कर्ण पर्व · अध्याय 35
शल्य द्वारा हंस और कौए की कथा
शल्य कर्ण की डींग का उत्तर एक दृष्टान्त से देते हैं। एक वैश्य के घर की जूठन से पला कौआ इतना घमण्डी हो जाता है कि वह हंस को उड़ान की होड़ के लिए ललकारता है, सौ और एक प्रकार की उड़ानें जानने का दावा करता है, और समुद्र के ऊपर हारकर लगभग डूब जाता है। दया से भरा हंस उसे पीठ पर बैठाकर किनारे लौटा लाता है। फिर शल्य इस कथा को कर्ण पर लगाते हैं, जो दुर्योधन के टुकड़ों पर पल रहा है; वे विराटनगर और द्वैतवन में अर्जुन के सामने उसके भागने की याद दिलाते हैं और उसे कृष्ण तथा अर्जुन का अपमान बन्द करने को कहते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.35.1)
मारिषाधिरथेः श्रुत्वा वाचो युद्धाभिनन्दिनः । शल्योऽब्रवीत्पुनः कर्णं निदर्शनमुदाहरन् ॥
māriṣādhiratheḥ śrutvā vāco yuddhābhinandinaḥ | śalyo'bravītpunaḥ karṇaṃ nidarśanamudāharan
हे आर्य, अधिरथपुत्र कर्ण के युद्ध का अभिनन्दन करने वाले वचन सुनकर शल्य ने फिर कर्ण से एक दृष्टान्त कहते हुए यह बात कही।
शल्य उवाच
श्लोक 2 (8.35.2)
जातोऽहं यज्वनां वंशे सङ्ग्रामेष्वनिवर्तिनाम् । राज्ञां मूर्धाभिषिक्तानां स्वयं धर्मपरायणः ॥
jāto'haṃ yajvanāṃ vaṃśe saṅgrāmeṣvanivartinām | rājñāṃ mūrdhābhiṣiktānāṃ svayaṃ dharmaparāyaṇaḥ
मेरा जन्म ऐसे यज्ञ करने वालों के वंश में हुआ है जो युद्धों से कभी पीछे नहीं हटते, उन मूर्धाभिषिक्त राजाओं के कुल में; और मैं स्वयं भी धर्म में तत्पर हूँ।
श्लोक 3 (8.35.3)
यथैव मत्तो मद्येन त्वं तथा लक्ष्यसे वृष । तथाऽद्य त्वां प्रमाद्यन्तं चिकित्सेयं सुहृत्तया ॥
yathaiva matto madyena tvaṃ tathā lakṣyase vṛṣa | tathā'dya tvāṃ pramādyantaṃ cikitseyaṃ suhṛttayā
हे वीर, जैसे कोई मदिरा से मतवाला हो जाता है, वैसे ही तुम मुझे दिखाई देते हो; इसीलिए आज तुम्हें प्रमाद में पड़ा देखकर मैं मित्रभाव से तुम्हारा उपचार करूँगा।
श्लोक 4 (8.35.4)
इमां काकोपमां कर्ण प्रोच्यमानां निबोध मे । श्रुत्वा यथेष्टं कुर्यास्त्वं निहीन कुलपांसन ॥
imāṃ kākopamāṃ karṇa procyamānāṃ nibodha me | śrutvā yatheṣṭaṃ kuryāstvaṃ nihīna kulapāṃsana
हे कर्ण, कौए की उपमा वाली यह कथा, जो मैं कह रहा हूँ, मुझसे सुनो; और सुनकर, हे नीच, कुल को कलंकित करने वाले, जैसा चाहो वैसा करना।
श्लोक 5 (8.35.5)
नाहमात्मनि किञ्चिद्वै किल्बिषं कर्ण संस्मरे । येन मां त्वं महाबाहो हन्तुमिच्छस्यनागसम् ॥
nāhamātmani kiñcidvai kilbiṣaṃ karṇa saṃsmare | yena māṃ tvaṃ mahābāho hantumicchasyanāgasam
हे कर्ण, मुझे अपने में ऐसा कोई अपराध स्मरण नहीं आता, जिसके कारण तुम, हे महाबाहो, मुझ निरपराध को मारना चाहो।
श्लोक 6 (8.35.6)
अवश्यं तु मया वाच्यं बुद्ध्वा तव हिताहितम् । विशेषतो रथस्थेन राज्ञश्चैव हितैषिणा ॥
avaśyaṃ tu mayā vācyaṃ buddhvā tava hitāhitam | viśeṣato rathasthena rājñaścaiva hitaiṣiṇā
फिर भी तुम्हारे हित और अहित को समझकर मुझे बोलना ही होगा, विशेषकर इसलिए कि मैं रथ पर बैठा हूँ और राजा का हितैषी हूँ।
श्लोक 7 (8.35.7)
समं च विषमं चैव रथिनश्च बलाबलम् । श्रमः खेदश्च सततं हयानां रथिना सह ॥
samaṃ ca viṣamaṃ caiva rathinaśca balābalam | śramaḥ khedaśca satataṃ hayānāṃ rathinā saha
सम और विषम भूमि, रथी का बल और निर्बलता, तथा रथी के साथ घोड़ों की निरन्तर थकान और पीड़ा —
श्लोक 8 (8.35.8)
आयुधस्य परिज्ञानं रुतं च मृगपक्षिणाम् । सारं चैवाप्यासरं च शल्यानां च प्रतिक्रिया ॥
āyudhasya parijñānaṃ rutaṃ ca mṛgapakṣiṇām | sāraṃ caivāpyāsaraṃ ca śalyānāṃ ca pratikriyā
अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान, पशु-पक्षियों की बोलियों का ज्ञान, दृढ़ बल और अचानक आक्रमण, तथा बाणों के घावों का उपचार —
श्लोक 9 (8.35.9)
अस्त्रयोगं च युद्धं च निमित्तानि तथैव च । सर्वमेतन्मया ज्ञेयं रथस्यास्य कुटुम्बिना । अतस्त्वां कथये कर्ण निदर्शनमिदं पुनः ॥
astrayogaṃ ca yuddhaṃ ca nimittāni tathaiva ca | sarvametanmayā jñeyaṃ rathasyāsya kuṭumbinā | atastvāṃ kathaye karṇa nidarśanamidaṃ punaḥ
अस्त्रों का प्रयोग, युद्ध-कला और शकुन-निमित्त — यह सब मुझे जानना ही चाहिए, क्योंकि मैं इस रथ का कुटुम्बी (संरक्षक) हूँ। इसीलिए, हे कर्ण, मैं तुम्हें यह दृष्टान्त फिर सुनाता हूँ।
श्लोक 10 (8.35.10)
वैश्यः किल समुद्रान्ते प्रभूतधनधान्यवान् । यज्वा दानपतिः क्षान्तः स्वकर्मस्थोऽभवच्छुचिः ॥
vaiśyaḥ kila samudrānte prabhūtadhanadhānyavān | yajvā dānapatiḥ kṣāntaḥ svakarmastho'bhavacchuciḥ
कहते हैं, समुद्र के तट पर एक वैश्य रहता था, जो प्रचुर धन-धान्य से सम्पन्न, यज्ञ करने वाला, दानपति, क्षमाशील, अपने कर्म में स्थित और पवित्र था।
श्लोक 11 (8.35.11)
बहुपुत्रः प्रियापत्यः सर्वभूतानुकम्पकः । राज्ञो धर्मप्रधानस्य राष्ट्रे वसति निर्भयः ॥
bahuputraḥ priyāpatyaḥ sarvabhūtānukampakaḥ | rājño dharmapradhānasya rāṣṭre vasati nirbhayaḥ
उसके बहुत-से पुत्र थे, वह सन्तान से प्रेम करता था और सब प्राणियों पर दया रखता था; वह धर्म को सर्वोपरि मानने वाले राजा के राज्य में निर्भय होकर रहता था।
श्लोक 12 (8.35.12)
पुत्राणां तस्य बालानां कुमाराणां यशस्विनाम् । काको बहूनामभवदुच्छिष्टकृतभोजनः ॥
putrāṇāṃ tasya bālānāṃ kumārāṇāṃ yaśasvinām | kāko bahūnāmabhavaducchiṣṭakṛtabhojanaḥ
उसके उन अनेक यशस्वी बालक पुत्रों के जूठे भोजन पर एक कौआ पलता था।
श्लोक 13 (8.35.13)
तस्मै सदा प्रयच्छन्ति वैश्यपुत्राः कुमारकाः । मांसोदनं दधि क्षीरं पायसं मधुसर्पिषी ॥
tasmai sadā prayacchanti vaiśyaputrāḥ kumārakāḥ | māṃsodanaṃ dadhi kṣīraṃ pāyasaṃ madhusarpiṣī
वैश्य के बालक उसे सदा माँस-भात, दही, दूध, खीर, मधु और घी देते थे।
श्लोक 14 (8.35.14)
स चोच्छिष्टभृतः काको वैश्यपुत्रैः कुमारकैः । सदृशान्पक्षिणो दृप्तः श्रेयसश्चावमन्यते ॥
sa cocchiṣṭabhṛtaḥ kāko vaiśyaputraiḥ kumārakaiḥ | sadṛśānpakṣiṇo dṛptaḥ śreyasaścāvamanyate
वैश्य-पुत्रों के जूठन से पला हुआ वह कौआ घमण्ड में आकर अपने बराबर के पक्षियों का और अपने से श्रेष्ठों का भी अपमान करता था।
श्लोक 15 (8.35.15)
अथ हंसाः समुद्रान्ते प्रजग्मुरतिपातिनः । गरुडस्य गतौ तुल्याश्चक्राङ्गा हृष्टचेतसः ॥
atha haṃsāḥ samudrānte prajagmuratipātinaḥ | garuḍasya gatau tulyāścakrāṅgā hṛṣṭacetasaḥ
तब समुद्र के किनारे द्रुतगामी हंस आए, जो उड़ान में गरुड़ के समान थे और प्रसन्नचित्त थे।
श्लोक 16 (8.35.16)
कुमारकास्तदा हंसान्दृष्ट्वा काकमथाब्रुवन् । भवानेव विशिष्टोऽसि पतत्रिभ्यो विहङ्गम ॥
kumārakāstadā haṃsāndṛṣṭvā kākamathābruvan | bhavāneva viśiṣṭo'si patatribhyo vihaṅgama
तब बालकों ने हंसों को देखकर कौए से कहा, "हे आकाशचारी, सब पक्षियों में तुम्हीं सबसे श्रेष्ठ हो।"
श्लोक 17 (8.35.17)
एतेऽतिपातिनः पश्य विहङ्गान्वियदाश्रितान् । एहि त्वमपि शक्तो हि कस्मान्न पतितं त्वया ॥
ete'tipātinaḥ paśya vihaṅgānviyadāśritān | ehi tvamapi śakto hi kasmānna patitaṃ tvayā
"देखो, ये तेज उड़ने वाले पक्षी आकाश में जा रहे हैं। आओ, तुम भी समर्थ हो; तुमने क्यों नहीं उड़ान भरी?"
श्लोक 18 (8.35.18)
प्रतार्यमाणस्तैः सर्वैरल्पबुद्धिभिरण्डजः । तद्वचः सत्यमित्येव मौर्ख्याद्दर्पाच्च जज्ञिवान् ॥
pratāryamāṇastaiḥ sarvairalpabuddhibhiraṇḍajaḥ | tadvacaḥ satyamityeva maurkhyāddarpācca jajñivān
उन सबके द्वारा बहकाया जाता हुआ वह मन्दबुद्धि पक्षी मूर्खता और अभिमान से उनकी बात को सच ही मान बैठा।
श्लोक 19 (8.35.19)
तान्सोनुपत्य जिज्ञासुः क एषां श्रेष्ठभागिति । उच्छिष्टदर्पितः काको बहूनामेकपातिनाम् ॥
tānsonupatya jijñāsuḥ ka eṣāṃ śreṣṭhabhāgiti | ucchiṣṭadarpitaḥ kāko bahūnāmekapātinām
बहुत-से दूर तक उड़ने वाले उन हंसों के पीछे उड़कर, यह जानने की इच्छा से कि इनमें कौन श्रेष्ठ है, जूठन के घमण्ड से भरा वह कौआ उनके बीच पहुँचा।
श्लोक 20 (8.35.20)
तेषां यं प्रवरं मेने हंसानां दूरपातिनाम् । स तमाह्वत दुर्बुद्धिः पताव इति पक्षिणम् । तच्छ्रुत्वा प्राहसन्हंसा ये तत्रासन्समागताः ॥
teṣāṃ yaṃ pravaraṃ mene haṃsānāṃ dūrapātinām | sa tamāhvata durbuddhiḥ patāva iti pakṣiṇam | tacchrutvā prāhasanhaṃsā ye tatrāsansamāgatāḥ
उन दूर तक उड़ने वाले हंसों में जिसे उसने सबसे श्रेष्ठ समझा, उसी को उस दुर्बुद्धि ने पुकारा, "आओ, हम दोनों उड़ें।" यह सुनकर वहाँ एकत्र हुए हंस हँस पड़े।
श्लोक 21 (8.35.21)
भाषतो बहु काकस्य बालिश्यात्पततां वराः । इदमूचुः स्म चक्राङ्गा वचः काकं विहङ्गमाः ॥
bhāṣato bahu kākasya bāliśyātpatatāṃ varāḥ | idamūcuḥ sma cakrāṅgā vacaḥ kākaṃ vihaṅgamāḥ
कौआ बहुत बढ़-चढ़कर बोलता रहा; तब उसकी बालबुद्धि को देखकर उन उड़ने वालों में श्रेष्ठ हंसों ने कौए से ये वचन कहे।
हंसा ऊचुः
श्लोक 22 (8.35.22)
वयं हंसाश्चरामेमां पृथिवीं मानसौकसः । पक्षिणां च वयं नित्यं दूरपातेन पूजिताः ॥
vayaṃ haṃsāścarāmemāṃ pṛthivīṃ mānasaukasaḥ | pakṣiṇāṃ ca vayaṃ nityaṃ dūrapātena pūjitāḥ
हम हंस हैं, मानसरोवर में रहने वाले, जो इस पृथ्वी पर विचरते हैं; और पक्षियों में हम सदा लम्बी उड़ान के कारण सम्मानित हैं।
श्लोक 23 (8.35.23)
कथं हंसं नु बलिनं चक्राङ्गं दूरपातिनम् । काको भूत्वा निपतने समाह्वयसि दुर्मते । कथं त्वं पतिता काक सहास्माभिर्ब्रवीहि तत् ॥
kathaṃ haṃsaṃ nu balinaṃ cakrāṅgaṃ dūrapātinam | kāko bhūtvā nipatane samāhvayasi durmate | kathaṃ tvaṃ patitā kāka sahāsmābhirbravīhi tat
हे दुर्बुद्धि, तू कौआ होकर बलवान् और दूर तक उड़ने वाले हंस को उड़ान की होड़ के लिए कैसे ललकारता है? हे कौए, बता, तू हमारे साथ कैसे उड़ेगा?
शल्य उवाच
श्लोक 24 (8.35.24)
अथ हंसवचो मूढः कुत्सयित्वा पुनः पुनः । प्रजगादोत्तरं काकः कत्थनो जातिलाघवात् ॥
atha haṃsavaco mūḍhaḥ kutsayitvā punaḥ punaḥ | prajagādottaraṃ kākaḥ katthano jātilāghavāt
तब उस मूर्ख कौए ने हंसों की बात का बार-बार तिरस्कार किया और अपनी नीच जाति के कारण डींग हाँकते हुए यह उत्तर दिया।
काक उवाच
श्लोक 25 (8.35.25)
शतमेकं च पातानां पतिताऽस्मि न संशयः । शतयोजनमेकैकं विचित्रं विविधं तथा ॥
śatamekaṃ ca pātānāṃ patitā'smi na saṃśayaḥ | śatayojanamekaikaṃ vicitraṃ vividhaṃ tathā
"इसमें सन्देह नहीं कि मैंने एक सौ एक उड़ानें भरी हैं, प्रत्येक सौ योजन की, और सब विचित्र तथा भिन्न-भिन्न प्रकार की।"
श्लोक 26 (8.35.26)
उड्डीनमवडीनं च प्रडीनं डीनमेव च । निडीनमथ संडीनं तिर्यक्डीनगतानि च ॥
uḍḍīnamavaḍīnaṃ ca praḍīnaṃ ḍīnameva ca | niḍīnamatha saṃḍīnaṃ tiryakḍīnagatāni ca
"उड्डीन, अवडीन, प्रडीन, डीन, निडीन, संडीन और तिरछी उड़ानें;"
श्लोक 27 (8.35.27)
विडीनं परिडीनं च पराडीनं सुडीनकम् । अभिडीनं महाडीनं निर्डीनमतिडीनकम् ॥
viḍīnaṃ pariḍīnaṃ ca parāḍīnaṃ suḍīnakam | abhiḍīnaṃ mahāḍīnaṃ nirḍīnamatiḍīnakam
"विडीन, परिडीन, पराडीन, सुडीन, अभिडीन, महाडीन, निर्डीन और अतिडीन;"
श्लोक 28 (8.35.28)
अवडीनं प्रडीनं च संडीनं डीनडीनकम् । संडीनोड्डीनडीनं च पुनर्डीनविडीनकम् ॥
avaḍīnaṃ praḍīnaṃ ca saṃḍīnaṃ ḍīnaḍīnakam | saṃḍīnoḍḍīnaḍīnaṃ ca punarḍīnaviḍīnakam
"अवडीन, प्रडीन, संडीन और डीनडीनक, संडीनोड्डीनडीन और पुनर्डीनविडीनक;"
श्लोक 29 (8.35.29)
संपातं समुदीषं च ततोऽन्यद्व्यतिरिक्तकम् । गतागतं प्रतिगतं बह्वीश्च निकुलीनकाः । कर्ताऽस्मि मिषतां वोऽद्य ततो द्रक्ष्यथ मे बलम् ॥
saṃpātaṃ samudīṣaṃ ca tato'nyadvyatiriktakam | gatāgataṃ pratigataṃ bahvīśca nikulīnakāḥ | kartā'smi miṣatāṃ vo'dya tato drakṣyatha me balam
"संपात, समुदीष और उनसे भिन्न विशिष्ट उड़ानें; जाना-आना, लौटना, और अनेक निकुलीनक। तुम्हारे देखते-देखते मैं आज इन्हें करूँगा, तब तुम मेरा बल देखोगे।"
श्लोक 30 (8.35.30)
तेषामन्यतमेनाहं पतिष्यामि विहायसम् । प्रदिशध्वं यथान्यायं केन हंसाः पताम्यहम् ॥
teṣāmanyatamenāhaṃ patiṣyāmi vihāyasam | pradiśadhvaṃ yathānyāyaṃ kena haṃsāḥ patāmyaham
"इनमें से किसी एक के द्वारा मैं आकाश में उड़ूँगा। हे हंसो, यथोचित बताओ, मैं किस उड़ान से उड़ूँ?"
श्लोक 31 (8.35.31)
ते वै ध्रुवं विनिश्चित्य सम्पतध्वं मया सह । पातैरेभिः खलु खगाः पतितुं खे निराश्रये ॥
te vai dhruvaṃ viniścitya sampatadhvaṃ mayā saha | pātairebhiḥ khalu khagāḥ patituṃ khe nirāśraye
"तो फिर इसका दृढ़ निश्चय करके, हे पक्षियो, इन उड़ानों के द्वारा बिना आधार के आकाश में उड़ने के लिए मेरे साथ उड़ो।"
शल्य उवाच
श्लोक 32 (8.35.32)
एवमुक्ते तु काकेन प्रहस्यैको विहंगमः । उवाच काकं राधेय वचनं तन्निबोध मे ॥
evamukte tu kākena prahasyaiko vihaṃgamaḥ | uvāca kākaṃ rādheya vacanaṃ tannibodha me
कौए के ऐसा कहने पर एक हंस ने हँसकर कौए से वह बात कही; हे राधेय, उसे मुझसे सुनो।
हंस उवाच
श्लोक 33 (8.35.33)
शतमेकं च पातानां त्वं काक पतिता ध्रुवम् । एकमेव तु यं पातं विदुः सर्वे विहङ्गमाः । तमहं पतिता काक नान्यं जानामि कञ्चन ॥
śatamekaṃ ca pātānāṃ tvaṃ kāka patitā dhruvam | ekameva tu yaṃ pātaṃ viduḥ sarve vihaṅgamāḥ | tamahaṃ patitā kāka nānyaṃ jānāmi kañcana
"हे कौए, तूने निश्चय ही सौ और एक उड़ानें भरी हैं। परन्तु जिस एक ही उड़ान को सब पक्षी जानते हैं, उसी में मैं उड़ता हूँ, हे कौए; मैं और कोई उड़ान नहीं जानता।"
काक उवाच
श्लोक 34 (8.35.34)
पत त्वमपि तत्राशु येन पातेन मन्यसे ॥
pata tvamapi tatrāśu yena pātena manyase
"तो तू भी वहाँ शीघ्र उड़, जिस उड़ान से भी तू उचित समझे।"
शल्य उवाच
श्लोक 35 (8.35.35)
अथ काकं प्रजहसुर्ये तत्रासन्समागताः । कथमेकेन पातेन हंसः पातशतं जयेत् । एकेन वायस त्वैनं पातेनाभिभविष्यति ॥
atha kākaṃ prajahasurye tatrāsansamāgatāḥ | kathamekena pātena haṃsaḥ pātaśataṃ jayet | ekena vāyasa tvainaṃ pātenābhibhaviṣyati
तब वहाँ एकत्र हुए पक्षी कौए पर हँस पड़े, "एक उड़ान से हंस सौ उड़ानों को कैसे जीतेगा? हे कौए, एक ही उड़ान से वह तुझे पराजित कर देगा।"
श्लोक 36 (8.35.36)
हंसश्चोत्पतितः काको बलवानाशुविक्रमः । प्रपेततुः स्पर्धया च ततस्तौ हंसवायसौ । उपर्युपरि वेगेन समुद्रं मकरालयम् ॥
haṃsaścotpatitaḥ kāko balavānāśuvikramaḥ | prapetatuḥ spardhayā ca tatastau haṃsavāyasau | uparyupari vegena samudraṃ makarālayam
हंस उड़ा और बलवान् तथा शीघ्रगामी कौआ भी उड़ा; तब वे दोनों, हंस और कौआ, होड़ लगाकर मकरों के निवास उस समुद्र के ऊपर-ऊपर वेग से उड़ चले।
श्लोक 37 (8.35.37)
हंसस्त्वेकेन पातेन काकः पातशतेन च । स्पर्धिनौ सहितौ तूर्णं खमास्थाय तरस्विनौ ॥
haṃsastvekena pātena kākaḥ pātaśatena ca | spardhinau sahitau tūrṇaṃ khamāsthāya tarasvinau
हंस एक उड़ान से और कौआ सौ उड़ानों से; वे दोनों वेगवान् स्पर्धी साथ-साथ शीघ्र ही आकाश में चढ़ गए।
श्लोक 38 (8.35.38)
हंसस्तु मृदुनैकेन विक्रान्तुमुपचक्रमे । पूर्वमेव तु वै काकः स तं तूर्णं प्रचक्रमे ॥
haṃsastu mṛdunaikena vikrāntumupacakrame | pūrvameva tu vai kākaḥ sa taṃ tūrṇaṃ pracakrame
हंस ने एक मृदु उड़ान से आगे बढ़ना आरम्भ किया, जबकि कौआ पहले से ही तेजी से आगे निकल पड़ा था।
श्लोक 39 (8.35.39)
नात्यहीयत काकश्च मुहूर्तमिव सूतज ॥
nātyahīyata kākaśca muhūrtamiva sūtaja
हे सूतपुत्र, एक क्षण के लिए कौआ पीछे नहीं रहा।
श्लोक 40 (8.35.40)
काकोपि हंसं चापल्याच्छीघ्रतां प्रतिदर्शयन् । वेगेनातीत्य तरसा पुनरेति मुहुर्मुहुः ॥
kākopi haṃsaṃ cāpalyācchīghratāṃ pratidarśayan | vegenātītya tarasā punareti muhurmuhuḥ
चंचलता के कारण कौआ हंस को अपनी तेजी दिखाता हुआ वेग से उसके आगे निकल जाता और फिर बार-बार लौट आता।
श्लोक 41 (8.35.41)
तुण्डेनाभ्यहनच्चैनं कुर्वन्नामापसव्यतः । रोरूयन्निव चाप्येनं समाह्वयति वै मुहुः । विसिस्मापयिषुः पातैर्दर्शयन्नात्मनः क्रियाम् ॥
tuṇḍenābhyahanaccainaṃ kurvannāmāpasavyataḥ | rorūyanniva cāpyenaṃ samāhvayati vai muhuḥ | visismāpayiṣuḥ pātairdarśayannātmanaḥ kriyām
वह चोंच से हंस पर चोट करता, उसकी बाईं ओर चक्कर काटता, कर्कश स्वर में चिल्लाता हुआ-सा उसे बार-बार पुकारता, और अपनी उड़ानों से उसे चकित करने की इच्छा से अपना करतब दिखाता था।
श्लोक 42 (8.35.42)
अथ तानि विचित्राणि पतितानीतराणि च । दृष्ट्वा प्रमुदिताः काका विनेदुरधिकैः स्वरैः ॥
atha tāni vicitrāṇi patitānītarāṇi ca | dṛṣṭvā pramuditāḥ kākā vineduradhikaiḥ svaraiḥ
वे विचित्र और दूसरी उड़ानें देखकर कौए बहुत प्रसन्न हुए और और भी ऊँचे स्वरों में काँव-काँव करने लगे।
श्लोक 43 (8.35.43)
हंसांश्चापहसन्ति स्म प्रवदन्ति प्रियाणि च । कुर्वाणा विविधान्रावानिच्छन्तो जयमात्मनः ॥
haṃsāṃścāpahasanti sma pravadanti priyāṇi ca | kurvāṇā vividhānrāvānicchanto jayamātmanaḥ
वे हंसों की हँसी उड़ाते थे और मीठी बातें कहते थे, अनेक प्रकार की बोलियाँ बोलते हुए अपने पक्ष की जीत चाहते थे।
श्लोक 44 (8.35.44)
उत्पत्योत्पत्य च प्राहुर्मुहूर्तमिति चेति च । वृक्षाग्रेभ्यः स्थलेभ्यश्च निपतन्त्युत्पतन्ति च ॥
utpatyotpatya ca prāhurmuhūrtamiti ceti ca | vṛkṣāgrebhyaḥ sthalebhyaśca nipatantyutpatanti ca
वे बार-बार उड़-उड़कर कहते, "बस एक क्षण!" और ऐसी ही बातें; वृक्षों की चोटियों से और भूमि से वे उतरते और ऊपर उड़ते थे।
श्लोक 45 (8.35.45)
अवमत्य च हंसं तमिदं काकोऽब्रवीद्वचः । योऽसावुत्पतितो हंसः सोऽसावेव प्रहीयते ॥
avamatya ca haṃsaṃ tamidaṃ kāko'bravīdvacaḥ | yo'sāvutpatito haṃsaḥ so'sāveva prahīyate
उस हंस का अनादर करके कौए ने यह वचन कहा, "जो यह हंस ऊपर उठा था, वही पीछे रहा जा रहा है।"
श्लोक 46 (8.35.46)
अथ हंसस्तु तच्छ्रुत्वा भाषितं पततांवरः । विगाह्य हंसो विक्षोभ्य प्रापतत्पश्चिमां दिशम् ॥
atha haṃsastu tacchrutvā bhāṣitaṃ patatāṃvaraḥ | vigāhya haṃso vikṣobhya prāpatatpaścimāṃ diśam
यह वचन सुनकर उड़ने वालों में श्रेष्ठ हंस ने आगे घुसकर आकाश को मथते हुए पश्चिम दिशा की ओर उड़ान भरी।
श्लोक 47 (8.35.47)
उपर्युपरि वेगेन सागरं मकरालयम् । बहुसत्वसमाकीर्णं वीचीभिर्भीमदर्शनम् ॥
uparyupari vegena sāgaraṃ makarālayam | bahusatvasamākīrṇaṃ vīcībhirbhīmadarśanam
वह मकरों के निवास उस सागर के ऊपर-ऊपर वेग से चला, जो अनेक जीवों से भरा था और लहरों के कारण भयंकर दीखता था।
श्लोक 48 (8.35.48)
अथाचिरेण राधेय काको वेगादहीयत । ततोऽतीव परिश्रान्तः कथञ्चिद्धंसमन्वगात् ॥
athācireṇa rādheya kāko vegādahīyata | tato'tīva pariśrāntaḥ kathañciddhaṃsamanvagāt
हे राधेय, थोड़ी ही देर में कौआ वेग में पीछे रह गया; तब अत्यन्त थका हुआ वह किसी तरह हंस के पीछे चलता रहा।
श्लोक 49 (8.35.49)
भीश्चैनमाविशत्तीव्रं काकं कर्ण विचेतसम् । द्वीपान्द्रुमान्वितान्पश्यन्विश्रमार्थं श्रमातुरः । निपतेयं क्व नु श्रान्त इति तस्मिञ्जलार्णवे ॥
bhīścainamāviśattīvraṃ kākaṃ karṇa vicetasam | dvīpāndrumānvitānpaśyanviśramārthaṃ śramāturaḥ | nipateyaṃ kva nu śrānta iti tasmiñjalārṇave
हे कर्ण, उस घबराए हुए कौए में तीव्र भय समा गया; थकान से व्याकुल होकर वह विश्राम के लिए वृक्षों वाले द्वीप खोजता हुआ सोचने लगा, "इस जल के सागर में थककर मैं कहाँ उतरूँगा?"
श्लोक 50 (8.35.50)
अवगाह्य समुद्रोऽपि बहुसत्वगणालयः । महान्भूतशतोद्भासी नभसस्तु विशिष्यते ॥
avagāhya samudro'pi bahusatvagaṇālayaḥ | mahānbhūtaśatodbhāsī nabhasastu viśiṣyate
प्रवेश करने पर यह समुद्र, जो अनेक जीव-समूहों का घर है और सैकड़ों महाप्राणियों से प्रकाशित होता है, आकाश से भी बढ़कर लगता है।
श्लोक 51 (8.35.51)
गाम्भीर्याद्धि समुद्रस्य न विशेषं कुलाधम । दिशश्च नाम्भसां कर्ण समुद्रस्था विदुर्जनाः । विपश्चितोप्यपारत्वात्किं पुनः कर्ण वायसः ॥
gāmbhīryāddhi samudrasya na viśeṣaṃ kulādhama | diśaśca nāmbhasāṃ karṇa samudrasthā vidurjanāḥ | vipaścitopyapāratvātkiṃ punaḥ karṇa vāyasaḥ
गहराई में, हे कुलाधम, समुद्र आकाश से भिन्न नहीं है; और हे कर्ण, समुद्र में रहने वाले लोग न दिशाओं को जानते हैं, न जल को। विद्वान् भी उसकी अपारता के कारण उसे नहीं माप पाते; तब, हे कर्ण, कौए की तो बात ही क्या?
श्लोक 52 (8.35.52)
अथ हंसोप्यतिक्रामन्मुहूर्तमिव दूरतः । अतिक्रम्य च चक्राङ्गः काकं तं समुदैक्षत ॥
atha haṃsopyatikrāmanmuhūrtamiva dūrataḥ | atikramya ca cakrāṅgaḥ kākaṃ taṃ samudaikṣata
तब हंस भी एक क्षण-भर थोड़ी दूर आगे निकल गया; और आगे बढ़कर उस हंस ने कौए की ओर मुड़कर देखा।
श्लोक 53 (8.35.53)
शनकैः परिहीनं तं परिश्रान्तमचेतसम् । अवेक्षमाणस्तं काकं प्रत्यागम्य हसन्निव ॥
śanakaiḥ parihīnaṃ taṃ pariśrāntamacetasam | avekṣamāṇastaṃ kākaṃ pratyāgamya hasanniva
धीरे-धीरे पीछे रह जाने वाले, थके हुए और बेसुध उस कौए को देखता हुआ वह हंस मानो हँसता हुआ उसके पास लौट आया।
श्लोक 54 (8.35.54)
तं प्रहस्य च चक्राङ्गः काकं मन्दगतिं तदा । हीयमानमथो दृष्ट्वा हंसः प्राह यथार्थवत् । उज्जिहीर्षुर्निमज्जन्तं स्मरन्सत्पुरुषव्रतम् ॥
taṃ prahasya ca cakrāṅgaḥ kākaṃ mandagatiṃ tadā | hīyamānamatho dṛṣṭvā haṃsaḥ prāha yathārthavat | ujjihīrṣurnimajjantaṃ smaransatpuruṣavratam
उस मन्दगति कौए पर हँसकर और उसे पिछड़ता देखकर हंस ने यथार्थ बात कही; वह डूबते हुए को उठाना चाहता था और सज्जनों के व्रत का स्मरण कर रहा था।
हंस उवाच
श्लोक 55 (8.35.55)
बहूनि पतितानि त्वमाचक्षाणो मुहुर्मुहुः । पतस्यव्याहरन्खेदं ततो गर्ह्यं प्रभाषसे ॥
bahūni patitāni tvamācakṣāṇo muhurmuhuḥ | patasyavyāharankhedaṃ tato garhyaṃ prabhāṣase
"तू बार-बार बहुत-सी उड़ानें गिनाता रहा; पर अब अपनी थकान की कोई बात कहे बिना गिर रहा है, इसलिए जो तू कहता है वह निन्दनीय है।"
श्लोक 56 (8.35.56)
जलं नाम पतितं काक यत्त्वं पतसि साम्प्रतम् । जलं स्पृशसि पक्षाभ्यां तुण्डेन च पुनः पुनः ॥
jalaṃ nāma patitaṃ kāka yattvaṃ patasi sāmpratam | jalaṃ spṛśasi pakṣābhyāṃ tuṇḍena ca punaḥ punaḥ
"हे कौए, इस समय तू जिस उड़ान से उड़ रहा है, वह तो 'जल' नाम की है; तू पंखों और चोंच से बार-बार जल को छू रहा है।"
श्लोक 57 (8.35.57)
प्रब्रूहि कतमोऽयं ते पातो वर्तति वायस । एह्येहि काक शीघ्रं त्वमेष त्वां परिपालये ॥
prabrūhi katamo'yaṃ te pāto vartati vāyasa | ehyehi kāka śīghraṃ tvameṣa tvāṃ paripālaye
"बता, हे कौए, यह तेरी कौन-सी उड़ान चल रही है? आ, आ, हे कौए, शीघ्र आ; यह मैं तेरी रक्षा करता हूँ।"
शल्य उवाच
श्लोक 58 (8.35.58)
स पक्षाभ्यां स्पृशन्नार्तस्तुण्डेन च जलं तदा । काको दृढं परिश्रान्तः सहसा निपपात ह ॥
sa pakṣābhyāṃ spṛśannārtastuṇḍena ca jalaṃ tadā | kāko dṛḍhaṃ pariśrāntaḥ sahasā nipapāta ha
पीड़ित कौआ पंखों और चोंच से जल को छूता हुआ, अत्यन्त थककर अचानक गिर पड़ा।
श्लोक 59 (8.35.59)
सागराम्भसि तं दृष्ट्वा पतितं दीनचेतसम् । म्रियमाणमिदं वाक्यं हंसः काकमुवाच ह ॥
sāgarāmbhasi taṃ dṛṣṭvā patitaṃ dīnacetasam | mriyamāṇamidaṃ vākyaṃ haṃsaḥ kākamuvāca ha
समुद्र के जल में गिरे हुए, दुःखी मन वाले और मरणासन्न उस कौए को देखकर हंस ने उससे यह बात कही।
हंस उवाच
श्लोक 60 (8.35.60)
शतमेकं च पातानां पताम्यहमिति स्म ह । श्लाघन्नात्मानमद्य त्वं काक भाषितवानसि ॥
śatamekaṃ ca pātānāṃ patāmyahamiti sma ha | ślāghannātmānamadya tvaṃ kāka bhāṣitavānasi
"तूने कहा था, 'मैं सौ और एक उड़ानें उड़ता हूँ'; हे कौए, आज तूने अपनी ही बड़ाई करते हुए ऐसा कहा था।"
श्लोक 61 (8.35.61)
स त्वमेकशतं पातं पतन्नभ्यधिको मया । कथमेवं परिश्रान्तः पतितोऽसि महार्णवे ॥
sa tvamekaśataṃ pātaṃ patannabhyadhiko mayā | kathamevaṃ pariśrāntaḥ patito'si mahārṇave
"तू जो सौ और एक उड़ानें उड़ता हुआ मुझसे भी बढ़कर था, वह तू इस प्रकार थककर महासागर में कैसे गिर पड़ा?"
शल्य उवाच
श्लोक 62 (8.35.62)
प्रत्युवाच ततः काकः सीदमान इदं वचः । उपरिष्ठं तदा हंसं प्रसमीक्ष्य प्रसादयन् ॥
pratyuvāca tataḥ kākaḥ sīdamāna idaṃ vacaḥ | upariṣṭhaṃ tadā haṃsaṃ prasamīkṣya prasādayan
तब डूबता हुआ कौआ अपने ऊपर उड़ते हुए हंस की ओर देखकर उसे मनाता हुआ यह उत्तर देने लगा।
काक उवाच
श्लोक 63 (8.35.63)
उच्छिष्टान्नेन पुष्टोऽहं दर्पोत्सिक्तः कुसत्वतः । सुपर्ण इव चात्मानं ज्ञातवान्पुत्रलाघवात् ॥
ucchiṣṭānnena puṣṭo'haṃ darpotsiktaḥ kusatvataḥ | suparṇa iva cātmānaṃ jñātavānputralāghavāt
"मैं जूठन के अन्न से पला, अभिमान से फूला हुआ और नीच स्वभाव का था; बालकों की चंचलता के कारण मैं अपने को सुपर्ण (गरुड़) समझ बैठा।"
श्लोक 64 (8.35.64)
शरणं त्वां प्रपन्नोऽहमुदकान्तमवाप्नुयाम् । हंसेदानीं परिश्रान्तमापदो मां समुद्वर ॥
śaraṇaṃ tvāṃ prapanno'hamudakāntamavāpnuyām | haṃsedānīṃ pariśrāntamāpado māṃ samudvara
"मैं तेरी शरण में आया हूँ; मुझे जल का किनारा मिल जाए। हे हंस, मैं अब बहुत थक चुका हूँ; मुझे इस विपत्ति से उबार ले।"
श्लोक 65 (8.35.65)
यदि नाम पुनर्जीवन्गच्छेयं स्वं निवेशनम् । नैनं पुनर्हीनमपि क्षेप्ताऽहं खे विचारिणम् ॥
yadi nāma punarjīvangaccheyaṃ svaṃ niveśanam | nainaṃ punarhīnamapi kṣeptā'haṃ khe vicāriṇam
"यदि मैं जीता हुआ अपने घर लौट सका, तो आकाश में विचरने वाले किसी का, चाहे वह मुझसे छोटा ही क्यों न हो, फिर कभी तिरस्कार नहीं करूँगा।"
शल्य उवाच
श्लोक 66 (8.35.66)
तमेवं करुणं दीनं विलपन्तमचेतसम् । काककाकेति वाशन्तं निमज्जन्तं महार्णवे । कृपयाऽभिपरीतो वै कृपां चक्रे दुरात्मनि ॥
tamevaṃ karuṇaṃ dīnaṃ vilapantamacetasam | kākakāketi vāśantaṃ nimajjantaṃ mahārṇave | kṛpayā'bhiparīto vai kṛpāṃ cakre durātmani
हंस ने करुणा से भरकर उस दुष्ट-हृदय पर दया की, जो इस प्रकार दीन, करुण स्वर में विलाप करता, बेसुध और काँव-काँव करता हुआ महासागर में डूब रहा था।
श्लोक 67 (8.35.67)
अथ तं पतितं दीनं जलक्लिन्नमचेतनम् । पद्भ्यामुत्क्षिप्य वेपन्तं पृष्ठमारोपयत्तदा ॥
atha taṃ patitaṃ dīnaṃ jalaklinnamacetanam | padbhyāmutkṣipya vepantaṃ pṛṣṭhamāropayattadā
तब उसने पानी से भीगे, बेसुध और काँपते हुए उस दीन गिरे हुए कौए को पैरों से उठाकर अपनी पीठ पर बैठा लिया।
श्लोक 68 (8.35.68)
स हंसः पृष्ठमारोप्य काकं कर्ण विचेतसम् । अविस्मयंस्तदा कर्ण पुनरेव समानयत् । तमेव देशं तरसा स्पर्धया पेततुर्यतः ॥
sa haṃsaḥ pṛṣṭhamāropya kākaṃ karṇa vicetasam | avismayaṃstadā karṇa punareva samānayat | tameva deśaṃ tarasā spardhayā petaturyataḥ
हे कर्ण, उस बेसुध कौए को पीठ पर चढ़ाकर हंस, बिना किसी विस्मय के, उसे तुरन्त उसी स्थान पर ले आया जहाँ से उन दोनों ने होड़ में उड़ान भरी थी।
श्लोक 69 (8.35.69)
उत्सृज्य त्वब्रवीन्मैवं पुनः कार्यं त्वयेति ह । स्थाप्य चैनं पुनर्द्वीपे समाश्वस्य च विक्लवम् । गतो यथेप्सितं देशं हंसो मन इवाशुगः ॥
utsṛjya tvabravīnmaivaṃ punaḥ kāryaṃ tvayeti ha | sthāpya cainaṃ punardvīpe samāśvasya ca viklavam | gato yathepsitaṃ deśaṃ haṃso mana ivāśugaḥ
उसे उतारकर हंस ने कहा, "फिर ऐसा मत करना"; और घबराए हुए उस पक्षी को फिर द्वीप पर बैठाकर तथा ढाढ़स बँधाकर, मन के समान वेगवान् हंस अपनी इच्छित जगह चला गया।
श्लोक 70 (8.35.70)
एवमुच्छिष्टपुष्टः स काको हंसपराजितः । बलं वीर्यं महत्कर्ण त्यक्त्वा क्षान्तिमुपागतः ॥
evamucchiṣṭapuṣṭaḥ sa kāko haṃsaparājitaḥ | balaṃ vīryaṃ mahatkarṇa tyaktvā kṣāntimupāgataḥ
इस प्रकार जूठन से पला हुआ वह कौआ हंस से हार जाने पर, हे कर्ण, अपना बड़ा बल और पराक्रम छोड़कर धैर्य और शान्ति को प्राप्त हो गया।
श्लोक 71 (8.35.71)
उच्छिष्टभोजनः काको यथा वैश्यकुले पुरा । एवं त्वमुच्छिष्टभृतो धार्तराष्ट्रैर्न संशयः ॥
ucchiṣṭabhojanaḥ kāko yathā vaiśyakule purā | evaṃ tvamucchiṣṭabhṛto dhārtarāṣṭrairna saṃśayaḥ
जैसे वह कौआ पूर्वकाल में वैश्य के घर जूठन खाकर पलता था, वैसे ही तुम भी निःसन्देह धृतराष्ट्र के पुत्रों के जूठन से पल रहे हो।
श्लोक 72 (8.35.72)
सदृशाञ्श्रेयसश्चापि सर्वान्कर्णावमन्यसे । द्रोणद्रौणिकृपैर्गुप्तो भीष्मेणान्यैश्च कौरवैः ॥
sadṛśāñśreyasaścāpi sarvānkarṇāvamanyase | droṇadrauṇikṛpairgupto bhīṣmeṇānyaiśca kauravaiḥ
हे कर्ण, तुम द्रोण, अश्वत्थामा, कृप, भीष्म और अन्य कौरवों से रक्षित होकर अपने बराबर वालों और अपने से श्रेष्ठ सभी का अपमान करते हो।
श्लोक 73 (8.35.73)
विराटनगरे पार्थमेकं किं नावधीस्तदा । यत्र व्यस्ताः समस्ताश्च निर्जिताः स्थ किरीटिना । सृगाला इव सिंहेन क्व ते वीर्यं तदा गतम् ॥
virāṭanagare pārthamekaṃ kiṃ nāvadhīstadā | yatra vyastāḥ samastāśca nirjitāḥ stha kirīṭinā | sṛgālā iva siṃhena kva te vīryaṃ tadā gatam
विराट के नगर में तब तुमने अकेले अर्जुन को क्यों नहीं मार डाला, जब तुम सब, अलग-अलग और एक साथ, किरीटी से वैसे हार गए थे जैसे सिंह से सियार? तब तुम्हारा पराक्रम कहाँ चला गया था?
श्लोक 74 (8.35.74)
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा समरे सव्यसाचिना । पश्यतां कुरुवीराणां प्रथमं त्वं पलायितः ॥
bhrātaraṃ nihataṃ dṛṣṭvā samare savyasācinā | paśyatāṃ kuruvīrāṇāṃ prathamaṃ tvaṃ palāyitaḥ
जब सव्यसाची ने युद्ध में तुम्हारे भाई को मार गिराया, तब कुरुवीरों के देखते-देखते तुम्हीं सबसे पहले भाग खड़े हुए।
श्लोक 75 (8.35.75)
तथा द्वैतवने कर्ण गन्धर्वैः समभिद्रुतान् । कुरून्सदारानुत्सृज्य त्वमेवाग्रे पलायितः ॥
tathā dvaitavane karṇa gandharvaiḥ samabhidrutān | kurūnsadārānutsṛjya tvamevāgre palāyitaḥ
और द्वैतवन में, हे कर्ण, जब कौरवों पर गन्धर्वों ने आक्रमण किया था, तब तुम उन्हें उनकी स्त्रियों सहित छोड़कर सबसे आगे भाग गए थे।
श्लोक 76 (8.35.76)
हत्वा जित्वा च गन्धर्वांश्चित्रसेनमुखान्रणे । कर्ण दुर्योधनं पार्थः सभ्रातृकममोक्षयत् ॥
hatvā jitvā ca gandharvāṃścitrasenamukhānraṇe | karṇa duryodhanaṃ pārthaḥ sabhrātṛkamamokṣayat
चित्रसेन आदि गन्धर्वों को रण में मारकर और हराकर अर्जुन ने, हे कर्ण, भाइयों सहित दुर्योधन को छुड़ाया था।
श्लोक 77 (8.35.77)
पुनः प्रभावः पार्थस्य पुराणः केशवस्य च । कथितः कर्ण रामेण सभायां कुरुसंसदि ॥
punaḥ prabhāvaḥ pārthasya purāṇaḥ keśavasya ca | kathitaḥ karṇa rāmeṇa sabhāyāṃ kurusaṃsadi
और हे कर्ण, कुरुओं की सभा में राम ने अर्जुन और केशव के पुरातन प्रभाव का वर्णन किया था।
श्लोक 78 (8.35.78)
सततं च त्वमश्रौषीर्वचनं द्रोणभीष्मयोः । अवध्यौ वदतोः कृष्णौ सन्निधौ च महीक्षिताम् ॥
satataṃ ca tvamaśrauṣīrvacanaṃ droṇabhīṣmayoḥ | avadhyau vadatoḥ kṛṣṇau sannidhau ca mahīkṣitām
और तुमने द्रोण और भीष्म के वे वचन निरन्तर सुने हैं, जिनमें उन्होंने राजाओं के सामने दोनों कृष्णों को अवध्य बताया था।
श्लोक 79 (8.35.79)
कियन्तं तत्र वक्ष्यामि येनयेन धनञ्जयः । त्वत्तोऽतिरिक्तः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ब्राह्मणो यथा ॥
kiyantaṃ tatra vakṣyāmi yenayena dhanañjayaḥ | tvatto'tiriktaḥ sarvebhyo bhūtebhyo brāhmaṇo yathā
इस विषय में मैं कितना कहूँ? जिस-जिस बात में भी देखा जाए, धनञ्जय तुमसे और सब प्राणियों से ऊपर है, जैसे ब्राह्मण सबसे ऊपर होता है।
श्लोक 80 (8.35.80)
इदानीमेव द्रष्टासि प्रधाने स्यन्दने स्थितौ । पुत्रं च वसुदेवस्य कुन्तीपुत्रं च पाण्डवम् ॥
idānīmeva draṣṭāsi pradhāne syandane sthitau | putraṃ ca vasudevasya kuntīputraṃ ca pāṇḍavam
अभी इसी समय तुम उन दोनों को प्रधान रथ पर खड़ा देखोगे, वसुदेव के पुत्र को और कुन्ती के पुत्र पाण्डव को।
श्लोक 81 (8.35.81)
यथाऽश्रयत चक्राङ्गं वायसो बुद्धिमास्थितः । तथाश्रयस्व वार्ष्णेयं पाण्डवं च धनञ्जयम् ॥
yathā'śrayata cakrāṅgaṃ vāyaso buddhimāsthitaḥ | tathāśrayasva vārṣṇeyaṃ pāṇḍavaṃ ca dhanañjayam
जैसे बुद्धि से काम लेकर कौए ने हंस की शरण ली थी, वैसे ही तुम वृष्णि-पुत्र कृष्ण और पाण्डव अर्जुन की शरण लो।
श्लोक 82 (8.35.82)
यदा त्वं युधि विक्रान्तौ वासुदेवधनञ्जयौ । द्रष्टास्येकरथे कर्ण तदा नैवं वदिष्यसि ॥
yadā tvaṃ yudhi vikrāntau vāsudevadhanañjayau | draṣṭāsyekarathe karṇa tadā naivaṃ vadiṣyasi
हे कर्ण, जब तुम युद्ध में पराक्रम करते हुए वासुदेव और अर्जुन को एक ही रथ पर देखोगे, तब ऐसा नहीं कहोगे।
श्लोक 83 (8.35.83)
यदा शरशतैः पार्थो दर्पं तव वधिष्यति । तदा त्वमन्तरं द्रष्टा आत्मनश्चार्जुनस्य च ॥
yadā śaraśataiḥ pārtho darpaṃ tava vadhiṣyati | tadā tvamantaraṃ draṣṭā ātmanaścārjunasya ca
जब अर्जुन सैकड़ों बाणों से तुम्हारे दर्प को चूर कर देगा, तब तुम अपने और अर्जुन के बीच का अन्तर देखोगे।
श्लोक 84 (8.35.84)
देवासुरमनुष्येषु प्रख्यातौ यौ नरोत्तमौ । तौ मावमंस्था मौर्ख्यात्त्वं खद्योत इव रोचनौ ॥
devāsuramanuṣyeṣu prakhyātau yau narottamau | tau māvamaṃsthā maurkhyāttvaṃ khadyota iva rocanau
देवताओं, असुरों और मनुष्यों में प्रसिद्ध जो दो नरश्रेष्ठ हैं, उन देदीप्यमान दोनों का तुम मूर्खतावश अपमान मत करो; तुम तो जुगनू के समान हो।
श्लोक 85 (8.35.85)
सूर्याचन्द्रमसौ यद्वत्तद्वदर्जुनकेशवौ । प्रकाशेनाभिविख्यातौ त्वं तु खद्योतवन्नृषु ॥
sūryācandramasau yadvattadvadarjunakeśavau | prakāśenābhivikhyātau tvaṃ tu khadyotavannṛṣu
जैसे सूर्य और चन्द्रमा हैं, वैसे ही अर्जुन और केशव अपने तेज के कारण प्रसिद्ध हैं; तुम तो मनुष्यों में जुगनू के समान हो।
श्लोक 86 (8.35.86)
एवं विद्वन्मावमंस्थाः सूतपुत्राच्युतार्जुनौ । नरसिंहौ नरश्वा त्वं जोषमास्स्व विकत्थसे ॥
evaṃ vidvanmāvamaṃsthāḥ sūtaputrācyutārjunau | narasiṃhau naraśvā tvaṃ joṣamāssva vikatthase
हे सूतपुत्र, यह जानते हुए, हे विद्वान्, तुम नरसिंह उन दोनों, अच्युत और अर्जुन, का अपमान मत करो। तुम तो मनुष्यों में कुत्ते हो; चुप रहो, तुम व्यर्थ डींग मारते हो।