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कर्ण पर्व · अध्याय 38

कर्ण द्वारा मद्र और बाह्लीक जनों की निन्दा

शल्य के ताने से तिलमिलाया कर्ण बाह्लीकों और मद्रों पर लम्बा आक्षेप करता है: बाह्लीकों में वर्णों का उलट-फेर, आरट्ट देश की एक बन्दिनी स्त्री का शाप, राक्षस कल्माषपाद की उक्तियाँ और भिन्न-भिन्न प्रदेशों के दोषों की गिनती। शल्य उत्तर देता है कि हर देश में भले और बुरे दोनों लोग होते हैं और हर मनुष्य को अपने दोषों का उत्तर स्वयं देना है। दुर्योधन दोनों को शान्त कराता है और कर्ण हँसकर शल्य से रथ आगे बढ़ाने को कहता है।

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

कर्ण उवाच

श्लोक 1 (8.38.1)

इति शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते । उच्यमानं मया सम्यक्त्वमेकाग्रमनाः शृणु ॥

iti śalya vijānīhi hanta bhūyo bravīmi te | ucyamānaṃ mayā samyaktvamekāgramanāḥ śṛṇu

हे शल्य, यह जान लो; मैं तुम्हें फिर कहता हूँ। जो कुछ तुमसे अब भलीभाँति कहा जा रहा है, उसे एकाग्र मन से सुनो।

श्लोक 2 (8.38.2)

ब्राह्मणः किल नो गेहमध्यगच्छत्पुराऽतिथिः । आचारं तत्र सम्प्रेक्ष्य प्रीतो वचनमब्रवीत् ॥

brāhmaṇaḥ kila no gehamadhyagacchatpurā'tithiḥ | ācāraṃ tatra samprekṣya prīto vacanamabravīt

बहुत पहले एक ब्राह्मण अतिथि हमारे घर आया था। वहाँ का आचार देखकर वह प्रसन्न हुआ और बोला।

श्लोक 3 (8.38.3)

मया हिमवतः शृङ्गमेकेनाध्युषितं चिरम् । दृष्टाश्च बहवो देशा नानाधर्मसमावृताः ॥

mayā himavataḥ śṛṅgamekenādhyuṣitaṃ ciram | dṛṣṭāśca bahavo deśā nānādharmasamāvṛtāḥ

मैं बहुत समय तक अकेला हिमालय के एक शिखर पर रहा और मैंने भिन्न-भिन्न धर्मों से भरे हुए अनेक देश देखे।

श्लोक 4 (8.38.4)

न च केन च धर्मेण विरुध्यन्ते प्रजा इमाः । सर्वाश्चाप्याचरन्धर्मं यदुक्तं वेदपारगैः ॥

na ca kena ca dharmeṇa virudhyante prajā imāḥ | sarvāścāpyācarandharmaṃ yaduktaṃ vedapāragaiḥ

वहाँ की प्रजाएँ किसी भी धर्म से विरोध नहीं करती थीं; वेदपारगों ने जैसा कहा था, सब वैसे ही धर्म का आचरण करती थीं।

श्लोक 5 (8.38.5)

अटता तु मया देशान्नानाधर्मसमाकुलान् । आगच्छता महाराज बाह्लीकेषु निशामितम् ॥

aṭatā tu mayā deśānnānādharmasamākulān | āgacchatā mahārāja bāhlīkeṣu niśāmitam

परन्तु हे महाराज, अनेक प्रकार के धर्मों से भरे देशों में घूमते हुए जब मैं बाह्लीकों के बीच आया, तब मैंने यह देखा।

श्लोक 6 (8.38.6)

तत्र वै ब्राह्मणो भूत्वा पुनर्भवति क्षत्रियः । वैश्यः शूद्रश्च बाह्लीकस्ततो भवति नापितः ॥

tatra vai brāhmaṇo bhūtvā punarbhavati kṣatriyaḥ | vaiśyaḥ śūdraśca bāhlīkastato bhavati nāpitaḥ

वहाँ जो ब्राह्मण होता है, वही फिर क्षत्रिय हो जाता है; फिर वैश्य और शूद्र होता है, और तब बाह्लीक बनकर नाई हो जाता है।

श्लोक 7 (8.38.7)

नापितश्च ततो भूत्वा पुनर्भवति ब्राह्मणः । द्विजो भूत्वा च तत्रैव पुनर्दासोऽभिजायते ॥

nāpitaśca tato bhūtvā punarbhavati brāhmaṇaḥ | dvijo bhūtvā ca tatraiva punardāso'bhijāyate

नाई होकर वह फिर ब्राह्मण हो जाता है, और वहीं द्विज होकर फिर दास के रूप में जन्म लेता है।

श्लोक 8 (8.38.8)

भवन्त्येककुले विप्राः शिष्टा ये कामचारिणः । गान्धारा मद्रकाश्चैव बाह्लीकाश्चाप्यतेजसः ॥

bhavantyekakule viprāḥ śiṣṭā ye kāmacāriṇaḥ | gāndhārā madrakāścaiva bāhlīkāścāpyatejasaḥ

एक ही कुल में शिष्ट ब्राह्मण भी होते हैं और स्वेच्छाचारी भी; गान्धार, मद्रक और तेजहीन बाह्लीक ऐसे ही हैं।

श्लोक 9 (8.38.9)

एतन्मया श्रुतं तत्र धर्मसङ्करकारकम् । कृत्स्नामटित्वा पृथिवीं बाह्लीकेषु विपर्ययः ॥

etanmayā śrutaṃ tatra dharmasaṅkarakārakam | kṛtsnāmaṭitvā pṛthivīṃ bāhlīkeṣu viparyayaḥ

यह धर्मों को मिला देने वाली बात मैंने वहाँ सुनी: सारी पृथ्वी में घूमकर मैंने जाना कि बाह्लीकों में सब कुछ उलटा है।

श्लोक 10 (8.38.10)

इति शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते । यदप्यन्योऽब्रवीद्वाक्यं बाह्लीकानां विकुत्सितं ॥

iti śalya vijānīhi hanta bhūyo bravīmi te | yadapyanyo'bravīdvākyaṃ bāhlīkānāṃ vikutsitaṃ

हे शल्य, यह जान लो, मैं तुमसे फिर कहता हूँ। बाह्लीकों की निन्दा में किसी और ने जो बात कही थी, वह भी सुनो।

श्लोक 11 (8.38.11)

आनीयेहाक्षता काचिदारट्टात्किल दस्युभिः । अधर्मतश्चोपयाता सा तानभ्यशपत्ततः ॥

ānīyehākṣatā kācidāraṭṭātkila dasyubhiḥ | adharmataścopayātā sā tānabhyaśapattataḥ

कहा जाता है कि आरट्ट देश से डाकू कोई अक्षता स्त्री यहाँ ले आए थे और उन्होंने अधर्म से उसके साथ सम्बन्ध किया; तब उसने उन्हें शाप दिया।

आरट्टात् आनीता नार्युवाच

श्लोक 12 (8.38.12)

बालां बन्धुमतीं यन्मामधर्मेणोपगच्छथ । तस्मात्कुमार्यः स्वैरिण्यो भविष्यन्ति कुलेषु वः ॥

bālāṃ bandhumatīṃ yanmāmadharmeṇopagacchatha | tasmātkumāryaḥ svairiṇyo bhaviṣyanti kuleṣu vaḥ

"तुमने अधर्म से मुझ बन्धुओं वाली बाला को अपनाया है, इसलिए तुम्हारे कुलों की कुमारियाँ स्वेच्छाचारिणी होंगी।"

कर्ण उवाच

श्लोक 13 (8.38.13)

न चैवास्मात्प्रमोक्षध्वं घोराच्छापान्नराधमाः । तस्मात्तेषां भागहरः कथं धर्मान्वदिष्यसि ॥

na caivāsmātpramokṣadhvaṃ ghorācchāpānnarādhamāḥ | tasmātteṣāṃ bhāgaharaḥ kathaṃ dharmānvadiṣyasi

"हे अधमो, तुम इस भयंकर शाप से मुक्त नहीं हो सकोगे।" अतः उनके भागीदार होकर तुम धर्म की बात कैसे कहोगे?

श्लोक 14 (8.38.14)

कुरवः सहपाञ्चालाः साल्वा मात्स्याः सनैमिशाः । कोसलाः काशपौण्ड्राश्च कालिङ्गा मागधास्तथा ॥

kuravaḥ sahapāñcālāḥ sālvā mātsyāḥ sanaimiśāḥ | kosalāḥ kāśapauṇḍrāśca kāliṅgā māgadhāstathā

पाञ्चालों सहित कुरु, शाल्व, नैमिषों सहित मत्स्य, कोसल, काशी और पौण्ड्र, कलिंग तथा मागध,

श्लोक 15 (8.38.15)

चेदयश्च महाभागा धर्मं जानन्ति शाश्वतम् । नानादेशेष्वसन्तश्च प्रायो बाह्यालयानृते ॥

cedayaśca mahābhāgā dharmaṃ jānanti śāśvatam | nānādeśeṣvasantaśca prāyo bāhyālayānṛte

और महाभाग चेदि लोग सनातन धर्म को जानते हैं; अन्य देशों में प्रायः असज्जन ही मिलते हैं, केवल बाहर के लोगों की बस्तियों को छोड़कर।

श्लोक 16 (8.38.16)

आमत्स्येभ्यः कुरुपाञ्चालसाल्वा । आनैमिशाच्चेदयो ये विशिष्टाः । धर्मं पुराणमुपजीवन्ति सन्तो । मद्रानृते पाञ्चनदांश्च जिह्मान् ॥

āmatsyebhyaḥ kurupāñcālasālvā | ānaimiśāccedayo ye viśiṣṭāḥ | dharmaṃ purāṇamupajīvanti santo | madrānṛte pāñcanadāṃśca jihmān

मत्स्यों से लेकर कुरु, पाञ्चाल और शाल्व, तथा नैमिष वन से लेकर श्रेष्ठ चेदि, ये सज्जन पुरातन धर्म के सहारे जीते हैं; केवल मद्रों और पञ्चनद (पाँच नदियों) के कुटिल लोगों को छोड़कर।

श्लोक 17 (8.38.17)

एवं विद्वान्धर्मकथासु राजं- । स्तूष्णींभूतः शल्य भवेः सदा त्वम् । त्वं तस्य गोप्ता च जनस्य राजा । षड्भागहर्ता शुभदुष्कृतस्य ॥

evaṃ vidvāndharmakathāsu rājaṃ- | stūṣṇīṃbhūtaḥ śalya bhaveḥ sadā tvam | tvaṃ tasya goptā ca janasya rājā | ṣaḍbhāgahartā śubhaduṣkṛtasya

हे राजन्, यह जानकर, शल्य, धर्म की चर्चा में तुम्हें सदा चुप रहना चाहिए। तुम उस जन के रक्षक और राजा हो और उनके शुभ-अशुभ कर्मों का छठा भाग लेने वाले हो।

श्लोक 18 (8.38.18)

अथवा दुष्कृतस्य त्वं हर्ता तेषामरक्षिता । रक्षिता पुण्यभाग्राजा प्रजानां त्वं ह्यपुण्यभाक् ॥

athavā duṣkṛtasya tvaṃ hartā teṣāmarakṣitā | rakṣitā puṇyabhāgrājā prajānāṃ tvaṃ hyapuṇyabhāk

अथवा तुम उनके दुष्कर्मों का भाग तो लेते हो, पर उनकी रक्षा नहीं करते। रक्षा करने वाला राजा प्रजा के पुण्य का भागी होता है, परन्तु तुम तो पाप के ही भागी हो।

श्लोक 19 (8.38.19)

पूज्यमाने पुरा धर्मे सर्वदेशेषु शाश्वते । धर्मं पाञ्चनदं दृष्ट्वा धिगित्याह पितामहः ॥

pūjyamāne purā dharme sarvadeśeṣu śāśvate | dharmaṃ pāñcanadaṃ dṛṣṭvā dhigityāha pitāmahaḥ

पूर्वकाल में जब सब देशों में सनातन धर्म का आदर था, तब पञ्चनद देश का धर्म देखकर पितामह ने "धिक्कार है" कहा था।

श्लोक 20 (8.38.20)

व्रात्यानां दाशकीयानां कृतेऽप्यशुभकर्मणाम् । ब्रह्मणा निन्दितान्धर्मान्कश्चित्सिद्धात्मकोऽब्रवीत् ॥

vrātyānāṃ dāśakīyānāṃ kṛte'pyaśubhakarmaṇām | brahmaṇā ninditāndharmānkaścitsiddhātmako'bravīt

कृतयुग में भी अशुभ कर्म करने वाले व्रात्यों और दाशकीयों के उन धर्मों को, जिनकी ब्रह्मा ने निन्दा की थी, किसी सिद्धात्मा ने बताया था।

श्लोक 21 (8.38.21)

इति पाञ्चनदं धर्ममवमेने पितामहः । स्वधर्मस्थेषु वर्णेषु सोऽप्येतान्नाभ्यपूजयत् ॥

iti pāñcanadaṃ dharmamavamene pitāmahaḥ | svadharmastheṣu varṇeṣu so'pyetānnābhyapūjayat

इस प्रकार पितामह ने पञ्चनद के धर्म की अवहेलना की; अपने धर्म में स्थित वर्णों में भी उन्होंने इन लोगों का आदर नहीं किया।

श्लोक 22 (8.38.22)

इति शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते । कल्माषपादः सरसि निमज्जन्राक्षसोऽब्रवीत् ॥

iti śalya vijānīhi hanta bhūyo bravīmi te | kalmāṣapādaḥ sarasi nimajjanrākṣaso'bravīt

हे शल्य, यह जान लो, मैं तुमसे फिर कहता हूँ: सरोवर में डूबते हुए राक्षस कल्माषपाद ने कहा था।

कल्माषपाद उवाच

श्लोक 23 (8.38.23)

क्षत्रियस्य मलं भैक्ष्यं ब्राह्मणस्याश्रुतं मलम् । मलं पृथिव्या बाह्लीकाः स्त्रीणां कौतूहलं मलम् ॥

kṣatriyasya malaṃ bhaikṣyaṃ brāhmaṇasyāśrutaṃ malam | malaṃ pṛthivyā bāhlīkāḥ strīṇāṃ kautūhalaṃ malam

"भिक्षा क्षत्रिय का मल है, अश्रुत (वेदज्ञान का अभाव) ब्राह्मण का मल है; बाह्लीक पृथ्वी के मल हैं और कौतूहल स्त्रियों का मल है।"

कर्ण उवाच

श्लोक 24 (8.38.24)

निमज्जमानमुद्धृत्य कश्चिद्राजा निशाचरम् । अपृच्छत्तेन चाख्यातं तच्छृणुष्व नराधिप ॥

nimajjamānamuddhṛtya kaścidrājā niśācaram | apṛcchattena cākhyātaṃ tacchṛṇuṣva narādhipa

डूबते हुए उस निशाचर को किसी राजा ने निकाला और उससे पूछा; हे नरेश्वर, उसने जो बताया वह सुनो।

कल्माषपाद उवाच

श्लोक 25 (8.38.25)

मानुषाणां मलं म्लेच्छा म्लेच्छानां मुष्टिका मलम् । मुष्टिकानां मलं षण्ढाः षण्ढानां राजयाजकाः ॥

mānuṣāṇāṃ malaṃ mlecchā mlecchānāṃ muṣṭikā malam | muṣṭikānāṃ malaṃ ṣaṇḍhāḥ ṣaṇḍhānāṃ rājayājakāḥ

"म्लेच्छ मनुष्यों के मल हैं, मुष्टिक म्लेच्छों के मल हैं, षण्ढ मुष्टिकों के मल हैं और राजयाजक षण्ढों के मल हैं।"

श्लोक 26 (8.38.26)

राजयाजकयाज्यानां मद्रकाणां च यन्मलम् । तद्भवेद्वै तव मलं यद्यस्मान्न विमुञ्चसि ॥

rājayājakayājyānāṃ madrakāṇāṃ ca yanmalam | tadbhavedvai tava malaṃ yadyasmānna vimuñcasi

"राजयाजकों के यजमानों का और मद्रकों का जो मल है, वही तुम्हारा भी मल होगा, यदि तुम हमें नहीं छोड़ते।"

कर्ण उवाच

श्लोक 27 (8.38.27)

इति रक्षोपसृष्टेषु विषवीर्यहतेषु च । विद्वद्भिर्भेषजं दृष्टं संसिद्धवचनोत्तरम् ॥

iti rakṣopasṛṣṭeṣu viṣavīryahateṣu ca | vidvadbhirbheṣajaṃ dṛṣṭaṃ saṃsiddhavacanottaram

राक्षसों से ग्रस्त और विष के प्रभाव से मारे हुओं के लिए विद्वानों ने यही औषध देखी है — ऐसे वचन जिनका फल सिद्ध है।

श्लोक 28 (8.38.28)

ब्राह्माः पञ्चालाः कौरवेयास्तु धर्म्याः । सत्या मत्स्याः शूरसेनाश्च याज्याः । प्राच्या दासा वृषला दाक्षिणात्याः । स्तेना बाह्लीकाः सङ्करा वै सुराष्ट्राः ॥

brāhmāḥ pañcālāḥ kauraveyāstu dharmyāḥ | satyā matsyāḥ śūrasenāśca yājyāḥ | prācyā dāsā vṛṣalā dākṣiṇātyāḥ | stenā bāhlīkāḥ saṅkarā vai surāṣṭrāḥ

पाञ्चाल वेदनिष्ठ हैं, कौरव धर्मपरायण, मत्स्य सत्यवादी और शूरसेन यज्ञ के योग्य हैं; पूर्व के लोग दास हैं, दक्षिण के लोग वृषल हैं, बाह्लीक चोर हैं और सुराष्ट्र के लोग वर्णसंकर हैं।

श्लोक 29 (8.38.29)

कृतघ्नता परवित्तापहारो । मद्यपानं गुरुदारावमर्दः । वाक्पारुष्यं गोवधो रात्रिचर्या । बहिर्गेहं परवस्त्रोपभोगः ॥

kṛtaghnatā paravittāpahāro | madyapānaṃ gurudārāvamardaḥ | vākpāruṣyaṃ govadho rātricaryā | bahirgehaṃ paravastropabhogaḥ

कृतघ्नता, दूसरों का धन हर लेना, मद्यपान, गुरु-पत्नी का अपमान, कठोर वाणी, गोवध, रात में विचरना, घर से बाहर रहना और पराये वस्त्र पहनना।

श्लोक 30 (8.38.30)

आ पाञ्चालेभ्यः कुरवो नैमिषाश्च । मत्स्याश्चैवाप्यथ जानन्ति धर्मम् । कलिङ्गकाश्चाङ्गका मागधाश्च । शिष्टान्धर्मानुपजीवन्ति वृद्धाः ॥

ā pāñcālebhyaḥ kuravo naimiṣāśca | matsyāścaivāpyatha jānanti dharmam | kaliṅgakāścāṅgakā māgadhāśca | śiṣṭāndharmānupajīvanti vṛddhāḥ

पाञ्चालों से लेकर कुरु और नैमिष, तथा मत्स्य भी धर्म को जानते हैं; कलिंग, अंग और मागध — वृद्धजन — सज्जनों के धर्मों पर जीते हैं।

श्लोक 31 (8.38.31)

प्राचीं दिशं श्रिता देवा जातवेदःपुरोगमाः । दक्षिणा पितृभिर्गुप्ता यमेन शुभकर्मणा ॥

prācīṃ diśaṃ śritā devā jātavedaḥpurogamāḥ | dakṣiṇā pitṛbhirguptā yamena śubhakarmaṇā

अग्नि को आगे करके देवता पूर्व दिशा में रहते हैं; दक्षिण दिशा की रक्षा पितर और शुभकर्मा यम करते हैं।

श्लोक 32 (8.38.32)

प्रतीचीं वरुणः पाति पालयन्नसुरान्बहून् । उदीचीं भगवान्सोमो ब्रह्मा च ब्राह्मणैः सह ॥

pratīcīṃ varuṇaḥ pāti pālayannasurānbahūn | udīcīṃ bhagavānsomo brahmā ca brāhmaṇaiḥ saha

पश्चिम की रक्षा वरुण करते हैं और बहुत-से असुरों का पालन करते हैं; उत्तर में भगवान् सोम हैं और ब्राह्मणों के साथ ब्रह्मा।

श्लोक 33 (8.38.33)

रक्षःपिशाचान्हिमवान्गुह्यकान्गन्धमादनः । ध्रुवं सर्वाणि भूतानि विष्णुः पाति सुरोत्तमः ॥

rakṣaḥpiśācānhimavānguhyakāngandhamādanaḥ | dhruvaṃ sarvāṇi bhūtāni viṣṇuḥ pāti surottamaḥ

हिमालय राक्षसों और पिशाचों की, गन्धमादन गुह्यकों की रक्षा करता है, और देवश्रेष्ठ विष्णु निश्चय ही सब प्राणियों की रक्षा करते हैं।

श्लोक 34 (8.38.34)

इङ्गितज्ञाश्च मगधाः प्रेक्षितज्ञाश्च कोसलाः । अर्धोक्ताः कुरुपाञ्चालाः सर्वोक्ता दाक्षिणापथाः ॥

iṅgitajñāśca magadhāḥ prekṣitajñāśca kosalāḥ | ardhoktāḥ kurupāñcālāḥ sarvoktā dākṣiṇāpathāḥ

मगध के लोग संकेत से समझ लेते हैं, कोसल के लोग दृष्टि से; कुरु और पाञ्चाल आधी बात कहने से, और दक्षिण के लोग तब जब सब कुछ कहा जाए।

श्लोक 35 (8.38.35)

पार्वतीयाश्च विषया यथैव गिरयस्तथा । सर्वज्ञा यवना राजञ्शूराश्चैव विशेषतः । म्लेच्छाः स्वसंज्ञानियता नानुक्तमितरे जनाः ॥

pārvatīyāśca viṣayā yathaiva girayastathā | sarvajñā yavanā rājañśūrāścaiva viśeṣataḥ | mlecchāḥ svasaṃjñāniyatā nānuktamitare janāḥ

पहाड़ी प्रदेश अपने पर्वतों जैसे ही हैं; हे राजन्, यवन सब कुछ जानने वाले हैं और उनमें शूर विशेष हैं; म्लेच्छ अपने ही संकेतों से बँधे रहते हैं, और अन्य लोग बिना कहे कुछ नहीं करते।

श्लोक 36 (8.38.36)

प्रतिरब्धास्तु बाह्लीका न च केचन मद्रकाः । स त्वमेतादृशः शल्य नोत्तरं वक्तुमर्हसि ॥

pratirabdhāstu bāhlīkā na ca kecana madrakāḥ | sa tvametādṛśaḥ śalya nottaraṃ vaktumarhasi

बाह्लीक हठी हैं, और कोई भी मद्रक इससे भिन्न नहीं। हे शल्य, तुम ऐसे होकर उत्तर देने योग्य नहीं हो।

श्लोक 37 (8.38.37)

एवं ज्ञात्वा जोषमास्स्व प्रतीपं । मा स्म क्रुद्धः पापभृतां वरिष्ठ । पूर्वं हत्वा त्वां सपुत्रं बलैश्च । पश्चाद्धंस्ये वासुदेवार्जुनौ च ॥

evaṃ jñātvā joṣamāssva pratīpaṃ | mā sma kruddhaḥ pāpabhṛtāṃ variṣṭha | pūrvaṃ hatvā tvāṃ saputraṃ balaiśca | paścāddhaṃsye vāsudevārjunau ca

यह जानकर चुप बैठे रहो; हे पापियों में श्रेष्ठ, क्रोध करके मेरे विरुद्ध मत होओ। पहले मैं तुम्हें पुत्रों और सेना सहित मारूँगा, फिर वासुदेव और अर्जुन को मारूँगा।

शल्य उवाच

श्लोक 38 (8.38.38)

आतुराणां परित्यागः स्वदारसुतविक्रयः । अङ्गे प्रवर्तते कर्ण येषामधिपतिर्भवान् ॥

āturāṇāṃ parityāgaḥ svadārasutavikrayaḥ | aṅge pravartate karṇa yeṣāmadhipatirbhavān

कर्ण, जिस अंग देश के तुम स्वामी हो, वहाँ दुखियों को त्याग देना और अपनी स्त्री-पुत्रों को बेच देना चलता है।

श्लोक 39 (8.38.39)

रथातिरथसङ्ख्यायां यत्त्वां भीष्मस्तदाब्रवीत् । तान्विदित्वाऽत्मनो दोषान्निर्मन्युर्भव मा क्रुधः ॥

rathātirathasaṅkhyāyāṃ yattvāṃ bhīṣmastadābravīt | tānviditvā'tmano doṣānnirmanyurbhava mā krudhaḥ

रथियों और अतिरथियों की गणना के समय भीष्म ने तुम्हारे विषय में जो कहा था, उसे और अपने दोषों को जानकर क्रोध छोड़ दो, कुपित मत होओ।

श्लोक 40 (8.38.40)

सर्वत्र ब्राह्मणाः सन्ति सन्ति सर्वत्र क्षत्रियाः । वैश्याः शूद्रास्तथा कर्ण स्त्रियः साध्व्यश्च सुव्रताः ॥

sarvatra brāhmaṇāḥ santi santi sarvatra kṣatriyāḥ | vaiśyāḥ śūdrāstathā karṇa striyaḥ sādhvyaśca suvratāḥ

कर्ण, सब जगह ब्राह्मण हैं, सब जगह क्षत्रिय हैं; वैश्य, शूद्र और पतिव्रता, उत्तम व्रत वाली स्त्रियाँ भी सब जगह हैं।

श्लोक 41 (8.38.41)

रमन्ते चोपहासेन पुरुषाः पुरुषैः सह । अन्योन्येन रताः क्षीबा देशेदेशे च मैथुनम् ॥

ramante copahāsena puruṣāḥ puruṣaiḥ saha | anyonyena ratāḥ kṣībā deśedeśe ca maithunam

पुरुष पुरुषों के साथ हँसी-मज़ाक में रमते हैं; नशे में चूर होकर एक-दूसरे में रत रहते हैं, और हर देश में ऐसा सहवास होता है।

श्लोक 42 (8.38.42)

परवाच्येषु निपुणः सर्वो भवति सर्वदा । आत्मवाच्यं न जानीते जानन्नपि च मुह्यति ॥

paravācyeṣu nipuṇaḥ sarvo bhavati sarvadā | ātmavācyaṃ na jānīte jānannapi ca muhyati

हर कोई सदा दूसरों के दोष कहने में निपुण होता है; अपने दोष को वह नहीं जानता, या जानकर भी मोह में पड़ा रहता है।

श्लोक 43 (8.38.43)

सर्वत्र सन्ति राजानः स्वंस्वं धर्ममनुव्रताः । दुर्मनुष्यान्निगृह्णन्ति सन्ति सर्वत्र धार्मिकाः ॥

sarvatra santi rājānaḥ svaṃsvaṃ dharmamanuvratāḥ | durmanuṣyānnigṛhṇanti santi sarvatra dhārmikāḥ

सब जगह राजा हैं जो अपने-अपने धर्म में लगे रहते हैं और दुष्टों को दण्ड देते हैं; सब जगह धर्मात्मा लोग भी हैं।

श्लोक 44 (8.38.44)

न कर्ण देशसामान्यात्सर्वः पापं निषेवते । यादृशाः स्वस्वभावेन देशांस्तांस्तादृशान्विदुः ॥

na karṇa deśasāmānyātsarvaḥ pāpaṃ niṣevate | yādṛśāḥ svasvabhāvena deśāṃstāṃstādṛśānviduḥ

कर्ण, देश की समानता से सब लोग पाप नहीं करने लगते; लोग अपने स्वभाव से जैसे होते हैं, उनके देश भी वैसे ही माने जाते हैं।

सञ्जय उवाच

श्लोक 45 (8.38.45)

ततो दुर्योधनो राजा कर्णशल्याववारयत् । सखिभावेन राधेयं शल्यं सौजन्यकेन च ॥

tato duryodhano rājā karṇaśalyāvavārayat | sakhibhāvena rādheyaṃ śalyaṃ saujanyakena ca

तब राजा दुर्योधन ने कर्ण और शल्य को रोक दिया — राधेय को मित्रभाव से और शल्य को सौजन्य से।

श्लोक 46 (8.38.46)

ततो निवारितः कर्णो धार्तराष्ट्रेण मारिष । प्रहस्य तत्र राजेन्द्र याहि शल्येत्यचोदयत् ॥

tato nivāritaḥ karṇo dhārtarāṣṭreṇa māriṣa | prahasya tatra rājendra yāhi śalyetyacodayat

हे मान्यवर, धृतराष्ट्र-पुत्र के इस प्रकार रोकने पर कर्ण ने वहाँ हँसकर, हे राजेन्द्र, "शल्य, चलो!" कहते हुए उसे आगे बढ़ाया।

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