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कर्ण पर्व · अध्याय 43

कर्ण पाञ्चालों की सेना को चीरता है

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि पाण्डव-सेना में घुसकर कर्ण ने क्या किया, और सञ्जय बताते हैं कि कर्ण पाञ्चालों पर टूट पड़ता है तथा उनके प्रमुख वीरों और सैकड़ों चेदियों को मार डालता है। भीम और नकुल कर्ण के पुत्रों सुषेण और सत्यसेन से भिड़ते हैं और भीम सत्यसेन का सिर काट देता है, जबकि सात्यकि वृषसेन से लड़ता है, जिसे दुःशासन उठा ले जाता है और वह नए रथ पर लौट आता है। फिर कर्ण अद्भुत फुर्ती से सब पाण्डव-वीरों को एक साथ रोकता है, उन्हें तितर-बितर करता है, चेदियों के तीन सौ रथ नष्ट करता है और युधिष्ठिर की ओर बढ़ता है, जिन्हें उनके रक्षक घेर लेते हैं, और दोनों सेनाएँ फिर भिड़ जाती हैं।

अध्याय 42अध्याय-सूचीअध्याय 44

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (8.43.1)

युक्तं प्रविश्य पार्थानां सैन्यं कुर्वञ्जनक्षयम् । कर्णो राजानमभ्येत्य तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

yuktaṃ praviśya pārthānāṃ sainyaṃ kurvañjanakṣayam | karṇo rājānamabhyetya tanmamācakṣva sañjaya

संजय! मुझे बताओ कि पाण्डवों की व्यूह में सजी सेना में घुसकर, मनुष्यों का संहार करते हुए कर्ण ने राजा के निकट पहुँचकर क्या किया।

श्लोक 2 (8.43.2)

के च प्रवीराः पार्थानां युधि कर्णमवारयन् । कांश्च प्रमथ्याधिरथिर्युधिष्ठिरमपीडयत् ॥

ke ca pravīrāḥ pārthānāṃ yudhi karṇamavārayan | kāṃśca pramathyādhirathiryudhiṣṭhiramapīḍayat

युद्ध में पार्थों के कौन-से प्रमुख वीरों ने कर्ण को रोका, और अधिरथ-पुत्र ने किन्हें कुचलकर युधिष्ठिर को पीड़ित किया?

सञ्जय उवाच

श्लोक 3 (8.43.3)

धृष्टद्युम्नमुखान्पार्थान्दृष्ट्वा कर्णो व्यवस्थितान् । समभ्यधावत्त्वरितः पाञ्चालाञ्छत्रुकर्शनः ॥

dhṛṣṭadyumnamukhānpārthāndṛṣṭvā karṇo vyavasthitān | samabhyadhāvattvaritaḥ pāñcālāñchatrukarśanaḥ

धृष्टद्युम्न को आगे किए खड़े पार्थों को देखकर शत्रुओं को सताने वाला कर्ण तेज़ी से पाञ्चालों पर टूट पड़ा।

श्लोक 4 (8.43.4)

तं तूर्णमभिधावन्तं पाञ्चाला जितकाशिनः । प्रत्युद्ययुर्महात्मानं हंसाः सर इवोष्णगे ॥

taṃ tūrṇamabhidhāvantaṃ pāñcālā jitakāśinaḥ | pratyudyayurmahātmānaṃ haṃsāḥ sara ivoṣṇage

वेग से बढ़ते हुए उस महात्मा के सामने विजय की इच्छा रखने वाले पाञ्चाल उसी तरह निकल पड़े, जैसे ग्रीष्म ऋतु में हंस सरोवर की ओर जाते हैं।

श्लोक 5 (8.43.5)

ततः शङ्खसहस्राणां निःस्वनो हृदयङ्गमः । प्रादुरासीदुभयतो भेरीशब्दश्च दारुणः ॥

tataḥ śaṅkhasahasrāṇāṃ niḥsvano hṛdayaṅgamaḥ | prādurāsīdubhayato bherīśabdaśca dāruṇaḥ

तब दोनों ओर हज़ारों शंखों की हृदय को छू लेने वाली ध्वनि और भेरियों का भयंकर शब्द उठा।

श्लोक 6 (8.43.6)

नानाबाणनिनादश्च द्विपाश्वरथनिःस्वनः । सिंहनादश्च वीराणामभवद्दारुणस्तदा ॥

nānābāṇaninādaśca dvipāśvarathaniḥsvanaḥ | siṃhanādaśca vīrāṇāmabhavaddāruṇastadā

अनेक प्रकार के बाणों की सनसनाहट, हाथियों, घोड़ों और रथों की घरघराहट, और वीरों की भयंकर सिंहगर्जना होने लगी।

श्लोक 7 (8.43.7)

साद्रिद्रुमार्णवा भूमिः सवाताम्बुदमम्बरम् । सार्केन्दुग्रहनक्षत्रा द्यौश्च व्यक्तं विघूर्णिता ॥

sādridrumārṇavā bhūmiḥ savātāmbudamambaram | sārkendugrahanakṣatrā dyauśca vyaktaṃ vighūrṇitā

पर्वतों, वृक्षों और सागरों सहित पृथ्वी, वायु और बादलों सहित आकाश, तथा सूर्य, चन्द्र, ग्रहों और नक्षत्रों सहित स्वर्ग स्पष्ट रूप से घूमते-से लगे।

श्लोक 8 (8.43.8)

इति भूतानि तं शब्दं मेनिरे ते च विव्यथुः । यानि चाप्यल्पसत्वानि प्रायस्तानि मृतानि वै ॥

iti bhūtāni taṃ śabdaṃ menire te ca vivyathuḥ | yāni cāpyalpasatvāni prāyastāni mṛtāni vai

प्राणियों ने उस शब्द को ऐसा ही समझा और वे काँप उठे; जो अल्प बल वाले थे, वे प्रायः मर ही गए।

श्लोक 9 (8.43.9)

अथ कर्णो भृशं क्रुद्धः शीघ्रमस्त्रमुदीरयन् । जघान पाण्डवीं सेनामासुरीं मघवानिव ॥

atha karṇo bhṛśaṃ kruddhaḥ śīghramastramudīrayan | jaghāna pāṇḍavīṃ senāmāsurīṃ maghavāniva

तब अत्यन्त क्रुद्ध कर्ण ने शीघ्रता से अस्त्र चलाते हुए पाण्डव-सेना को उसी प्रकार मार गिराया, जैसे इन्द्र ने असुरों की सेना को मारा था।

श्लोक 10 (8.43.10)

स पाण्डवबलं कर्णः प्रविश्य विसृजञ्छरान् । प्रभद्रकाणां प्रवरानहनत्सप्तसप्ततिम् ॥

sa pāṇḍavabalaṃ karṇaḥ praviśya visṛjañcharān | prabhadrakāṇāṃ pravarānahanatsaptasaptatim

पाण्डव-सेना में घुसकर बाण छोड़ते हुए कर्ण ने प्रभद्रकों के सतहत्तर प्रमुख वीरों को मार डाला।

श्लोक 11 (8.43.11)

ततः सुपुङ्खैर्निशितैरथ श्रेष्ठो रथेषुभिः । अवधीत्पञ्चविंशत्या पाञ्चालान्पञ्चविंशतिम् ॥

tataḥ supuṅkhairniśitairatha śreṣṭho ratheṣubhiḥ | avadhītpañcaviṃśatyā pāñcālānpañcaviṃśatim

फिर उस श्रेष्ठ योद्धा ने तेज़, सुन्दर पंखों वाले रथ-बाणों से पच्चीस बाणों द्वारा पच्चीस पाञ्चालों को मार डाला।

श्लोक 12 (8.43.12)

सुवर्णपुङ्खैर्नाराचैः परकायविदारणैः । चेदिकानवधीद्वीरः शतशोऽथ सहस्रशः ॥

suvarṇapuṅkhairnārācaiḥ parakāyavidāraṇaiḥ | cedikānavadhīdvīraḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

शत्रुओं के शरीर चीर देने वाले सुनहरे पंखों के लोहे के बाणों से उस वीर ने चेदियों को सैकड़ों और फिर हज़ारों की संख्या में मार डाला।

श्लोक 13 (8.43.13)

तं तथा समरे कर्म कुर्वाणमतिमानुषम् । परिवव्रुर्महाराज पाञ्चालानां रथव्रजाः ॥

taṃ tathā samare karma kurvāṇamatimānuṣam | parivavrurmahārāja pāñcālānāṃ rathavrajāḥ

समरभूमि में ऐसे अतिमानवीय कर्म करते हुए उसे, हे महाराज! पाञ्चालों के रथ-समूहों ने घेर लिया।

श्लोक 14 (8.43.14)

ततः सन्धाय विशिखान्पञ्च भारत दुःसहान् । पाञ्चालानवधीत्पञ्च कर्णो वैकर्तनो वृषः ॥

tataḥ sandhāya viśikhānpañca bhārata duḥsahān | pāñcālānavadhītpañca karṇo vaikartano vṛṣaḥ

तब, हे भारत! वैकर्तन वृष कर्ण ने पाँच असह्य बाण चढ़ाकर पाँच पाञ्चालों को मार डाला।

श्लोक 15 (8.43.15)

भानुदेवं चित्रसेनं सेनाबिन्दुं च भारत । तपनं शूरसेनं च पाञ्चालानहनद्रणे ॥

bhānudevaṃ citrasenaṃ senābinduṃ ca bhārata | tapanaṃ śūrasenaṃ ca pāñcālānahanadraṇe

भानुदेव, चित्रसेन, सेनाबिन्दु, तपन और शूरसेन — इन पाञ्चालों को उसने युद्ध में मार डाला।

श्लोक 16 (8.43.16)

पाञ्चालेषु च शूरेषु वध्यमानेषु सायकैः । हाहाकारो महानासीत्पाञ्चालानां महाहवे ॥

pāñcāleṣu ca śūreṣu vadhyamāneṣu sāyakaiḥ | hāhākāro mahānāsītpāñcālānāṃ mahāhave

उसके बाणों से शूर पाञ्चालों के कटते जाने पर उस महायुद्ध में पाञ्चालों में बड़ा हाहाकार मच गया।

श्लोक 17 (8.43.17)

तेषां सहक्रीडमानानां हाहाकारं प्रकुर्वताम् । पुनरेव च तान्कर्णो जघानाशु पतत्त्रिभिः ॥

teṣāṃ sahakrīḍamānānāṃ hāhākāraṃ prakurvatām | punareva ca tānkarṇo jaghānāśu patattribhiḥ

जब वे साथ-साथ विचरते हुए हाहाकार कर रहे थे, तब कर्ण ने अपने पंखदार बाणों से फिर उन्हें शीघ्र ही मार गिराया।

श्लोक 18 (8.43.18)

चक्ररक्षौ तु कर्णस्य पुत्रौ मारिष दुर्जयौ । सुषेणः सत्यसेनश्च त्यक्त्वा प्राणानयुध्यताम् ॥

cakrarakṣau tu karṇasya putrau māriṣa durjayau | suṣeṇaḥ satyasenaśca tyaktvā prāṇānayudhyatām

कर्ण के दोनों अजेय पुत्र सुषेण और सत्यसेन, जो उसके रथ के पहियों की रक्षा करते थे, हे आर्य! प्राणों की परवाह छोड़कर लड़ने लगे।

श्लोक 19 (8.43.19)

पृष्ठगोप्ता तु कर्णस्य ज्येष्ठः पुत्रो महारथः । वृषसेनोऽन्वयात्कर्णं पृष्ठतः परिपालयन् ॥

pṛṣṭhagoptā tu karṇasya jyeṣṭhaḥ putro mahārathaḥ | vṛṣaseno'nvayātkarṇaṃ pṛṣṭhataḥ paripālayan

और कर्ण का ज्येष्ठ पुत्र महारथी वृषसेन पीछे से उसकी रक्षा करता हुआ कर्ण के पीछे-पीछे चला।

श्लोक 20 (8.43.20)

धृष्टद्युम्नः सात्यकिश्च द्रौपदेया वृकोदरः । जनमेजयः शिखण्डी च प्रवीराश्च प्रभद्रकाः ॥

dhṛṣṭadyumnaḥ sātyakiśca draupadeyā vṛkodaraḥ | janamejayaḥ śikhaṇḍī ca pravīrāśca prabhadrakāḥ

धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदी के पुत्र, वृकोदर, जनमेजय, शिखण्डी और प्रभद्रकों के प्रमुख वीर,

श्लोक 21 (8.43.21)

चेदिकेकयपाञ्चाला यमौ मात्स्याश्च दंशिताः । समभ्यधावन्राधेयं जिघांसन्तः प्रहारिणम् ॥

cedikekayapāñcālā yamau mātsyāśca daṃśitāḥ | samabhyadhāvanrādheyaṃ jighāṃsantaḥ prahāriṇam

चेदि, केकय और पाञ्चाल, दोनों जुड़वाँ भाई और मत्स्य, सब कवच पहने हुए, प्रहार करने वाले राधापुत्र को मार डालने की इच्छा से उस पर टूट पड़े।

श्लोक 22 (8.43.22)

त एनं विविधैः शस्त्रैः शरधाराभिरेव च । अभ्यवर्षन्विमर्दन्तं प्रावृषीवाम्बुदा गिरिम् ॥

ta enaṃ vividhaiḥ śastraiḥ śaradhārābhireva ca | abhyavarṣanvimardantaṃ prāvṛṣīvāmbudā girim

जैसे वर्षा ऋतु में बादल पर्वत पर बरसते हैं, वैसे ही उन्होंने नाना शस्त्रों और बाणों की धाराओं से उस पर वर्षा की, जबकि वह उन्हें कुचलता जा रहा था।

श्लोक 23 (8.43.23)

पितरं तु परीप्सन्तः कर्णपुत्राः प्रहारिणः । त्वदीयाश्चापरे राजन्वीरा वीरानवारयन् ॥

pitaraṃ tu parīpsantaḥ karṇaputrāḥ prahāriṇaḥ | tvadīyāścāpare rājanvīrā vīrānavārayan

अपने पिता की रक्षा करना चाहने वाले कर्ण के प्रहारकुशल पुत्रों ने, और हे राजन्! आपके अन्य वीरों ने, शत्रु-वीरों को रोका।

श्लोक 24 (8.43.24)

सुषेणो भीमसेनस्य च्छित्त्वा भल्लेन कार्मुकम् । नाराचैः सप्तभिर्विद्ध्वा हृदि भीमं ननाद ह ॥

suṣeṇo bhīmasenasya cchittvā bhallena kārmukam | nārācaiḥ saptabhirviddhvā hṛdi bhīmaṃ nanāda ha

सुषेण ने भल्ल से भीमसेन का धनुष काट दिया, सात नाराचों से भीम की छाती बींध दी और गर्जना की।

श्लोक 25 (8.43.25)

अथान्यद्धनुरादाय सुदृढं भीमविक्रमः । सज्यं वृकोदरः कृत्वा सुषेणस्याच्छिनद्धनुः ॥

athānyaddhanurādāya sudṛḍhaṃ bhīmavikramaḥ | sajyaṃ vṛkodaraḥ kṛtvā suṣeṇasyācchinaddhanuḥ

तब भयंकर पराक्रमी वृकोदर ने दूसरा अत्यन्त दृढ़ धनुष लेकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और सुषेण का धनुष काट डाला।

श्लोक 26 (8.43.26)

विव्याध चैनं दशभिः क्रुद्धो नृत्यन्निवेषुभिः । कर्णं च तूर्णं विव्याध त्रिसप्तत्या शितैः शरैः ॥

vivyādha cainaṃ daśabhiḥ kruddho nṛtyanniveṣubhiḥ | karṇaṃ ca tūrṇaṃ vivyādha trisaptatyā śitaiḥ śaraiḥ

क्रुद्ध होकर उसने मानो नाचते हुए दस बाणों से उसे बींधा, और शीघ्र ही तिहत्तर तीखे बाणों से कर्ण को भी बींध दिया।

श्लोक 27 (8.43.27)

सत्यसेनं च दशभिः साश्वसूतायुधध्वजम् । पश्यतां सुहृदां मध्ये कर्णपुत्रमपातयत् ॥

satyasenaṃ ca daśabhiḥ sāśvasūtāyudhadhvajam | paśyatāṃ suhṛdāṃ madhye karṇaputramapātayat

फिर दस बाणों से उसने घोड़ों, सारथि, आयुधों और ध्वज सहित कर्ण-पुत्र सत्यसेन को मित्रों के देखते-देखते गिरा दिया।

श्लोक 28 (8.43.28)

क्षुरप्रणुन्नं तत्तस्य शिरश्चन्द्रनिभाननम् । शुभदर्शनमेवासीन्नालभ्रष्टमिवाम्बुजम् ॥

kṣurapraṇunnaṃ tattasya śiraścandranibhānanam | śubhadarśanamevāsīnnālabhraṣṭamivāmbujam

क्षुरप्र से कटा हुआ उसका चन्द्रमा-सा मुखवाला सिर, डंठल से टूटे कमल की तरह, तब भी देखने में सुन्दर लग रहा था।

श्लोक 29 (8.43.29)

हत्वा कर्णसुतं भीमस्तावकान्पुनरार्दयत् । कृपहार्दिक्ययोश्छित्त्वा चापौ तावप्यथार्दयत् ॥

hatvā karṇasutaṃ bhīmastāvakānpunarārdayat | kṛpahārdikyayośchittvā cāpau tāvapyathārdayat

कर्ण के पुत्र को मारकर भीम ने फिर आपके योद्धाओं को सताया; कृप और हार्दिक्य के धनुष काटकर उन दोनों को भी पीड़ित किया।

श्लोक 30 (8.43.30)

दुःशासनं त्रिभिर्विद्ध्वा शकुनिं षड्भिरायसैः । उलूकं च पतत्रिं च चकार विरथावुभौ ॥

duḥśāsanaṃ tribhirviddhvā śakuniṃ ṣaḍbhirāyasaiḥ | ulūkaṃ ca patatriṃ ca cakāra virathāvubhau

उसने दुःशासन को तीन, और शकुनि को लोहे के छह बाणों से बींधा, तथा उलूक और पतत्री दोनों को रथहीन कर दिया।

श्लोक 31 (8.43.31)

हे सुषेण हतोऽसीति ब्रुवन्नादत्त सायकम् । तमस्य कर्णश्चिच्छेद त्रिभिश्चैनमताडयत् ॥

he suṣeṇa hato'sīti bruvannādatta sāyakam | tamasya karṇaściccheda tribhiścainamatāḍayat

"हे सुषेण! तू मरा!" यह कहते हुए उसने बाण उठाया; किन्तु कर्ण ने उसे काट डाला और भीम को तीन बाणों से मारा।

श्लोक 32 (8.43.32)

अथान्यं परिजग्राह सुपर्वाणं सुतेजनम् । सुषेणायासृजद्भीमस्तमप्यस्याच्छिनद्वृषः ॥

athānyaṃ parijagrāha suparvāṇaṃ sutejanam | suṣeṇāyāsṛjadbhīmastamapyasyācchinadvṛṣaḥ

तब भीम ने सुन्दर गाँठों वाला तीक्ष्ण एक और बाण उठाकर सुषेण पर छोड़ा, किन्तु वृष ने उसे भी काट डाला।

श्लोक 33 (8.43.33)

पुनः कर्णस्त्रिसप्तत्या भीमसेनमथेषुभिः । पुत्रं परीप्सन्विव्याध क्रुद्धः शत्रुजिघांसया ॥

punaḥ karṇastrisaptatyā bhīmasenamatheṣubhiḥ | putraṃ parīpsanvivyādha kruddhaḥ śatrujighāṃsayā

फिर पुत्र को बचाने की इच्छा से, क्रोध में भरे और शत्रु को मारने को उद्यत कर्ण ने भीमसेन को तिहत्तर बाणों से बींध दिया।

श्लोक 34 (8.43.34)

सुषेणस्तु धनुर्गृह्य भारसाधनमुत्तमम् । नकुलं पञ्चभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥

suṣeṇastu dhanurgṛhya bhārasādhanamuttamam | nakulaṃ pañcabhirbāṇairbāhvorurasi cārpayat

किन्तु सुषेण ने भार सहने में समर्थ एक उत्तम धनुष लेकर नकुल की भुजाओं और छाती में पाँच बाण मारे।

श्लोक 35 (8.43.35)

नकुलस्तं तु विंशत्या विद्ध्वा भारसहैर्दृढैः । ननाद बलवन्नादं कर्णस्य भयमादधत् ॥

nakulastaṃ tu viṃśatyā viddhvā bhārasahairdṛḍhaiḥ | nanāda balavannādaṃ karṇasya bhayamādadhat

नकुल ने भार सहने वाले बीस दृढ़ बाणों से उसे बींधकर ऐसी बलवान गर्जना की कि कर्ण को भय हो गया।

श्लोक 36 (8.43.36)

तं सुषेणो महाराज विद्ध्वा दशभिराशुगैः । चिच्छेद च धनुः शीघ्रं क्षुरप्रेण महारथः ॥

taṃ suṣeṇo mahārāja viddhvā daśabhirāśugaiḥ | ciccheda ca dhanuḥ śīghraṃ kṣurapreṇa mahārathaḥ

हे महाराज! महारथी सुषेण ने दस तेज़ बाणों से उसे बींध दिया और शीघ्र ही क्षुरप्र से उसका धनुष काट डाला।

श्लोक 37 (8.43.37)

अथान्यद्धनुरादाय नकुलः क्रोधमूर्च्छितः । सुषेणं नवभिर्बाणैर्वारयामास संयुगे ॥

athānyaddhanurādāya nakulaḥ krodhamūrcchitaḥ | suṣeṇaṃ navabhirbāṇairvārayāmāsa saṃyuge

तब क्रोध से मूर्च्छित-से नकुल ने दूसरा धनुष लेकर नौ बाणों से युद्ध में सुषेण को रोक दिया।

श्लोक 38 (8.43.38)

स तु बाणैर्दिशो राजन्नाच्छाद्य परवीरहा । आजघ्ने सारथिं चास्य सुषेणं च ततस्त्रिभिः । चिच्छेद चास्य सुदृढं धनुर्भल्लैस्त्रिभिस्त्रिधा ॥

sa tu bāṇairdiśo rājannācchādya paravīrahā | ājaghne sārathiṃ cāsya suṣeṇaṃ ca tatastribhiḥ | ciccheda cāsya sudṛḍhaṃ dhanurbhallaistribhistridhā

शत्रु-वीरों के संहारक उसने, हे राजन्! बाणों से दिशाओं को ढककर सुषेण के सारथि को मारा, फिर तीन बाणों से सुषेण को भी मारा, और तीन भल्लों से उसके दृढ़ धनुष के तीन टुकड़े कर दिए।

श्लोक 39 (8.43.39)

अथान्यद्धनुरादाय सुषेणः क्रोधमूर्च्छितः । आविध्यन्नकुलं षष्ट्या सहदेवं च सप्तभिः ॥

athānyaddhanurādāya suṣeṇaḥ krodhamūrcchitaḥ | āvidhyannakulaṃ ṣaṣṭyā sahadevaṃ ca saptabhiḥ

तब क्रोध से मूर्च्छित-से सुषेण ने दूसरा धनुष लेकर नकुल को साठ और सहदेव को सात बाणों से बींध दिया।

श्लोक 40 (8.43.40)

तद्युद्धं सुमहद्धोरमासीद्देवासुरोपमम् । निघ्नतां सायकैस्तूर्णमन्योन्यस्य वधं प्रति ॥

tadyuddhaṃ sumahaddhoramāsīddevāsuropamam | nighnatāṃ sāyakaistūrṇamanyonyasya vadhaṃ prati

वह विशाल और भयंकर युद्ध देवासुर-संग्राम के समान था, जिसमें वे एक-दूसरे के वध के लिए तेज़ी से बाण चला रहे थे।

श्लोक 41 (8.43.41)

सात्यकिर्वृषसेनं तु विद्ध्वा सप्तभिरायसैः । पुनर्विव्याध सप्तत्या सारथिं च त्रिभिः शितैः ॥

sātyakirvṛṣasenaṃ tu viddhvā saptabhirāyasaiḥ | punarvivyādha saptatyā sārathiṃ ca tribhiḥ śitaiḥ

सात्यकि ने वृषसेन को लोहे के सात बाणों से बींधकर फिर सत्तर से बींधा, और उसके सारथि को तीन तीखे बाणों से।

श्लोक 42 (8.43.42)

वृषसेनस्तु शैनेयं शरेणानतपर्वणा । आजघान महाराज शङ्खदेशे महारथम् ॥

vṛṣasenastu śaineyaṃ śareṇānataparvaṇā | ājaghāna mahārāja śaṅkhadeśe mahāratham

किन्तु वृषसेन ने सीधी गाँठ वाले बाण से महारथी शैनेय के कनपटी-प्रदेश में प्रहार किया, हे महाराज!

श्लोक 43 (8.43.43)

शैनेयो वृषसेनेन पत्रिणा परिपीडितः । कोपं चक्रे महाराज क्रुद्धो वेगं च दारुणम् ॥

śaineyo vṛṣasenena patriṇā paripīḍitaḥ | kopaṃ cakre mahārāja kruddho vegaṃ ca dāruṇam

वृषसेन के बाण से पीड़ित होकर शैनेय क्रुद्ध हो उठा, हे महाराज! और क्रोध में उसका वेग भयंकर हो गया।

श्लोक 44 (8.43.44)

जग्राहेषुवरान्वीरः शीघ्रं वै दश पञ्च च । सात्यकिर्वृषसेनस्य सूतं हत्वा त्रिभिः शरैः ॥

jagrāheṣuvarānvīraḥ śīghraṃ vai daśa pañca ca | sātyakirvṛṣasenasya sūtaṃ hatvā tribhiḥ śaraiḥ

उस वीर ने शीघ्र ही पन्द्रह उत्तम बाण उठाए, और सात्यकि ने तीन बाणों से वृषसेन के सारथि को मार डाला।

श्लोक 45 (8.43.45)

धनुश्चिच्छेद भल्लेन जघानाश्वांश्च सप्तभिः । ध्वजमेकेषुणोन्मथ्य त्रिभिस्तं हृद्यताडयत् ॥

dhanuściccheda bhallena jaghānāśvāṃśca saptabhiḥ | dhvajamekeṣuṇonmathya tribhistaṃ hṛdyatāḍayat

उसने भल्ल से उसका धनुष काट दिया, सात बाणों से घोड़े मार डाले, एक बाण से ध्वज तोड़ दिया और तीन बाणों से उसके हृदय में प्रहार किया।

श्लोक 46 (8.43.46)

अथावसन्नः स्वरथे मुहूर्तात्पुनरुत्थितः । स रणे युयुधानेन विसूताश्वरथध्वजः । कृतो जिघांसुः शैनेयं खङ्गचर्मधृगभ्ययात् ॥

athāvasannaḥ svarathe muhūrtātpunarutthitaḥ | sa raṇe yuyudhānena visūtāśvarathadhvajaḥ | kṛto jighāṃsuḥ śaineyaṃ khaṅgacarmadhṛgabhyayāt

अपने रथ में बैठ गया वह क्षणभर बाद फिर उठ खड़ा हुआ; युद्ध में युयुधान द्वारा सारथि, घोड़ों, रथ और ध्वज से रहित कर दिया गया, और शैनेय को मारने की इच्छा से वह तलवार और ढाल लेकर आगे बढ़ा।

श्लोक 47 (8.43.47)

तस्य चापततः शीघ्रं वृषसेनस्य सात्यकिः । वाराहकर्णैर्दशभिरविध्यदसिचर्मणी ॥

tasya cāpatataḥ śīghraṃ vṛṣasenasya sātyakiḥ | vārāhakarṇairdaśabhiravidhyadasicarmaṇī

उसके झपटते ही सात्यकि ने दस वाराहकर्ण बाणों से वृषसेन की तलवार और ढाल बींध डाली।

श्लोक 48 (8.43.48)

दुःशासनस्तु तं दृष्ट्वा विरथं व्यायुधं कृतम् । आरोप्य स्वरथं तूर्णमपोवाह रथान्तरम् ॥

duḥśāsanastu taṃ dṛṣṭvā virathaṃ vyāyudhaṃ kṛtam | āropya svarathaṃ tūrṇamapovāha rathāntaram

उसे रथहीन और शस्त्रहीन देखकर दुःशासन उसे तुरन्त अपने रथ पर चढ़ाकर दूसरे रथ के पास ले गया।

श्लोक 49 (8.43.49)

अथान्यं रथमास्थाय वृषसेनो महारथः । द्रौपदेयांस्त्रिसप्तत्या युयुधानं च पञ्चभिः ॥

athānyaṃ rathamāsthāya vṛṣaseno mahārathaḥ | draupadeyāṃstrisaptatyā yuyudhānaṃ ca pañcabhiḥ

तब महारथी वृषसेन ने दूसरे रथ पर चढ़कर द्रौपदी के पुत्रों को तिहत्तर बाणों से और युयुधान को पाँच से बींधा,

श्लोक 50 (8.43.50)

भीमसेनं चतुःषष्ट्या सहदेवं च पञ्चभिः । नकुलं त्रिंशता बाणैः शतानीकं च सप्तभिः ॥

bhīmasenaṃ catuḥṣaṣṭyā sahadevaṃ ca pañcabhiḥ | nakulaṃ triṃśatā bāṇaiḥ śatānīkaṃ ca saptabhiḥ

भीमसेन को चौंसठ से, सहदेव को पाँच से, नकुल को तीस बाणों से और शतानीक को सात से,

श्लोक 51 (8.43.51)

शिखण्डिनं च दशभिर्धर्मराजं शतेन च । एतांश्चान्यांश्च राजेन्द्र प्रवीराञ्जयगृद्धिनः ॥

śikhaṇḍinaṃ ca daśabhirdharmarājaṃ śatena ca | etāṃścānyāṃśca rājendra pravīrāñjayagṛddhinaḥ

शिखण्डी को दस से और धर्मराज को सौ से, तथा इन्हें और अन्य विजयाभिलाषी वीरों को भी, हे राजेन्द्र!

श्लोक 52 (8.43.52)

अभ्यर्दयन्महेष्वासः कर्णपुत्रो विशाम्पते । कर्णस्य युधि दुर्धर्षस्ततः पृष्ठमपालयत् ॥

abhyardayanmaheṣvāsaḥ karṇaputro viśāmpate | karṇasya yudhi durdharṣastataḥ pṛṣṭhamapālayat

कर्ण के उस महाधनुर्धर पुत्र ने, जो युद्ध में दुर्धर्ष था, हे विशाम्पते! उन्हें पीड़ित किया और इस प्रकार कर्ण की पीठ की रक्षा की।

श्लोक 53 (8.43.53)

युयुधानं च राधेयो नवैर्नवभिरायसैः । विसूताश्वरथं कृत्वा ललाटे त्रिभिरार्पयत् ॥

yuyudhānaṃ ca rādheyo navairnavabhirāyasaiḥ | visūtāśvarathaṃ kṛtvā lalāṭe tribhirārpayat

और राधापुत्र ने लोहे के नौ-नौ बाणों से युयुधान को सारथि, घोड़ों और रथ से रहित कर दिया और तीन बाणों से उसके मस्तक पर प्रहार किया।

श्लोक 54 (8.43.54)

स त्वन्यं रथमास्थाय विधिवत्कल्पितं पुनः । युयुधे पाण्डुभिः सार्धं कर्णस्य व्यधमद्बलम् ॥

sa tvanyaṃ rathamāsthāya vidhivatkalpitaṃ punaḥ | yuyudhe pāṇḍubhiḥ sārdhaṃ karṇasya vyadhamadbalam

किन्तु उसने विधिपूर्वक सजे हुए दूसरे रथ पर चढ़कर पाण्डवों के साथ फिर युद्ध किया और कर्ण की सेना को चीर डाला।

श्लोक 55 (8.43.55)

धृष्टद्युम्नस्ततः कर्णमविध्यद्दशभिः शरैः । द्रौपदेयास्त्रिसप्तत्या युयुधानस्तु सप्तभिः ॥

dhṛṣṭadyumnastataḥ karṇamavidhyaddaśabhiḥ śaraiḥ | draupadeyāstrisaptatyā yuyudhānastu saptabhiḥ

तब धृष्टद्युम्न ने कर्ण को दस बाणों से बींधा, द्रौपदी के पुत्रों ने तिहत्तर से, युयुधान ने सात से,

श्लोक 56 (8.43.56)

भीमसेनश्चतुःषष्ट्या सहदेवश्च सप्तभिः । नकुलस्त्रिंशता बाणैः शतानीकस्तु सप्तभिः ॥

bhīmasenaścatuḥṣaṣṭyā sahadevaśca saptabhiḥ | nakulastriṃśatā bāṇaiḥ śatānīkastu saptabhiḥ

भीमसेन ने चौंसठ से, सहदेव ने सात से, नकुल ने तीस बाणों से और शतानीक ने सात से,

श्लोक 57 (8.43.57)

शिखण्डी दशभिर्वीरो धर्मराजः शतेन तु । एते चान्ये च राजेन्द्र प्रवीरा जयगृद्धिनः । अभ्यर्दयन्महेष्वासं सूतपुत्रं महामृधे ॥

śikhaṇḍī daśabhirvīro dharmarājaḥ śatena tu | ete cānye ca rājendra pravīrā jayagṛddhinaḥ | abhyardayanmaheṣvāsaṃ sūtaputraṃ mahāmṛdhe

वीर शिखण्डी ने दस से, और धर्मराज ने सौ से; ये और अन्य विजयाभिलाषी वीर, हे राजेन्द्र! उस महासंग्राम में महाधनुर्धर सूतपुत्र को पीड़ित करने लगे।

श्लोक 58 (8.43.58)

तान्सूतपुत्रो विशिखैर्दशभिर्दशभिः शरैः । रथेनानुचरन्वीरः प्रत्यविध्यदरिन्दमः ॥

tānsūtaputro viśikhairdaśabhirdaśabhiḥ śaraiḥ | rathenānucaranvīraḥ pratyavidhyadarindamaḥ

शत्रुओं का दमन करने वाले सूतपुत्र वीर ने रथ में घूमते हुए उनमें से प्रत्येक को बदले में दस-दस बाणों से बींधा।

श्लोक 59 (8.43.59)

सात्यकिं भीमसेनं च धृष्टद्युम्नं शिखण्डिनम् । द्रौपदेयांश्च संरब्धान्यतमानान्महारथान् ॥

sātyakiṃ bhīmasenaṃ ca dhṛṣṭadyumnaṃ śikhaṇḍinam | draupadeyāṃśca saṃrabdhānyatamānānmahārathān

सात्यकि, भीमसेन, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और द्रौपदी के पुत्रों को, जो क्रोध से भरे हुए प्रयत्नशील महारथी थे,

श्लोक 60 (8.43.60)

पश्यतां सर्वसैन्यानामथैतान्सूतनन्दनः । विरथान्रथिनः श्रेष्ठान्निमेषार्धाच्चकार ह ॥

paśyatāṃ sarvasainyānāmathaitānsūtanandanaḥ | virathānrathinaḥ śreṣṭhānnimeṣārdhāccakāra ha

समस्त सेनाओं के देखते-देखते सूतपुत्र ने इन श्रेष्ठ रथियों को पलक झपकने के आधे क्षण में रथहीन कर दिया।

श्लोक 61 (8.43.61)

अमोघत्वाच्च बाणानां भूतसङ्घा विसिष्मियुः ॥

amoghatvācca bāṇānāṃ bhūtasaṅghā visiṣmiyuḥ

और उसके बाणों के अचूक होने से प्राणियों के समूह विस्मित हो गए।

श्लोक 62 (8.43.62)

तत्रास्त्रवीर्यं कर्णस्य लाघवं च महात्मनः । अपश्याम महाभाग तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tatrāstravīryaṃ karṇasya lāghavaṃ ca mahātmanaḥ | apaśyāma mahābhāga tadadbhutamivābhavat

वहाँ हमने उस महात्मा कर्ण के अस्त्रों का बल और हाथ की फुर्ती देखी, हे महाभाग! वह अद्भुत-सा लगा।

श्लोक 63 (8.43.63)

न ह्याददानं ददृशुः सन्दधानं च सायकान् । विमुञ्चन्तं च संरम्भात्पश्यन्नैव तं जनाः ॥

na hyādadānaṃ dadṛśuḥ sandadhānaṃ ca sāyakān | vimuñcantaṃ ca saṃrambhātpaśyannaiva taṃ janāḥ

लोग उसे बाण उठाते हुए, चढ़ाते हुए, या क्रोध के आवेग में छोड़ते हुए नहीं देख पाते थे; वे देखते हुए भी उसे नहीं देख सके।

श्लोक 64 (8.43.64)

प्रतीच्यां दिशि तं दृष्ट्वा प्राच्यां पश्याम लाघवात् । न च पश्याम राजेन्द्र क्व नु कर्णो व्यतिष्ठत ॥

pratīcyāṃ diśi taṃ dṛṣṭvā prācyāṃ paśyāma lāghavāt | na ca paśyāma rājendra kva nu karṇo vyatiṣṭhata

उसे पश्चिम दिशा में देखकर, उसकी फुर्ती के कारण हम उसे पूर्व में देखते थे; और हे राजेन्द्र! हम यह नहीं जान पाते थे कि कर्ण कहाँ खड़ा है।

श्लोक 65 (8.43.65)

इषूनेवास्य पश्यामो विनिकीर्णान्समन्ततः । छादयमानान्दिशो राजञ्शलभानामिव व्रजान् ॥

iṣūnevāsya paśyāmo vinikīrṇānsamantataḥ | chādayamānāndiśo rājañśalabhānāmiva vrajān

हम केवल उसके चारों ओर बिखरे हुए बाणों को ही देखते थे, जो टिड्डियों के झुंडों की तरह दिशाओं को ढके दे रहे थे, हे राजन्!

श्लोक 66 (8.43.66)

तस्य तैरिषुभिस्तीक्ष्णैः सम्पतद्भिः सहस्रशः । मरीचिभिरिवोष्णांशोः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

tasya tairiṣubhistīkṣṇaiḥ sampatadbhiḥ sahasraśaḥ | marīcibhirivoṣṇāṃśoḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ

उसके गिरते हुए हज़ारों तीखे, सीधी गाँठ वाले बाणों से, जो सूर्य की किरणों के समान थे,

श्लोक 67 (8.43.67)

व्याप्ताः सर्वा दिशो राजन्योधाश्च ददृशुस्तदा । शरैः संवृतमाकाशं तत्राभ्रैरिव चाभवत् ॥

vyāptāḥ sarvā diśo rājanyodhāśca dadṛśustadā | śaraiḥ saṃvṛtamākāśaṃ tatrābhrairiva cābhavat

सब दिशाएँ भर गईं, हे राजन्! और योद्धाओं ने तब देखा कि आकाश बाणों से ढका हुआ है, मानो बादलों से ढका हो।

श्लोक 68 (8.43.68)

द्यौर्वियद्भूर्दिशश्चैव प्रच्छन्ना निशितैः शरैः । अरुणाभ्रावृताकारं तस्मिन्देशे बभौ वियत् ॥

dyaurviyadbhūrdiśaścaiva pracchannā niśitaiḥ śaraiḥ | aruṇābhrāvṛtākāraṃ tasmindeśe babhau viyat

स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ उसके तीखे बाणों से ढक गईं; उस स्थान पर आकाश लाल बादलों से घिरा-सा चमक उठा।

श्लोक 69 (8.43.69)

ततः पुनरमेयात्मा कर्णो राजा महारथः । न्यहनत्समरे योधान्योधवृत्तमनुष्ठितः ॥

tataḥ punarameyātmā karṇo rājā mahārathaḥ | nyahanatsamare yodhānyodhavṛttamanuṣṭhitaḥ

तब फिर अपरिमेय आत्मबल वाले राजा महारथी कर्ण ने योद्धा-धर्म का पालन करते हुए युद्ध में योद्धाओं को मार गिराया।

श्लोक 70 (8.43.70)

नृत्यन्निव हि राधेयश्चापहस्तो रणाजिरे । यैर्विद्धः प्रत्यविध्यत्तानेकैकं त्रिगुणैः शरैः ॥

nṛtyanniva hi rādheyaścāpahasto raṇājire | yairviddhaḥ pratyavidhyattānekaikaṃ triguṇaiḥ śaraiḥ

रणभूमि में धनुष हाथ में लिए मानो नाचता हुआ राधापुत्र, जिन्होंने उसे बींधा था, उनमें से प्रत्येक को उनसे तिगुने बाणों से बदले में बींधता गया।

श्लोक 71 (8.43.71)

शतैश्च दशभिश्चैतान्पुनर्विद्ध्वा ननाद च । साश्वसूतध्वजच्छत्रास्ततस्ते विवरं ददुः ॥

śataiśca daśabhiścaitānpunarviddhvā nanāda ca | sāśvasūtadhvajacchatrāstataste vivaraṃ daduḥ

सैकड़ों और दसों बाणों से उन्हें फिर बींधकर वह गरज उठा; तब घोड़ों, सारथियों, ध्वजों और छत्रों सहित वे हट गए।

श्लोक 72 (8.43.72)

ते हन्यमानाः कर्णेन पलायन्त दिशो दश । नादयन्तो दिशः सर्वाः कर्णत्रस्ता विचेतसः ॥

te hanyamānāḥ karṇena palāyanta diśo daśa | nādayanto diśaḥ sarvāḥ karṇatrastā vicetasaḥ

कर्ण के प्रहारों से मारे जाते हुए वे दसों दिशाओं में भाग चले; सब दिशाओं को चिल्लाहट से गुँजाते हुए, कर्ण से भयभीत और बेसुध होकर।

श्लोक 73 (8.43.73)

तान्प्रमथ्य महेष्वासान्राधेयः शरवृष्टिभिः । राजानीकमसम्बाधं प्राविशच्छत्रुकर्शनः ॥

tānpramathya maheṣvāsānrādheyaḥ śaravṛṣṭibhiḥ | rājānīkamasambādhaṃ prāviśacchatrukarśanaḥ

उन महाधनुर्धरों को बाणों की वर्षा से कुचलकर शत्रुओं को सताने वाला राधापुत्र राजा की सेना में, जिसमें अब कोई रुकावट न थी, घुस गया।

श्लोक 74 (8.43.74)

स रथांस्त्रिशतं हत्वा चेदीनामनिवर्तिनाम् । राधेयो निशितैर्बाणैस्ततोऽभ्यागाद्युधिष्ठिरम् ॥

sa rathāṃstriśataṃ hatvā cedīnāmanivartinām | rādheyo niśitairbāṇaistato'bhyāgādyudhiṣṭhiram

कभी पीछे न हटने वाले चेदियों के तीन सौ रथों को मारकर राधापुत्र तीखे बाणों से युधिष्ठिर की ओर बढ़ा।

श्लोक 75 (8.43.75)

ततस्ते विरथाः शूरा रथानन्यान्समास्थिताः । परिवव्रुर्महाराज धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥

tataste virathāḥ śūrā rathānanyānsamāsthitāḥ | parivavrurmahārāja dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram

तब वे रथहीन हुए शूर दूसरे रथों पर चढ़कर, हे महाराज! धर्मपुत्र युधिष्ठिर को घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 76 (8.43.76)

ततस्ते तु परे राजञ्छिखण्डी च ससात्यकिः । राधेयात्परिरक्षन्तो राजानं पर्यवारयन् । मुञ्चन्तो विविधान्बाणान्स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् ॥

tataste tu pare rājañchikhaṇḍī ca sasātyakiḥ | rādheyātparirakṣanto rājānaṃ paryavārayan | muñcanto vividhānbāṇānsvarṇapuṅkhāñśilāśitān

तब दूसरे योद्धाओं ने, हे राजन्! शिखण्डी और सात्यकि के साथ राधापुत्र से राजा की रक्षा करते हुए, सोने के पंखों वाले, शिला पर तेज़ किए हुए नाना प्रकार के बाण छोड़ते हुए उन्हें घेर लिया।

श्लोक 77 (8.43.77)

तथैव तावकाः सर्वे कर्णं दुर्वारणं रणे । यत्ताः शूरा महेष्वासाः पर्यरक्षन्त सर्वशः ॥

tathaiva tāvakāḥ sarve karṇaṃ durvāraṇaṃ raṇe | yattāḥ śūrā maheṣvāsāḥ paryarakṣanta sarvaśaḥ

वैसे ही आपके सब योद्धाओं ने, महाधनुर्धरों ने, यत्नपूर्वक रणभूमि में दुर्निवार कर्ण की चारों ओर से रक्षा की।

श्लोक 78 (8.43.78)

नानावादित्रघोषाश्च प्रादुरासन्विशाम्पते । सिंहनादश्च सञ्जज्ञे शूराणामभिगर्जताम् ॥

nānāvāditraghoṣāśca prādurāsanviśāmpate | siṃhanādaśca sañjajñe śūrāṇāmabhigarjatām

नाना वाद्यों की ध्वनि उठी, हे विशाम्पते! और गरजते हुए वीरों की सिंहगर्जना गूँज उठी।

श्लोक 79 (8.43.79)

ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुपाण्डवाः । युधिष्ठिरमुखाः पार्थाः सूतपुत्रमुखा वयम् ॥

tataḥ punaḥ samājagmurabhītāḥ kurupāṇḍavāḥ | yudhiṣṭhiramukhāḥ pārthāḥ sūtaputramukhā vayam

तब कौरव और पाण्डव निर्भय होकर फिर टकराए — पार्थ युधिष्ठिर को आगे करके, और हम सूतपुत्र को आगे करके।

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