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कर्ण पर्व · अध्याय 37

कर्ण द्वारा बाह्लीकों और मद्रों की निन्दा

कर्ण शल्य की फटकार का उत्तर देता है कि वह उसे केवल मित्रता और दुर्योधन के कार्य के कारण छोड़ रहा है; शल्य कहता है कि हज़ार कर्ण भी शत्रु को नहीं जीत सकते। तब कर्ण धृतराष्ट्र की सभा में ब्राह्मणों द्वारा पाँच नदियों के देश के बाह्लीकों के विरुद्ध कही गई बातें दोहराता है: उनका मद्यपान, नाच-गान और निर्लज्ज स्त्रियाँ, उनका भोजन और बर्तन, उनका नष्ट धर्म और दो पिशाचों से उनकी उत्पत्ति। वह एक बाह्लीक का विरह-गीत और शाकल की राक्षसी का गीत सुनाता है, और त्यागने योग्य जातियों व जनों की सूची देता है।

अध्याय 36अध्याय-सूचीअध्याय 38

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.37.1)

ततः पुनर्महाराज मद्रराजमरिन्दमः । अभ्यभाषत राधेयः सन्निवार्योत्तरं वचः ॥

tataḥ punarmahārāja madrarājamarindamaḥ | abhyabhāṣata rādheyaḥ sannivāryottaraṃ vacaḥ

हे महाराज, तब शत्रुओं का दमन करने वाले राधेय (कर्ण) ने मद्रराज को रोककर उन्हें फिर यह उत्तर दिया।

कर्ण उवाच

श्लोक 2 (8.37.2)

निर्भर्त्सनार्थं शल्य त्वं यत्तु जल्पितवानसि । नाहं शक्यस्त्वया वाचा विभीषयितुमाहवे ॥

nirbhartsanārthaṃ śalya tvaṃ yattu jalpitavānasi | nāhaṃ śakyastvayā vācā vibhīṣayitumāhave

हे शल्य, तुमने मुझे डाँटने के लिए जो बकवास की है, उसके उत्तर में यह सुनो: मैं युद्ध में वचनों से डराया नहीं जा सकता।

श्लोक 3 (8.37.3)

यदि मां देवताः सर्वा योधयेयुः सवासवाः । तथापि मे भयं न स्यात्किमु पार्थात्सकेशवात् ॥

yadi māṃ devatāḥ sarvā yodhayeyuḥ savāsavāḥ | tathāpi me bhayaṃ na syātkimu pārthātsakeśavāt

यदि इन्द्र-सहित सब देवता भी मुझसे युद्ध करें, तब भी मुझे भय न होगा; फिर केशव-सहित पार्थ से भय की तो बात ही क्या!

श्लोक 4 (8.37.4)

नाहं भीषयितुं शक्यः शुद्धकर्मा महाहवे । अभिजानीहि शक्तस्त्वमन्यं भीषयितुं रणे ॥

nāhaṃ bhīṣayituṃ śakyaḥ śuddhakarmā mahāhave | abhijānīhi śaktastvamanyaṃ bhīṣayituṃ raṇe

मैं शुद्ध कर्म वाला इस महायुद्ध में डराया नहीं जा सकता। यह जान लो कि तुम रण में किसी और को ही डराने में समर्थ हो।

श्लोक 5 (8.37.5)

नीचस्य बलमेतावत्पारुष्यं यत्त्वमात्थ माम् । अशक्तो हि गुणान्वक्तुं वल्गसे बहु दुर्मते ॥

nīcasya balametāvatpāruṣyaṃ yattvamāttha mām | aśakto hi guṇānvaktuṃ valgase bahu durmate

जो कठोर बातें तुम मुझसे कह रहे हो, एक नीच मनुष्य का बल बस इतना ही होता है। मेरे गुणों का वर्णन करने में असमर्थ होकर, हे दुर्बुद्धि, तुम बहुत बकवास कर रहे हो।

श्लोक 6 (8.37.6)

न हि कर्णः समुद्भूतो भयार्थमिह मद्रक । विक्रमार्थमहं जातो यशोर्थं च तथाऽऽत्मनः ॥

na hi karṇaḥ samudbhūto bhayārthamiha madraka | vikramārthamahaṃ jāto yaśorthaṃ ca tathā''tmanaḥ

हे मद्रक, कर्ण यहाँ डरने के लिए नहीं जन्मा; मैं पराक्रम के लिए और अपने यश के लिए जन्मा हूँ।

श्लोक 7 (8.37.7)

सखिभावेन सौहार्दान्मित्रभावेन चैव हि । कारणैस्त्रिभिरेतैस्त्वं शल्य जीवसि साम्प्रतम् ॥

sakhibhāvena sauhārdānmitrabhāvena caiva hi | kāraṇaistribhiretaistvaṃ śalya jīvasi sāmpratam

साथी के भाव से, सद्भाव से और मित्रता के भाव से, इन्हीं तीन कारणों से हे शल्य, तुम इस समय जीवित हो।

श्लोक 8 (8.37.8)

राज्ञश्च धार्तराष्ट्रस्य कार्यं सुमहदुद्यतम् । मयि तच्चाहितं शल्य तेन जीवसि मे क्षणम् ॥

rājñaśca dhārtarāṣṭrasya kāryaṃ sumahadudyatam | mayi taccāhitaṃ śalya tena jīvasi me kṣaṇam

राजा धृतराष्ट्र-पुत्र का एक बहुत बड़ा कार्य आरम्भ हुआ है, और वह मुझ पर टिका है; इसी से तुम क्षण भर और जी रहे हो।

श्लोक 9 (8.37.9)

कृतश्च समयः पूर्वं क्षन्तव्यं विप्रियं तव । समयः परिपाल्यो मे तेन जीवसि साम्प्रतम् ॥

kṛtaśca samayaḥ pūrvaṃ kṣantavyaṃ vipriyaṃ tava | samayaḥ paripālyo me tena jīvasi sāmpratam

पहले यह समझौता हो चुका था कि तुम्हारी अप्रिय बातें मुझे सहनी होंगी। मुझे उस समझौते का पालन करना है; इसलिए तुम इस समय जीवित हो।

श्लोक 10 (8.37.10)

ऋते शल्यसहस्रेण विजयेयमहं परान् । मित्रद्रोहस्तु पापीयानिति जीवसि साम्प्रतम् ॥

ṛte śalyasahasreṇa vijayeyamahaṃ parān | mitradrohastu pāpīyāniti jīvasi sāmpratam

हज़ार शल्यों के बिना भी मैं शत्रुओं को जीत सकता हूँ; पर मित्र के साथ द्रोह कहीं बड़ा पाप है, इसीलिए तुम इस समय जीवित हो।

शल्य उवाच

श्लोक 11 (8.37.11)

आर्तप्रलापांस्त्वं कर्ण यान्ब्रवीषि परान्प्रति । न ते कर्णसहस्रेण शक्या जेतुं परे युधि ॥

ārtapralāpāṃstvaṃ karṇa yānbravīṣi parānprati | na te karṇasahasreṇa śakyā jetuṃ pare yudhi

हे कर्ण, तुम शत्रुओं के विषय में जो ये दुखियों के-से प्रलाप कर रहे हो, उन शत्रुओं को हज़ार कर्ण भी युद्ध में नहीं जीत सकते।

सञ्जय उवाच

श्लोक 12 (8.37.12)

तथा ब्रुवन्तं परुषं कर्णो मद्राधिपं तदा । परुषं द्विगुणं भूयः प्रोवाचाप्रियदर्शनम् ॥

tathā bruvantaṃ paruṣaṃ karṇo madrādhipaṃ tadā | paruṣaṃ dviguṇaṃ bhūyaḥ provācāpriyadarśanam

इस प्रकार कठोर वचन कहते हुए मद्रराज को कर्ण ने तब और भी कठोर, दुगुने कठोर और अप्रिय वचन कहे।

कर्ण उवाच

श्लोक 13 (8.37.13)

इदं त्वमेकाग्रमनाः शृणु मद्रजनाधिप । सन्निधौ धृतराष्ट्रस्य प्रोच्यमानं मया श्रुतम् ॥

idaṃ tvamekāgramanāḥ śṛṇu madrajanādhipa | sannidhau dhṛtarāṣṭrasya procyamānaṃ mayā śrutam

हे मद्रजनों के स्वामी, धृतराष्ट्र के समीप जो कुछ कहा जा रहा था और मैंने सुना, उसे एकाग्र मन से सुनो।

श्लोक 14 (8.37.14)

देशांश्च विविधांश्चित्रान्पूर्ववृत्तांश्च पार्थिवान् । ब्राह्मणाः कथयन्ति स्म धृतराष्ट्रनिवेशने ॥

deśāṃśca vividhāṃścitrānpūrvavṛttāṃśca pārthivān | brāhmaṇāḥ kathayanti sma dhṛtarāṣṭraniveśane

धृतराष्ट्र के भवन में ब्राह्मण नाना प्रकार के अद्भुत देशों और पूर्वकाल के राजाओं की कथा कहा करते थे।

श्लोक 15 (8.37.15)

तत्र वृद्धः पुरावृत्ताः कथाः कश्चिद्द्विजोत्तमः । बाह्लीकदेशं मद्रांश्च कुत्सयन्वाक्यमब्रवीत् ॥

tatra vṛddhaḥ purāvṛttāḥ kathāḥ kaściddvijottamaḥ | bāhlīkadeśaṃ madrāṃśca kutsayanvākyamabravīt

वहाँ एक वृद्ध श्रेष्ठ ब्राह्मण ने पुरानी कथाएँ सुनाते हुए बाह्लीक देश और मद्रों की निन्दा करते हुए यह कहा:

श्लोक 16 (8.37.16)

बहिष्कृता हिमवता गङ्गया च तिरस्कृताः । सरस्वत्या यमुनया कुरुक्षेत्रेण चापि ये ॥

bahiṣkṛtā himavatā gaṅgayā ca tiraskṛtāḥ | sarasvatyā yamunayā kurukṣetreṇa cāpi ye

जो हिमालय से बहिष्कृत हैं, और गंगा, सरस्वती, यमुना तथा कुरुक्षेत्र से भी तिरस्कृत हैं,

श्लोक 17 (8.37.17)

पञ्चानां सिन्धुषष्ठानां नदीनां येऽन्तराश्रिताः । तान्धर्मबाह्यानशुचीन्बाह्लीकानपि वर्जयेत् ॥

pañcānāṃ sindhuṣaṣṭhānāṃ nadīnāṃ ye'ntarāśritāḥ | tāndharmabāhyānaśucīnbāhlīkānapi varjayet

जो सिन्धु को छठी लेकर पाँच नदियों के बीच रहते हैं, उन धर्म से बाहर और अपवित्र बाह्लीकों से बचना चाहिए।

श्लोक 18 (8.37.18)

गोवर्धनो नाम वटः सुभाण्डं नाम पत्तनम् । एतद्राजन्कलिद्वारमाकुमारात्स्मराम्यहम् ॥

govardhano nāma vaṭaḥ subhāṇḍaṃ nāma pattanam | etadrājankalidvāramākumārātsmarāmyaham

गोवर्धन नाम का एक वटवृक्ष है और सुभाण्ड नाम का एक नगर। हे राजन्, यह कलि का द्वार है; मैं इसे बचपन से जानता हूँ।

श्लोक 19 (8.37.19)

कार्येणात्यर्थगूढेन बाह्लीकेषूषितं मया । तत एषां समाचारः संवासाद्विदितो मया ॥

kāryeṇātyarthagūḍhena bāhlīkeṣūṣitaṃ mayā | tata eṣāṃ samācāraḥ saṃvāsādvidito mayā

एक अत्यन्त गुप्त कार्य से मैं बाह्लीकों के बीच रहा था, और उनके साथ रहने से मुझे उनके आचार का पता चला।

श्लोक 20 (8.37.20)

शाकलं नाम नगरमापगानामनिम्नगा । चण्डाला नाम बाह्लीकास्तेषां वृत्तं सुनिन्दितम् ॥

śākalaṃ nāma nagaramāpagānāmanimnagā | caṇḍālā nāma bāhlīkāsteṣāṃ vṛttaṃ suninditam

शाकल नाम का नगर है और आपगा नाम की नदी। वहाँ के बाह्लीक चण्डाल कहलाते हैं, और उनका आचरण अत्यन्त निन्दित है।

श्लोक 21 (8.37.21)

पानं गुडासवं पीत्वा गोमांसं लशुनैः सह । अपूपसक्तुमद्यानामाशिताः शीलवर्जिताः ॥

pānaṃ guḍāsavaṃ pītvā gomāṃsaṃ laśunaiḥ saha | apūpasaktumadyānāmāśitāḥ śīlavarjitāḥ

गुड़ की मदिरा पीकर और लहसुन के साथ गोमांस खाकर वे पूए, सत्तू और मद्य से तृप्त होते हैं, शील से रहित हैं।

श्लोक 22 (8.37.22)

गायन्त्यथ च नृत्यन्ति स्त्रियो मत्ता विवाससः । नगरापणवेशेषु बहिर्माल्यानुलेपनाः ॥

gāyantyatha ca nṛtyanti striyo mattā vivāsasaḥ | nagarāpaṇaveśeṣu bahirmālyānulepanāḥ

उनकी मतवाली, नंगी स्त्रियाँ नगर में, बाज़ारों और घरों में, बाहर माला पहने और अंगराग लगाए गाती और नाचती हैं।

श्लोक 23 (8.37.23)

मत्ताः प्रगीतविरुतैः खरोष्ट्रनिनदोपमैः । अनावृता मैथुने ताः कामचाराश्च सर्वशः ॥

mattāḥ pragītavirutaiḥ kharoṣṭraninadopamaiḥ | anāvṛtā maithune tāḥ kāmacārāśca sarvaśaḥ

मद में चूर, गधों और ऊँटों के रेंकने-बलबलाने जैसे गीतों और चीत्कारों के साथ, वे सम्भोग में निरंकुश हैं और हर प्रकार से मनमाना आचरण करती हैं।

श्लोक 24 (8.37.24)

आहुरन्योन्यसूक्तानि प्रब्रुवाणा मदोत्कटाः । हेहतेहेहतेत्येवं स्वामिभर्तृहतेति च ॥

āhuranyonyasūktāni prabruvāṇā madotkaṭāḥ | hehatehehatetyevaṃ svāmibhartṛhateti ca

मद से उन्मत्त होकर वे एक-दूसरे से हँसी-ठट्ठे की बातें कहती हैं और ‘हे हते! हे हते!’ तथा ‘स्वामी मारा गया! पति मारा गया!’ चिल्लाती हैं।

श्लोक 25 (8.37.25)

आक्रोशन्त्यः प्रनृत्यन्ति व्रात्याः पर्वस्वसंयताः । तासां किलावलिप्तानां निवसन्कुरुजाङ्गले ॥

ākrośantyaḥ pranṛtyanti vrātyāḥ parvasvasaṃyatāḥ | tāsāṃ kilāvaliptānāṃ nivasankurujāṅgale

चीखती हुई वे उत्सवों में अनियन्त्रित व्रात्य स्त्रियाँ नाचती हैं। और उन अहंकारी स्त्रियों के लोगों में से एक, जो कुरुजांगल में रह रहा था,

श्लोक 26 (8.37.26)

कश्चिद्बाह्लीकदुष्टानां नातिहृष्टमना जगौ । सा नूनं बृहती गौरी सूक्ष्मकम्बलवासिनी ॥

kaścidbāhlīkaduṣṭānāṃ nātihṛṣṭamanā jagau | sā nūnaṃ bṛhatī gaurī sūkṣmakambalavāsinī

वह कोई दुष्ट बाह्लीक, मन से कुछ भी प्रसन्न न होकर, गाने लगा: ‘वह ऊँची, गोरी स्त्री, महीन कम्बल पहने, अवश्य मुझे याद करती पड़ी होगी,

श्लोक 27 (8.37.27)

मामनुस्मरती शेते बाह्लीकं कुरुवासिनम् । शतद्रुं नु कदा तीर्त्वा तां च रम्यामिरावतीम् । गत्वा स्वदेशं द्रक्ष्यामि स्थूलजङ्घाः शुभाः स्त्रियः ॥

māmanusmaratī śete bāhlīkaṃ kuruvāsinam | śatadruṃ nu kadā tīrtvā tāṃ ca ramyāmirāvatīm | gatvā svadeśaṃ drakṣyāmi sthūlajaṅghāḥ śubhāḥ striyaḥ

मुझ कुरुदेश में रहने वाले बाह्लीक को। कब मैं शतद्रु को और उस रमणीय इरावती को पार करके अपने देश पहुँचूँगा और वे सुन्दर, पुष्ट पिंडलियों वाली स्त्रियाँ देखूँगा?

श्लोक 28 (8.37.28)

मनःशिलोज्ज्वलापाङ्ग्यो गौर्यस्ताः काकुकूजिताः । कम्बलाजिनसंवीता रुदन्त्यः प्रियदर्शनाः ॥

manaḥśilojjvalāpāṅgyo gauryastāḥ kākukūjitāḥ | kambalājinasaṃvītā rudantyaḥ priyadarśanāḥ

मनःशिला से उज्ज्वल आँखों के कोनों वाली, गोरी, करुण स्वर में कूजती, कम्बल और मृगचर्म में लिपटी, पुकारती हुई, देखने में प्यारी वे स्त्रियाँ।

श्लोक 29 (8.37.29)

मृदङ्गानकशङ्खानां मर्दलानां च निःस्वनैः । खरोष्ट्राश्वतरैश्चैव मत्ता यास्यामहे सुखम् ॥

mṛdaṅgānakaśaṅkhānāṃ mardalānāṃ ca niḥsvanaiḥ | kharoṣṭrāśvataraiścaiva mattā yāsyāmahe sukham

मृदंग, आनक, शंख और मर्दल की ध्वनि के साथ, गधों, ऊँटों और खच्चरों पर सवार होकर हम मदमस्त और सुखी होकर चलेंगे।

श्लोक 30 (8.37.30)

शमीपीलुकरीराणां वनेषु सुखवर्त्मसु । अपूपान्सक्तुपिण्डांश्च प्राश्नन्तो मथितान्वितान् ॥

śamīpīlukarīrāṇāṃ vaneṣu sukhavartmasu | apūpānsaktupiṇḍāṃśca prāśnanto mathitānvitān

शमी, पीलु और करीर के वनों में, सुखद मार्गों पर, छाछ के साथ पूए और सत्तू के पिंड खाते हुए,

श्लोक 31 (8.37.31)

पथिषु प्रबलो भूत्वा तथा सम्पततोऽध्वगान् । चेलापहारं कुर्वाणास्ताडयिष्याम भूयसः ॥

pathiṣu prabalo bhūtvā tathā sampatato'dhvagān | celāpahāraṃ kurvāṇāstāḍayiṣyāma bhūyasaḥ

मार्गों में बलवान् होकर, सामने पड़ने वाले बहुत-से यात्रियों को हम उनके वस्त्र छीनकर पीटेंगे।’

श्लोक 32 (8.37.32)

एवंशीलेषु व्रात्येषु बाह्लीकेषु दुरात्मसु । कश्चेतयानो निवसेन्मुहूर्तमपि मानवः ॥

evaṃśīleṣu vrātyeṣu bāhlīkeṣu durātmasu | kaścetayāno nivasenmuhūrtamapi mānavaḥ

ऐसे स्वभाव वाले, दुरात्मा, व्रात्य बाह्लीकों के बीच कौन विचारशील मनुष्य क्षण भर भी रहेगा?

श्लोक 33 (8.37.33)

ईदृशा ब्राह्मणेनोक्ता बाह्लीका मोघचारिणः । येषां षड्भागहर्ता त्वमुभयोः पुण्यपापयोः ॥

īdṛśā brāhmaṇenoktā bāhlīkā moghacāriṇaḥ | yeṣāṃ ṣaḍbhāgahartā tvamubhayoḥ puṇyapāpayoḥ

ब्राह्मण ने बाह्लीकों को ऐसा बताया, जो व्यर्थ आचरण करने वाले हैं, और जिनके पुण्य तथा पाप, दोनों का छठा भाग तुम लेते हो।

श्लोक 34 (8.37.34)

इत्युक्त्वा ब्राह्मणः साधुरुत्तरं पुनरुक्तवान् । बाह्लीकेष्वविनीतेषु प्रोच्यमानं निबोध तत् ॥

ityuktvā brāhmaṇaḥ sādhuruttaraṃ punaruktavān | bāhlīkeṣvavinīteṣu procyamānaṃ nibodha tat

यह कहकर उन साधु ब्राह्मण ने फिर आगे कहा; उद्दण्ड बाह्लीकों के विषय में जो कहा गया, उसे सुनो।

श्लोक 35 (8.37.35)

तत्र स्म राक्षसी गाति कृष्णचतुर्दशीम् । नगरे शाकले स्फीते आहत्य निशि दुन्दुभिम् ॥

tatra sma rākṣasī gāti kṛṣṇacaturdaśīm | nagare śākale sphīte āhatya niśi dundubhim

वहाँ समृद्ध शाकल नगर में कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात दुन्दुभि बजाकर एक राक्षसी गाती है:

श्लोक 36 (8.37.36)

कथं वस्तादृशो गाथाः पुनर्गास्यामि शाकले । गव्यस्य तृप्ता मांसस्य पीत्वा गौडं सुरासवम् ॥

kathaṃ vastādṛśo gāthāḥ punargāsyāmi śākale | gavyasya tṛptā māṃsasya pītvā gauḍaṃ surāsavam

‘गोमांस से तृप्त होकर और गौड़ मदिरा तथा सुरा पीकर मैं शाकल में फिर ऐसे गीत कैसे गाऊँगी,

श्लोक 37 (8.37.37)

गौरीभिः सह नारीभिर्बृहतीभिः स्वलङ्कृता । पलाण्डुगण्डूषयुताः खादन्तश्चैडकान्बहून् ॥

gaurībhiḥ saha nārībhirbṛhatībhiḥ svalaṅkṛtā | palāṇḍugaṇḍūṣayutāḥ khādantaścaiḍakānbahūn

सुन्दर रूप से सजी हुई, गोरी और ऊँची स्त्रियों के साथ, प्याज़ के कौर लिए हुए बहुत-सी भेड़ें खाती हुई?

श्लोक 38 (8.37.38)

वाराहं कौक्कुटं मांसं गव्यं गार्दभमौष्ट्रकम् । धानाश्च ये न खादन्ति तेषां जन्म निरर्थकम् ॥

vārāhaṃ kaukkuṭaṃ māṃsaṃ gavyaṃ gārdabhamauṣṭrakam | dhānāśca ye na khādanti teṣāṃ janma nirarthakam

जो सूअर, मुर्गे, गाय, गधे और ऊँट का माँस तथा भुने अनाज नहीं खाते, उनका जन्म व्यर्थ है।’

श्लोक 39 (8.37.39)

एवं गायन्ति ये मत्ताः शीधुना पीलुकावने । सबालवृद्धाः क्रन्दन्ति तेषां धर्मः कथं भवेत् ॥

evaṃ gāyanti ye mattāḥ śīdhunā pīlukāvane | sabālavṛddhāḥ krandanti teṣāṃ dharmaḥ kathaṃ bhavet

जो पीलु-वन में शराब पीकर मतवाले होकर इस प्रकार गाते हैं, और बालकों तथा बूढ़ों-सहित सब चिल्लाते हैं, उनमें धर्म कैसे हो सकता है?

श्लोक 40 (8.37.40)

यत्र लोकेश्वरः कृष्णो देवदेवो जनार्दनः । विस्मृतः पुरुषैरुग्रैस्तेषां धर्मः कथं भवेत् ॥

yatra lokeśvaraḥ kṛṣṇo devadevo janārdanaḥ | vismṛtaḥ puruṣairugraisteṣāṃ dharmaḥ kathaṃ bhavet

जहाँ लोकेश्वर, देवों के देव जनार्दन कृष्ण को उग्र पुरुषों ने भुला दिया है, उनमें धर्म कैसे हो सकता है?

श्लोक 41 (8.37.41)

इति शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते । यदन्योऽप्युक्तवानस्मान्ब्राह्मणः कुरुसंसदि ॥

iti śalya vijānīhi hanta bhūyo bravīmi te | yadanyo'pyuktavānasmānbrāhmaṇaḥ kurusaṃsadi

हे शल्य, यह जान लो; सुनो, मैं तुम्हें और भी बताता हूँ, जो एक और ब्राह्मण ने कुरुओं की सभा में हमसे कहा था।

श्लोक 42 (8.37.42)

पञ्चनद्यो वहन्त्येता यत्र पीलुवनान्युत । शतद्रुश्च विपाशा च तृतीयैरावती तथा ॥

pañcanadyo vahantyetā yatra pīluvanānyuta | śatadruśca vipāśā ca tṛtīyairāvatī tathā

यहाँ ये पाँच नदियाँ बहती हैं, जहाँ पीलु के वन हैं: शतद्रु, विपाशा और तीसरी इरावती,

श्लोक 43 (8.37.43)

चन्द्रभागा वितस्ता च सिन्धुषष्ठा महानदी । आरट्टा नाम बह्लीका एतेष्वार्यो हि नो वसेत् ॥

candrabhāgā vitastā ca sindhuṣaṣṭhā mahānadī | āraṭṭā nāma bahlīkā eteṣvāryo hi no vaset

चन्द्रभागा, वितस्ता और छठी महानदी सिन्धु। वहाँ आरट्ट नाम के बाह्लीक रहते हैं; कोई आर्य उनके बीच न रहे।

श्लोक 44 (8.37.44)

व्रात्यानां दासमीयानां विदेहानामयज्वनाम् । न देवाः प्रतिगृह्णन्ति पितरो ब्राह्मणास्तथा ॥

vrātyānāṃ dāsamīyānāṃ videhānāmayajvanām | na devāḥ pratigṛhṇanti pitaro brāhmaṇāstathā

व्रात्यों, दासमीयों, विदेहों और यज्ञ न करने वालों से न देवता कुछ ग्रहण करते हैं, न पितर, न ब्राह्मण।

श्लोक 45 (8.37.45)

तेषां प्रनष्टधर्माणां बाह्लीकानामिति श्रुतिः । ब्राह्मणेन यथा प्रोक्तं विदुषा साधुसंसदि ॥

teṣāṃ pranaṣṭadharmāṇāṃ bāhlīkānāmiti śrutiḥ | brāhmaṇena yathā proktaṃ viduṣā sādhusaṃsadi

ऐसे नष्टधर्म बाह्लीकों के विषय में श्रुति है, जैसा विद्वान् ब्राह्मण ने सज्जनों की सभा में कहा था।

श्लोक 46 (8.37.46)

काष्ठकुण्डेषु बाह्लीका मृण्मयेषु च भुञ्जते । सक्तुमद्यावलिप्तेषु श्वावलीढेषु निर्घृणाः ॥

kāṣṭhakuṇḍeṣu bāhlīkā mṛṇmayeṣu ca bhuñjate | saktumadyāvalipteṣu śvāvalīḍheṣu nirghṛṇāḥ

निर्दय बाह्लीक काठ के कटोरों और मिट्टी के बर्तनों में खाते हैं, जो सत्तू और मद्य से सने और कुत्तों के चाटे हुए होते हैं।

श्लोक 47 (8.37.47)

आविकं चौष्ट्रिकं चैव क्षीरं गार्दभमेव च । तद्विकारांश्च बाह्लीकाः खादन्ति च पिबन्ति च ॥

āvikaṃ cauṣṭrikaṃ caiva kṣīraṃ gārdabhameva ca | tadvikārāṃśca bāhlīkāḥ khādanti ca pibanti ca

भेड़, ऊँटनी और गधी का दूध और उससे बनी वस्तुएँ बाह्लीक खाते और पीते हैं।

श्लोक 48 (8.37.48)

पात्रसङ्करिणो जाल्माः सर्वान्नक्षीरभोजनाः । आरट्टा नाम बाह्लीका वर्जनीया विपश्चिता ॥

pātrasaṅkariṇo jālmāḥ sarvānnakṣīrabhojanāḥ | āraṭṭā nāma bāhlīkā varjanīyā vipaścitā

बर्तनों को मिलाने वाले, गँवार, सब प्रकार का अन्न और दूध खाने-पीने वाले आरट्ट बाह्लीकों से बुद्धिमान् को दूर रहना चाहिए।

श्लोक 49 (8.37.49)

इति शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते । यदन्योऽप्युक्तवान्मह्यं ब्राह्मणः कुरुसंसदि ॥

iti śalya vijānīhi hanta bhūyo bravīmi te | yadanyo'pyuktavānmahyaṃ brāhmaṇaḥ kurusaṃsadi

हे शल्य, यह जान लो; मैं तुम्हें और बताता हूँ, जो एक और ब्राह्मण ने कुरुओं की सभा में मुझसे कहा था।

श्लोक 50 (8.37.50)

युगन्धरे पयः पीत्वा प्रोष्य चाप्यच्युतस्थले । तद्वद्भूतिलये स्नात्वा कथं स्वर्गं गमिष्यति ॥

yugandhare payaḥ pītvā proṣya cāpyacyutasthale | tadvadbhūtilaye snātvā kathaṃ svargaṃ gamiṣyati

युगन्धर में दूध पीकर, अच्युतस्थल में रहकर और वैसे ही भूतिलय में स्नान करके कोई स्वर्ग कैसे जाएगा?

श्लोक 51 (8.37.51)

पञ्चनद्यो वहन्त्येता यत्र निःसृत्य पर्वतात् । आरट्टा नाम बाह्लीका न तेष्वार्यो द्व्यहं वसेत् ॥

pañcanadyo vahantyetā yatra niḥsṛtya parvatāt | āraṭṭā nāma bāhlīkā na teṣvāryo dvyahaṃ vaset

जहाँ ये पाँच नदियाँ पर्वत से निकलकर बहती हैं, वहाँ आरट्ट नाम के बाह्लीक रहते हैं; कोई आर्य उनके बीच दो दिन भी न रहे।

श्लोक 52 (8.37.52)

बाह्लीका नाम हीकश्च विपाशायां पिशाचकौ । तयोरपत्यं बाह्लीका नैषा सृष्टिः प्रजापतेः ॥

bāhlīkā nāma hīkaśca vipāśāyāṃ piśācakau | tayorapatyaṃ bāhlīkā naiṣā sṛṣṭiḥ prajāpateḥ

विपाशा के तट पर बाह्लीक और हीक नाम के दो पिशाच थे; बाह्लीक उन्हीं की सन्तान हैं, यह प्रजापति की सृष्टि नहीं है।

श्लोक 53 (8.37.53)

ते कथं विविधान्धर्माञ्ज्ञास्यन्ते हीनयोनयः ॥

te kathaṃ vividhāndharmāñjñāsyante hīnayonayaḥ

वे नीच योनि के लोग अनेक धर्मों को कैसे जानेंगे?

श्लोक 54 (8.37.54)

कारस्करान्माहिषकान्करम्भान्कटकालिकान् । कर्करान्वीरकान्वीरा उन्मत्तांश्च विवर्जयेत् ॥

kāraskarānmāhiṣakānkarambhānkaṭakālikān | karkarānvīrakānvīrā unmattāṃśca vivarjayet

कारस्कर, माहिषक, करम्भ, कटकालिक, कर्कर, वीरक, वीर और उन्मत्त लोगों से बचना चाहिए।

श्लोक 55 (8.37.55)

इति तीर्थानुसञ्चारी राक्षसी काचिदब्रवीत् । एकरात्रमुषित्वेह महोलूखलमेखला ॥

iti tīrthānusañcārī rākṣasī kācidabravīt | ekarātramuṣitveha maholūkhalamekhalā

तीर्थों में विचरने वाली, बड़ी ओखली को करधनी बनाए हुए किसी राक्षसी ने यहाँ एक रात रहकर ऐसा कहा था:

श्लोक 56 (8.37.56)

आरट्टा नाम ते देशा बाह्लीकं नाम तद्वनम् । वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायोऽतिकुत्सिताः ॥

āraṭṭā nāma te deśā bāhlīkaṃ nāma tadvanam | vasātisindhusauvīrā iti prāyo'tikutsitāḥ

वे देश आरट्ट कहलाते हैं और उनका वन बाह्लीक कहलाता है; वसाति, सिन्धु और सौवीर प्रायः अत्यन्त निन्दनीय हैं।

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