कर्ण पर्व · अध्याय 39
शल्य द्वारा कर्ण को अर्जुन के आगमन की चेतावनी
कर्ण धृष्टद्युम्न द्वारा रक्षित पाण्डव-व्यूह की ओर रथ बढ़ाता है। शल्य भयंकर अपशकुन गिनाता है और विपक्ष में खड़े अर्जुन, कृष्ण, भीम, युधिष्ठिर, नकुल-सहदेव तथा द्रौपदी के पुत्रों को दिखाकर कहता है कि अर्जुन को जीता नहीं जा सकता। कर्ण क्रुद्ध होकर उत्तर देता है कि अर्जुन संशप्तकों से घिरा हुआ है। उन दोनों के बात करते-करते दोनों सेनाएँ गंगा-यमुना की भाँति आपस में टकरा गईं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.39.1)
ततः परानीकभिदं व्यूहमप्रतिमं कृतम् । समीक्ष्य कर्णः पार्थानां धृष्टद्युम्नाभिरक्षितम् ॥
tataḥ parānīkabhidaṃ vyūhamapratimaṃ kṛtam | samīkṣya karṇaḥ pārthānāṃ dhṛṣṭadyumnābhirakṣitam
तब शत्रु-सेना को भेदने के लिए रचे गए, धृष्टद्युम्न से रक्षित पाण्डवों के अनुपम व्यूह को देखकर कर्ण
श्लोक 2 (8.39.2)
प्रययौ रथघोषेण सिंहनादरवेण च । वादित्राणां च निनदैः कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥
prayayau rathaghoṣeṇa siṃhanādaraveṇa ca | vāditrāṇāṃ ca ninadaiḥ kampayanniva medinīm
रथ की घरघराहट, सिंहनाद और वाद्यों की ध्वनि के साथ, मानो पृथ्वी को कँपाता हुआ, आगे बढ़ा।
श्लोक 3 (8.39.3)
ततः प्रयान्तं राधेयं मद्रराजः स्मयन्निव । अवधूय इदं वाक्यमब्रवीत्कुरुसन्निधौ ॥
tataḥ prayāntaṃ rādheyaṃ madrarājaḥ smayanniva | avadhūya idaṃ vākyamabravītkurusannidhau
तब आगे बढ़ते हुए राधेय से, कौरवों के सामने, मद्रराज ने कुछ मुस्कराकर, हाथ झटकते हुए यह बात कही।
शल्य उवाच
श्लोक 4 (8.39.4)
चमूं तवेमां विपुलां समृद्धा- । मसङ्ख्येयामश्वनराकुलां च । तथा प्रवेष्टा समरे धनञ्जयः । कक्षं दहन्दीप्त इवाश्रयाशी ॥
camūṃ tavemāṃ vipulāṃ samṛddhā- | masaṅkhyeyāmaśvanarākulāṃ ca | tathā praveṣṭā samare dhanañjayaḥ | kakṣaṃ dahandīpta ivāśrayāśī
तुम्हारी इस विशाल, समृद्ध, असंख्य, घोड़ों और मनुष्यों से भरी सेना में धनञ्जय युद्ध में वैसे ही घुसेगा जैसे धधकती आग सूखी घास-फूस में घुसती है।
श्लोक 5 (8.39.5)
रथे स्थितौ वीरवरौ वरेण्यौ । सिंहस्कन्धौ लोहितपद्मनेत्रौ । द्रष्टा भवानद्य विना प्रयत्ना- । त्तथाहि मे शकुना वेदयन्ति ॥
rathe sthitau vīravarau vareṇyau | siṃhaskandhau lohitapadmanetrau | draṣṭā bhavānadya vinā prayatnā- | ttathāhi me śakunā vedayanti
सिंह जैसे कन्धों और लाल कमल जैसे नेत्रों वाले दो श्रेष्ठ, वरेण्य वीर एक रथ पर खड़े हैं; आज तुम उन्हें बिना प्रयत्न के देख लोगे, क्योंकि मुझे शकुन ऐसा ही बता रहे हैं।
श्लोक 6 (8.39.6)
अद्य द्रष्टाऽसि तं वीरं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् । निघ्नन्तं शात्रवान्सङ्ख्ये यं कर्ण परिपृच्छसि ॥
adya draṣṭā'si taṃ vīraṃ śvetāśvaṃ kṛṣṇasārathim | nighnantaṃ śātravānsaṅkhye yaṃ karṇa paripṛcchasi
कर्ण, जिसके विषय में तुम पूछते रहते हो, उस श्वेत अश्वों वाले, कृष्ण-सारथि वीर को आज तुम युद्ध में शत्रुओं को मारते हुए देखोगे।
श्लोक 7 (8.39.7)
अद्य तौ पुरुषव्याघ्रौ लोहिताक्षौ परन्तपौ । वासुदेवार्जुनौ कर्ण द्रष्टाऽस्यमितविक्रमौ ॥
adya tau puruṣavyāghrau lohitākṣau parantapau | vāsudevārjunau karṇa draṣṭā'syamitavikramau
कर्ण, आज तुम उन दोनों नरव्याघ्रों, लाल नेत्रों वाले शत्रुतापन, अमित पराक्रमी वासुदेव और अर्जुन को देखोगे।
श्लोक 8 (8.39.8)
सारथिर्यस्य गोविन्दो गाण्डीवं यस्य कार्मुकम् । तं चेद्वन्ताऽसि राधेय त्वं नो राजा भविष्यसि ॥
sārathiryasya govindo gāṇḍīvaṃ yasya kārmukam | taṃ cedvantā'si rādheya tvaṃ no rājā bhaviṣyasi
राधेय, जिसके सारथि गोविन्द हैं और जिसका धनुष गाण्डीव है, उसे यदि तुम मार दो तो तुम हमारे राजा होगे।
श्लोक 9 (8.39.9)
प्रवात्येष महावायुरभितस्तव वाहिनीम् । क्रव्यादा व्याहरन्त्येते मृगाः कुर्वन्ति भैरवम् ॥
pravātyeṣa mahāvāyurabhitastava vāhinīm | kravyādā vyāharantyete mṛgāḥ kurvanti bhairavam
यह प्रचण्ड वायु तुम्हारी सेना के चारों ओर बह रही है; मांसभक्षी पक्षी चिल्ला रहे हैं और पशु भयानक शब्द कर रहे हैं।
श्लोक 10 (8.39.10)
पश्य कर्ण महाघोरं भयं वै रोमहर्षणम् । अर्कं जीमूतसङ्काशः कबन्धो वार्य तिष्ठति ॥
paśya karṇa mahāghoraṃ bhayaṃ vai romaharṣaṇam | arkaṃ jīmūtasaṅkāśaḥ kabandho vārya tiṣṭhati
कर्ण, देखो यह महाघोर, रोमांच कर देने वाला भय: मेघ जैसा एक कबन्ध सूर्य को रोककर खड़ा है।
श्लोक 11 (8.39.11)
पश्य यूथं मृगशतं मृगाणां सर्वतोदिशम् । ररास दीप्तलाङ्गूलमादित्यमभि संस्थितम् ॥
paśya yūthaṃ mṛgaśataṃ mṛgāṇāṃ sarvatodiśam | rarāsa dīptalāṅgūlamādityamabhi saṃsthitam
देखो, चारों ओर सैकड़ों मृगों का झुंड है; जलती पूँछ वाला वह सूर्य की ओर मुँह किए खड़ा चीख रहा है।
श्लोक 12 (8.39.12)
पश्य काकांश्च गृध्रांश्च समवेतान्सहस्रशः । आदित्यमभिवीक्षन्ते ह्यशिवाः कर्ण सस्वराः ॥
paśya kākāṃśca gṛdhrāṃśca samavetānsahasraśaḥ | ādityamabhivīkṣante hyaśivāḥ karṇa sasvarāḥ
देखो, हज़ारों कौए और गिद्ध इकट्ठे हैं; कर्ण, ये अमंगल करने वाले चीखते हुए सूर्य की ओर देख रहे हैं।
श्लोक 13 (8.39.13)
श्वेतवाजिसमायुक्ते तव कर्ण महारथे । पताकाः प्रज्वलन्त्येता ध्वजश्चातीव कम्पते ॥
śvetavājisamāyukte tava karṇa mahārathe | patākāḥ prajvalantyetā dhvajaścātīva kampate
कर्ण, श्वेत अश्वों से जुते तुम्हारे महारथ पर ये पताकाएँ जल-सी रही हैं और ध्वज बहुत काँप रहा है।
श्लोक 14 (8.39.14)
उदीर्यतो हयान्पश्य महाकायान्महाजवान् । प्लवमानान्महावीर्यानाकाशे गरुडानिव ॥
udīryato hayānpaśya mahākāyānmahājavān | plavamānānmahāvīryānākāśe garuḍāniva
देखो, विशाल देह वाले, तेज़ और महाबली घोड़े ऊपर उठकर आकाश में गरुडों की तरह उछल रहे हैं।
श्लोक 15 (8.39.15)
ध्रुवमेषु निमित्तेषु भूमिमावृत्य पार्थिवाः । स्वप्स्यन्ति निहताः कर्ण शतशोऽथ सहस्रशः ॥
dhruvameṣu nimitteṣu bhūmimāvṛtya pārthivāḥ | svapsyanti nihatāḥ karṇa śataśo'tha sahasraśaḥ
कर्ण, इन अपशकुनों से निश्चय ही सैकड़ों-हज़ारों राजा मारे जाकर पृथ्वी को ढककर सो जाएँगे।
श्लोक 16 (8.39.16)
शङ्खानां तुमुलः शब्दः श्रूयते रोमहर्षणः । आनकानां च राधेय मृदङ्गानां च हन्यताम् ॥
śaṅkhānāṃ tumulaḥ śabdaḥ śrūyate romaharṣaṇaḥ | ānakānāṃ ca rādheya mṛdaṅgānāṃ ca hanyatām
राधेय, शंखों का रोमांचकारी तुमुल नाद सुनाई दे रहा है, और नगाड़ों तथा मृदंगों के बजाए जाने की ध्वनि भी।
श्लोक 17 (8.39.17)
शृणु शब्दान्बहुविधान्नराश्वरथवाजिनाम् । ज्यातलत्रेषुशब्दांश्च शृणु कर्ण महात्मनाम् ॥
śṛṇu śabdānbahuvidhānnarāśvarathavājinām | jyātalatreṣuśabdāṃśca śṛṇu karṇa mahātmanām
मनुष्यों, घोड़ों, रथों और अश्वों की अनेक प्रकार की आवाज़ें सुनो, और कर्ण, उन महात्माओं की प्रत्यंचा, दस्तानों और बाणों का शब्द सुनो।
श्लोक 18 (8.39.18)
हेमरूप्यप्रमृष्टानां वाससां शिल्पिनिर्मिताः । सहेमचन्द्रताराभाः पताकाः किङ्गिणीयुताः ॥
hemarūpyapramṛṣṭānāṃ vāsasāṃ śilpinirmitāḥ | sahemacandratārābhāḥ patākāḥ kiṅgiṇīyutāḥ
सोने-चाँदी से चमकाए गए वस्त्रों की, शिल्पियों की बनाई, सोने के चन्द्र और तारों से सजी, घुँघरुओं वाली पताकाएँ
श्लोक 19 (8.39.19)
नानावर्णा रणे भान्ति श्वसनेन प्रकम्पिताः । पश्य कर्णार्जुनस्यैताः सौदामिन्य इवाम्बुदे ॥
nānāvarṇā raṇe bhānti śvasanena prakampitāḥ | paśya karṇārjunasyaitāḥ saudāminya ivāmbude
रंग-बिरंगी होकर युद्ध में हवा से हिलती हुई चमक रही हैं। कर्ण, अर्जुन की इन पताकाओं को देखो, मेघ में बिजली की कौंध जैसी हैं।
श्लोक 20 (8.39.20)
ध्वजाः कणकणायन्ते वातेनातिसमीरिताः । सपताकरथाश्चापि पाञ्चालानां महात्मनाम् ॥
dhvajāḥ kaṇakaṇāyante vātenātisamīritāḥ | sapatākarathāścāpi pāñcālānāṃ mahātmanām
हवा के वेग से झकझोरे हुए ध्वज खनखना रहे हैं, और महात्मा पाञ्चालों के पताका-युक्त रथ भी।
श्लोक 21 (8.39.21)
एष रेणुः समुद्भूतो दिवमावृत्य तिष्ठति । गजवाजिप्रणुन्ना च कम्पते कर्ण मेदिनी ॥
eṣa reṇuḥ samudbhūto divamāvṛtya tiṣṭhati | gajavājipraṇunnā ca kampate karṇa medinī
यह धूल उठकर आकाश को ढककर खड़ी है; हाथियों और घोड़ों से रौंदी हुई पृथ्वी काँप रही है, कर्ण।
श्लोक 22 (8.39.22)
श्रूयते मेघसङ्काशो रथनेमिस्वनस्तथा । पश्य कुन्तीसुतं वीरं बीभत्सुमपराजितम् । प्रहरिष्यन्तमायान्तं कपिप्रवरकेतनम् ॥
śrūyate meghasaṅkāśo rathanemisvanastathā | paśya kuntīsutaṃ vīraṃ bībhatsumaparājitam | prahariṣyantamāyāntaṃ kapipravaraketanam
मेघ जैसी रथ के पहियों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है। देखो, कुन्ती के पुत्र अपराजित वीर बीभत्सु को, जिसकी ध्वजा पर श्रेष्ठ वानर है, प्रहार करने को आ रहे हैं।
श्लोक 23 (8.39.23)
गजाश्वरथपत्त्योघांस्तावकान्युधि निघ्नतः । ध्वजाग्रं दृश्यते तस्य ज्याशब्दश्चैव श्रूयते ॥
gajāśvarathapattyoghāṃstāvakānyudhi nighnataḥ | dhvajāgraṃ dṛśyate tasya jyāśabdaścaiva śrūyate
तुम्हारे हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों के समूहों को युद्ध में मारते हुए उसके ध्वज का अग्रभाग दिखाई देता है और प्रत्यंचा का शब्द सुनाई देता है।
श्लोक 24 (8.39.24)
एष संशप्तकान्भूयस्तानेवाभिमुखो गतः । करोति कदनं चैष सङ्ग्रामे द्विषतां बली ॥
eṣa saṃśaptakānbhūyastānevābhimukho gataḥ | karoti kadanaṃ caiṣa saṅgrāme dviṣatāṃ balī
वह देखो, वह बलवान् फिर उन्हीं संशप्तकों की ओर गया है और युद्ध में शत्रुओं का संहार कर रहा है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 25 (8.39.25)
इति ब्रुवाणं मद्रेशं कर्णः प्रोवाच मन्युमान् ॥
iti bruvāṇaṃ madreśaṃ karṇaḥ provāca manyumān
ऐसा कहते हुए मद्रराज से क्रोध से भरे कर्ण ने कहा।
कर्ण उवाच
श्लोक 26 (8.39.26)
पश्य संशप्तकैः क्रुद्धैः समन्तात्समभिद्रुतः । एष सूर्य इवाम्भोदैश्छन्नः पार्थो न दृश्यते । एष दान्तोऽर्जुनः शल्य निमग्नः शोकसागरे ॥
paśya saṃśaptakaiḥ kruddhaiḥ samantātsamabhidrutaḥ | eṣa sūrya ivāmbhodaiśchannaḥ pārtho na dṛśyate | eṣa dānto'rjunaḥ śalya nimagnaḥ śokasāgare
देखो, क्रुद्ध संशप्तकों ने चारों ओर से उस पर धावा बोल रखा है; बादलों से ढके सूर्य की तरह पार्थ दिखाई नहीं दे रहा। हे शल्य, यह अर्जुन अब हार मानकर शोक के सागर में डूब गया है।
शल्य उवाच
श्लोक 27 (8.39.27)
वरुणं कोऽम्भसा हन्यादिन्धनेन च कोऽनलम् । कोवाऽनिलं निगृह्णीयात्पिबेद्वा को महार्णवम् ॥
varuṇaṃ ko'mbhasā hanyādindhanena ca ko'nalam | kovā'nilaṃ nigṛhṇīyātpibedvā ko mahārṇavam
कौन वरुण को जल से मार सकता है, या अग्नि को ईंधन से? कौन वायु को पकड़ सकता है, या महासागर को पी सकता है?
श्लोक 28 (8.39.28)
ईदृग्रूपमहं मन्ये पार्थस्य युधि निर्जयम् । न हि शक्योऽर्जुनो जेतुं युधि देवासुरैरपि ॥
īdṛgrūpamahaṃ manye pārthasya yudhi nirjayam | na hi śakyo'rjuno jetuṃ yudhi devāsurairapi
मैं समझता हूँ कि युद्ध में पार्थ को जीतना भी ऐसा ही है। अर्जुन को युद्ध में देवता और असुर भी नहीं जीत सकते।
श्लोक 29 (8.39.29)
अथैवं परितोषस्ते वाग्भिस्त्वं सुमना भव । न हि शक्यो युधा जेतुमन्यं कुरु मनोरथम् ॥
athaivaṃ paritoṣaste vāgbhistvaṃ sumanā bhava | na hi śakyo yudhā jetumanyaṃ kuru manoratham
यदि तुम्हें बातों से ही सन्तोष होता है तो प्रसन्न रहो; पर वह युद्ध में जीता नहीं जा सकता। कोई और मनोरथ करो।
श्लोक 30 (8.39.30)
बाहुभ्यामुद्धरेद्भूमिं दहेत्क्रुद्ध इमाः प्रजाः । पातयेत्त्रिदिवाद्देवान्नार्जुनं समरे जयेत् ॥
bāhubhyāmuddharedbhūmiṃ dahetkruddha imāḥ prajāḥ | pātayettridivāddevānnārjunaṃ samare jayet
जो अपनी भुजाओं से पृथ्वी को उठा ले, क्रोध करके इन सब प्राणियों को जला दे, या देवताओं को स्वर्ग से गिरा दे, वह भी युद्ध में अर्जुन को नहीं जीत सकता।
श्लोक 31 (8.39.31)
पश्य कुन्तीसुतं भीमं वीरमक्लिष्टकारिणम् । प्रहरन्तं महाबाहुं स्थितं मेरुमिवाचलम् ॥
paśya kuntīsutaṃ bhīmaṃ vīramakliṣṭakāriṇam | praharantaṃ mahābāhuṃ sthitaṃ merumivācalam
देखो, कुन्ती के पुत्र भीम को, बिना थके कर्म करने वाले उस महाबाहु वीर को, जो मेरु पर्वत की तरह अडिग खड़ा प्रहार कर रहा है।
श्लोक 32 (8.39.32)
अमर्षी पुरुषव्याघ्रः सदा वैरमनुस्मरन् । एष भीमो जयप्रेप्सुर्युधि तिष्ठति वीर्यवान् ॥
amarṣī puruṣavyāghraḥ sadā vairamanusmaran | eṣa bhīmo jayaprepsuryudhi tiṣṭhati vīryavān
असहनशील वह पुरुषव्याघ्र सदा पुराने वैर को याद करता रहता है; वही बलवान् भीम विजय की इच्छा से युद्ध में डटा है।
श्लोक 33 (8.39.33)
एष धर्मभृतां श्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः । तिष्ठत्यसुकरः सङ्ख्ये परैः परपुरञ्जयः ॥
eṣa dharmabhṛtāṃ śreṣṭho dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | tiṣṭhatyasukaraḥ saṅkhye paraiḥ parapurañjayaḥ
और यह है धर्म को धारण करने वालों में श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर, शत्रुओं के नगरों को जीतने वाला, जिससे युद्ध में शत्रु पार नहीं पा सकते।
श्लोक 34 (8.39.34)
एतौ च पुरुषव्याघ्रावाश्विनेयौ महारथौ । नकुलः सहदेवश्च तिष्ठतो युधि दुर्जयौ ॥
etau ca puruṣavyāghrāvāśvineyau mahārathau | nakulaḥ sahadevaśca tiṣṭhato yudhi durjayau
और ये दो पुरुषव्याघ्र महारथी, अश्विनीकुमारों के पुत्र नकुल और सहदेव, युद्ध में अजेय खड़े हैं।
श्लोक 35 (8.39.35)
एते तिष्ठन्ति कार्ष्णेयाः पञ्च पञ्चाचला इव । योत्स्यमाना महावीर्या भीमार्जुनसमा युधि ॥
ete tiṣṭhanti kārṣṇeyāḥ pañca pañcācalā iva | yotsyamānā mahāvīryā bhīmārjunasamā yudhi
ये द्रौपदी के पाँचों पुत्र पाँच पर्वतों की तरह खड़े हैं, महापराक्रमी, लड़ने को तैयार, युद्ध में भीम और अर्जुन के समान।
श्लोक 36 (8.39.36)
एते द्रुपदपुत्राश्च धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । हीनाः सत्यजिता वीरास्तिष्ठन्ति परमौजसः ॥
ete drupadaputrāśca dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ | hīnāḥ satyajitā vīrāstiṣṭhanti paramaujasaḥ
और धृष्टद्युम्न को आगे किए ये द्रुपद के पुत्र, महातेजस्वी वीर, सत्यजित् को खोकर भी डटे हुए हैं।
श्लोक 37 (8.39.37)
यत्र कृष्णार्जुनौ वीरौ यत्र राजा युधिष्ठिरः । तत्र धर्मश्च सत्यं च यतो धर्मस्ततो जयः ॥
yatra kṛṣṇārjunau vīrau yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ | tatra dharmaśca satyaṃ ca yato dharmastato jayaḥ
जहाँ वीर कृष्ण और अर्जुन हैं, जहाँ राजा युधिष्ठिर हैं, वहीं धर्म और सत्य हैं, और जहाँ धर्म है वहीं जय है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 38 (8.39.38)
इति संवदतोरेव तयोः पुरुषसिंहयोः । ते सेने समसज्जेतां गङ्गायमुनवद्भृशम् ॥
iti saṃvadatoreva tayoḥ puruṣasiṃhayoḥ | te sene samasajjetāṃ gaṅgāyamunavadbhṛśam
जब वे दोनों पुरुषसिंह इस प्रकार बात कर ही रहे थे, तभी वे दोनों सेनाएँ गंगा और यमुना की धाराओं की तरह वेग से टकरा गईं।