कर्ण पर्व · अध्याय 45
भीमसेन के प्रहार से कर्ण का अचेत होना
पीछे हटती कौरव-सेना भीमसेन पर टूटती है। कर्ण भी उसकी ओर बढ़ता है, और भीम युधिष्ठिर की रक्षा का भार सात्यकि और धृष्टद्युम्न को सौंपकर प्रतिज्ञा करता है कि या तो कर्ण को मारेगा या स्वयं मरेगा। शल्य कर्ण को भीम के क्रोध से सावधान करते हैं, और कर्ण कहता है कि उसकी सच्ची साध अर्जुन से भिड़ने की है। दोनों में बाणों का भीषण द्वन्द्व होता है; अन्त में भीम का बाण कर्ण को चीर देता है, वह रथ में अचेत हो जाता है, शल्य उसे रण से बाहर ले जाते हैं और भीम कौरव-सेना को भगा देता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.45.1)
तानभिद्रवतो दृष्ट्वा पाण्डवांस्तावकं बलम् । क्रोशतस्तव पुत्रस्य न स्म राजन्न्यवर्तत ॥
tānabhidravato dṛṣṭvā pāṇḍavāṃstāvakaṃ balam | krośatastava putrasya na sma rājannyavartata
पाण्डवों को आक्रमण करते देखकर, हे राजन्, आपकी सेना नहीं लौटी, यद्यपि आपका पुत्र पुकार-पुकारकर उसे रोकता रहा।
श्लोक 2 (8.45.2)
ततः पक्षात्प्रपक्षाच्च प्रपक्षैश्चापि दक्षिणात् । उदस्तशस्त्राः कुरवो भीममभ्यद्रवन्रणे ॥
tataḥ pakṣātprapakṣācca prapakṣaiścāpi dakṣiṇāt | udastaśastrāḥ kuravo bhīmamabhyadravanraṇe
तब बगल से, दूर के पार्श्वों से और दाहिनी ओर से शस्त्र उठाए हुए कौरवों ने रण में भीम पर धावा बोल दिया।
श्लोक 3 (8.45.3)
कर्णोऽपि दृष्ट्वा द्रवतो धार्तराष्ट्रान्पराङ्मुखान् । हंसवर्णान्हयाग्र्यांस्तान्प्रैषीद्यत्र वृकोदरम् ॥
karṇo'pi dṛṣṭvā dravato dhārtarāṣṭrānparāṅmukhān | haṃsavarṇānhayāgryāṃstānpraiṣīdyatra vṛkodaram
कर्ण ने भी धृतराष्ट्र के पुत्रों को पीठ फेरकर भागते देखा, तो अपने हंस के समान श्वेत उत्तम घोड़ों को वहाँ भेजा जहाँ वृकोदर था।
श्लोक 4 (8.45.4)
ते प्रेषिता महाराज शल्येनाहवशोभिना । भीमसेनरथं प्राप्य समसज्जन्त वाजिनः ॥
te preṣitā mahārāja śalyenāhavaśobhinā | bhīmasenarathaṃ prāpya samasajjanta vājinaḥ
हे महाराज! युद्ध की शोभा शल्य के हाँके हुए वे घोड़े भीमसेन के रथ तक पहुँचकर उससे जा भिड़े।
श्लोक 5 (8.45.5)
दृष्ट्वा कर्णं समायान्तं भीमः क्रोधसमन्वितः । मतिं दध्रे विनाशाय कर्णस्य भरतर्षभ ॥
dṛṣṭvā karṇaṃ samāyāntaṃ bhīmaḥ krodhasamanvitaḥ | matiṃ dadhre vināśāya karṇasya bharatarṣabha
कर्ण को आते देखकर क्रोध से भरे भीम ने, हे भरतश्रेष्ठ, कर्ण के विनाश का निश्चय किया।
श्लोक 6 (8.45.6)
सोऽब्रवीत्सात्यकिं वीरं धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् । एनं रक्षत राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । संशयान्महतो मुक्तं कथं चित्प्रेक्षतो मम ॥
so'bravītsātyakiṃ vīraṃ dhṛṣṭadyumnaṃ ca pārṣatam | enaṃ rakṣata rājānaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | saṃśayānmahato muktaṃ kathaṃ citprekṣato mama
उसने वीर सात्यकि और पृषतपुत्र धृष्टद्युम्न से कहा, "इन धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर की रक्षा करो, जो मेरे देखते-देखते किसी तरह एक बड़े सङ्कट से छूटे हैं।
भीमसेन उवाच
श्लोक 7 (8.45.7)
अग्रतो मे कृतो राजा छिन्नसर्वपरिच्छदः । दुर्योधनस्य प्रीत्यर्थं राधेयेन दुरात्मना ॥
agrato me kṛto rājā chinnasarvaparicchadaḥ | duryodhanasya prītyarthaṃ rādheyena durātmanā
दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए उस दुष्ट राधापुत्र ने मेरे सामने ही राजा को सारे साज-सामान से रहित कर दिया था।
श्लोक 8 (8.45.8)
अन्तमद्य करिष्यामि तस्य दुःखस्य पार्षत । हन्ता वास्मि रणे कर्णं स वा मां निहनिष्यति । संग्रामेण सुघोरेण सत्यमेतद्ब्रवीमि वः ॥
antamadya kariṣyāmi tasya duḥkhasya pārṣata | hantā vāsmi raṇe karṇaṃ sa vā māṃ nihaniṣyati | saṃgrāmeṇa sughoreṇa satyametadbravīmi vaḥ
हे पार्षत! आज मैं उस दुःख का अन्त करूँगा। या तो मैं युद्ध में कर्ण को मारूँगा, या वह इस भीषण संग्राम में मुझे मारेगा; मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ।
श्लोक 9 (8.45.9)
राजानमद्य भवतां न्यासभूतं ददामि वै । अस्य संरक्षणे सर्वे यतध्वं विगतज्वराः ॥
rājānamadya bhavatāṃ nyāsabhūtaṃ dadāmi vai | asya saṃrakṣaṇe sarve yatadhvaṃ vigatajvarāḥ
मैं आज राजा को तुम्हारे हाथों धरोहर के रूप में सौंपता हूँ; तुम सब निश्चिन्त होकर इनकी रक्षा का यत्न करो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 10 (8.45.10)
एवमुक्त्वा महाबाहुः प्रायादाधिरथिं प्रति । सिंहनादेन महता सर्वाः संनादयन्दिशः ॥
evamuktvā mahābāhuḥ prāyādādhirathiṃ prati | siṃhanādena mahatā sarvāḥ saṃnādayandiśaḥ
ऐसा कहकर वह महाबाहु बड़े सिंहनाद से सब दिशाओं को गुँजाता हुआ अधिरथपुत्र की ओर चला।
श्लोक 11 (8.45.11)
दृष्ट्वा त्वरितमायान्तं भीमं युद्धाभिनन्दिनम् । सूतपुत्रमथोवाच मद्राणामीश्वरो विभुः ॥
dṛṣṭvā tvaritamāyāntaṃ bhīmaṃ yuddhābhinandinam | sūtaputramathovāca madrāṇāmīśvaro vibhuḥ
युद्ध में आनन्द पाने वाले भीम को वेग से आते देखकर मद्रराज शल्य ने सूतपुत्र से कहा।
शल्य उवाच
श्लोक 12 (8.45.12)
पश्य कर्ण महाबाहुं क्रुद्धं पाण्डवनन्दनम् । दीर्घकालार्जितं क्रोधं मोक्तुकामं त्वयि ध्रुवम् ॥
paśya karṇa mahābāhuṃ kruddhaṃ pāṇḍavanandanam | dīrghakālārjitaṃ krodhaṃ moktukāmaṃ tvayi dhruvam
"कर्ण, देखो, पाण्डवों के आनन्द-रूप उस महाबाहु को, जो क्रोध में है; निश्चय ही वह चिरकाल से सञ्चित अपना क्रोध तुम पर छोड़ना चाहता है।
श्लोक 13 (8.45.13)
ईदृशं नास्य रूपं मे दृष्टपूर्वं कदा चन । अभिमन्यौ हते कर्ण राक्षसे वा घटोत्कचे ॥
īdṛśaṃ nāsya rūpaṃ me dṛṣṭapūrvaṃ kadā cana | abhimanyau hate karṇa rākṣase vā ghaṭotkace
कर्ण, मैंने उसका ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा, न तब जब अभिमन्यु मारा गया, न तब जब राक्षस घटोत्कच मारा गया।
श्लोक 14 (8.45.14)
त्रैलोक्यस्य समस्तस्य शक्तः क्रुद्धो निवारणे । बिभर्ति यादृशं रूपं कालाग्निसदृशं शुभम् ॥
trailokyasya samastasya śaktaḥ kruddho nivāraṇe | bibharti yādṛśaṃ rūpaṃ kālāgnisadṛśaṃ śubham
क्रुद्ध होने पर वह तीनों लोकों को रोक सकता है; वह ऐसा रूप धारण किए है जो तेजस्वी है और प्रलय की अग्नि के समान भी।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 15 (8.45.15)
इति ब्रुवति राधेयं मद्राणामीश्वरे नृप । अभ्यवर्तत वै कर्णं क्रोधदीप्तो वृकोदरः ॥
iti bruvati rādheyaṃ madrāṇāmīśvare nṛpa | abhyavartata vai karṇaṃ krodhadīpto vṛkodaraḥ
हे राजन्! मद्रराज जब राधापुत्र से यह कह रहे थे, तभी क्रोध से प्रज्वलित वृकोदर कर्ण की ओर बढ़ा।
श्लोक 16 (8.45.16)
तथागतं तु संप्रेक्ष्य भीमं युद्धाभिनन्दिनम् । अब्रवीद्वचनं शल्यं राधेयः प्रहसन्निव ॥
tathāgataṃ tu saṃprekṣya bhīmaṃ yuddhābhinandinam | abravīdvacanaṃ śalyaṃ rādheyaḥ prahasanniva
युद्ध में आनन्द पाने वाले भीम को इस प्रकार आता देखकर राधापुत्र ने मानो मुस्कुराते हुए शल्य से कहा।
कर्ण उवाच
श्लोक 17 (8.45.17)
यदुक्तं वचनं मेऽद्य त्वया मद्रजनेश्वर । भीमसेनं प्रति विभो तत्सत्यं नात्र संशयः ॥
yaduktaṃ vacanaṃ me'dya tvayā madrajaneśvara | bhīmasenaṃ prati vibho tatsatyaṃ nātra saṃśayaḥ
"हे मद्रराज! आज आपने भीमसेन के विषय में मुझसे जो कहा, हे विभो, वह सत्य है; इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 18 (8.45.18)
एष शूरश्च वीरश्च क्रोधनश्च वृकोदरः । निरपेक्षः शरीरे च प्राणतश्च बलाधिकः ॥
eṣa śūraśca vīraśca krodhanaśca vṛkodaraḥ | nirapekṣaḥ śarīre ca prāṇataśca balādhikaḥ
यह वृकोदर शूर है, वीर है, क्रोधी है, अपने शरीर और प्राणों की परवाह न करने वाला और बल में बढ़ा-चढ़ा है।
श्लोक 19 (8.45.19)
अज्ञातवासं वसता विराटनगरे तदा । द्रौपद्याः प्रियकामेन केवलं बाहुसंश्रयात् । गूढभावं समाश्रित्य कीचकः सगणो हतः ॥
ajñātavāsaṃ vasatā virāṭanagare tadā | draupadyāḥ priyakāmena kevalaṃ bāhusaṃśrayāt | gūḍhabhāvaṃ samāśritya kīcakaḥ sagaṇo hataḥ
अज्ञातवास में विराटनगर में रहते हुए केवल द्रौपदी को प्रसन्न करने की इच्छा से, अपनी भुजाओं का ही सहारा लेकर, गुप्त वेष धारण करके उसने कीचक को उसके पूरे कुल सहित मार डाला था।
श्लोक 20 (8.45.20)
सोऽद्य संग्रामशिरसि संनद्धः क्रोधमूर्च्छितः । किंकरोद्यतदण्डेन मृत्युनापि व्रजेद्रणम् ॥
so'dya saṃgrāmaśirasi saṃnaddhaḥ krodhamūrcchitaḥ | kiṃkarodyatadaṇḍena mṛtyunāpi vrajedraṇam
आज वही कवच बाँधे, क्रोध से मूर्च्छित-सा, युद्ध के मोर्चे पर है; वह तो यमराज के सेवक के दण्ड उठाए रहने पर भी उससे लड़ने चला जाए।
श्लोक 21 (8.45.21)
चिरकालाभिलषितो ममायं तु मनोरथः । अर्जुनं समरे हन्यां मां वा हन्याद्धनंजयः । स मे कदा चिदद्यैव भवेद्भीमसमागमात् ॥
cirakālābhilaṣito mamāyaṃ tu manorathaḥ | arjunaṃ samare hanyāṃ māṃ vā hanyāddhanaṃjayaḥ | sa me kadā cidadyaiva bhavedbhīmasamāgamāt
यह मेरी चिरकाल की अभिलाषा है कि मैं युद्ध में अर्जुन को मारूँ, या धनञ्जय मुझे मार दे। सम्भव है भीम से मेरी भेंट होने पर आज ही वह इच्छा पूरी हो जाए।
श्लोक 22 (8.45.22)
निहते भीमसेने तु यदि वा विरथीकृते । अभियास्यति मां पार्थस्तन्मे साधु भविष्यति । अत्र यन्मन्यसे प्राप्तं तच्छीघ्रं संप्रधारय ॥
nihate bhīmasene tu yadi vā virathīkṛte | abhiyāsyati māṃ pārthastanme sādhu bhaviṣyati | atra yanmanyase prāptaṃ tacchīghraṃ saṃpradhāraya
यदि भीमसेन मारा जाए, या रथहीन हो जाए, और तब पार्थ मुझ पर चढ़ाई करे, तो वह मेरे लिए अच्छा ही होगा। इस विषय में आप जो उचित समझें, उसे शीघ्र निश्चित कीजिए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 23 (8.45.23)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राधेयस्य महात्मनः । उवाच वचनं शल्यः सूतपुत्रं तथागतम् ॥
etacchrutvā tu vacanaṃ rādheyasya mahātmanaḥ | uvāca vacanaṃ śalyaḥ sūtaputraṃ tathāgatam
महात्मा राधापुत्र के ये वचन सुनकर शल्य ने वैसे ही खड़े सूतपुत्र से कहा।
शल्य उवाच
श्लोक 24 (8.45.24)
अभियासि महाबाहो भीमसेनं महाबलम् । निरस्य भीमसेनं तु ततः प्राप्स्यसि फल्गुनम् ॥
abhiyāsi mahābāho bhīmasenaṃ mahābalam | nirasya bhīmasenaṃ tu tataḥ prāpsyasi phalgunam
"हे महाबाहो! महाबली भीमसेन पर चढ़ाई कीजिए; भीमसेन को हटाने के बाद आप फल्गुन तक पहुँचेंगे।
श्लोक 25 (8.45.25)
यस्ते कामोऽभिलषितश्चिरात्प्रभृति हृद्गतः । स वै संपत्स्यते कर्ण सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
yaste kāmo'bhilaṣitaścirātprabhṛti hṛdgataḥ | sa vai saṃpatsyate karṇa satyametadbravīmi te
आपके हृदय में चिरकाल से बसी हुई जो अभिलाषा है, वह निश्चय पूरी होगी, कर्ण; मैं आपसे यह सत्य कहता हूँ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 26 (8.45.26)
एवमुक्ते ततः कर्णः शल्यं पुनरभाषत । हन्ताहमर्जुनं संख्ये मां वा हन्ता धनंजयः । युद्धे मनः समाधाय याहि याहीत्यचोदयत् ॥
evamukte tataḥ karṇaḥ śalyaṃ punarabhāṣata | hantāhamarjunaṃ saṃkhye māṃ vā hantā dhanaṃjayaḥ | yuddhe manaḥ samādhāya yāhi yāhītyacodayat
ऐसा कहे जाने पर कर्ण ने शल्य से फिर कहा, "मैं युद्ध में अर्जुन को मारूँगा, या धनञ्जय मुझे मारेगा।" और युद्ध में मन लगाकर उसने उन्हें प्रेरित किया, "चलो! चलो!"
श्लोक 27 (8.45.27)
ततः प्रायाद्रथेनाशु शल्यस्तत्र विशां पते । यत्र भीमो महेष्वासो व्यद्रावयत वाहिनीम् ॥
tataḥ prāyādrathenāśu śalyastatra viśāṃ pate | yatra bhīmo maheṣvāso vyadrāvayata vāhinīm
तब, हे राजन्, शल्य शीघ्र रथ लेकर वहाँ पहुँचे जहाँ महाधनुर्धर भीम सेना को भगा रहा था।
श्लोक 28 (8.45.28)
ततस्तूर्यनिनादश्च भेरीणां च महास्वनः । उदतिष्ठत राजेन्द्र कर्णभीमसमागमे ॥
tatastūryaninādaśca bherīṇāṃ ca mahāsvanaḥ | udatiṣṭhata rājendra karṇabhīmasamāgame
तब, हे राजेन्द्र, कर्ण और भीम के भिड़ने पर तुरहियों की ध्वनि और भेरियों का महानाद उठा।
श्लोक 29 (8.45.29)
भीमसेनोऽथ संक्रुद्धस्तव सैन्यं दुरासदम् । नाराचैर्विमलैस्तीक्ष्णैर्दिशः प्राद्रावयद्बली ॥
bhīmaseno'tha saṃkruddhastava sainyaṃ durāsadam | nārācairvimalaistīkṣṇairdiśaḥ prādrāvayadbalī
क्रोध से भरे बलवान् भीमसेन ने स्वच्छ, तीखे नाराचों से आपकी दुर्जेय सेना को सब दिशाओं में भगा दिया।
श्लोक 30 (8.45.30)
स संनिपातस्तुमुलो भीमरूपो विशां पते । आसीद्रौद्रो महाराज कर्णपाण्डवयोर्मृधे । ततो मुहूर्ताद्राजेन्द्र पाण्डवः कर्णमाद्रवत् ॥
sa saṃnipātastumulo bhīmarūpo viśāṃ pate | āsīdraudro mahārāja karṇapāṇḍavayormṛdhe | tato muhūrtādrājendra pāṇḍavaḥ karṇamādravat
हे राजन्! वह संघर्ष तुमुल और भयंकर रूप का था; हे महाराज, कर्ण और पाण्डव के उस युद्ध में वह भीषण हो उठा। फिर क्षण भर बाद, हे राजेन्द्र, पाण्डव कर्ण पर टूट पड़ा।
श्लोक 31 (8.45.31)
तमापतन्तं संप्रेक्ष्य कर्णो वैकर्तनो वृषः । आजघानोरसि क्रुद्धो नाराचेन स्तनान्तरे । पुनश्चैनममेयात्मा शरवर्षैरवाकिरत् ॥
tamāpatantaṃ saṃprekṣya karṇo vaikartano vṛṣaḥ | ājaghānorasi kruddho nārācena stanāntare | punaścainamameyātmā śaravarṣairavākirat
उसे आते देखकर क्रुद्ध वैकर्तन कर्ण ने वक्ष में स्तनों के बीच नाराच से प्रहार किया, और उस अपरिमित आत्मबल वाले ने उसे फिर बाणों की वर्षा से ढक दिया।
श्लोक 32 (8.45.32)
स विद्धः सूतपुत्रेण छादयामास पत्रिभिः । विव्याध निशितैः कर्ण नवभिर्नतपर्वभिः ॥
sa viddhaḥ sūtaputreṇa chādayāmāsa patribhiḥ | vivyādha niśitaiḥ karṇa navabhirnataparvabhiḥ
सूतपुत्र से बिंधा हुआ भीम ने उसे पंखदार बाणों से ढक दिया और झुकी गाँठों वाले नौ तीखे बाणों से कर्ण को बींध दिया।
श्लोक 33 (8.45.33)
तस्य कर्णो धनुर्मध्ये द्विधा चिच्छेद पत्रिणा । अथ तं छिन्नधन्वानमभ्यविध्यत्स्तनान्तरे । नाराचेन सुतीक्ष्णेन सर्वावरणभेदिना ॥
tasya karṇo dhanurmadhye dvidhā ciccheda patriṇā | atha taṃ chinnadhanvānamabhyavidhyatstanāntare | nārācena sutīkṣṇena sarvāvaraṇabhedinā
कर्ण ने एक बाण से उसका धनुष बीच से काटकर दो टुकड़े कर दिए, और फिर धनुष कट जाने पर उसके वक्ष में सब कवचों को भेदने वाले अत्यन्त तीखे नाराच से प्रहार किया।
श्लोक 34 (8.45.34)
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय सूतपुत्रं वृकोदरः । राजन्मर्मसु मर्मज्ञो विद्ध्वा सुनिशितैः शरैः । ननाद बलवन्नादं कम्पयन्निव रोदसी ॥
so'nyatkārmukamādāya sūtaputraṃ vṛkodaraḥ | rājanmarmasu marmajño viddhvā suniśitaiḥ śaraiḥ | nanāda balavannādaṃ kampayanniva rodasī
मर्मों को जानने वाले वृकोदर ने दूसरा धनुष लेकर, हे राजन्, अत्यन्त तीखे बाणों से सूतपुत्र के मर्मस्थानों को बींध दिया और ऐसा भीषण नाद किया मानो आकाश और पृथ्वी को हिला दिया हो।
श्लोक 35 (8.45.35)
तं कर्णः पञ्चविंशत्या नाराचानां समार्दयत् । मदोत्कटं वने दृप्तमुल्काभिरिव कुञ्जरम् ॥
taṃ karṇaḥ pañcaviṃśatyā nārācānāṃ samārdayat | madotkaṭaṃ vane dṛptamulkābhiriva kuñjaram
कर्ण ने पच्चीस नाराचों से उसे वैसे ही पीड़ित किया, जैसे वन में मदमत्त, घमण्डी हाथी को जलती मशालों से पीड़ित किया जाता है।
श्लोक 36 (8.45.36)
ततः सायकभिन्नाङ्गः पाण्डवः क्रोधमूर्च्छितः । संरम्भामर्षताम्राक्षः सूतपुत्रवधेच्छया ॥
tataḥ sāyakabhinnāṅgaḥ pāṇḍavaḥ krodhamūrcchitaḥ | saṃrambhāmarṣatāmrākṣaḥ sūtaputravadhecchayā
तब बाणों से अङ्ग छिदे हुए पाण्डव ने, क्रोध से अचेत-सा होकर, रोष और अमर्ष से लाल आँखों के साथ सूतपुत्र के वध की इच्छा से
श्लोक 37 (8.45.37)
स कार्मुके महावेगं भारसाधनमुत्तमम् । गिरीणामपि भेत्तारं सायकं समयोजयत् ॥
sa kārmuke mahāvegaṃ bhārasādhanamuttamam | girīṇāmapi bhettāraṃ sāyakaṃ samayojayat
अपने धनुष पर एक उत्तम बाण चढ़ाया, जो बड़े वेग वाला था, भारी बोझ उठाने वाला था और पर्वतों को भी चीर देता था।
श्लोक 38 (8.45.38)
विकृष्य बलवच्चापमाकर्णादतिमारुतिः । तं मुमोच महेष्वासः क्रुद्धः कर्णजिघांसया ॥
vikṛṣya balavaccāpamākarṇādatimārutiḥ | taṃ mumoca maheṣvāsaḥ kruddhaḥ karṇajighāṃsayā
बलपूर्वक धनुष को कान तक खींचकर, वायु से भी तेज़ उस महाधनुर्धर ने क्रुद्ध होकर कर्ण को मारने की इच्छा से उसे छोड़ा।
श्लोक 39 (8.45.39)
स विसृष्टो बलवता बाणो वज्राशनिस्वनः । अदारयद्रणे कर्णं वज्रवेग इवाचलम् ॥
sa visṛṣṭo balavatā bāṇo vajrāśanisvanaḥ | adārayadraṇe karṇaṃ vajravega ivācalam
बलवान् के छोड़े हुए, वज्र के समान गर्जते उस बाण ने रण में कर्ण को वैसे ही चीर दिया, जैसे वज्र का वेग पर्वत को चीर देता है।
श्लोक 40 (8.45.40)
स भीमसेनाभिहतो सूतपुत्रः कुरूद्वह । निषसाद रथोपस्थे विसंज्ञः पृतनापतिः ॥
sa bhīmasenābhihato sūtaputraḥ kurūdvaha | niṣasāda rathopasthe visaṃjñaḥ pṛtanāpatiḥ
हे कुरुश्रेष्ठ! भीमसेन से आहत होकर सेनापति सूतपुत्र अचेत होकर रथ की बैठक में ढह पड़ा।
श्लोक 41 (8.45.41)
ततो मद्राधिपो दृष्ट्वा विसंज्ञं सूतनन्दनम् । अपोवाह रथेनाजौ कर्णमाहवशोभिनम् ॥
tato madrādhipo dṛṣṭvā visaṃjñaṃ sūtanandanam | apovāha rathenājau karṇamāhavaśobhinam
तब मद्रराज ने सूतपुत्र को अचेत देखकर युद्ध की शोभा कर्ण को रथ में बैठाकर रण से बाहर ले गए।
श्लोक 42 (8.45.42)
ततः पराजिते कर्णे धार्तराष्ट्रीं महाचमूम् । व्यद्रावयद्भीमसेनो यथेन्द्रो दानवीं चमूम् ॥
tataḥ parājite karṇe dhārtarāṣṭrīṃ mahācamūm | vyadrāvayadbhīmaseno yathendro dānavīṃ camūm
कर्ण के पराजित होने पर भीमसेन ने धृतराष्ट्र के पुत्रों की विशाल सेना को वैसे ही भगा दिया, जैसे इन्द्र दानवों की सेना को भगाते हैं।