हुए बोल रहे थे, तब शत्रुओं को तपाने वाले कुरुसेनापति कर्ण ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर मद्रराज से कहा:
कर्ण उवाच
श्लोक 43 (8.31.43)
भवतु भवतु किं विकत्थसे ननु मम तस्य हि युद्धमुद्यतम् । यदि स जयति मामिहाहवे तत इदमस्तु सुकत्थितं तव ॥
bhavatu bhavatu kiṃ vikatthase nanu mama tasya hi yuddhamudyatam | yadi sa jayati māmihāhave tata idamastu sukatthitaṃ tava
बस, बस! क्यों डींग हाँकते हो? उसके साथ मेरा युद्ध तो ठन ही चुका है। यदि वह इस युद्ध में मुझे जीत ले, तब तुम्हारी यह बड़ी-बड़ी बातें ठीक कही गई समझी जाएँगी।
सञ्जय उवाच
श्लोक 44 (8.31.44)
एवमस्त्विति मद्रेश उक्त्वा नोत्तरमुक्तवान् । याहि शल्येति चाप्येनं कर्णः प्राह युयुत्सया ॥
evamastviti madreśa uktvā nottaramuktavān | yāhi śalyeti cāpyenaṃ karṇaḥ prāha yuyutsayā
मद्रराज "ऐसा ही हो" कहकर चुप हो गए, आगे कुछ नहीं बोले; तब युद्ध की इच्छा से कर्ण ने उनसे कहा, "चलो शल्य।"
श्लोक 45 (8.31.45)
स रथः प्रययौ शत्रून्निघ्नतः शल्यसारथिः । निघ्नन्नमित्रान्समरे तमोघ्नः सविता यथा ॥
sa rathaḥ prayayau śatrūnnighnataḥ śalyasārathiḥ | nighnannamitrānsamare tamoghnaḥ savitā yathā
शल्य जिसके सारथि थे, वह रथ शत्रुओं पर टूट पड़ा और रण में शत्रुओं को मारता हुआ ऐसे आगे बढ़ा जैसे अन्धकार हरने वाला सूर्य।
श्लोक 46 (8.31.46)
ततः प्रायात्प्रीतिमान्वै रथेन वैयाघ्रेण श्वेतयुजाऽथ कर्णः । स चालोक्य ध्वजिनीं पाण्डवानां धनंजयं त्वरया पर्यपृच्छत् ॥
tataḥ prāyātprītimānvai rathena vaiyāghreṇa śvetayujā'tha karṇaḥ | sa cālokya dhvajinīṃ pāṇḍavānāṃ dhanaṃjayaṃ tvarayā paryapṛcchat
तब प्रसन्न कर्ण व्याघ्रचर्म से ढके, श्वेत घोड़ों से जुते रथ में आगे बढ़ा; पाण्डवों की सेना को देखकर उसने उतावली से धनंजय के विषय में पूछा।