कर्ण पर्व · अध्याय 42
अर्जुन और कर्ण का सेनाओं में प्रवेश
धृतराष्ट्र सञ्जय से विस्तार से पूछते हैं कि संशप्तकों ने अर्जुन से और पाण्डवों ने कर्ण से कैसे युद्ध किया। कर्ण धृष्टद्युम्न के नेतृत्व वाली सेना के सामने अपनी सेना का व्यूह रचता है, और क्रुद्ध अर्जुन संशप्तकों पर टूट पड़कर हज़ारों का संहार करता है। दोनों ओर की सेनाएँ पूरी पंक्ति में भिड़ जाती हैं; दुर्योधन से रक्षित कर्ण पाण्डव-सेना को रौंदता है, युधिष्ठिर को पीड़ित करता है और रणभूमि में रक्त की नदी बहा देता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (8.42.1)
तथा व्यूढेष्वनीकेषु संसक्तेषु च सञ्जय । संशप्तकाः कथं पार्थं कथं कर्णं च पाण्डवाः ॥
tathā vyūḍheṣvanīkeṣu saṃsakteṣu ca sañjaya | saṃśaptakāḥ kathaṃ pārthaṃ kathaṃ karṇaṃ ca pāṇḍavāḥ
सञ्जय! इस प्रकार सेनाओं के व्यूह बँध जाने और उनके भिड़ जाने पर संशप्तकों ने पार्थ से कैसे युद्ध किया, और पाण्डवों ने कर्ण से कैसे?
श्लोक 2 (8.42.2)
एतद्विस्तरशो युद्धं प्रब्रूहि कुशलो ह्यसि । न हि तृप्यामि वीराणां शृण्वानो युधि विक्रमम् ॥
etadvistaraśo yuddhaṃ prabrūhi kuśalo hyasi | na hi tṛpyāmi vīrāṇāṃ śṛṇvāno yudhi vikramam
इस युद्ध को विस्तार से बताओ, क्योंकि तुम कुशल हो; वीरों का पराक्रम सुनते-सुनते मैं तृप्त ही नहीं होता।
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (8.42.3)
तत्संस्थितमथो दृष्ट्वा प्रत्यमित्रं महद्बलम् । प्रत्यव्यूहत्ततः कर्णो हितार्थं तनयस्य ते ॥
tatsaṃsthitamatho dṛṣṭvā pratyamitraṃ mahadbalam | pratyavyūhattataḥ karṇo hitārthaṃ tanayasya te
शत्रु की उस विशाल सेना को व्यूह में खड़ा देखकर कर्ण ने आपके पुत्र के हित के लिए प्रतिव्यूह रचा।
श्लोक 4 (8.42.4)
तत्सादिनागकलिलं पदातिरथसङ्कुलम् । धृष्टद्युम्नमुखं घोरमशोभत महद्बलम् ॥
tatsādināgakalilaṃ padātirathasaṅkulam | dhṛṣṭadyumnamukhaṃ ghoramaśobhata mahadbalam
घुड़सवारों और हाथियों से भरी तथा पैदलों और रथों से ठसाठस वह विशाल सेना, जिसके आगे धृष्टद्युम्न थे, भयंकर और शोभायमान दिखाई दी।
श्लोक 5 (8.42.5)
पारावतसवर्णाश्वश्चन्द्रसूर्यसमद्युतिः । स पार्षतो बभौ धन्वी कालो विग्रहवानिव ॥
pārāvatasavarṇāśvaścandrasūryasamadyutiḥ | sa pārṣato babhau dhanvī kālo vigrahavāniva
कबूतर के रंग के घोड़ोंवाला, चन्द्र और सूर्य के समान कान्तिमान् वह धनुर्धर पार्षत (धृष्टद्युम्न) मानो देहधारी काल के समान शोभित हो रहा था।
श्लोक 6 (8.42.6)
पार्षतं त्वभितस्तस्थुर्द्रौपदेया युयुत्सवः । सानुगा दीप्तवपुषश्चन्द्रं तारागणा इव ॥
pārṣataṃ tvabhitastasthurdraupadeyā yuyutsavaḥ | sānugā dīptavapuṣaścandraṃ tārāgaṇā iva
लड़ने को उत्सुक, तेजस्वी शरीरवाले द्रौपदी के पुत्र अपने अनुयायियों के साथ पार्षत को घेरकर वैसे ही खड़े थे जैसे चन्द्रमा को तारागण घेरे रहते हैं।
श्लोक 7 (8.42.7)
अथ व्यूढेष्वनीकेषु प्रेक्ष्य संशप्तकान्रणे । क्रुद्धोऽर्जुनोऽभिदुद्राव व्याक्षिपन्गाण्डिवं धनुः ॥
atha vyūḍheṣvanīkeṣu prekṣya saṃśaptakānraṇe | kruddho'rjuno'bhidudrāva vyākṣipangāṇḍivaṃ dhanuḥ
तब रण में व्यूहबद्ध संशप्तकों को देखकर अर्जुन क्रुद्ध होकर गाण्डीव धनुष को टंकारता हुआ उन पर टूट पड़ा।
श्लोक 8 (8.42.8)
अथ संशप्तकाः पार्थमभ्यधावन्वधैषिणः । विजये धृतसङ्कल्पा मृत्युं कृत्वानिवर्तनम् ॥
atha saṃśaptakāḥ pārthamabhyadhāvanvadhaiṣiṇaḥ | vijaye dhṛtasaṅkalpā mṛtyuṃ kṛtvānivartanam
तब वध की इच्छा रखनेवाले संशप्तक विजय का दृढ़ निश्चय करके और मृत्यु को ही लौटने का मार्ग मानकर पार्थ की ओर दौड़े।
श्लोक 9 (8.42.9)
तदश्वसङ्घबहुलं पत्तिनागरथाकुलम् । उदीर्यमाणं संरब्धं धनञ्जयमभिद्रवत् ॥
tadaśvasaṅghabahulaṃ pattināgarathākulam | udīryamāṇaṃ saṃrabdhaṃ dhanañjayamabhidravat
घोड़ों के समूहों से भरी तथा पैदलों, हाथियों और रथों से ठसाठस वह सेना क्रोध में उमड़कर धनञ्जय पर टूट पड़ी।
श्लोक 10 (8.42.10)
तदुद्यतं महत्सैन्यं सागरौघसमं जवे । पार्थवेलां समासाद्य विष्ठितं समदृश्यत ॥
tadudyataṃ mahatsainyaṃ sāgaraughasamaṃ jave | pārthavelāṃ samāsādya viṣṭhitaṃ samadṛśyata
समुद्र की बाढ़ के समान वेगवान्, उमड़ी हुई वह विशाल सेना पार्थ रूपी तट तक पहुँचकर ठहर गई-सी दिखाई दी।
श्लोक 11 (8.42.11)
मृद्नन्तं शरवर्षौघैर्द्रुतमर्जुनमार्दयत् ॥
mṛdnantaṃ śaravarṣaughairdrutamarjunamārdayat
वह सेना बाण-वर्षा की बाढ़ से उसे कुचलते हुए अर्जुन को तेज़ी से पीड़ित करने लगी।
श्लोक 12 (8.42.12)
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तेषामासीत्किरीटिना । तस्यैव तु यथा राजन्निवातकवचैः सह ॥
sa samprahārastumulasteṣāmāsītkirīṭinā | tasyaiva tu yathā rājannivātakavacaiḥ saha
हे राजन्! उनके और किरीटधारी अर्जुन के बीच वैसा ही घमासान संग्राम हुआ जैसा उसका निवातकवचों के साथ हुआ था।
श्लोक 13 (8.42.13)
रथानश्वान्ध्वजान्नागान्पत्तीन्गजगतानपि । इषून्धनूंषि खड्गांश्च चक्राणि च परश्वथान् ॥
rathānaśvāndhvajānnāgānpattīngajagatānapi | iṣūndhanūṃṣi khaḍgāṃśca cakrāṇi ca paraśvathān
रथ, घोड़े, ध्वज, हाथी, पैदल और हाथियों पर चढ़े योद्धा, बाण, धनुष, तलवारें, चक्र और कुल्हाड़ियाँ—
श्लोक 14 (8.42.14)
सायुधानुद्यतान्बाहून्विविधान्यायुधानि च । चिच्छेद द्विषतां पार्थः शिरांसि च सहस्रशः ॥
sāyudhānudyatānbāhūnvividhānyāyudhāni ca | ciccheda dviṣatāṃ pārthaḥ śirāṃsi ca sahasraśaḥ
हथियारों सहित उठी हुई भुजाएँ, अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और शत्रुओं के हज़ारों सिर पार्थ ने काट डाले।
श्लोक 15 (8.42.15)
तस्मिन्सैन्यमहावर्ते पातालतलसन्निभे । निमग्नं तं रथं मत्वा नेदुः संशप्तका मुदा ॥
tasminsainyamahāvarte pātālatalasannibhe | nimagnaṃ taṃ rathaṃ matvā neduḥ saṃśaptakā mudā
पाताल की गहराई जैसे उस सेना-रूपी महान् भँवर में उसका रथ डूब गया है, ऐसा मानकर संशप्तक हर्ष से गरज उठे।
श्लोक 16 (8.42.16)
स पुरस्तादरीन्हत्वा पुनरुत्तरतोऽवधीत् । दक्षिणेन च पश्चाच्च क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ॥
sa purastādarīnhatvā punaruttarato'vadhīt | dakṣiṇena ca paścācca kruddho rudraḥ paśūniva
पहले सामने के शत्रुओं को मारकर उसने फिर उत्तर की ओर के शत्रुओं को मारा, फिर दक्षिण और पीछे के शत्रुओं को—पशुओं के बीच क्रुद्ध रुद्र की भाँति।
श्लोक 17 (8.42.17)
अथ पाञ्चालचेदीनां सृञ्जयानां च मारिष । त्वदीयैः सह सङ्ग्राम आसीत्परमदारुणः ॥
atha pāñcālacedīnāṃ sṛñjayānāṃ ca māriṣa | tvadīyaiḥ saha saṅgrāma āsītparamadāruṇaḥ
हे माननीय! तब पाञ्चालों, चेदियों और सृञ्जयों का आपके योद्धाओं के साथ अत्यन्त भयंकर संग्राम हुआ।
श्लोक 18 (8.42.18)
कृपश्च कृतवर्मा च शकुनिश्चापि सौबलः । हृष्टसेनाः सुसंरब्धा रथानीकप्रहारिणः ॥
kṛpaśca kṛtavarmā ca śakuniścāpi saubalaḥ | hṛṣṭasenāḥ susaṃrabdhā rathānīkaprahāriṇaḥ
कृप, कृतवर्मा और सुबलपुत्र शकुनि हर्षित सेना के साथ क्रोध से भरकर अपने रथ-दलों से प्रहार करते हुए—
श्लोक 19 (8.42.19)
कोसलैः काश्यमत्स्यैश्च कारूषैः केकयैरपि । शूरसेनैः शूरवरैर्युयुधुर्युद्धदुर्मदाः ॥
kosalaiḥ kāśyamatsyaiśca kārūṣaiḥ kekayairapi | śūrasenaiḥ śūravarairyuyudhuryuddhadurmadāḥ
युद्ध के मद में चूर होकर कोसलों, काशियों, मत्स्यों, करूषों, केकयों और वीरों में श्रेष्ठ शूरसेनों से लड़े।
श्लोक 20 (8.42.20)
तेषामन्तकरं युद्धं देहपाप्मविनाशनम् । क्षत्रविट्शूद्रवीराणां धर्म्यं स्वर्ग्यं यशस्करम् ॥
teṣāmantakaraṃ yuddhaṃ dehapāpmavināśanam | kṣatraviṭśūdravīrāṇāṃ dharmyaṃ svargyaṃ yaśaskaram
उनका वह युद्ध प्राणान्तक था, देह के पापों का नाश करनेवाला, धर्मसम्मत, स्वर्ग दिलानेवाला और यश देनेवाला—क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वीरों के लिए।
श्लोक 21 (8.42.21)
दुर्योधनोऽथ सहितो भ्रातृभिर्भरतर्षभ । गुप्तः कुरुप्रवीरैश्च मद्राणां च महारथैः ॥
duryodhano'tha sahito bhrātṛbhirbharatarṣabha | guptaḥ kurupravīraiśca madrāṇāṃ ca mahārathaiḥ
हे भरतश्रेष्ठ! दुर्योधन भी अपने भाइयों के साथ, कुरुओं के प्रमुख वीरों और मद्रों के महारथियों से रक्षित होकर,
श्लोक 22 (8.42.22)
पाण्डवैः सह पाञ्चालैश्चेदिभिः सात्यकेन च । युध्यमानं रणे कर्णं कुरुवीरोऽभ्यपालयत् ॥
pāṇḍavaiḥ saha pāñcālaiścedibhiḥ sātyakena ca | yudhyamānaṃ raṇe karṇaṃ kuruvīro'bhyapālayat
पाण्डवों, पाञ्चालों, चेदियों और सात्यकि के साथ रण में लड़ते हुए कर्ण की रक्षा करने लगा।
श्लोक 23 (8.42.23)
कर्णोऽपि निशितैर्बाणैर्विनिहत्य महाचमूम् । प्रमृद्य च रथश्रेष्ठान्युधिष्ठिरमपीडयत् ॥
karṇo'pi niśitairbāṇairvinihatya mahācamūm | pramṛdya ca rathaśreṣṭhānyudhiṣṭhiramapīḍayat
कर्ण ने भी तीखे बाणों से विशाल सेना को मारकर और श्रेष्ठ रथियों को कुचलकर युधिष्ठिर को पीड़ित किया।
श्लोक 24 (8.42.24)
विपत्रायुधदेहासून्कृत्वा शत्रून्सहस्रशः । युक्त्वा स्वर्गयशोभ्यां च स्वेभ्यो मुदमुदावहत् ॥
vipatrāyudhadehāsūnkṛtvā śatrūnsahasraśaḥ | yuktvā svargayaśobhyāṃ ca svebhyo mudamudāvahat
हज़ारों शत्रुओं को बाणों, हथियारों, देहों और प्राणों से रहित करके, और इस प्रकार उन्हें स्वर्ग तथा यश से जोड़कर, उसने अपने पक्ष को आनन्द दिया।
श्लोक 25 (8.42.25)
तद्विगाह्य महानीकं सूतपुत्रो महारथः । नदीं प्रवर्तयामास शोणितौघतरङ्गिणीम् ॥
tadvigāhya mahānīkaṃ sūtaputro mahārathaḥ | nadīṃ pravartayāmāsa śoṇitaughataraṅgiṇīm
उस विशाल सेना में घुसकर महारथी सूतपुत्र ने रक्त के प्रवाहों की लहरों वाली एक नदी बहा दी,
श्लोक 26 (8.42.26)
शोणितोदां क्षुण्णमत्स्यां नागनक्रदुरत्ययाम् । मांसमज्जाकर्दमिनीं चक्रकूर्ममहोडुपाम् ॥
śoṇitodāṃ kṣuṇṇamatsyāṃ nāganakraduratyayām | māṃsamajjākardaminīṃ cakrakūrmamahoḍupām
जिसका जल रक्त था, जिसकी मछलियाँ कुचल गई थीं, जिसे पार करना हाथियों और मगरमच्छों के लिए भी कठिन था, जो मांस और मज्जा के कीचड़ से भरी थी, जिसमें पहिये कछुए थे और बड़े-बड़े बेड़े तैर रहे थे।
श्लोक 27 (8.42.27)
पातितैर्मेघसङ्काशैस्तत्रतत्र महाद्विपैः । अशनीभिरिव ध्वस्ता नदी राजन्विराजते ॥
pātitairmeghasaṅkāśaistatratatra mahādvipaiḥ | aśanībhiriva dhvastā nadī rājanvirājate
यहाँ-वहाँ बादलों के समान गिरे हुए, मानो वज्रों से मारे गए विशाल हाथियों से पटी हुई वह नदी, हे राजन्! शोभित हो रही थी।
श्लोक 28 (8.42.28)
तां शरोर्मिमहावर्तां छत्रहंससमाकुलाम् । तनुत्रोष्णीषसङ्घाटामस्थिपाषाणसङ्कुलाम् ॥
tāṃ śarormimahāvartāṃ chatrahaṃsasamākulām | tanutroṣṇīṣasaṅghāṭāmasthipāṣāṇasaṅkulām
बाण जिसकी लहरें और बड़ी भँवरें थे, छत्र जिसके हंस थे, जिसमें कवचों और पगड़ियों के ढेर थे और जो हड्डियों के पत्थरों से भरी थी,
श्लोक 29 (8.42.29)
अपारामनपारां च शङ्खदुन्दुभिघोषिणीम् । रौद्रां नदीं महाराज रजसा सर्वतोवृताम् ॥
apārāmanapārāṃ ca śaṅkhadundubhighoṣiṇīm | raudrāṃ nadīṃ mahārāja rajasā sarvatovṛtām
अपार, जिसका दूसरा तट नहीं था, शंखों और दुन्दुभियों से गूँजती, भयंकर और, हे महाराज! चारों ओर धूल से ढकी हुई,
श्लोक 30 (8.42.30)
अतितीक्ष्णां नराकीर्णां नदीमन्तकगामिनीम् । समं च विषमं चैव समायान्तीं महाभयाम् ॥
atitīkṣṇāṃ narākīrṇāṃ nadīmantakagāminīm | samaṃ ca viṣamaṃ caiva samāyāntīṃ mahābhayām
अत्यन्त तीखी, मनुष्यों से भरी हुई, यमलोक की ओर जाती, सम और विषम भूमि पर एक समान बहती हुई, महाभयंकर,
श्लोक 31 (8.42.31)
आकुलाश्चात्र सीदन्ति नराः शोणितकर्दमे । नरैरभिपरिक्षिप्ता यथा राजन्महाद्रुमाः ॥
ākulāścātra sīdanti narāḥ śoṇitakardame | narairabhiparikṣiptā yathā rājanmahādrumāḥ
यहाँ व्याकुल मनुष्य रक्त के कीचड़ में धँस जाते थे; हे राजन्! वे दूसरे मनुष्यों से घिरे थे, जैसे बड़े-बड़े वृक्ष घिरे हों।
श्लोक 32 (8.42.32)
ततस्ते तत्रतत्रैव प्रचरन्तो महानदीम् । विचेरुः सर्वतो योधा नौवारणमहारथैः ॥
tataste tatratatraiva pracaranto mahānadīm | viceruḥ sarvato yodhā nauvāraṇamahārathaiḥ
तब वे योद्धा उस महानदी में यहाँ-वहाँ विचरते हुए, हाथियों और बड़े रथों को नौकाएँ बनाकर चारों ओर घूमते रहे।
श्लोक 33 (8.42.33)
शोणितेन समं राजन्कृतमासीत्समन्ततः । नदीवेगैर्यथा भूमिस्तद्वदासीद्विशापते ॥
śoṇitena samaṃ rājankṛtamāsītsamantataḥ | nadīvegairyathā bhūmistadvadāsīdviśāpate
हे राजन्! चारों ओर सब कुछ रक्त से समतल हो गया था, जैसे नदियों के वेग से भूमि समतल हो जाती है, हे प्रजापालक!
श्लोक 34 (8.42.34)
एवं भारत सङ्ग्रामो नरवाजिगजक्षयः । कुरूणां सृञ्जयानां च देवासुरसमोऽभवत् ॥
evaṃ bhārata saṅgrāmo naravājigajakṣayaḥ | kurūṇāṃ sṛñjayānāṃ ca devāsurasamo'bhavat
हे भारत! इस प्रकार मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों का संहार करनेवाला वह संग्राम कुरुओं और सृञ्जयों के बीच देवासुर-संग्राम के समान हो गया।