कर्ण पर्व · अध्याय 34
कर्ण द्वारा शल्य और मद्रकों की भर्त्सना
शल्य के उपहास से तिलमिलाकर कर्ण उत्तर देता है कि गुण को गुणी ही पहचानता है। वह कहता है कि वह अर्जुन और कृष्ण के पराक्रम को जानता है और उस घातक बाण से, जिसे उसने बहुत समय से सम्मान से सँजोकर रखा है, उन दोनों का सामना करेगा; अकेले उन दोनों से भिड़ना उसे अपना सौभाग्य लगता है। फिर वह मद्रकों के विषय में लोगों द्वारा गाई जाने वाली गाथाएँ दोहराता है—उनके शिथिल आचार और अशुचिता की—और पूछता है कि ऐसे लोग धर्म की शिक्षा कैसे दे सकते हैं। वह घोषणा करता है कि क्षत्रिय का पहला धर्म युद्ध में मरना है, मित्र और धृतराष्ट्र के लिहाज़ से ही शल्य के प्राण छोड़ता है, चेतावनी देता है कि दोबारा ऐसा कहने पर गदा से उसका सिर गिरा देगा, और उसे रथ हाँकने का आदेश देता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.34.1)
अधिक्षिप्तस्तु राधेयः शल्येनामिततेजसा । शल्यमाह सुसङ्क्रुद्धो वाक्शल्यमवधारयन् ॥
adhikṣiptastu rādheyaḥ śalyenāmitatejasā | śalyamāha susaṅkruddho vākśalyamavadhārayan
अपरिमित तेजस्वी शल्य के इस प्रकार अपमान करने पर राधापुत्र कर्ण अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और उसके वचनों को काँटे की तरह चुभता मानकर शल्य से बोला।
कर्ण उवाच
श्लोक 2 (8.34.2)
गुणान्गुणवतां शल्य गुणवान्वेत्ति नागुणः । त्वं तु नित्यं गुणैर्हीनः किं ज्ञास्यसि गुणागुणान् ॥
guṇānguṇavatāṃ śalya guṇavānvetti nāguṇaḥ | tvaṃ tu nityaṃ guṇairhīnaḥ kiṃ jñāsyasi guṇāguṇān
हे शल्य! गुणवानों के गुणों को गुणी ही जानता है, गुणहीन नहीं; तुम तो सदा गुणों से रहित हो, फिर गुण-अवगुण को क्या जानोगे?
श्लोक 3 (8.34.3)
अर्जुनस्य महास्त्राणि क्रोधं वीर्यं धनुः शरान् । अहं शल्याभिजानामि न त्वं जानासि तत्तथा ॥
arjunasya mahāstrāṇi krodhaṃ vīryaṃ dhanuḥ śarān | ahaṃ śalyābhijānāmi na tvaṃ jānāsi tattathā
हे शल्य! अर्जुन के महान् अस्त्रों, उसके क्रोध, पराक्रम, धनुष और बाणों को मैं जानता हूँ; तुम उन्हें वैसा नहीं जानते।
श्लोक 4 (8.34.4)
तथा कृष्णस्य माहात्म्यमृषभस्य महीक्षिताम् । यथाहं शल्य जानामि न त्वं जानासि तत्तथा ॥
tathā kṛṣṇasya māhātmyamṛṣabhasya mahīkṣitām | yathāhaṃ śalya jānāmi na tvaṃ jānāsi tattathā
और राजाओं में श्रेष्ठ कृष्ण की महिमा को भी मैं जिस प्रकार जानता हूँ, हे शल्य! उस प्रकार तुम नहीं जानते।
श्लोक 5 (8.34.5)
एवमेवात्मनो वीर्यमहं वीर्यं च पाण्डवे । जानंस्तावाह्वये युद्धे शल्य नाग्निं पतङ्गवत् ॥
evamevātmano vīryamahaṃ vīryaṃ ca pāṇḍave | jānaṃstāvāhvaye yuddhe śalya nāgniṃ pataṅgavat
इसी प्रकार अपने बल और पाण्डव के बल को जानते हुए ही मैं उन दोनों को युद्ध के लिए ललकारता हूँ, हे शल्य! पतङ्गे की तरह आग को नहीं।
श्लोक 6 (8.34.6)
अस्ति चाऽयमिषुः शल्य सुपुङ्खो रक्तभोजनः । एकस्तूणीशयः पत्री सुधौतः समलङ्कृतः ॥
asti cā'yamiṣuḥ śalya supuṅkho raktabhojanaḥ | ekastūṇīśayaḥ patrī sudhautaḥ samalaṅkṛtaḥ
हे शल्य! मेरे पास यह बाण है—सुन्दर पङ्खोंवाला, रक्त पीनेवाला, अकेला तरकश में पड़ा रहनेवाला, पत्रयुक्त, भली-भाँति धुला हुआ और सजा हुआ।
श्लोक 7 (8.34.7)
शेते चन्दनचूर्णेन पूजितो बहुलाः समाः । आहेयो विषवानुग्रो नराश्वद्विपसङ्घहा ॥
śete candanacūrṇena pūjito bahulāḥ samāḥ | āheyo viṣavānugro narāśvadvipasaṅghahā
वह चन्दन के चूर्ण में रखा हुआ बहुत वर्षों से पूजित होता आया है; सर्प के समान विषैला, उग्र, मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों के झुण्डों का संहारक।
श्लोक 8 (8.34.8)
घोररूपो महारौद्रस्तनुत्रास्थिविदारणः । निर्भिन्द्यां येन रुष्टोऽहमपि मेरुं महागिरिम् ॥
ghorarūpo mahāraudrastanutrāsthividāraṇaḥ | nirbhindyāṃ yena ruṣṭo'hamapi meruṃ mahāgirim
भयंकर रूपवाला, महाक्रूर, कवच और हड्डियों को चीर देनेवाला है; क्रुद्ध होकर मैं उससे महान् पर्वत मेरु को भी भेद दूँ।
श्लोक 9 (8.34.9)
तमहं जातु नास्येयमन्यस्मिन्फल्गुनादृते । कृष्णाद्वा देवकीपुत्रात्सत्यं चापि शृणुष्व मे ॥
tamahaṃ jātu nāsyeyamanyasminphalgunādṛte | kṛṣṇādvā devakīputrātsatyaṃ cāpi śṛṇuṣva me
उसे मैं फल्गुन अथवा देवकीपुत्र कृष्ण के सिवा किसी और पर कभी नहीं चलाऊँगा; और यह सत्य भी मुझसे सुन लो।
श्लोक 10 (8.34.10)
तेनाहमिषुणा शल्य वासुदेवधनञ्जयौ । योत्स्ये परमसंरब्धौ तत्कर्म सदृशं मम ॥
tenāhamiṣuṇā śalya vāsudevadhanañjayau | yotsye paramasaṃrabdhau tatkarma sadṛśaṃ mama
हे शल्य! उसी बाण से मैं अत्यन्त क्रोध में भरकर वासुदेव और धनञ्जय दोनों से युद्ध करूँगा; वह कर्म मेरे योग्य है।
श्लोक 11 (8.34.11)
सर्वेषां वृष्णिवीराणां कृष्णे लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता । सर्वेषां पाण्डुपुत्राणां जयः पार्थे प्रतिष्ठितः । उभयं तु समासाद्य को निवर्तितुमर्हति ॥
sarveṣāṃ vṛṣṇivīrāṇāṃ kṛṣṇe lakṣmīḥ pratiṣṭhitā | sarveṣāṃ pāṇḍuputrāṇāṃ jayaḥ pārthe pratiṣṭhitaḥ | ubhayaṃ tu samāsādya ko nivartitumarhati
वृष्णिवंश के सब वीरों की लक्ष्मी कृष्ण में प्रतिष्ठित है, और सब पाण्डवों की विजय पार्थ में। इन दोनों का सामना करके कौन पीछे हट सकता है?
श्लोक 12 (8.34.12)
तावेतौ पुरुषव्याघ्रौ समेतौ स्यन्दने स्थितौ । मामेकमभिसंयुद्धौ सुजातं पश्य शल्य मे ॥
tāvetau puruṣavyāghrau sametau syandane sthitau | māmekamabhisaṃyuddhau sujātaṃ paśya śalya me
ये दोनों पुरुषसिंह एक रथ पर साथ खड़े हैं और दोनों अकेले मुझ पर टूट पड़ने को आ रहे हैं। हे शल्य! देखो, मेरा जन्म कैसा श्रेष्ठ है।
श्लोक 13 (8.34.13)
पितृष्वसामातुलजौ भ्रातरावपराजितौ । मणी सूत्र इव प्रोतौ द्रष्टासि निहतौ मया ॥
pitṛṣvasāmātulajau bhrātarāvaparājitau | maṇī sūtra iva protau draṣṭāsi nihatau mayā
बुआ के पुत्र और मामा के पुत्र ये दोनों अपराजित भाई धागे में पिरोई दो मणियों की तरह साथ हैं; तुम इन्हें मेरे हाथों मारा गया देखोगे।
श्लोक 14 (8.34.14)
अर्जुने गाण्डिवं कृष्णे चक्रं तार्क्ष्यकपिध्वजौ । भीरूणां त्रासजननं शल्य हर्षकरं मम ॥
arjune gāṇḍivaṃ kṛṣṇe cakraṃ tārkṣyakapidhvajau | bhīrūṇāṃ trāsajananaṃ śalya harṣakaraṃ mama
अर्जुन के पास गाण्डीव, कृष्ण के पास चक्र, और गरुड़ तथा वानर के ध्वज—ये कायरों में भय जगाते हैं, किन्तु हे शल्य! मुझे आनन्द देते हैं।
श्लोक 15 (8.34.15)
त्वं तु दुष्प्रकृतिर्मूढो महायुद्धेष्वकोविदः । भयावदीर्णः सन्त्रासादबद्धं बहु भाषसे ॥
tvaṃ tu duṣprakṛtirmūḍho mahāyuddheṣvakovidaḥ | bhayāvadīrṇaḥ santrāsādabaddhaṃ bahu bhāṣase
तुम तो दुष्ट स्वभाव के, मूर्ख और बड़े युद्धों में अनजान हो; भय से फटे हुए-से तुम घबराहट में बहुत-सी बेसिर-पैर की बातें बोल रहे हो।
श्लोक 16 (8.34.16)
संस्तौषि तौ तु केनापि हेतुना त्वं कुदेशज । तौ हत्वा समरे हन्ता त्वामद्य सह बान्धवम् ॥
saṃstauṣi tau tu kenāpi hetunā tvaṃ kudeśaja | tau hatvā samare hantā tvāmadya saha bāndhavam
हे नीच देश में जन्मे! किसी कारण से तुम उन दोनों की स्तुति करते हो; युद्ध में उन दोनों को मारकर मैं आज तुम्हें भी तुम्हारे बन्धुओं सहित मार डालूँगा।
श्लोक 17 (8.34.17)
पापदेशज दुर्बुद्धे क्षुद्र क्षत्रियपांसन । सुहृद्रूपो रिपुः किं मां कृष्णाभ्यां भीषयिष्यसि ॥
pāpadeśaja durbuddhe kṣudra kṣatriyapāṃsana | suhṛdrūpo ripuḥ kiṃ māṃ kṛṣṇābhyāṃ bhīṣayiṣyasi
हे पापी देश में जन्मे, दुर्बुद्धि, क्षुद्र, क्षत्रियों के कलंक! मित्र का रूप धरे शत्रु होकर तुम दोनों कृष्णों से मुझे क्यों डराते हो?
श्लोक 18 (8.34.18)
तौ वा मामद्य हन्तारौ हनिष्ये वाऽपि तावहम् । नाहं बिभेमि कृष्णाभ्यां विजानन्नात्मनो बलम् ॥
tau vā māmadya hantārau haniṣye vā'pi tāvaham | nāhaṃ bibhemi kṛṣṇābhyāṃ vijānannātmano balam
या तो वे दोनों आज मुझे मारेंगे, या मैं उन्हें मारूँगा; अपने बल को जानते हुए मैं दोनों कृष्णों से नहीं डरता।
श्लोक 19 (8.34.19)
वासुदेवसहस्रं वा फल्गुनानां शतानि वा । अहमेको हनिष्यामि जोषमास्स्व कुदेशज ॥
vāsudevasahasraṃ vā phalgunānāṃ śatāni vā | ahameko haniṣyāmi joṣamāssva kudeśaja
चाहे हजार वासुदेव हों या सैकड़ों फल्गुन, मैं अकेला ही उन्हें मार डालूँगा; हे नीच देश में जन्मे! चुप बैठो।
श्लोक 20 (8.34.20)
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च प्रायः क्रीडागता जनाः ॥
striyo bālāśca vṛddhāśca prāyaḥ krīḍāgatā janāḥ
स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े—अधिकतर वे लोग जो खेल-कूद में निकल आए हैं—
श्लोक 21 (8.34.21)
या गाथाः सम्प्रगायन्ति कुर्वतोऽध्ययनं यथा । ता गाथाः शृणु मे शल्य मद्रकेषु दुरात्मसु ॥
yā gāthāḥ sampragāyanti kurvato'dhyayanaṃ yathā | tā gāthāḥ śṛṇu me śalya madrakeṣu durātmasu
पाठ करते हुए-से जिन गाथाओं को वे गाते हैं, हे शल्य! दुष्टात्मा मद्रकों के विषय में वे गाथाएँ मुझसे सुनो।
श्लोक 22 (8.34.22)
ब्राह्मणैः कथिताः पूर्वं यथावद्राजसन्निधौ । श्रुत्वा चैकमना मूढ मम वा ब्रूहि चोत्तरम् ॥
brāhmaṇaiḥ kathitāḥ pūrvaṃ yathāvadrājasannidhau | śrutvā caikamanā mūḍha mama vā brūhi cottaram
उन्हें ब्राह्मणों ने पहले राजा के सामने ठीक-ठीक सुनाया था। हे मूढ़! एकाग्र मन से उन्हें सुनकर मुझे उत्तर दो।
श्लोक 23 (8.34.23)
मित्रध्रुङ्मद्रको नित्यं यो नो द्वेष्टि स मद्रकः । मद्रके सङ्गतं नास्ति क्षुद्रवाक्ये नराधमे ॥
mitradhruṅmadrako nityaṃ yo no dveṣṭi sa madrakaḥ | madrake saṅgataṃ nāsti kṣudravākye narādhame
मद्रक सदा मित्रों से द्रोह करनेवाला होता है; जो हमसे द्वेष रखता है, वही मद्रक है। नीच वाणी बोलनेवाले उस अधम मद्रक के साथ कोई मेल नहीं हो सकता।
श्लोक 24 (8.34.24)
दुरात्मा मद्रको नित्यं नित्यमानृतिकोऽनृजुः । यच्चान्यदपि दौरात्म्यं मद्रकेष्विति नः श्रुतम् ॥
durātmā madrako nityaṃ nityamānṛtiko'nṛjuḥ | yaccānyadapi daurātmyaṃ madrakeṣviti naḥ śrutam
मद्रक सदा दुष्टात्मा, सदा झूठा और कुटिल होता है; और मद्रकों में दुष्टता की जो और बातें हैं, वे भी हमने सुनी हैं।
श्लोक 25 (8.34.25)
पिता पुत्रश्च माता च श्वश्रूश्वशुरमातुलाः । भगिनी दुहिता भ्राता नप्ताऽन्ये ते च बान्धवाः ॥
pitā putraśca mātā ca śvaśrūśvaśuramātulāḥ | bhaginī duhitā bhrātā naptā'nye te ca bāndhavāḥ
पिता, पुत्र, माता, सास, ससुर, मामा, बहन, बेटी, भाई, नाती और दूसरे बन्धु-जन,
श्लोक 26 (8.34.26)
वयस्याभ्यागताश्चान्ये दासीदासाश्च सङ्गताः । पुम्भिर्विमिश्रा नार्यश्च ज्ञाताज्ञाताः स्वयेच्छया ॥
vayasyābhyāgatāścānye dāsīdāsāśca saṅgatāḥ | pumbhirvimiśrā nāryaśca jñātājñātāḥ svayecchayā
मित्र, आए हुए अतिथि, अन्य लोग, दास-दासियाँ—सब एक साथ रहते हैं; स्त्रियाँ पुरुषों से मिली-जुली रहती हैं, जाने-अनजाने सब अपनी इच्छा से।
श्लोक 27 (8.34.27)
येषां गृहेष्वशिष्टानां सक्तुमद्याशिनां सदा । पीत्वा शीधु सगोमांसं क्रन्दन्ति च हसन्ति च ॥
yeṣāṃ gṛheṣvaśiṣṭānāṃ saktumadyāśināṃ sadā | pītvā śīdhu sagomāṃsaṃ krandanti ca hasanti ca
जिन अशिष्ट लोगों के घरों में सदा सत्तू खाया और मद्य पिया जाता है, वे शीधु पीकर और गोमांस के साथ खाकर चिल्लाते और हँसते हैं,
श्लोक 28 (8.34.28)
गायन्ति चाप्यबद्धानि प्रवर्तन्ते च कामतः । कामप्रलापिनोऽन्योन्यं तेषु धर्मः कथं भवेत् ॥
gāyanti cāpyabaddhāni pravartante ca kāmataḥ | kāmapralāpino'nyonyaṃ teṣu dharmaḥ kathaṃ bhavet
बेसिर-पैर के गीत गाते हैं और मनमाने ढंग से चलते हैं; इच्छा के वश एक-दूसरे से बकवाद करते हैं—उनमें धर्म कैसे हो सकता है?
श्लोक 29 (8.34.29)
मद्रकेष्ववलिप्तेषु प्रख्याताशुभकर्मसु । नापि वैरं न सौहार्दं मद्रकेण समाचरेत् ॥
madrakeṣvavalipteṣu prakhyātāśubhakarmasu | nāpi vairaṃ na sauhārdaṃ madrakeṇa samācaret
घमण्डी और अशुभ कर्मों के लिए प्रसिद्ध मद्रकों में किसी मद्रक के साथ न वैर रखना चाहिए, न मित्रता।
श्लोक 30 (8.34.30)
मद्रके सङ्गतं नास्ति मद्रको हि सदा मलः । मद्रकेषु च संसृष्टं शौचं गान्धारकेषु च ॥
madrake saṅgataṃ nāsti madrako hi sadā malaḥ | madrakeṣu ca saṃsṛṣṭaṃ śaucaṃ gāndhārakeṣu ca
मद्रक के साथ कोई मेल नहीं है, क्योंकि मद्रक सदा मलिन है; मद्रकों से मिला हुआ बिगड़ जाता है, और गान्धारों में भी शुचिता नष्ट हो जाती है।
श्लोक 31 (8.34.31)
राजयाजकयाज्ये हि यथा दत्तं हविर्नशेत् । शूद्रसंस्कारको विप्रो यथा याति पराभवम् ॥
rājayājakayājye hi yathā dattaṃ havirnaśet | śūdrasaṃskārako vipro yathā yāti parābhavam
जैसे जिसके पुरोहित राजा हों, उसके लिए दी हुई आहुति नष्ट हो जाती है, और जैसे शूद्र का संस्कार करानेवाला ब्राह्मण पतन को प्राप्त होता है,
श्लोक 32 (8.34.32)
यथा ब्रह्मद्विषो नित्यं गच्छन्तीह पराभवम् । यथैव संगतं कृत्वा नरः पतति मद्रकैः ॥
yathā brahmadviṣo nityaṃ gacchantīha parābhavam | yathaiva saṃgataṃ kṛtvā naraḥ patati madrakaiḥ
जैसे ब्राह्मणों से द्वेष करनेवाले यहाँ सदा पतन को प्राप्त होते हैं, और जैसे मद्रकों से मेल करके मनुष्य गिर जाता है,
श्लोक 33 (8.34.33)
बालेष्वपि सदा न स्म हतं वृश्चिक ते विषम् । आथर्वणेन मन्त्रेण सर्वशान्तिः कृता मया ॥
bāleṣvapi sadā na sma hataṃ vṛścika te viṣam | ātharvaṇena mantreṇa sarvaśāntiḥ kṛtā mayā
वैसे ही हे बिच्छू! तेरा विष सदा नष्ट होता है, बालकों में भी; अथर्ववेद के मन्त्र से मैंने सब कुछ शान्त कर दिया।
श्लोक 34 (8.34.34)
इति वृश्चिकदष्टस्य विषवेगहतस्य च । कुर्वन्ति भेषजं प्राज्ञाः सत्यं तच्चापि दृश्यते ॥
iti vṛścikadaṣṭasya viṣavegahatasya ca | kurvanti bheṣajaṃ prājñāḥ satyaṃ taccāpi dṛśyate
इस प्रकार बिच्छू से डसे हुए और विष के वेग से पीड़ित व्यक्ति की चिकित्सा विद्वान् करते हैं, और वह सच भी दिखाई देता है।
श्लोक 35 (8.34.35)
एवं विद्वञ्जोषमास्स्व ब्रूहि चात्रोत्तरं वचः । वासांस्युत्सृज्य नृत्यन्ति स्त्रियो मद्यविमोहिताः ॥
evaṃ vidvañjoṣamāssva brūhi cātrottaraṃ vacaḥ | vāsāṃsyutsṛjya nṛtyanti striyo madyavimohitāḥ
यह जानकर चुप रहो, या इस पर उत्तर दो। मद्य से मोहित स्त्रियाँ वस्त्र उतारकर नाचती हैं,
श्लोक 36 (8.34.36)
मैथुनेऽसङ्गताश्चापि यथाकामवराश्च ताः । तासां पुत्र कथं धर्मं मद्रको वक्तुमर्हति ॥
maithune'saṅgatāścāpi yathākāmavarāśca tāḥ | tāsāṃ putra kathaṃ dharmaṃ madrako vaktumarhati
और मैथुन में निरंकुश होकर इच्छानुसार वर चुनती फिरती हैं; ऐसी स्त्रियों का पुत्र मद्रक धर्म की बात कैसे कह सकता है?
श्लोक 37 (8.34.37)
यास्तिष्ठन्त्यः प्रमेहन्ति यथैवोष्ट्रदशेरकाः । तासां विभ्रष्टधर्माणां निर्लज्जानां ततस्ततः । त्वं पुत्रस्तादृशीनां हि धर्मं वक्तुमिहेच्छसि ॥
yāstiṣṭhantyaḥ pramehanti yathaivoṣṭradaśerakāḥ | tāsāṃ vibhraṣṭadharmāṇāṃ nirlajjānāṃ tatastataḥ | tvaṃ putrastādṛśīnāṃ hi dharmaṃ vaktumihecchasi
जो खड़ी-खड़ी ऊँटनियों और गधों की तरह मूत्र करती हैं, धर्म से गिरी हुई और जहाँ-तहाँ निर्लज्ज—तुम ऐसी स्त्रियों के पुत्र होकर यहाँ धर्म की बात कहना चाहते हो!
श्लोक 38 (8.34.38)
सौवीरकं याच्यमाना मद्रिका कर्षति स्फिचौ । अदातुकामा वचनमिदं वदति दारुणम् ॥
sauvīrakaṃ yācyamānā madrikā karṣati sphicau | adātukāmā vacanamidaṃ vadati dāruṇam
सौवीरक (काँजी) माँगे जाने पर मद्र देश की स्त्री अपने कूल्हे खुजलाती है, और न देने की इच्छा से यह कठोर बात कहती है:
श्लोक 39 (8.34.39)
मा मां सौवीरकं कश्चिद्याचतां दयितं मम । पुत्रं दद्यां पतिं दद्यां न तु दद्यां सुवीरकम् ॥
mā māṃ sauvīrakaṃ kaścidyācatāṃ dayitaṃ mama | putraṃ dadyāṃ patiṃ dadyāṃ na tu dadyāṃ suvīrakam
"कोई मुझसे मेरी प्रिय सौवीरक न माँगे; मैं पुत्र दे दूँ, पति दे दूँ, पर सौवीरक नहीं दूँगी।"
श्लोक 40 (8.34.40)
गौर्यो बृहत्यो निर्हीका मद्रिकाः कम्बलावृताः । घस्मरा नष्टशौचाश्च प्राय इत्यनुशुश्रुम ॥
gauryo bṛhatyo nirhīkā madrikāḥ kambalāvṛtāḥ | ghasmarā naṣṭaśaucāśca prāya ityanuśuśruma
गोरी, लम्बी, निर्लज्ज, कम्बल ओढ़े, पेटू और शुचिता से रहित मद्र देश की स्त्रियाँ—ऐसा हमने प्रायः सुना है।
श्लोक 41 (8.34.41)
प्रमेहित्वा स्फिचौ भूमौ घर्षन्त्यो हीनशोधनाः । शुद्धा नाद्भिर्न मृद्भिश्च नित्योच्छिष्टा भवन्ति हि ॥
pramehitvā sphicau bhūmau gharṣantyo hīnaśodhanāḥ | śuddhā nādbhirna mṛdbhiśca nityocchiṣṭā bhavanti hi
मूत्र करके वे अपने कूल्हे भूमि पर रगड़ती हैं, ठीक से शुद्धि नहीं करतीं; न जल से, न मिट्टी से शुद्ध होकर वे सदा अशुद्ध ही रहती हैं।
श्लोक 42 (8.34.42)
एवमादि मयाऽन्यैर्वा शक्यं वक्तुं भवेद्बहु । आकेशान्तान्नखाग्राच्च वक्तव्येषु कुकर्मसु ॥
evamādi mayā'nyairvā śakyaṃ vaktuṃ bhavedbahu | ākeśāntānnakhāgrācca vaktavyeṣu kukarmasu
इस प्रकार की और भी बहुत-सी बातें मैं या दूसरे कह सकते हैं; बाल की नोक से नख की नोक तक निन्दा के योग्य उन कुकर्मियों के विषय में कहने को बहुत है।
श्लोक 43 (8.34.43)
मद्रकाः सिन्धुसौवीरा धर्मं विद्युः कथं त्विह । पापदेशोद्भवा म्लेच्छा धर्माणामविचक्षणाः ॥
madrakāḥ sindhusauvīrā dharmaṃ vidyuḥ kathaṃ tviha | pāpadeśodbhavā mlecchā dharmāṇāmavicakṣaṇāḥ
मद्रक, सिन्धु और सौवीर लोग यहाँ धर्म को कैसे जानेंगे? पापी देश में उत्पन्न वे म्लेच्छ धर्मों के जानकार नहीं हैं।
श्लोक 44 (8.34.44)
एष मुख्यतमो धर्मः क्षत्रियस्येति नः श्रुतम् । यदाजौ निहतः शेते सद्भिः समभिपूजितः ॥
eṣa mukhyatamo dharmaḥ kṣatriyasyeti naḥ śrutam | yadājau nihataḥ śete sadbhiḥ samabhipūjitaḥ
हमने सुना है कि क्षत्रिय का सबसे प्रमुख धर्म यही है कि वह युद्ध में मारा जाकर सज्जनों से सम्मानित होकर सोए।
श्लोक 45 (8.34.45)
आयुधानां साम्पराये यन्मुञ्चेयमहं ततः । ममैष प्रथमः कल्पो निधने स्वर्गमिच्छतः ॥
āyudhānāṃ sāmparāye yanmuñceyamahaṃ tataḥ | mamaiṣa prathamaḥ kalpo nidhane svargamicchataḥ
शस्त्रों की टक्कर में मैं जो प्राण छोड़ूँ, वही मेरे लिए पहला विकल्प है, क्योंकि मैं मृत्यु में स्वर्ग चाहता हूँ।
श्लोक 46 (8.34.46)
सोऽयं प्रियसखा चास्मि धार्तराष्ट्रस्य धीमतः । तदर्थे हि मम प्राणा यच्च मे विद्यते वसु ॥
so'yaṃ priyasakhā cāsmi dhārtarāṣṭrasya dhīmataḥ | tadarthe hi mama prāṇā yacca me vidyate vasu
ऐसा मैं बुद्धिमान् धृतराष्ट्रपुत्र का प्रिय मित्र हूँ; उसी के लिए मेरे प्राण हैं और जो भी धन मेरे पास है।
श्लोक 47 (8.34.47)
व्यक्तं त्वमप्युपहितः पाण्डवैः पापदेशज । यथा चामित्रवत्सर्वं त्वमस्मासु प्रवर्तसे ॥
vyaktaṃ tvamapyupahitaḥ pāṇḍavaiḥ pāpadeśaja | yathā cāmitravatsarvaṃ tvamasmāsu pravartase
हे पापी देश में जन्मे! स्पष्ट है कि तुम भी पाण्डवों के बहकावे में आ गए हो, तभी तो तुम हमारे साथ हर तरह से शत्रु जैसा व्यवहार करते हो।
श्लोक 48 (8.34.48)
कामं न खलु शक्योऽहं त्वद्विधानां शतैरपि । सङ्ग्रामाद्विमुखः कर्तुं धर्मज्ञ इव नास्तिकैः ॥
kāmaṃ na khalu śakyo'haṃ tvadvidhānāṃ śatairapi | saṅgrāmādvimukhaḥ kartuṃ dharmajña iva nāstikaiḥ
तुम जैसे सैकड़ों भी मुझे युद्ध से विमुख नहीं कर सकते, जैसे नास्तिक धर्म को जाननेवाले को विमुख नहीं कर सकते।
श्लोक 49 (8.34.49)
सारङ्ग इव घर्मार्तः कामं विलप शुष्य च । नाहं भीषयितुं शक्यः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ॥
sāraṅga iva gharmārtaḥ kāmaṃ vilapa śuṣya ca | nāhaṃ bhīṣayituṃ śakyaḥ kṣatradharme vyavasthitaḥ
गरमी से तपे हुए हिरन की तरह चाहे जितना विलाप करो और सूखो; क्षत्रिय-धर्म में दृढ़ मुझे डराया नहीं जा सकता।
श्लोक 50 (8.34.50)
तनुत्यजां नृसिंहानामाहवेष्वनिवर्तिनाम् । या गतिर्गुरुणा प्रोक्ता प्रेम्णा रामेण तां स्मरे ॥
tanutyajāṃ nṛsiṃhānāmāhaveṣvanivartinām | yā gatirguruṇā proktā premṇā rāmeṇa tāṃ smare
युद्ध से न लौटनेवाले, शरीर त्यागनेवाले पुरुषसिंहों की जो गति मेरे गुरु राम ने प्रेम से बताई थी, मैं उसे याद करता हूँ।
श्लोक 51 (8.34.51)
स्वेषां त्राणार्थमुद्यन्तं वधार्थं द्विषतामपि । विद्धि मामास्थितं वृत्तं पौरूरवसमुत्तमम् ॥
sveṣāṃ trāṇārthamudyantaṃ vadhārthaṃ dviṣatāmapi | viddhi māmāsthitaṃ vṛttaṃ paurūravasamuttamam
जान लो कि मैं अपने लोगों की रक्षा और शत्रुओं के वध के लिए तत्पर, पुरूरवा के वंश के उत्तम आचरण पर स्थित हूँ।
श्लोक 52 (8.34.52)
न तद्भूतं प्रपश्यामि त्रिषु लोकेषु मद्रप । यो मामस्मादभिप्रायाद्वारयेदिति मे मतिः ॥
na tadbhūtaṃ prapaśyāmi triṣu lokeṣu madrapa | yo māmasmādabhiprāyādvārayediti me matiḥ
हे मद्रराज! तीनों लोकों में मुझे ऐसा कोई प्राणी नहीं दिखता जो मुझे इस संकल्प से रोक सके—ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 53 (8.34.53)
एवं विद्वञ्जोषमास्स्व त्रासात्किं बहु भाषसे । न त्वां हत्वा प्रदास्यामि क्रव्याद्भ्यो मद्रकाधम् ॥
evaṃ vidvañjoṣamāssva trāsātkiṃ bahu bhāṣase | na tvāṃ hatvā pradāsyāmi kravyādbhyo madrakādham
यह जानकर चुप बैठो; भय के मारे इतना क्यों बकते हो? हे अधम मद्रक! मैं तुम्हें मारकर माँसभक्षियों को नहीं दूँगा।
श्लोक 54 (8.34.54)
मित्रप्रतीक्षया शल्य धृतराष्ट्रस्य चोभयोः । अपवादतितिक्षाभिस्त्रिभिरेतैर्हि जीवसि ॥
mitrapratīkṣayā śalya dhṛtarāṣṭrasya cobhayoḥ | apavādatitikṣābhistribhiretairhi jīvasi
हे शल्य! मित्र के प्रति, और धृतराष्ट्र के प्रति—दोनों के प्रति—मेरे लिहाज़ से, और तुम्हारे अपशब्द सहने की मेरी सहनशीलता से—इन्हीं तीन कारणों से तुम जीवित हो।
श्लोक 55 (8.34.55)
पुनश्चेदीदृशं वाक्यं मद्रराज वदिष्यसि । शिरस्ते पातयिष्यामि गदया वज्रकल्पया ॥
punaścedīdṛśaṃ vākyaṃ madrarāja vadiṣyasi | śiraste pātayiṣyāmi gadayā vajrakalpayā
हे मद्रराज! यदि तुमने फिर ऐसी बात कही, तो मैं वज्र जैसी गदा से तुम्हारा सिर गिरा दूँगा।
श्लोक 56 (8.34.56)
श्रोतारस्त्विदमद्येह द्रष्टारो वा कुदेशज । कर्णं वा जघ्नतुः कृष्णौ कर्णो वा निजघान तौ ॥
śrotārastvidamadyeha draṣṭāro vā kudeśaja | karṇaṃ vā jaghnatuḥ kṛṣṇau karṇo vā nijaghāna tau
हे नीच देश में जन्मे! आज यहाँ तुम इसे सुनोगे या देखोगे: या तो दोनों कृष्ण कर्ण को मार चुके होंगे, या कर्ण उन्हें मार चुका होगा।
श्लोक 57 (8.34.57)
एवमुक्त्वा तु राधेयः पुनरेव विशाम्पते । अब्रवीन्मद्रराजानं याहियाहीत्यसम्भ्रमम् ॥
evamuktvā tu rādheyaḥ punareva viśāmpate | abravīnmadrarājānaṃ yāhiyāhītyasambhramam
हे राजन्! ऐसा कहकर राधापुत्र ने फिर निश्चिन्त भाव से मद्रराज से कहा, "चलो, चलो!"