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कर्ण पर्व · अध्याय 33

कर्ण की डींग पर शल्य का उपहास

कर्ण की डींग—कि जो उसे अर्जुन दिखाएगा उसे वह बड़े-बड़े दान देगा—शल्य से सही नहीं जाती; वह कहता है कि ये दान व्यर्थ हैं और कर्ण मृत्यु को बुला रहा है, और उसे सलाह देता है कि अर्जुन का सामना पूरी सेना से घिरकर ही करे। कर्ण उत्तर देता है कि उसे अपनी भुजाओं के बल पर भरोसा है; तब शल्य उसे और क्रोधित करने के लिए उपमाओं की झड़ी लगा देता है—कर्ण चन्द्रमा को छूने की चाह रखनेवाला बालक है, सिंह के सामने सियार है, मेघ को उत्तर देनेवाला मेंढक है—और कर्ण तथा अर्जुन में वही अन्तर है जो सत्य और असत्य, विष और अमृत में है।

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शल्य उवाच

श्लोक 1 (8.33.1)

मा सूतपुत्र मन्येथाः सौवर्णं हस्तिषङ्गवम् । प्रयच्छसि मुधैव त्वं द्रक्ष्यस्यद्य धनञ्जयम् ॥

mā sūtaputra manyethāḥ sauvarṇaṃ hastiṣaṅgavam | prayacchasi mudhaiva tvaṃ drakṣyasyadya dhanañjayam

हे सूतपुत्र! ऐसा मत समझो; तुम सोने के हाथी और छह बैलों का यह दान व्यर्थ ही दे रहे हो, क्योंकि आज तुम धनञ्जय को वैसे भी देख ही लोगे।

श्लोक 2 (8.33.2)

मा सूतपुत्र दानेन सौवर्णं हस्तिषङ्गवम् । प्रयच्छ पुरुषायाद्य द्रक्ष्यसि त्वं धनञ्जयम् ॥

mā sūtaputra dānena sauvarṇaṃ hastiṣaṅgavam | prayaccha puruṣāyādya drakṣyasi tvaṃ dhanañjayam

हे सूतपुत्र! सोने के हाथी और छह बैल दान में लोगों को मत दो; आज तुम धनञ्जय को वैसे भी देख ही लोगे।

श्लोक 3 (8.33.3)

बलेन मत्तस्त्यजसि वसु वैश्रवणो यथा । अयत्नेनैव राधेय द्रष्टास्यद्य धनञ्जयम् ॥

balena mattastyajasi vasu vaiśravaṇo yathā | ayatnenaiva rādheya draṣṭāsyadya dhanañjayam

बल के मद में चूर होकर तुम कुबेर की तरह धन लुटा रहे हो; हे राधेय! बिना किसी प्रयत्न के ही आज तुम धनञ्जय को देख लोगे।

श्लोक 4 (8.33.4)

पुरा सृजसि यच्चापि वित्तं बहु च मूढवत् । अपात्रदानाद्ये दोषास्तान्मोहान्नावबुध्यसे ॥

purā sṛjasi yaccāpi vittaṃ bahu ca mūḍhavat | apātradānādye doṣāstānmohānnāvabudhyase

जो बहुत-सा धन तुम बहुत समय से मूर्ख की तरह बिखेरते आ रहे हो, उसमें अपात्र को दान देने से जो दोष होते हैं, उन्हें तुम मोह के कारण नहीं समझते।

श्लोक 5 (8.33.5)

यत्प्रवेदयसे वित्तं बहु तेन खलु त्वया । शक्यं बहुविधैर्यज्ञैर्यष्टुं सूत यजस्व तैः ॥

yatpravedayase vittaṃ bahu tena khalu tvayā | śakyaṃ bahuvidhairyajñairyaṣṭuṃ sūta yajasva taiḥ

जिस बड़े धन का तुम बखान करते हो, उससे तो निश्चय ही अनेक प्रकार के यज्ञ किए जा सकते हैं; हे सूत! उसी से यज्ञ करो।

श्लोक 6 (8.33.6)

यच्च प्रार्थयसे हन्तुं कृष्णौ मोहाद्वृथैव तत् । न हि शुश्रुम सम्मर्दे क्रोष्ट्रा सिंहौ निपातितौ ॥

yacca prārthayase hantuṃ kṛṣṇau mohādvṛthaiva tat | na hi śuśruma sammarde kroṣṭrā siṃhau nipātitau

और जो तुम दोनों कृष्णों को मारना चाहते हो, वह मोह से उपजी व्यर्थ बात है; हमने कभी नहीं सुना कि किसी युद्ध में सियार ने दो सिंहों को गिराया हो।

श्लोक 7 (8.33.7)

अप्रार्थितं प्रार्थयसे सुहृदो न हि सन्ति ते । ये त्वां निवारयन्त्याशु प्रपतन्तं हुताशने ॥

aprārthitaṃ prārthayase suhṛdo na hi santi te | ye tvāṃ nivārayantyāśu prapatantaṃ hutāśane

तुम वह चाहते हो जिसे कोई नहीं चाहता; तुम्हारे कोई मित्र नहीं हैं, तभी तो कोई तुम्हें आग में गिरते हुए तुरन्त रोकता नहीं।

श्लोक 8 (8.33.8)

कार्याकार्यं न जानीषे कालपक्वोऽस्यसंशयम् । बह्वबद्धमकर्णीयं को हि ब्रूयाज्जिजीविषुः ॥

kāryākāryaṃ na jānīṣe kālapakvo'syasaṃśayam | bahvabaddhamakarṇīyaṃ ko hi brūyājjijīviṣuḥ

तुम्हें करने और न करने योग्य का ज्ञान नहीं है; निस्सन्देह तुम्हारा काल पक चुका है। जीने की इच्छा रखनेवाला कौन ऐसी बहुत-सी असम्बद्ध और न सुनने योग्य बातें कहेगा?

श्लोक 9 (8.33.9)

समुद्रतरणं दोर्भ्यां कण्ठे बद्ध्वा यथा शिलाम् । गिर्यग्राद्वा निपतनं तादृक्तव चिकीर्षितम् ॥

samudrataraṇaṃ dorbhyāṃ kaṇṭhe baddhvā yathā śilām | giryagrādvā nipatanaṃ tādṛktava cikīrṣitam

तुम जो करना चाहते हो, वह गले में पत्थर बाँधकर भुजाओं से समुद्र पार करने, या पर्वत की चोटी से कूद पड़ने के समान है।

श्लोक 10 (8.33.10)

सहितः सर्वयोधैस्त्वं व्यूढानीकैः सुरक्षितः । धनञ्जयेन युध्यस्व श्रेयश्चेत्प्राप्तुमिच्छसि ॥

sahitaḥ sarvayodhaistvaṃ vyūḍhānīkaiḥ surakṣitaḥ | dhanañjayena yudhyasva śreyaścetprāptumicchasi

यदि अपना कल्याण पाना चाहते हो, तो व्यूह में खड़े सब योद्धाओं के साथ, भली-भाँति रक्षित होकर, धनञ्जय से युद्ध करो।

श्लोक 11 (8.33.11)

हितार्थं धार्तराष्ट्रस्य ब्रवीमि त्वां न हिंसया । श्रद्धस्वेदं मया प्रोक्तं यदि तेऽस्ति जिजीविषा ॥

hitārthaṃ dhārtarāṣṭrasya bravīmi tvāṃ na hiṃsayā | śraddhasvedaṃ mayā proktaṃ yadi te'sti jijīviṣā

मैं धृतराष्ट्र के पुत्र के हित के लिए तुमसे यह कह रहा हूँ, द्वेष से नहीं; यदि जीने की इच्छा है तो मेरी इस बात पर विश्वास करो।

कर्ण उवाच

श्लोक 12 (8.33.12)

स्वबाहुवीर्यमाश्रित्य प्रार्थयाम्यर्जुनं रणे । त्वं तु मित्रमुखः शत्रुर्मां भीषयितुमिच्छसि ॥

svabāhuvīryamāśritya prārthayāmyarjunaṃ raṇe | tvaṃ tu mitramukhaḥ śatrurmāṃ bhīṣayitumicchasi

मैं अपनी भुजाओं के बल के भरोसे युद्ध में अर्जुन को चुनौती देता हूँ; और तुम मित्र का मुख लिए हुए शत्रु हो, जो मुझे डराना चाहते हो।

श्लोक 13 (8.33.13)

न मामस्मादभिप्रायात्कश्चिदद्य निवर्तयेत् । अपीन्द्रो वज्रमुद्यम्य किमु मर्त्यः कथञ्चन ॥

na māmasmādabhiprāyātkaścidadya nivartayet | apīndro vajramudyamya kimu martyaḥ kathañcana

आज इस संकल्प से मुझे कोई नहीं हटा सकता; वज्र उठाए हुए इन्द्र भी नहीं, फिर किसी तरह कोई मनुष्य क्या कर पाएगा?

सञ्जय उवाच

श्लोक 14 (8.33.14)

इति कर्णस्य वाक्यान्ते शल्यः प्राहोत्तरं वचः । चुकोपयिषुरत्यर्थं कर्णं मद्रेश्वरः पुनः ॥

iti karṇasya vākyānte śalyaḥ prāhottaraṃ vacaḥ | cukopayiṣuratyarthaṃ karṇaṃ madreśvaraḥ punaḥ

कर्ण की बात समाप्त होने पर मद्रराज शल्य ने कर्ण को और अधिक क्रोधित करने की इच्छा से फिर यह उत्तर दिया।

शल्य उवाच

श्लोक 15 (8.33.15)

यदा वै त्वां फल्गुनबाहुवेगाज् । ज्याचोदिता वेगवन्तोऽग्निकल्पाः । अन्वेतारः कङ्कपत्राः शिताग्रास् । त्यक्ष्यत्येषा स्वां तदा कर्ण बुद्धिः ॥

yadā vai tvāṃ phalgunabāhuvegāj | jyācoditā vegavanto'gnikalpāḥ | anvetāraḥ kaṅkapatrāḥ śitāgrās | tyakṣyatyeṣā svāṃ tadā karṇa buddhiḥ

जब फल्गुन (अर्जुन) की भुजाओं के वेग से प्रत्यञ्चा पर चढ़ाकर छोड़े गए, वेगवान्, अग्नि के समान, कङ्कपत्रों वाले, तीखी नोकों वाले बाण तुम्हारे पीछे-पीछे आएँगे, तब हे कर्ण! तुम्हारी यह बुद्धि अपना संकल्प छोड़ देगी।

श्लोक 16 (8.33.16)

यदा दिव्यं धनुरादाय पार्थः । प्रतापयन्पृतनां सव्यसाची । त्वां मर्दयिष्यत्यसुखैः पृषत्कैस् । तदापृच्छां त्यक्ष्यसे पाण्डवस्य ॥

yadā divyaṃ dhanurādāya pārthaḥ | pratāpayanpṛtanāṃ savyasācī | tvāṃ mardayiṣyatyasukhaiḥ pṛṣatkais | tadāpṛcchāṃ tyakṣyase pāṇḍavasya

जब सव्यसाची पार्थ दिव्य धनुष लेकर सेना को तपाता हुआ तुम्हें दुःख देनेवाले बाणों से रौंदेगा, तब तुम पाण्डुपुत्र के विषय में पूछताछ करना छोड़ दोगे।

श्लोक 17 (8.33.17)

बालश्चन्द्रं मातुरङ्के शयानो । यथा कश्चित्प्रार्थयतेऽपहर्तुम् । तद्वन्मोहाद्द्योतमानं रथस्थं । जेतुं पार्थं काङ्क्षसे सूतपुत्र ॥

bālaścandraṃ māturaṅke śayāno | yathā kaścitprārthayate'pahartum | tadvanmohāddyotamānaṃ rathasthaṃ | jetuṃ pārthaṃ kāṅkṣase sūtaputra

जैसे माता की गोद में लेटा हुआ कोई बालक चन्द्रमा को चुरा लेना चाहे, वैसे ही हे सूतपुत्र! तुम मोहवश रथ पर दमकते हुए पार्थ को जीतना चाहते हो।

श्लोक 18 (8.33.18)

हरादस्त्रं तीक्ष्णधारं यथाऽद्य । सर्वाणि गात्राणि निकर्षसि त्वम् । सुतीक्ष्णशस्त्रोपमकर्मणेह । युयुत्ससे फल्गुनेनाद्य कर्ण ॥

harādastraṃ tīkṣṇadhāraṃ yathā'dya | sarvāṇi gātrāṇi nikarṣasi tvam | sutīkṣṇaśastropamakarmaṇeha | yuyutsase phalgunenādya karṇa

मानो तुम तीखी धारवाले हथियार पर अपने सारे अंग घिस रहे हो; वैसे ही हे कर्ण! अत्यन्त तीखे शस्त्र के समान खतरनाक इस कर्म से तुम आज फल्गुन से लड़ना चाहते हो।

श्लोक 19 (8.33.19)

खन्यादसिं तीक्ष्णधारं यथाऽज्ञः । सुतेजनं निहितं वै पृथिव्याम् । तथा खनस्यद्य शितान्पृषत्कान् । यथार्थयस्यर्जुनेनेह युद्धम् ॥

khanyādasiṃ tīkṣṇadhāraṃ yathā'jñaḥ | sutejanaṃ nihitaṃ vai pṛthivyām | tathā khanasyadya śitānpṛṣatkān | yathārthayasyarjuneneha yuddham

जैसे कोई अज्ञानी पृथ्वी में गड़ी हुई तीखी धारवाली, खूब माँजी हुई तलवार को खोद निकाले, वैसे ही अर्जुन से यहाँ युद्ध चाहते हुए तुम आज अपने लिए तीखे बाण खोद रहे हो।

श्लोक 20 (8.33.20)

त्रिशूलमाश्लिष्य सुतीक्ष्णधारं । सर्वाणि गात्राणि विघर्षसि त्वम् । सुतीक्ष्णधारोपमकर्मणा त्वं । युयुत्ससे योऽर्जुनेनाद्य कर्ण ॥

triśūlamāśliṣya sutīkṣṇadhāraṃ | sarvāṇi gātrāṇi vigharṣasi tvam | sutīkṣṇadhāropamakarmaṇā tvaṃ | yuyutsase yo'rjunenādya karṇa

तुम अत्यन्त तीखी धारवाला त्रिशूल गले लगाकर उस पर अपने सारे अंग रगड़ रहे हो; हे कर्ण! तीखी धार के समान ऐसे ही कर्म से तुम आज अर्जुन से लड़ना चाहते हो।

श्लोक 21 (8.33.21)

क्रुद्धं सिंहं केसरिणं बृहन्तं । बालो मूढः क्षुद्रमृगस्तरस्वी । समाह्वयेद्वृष्टमुपेत्य योद्धुं । तथा त्वमद्याह्वयसे हि पार्थम् ॥

kruddhaṃ siṃhaṃ kesariṇaṃ bṛhantaṃ | bālo mūḍhaḥ kṣudramṛgastarasvī | samāhvayedvṛṣṭamupetya yoddhuṃ | tathā tvamadyāhvayase hi pārtham

जैसे कोई मूर्ख, छोटा किन्तु फुर्तीला हिरन का बच्चा क्रुद्ध, विशाल, अयालवाले सिंह के पास पहुँचकर उसे युद्ध के लिए ललकारे, वैसे ही तुम आज पार्थ को ललकारते हो।

श्लोक 22 (8.33.22)

मा सूतपुत्राह्वय राजपुत्रं । महावीर्यं केसरिणं यथैव । वने शृगालः पिशितेन तृप्तः । पार्थं समासाद्य विनङ्क्ष्यसि त्वम् ॥

mā sūtaputrāhvaya rājaputraṃ | mahāvīryaṃ kesariṇaṃ yathaiva | vane śṛgālaḥ piśitena tṛptaḥ | pārthaṃ samāsādya vinaṅkṣyasi tvam

हे सूतपुत्र! उस महापराक्रमी राजकुमार को, जो अयालवाले सिंह के समान है, मत ललकारो। जंगल में माँस से तृप्त सियार की तरह तुम पार्थ के सामने जाकर नष्ट हो जाओगे।

श्लोक 23 (8.33.23)

ईषादन्तं महानागं प्रभिन्नकरटामुखम् । शशको ह्वयसे युद्धे कर्ण पार्थं धनञ्जयम् ॥

īṣādantaṃ mahānāgaṃ prabhinnakaraṭāmukham | śaśako hvayase yuddhe karṇa pārthaṃ dhanañjayam

हे कर्ण! तुम खरगोश होकर हल की ईषा-जैसे दाँतों और मद बहाते मस्तकवाले महाहाथी को—पार्थ धनञ्जय को—युद्ध में ललकारते हो।

श्लोक 24 (8.33.24)

विलस्थं कृष्णसर्पं त्वं बाल्यात्काष्ठेन विध्यसि । महाविषं पूर्णकोपं यत्पार्थं योद्धुमिच्छसि ॥

vilasthaṃ kṛṣṇasarpaṃ tvaṃ bālyātkāṣṭhena vidhyasi | mahāviṣaṃ pūrṇakopaṃ yatpārthaṃ yoddhumicchasi

बिल में बैठे महाविषैले, क्रोध से भरे काले नाग को तुम बचपने में लकड़ी से कोंच रहे हो, जो तुम पार्थ से युद्ध करना चाहते हो।

श्लोक 25 (8.33.25)

सिंहं केसरिणं क्रुद्धमभिक्रम्याभिनर्दसे । शृगाल इव मूढस्त्वं नृसिंहं कर्ण पाण्डवम् ॥

siṃhaṃ kesariṇaṃ kruddhamabhikramyābhinardase | śṛgāla iva mūḍhastvaṃ nṛsiṃhaṃ karṇa pāṇḍavam

हे कर्ण! क्रुद्ध अयालवाले सिंह के सामने जाकर मूर्खतावश सियार की तरह तुम पुरुषसिंह पाण्डव को देखकर दहाड़ रहे हो।

श्लोक 26 (8.33.26)

सुपर्णं पतगश्रेष्ठं वैनतेयं तरस्विनम् । स्वगेवाह्वयसे पार्थं तथा कर्ण धनञ्जयम् ॥

suparṇaṃ patagaśreṣṭhaṃ vainateyaṃ tarasvinam | svagevāhvayase pārthaṃ tathā karṇa dhanañjayam

पक्षियों में श्रेष्ठ, वेगवान् विनतापुत्र सुपर्ण (गरुड़) को कोई छोटा पक्षी जैसे ललकारे, वैसे ही हे कर्ण! तुम पार्थ धनञ्जय को ललकारते हो।

श्लोक 27 (8.33.27)

सर्वाम्भसां निधिं भीमं मूर्तिमन्तं झषाकुलम् । चन्द्रोदये विवर्धन्तमप्लवस्त्वं तितीर्षसि ॥

sarvāmbhasāṃ nidhiṃ bhīmaṃ mūrtimantaṃ jhaṣākulam | candrodaye vivardhantamaplavastvaṃ titīrṣasi

सब जलों के निधि, भयंकर, मूर्तिमान्, मछलियों से भरे और चन्द्रोदय पर उमड़ते समुद्र को तुम बिना नाव के पार करना चाहते हो।

श्लोक 28 (8.33.28)

ऋषभं दुन्दुभिग्रीवं तीक्ष्णशृङ्गं प्रहारिणम् । वत्स आह्वयसे युद्धे कर्ण पार्थं धनञ्जयम् ॥

ṛṣabhaṃ dundubhigrīvaṃ tīkṣṇaśṛṅgaṃ prahāriṇam | vatsa āhvayase yuddhe karṇa pārthaṃ dhanañjayam

हे कर्ण! नगाड़े जैसे कण्ठवाले, तीखे सींगोंवाले, प्रहार करनेवाले साँड़ को तुम बछड़े की तरह युद्ध में ललकारते हो—पार्थ धनञ्जय को।

श्लोक 29 (8.33.29)

महामेघं महाघोषं दर्दुरः प्रतिनर्दसि । बाणतोयप्रदं काले नरपर्जन्यमर्जुनम् ॥

mahāmeghaṃ mahāghoṣaṃ darduraḥ pratinardasi | bāṇatoyapradaṃ kāle naraparjanyamarjunam

भारी गर्जनावाले महामेघ को—उचित समय पर बाणरूपी जल बरसानेवाले, नरों के मेघ अर्जुन को—तुम मेंढक की तरह टर्राकर उत्तर देते हो।

श्लोक 30 (8.33.30)

यथा च श्वा गृहस्थस्तु व्याघ्रं वनगतं भषेत् । तथा त्वं भषसे कर्ण नरव्याघ्रं धनञ्जयम् ॥

yathā ca śvā gṛhasthastu vyāghraṃ vanagataṃ bhaṣet | tathā tvaṃ bhaṣase karṇa naravyāghraṃ dhanañjayam

जैसे घर में पला कुत्ता वन में गए बाघ पर भौंके, वैसे ही हे कर्ण! तुम नरव्याघ्र धनञ्जय पर भौंकते हो।

श्लोक 31 (8.33.31)

शृगालो हि वने कर्ण शशैः परिवृतो वसन् । मन्यते सिंहमात्मानं यावत्सिंहं न पश्यति ॥

śṛgālo hi vane karṇa śaśaiḥ parivṛto vasan | manyate siṃhamātmānaṃ yāvatsiṃhaṃ na paśyati

हे कर्ण! वन में खरगोशों से घिरा रहनेवाला सियार तब तक अपने को सिंह मानता है, जब तक वह सिंह को देख नहीं लेता।

श्लोक 32 (8.33.32)

तथा त्वमपि राधेय सिंहमात्मानमिच्छसि । अपश्यञ्शत्रुदमनं नरसिंहं रणेऽर्जुनम् ॥

tathā tvamapi rādheya siṃhamātmānamicchasi | apaśyañśatrudamanaṃ narasiṃhaṃ raṇe'rjunam

हे राधेय! उसी तरह तुम भी तब तक अपने को सिंह समझते हो, जब तक शत्रुओं का दमन करनेवाले नरसिंह अर्जुन को रणभूमि में नहीं देख लेते।

श्लोक 33 (8.33.33)

व्याघ्रं त्वं मन्यसेऽऽत्मानं यावत्कृष्णौ न पश्यसि । समास्थितावेकरथे सूर्याचन्द्रमसाविव ॥

vyāghraṃ tvaṃ manyase''tmānaṃ yāvatkṛṣṇau na paśyasi | samāsthitāvekarathe sūryācandramasāviva

जब तक तुम एक ही रथ में बैठे सूर्य और चन्द्रमा जैसे दोनों कृष्णों को नहीं देखते, तब तक अपने को बाघ मानते हो।

श्लोक 34 (8.33.34)

यावद्गाण्डीवघोषं त्वं न शृणोषि महाहवे । तावदेव त्वया कर्ण शक्यं वक्तुं यथेच्छसि ॥

yāvadgāṇḍīvaghoṣaṃ tvaṃ na śṛṇoṣi mahāhave | tāvadeva tvayā karṇa śakyaṃ vaktuṃ yathecchasi

हे कर्ण! महायुद्ध में जब तक तुम गाण्डीव की टङ्कार नहीं सुनते, तभी तक तुम जो चाहो कह सकते हो।

श्लोक 35 (8.33.35)

रथशङ्खधनुःशब्दैर्नादयन्तं दिशो दश । नर्दन्तमिव शार्दूलं दृष्ट्वा क्रोष्टा भविष्यसि ॥

rathaśaṅkhadhanuḥśabdairnādayantaṃ diśo daśa | nardantamiva śārdūlaṃ dṛṣṭvā kroṣṭā bhaviṣyasi

रथ, शङ्ख और धनुष की ध्वनि से दसों दिशाओं को गुँजाते, दहाड़ते हुए बाघ जैसे अर्जुन को देखकर तुम सियार बन जाओगे।

श्लोक 36 (8.33.36)

नित्यमेव शृगालस्त्वं नित्यं सिंहो धनञ्जयः । वीरप्रद्वेषणान्मूढ तस्मात्क्रोष्टेव लक्ष्यसे ॥

nityameva śṛgālastvaṃ nityaṃ siṃho dhanañjayaḥ | vīrapradveṣaṇānmūḍha tasmātkroṣṭeva lakṣyase

तुम सदा सियार ही हो और धनञ्जय सदा सिंह; हे मूढ़! वीरों से द्वेष करने के कारण तुम सियार जैसे ही दिखते हो।

श्लोक 37 (8.33.37)

यथाऽऽखुः स्याद्विडालश्च श्वा व्याघ्रश्च बलाबले । यथा शृगालः सिंहश्च यथा च शशकुञ्जरौ ॥

yathā''khuḥ syādviḍālaśca śvā vyāghraśca balābale | yathā śṛgālaḥ siṃhaśca yathā ca śaśakuñjarau

जैसे चूहा और बिलाव, कुत्ता और बाघ, सियार और सिंह, खरगोश और हाथी बल और निर्बलता में एक-दूसरे से भिन्न हैं,

श्लोक 38 (8.33.38)

यथाऽनृतं च सत्यं च यथा चापि विषामृते । तथा त्वमपि पार्थश्च प्रख्यातावात्मकर्मभिः ॥

yathā'nṛtaṃ ca satyaṃ ca yathā cāpi viṣāmṛte | tathā tvamapi pārthaśca prakhyātāvātmakarmabhiḥ

जैसे झूठ और सच, जैसे विष और अमृत—वैसे ही तुम और पार्थ दोनों अपने-अपने कर्मों से प्रसिद्ध हो।

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