कर्ण पर्व · अध्याय 41
दोनों सेनाओं की व्यूह-रचना
कर्ण पाण्डवों के धृष्टद्युम्न-रक्षित व्यूह को देखकर अपनी सेना को आगे ले चलता है; कौरव कर्ण और अर्जुन के द्वन्द्व की आशा में जयघोष करते हैं। धृतराष्ट्र के पूछने पर सञ्जय कौरव-सेना के बृहस्पति-व्यूह का वर्णन करते हैं—उसके पक्ष, प्रपक्ष और उनके नायक। युधिष्ठिर अर्जुन को वह व्यूह दिखाते हैं और प्रत्येक पाण्डव योद्धा को उसका कौरव प्रतिद्वन्द्वी बाँट देते हैं; फिर पाण्डव धृष्टद्युम्न और शिखण्डी को आगे रखकर अपना प्रतिव्यूह रचते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.41.1)
ततः परानीकभिदं व्यूहमप्रतिमं महत् । समीक्ष्य कर्णः पार्थानां धृष्टद्युम्नाभिरक्षितम् ॥
tataḥ parānīkabhidaṃ vyūhamapratimaṃ mahat | samīkṣya karṇaḥ pārthānāṃ dhṛṣṭadyumnābhirakṣitam
तब कर्ण ने पार्थों की उस विशाल और अनुपम व्यूह-रचना को देखा, जो शत्रु की सेना को चीर देनेवाली थी और जिसकी रक्षा धृष्टद्युम्न कर रहे थे।
श्लोक 2 (8.41.2)
प्रययौ रथघोषेण सिंहनादरवेण च । वादित्राणां च निनदैः कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥
prayayau rathaghoṣeṇa siṃhanādaraveṇa ca | vāditrāṇāṃ ca ninadaiḥ kampayanniva medinīm
और रथ की घर्घराहट, सिंहनाद और वाद्यों के घोष से मानो पृथ्वी को कँपाता हुआ आगे बढ़ा।
श्लोक 3 (8.41.3)
वेपमान इव क्रोधाद्युद्धशौण्डः परन्तपः । प्रतिव्यूह्य महातेजा यथावद्भरतर्षभ ॥
vepamāna iva krodhādyuddhaśauṇḍaḥ parantapaḥ | prativyūhya mahātejā yathāvadbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ! क्रोध से मानो काँपता हुआ, युद्ध का रसिया और शत्रुओं को तपानेवाला वह महातेजस्वी कर्ण विधिपूर्वक अपना प्रतिव्यूह रचकर आगे बढ़ा,
श्लोक 4 (8.41.4)
व्यधमत्पाण्डवीं सेनामासुरीं मघवानिव । युधिष्ठिरं चाभ्यहनदपसव्यं चकार ह ॥
vyadhamatpāṇḍavīṃ senāmāsurīṃ maghavāniva | yudhiṣṭhiraṃ cābhyahanadapasavyaṃ cakāra ha
और जैसे इन्द्र असुरों की सेना को तितर-बितर कर देते हैं, वैसे ही उसने पाण्डवों की सेना को छिन्न-भिन्न कर दिया; उसने युधिष्ठिर पर भी प्रहार किया और उन्हें अपनी बायीं ओर कर दिया।
श्लोक 5 (8.41.5)
कर्णस्य रथघोषेण मौर्वीनिष्पेषणेन च । सुसङ्ग्राहेण रश्मीनां समकम्पन्त सृञ्जयाः ॥
karṇasya rathaghoṣeṇa maurvīniṣpeṣaṇena ca | susaṅgrāheṇa raśmīnāṃ samakampanta sṛñjayāḥ
कर्ण के रथ की घर्घराहट, उसकी प्रत्यंचा की टंकार और लगामों पर उसकी दृढ़ पकड़ से सृञ्जय काँप उठे।
श्लोक 6 (8.41.6)
तानि सर्वाणि सैन्यानि कर्णं दृष्ट्वा विशाम्पते । बभूवुः सम्प्रहृष्टानि तावकानि युयुत्सया ॥
tāni sarvāṇi sainyāni karṇaṃ dṛṣṭvā viśāmpate | babhūvuḥ samprahṛṣṭāni tāvakāni yuyutsayā
हे प्रजापालक! कर्ण को देखकर आपकी वे सारी सेनाएँ हर्ष से भर उठीं और युद्ध के लिए उत्सुक हो गईं।
श्लोक 7 (8.41.7)
अश्रूयन्त ततो वाचस्तावकानां विशाम्पते । कर्णार्जुनमहायुद्धमेतदद्य भविष्यति ॥
aśrūyanta tato vācastāvakānāṃ viśāmpate | karṇārjunamahāyuddhametadadya bhaviṣyati
हे प्रजापालक! तब आपके योद्धाओं की ये बातें सुनाई दीं—"आज कर्ण और अर्जुन का महान् युद्ध होगा!"
सैनिका ऊचुः
श्लोक 8 (8.41.8)
अद्य दुर्योधनो राजा हतामित्रो भविष्यति । अद्य कर्णं रणे दृष्ट्वा फल्गुनो विद्रविष्यति ॥
adya duryodhano rājā hatāmitro bhaviṣyati | adya karṇaṃ raṇe dṛṣṭvā phalguno vidraviṣyati
"आज राजा दुर्योधन के शत्रु मारे जाएँगे! आज रणभूमि में कर्ण को देखकर फल्गुन भाग खड़ा होगा!"
श्लोक 9 (8.41.9)
अद्य तावद्वयं युद्धे कर्णस्यैवानुगामिनः । कर्णबाणमयं भीमं युद्धं द्रक्ष्याम संयुगे ॥
adya tāvadvayaṃ yuddhe karṇasyaivānugāminaḥ | karṇabāṇamayaṃ bhīmaṃ yuddhaṃ drakṣyāma saṃyuge
"आज हम, जो अकेले कर्ण के ही अनुगामी हैं, रणभूमि में कर्ण के बाणों से बना वह भयंकर युद्ध देखेंगे!"
श्लोक 10 (8.41.10)
चिरकालेप्सितमिदमद्येदानीं भविष्यति । अद्य द्रक्ष्याम सङ्ग्रामं घोरं देवासुरोपमम् ॥
cirakālepsitamidamadyedānīṃ bhaviṣyati | adya drakṣyāma saṅgrāmaṃ ghoraṃ devāsuropamam
"जिसे हम बहुत समय से चाहते थे, वह अब होने जा रहा है। आज हम देवासुर-संग्राम जैसा भयंकर युद्ध देखेंगे।"
श्लोक 11 (8.41.11)
अद्येदानीं महद्युद्धं भविष्यति भयानकम् । अद्येदानीं जयो नित्यमेकस्यैकस्य वा रणे ॥
adyedānīṃ mahadyuddhaṃ bhaviṣyati bhayānakam | adyedānīṃ jayo nityamekasyaikasya vā raṇe
"अब महान् और भयंकर युद्ध होगा। अब इस संग्राम में विजय स्थायी रूप से दोनों में से किसी एक की ही होगी।"
श्लोक 12 (8.41.12)
अर्जुनं किल राधेयो वधिष्यति महारणे । अथवा कं नरं लोके न स्पृशन्ति मनोरथाः ॥
arjunaṃ kila rādheyo vadhiṣyati mahāraṇe | athavā kaṃ naraṃ loke na spṛśanti manorathāḥ
"राधापुत्र कर्ण निश्चय ही इस महासंग्राम में अर्जुन को मार डालेगा। अथवा संसार में ऐसा कौन मनुष्य है जिसे मनोरथ नहीं छूते?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 13 (8.41.13)
इत्युक्त्वा विविधा वाचः कुरवः कुरुनन्दन । आजघ्नुः पटहांश्चैव तूर्यांश्चैव सहस्रशः ॥
ityuktvā vividhā vācaḥ kuravaḥ kurunandana | ājaghnuḥ paṭahāṃścaiva tūryāṃścaiva sahasraśaḥ
हे कुरुनन्दन! ऐसी अनेक बातें कहकर कौरवों ने हज़ारों नगाड़े और तुरहियाँ बजा दीं,
श्लोक 14 (8.41.14)
भेरीनादांश्च विविधान्सिंहनादांश्च पुष्कलान् । मुरजानां महाशब्दानानकानां महारवान् ॥
bherīnādāṃśca vividhānsiṃhanādāṃśca puṣkalān | murajānāṃ mahāśabdānānakānāṃ mahāravān
भेरियों के अनेक प्रकार के नाद, भरपूर सिंहनाद, मृदंगों की महाध्वनि और आनकों की गम्भीर गर्जना के साथ।
श्लोक 15 (8.41.15)
नृत्यमानाश्च बहुशस्तर्जमानाश्च मारिष । अन्योन्यमभ्ययुर्युद्धे युद्धरङ्गगता नराः ॥
nṛtyamānāśca bahuśastarjamānāśca māriṣa | anyonyamabhyayuryuddhe yuddharaṅgagatā narāḥ
हे माननीय! बार-बार नाचते और एक-दूसरे को धमकाते हुए, रणभूमि में आए हुए वे योद्धा युद्ध में परस्पर टूट पड़े।
श्लोक 16 (8.41.16)
तेषां पदाता नागानां पादरक्षाः समन्ततः । पट्टसासिधराः शूराश्चापबाणमुसुण्ठिनः ॥
teṣāṃ padātā nāgānāṃ pādarakṣāḥ samantataḥ | paṭṭasāsidharāḥ śūrāścāpabāṇamusuṇṭhinaḥ
उनमें हाथियों के पाँवों की रक्षा करनेवाले पैदल योद्धा चारों ओर थे—पट्टस और तलवारें धारण किए हुए शूर, जो धनुष, बाण और मुसुण्ठियाँ लिए हुए थे।
श्लोक 17 (8.41.17)
भिण्डिपालधराश्चैव शूलहस्ताः सुचक्रिणः । तेषां समागमो घोरो देवासुररणोपमः ॥
bhiṇḍipāladharāścaiva śūlahastāḥ sucakriṇaḥ | teṣāṃ samāgamo ghoro devāsuraraṇopamaḥ
भिन्दिपाल धारण किए, हाथों में शूल और उत्तम चक्र लिए हुए उन योद्धाओं का वह समागम देवासुर-संग्राम के समान भयंकर था।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 18 (8.41.18)
कथं सञ्जय राधेयः प्रत्यव्यूहत पाण्डवान् । धृष्टद्युम्नमुखान्सङ्ख्ये भीमसेनाभिरक्षितान् । सर्वानेव महेष्वासानजय्यानमरैरपि ॥
kathaṃ sañjaya rādheyaḥ pratyavyūhata pāṇḍavān | dhṛṣṭadyumnamukhānsaṅkhye bhīmasenābhirakṣitān | sarvāneva maheṣvāsānajayyānamarairapi
सञ्जय! राधापुत्र कर्ण ने पाण्डवों के विरुद्ध अपनी सेना का व्यूह कैसे रचा—उन सब महाधनुर्धरों के विरुद्ध, जिनके आगे धृष्टद्युम्न थे, जिनकी रक्षा भीमसेन कर रहे थे और जिन्हें देवता भी नहीं जीत सकते?
श्लोक 19 (8.41.19)
के च प्रपक्षौ पक्षौ वा मम सैन्यस्य सञ्जय । प्रविभज्य यथान्यायमवतस्थुः सुदंशिताः ॥
ke ca prapakṣau pakṣau vā mama sainyasya sañjaya | pravibhajya yathānyāyamavatasthuḥ sudaṃśitāḥ
और सञ्जय! मेरी सेना के पक्ष और प्रपक्ष कौन थे, जो विधिपूर्वक सेना को बाँटकर कवच धारण किए खड़े हुए?
श्लोक 20 (8.41.20)
कथं पाण्डुसुताश्चापि प्रत्यव्यूहन्त मामकान् । कथं चैतन्महद्युद्धं प्रावर्तत सुदारुणम् ॥
kathaṃ pāṇḍusutāścāpi pratyavyūhanta māmakān | kathaṃ caitanmahadyuddhaṃ prāvartata sudāruṇam
और पाण्डुपुत्रों ने मेरे योद्धाओं के विरुद्ध अपना प्रतिव्यूह कैसे रचा? और यह महान् तथा अत्यन्त भयंकर युद्ध कैसे आरम्भ हुआ?
श्लोक 21 (8.41.21)
क्व च बीभत्सुरभवद्यत्कर्णोऽयाद्युधिष्ठिरम् । को ह्यर्जुनस्य सान्निध्ये शक्तो जेतुं युधिष्ठिरम् ॥
kva ca bībhatsurabhavadyatkarṇo'yādyudhiṣṭhiram | ko hyarjunasya sānnidhye śakto jetuṃ yudhiṣṭhiram
और जब कर्ण युधिष्ठिर की ओर गया, तब बीभत्सु (अर्जुन) कहाँ था? अर्जुन के समीप रहते युधिष्ठिर को जीतने में कौन समर्थ हो सकता है?
श्लोक 22 (8.41.22)
सर्वभूतानि यो ह्येकः खाण्डवे जितवान्पुरा । कस्तमन्यस्तु राधेयात्प्रतियुध्येज्जिजीविषुः ॥
sarvabhūtāni yo hyekaḥ khāṇḍave jitavānpurā | kastamanyastu rādheyātpratiyudhyejjijīviṣuḥ
जिसने अकेले ही बहुत पहले खाण्डव वन में सब प्राणियों को जीत लिया था, राधापुत्र के सिवा और कौन जीने की इच्छा रखनेवाला उससे लड़ेगा?
सञ्जय उवाच
श्लोक 23 (8.41.23)
शृणु व्यूहस्य रचनामर्जुनश्च यथा गतः । परिवार्य नृपान्सर्वान्सङ्ग्रामश्चाभवद्यथा ॥
śṛṇu vyūhasya racanāmarjunaśca yathā gataḥ | parivārya nṛpānsarvānsaṅgrāmaścābhavadyathā
व्यूह की रचना सुनिए, और यह भी कि अर्जुन कैसे गया और सब राजाओं को घेरकर संग्राम कैसे हुआ।
श्लोक 24 (8.41.24)
कृपः शारद्वतो राजन्मागधाश्च तरस्विनः । सात्वतः कृतवर्मा च दक्षिणं पक्षमाश्रिताः ॥
kṛpaḥ śāradvato rājanmāgadhāśca tarasvinaḥ | sātvataḥ kṛtavarmā ca dakṣiṇaṃ pakṣamāśritāḥ
हे राजन्! शरद्वान् के पुत्र कृप, बलवान् मागध और सात्वत कृतवर्मा दाहिने पक्ष में स्थित हुए।
श्लोक 25 (8.41.25)
तेषां प्रपक्षे शकुनिरुलूकश्च महारथः । सादिभिर्विमलप्रासैस्तदानीमभ्यरक्षताम् ॥
teṣāṃ prapakṣe śakunirulūkaśca mahārathaḥ | sādibhirvimalaprāsaistadānīmabhyarakṣatām
उनके प्रपक्ष में शकुनि और महारथी उलूक निर्मल भालोंवाले घुड़सवारों के साथ उनकी रक्षा कर रहे थे,
श्लोक 26 (8.41.26)
गान्धारैश्चाप्यसम्भ्रान्तैः पार्वतीयैश्च दुर्जयैः । शलभानामिव व्रातैः पिशाचैरिव दुर्दृशैः ॥
gāndhāraiścāpyasambhrāntaiḥ pārvatīyaiśca durjayaiḥ | śalabhānāmiva vrātaiḥ piśācairiva durdṛśaiḥ
साथ में अविचल गान्धार और अजेय पर्वतीय योद्धा थे, जो टिड्डियों के झुंड जैसे और पिशाचों जैसे भयानक दिखते थे।
श्लोक 27 (8.41.27)
चतुर्विंशत्सहस्राणि रथानामनिवर्तिनाम् । संशप्तका युद्धशौण्डा वामपार्श्वमपालयन् ॥
caturviṃśatsahasrāṇi rathānāmanivartinām | saṃśaptakā yuddhaśauṇḍā vāmapārśvamapālayan
कभी पीछे न हटनेवाले चौबीस हज़ार रथी—युद्ध के अभिमानी संशप्तक—बायें पार्श्व की रक्षा कर रहे थे,
श्लोक 28 (8.41.28)
समन्वितास्तव सुतैः कृष्णार्जुनजिघांसवः । तेषां प्रपक्षाः काम्भोजाः शकाश्च यवनैः सह ॥
samanvitāstava sutaiḥ kṛṣṇārjunajighāṃsavaḥ | teṣāṃ prapakṣāḥ kāmbhojāḥ śakāśca yavanaiḥ saha
वे आपके पुत्रों के साथ मिले हुए थे और कृष्ण तथा अर्जुन को मार डालने की इच्छा रखते थे। उनका प्रपक्ष काम्बोज, शक और यवन थे।
श्लोक 29 (8.41.29)
निदेशात्सूतपुत्रस्य सरथाश्वेभपत्तयः । आह्वयन्तोऽर्जुनं तस्थुः केशवं च महाबलम् ॥
nideśātsūtaputrasya sarathāśvebhapattayaḥ | āhvayanto'rjunaṃ tasthuḥ keśavaṃ ca mahābalam
सूतपुत्र की आज्ञा से वे रथों, घोड़ों, हाथियों और पैदलों के साथ अर्जुन और महाबली केशव को ललकारते हुए खड़े थे।
श्लोक 30 (8.41.30)
ततः सेनामुखे कर्णोऽप्यवातिष्ठत दंशितः । चित्रवर्माङ्गदः स्रग्वी पालयन्वाहिनीमुखम् ॥
tataḥ senāmukhe karṇo'pyavātiṣṭhata daṃśitaḥ | citravarmāṅgadaḥ sragvī pālayanvāhinīmukham
तब कवचधारी कर्ण भी सेना के अग्रभाग में आ खड़ा हुआ; वह विचित्र कवच और बाजूबन्द पहने, माला धारण किए सेना के मुख की रक्षा कर रहा था।
श्लोक 31 (8.41.31)
रक्षमाणैः सुसंरब्धैः पुत्रैः शस्त्रभृतां वरः । वाहिनीं प्रमुखे वीरः सम्प्रकर्षन्नशोभत ॥
rakṣamāṇaiḥ susaṃrabdhaiḥ putraiḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | vāhinīṃ pramukhe vīraḥ samprakarṣannaśobhata
क्रोध से भरे अपने पुत्रों से रक्षित वह शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वीर सेना को आगे खींचता हुआ अग्रभाग में शोभित हो रहा था।
श्लोक 32 (8.41.32)
अशोकस्तु महाबाहुः सूर्यवैश्वानरप्रभः । महाद्विपस्कन्धगतः पिङ्गाक्षः प्रियदर्शनः । दुःशासनो वृतः सैन्यैः स्थितो व्यूहस्य पृष्ठतः ॥
aśokastu mahābāhuḥ sūryavaiśvānaraprabhaḥ | mahādvipaskandhagataḥ piṅgākṣaḥ priyadarśanaḥ | duḥśāsano vṛtaḥ sainyaiḥ sthito vyūhasya pṛṣṭhataḥ
निर्भय, महाबाहु, सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, पिङ्गल नेत्रोंवाला और देखने में प्रिय दुःशासन विशाल हाथी के कन्धे पर बैठा हुआ, सेना से घिरा, व्यूह के पीछे स्थित था।
श्लोक 33 (8.41.33)
तन्मध्ये स महाबाहुः स्वयं दुर्योधनो नृपः । चित्राश्वैश्चित्रसन्नाहैः सोदर्यैरभिरक्षितः ॥
tanmadhye sa mahābāhuḥ svayaṃ duryodhano nṛpaḥ | citrāśvaiścitrasannāhaiḥ sodaryairabhirakṣitaḥ
उनके बीच महाबाहु राजा दुर्योधन स्वयं अपने भाइयों से सुरक्षित थे, जिनके घोड़े और कवच रंग-बिरंगे थे,
श्लोक 34 (8.41.34)
रक्ष्यमाणो महावीर्यैः सहितैर्मद्रकेकयैः । अशोभत महाराज देवैरिव शतक्रतुः ॥
rakṣyamāṇo mahāvīryaiḥ sahitairmadrakekayaiḥ | aśobhata mahārāja devairiva śatakratuḥ
और महापराक्रमी मद्रकों तथा केकयों से एक साथ रक्षित होकर, हे महाराज! वह देवताओं के बीच शतक्रतु (इन्द्र) के समान शोभित हो रहा था।
श्लोक 35 (8.41.35)
अश्वत्थामा कुरूणां च ये प्रवीरा महारथाः । नित्यमत्ताश्च मातङ्गाः शूरैर्म्लेच्छैः समन्विताः । अन्वयुस्तद्रथानीकं क्षरन्त इव तोयदाः ॥
aśvatthāmā kurūṇāṃ ca ye pravīrā mahārathāḥ | nityamattāśca mātaṅgāḥ śūrairmlecchaiḥ samanvitāḥ | anvayustadrathānīkaṃ kṣaranta iva toyadāḥ
अश्वत्थामा, कुरुओं के जो प्रमुख वीर महारथी थे, और शूर म्लेच्छों से युक्त सदा मद बहानेवाले हाथी, उस रथ-सेना के पीछे चल रहे थे, मानो बरसते हुए बादल हों।
श्लोक 36 (8.41.36)
ते ध्वजैर्वैजयन्तीभिर्ज्वलद्भिः परमायुधैः । सादिभिश्चास्थिता रेजुर्द्रुमवन्त इवाचलाः ॥
te dhvajairvaijayantībhirjvaladbhiḥ paramāyudhaiḥ | sādibhiścāsthitā rejurdrumavanta ivācalāḥ
ध्वजाओं, पताकाओं और चमकते हुए उत्तम अस्त्र-शस्त्रों से सजे तथा घुड़सवारों से युक्त वे वृक्षों से लदे पर्वतों के समान शोभित हो रहे थे।
श्लोक 37 (8.41.37)
तेषां पदातिनागानां पादरक्षाः सहस्रशः । पट्टसासिधराः शूरा बभूवुरनिवर्तिनः ॥
teṣāṃ padātināgānāṃ pādarakṣāḥ sahasraśaḥ | paṭṭasāsidharāḥ śūrā babhūvuranivartinaḥ
उनके पैदलों और हाथियों के पाँवों की रक्षा करनेवाले हज़ारों योद्धा थे—पट्टस और तलवारें लिए हुए शूर, जो कभी पीछे नहीं हटते थे।
श्लोक 38 (8.41.38)
सादिभिः स्यन्दनैर्नागैरधिकं समलङ्कृतैः । स व्यूहराजो विबभौ देवासुरचमूपमः ॥
sādibhiḥ syandanairnāgairadhikaṃ samalaṅkṛtaiḥ | sa vyūharājo vibabhau devāsuracamūpamaḥ
घुड़सवारों, रथों और अत्यन्त सुसज्जित हाथियों के साथ वह व्यूहराज देवों और असुरों की सेना के समान शोभित हुआ।
श्लोक 39 (8.41.39)
बार्हस्पत्यः सुविहितो नायकेन विपश्चिता । नृत्यतीव महाव्यूहः परेषां भयमादधत् ॥
bārhaspatyaḥ suvihito nāyakena vipaścitā | nṛtyatīva mahāvyūhaḥ pareṣāṃ bhayamādadhat
विद्वान् सेनापति द्वारा भली-भाँति रचा हुआ वह बृहस्पति-व्यूह शत्रुओं के मन में भय उत्पन्न करता हुआ मानो नाच रहा था।
श्लोक 40 (8.41.40)
तस्य पक्षप्रपक्षेभ्यो निष्पतन्ति युयुत्सवः । हस्त्यश्वरथमातङ्गाः प्रावृषीव बलाहकाः ॥
tasya pakṣaprapakṣebhyo niṣpatanti yuyutsavaḥ | hastyaśvarathamātaṅgāḥ prāvṛṣīva balāhakāḥ
उसके पक्षों और प्रपक्षों से लड़ने को उत्सुक योद्धा निकल रहे थे—हाथी, घोड़े, रथ और मतवाले गज—मानो वर्षा ऋतु में बादल उमड़ रहे हों।
श्लोक 41 (8.41.41)
ततः सेनामुखे कर्णं दृष्ट्वा राजा युधिष्ठिरः । धनञ्जयममित्रघ्नमेकवीरमुवाच ह ॥
tataḥ senāmukhe karṇaṃ dṛṣṭvā rājā yudhiṣṭhiraḥ | dhanañjayamamitraghnamekavīramuvāca ha
तब सेना के अग्रभाग में कर्ण को देखकर राजा युधिष्ठिर ने शत्रुनाशक, अद्वितीय वीर धनञ्जय से कहा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 42 (8.41.42)
पश्यार्जुन महाव्यूहं कर्णेन विहितं रणे । युक्तं पक्षैः प्रपक्षैश्च परानीकं प्रकाशते ॥
paśyārjuna mahāvyūhaṃ karṇena vihitaṃ raṇe | yuktaṃ pakṣaiḥ prapakṣaiśca parānīkaṃ prakāśate
"अर्जुन! देखो, कर्ण ने युद्ध में कैसा विशाल व्यूह रचा है। पक्षों और प्रपक्षों से युक्त शत्रु की सेना कैसी चमक रही है।"
श्लोक 43 (8.41.43)
तत्समीपगतं ह्येतत्प्रत्यमित्रं महद्बलम् । यथा नाभिभवत्यस्मांस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥
tatsamīpagataṃ hyetatpratyamitraṃ mahadbalam | yathā nābhibhavatyasmāṃstathā nītirvidhīyatām
"शत्रु की यह विशाल सेना हमारे निकट आ पहुँची है। ऐसी नीति अपनाई जाए कि यह हमें दबा न सके।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 44 (8.41.44)
एवमुक्तोऽर्जुनो राज्ञा प्राञ्जलिर्नृपमब्रवीत् ॥
evamukto'rjuno rājñā prāñjalirnṛpamabravīt
राजा के इस प्रकार कहने पर अर्जुन ने हाथ जोड़कर राजा से कहा—
अर्जुन उवाच
श्लोक 45 (8.41.45)
यथा यथा भवानाह तत्तथा न तदन्यथा । यत्तस्य विहितं कार्यं तत्करिष्यामि सुव्रत । प्रधानमथ चैवास्य विनाशं च करोम्यहम् ॥
yathā yathā bhavānāha tattathā na tadanyathā | yattasya vihitaṃ kāryaṃ tatkariṣyāmi suvrata | pradhānamatha caivāsya vināśaṃ ca karomyaham
"आप जैसा कहते हैं, वैसा ही होगा; उसमें कोई अन्तर नहीं होगा। हे सुव्रत! उसके विरुद्ध जो करना उचित है, वह मैं करूँगा; मैं उसके प्रधान का नाश भी करूँगा और उसका संहार भी।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 46 (8.41.46)
तस्मात्त्वं जहि राधेयं भीमसेनः सुयोधनम् । वृषसेनं च नकुलः सहदेवोऽपि सौबलम् ॥
tasmāttvaṃ jahi rādheyaṃ bhīmasenaḥ suyodhanam | vṛṣasenaṃ ca nakulaḥ sahadevo'pi saubalam
"इसलिए तुम राधापुत्र को मारो; भीमसेन सुयोधन को; नकुल वृषसेन को; और सहदेव सुबलपुत्र शकुनि को मारें;"
श्लोक 47 (8.41.47)
दुःशासनं शतानीको हार्दिक्यं शिनिपुङ्गवः । धृष्टद्युम्नो द्रोणसुतं स्वयं योत्स्याम्यहं कृपम् ॥
duḥśāsanaṃ śatānīko hārdikyaṃ śinipuṅgavaḥ | dhṛṣṭadyumno droṇasutaṃ svayaṃ yotsyāmyahaṃ kṛpam
"शतानीक दुःशासन को; शिनिवंश के श्रेष्ठ सात्यकि हार्दिक्य (कृतवर्मा) को; धृष्टद्युम्न द्रोणपुत्र को; और मैं स्वयं कृप से युद्ध करूँगा।"
श्लोक 48 (8.41.48)
द्रौपदेया धार्तराष्ट्राञ्शिष्टान्सह शिखण्डिना । ते ते च तांस्तानहितानस्माकं घ्नन्तु मामकाः ॥
draupadeyā dhārtarāṣṭrāñśiṣṭānsaha śikhaṇḍinā | te te ca tāṃstānahitānasmākaṃ ghnantu māmakāḥ
"द्रौपदी के पुत्र शिखण्डी के साथ धृतराष्ट्र के शेष पुत्रों को लें; और हमारे वे-वे योद्धा हमारे उन-उन शत्रुओं को मारें।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 49 (8.41.49)
इत्युक्तो धर्मराजेन तथेत्युक्त्वा धनञ्जयः । व्यादिदेश स्वसैन्यानि स्वयं चागाच्चमूमुखम् ॥
ityukto dharmarājena tathetyuktvā dhanañjayaḥ | vyādideśa svasainyāni svayaṃ cāgāccamūmukham
धर्मराज के ऐसा कहने पर धनञ्जय ने "ऐसा ही हो" कहकर अपनी सेनाओं को आदेश दिया और स्वयं सेना के अग्रभाग में चले गए।
श्लोक 50 (8.41.50)
धनञ्जयो महाराज दक्षिणं पक्षमास्थितः । भीमसेनो महाबाहुर्वामं पक्षमुपाश्रितः ॥
dhanañjayo mahārāja dakṣiṇaṃ pakṣamāsthitaḥ | bhīmaseno mahābāhurvāmaṃ pakṣamupāśritaḥ
हे महाराज! धनञ्जय दाहिने पक्ष में स्थित हुए और महाबाहु भीमसेन ने बायें पक्ष का आश्रय लिया।
श्लोक 51 (8.41.51)
सात्यकिर्द्रौपदेयाश्च स्वयं राजा च पाण्डवः । व्यूहस्य प्रमुखे तस्थुः स्वेनानीकेन संवृताः ॥
sātyakirdraupadeyāśca svayaṃ rājā ca pāṇḍavaḥ | vyūhasya pramukhe tasthuḥ svenānīkena saṃvṛtāḥ
सात्यकि, द्रौपदी के पुत्र और स्वयं पाण्डव राजा युधिष्ठिर अपनी-अपनी सेना से घिरे हुए व्यूह के अग्रभाग में खड़े हुए।
श्लोक 52 (8.41.52)
स्वबलेनारिसैन्यं तत्प्रत्यवस्थाप्य पाण्डवः । प्रत्यव्यूहत्पुरस्कृत्य धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ॥
svabalenārisainyaṃ tatpratyavasthāpya pāṇḍavaḥ | pratyavyūhatpuraskṛtya dhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍinau
अपनी सेना से उस शत्रु-सेना के सामने डटकर, पाण्डव ने धृष्टद्युम्न और शिखण्डी को आगे करके प्रतिव्यूह रचा।
श्लोक 53 (8.41.53)
तत्सादिनागकलिलं पदातिरथसङ्कुलम् । धृष्टद्युम्नमुखं घोरमशोभत महद्बलम् ॥
tatsādināgakalilaṃ padātirathasaṅkulam | dhṛṣṭadyumnamukhaṃ ghoramaśobhata mahadbalam
घुड़सवारों और हाथियों से भरी तथा पैदलों और रथों से ठसाठस वह विशाल सेना, जिसके आगे धृष्टद्युम्न थे, भयंकर और शोभायमान दिखाई दी।