कर्ण पर्व · अध्याय 36
कर्ण का शल्य को परशुराम के शाप की कथा सुनाना
शल्य के ताने सुनकर कर्ण कहता है कि वह अर्जुन और कृष्ण के बल को जानता है और उनसे निर्भय होकर लड़ेगा। वह बताता है कि उसने ब्राह्मण का वेश धरकर परशुराम से ब्रह्मास्त्र कैसे पाया, कैसे इन्द्र ने कीड़ा बनकर उसकी जाँघ छेद दी, और कैसे गुरु ने उसे सूत जानकर शाप दिया कि निर्णायक घड़ी में वह अस्त्र उसे भूल जाएगा। फिर वह दूसरे शाप की कथा कहता है, जो उस ब्राह्मण का था जिसकी होमधेनु के बछड़े को उसने अनजाने मार दिया था: शत्रु से लड़ते समय उसके रथ का पहिया गड्ढे में धँस जाएगा। अन्त में वह शल्य से कहता है कि अब अपने दोष सुनो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.36.1)
मद्राधिपस्याधिरथिर्महात्मा । वचो निशम्याप्रियमप्रतीतः । उवाच शल्यं विदितं ममैत । द्यथाविधावर्जुनवासुदेवौ ॥
madrādhipasyādhirathirmahātmā | vaco niśamyāpriyamapratītaḥ | uvāca śalyaṃ viditaṃ mamaita | dyathāvidhāvarjunavāsudevau
मद्रराज के अप्रिय वचन सुनकर अधिरथ के महात्मा पुत्र कर्ण अप्रसन्न हुए और शल्य से बोले, “अर्जुन और वासुदेव कैसे हैं, यह मैं भली-भाँति जानता हूँ।
कर्ण उवाच
श्लोक 2 (8.36.2)
शौरे रथं वाहयतोऽर्जुनस्य । बलं महास्त्राणि च पाण्डवस्य । अहं विजानामि यथावदद्य । परोक्षभूतं तव तत्तु शल्य ॥
śaure rathaṃ vāhayato'rjunasya | balaṃ mahāstrāṇi ca pāṇḍavasya | ahaṃ vijānāmi yathāvadadya | parokṣabhūtaṃ tava tattu śalya
शौरि जिसका रथ हाँक रहे हैं उस अर्जुन का बल और उस पाण्डुपुत्र के महान् अस्त्र, इन्हें मैं आज ठीक-ठीक जानता हूँ; पर हे शल्य, ये बातें तुम्हारी दृष्टि से ओझल हैं।
श्लोक 3 (8.36.3)
तौ चाप्यहं शस्त्रभृतां वरिष्ठौ । व्यपेतभीर्योधयिष्यामि कृष्णौ । सन्तापयत्यभ्यधिकं हि रामा । च्छापोऽद्य मां ब्राह्मणसत्तमाच्च ॥
tau cāpyahaṃ śastrabhṛtāṃ variṣṭhau | vyapetabhīryodhayiṣyāmi kṛṣṇau | santāpayatyabhyadhikaṃ hi rāmā | cchāpo'dya māṃ brāhmaṇasattamācca
फिर भी शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ उन दोनों कृष्णों से मैं निर्भय होकर युद्ध करूँगा; मुझे तो आज परशुराम का और उस श्रेष्ठ ब्राह्मण का शाप ही कहीं अधिक सन्ताप दे रहा है।
श्लोक 4 (8.36.4)
पुरा महेन्द्राद्रिवरे समुद्रे । तपस्विनं राममुपेत्य शल्य । अस्त्रार्थिनं माऽद्य शिष्यं गृहाणे । त्यथाऽब्रुवं ब्राह्मणच्छद्मना च ॥
purā mahendrādrivare samudre | tapasvinaṃ rāmamupetya śalya | astrārthinaṃ mā'dya śiṣyaṃ gṛhāṇe | tyathā'bruvaṃ brāhmaṇacchadmanā ca
हे शल्य, बहुत पहले मैं समुद्र-तट पर पर्वतश्रेष्ठ महेन्द्र पर तपस्वी राम (परशुराम) के पास गया और ब्राह्मण का छद्म वेश धरकर बोला, ‘मैं अस्त्र चाहता हूँ; मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।’
श्लोक 5 (8.36.5)
तत्रावसं ब्राह्मण इत्यविप्रो । ब्रह्मास्त्रलोभादनृतेन चाहम् । तज्जामदग्न्येन परं महास्त्रं । समन्त्रयुक्तं विहितं ममासीत् ॥
tatrāvasaṃ brāhmaṇa ityavipro | brahmāstralobhādanṛtena cāham | tajjāmadagnyena paraṃ mahāstraṃ | samantrayuktaṃ vihitaṃ mamāsīt
ब्रह्मास्त्र के लोभ से मैं झूठ बोलकर, ब्राह्मण न होते हुए भी, ब्राह्मण बनकर वहाँ रहा; और जमदग्नि के पुत्र ने मुझे मन्त्रों सहित वह श्रेष्ठ महान् अस्त्र प्रदान किया।
श्लोक 6 (8.36.6)
अस्त्रं यदा तद्विदितं ममासी । त्तदाऽब्रवीद्ब्राह्मणो मां महर्षिः । आपद्गतेनास्त्रमिदं प्रयोज्यं । त्वया रणे गच्छता साधयेति ॥
astraṃ yadā tadviditaṃ mamāsī | ttadā'bravīdbrāhmaṇo māṃ maharṣiḥ | āpadgatenāstramidaṃ prayojyaṃ | tvayā raṇe gacchatā sādhayeti
जब वह अस्त्र मुझे आ गया, तब मुझे ब्राह्मण समझकर उन महर्षि ने कहा, ‘इस अस्त्र का प्रयोग तुम्हें तभी करना है जब तुम संकट में पड़ो; रण में जाकर इसी से अपना कार्य सिद्ध करना।’
श्लोक 7 (8.36.7)
तत्रापि मे देवराजेन विघ्नो । हितार्थिना फल्गुनस्यैव शल्य । कृतो विभेदेन ममोरुमेत्य । प्रविश्य कीटस्य तनुं विरूपाम् ॥
tatrāpi me devarājena vighno | hitārthinā phalgunasyaiva śalya | kṛto vibhedena mamorumetya | praviśya kīṭasya tanuṃ virūpām
वहाँ भी, हे शल्य, फल्गुन का हित चाहने वाले देवराज इन्द्र ने मेरे मार्ग में विघ्न डाला; उन्होंने एक कीड़े का कुरूप शरीर धारण किया और मेरी जाँघ में घुसकर उसे चीर दिया।
श्लोक 8 (8.36.8)
ममोरुमेत्य प्रबिभेद कीटः । सुप्ते गुरौ तत्र शिरो निधाय । ऊरुप्रभेदाच्च महान्बभूव । शरीरतो मे घनशोणितौघः ॥
mamorumetya prabibheda kīṭaḥ | supte gurau tatra śiro nidhāya | ūruprabhedācca mahānbabhūva | śarīrato me ghanaśoṇitaughaḥ
वह कीड़ा मेरी जाँघ में पहुँचकर, गुरु के सो जाने पर उसी पर सिर टिकाकर उसे छेदता रहा; और जाँघ के फट जाने से मेरे शरीर से गाढ़े रक्त की बड़ी धारा बह निकली।
श्लोक 9 (8.36.9)
गुरोर्भयाच्चापि न चेलिवानहं । ततो विबुद्धो ददृशे स विप्रः । स धैर्ययुक्तं प्रसमीक्ष्य मां वै । न त्वं विप्रः कोऽसि सत्यं वदेति ॥
gurorbhayāccāpi na celivānahaṃ | tato vibuddho dadṛśe sa vipraḥ | sa dhairyayuktaṃ prasamīkṣya māṃ vai | na tvaṃ vipraḥ ko'si satyaṃ vadeti
गुरु के भय से मैं हिला तक नहीं; तब वे ब्राह्मण जागे और उन्होंने यह सब देखा। मुझे धैर्य से सम्पन्न देखकर उन्होंने कहा, ‘तुम ब्राह्मण नहीं हो। तुम कौन हो? सच बताओ।’
श्लोक 10 (8.36.10)
तस्मै तदाऽऽत्मानमहं यथाव । दाख्यातवान्सूत इत्येव शल्य । स मां निशाम्याथ महातपस्वी । संशप्तवान्रोषपरीतचेताः ॥
tasmai tadā''tmānamahaṃ yathāva | dākhyātavānsūta ityeva śalya | sa māṃ niśāmyātha mahātapasvī | saṃśaptavānroṣaparītacetāḥ
हे शल्य, मैंने उन्हें ठीक-ठीक अपना परिचय दिया कि मैं सूत हूँ। यह सुनकर रोष से भरे चित्त वाले उन महातपस्वी ने मुझे शाप दे दिया:
श्लोक 11 (8.36.11)
सूत त्वया ह्याप्तमिदं तवास्त्रं । न कर्मकाले प्रतिभास्यतीति । अन्यत्र तु स्यात्तव मृत्युकाला । दब्राह्मणे ब्रह्म न हि ध्रुवं स्यात् ॥
sūta tvayā hyāptamidaṃ tavāstraṃ | na karmakāle pratibhāsyatīti | anyatra tu syāttava mṛtyukālā | dabrāhmaṇe brahma na hi dhruvaṃ syāt
‘सूत, तुमने जो यह अस्त्र पाया है, वह काम के समय तुम्हें सूझेगा नहीं; तुम्हारी मृत्यु की घड़ी को छोड़कर और कहीं यह नहीं आएगा; क्योंकि जो ब्राह्मण नहीं है, उसमें ब्रह्मास्त्र स्थिर नहीं रह सकता।’
श्लोक 12 (8.36.12)
तदद्य पर्याप्तमतीव मेऽस्त्र । मुपस्थितेऽस्मिंस्तुमुले विमर्दे ॥
tadadya paryāptamatīva me'stra | mupasthite'smiṃstumule vimarde
सो मेरा वह अस्त्र आज बहुत पर्याप्त है, अब जबकि यह भयंकर संग्राम, यह घोर संहार सामने आ खड़ा हुआ है।
श्लोक 13 (8.36.13)
शल्योग्रधन्वानमहं वरिष्ठं । तरस्विनं भीममसह्यवीर्यम् । सत्यप्रतिज्ञं युधि पाण्डवेयं । धनञ्जयं मृत्युमुखं नयिष्ये ॥
śalyogradhanvānamahaṃ variṣṭhaṃ | tarasvinaṃ bhīmamasahyavīryam | satyapratijñaṃ yudhi pāṇḍaveyaṃ | dhanañjayaṃ mṛtyumukhaṃ nayiṣye
हे शल्य, उस उग्र धनुर्धर, श्रेष्ठ योद्धा, वेगवान्, भयंकर और असह्य पराक्रम वाले, सत्य की प्रतिज्ञा रखने वाले पाण्डुपुत्र धनञ्जय को मैं युद्ध में मृत्यु के मुख में पहुँचा दूँगा।
श्लोक 14 (8.36.14)
अस्त्रं हि मे तत्प्रतिपन्नमद्य । येन क्षेप्स्ये समरे शत्रुपूगान् । प्रतापिनं बलवन्तं कृतास्त्रं । तमुग्रधन्वानममितौजसं च । क्रूरं शूरं रौद्रममित्रसाहं । धनञ्जयं संयुगेऽहं हनिष्ये ॥
astraṃ hi me tatpratipannamadya | yena kṣepsye samare śatrupūgān | pratāpinaṃ balavantaṃ kṛtāstraṃ | tamugradhanvānamamitaujasaṃ ca | krūraṃ śūraṃ raudramamitrasāhaṃ | dhanañjayaṃ saṃyuge'haṃ haniṣye
वह अस्त्र आज मुझे प्राप्त हो गया है, जिससे मैं युद्ध में शत्रुओं के झुंडों पर बाण चलाऊँगा। जो प्रतापी, बलवान्, अस्त्रविद्या में निपुण, उग्र धनुर्धर और अपार तेजस्वी है, जो क्रूर, शूर, रौद्र और शत्रुओं का सामना करने वाला है, उस धनञ्जय को मैं युद्ध में मारूँगा।
श्लोक 15 (8.36.15)
अपांपतिर्वेगवानप्रमेयो । निमज्जयिष्यन्बहुलाः प्रजा इव । महारवं यः कुरुते समुद्रो । वेलेव तं वारयाम्यप्रमेयम् ॥
apāṃpatirvegavānaprameyo | nimajjayiṣyanbahulāḥ prajā iva | mahāravaṃ yaḥ kurute samudro | veleva taṃ vārayāmyaprameyam
जैसे वेगवान् और अपार जलपति समुद्र प्राणियों के समूह को मानो डुबो देने के लिए भारी गर्जना करता है और तट उस अथाह समुद्र को रोक लेता है, वैसे ही मैं उस अप्रमेय को रोक दूँगा।
श्लोक 16 (8.36.16)
प्रमुञ्चन्तं बाणसङ्घानमेया । न्मर्मच्छिदो वीरहणः सुपत्रान् । कुन्तीपुत्रं प्रतियोत्स्यामि युद्धे । ज्यां कर्षतामुत्तमं मर्त्यलोके ॥
pramuñcantaṃ bāṇasaṅghānameyā | nmarmacchido vīrahaṇaḥ supatrān | kuntīputraṃ pratiyotsyāmi yuddhe | jyāṃ karṣatāmuttamaṃ martyaloke
मर्मस्थानों को छेदने वाले, वीरों का वध करने वाले, सुन्दर पंखों वाले असंख्य बाणों के समूह छोड़ते हुए, मर्त्यलोक में धनुष की डोरी खींचने वालों में सर्वश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र का मैं युद्ध में सामना करूँगा।
श्लोक 17 (8.36.17)
एवं बलेनातिबलं महास्त्रं । समुद्रकल्पं सुदुरापमुग्रम् । शरौघिणं पार्थिवान्मज्जयन्तं । वेलेव पार्थमिषुभिर्वारयिष्ये ॥
evaṃ balenātibalaṃ mahāstraṃ | samudrakalpaṃ sudurāpamugram | śaraughiṇaṃ pārthivānmajjayantaṃ | veleva pārthamiṣubhirvārayiṣye
इसी प्रकार अपने बल से मैं महान् अस्त्रों वाले, समुद्र के समान दुर्गम और उग्र, बाणों की बाढ़ से राजाओं को डुबोने वाले अतिबली पार्थ को अपने बाणों से रोक दूँगा, जैसे तट समुद्र को रोकता है।
श्लोक 18 (8.36.18)
कृती कृतास्त्रो दृढहस्तयोधी । दिव्यास्त्रविच्छ्वेतहयः प्रमाथी । सुरासुरान्युधि वै यो जयेत । तेनाद्य मे पश्य युद्धं सुघोरम् ॥
kṛtī kṛtāstro dṛḍhahastayodhī | divyāstravicchvetahayaḥ pramāthī | surāsurānyudhi vai yo jayeta | tenādya me paśya yuddhaṃ sughoram
उस कुशल, अस्त्रों में प्रशिक्षित, दृढ़ हाथों से लड़ने वाले, दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता, श्वेत अश्वों वाले, शत्रुओं को कुचलने वाले वीर से, जो युद्ध में देवताओं और असुरों को भी जीत सकता है, आज मेरा भयंकर युद्ध देखो।
श्लोक 19 (8.36.19)
अभीर्मानी पाण्डवो युद्धकामो । ह्यमानुषैरस्यति मां महास्त्रैः । तस्यास्त्रमस्त्रैरभिभूय सङ्ख्ये । बाणोत्तमैः पातयिष्यामि पार्थम् ॥
abhīrmānī pāṇḍavo yuddhakāmo | hyamānuṣairasyati māṃ mahāstraiḥ | tasyāstramastrairabhibhūya saṅkhye | bāṇottamaiḥ pātayiṣyāmi pārtham
निर्भय और अभिमानी वह पाण्डव युद्ध की इच्छा से मुझ पर अलौकिक महान् अस्त्र चलाएगा; रण में उसके अस्त्र को अपने अस्त्रों से दबाकर मैं उत्तम बाणों से पार्थ को गिरा दूँगा।
श्लोक 20 (8.36.20)
सहस्ररश्मिप्रतिमं ज्वलन्तं । दिशश्च सर्वाः प्रतपन्तमुग्रम् । तमोनुदं मेघ इवातिमात्रं । धनञ्जयं छादयिष्यामि बाणैः ॥
sahasraraśmipratimaṃ jvalantaṃ | diśaśca sarvāḥ pratapantamugram | tamonudaṃ megha ivātimātraṃ | dhanañjayaṃ chādayiṣyāmi bāṇaiḥ
हज़ार किरणों वाले सूर्य के समान जलते हुए और सब दिशाओं को उग्रता से तपाते हुए धनञ्जय को मैं अपने बाणों से ढक दूँगा, जैसे विशाल मेघ अन्धकार हरने वाले सूर्य को ढक लेता है।
श्लोक 21 (8.36.21)
वैश्वानरं धूमकेतुं ज्वलन्तं । तेजस्विनं नरवीरान्दहन्तम् । पर्जन्यभूतः शरवर्षैर्यथाऽग्निं । तथा पार्थं शमयिष्यामि युद्धे ॥
vaiśvānaraṃ dhūmaketuṃ jvalantaṃ | tejasvinaṃ naravīrāndahantam | parjanyabhūtaḥ śaravarṣairyathā'gniṃ | tathā pārthaṃ śamayiṣyāmi yuddhe
पार्थ धूम की ध्वजा वाली, जलती हुई, तेजस्वी और वीर पुरुषों को भस्म करती वैश्वानर अग्नि के समान है; मैं मेघ बनकर बाणों की वर्षा से उसे युद्ध में वैसे ही शान्त कर दूँगा, जैसे वर्षा अग्नि को बुझा देती है।
श्लोक 22 (8.36.22)
आशीविषं दृष्टिहणं सुघोरं । सुतीक्ष्णदंष्ट्रं ज्वलनप्रभावम् । क्रोधात्प्रदीप्तानलवद्दहन्तं । कुन्तीपुत्रं शमयिष्यामि भल्लैः ॥
āśīviṣaṃ dṛṣṭihaṇaṃ sughoraṃ | sutīkṣṇadaṃṣṭraṃ jvalanaprabhāvam | krodhātpradīptānalavaddahantaṃ | kuntīputraṃ śamayiṣyāmi bhallaiḥ
विषैले सर्प के समान, जिसकी दृष्टि ही मार डालती है, अत्यन्त भयंकर, तीखी दाढ़ों वाले, अग्नि-सी प्रभा वाले और क्रोध से प्रज्वलित आग की तरह जलाने वाले कुन्तीपुत्र को मैं भल्ल बाणों से शान्त कर दूँगा।
श्लोक 23 (8.36.23)
प्रवाहिणं बलवन्तं महौजसं । प्रभञ्जनं मातरिश्वानमुग्रम् । युद्धे सहिष्ये हिमवानिवाचलो । धनञ्जयं क्रुद्धममृष्यमाणम् ॥
pravāhiṇaṃ balavantaṃ mahaujasaṃ | prabhañjanaṃ mātariśvānamugram | yuddhe sahiṣye himavānivācalo | dhanañjayaṃ kruddhamamṛṣyamāṇam
क्रोध से भरे, असहिष्णु धनञ्जय प्रबल, बलवान्, महातेजस्वी और सब कुछ उखाड़ फेंकने वाले उग्र वायु मातरिश्वा के समान हैं; मैं युद्ध में हिमालय की तरह अटल रहकर उन्हें सहूँगा।
श्लोक 24 (8.36.24)
विशारदं रथमार्गेषु शक्तं । धुर्यं नित्यं समरेषु प्रवीरम् । लोके वरं सर्वधनुर्धराणां । धनञ्जयं संयुगेऽहं हनिष्ये ॥
viśāradaṃ rathamārgeṣu śaktaṃ | dhuryaṃ nityaṃ samareṣu pravīram | loke varaṃ sarvadhanurdharāṇāṃ | dhanañjayaṃ saṃyuge'haṃ haniṣye
रथ के मार्गों में निपुण, समर्थ, युद्धों में सदा अग्रणी, महावीर और संसार के सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ धनञ्जय को मैं युद्ध में मारूँगा।
श्लोक 25 (8.36.25)
अद्याहवे यस्य न तुल्यमन्यं । मन्ये मनुष्यं धनुराददानम् । सर्वामिमां यः पृथिवीं सहेत । तथापि तेनाद्य रणे समेष्ये ॥
adyāhave yasya na tulyamanyaṃ | manye manuṣyaṃ dhanurādadānam | sarvāmimāṃ yaḥ pṛthivīṃ saheta | tathāpi tenādya raṇe sameṣye
जब वह धनुष उठाता है, तब युद्ध में मैं किसी और मनुष्य को उसके समान नहीं मानता; यदि वह इस सारी पृथ्वी का सामना कर सकता हो, तब भी आज मैं रण में उसी से भिड़ूँगा।
श्लोक 26 (8.36.26)
यः सर्वभूतानि सदैवतानि । प्रस्थेऽजयत्खाण्डवे सव्यसाची । को जीवितं रक्षमाणो हि तेन । युयुत्सतेऽस्त्रैर्मानुषो मामृतेऽन्यः ॥
yaḥ sarvabhūtāni sadaivatāni | prasthe'jayatkhāṇḍave savyasācī | ko jīvitaṃ rakṣamāṇo hi tena | yuyutsate'strairmānuṣo māmṛte'nyaḥ
सव्यसाची ने खाण्डव वन में देवताओं-सहित सब प्राणियों को जीत लिया था; मेरे सिवा ऐसा कौन मनुष्य है जो अपने प्राण बचाने की चिन्ता करते हुए उससे अस्त्रों द्वारा लड़ना चाहेगा?
श्लोक 27 (8.36.27)
मानी कृतास्त्रः कृतहस्तयोधी । दिव्यास्त्रविच्छ्वेतहयः प्रमाथी । तस्याहमद्यातिरथस्य काया । च्छिरो हरिष्यामि शितैः पृषत्कैः ॥
mānī kṛtāstraḥ kṛtahastayodhī | divyāstravicchvetahayaḥ pramāthī | tasyāhamadyātirathasya kāyā | cchiro hariṣyāmi śitaiḥ pṛṣatkaiḥ
उस अभिमानी, अस्त्रविद्या में निपुण, हाथ के सधे हुए योद्धा, दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता, श्वेत अश्वों वाले, शत्रुओं को कुचलने वाले अतिरथी के धड़ से मैं आज तीखे बाणों से उसका सिर उड़ा दूँगा।
श्लोक 28 (8.36.28)
योत्स्याम्येनं शल्य धनञ्जयं वै । मृत्युं पुरस्कृत्य रणे जयं वा । अन्यो हि न ह्येकरथेन मर्त्यो । युध्येत यः पाण्डवमिन्द्रकल्पम् ॥
yotsyāmyenaṃ śalya dhanañjayaṃ vai | mṛtyuṃ puraskṛtya raṇe jayaṃ vā | anyo hi na hyekarathena martyo | yudhyeta yaḥ pāṇḍavamindrakalpam
हे शल्य, मृत्यु या विजय को सामने रखकर मैं इस धनञ्जय से युद्ध करूँगा; क्योंकि इन्द्र के समान उस पाण्डव से एक ही रथ पर बैठकर लड़ने वाला कोई दूसरा मनुष्य नहीं है।
श्लोक 29 (8.36.29)
तस्याहवे पौरुषं पाण्डवस्य । ब्रूयां पृष्टः समितौ क्षत्रियाणाम् । किं त्वं मूर्खः प्रहसन्मूढचेता । आख्यासि मे पौरुषं फल्गुनस्य ॥
tasyāhave pauruṣaṃ pāṇḍavasya | brūyāṃ pṛṣṭaḥ samitau kṣatriyāṇām | kiṃ tvaṃ mūrkhaḥ prahasanmūḍhacetā | ākhyāsi me pauruṣaṃ phalgunasya
क्षत्रियों की सभा में पूछे जाने पर तो मैं स्वयं ही उस पाण्डव के युद्ध-पराक्रम का वर्णन कर सकता हूँ। तुम मूर्ख और मूढ़ चित्त वाले होकर हँसते हुए मुझे फल्गुन का पराक्रम क्यों सुना रहे हो?
श्लोक 30 (8.36.30)
अत्यप्रियो यः पुरुषो निष्ठुरो हि । क्षुद्रः क्षेप्ता क्षमिणश्चाक्षमावान् । हन्यामहं त्वादृशानां शतानि । क्षमाम्यहं क्षमिणां काल एषः ॥
atyapriyo yaḥ puruṣo niṣṭhuro hi | kṣudraḥ kṣeptā kṣamiṇaścākṣamāvān | hanyāmahaṃ tvādṛśānāṃ śatāni | kṣamāmyahaṃ kṣamiṇāṃ kāla eṣaḥ
जो पुरुष अत्यन्त अप्रिय, कठोर, क्षुद्र, निन्दक और क्षमाशीलों के प्रति भी क्षमा न करने वाला हो, ऐसे तुम जैसे सैकड़ों को मैं मार सकता हूँ; फिर भी मैं क्षमा करता हूँ, क्योंकि यह क्षमा करने वालों का समय है।
श्लोक 31 (8.36.31)
अवोचस्त्वं पाण्डवार्थे प्रियाणि । प्रधर्षयन्मां मूढवत्पापकर्मन् । मय्यार्जवे जिह्ममतिर्यतस्त्वं । मित्रद्रोही साप्तपदं हि मित्रम् ॥
avocastvaṃ pāṇḍavārthe priyāṇi | pradharṣayanmāṃ mūḍhavatpāpakarman | mayyārjave jihmamatiryatastvaṃ | mitradrohī sāptapadaṃ hi mitram
हे पापकर्मी, तुमने पाण्डव के पक्ष में प्रिय बातें कहीं और मुझे मूर्ख के समान अपमानित किया; मैं सरल हूँ और तुम मुझसे कुटिल बुद्धि से पेश आते हो, इसलिए तुम मित्र-द्रोही हो; क्योंकि मित्रता सात पग साथ चलने से बनती है।
श्लोक 32 (8.36.32)
कालस्त्वयं प्रत्युपयाति दारुणो । दुर्योधनो युद्धमुपागमद्यत् । तस्यार्थसिद्धिं त्वभिकाङ्क्षमाण । स्तमन्वेष्ये यत्र चैकान्तमस्ति ॥
kālastvayaṃ pratyupayāti dāruṇo | duryodhano yuddhamupāgamadyat | tasyārthasiddhiṃ tvabhikāṅkṣamāṇa | stamanveṣye yatra caikāntamasti
यह भयानक समय आ पहुँचा है, क्योंकि दुर्योधन युद्ध में उतर आया है; उसके कार्य की सिद्धि चाहते हुए मैं उसी को ढूँढ़ रहा हूँ, जहाँ निर्णय निश्चित है।
श्लोक 33 (8.36.33)
तथाप्यहं पाण्डववासुदेवौ । योत्स्ये रणे मद्विधस्यैव कर्म । न प्राकृतः सज्जते वै कदाचि । द्यः प्रत्युदीयात्कृष्णधनञ्जयौ तौ ॥
tathāpyahaṃ pāṇḍavavāsudevau | yotsye raṇe madvidhasyaiva karma | na prākṛtaḥ sajjate vai kadāci | dyaḥ pratyudīyātkṛṣṇadhanañjayau tau
तो भी मैं युद्ध में पाण्डव और वासुदेव से लडूँगा; यही मुझ जैसे पुरुष का कर्म है। कोई साधारण मनुष्य कभी कृष्ण और धनञ्जय, इन दोनों का सामना करने को तैयार नहीं होता।
श्लोक 34 (8.36.34)
मित्रं मिन्देर्नन्दतेः प्रीयतेर्वा । सन्त्रायतेर्मिनुतेर्मोदतेर्वा । दुर्योधने सर्वमिदं ममास्ति । तच्चापि सर्वं मम वेत्ति राजा ॥
mitraṃ mindernandateḥ prīyatervā | santrāyaterminutermodatervā | duryodhane sarvamidaṃ mamāsti | taccāpi sarvaṃ mama vetti rājā
‘मित्र’ शब्द ऐसी धातुओं से बनता है जिनके अर्थ हैं स्नेह करना, आनन्दित होना, प्रसन्न करना, रक्षा करना, सम्मान करना और हर्षित करना; यह सब कुछ मेरे मन में दुर्योधन के प्रति है, और राजा भी मेरे विषय में यह सब जानता है।
श्लोक 35 (8.36.35)
शत्रुः शदेः शासतेर्वा श्यतेर्वा । शृणातेर्वा श्वसतेः सीदतेर्वा । श्रमेः शुचो बहुशः सूदतेश्च । प्रायेण सर्वं त्वयि तच्च मह्यम् ॥
śatruḥ śadeḥ śāsatervā śyatervā | śṛṇātervā śvasateḥ sīdatervā | śrameḥ śuco bahuśaḥ sūdateśca | prāyeṇa sarvaṃ tvayi tacca mahyam
‘शत्रु’ शब्द ऐसी धातुओं से बनता है जिनके अर्थ हैं काटना, शासन करना, क्षीण करना, हिंसा करना, हाँफना, डूबना, थकाना, शोक करना और प्रायः नष्ट करना; इनमें से लगभग सब कुछ तुममें है, और वह मेरे प्रति है।
श्लोक 36 (8.36.36)
दुर्योधनार्थं तव च प्रियार्थं । यशोर्थमात्मार्थमपीश्वरार्थम् । तस्मादहं पाण्डववासुदेवौ । योत्स्ये यत्नात्कर्म च पश्य मेऽद्य ॥
duryodhanārthaṃ tava ca priyārthaṃ | yaśorthamātmārthamapīśvarārtham | tasmādahaṃ pāṇḍavavāsudevau | yotsye yatnātkarma ca paśya me'dya
दुर्योधन के लिए, तुम्हारे प्रिय के लिए, यश के लिए, अपने लिए और स्वामी के लिए ही मैं पाण्डव और वासुदेव से पूरे यत्न से लडूँगा; आज मेरा कर्म देखो।
श्लोक 37 (8.36.37)
शल्याद्याहं सङ्गतः पाण्डवेन । मुच्येयं चेज्जीवमानः कथञ्चित् । शश्वन्मृत्योः स्यामनाधृष्यरूपो । व्यक्तं तस्मात्संयुगाद्विप्रमुक्तः ॥
śalyādyāhaṃ saṅgataḥ pāṇḍavena | mucyeyaṃ cejjīvamānaḥ kathañcit | śaśvanmṛtyoḥ syāmanādhṛṣyarūpo | vyaktaṃ tasmātsaṃyugādvipramuktaḥ
‘हे शल्य, आज पाण्डव से भिड़कर यदि मैं किसी तरह जीवित छूट गया, तो मैं सदा के लिए मृत्यु के लिए अजेय हो जाऊँगा, और निश्चय ही उस युद्ध से मुक्त हो जाऊँगा।’
श्लोक 38 (8.36.38)
अस्त्रं ब्राह्मं मनसा सञ्जपन्वै । यदाऽस्यते क्रोधितः सव्यसाची । तदापि मे नैव मुच्येत पार्थो । न चेत्पतेद्विषमे मेऽद्य चक्रम् ॥
astraṃ brāhmaṃ manasā sañjapanvai | yadā'syate krodhitaḥ savyasācī | tadāpi me naiva mucyeta pārtho | na cetpatedviṣame me'dya cakram
जब मैं मन ही मन ब्रह्मास्त्र का जप करता हुआ क्रुद्ध सव्यसाची पर उसे छोड़ूँगा, तब भी पार्थ मुझसे नहीं बचेगा, यदि आज मेरा पहिया किसी गड्ढे में न गिर पड़े।
श्लोक 39 (8.36.39)
अस्त्राणि विद्ध्वा समरे गतानि । ब्राह्माणि दिव्यान्यथ मानुषाणि । आसादयिष्याम्यहमुग्रवीर्यं । नागोत्तमं नाग इव प्रभिन्नः ॥
astrāṇi viddhvā samare gatāni | brāhmāṇi divyānyatha mānuṣāṇi | āsādayiṣyāmyahamugravīryaṃ | nāgottamaṃ nāga iva prabhinnaḥ
युद्ध में आने वाले ब्राह्म, दिव्य और मानुष अस्त्रों को छेदकर मैं उस उग्र पराक्रमी के पास जा पहुँचूँगा, जैसे मदमत्त हाथी श्रेष्ठ हाथी पर टूट पड़ता है।
श्लोक 40 (8.36.40)
वैवस्वताद्दण्डहस्ताद्वरुणाद्वापि पाशिनः । सगदाद्वा धनपतेः सवज्राद्वा सुराधिपात् ॥
vaivasvatāddaṇḍahastādvaruṇādvāpi pāśinaḥ | sagadādvā dhanapateḥ savajrādvā surādhipāt
न मैं दण्ड हाथ में लिए वैवस्वत यम से डरता हूँ, न पाशधारी वरुण से, न गदाधारी कुबेर से, न वज्रधारी देवराज इन्द्र से,
श्लोक 41 (8.36.41)
अथान्यस्मादपि सुरादमित्रादाततायिनः । इति शल्य विजानीहि यथा नाहं बिभेम्युत ॥
athānyasmādapi surādamitrādātatāyinaḥ | iti śalya vijānīhi yathā nāhaṃ bibhemyuta
और न किसी अन्य देवता या आततायी शत्रु से; हे शल्य, यह जान लो कि मैं डरता नहीं हूँ।
श्लोक 42 (8.36.42)
तस्मान्न मे भयं पार्थान्नापि चैव जनार्दनात् । सह युद्धं हि मे ताभ्यां साम्पराये भविष्यति ॥
tasmānna me bhayaṃ pārthānnāpi caiva janārdanāt | saha yuddhaṃ hi me tābhyāṃ sāmparāye bhaviṣyati
इसलिए मुझे न पार्थ से भय है, न जनार्दन से; इस संग्राम में उन दोनों के साथ एक साथ मेरा युद्ध होगा।
श्लोक 43 (8.36.43)
श्वभ्रे ते पततां चक्रमिति मां ब्राह्मणोऽब्रवीत् । युध्यमानस्य सङ्ग्रामे प्राप्तस्यैकायनं भयम् ॥
śvabhre te patatāṃ cakramiti māṃ brāhmaṇo'bravīt | yudhyamānasya saṅgrāme prāptasyaikāyanaṃ bhayam
एक ब्राह्मण ने मुझसे कहा था, ‘तेरा पहिया गड्ढे में गिर पड़े’; इसलिए युद्ध करते हुए मेरे सामने एक ही, अटल भय आ खड़ा हुआ है।
श्लोक 44 (8.36.44)
तस्माद्बिभेमि बलवद्ब्राह्मणव्याहृतादहम् । एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥
tasmādbibhemi balavadbrāhmaṇavyāhṛtādaham | ete hi somarājāna īśvarāḥ sukhaduḥkhayoḥ
इसीलिए मैं ब्राह्मण के कहे हुए वचन से बहुत डरता हूँ; क्योंकि ये सोमराज, अर्थात् ब्राह्मण, सुख-दुःख के स्वामी हैं।
श्लोक 45 (8.36.45)
कदाचिद्ब्राह्मणस्याथ होमधेनोरहं नृप । अजानन्नक्षिपं बाणं घोररूपं भयावहम् ॥
kadācidbrāhmaṇasyātha homadhenorahaṃ nṛpa | ajānannakṣipaṃ bāṇaṃ ghorarūpaṃ bhayāvaham
हे राजन्, एक बार मैंने अनजाने में एक ब्राह्मण की होमधेनु पर भयानक रूप वाला, भय पैदा करने वाला बाण चला दिया।
श्लोक 46 (8.36.46)
होमधेन्वास्ततो वत्सः प्रमत्त इषुणा हतः । चरन्वै विजने शल्य ततोऽनु व्याजहार सः ॥
homadhenvāstato vatsaḥ pramatta iṣuṇā hataḥ | caranvai vijane śalya tato'nu vyājahāra saḥ
तब हे शल्य, निर्जन स्थान में असावधान घूमता हुआ उस होमधेनु का बछड़ा बाण से मारा गया; और तब उस ब्राह्मण ने मुझसे कहा:
श्लोक 47 (8.36.47)
यस्माद्वत्सस्त्वया चात्र होमधेन्वा हतो नृप । तस्मात्त्वमपि राधेय वाक्शल्यं महदाप्नुहि ॥
yasmādvatsastvayā cātra homadhenvā hato nṛpa | tasmāttvamapi rādheya vākśalyaṃ mahadāpnuhi
‘हे राजन्, तुमने यहाँ होमधेनु के बछड़े को मार डाला है, इसलिए हे राधेय, तुम भी वाणी का महान् शूल पाओ।
श्लोक 48 (8.36.48)
श्वभ्रे ते पतिता चक्रं युध्यमानस्य शत्रुणा । प्राप्त एकायने काले मृत्युसाधारणे त्वयि ॥
śvabhre te patitā cakraṃ yudhyamānasya śatruṇā | prāpta ekāyane kāle mṛtyusādhāraṇe tvayi
जब तुम शत्रु से लड़ रहे होगे, तब तुम्हारा पहिया गड्ढे में गिर पड़ेगा; जब तुम पर मृत्यु के साथ साझा वह अटल घड़ी आ पहुँचेगी।
श्लोक 49 (8.36.49)
स्पर्धसे येन सङ्ग्रामे यदर्थं घटसेऽनिशम् । तत एव ध्रुवं मृत्युं सूत प्राप्स्यसि संयुगे ॥
spardhase yena saṅgrāme yadarthaṃ ghaṭase'niśam | tata eva dhruvaṃ mṛtyuṃ sūta prāpsyasi saṃyuge
जिससे तुम युद्ध में स्पर्धा करते हो और जिसके लिए निरन्तर यत्न करते हो, हे सूत, उसी के हाथ से तुम निश्चय ही युद्ध में मृत्यु को प्राप्त होगे।’
श्लोक 50 (8.36.50)
अहं प्रसादयाञ्चक्रे ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥
ahaṃ prasādayāñcakre brāhmaṇaṃ saṃśitavratam
मैंने कठोर व्रत वाले उन ब्राह्मण को प्रसन्न करने का यत्न किया।
श्लोक 51 (8.36.51)
गवां दशशतं वित्तं बलीवर्दांश्च षट्शतम् । प्रच्छन्नं काञ्चनैः कामं ब्राह्मणार्थमहं तदा ॥
gavāṃ daśaśataṃ vittaṃ balīvardāṃśca ṣaṭśatam | pracchannaṃ kāñcanaiḥ kāmaṃ brāhmaṇārthamahaṃ tadā
उस ब्राह्मण के लिए मैंने तब हज़ार गायें धन के रूप में और छह सौ बैल, सोने से सजाकर, जितना वह चाहे उतना देने को कहा।
श्लोक 52 (8.36.52)
दासीशतं निष्ककण्ठं शतमश्वतरीरथान् । कन्यानां निष्ककण्ठीनां सहस्रं समलंकृतम् ॥
dāsīśataṃ niṣkakaṇṭhaṃ śatamaśvatarīrathān | kanyānāṃ niṣkakaṇṭhīnāṃ sahasraṃ samalaṃkṛtam
गले में सोने के हार पहने सौ दासियाँ, सौ खच्चर-रथ, और सोने के हार पहने, भली-भाँति सजी हुई एक हज़ार कन्याएँ।
श्लोक 53 (8.36.53)
ईषादन्तान्नागशतान्दासीदासशतानि च । दद्मि तैर्द्विजमुख्यो मे प्रसादं न चकार सः ॥
īṣādantānnāgaśatāndāsīdāsaśatāni ca | dadmi tairdvijamukhyo me prasādaṃ na cakāra saḥ
हल की ईषा जैसे दाँतों वाले सौ हाथी और सैकड़ों दास-दासियाँ मैंने दीं; फिर भी उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने मुझ पर कृपा नहीं की।
श्लोक 54 (8.36.54)
कृष्णानां श्वेतवत्सानां गोशतानि चतुर्दश । ददन्हि न लभे तस्मात्प्रसादं द्विजसत्तमात् ॥
kṛṣṇānāṃ śvetavatsānāṃ gośatāni caturdaśa | dadanhi na labhe tasmātprasādaṃ dvijasattamāt
श्वेत बछड़ों वाली चौदह सौ काली गायें देने पर भी मैं उन श्रेष्ठ ब्राह्मण की कृपा न पा सका।
श्लोक 55 (8.36.55)
यत्किञ्चिन्मामकं वित्तं त्वदधीनं करोमि तत् । इति मां याचमानं वै ब्राह्मणः प्रत्यवारयत् । क्रोधदीप्तेक्षणः शल्य निर्दहन्निव चक्षुषा ॥
yatkiñcinmāmakaṃ vittaṃ tvadadhīnaṃ karomi tat | iti māṃ yācamānaṃ vai brāhmaṇaḥ pratyavārayat | krodhadīptekṣaṇaḥ śalya nirdahanniva cakṣuṣā
‘मेरा जो कुछ धन है, वह सब मैं आपके अधीन कर देता हूँ’, इस प्रकार याचना करने पर भी, हे शल्य, उन ब्राह्मण ने क्रोध से जलती आँखों से मानो मुझे भस्म करते हुए मना कर दिया।
श्लोक 56 (8.36.56)
व्याहृतं यन्मया सूत तत्तथा न तदन्यथा । अनृतोक्तं प्रजां हन्यात्ततः पापमवाप्नुयाम् ॥
vyāhṛtaṃ yanmayā sūta tattathā na tadanyathā | anṛtoktaṃ prajāṃ hanyāttataḥ pāpamavāpnuyām
‘सूत, मैंने जो कह दिया है, वह वैसा ही होगा, अन्यथा नहीं। झूठ बोलने से प्रजा का नाश होता है, और तब मुझे पाप लगेगा।
श्लोक 57 (8.36.57)
तस्माद्धर्माभिरक्षार्थं नानृतं वक्तुमुत्सहे । मा त्वं ब्रह्मगतिं हिंस्याः प्रायश्चित्तं कृतं त्वया ॥
tasmāddharmābhirakṣārthaṃ nānṛtaṃ vaktumutsahe | mā tvaṃ brahmagatiṃ hiṃsyāḥ prāyaścittaṃ kṛtaṃ tvayā
इसलिए धर्म की रक्षा के लिए मैं झूठ बोलने का साहस नहीं करता। ब्राह्मण के वचन से निश्चित हुई गति को मत तोड़ो; तुम प्रायश्चित कर ही चुके हो।
श्लोक 58 (8.36.58)
मद्वाक्यं नानृतं लोके कश्चित्कुर्यात्समाप्नुहि । यन्मयोक्तं सरोषेण गच्छ सूतज माचिरम् ॥
madvākyaṃ nānṛtaṃ loke kaścitkuryātsamāpnuhi | yanmayoktaṃ saroṣeṇa gaccha sūtaja māciram
संसार में कोई मेरे वचन को मिथ्या नहीं कर सकता; इसे स्वीकार करो। जो मैंने क्रोध में कहा है, हे सूतपुत्र, उसे लेकर देर किए बिना चले जाओ।’
श्लोक 59 (8.36.59)
इति मामसकृत्क्रुद्धः स उवाच द्विजोत्तमः । एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥
iti māmasakṛtkruddhaḥ sa uvāca dvijottamaḥ | ete hi somarājāna īśvarāḥ sukhaduḥkhayoḥ
इस प्रकार बार-बार क्रोध करते हुए उन द्विजश्रेष्ठ ने मुझसे कहा: ‘ये सोमराज, अर्थात् ब्राह्मण, सुख-दुःख के स्वामी हैं।’
श्लोक 60 (8.36.60)
नाहं बिभेमि बीभत्सोर्न शल्य मधुसूदनात् । तस्माद्बिभेम्यहं शापात्तेन सत्येन ते शपे ॥
nāhaṃ bibhemi bībhatsorna śalya madhusūdanāt | tasmādbibhemyahaṃ śāpāttena satyena te śape
हे शल्य, मुझे न बीभत्सु से भय है, न मधुसूदन से; मैं उस शाप से डरता हूँ। उसी सत्य की शपथ लेकर मैं तुमसे यह कहता हूँ।
श्लोक 61 (8.36.61)
सह युद्धं समेताभ्यामद्येदं समुपस्थितम् । युद्धेऽस्मिञ्जीवितं मेऽद्य शल्य संशयमागतम् ॥
saha yuddhaṃ sametābhyāmadyedaṃ samupasthitam | yuddhe'smiñjīvitaṃ me'dya śalya saṃśayamāgatam
उन दोनों के साथ एक साथ यह युद्ध आज मेरे सामने आ गया है; हे शल्य, इस युद्ध में आज मेरे प्राण संकट में पड़ गए हैं।
श्लोक 62 (8.36.62)
शक्रोऽप्यमरराट् ताभ्यामुपगम्याहवं सह । संशयं परमं गच्छेत्कथं वा मन्यते भवान् ॥
śakro'pyamararāṭ tābhyāmupagamyāhavaṃ saha | saṃśayaṃ paramaṃ gacchetkathaṃ vā manyate bhavān
अमरों के राजा शक्र भी यदि उन दोनों के साथ युद्ध में उतरें, तो वे भी भारी संशय में पड़ जाएँगे। आप क्या सोचते हैं?
श्लोक 63 (8.36.63)
इत्येवं ते मयाऽऽख्यातं क्षिप्तेन न सुहृत्तया । जानामि त्वाऽधिक्षिपन्तं दोषमात्मगतं शृणु ॥
ityevaṃ te mayā''khyātaṃ kṣiptena na suhṛttayā | jānāmi tvā'dhikṣipantaṃ doṣamātmagataṃ śṛṇu
यह सब मैंने तुमसे कहा है, पर उकसाए जाने के कारण कहा है, मित्रभाव से नहीं। मैं जानता हूँ कि तुम मेरी निन्दा कर रहे हो; अब अपने ही भीतर के दोष को सुनो।