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कर्ण पर्व · अध्याय 46

भीम द्वारा दुर्योधन के भाइयों का संहार

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि भीम द्वारा कर्ण के पराजित होने पर दुर्योधन ने क्या किया; सञ्जय बताते हैं कि दुर्योधन ने कर्ण की रक्षा के लिए अपने भाइयों को भेजा। भीम विवित्सु, विकट, सह, क्राथ, नन्द और उपनन्द को मार डालते हैं, फिर कर्ण से लड़ते हैं, रथहीन होने पर भूमि पर खड़े होकर गदा से सैकड़ों हाथियों, रथों और शकुनि के घुड़सवारों का संहार करते हैं। सात्यकि कर्ण से भिड़ जाते हैं, दोपहर में दोनों सेनाएँ भयंकर रूप से टकराती हैं और युद्ध और भी उग्र हो उठता है।

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (8.46.1)

सुदुष्करमिदं कर्म कृतं भीमेन सञ्जय । येन कर्णो महाबाहू रथोपस्थे निपातितः ॥

suduṣkaramidaṃ karma kṛtaṃ bhīmena sañjaya | yena karṇo mahābāhū rathopasthe nipātitaḥ

सञ्जय, भीम ने बड़ा ही कठिन कार्य कर दिखाया, जिससे महाबाहु कर्ण रथ के भीतर ही गिर पड़ा।

श्लोक 2 (8.46.2)

कर्णो ह्येको रणे हन्ता पाण्डवान्सृञ्जयैः सह । इति दुर्योधनः सूत प्राब्रवीन्मां मुहुर्मुहुः ॥

karṇo hyeko raṇe hantā pāṇḍavānsṛñjayaiḥ saha | iti duryodhanaḥ sūta prābravīnmāṃ muhurmuhuḥ

हे सूत, दुर्योधन मुझसे बार-बार कहता था कि 'रण में अकेला कर्ण ही सृञ्जयों सहित पाण्डवों को मार डालेगा।'

श्लोक 3 (8.46.3)

पराजितं तु राधेयं दृष्ट्वा भीमेन संयुगे । ततः परं किमकरोत्पुत्रो दुर्योधनो मम ॥

parājitaṃ tu rādheyaṃ dṛṣṭvā bhīmena saṃyuge | tataḥ paraṃ kimakarotputro duryodhano mama

रण में भीम के हाथों राधापुत्र को पराजित देखकर मेरे पुत्र दुर्योधन ने उसके बाद क्या किया?

सञ्जय उवाच

श्लोक 4 (8.46.4)

विमुखं प्रेक्ष्य राधेयं सूतपुत्रं महाहवे । पुत्रस्तव महाराज सोदर्यानिदमब्रवीत् ॥

vimukhaṃ prekṣya rādheyaṃ sūtaputraṃ mahāhave | putrastava mahārāja sodaryānidamabravīt

महायुद्ध में सूतपुत्र राधेय को विमुख देखकर, हे महाराज, आपके पुत्र ने अपने भाइयों से यह कहा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 5 (8.46.5)

शीघ्रं गच्छत भद्रं वो राधेयं परिरक्षत । भीमसेनभयेऽगाधे मज्जन्तं व्यसनार्णवे ॥

śīghraṃ gacchata bhadraṃ vo rādheyaṃ parirakṣata | bhīmasenabhaye'gādhe majjantaṃ vyasanārṇave

शीघ्र जाओ, तुम्हारा कल्याण हो। राधापुत्र की रक्षा करो, जो भीमसेन के भय की अथाह विपत्ति के सागर में डूब रहा है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 6 (8.46.6)

ते तु राज्ञा समादिष्टा भीमसेनं जिघांसवः । अभ्यवर्तन्त सङ्क्रुद्धाः पतङ्गाः पावकं यथा ॥

te tu rājñā samādiṣṭā bhīmasenaṃ jighāṃsavaḥ | abhyavartanta saṅkruddhāḥ pataṅgāḥ pāvakaṃ yathā

राजा की आज्ञा पाकर वे भीमसेन को मार डालने की इच्छा से क्रोध में भरकर उसी प्रकार टूट पड़े, जैसे पतंगे आग पर टूट पड़ते हैं।

श्लोक 7 (8.46.7)

श्रुतायुर्दुर्धरः क्राथो विवित्सुर्विकटः समः । निषङ्गी कवची पाशी तथा नन्दोपनन्दकौ ॥

śrutāyurdurdharaḥ krātho vivitsurvikaṭaḥ samaḥ | niṣaṅgī kavacī pāśī tathā nandopanandakau

श्रुतायु, दुर्धर, क्राथ, विवित्सु, विकट, सम, निषङ्गी, कवची, पाशी तथा नन्द और उपनन्द,

श्लोक 8 (8.46.8)

दुष्प्रधर्षः सुबाहुश्च वातवेगसुवर्चसौ । धनुर्ग्राहो दुर्मदश्च जलसन्धः शलः सहः ॥

duṣpradharṣaḥ subāhuśca vātavegasuvarcasau | dhanurgrāho durmadaśca jalasandhaḥ śalaḥ sahaḥ

दुष्प्रधर्ष, सुबाहु, वातवेग और सुवर्चा, धनुर्ग्राह, दुर्मद, जलसन्ध, शल और सह—

श्लोक 9 (8.46.9)

एते रथैः परिवृता वीर्यवन्तो महाबलाः । भीमसेनं समासाद्य समन्तात्पर्यवारयन् ॥

ete rathaiḥ parivṛtā vīryavanto mahābalāḥ | bhīmasenaṃ samāsādya samantātparyavārayan

रथों से घिरे हुए ये पराक्रमी और महाबली वीर भीमसेन के पास पहुँचकर उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 10 (8.46.10)

ते व्यमुञ्चञ्छरव्रातान्नानालिङ्गान्समन्ततः । स तैरभ्यर्द्यमानस्तु भीमसेनो महाबलः ॥

te vyamuñcañcharavrātānnānāliṅgānsamantataḥ | sa tairabhyardyamānastu bhīmaseno mahābalaḥ

उन्होंने चारों ओर से अनेक चिह्नों वाले बाणों की झड़ी लगा दी; उनसे पीड़ित हुआ महाबली भीमसेन—

श्लोक 11 (8.46.11)

तेषामापततां क्षिप्रं सुतानां ते जनाधिप । रथैः पञ्चशतैः सार्धं पञ्चाशदहनद्रथान् ॥

teṣāmāpatatāṃ kṣipraṃ sutānāṃ te janādhipa | rathaiḥ pañcaśataiḥ sārdhaṃ pañcāśadahanadrathān

हे नरेश्वर, आपके उन पुत्रों के झपटकर आते ही, पाँच सौ रथों के साथ पचास रथियों को मार गिराया।

श्लोक 12 (8.46.12)

विवित्सोस्तु ततः क्रुद्धो भल्लेनापाहरच्छिरः । भीमसेनो महाराज तत्पपात हतं भुवि ॥

vivitsostu tataḥ kruddho bhallenāpāharacchiraḥ | bhīmaseno mahārāja tatpapāta hataṃ bhuvi

तब क्रोध में भरे भीमसेन ने, हे महाराज, भल्ल से विवित्सु का मस्तक काट डाला और वह कटा हुआ भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 13 (8.46.13)

सकुण्डलशिरस्त्राणं पूर्णचन्द्रोपमं तथा । अशोभत महाराज पूर्णचन्द्र इवाम्बरे ॥

sakuṇḍalaśirastrāṇaṃ pūrṇacandropamaṃ tathā | aśobhata mahārāja pūrṇacandra ivāmbare

कुण्डलों और शिरस्त्राण सहित पूर्णचन्द्र के समान वह मस्तक, हे महाराज, आकाश में पूर्णचन्द्र की तरह शोभा देने लगा।

श्लोक 14 (8.46.14)

तं दृष्ट्वा निहतं शूरं भ्रातरः सर्वतस्तदा । अभ्यद्रवन्त समरे भीमं भीमपराक्रमम् ॥

taṃ dṛṣṭvā nihataṃ śūraṃ bhrātaraḥ sarvatastadā | abhyadravanta samare bhīmaṃ bhīmaparākramam

उस वीर को मरा हुआ देखकर उसके भाई चारों ओर से भयंकर पराक्रमी भीम पर युद्ध में टूट पड़े।

श्लोक 15 (8.46.15)

ततोऽपराभ्यां भल्लाभ्यां पुत्रयोस्ते महाहवे । जहार समरे प्राणान्भीमो भीमपराक्रमः ॥

tato'parābhyāṃ bhallābhyāṃ putrayoste mahāhave | jahāra samare prāṇānbhīmo bhīmaparākramaḥ

तब भयंकर पराक्रमी भीम ने उस महायुद्ध में दो और भल्लों से आपके दो पुत्रों के प्राण हर लिए।

श्लोक 16 (8.46.16)

तौ धरामन्वपद्येतां वातरुग्णाविव द्रुमौ । विकटश्च सहश्चोभौ देवपुत्रोपमौ नृप ॥

tau dharāmanvapadyetāṃ vātarugṇāviva drumau | vikaṭaśca sahaścobhau devaputropamau nṛpa

देवपुत्रों के समान वे दोनों, विकट और सह, हे राजन्, आँधी से टूटे दो वृक्षों की तरह पृथ्वी पर गिर पड़े।

श्लोक 17 (8.46.17)

ततस्तु त्वरितो भीमः क्राथं निन्ये यमक्षयम् । नाराचेन सुतीक्ष्णेन स हतो न्यपतद्भुवि ॥

tatastu tvarito bhīmaḥ krāthaṃ ninye yamakṣayam | nārācena sutīkṣṇena sa hato nyapatadbhuvi

फिर भीम ने शीघ्रता से क्राथ को यमलोक भेज दिया; तीखे नाराच से मारा जाकर वह भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 18 (8.46.18)

हाहाकारस्ततस्तीव्रः सम्बभूव जनेश्वर । वध्यमानेषु वीरेषु तव पुत्रेषु धन्विषु ॥

hāhākārastatastīvraḥ sambabhūva janeśvara | vadhyamāneṣu vīreṣu tava putreṣu dhanviṣu

हे जनेश्वर, आपके धनुर्धारी वीर पुत्रों के मारे जाने पर तब भयंकर हाहाकार मच गया।

श्लोक 19 (8.46.19)

तेषां सुलुलिते सैन्ये पुनर्भीमो महाबलः । नन्दोपनन्दौ समरे प्रैषयद्यमसादनम् ॥

teṣāṃ sululite sainye punarbhīmo mahābalaḥ | nandopanandau samare praiṣayadyamasādanam

उनकी सेना में खलबली मचने पर महाबली भीम ने फिर युद्ध में नन्द और उपनन्द को यमलोक पहुँचा दिया।

श्लोक 20 (8.46.20)

ततस्ते प्राद्रवन्भीताः पुत्रास्ते विह्वलीकृताः । भीमसेनं रणे दृष्ट्वा कालान्तकयमोपमम् ॥

tataste prādravanbhītāḥ putrāste vihvalīkṛtāḥ | bhīmasenaṃ raṇe dṛṣṭvā kālāntakayamopamam

तब आपके वे पुत्र घबराकर भयभीत हो भाग खड़े हुए; उन्होंने रण में भीमसेन को काल, अन्तक और यम के समान देखा था।

श्लोक 21 (8.46.21)

पुत्रांस्ते निहतान्दृष्ट्वा सूतपुत्रः सुदुर्मनाः । हंसवर्णान्हयान्भूयः प्रैषयद्यत्र पाण्डवः ॥

putrāṃste nihatāndṛṣṭvā sūtaputraḥ sudurmanāḥ | haṃsavarṇānhayānbhūyaḥ praiṣayadyatra pāṇḍavaḥ

आपके पुत्रों को मरा देखकर सूतपुत्र कर्ण अत्यन्त उदास हो गया और उसने अपने हंस-जैसे श्वेत घोड़ों को फिर वहाँ बढ़ाया जहाँ पाण्डव भीम था।

श्लोक 22 (8.46.22)

ते प्रेषिता महाराज मद्रराजेन वाजिनः । भीमसेनरथं प्राप्य समसज्जन्त वेगिताः ॥

te preṣitā mahārāja madrarājena vājinaḥ | bhīmasenarathaṃ prāpya samasajjanta vegitāḥ

हे महाराज, मद्रराज के हाँकने पर वे घोड़े वेग से भीमसेन के रथ के पास पहुँचकर उससे जा भिड़े।

श्लोक 23 (8.46.23)

स सन्निपातस्तुमुलो घोररूपो विशाम्पते । आसीद्रौद्रो महाराज कर्णपाण्डवयोर्मृधे ॥

sa sannipātastumulo ghorarūpo viśāmpate | āsīdraudro mahārāja karṇapāṇḍavayormṛdhe

हे प्रजापति, कर्ण और पाण्डव के बीच युद्ध में वह टक्कर बड़ी तुमुल, घोर और भयानक थी।

श्लोक 24 (8.46.24)

दृष्ट्वा मम महाराज तौ समेतौ महारथौ । आसीद्बुद्धिः कथं युद्धमेतदद्य भविष्यति ॥

dṛṣṭvā mama mahārāja tau sametau mahārathau | āsīdbuddhiḥ kathaṃ yuddhametadadya bhaviṣyati

हे महाराज, उन दोनों महारथियों को आमने-सामने देखकर मेरे मन में यह विचार आया कि आज यह युद्ध कैसा होगा।

श्लोक 25 (8.46.25)

ततो भीमो रणश्लाघी छादयामास पत्रिभिः । कर्णं रणे महाराज पुत्राणां तव पश्यताम् ॥

tato bhīmo raṇaślāghī chādayāmāsa patribhiḥ | karṇaṃ raṇe mahārāja putrāṇāṃ tava paśyatām

तब रण में आनन्द लेने वाले भीम ने, हे महाराज, आपके पुत्रों के देखते-देखते कर्ण को बाणों से ढक दिया।

श्लोक 26 (8.46.26)

ततः कर्णो भृशं क्रुद्धो भीमं नवभिरायसैः । विव्याध परमास्त्रज्ञो भल्लैः सन्नतपर्वभिः ॥

tataḥ karṇo bhṛśaṃ kruddho bhīmaṃ navabhirāyasaiḥ | vivyādha paramāstrajño bhallaiḥ sannataparvabhiḥ

तब अत्यन्त क्रुद्ध, श्रेष्ठ अस्त्रों के ज्ञाता कर्ण ने सीधी गाँठों वाले नौ लोहे के भल्लों से भीम को बींध डाला।

श्लोक 27 (8.46.27)

तान्निहत्य महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रमः । आकर्णपूर्णैर्विशिखैः कर्णं विव्याध सप्तभिः ॥

tānnihatya mahābāhurbhīmo bhīmaparākramaḥ | ākarṇapūrṇairviśikhaiḥ karṇaṃ vivyādha saptabhiḥ

उन्हें काटकर भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीम ने कान तक खिंचे हुए सात बाणों से कर्ण को बींध डाला।

श्लोक 28 (8.46.28)

ततः कर्णो महाराज आशीविष इव श्वसन् । शरवर्षेण महता छादयामास पाण्डवम् ॥

tataḥ karṇo mahārāja āśīviṣa iva śvasan | śaravarṣeṇa mahatā chādayāmāsa pāṇḍavam

तब, हे महाराज, विषैले सर्प की तरह फुफकारते हुए कर्ण ने बाणों की भारी वर्षा से पाण्डव को ढक दिया।

श्लोक 29 (8.46.29)

भीमोऽपि तं शरव्रातैश्छादयित्वा महारथम् । पश्यतां कौरवेयाणां विननर्द महाबलः ॥

bhīmo'pi taṃ śaravrātaiśchādayitvā mahāratham | paśyatāṃ kauraveyāṇāṃ vinanarda mahābalaḥ

भीम ने भी उस महारथी को बाणों के समूह से ढककर कौरवों के देखते-देखते जोर से गर्जना की।

श्लोक 30 (8.46.30)

ततः कर्णो भृशं क्रुद्धो दृढमादाय कार्मुकम् । भीमं विव्याध दशभिः कङ्कपत्रैः शिलाशितैः । कार्मुकं चास्य चिच्छेद भल्लेन निशितेन च ॥

tataḥ karṇo bhṛśaṃ kruddho dṛḍhamādāya kārmukam | bhīmaṃ vivyādha daśabhiḥ kaṅkapatraiḥ śilāśitaiḥ | kārmukaṃ cāsya ciccheda bhallena niśitena ca

तब अत्यन्त क्रुद्ध कर्ण ने दृढ़ धनुष लेकर शिला पर तेज किए हुए, कङ्क-पंख वाले दस बाणों से भीम को बींधा और तीखे भल्ल से उसका धनुष भी काट डाला।

श्लोक 31 (8.46.31)

ततो भीमो महाबाहुर्हेमपट्टविभूषितम् । परिघं घोरमादाय मृत्युदण्डमिवापरम् । कर्णस्य निधनाकाङ्क्षी चिक्षेपातिबलो नदन् ॥

tato bhīmo mahābāhurhemapaṭṭavibhūṣitam | parighaṃ ghoramādāya mṛtyudaṇḍamivāparam | karṇasya nidhanākāṅkṣī cikṣepātibalo nadan

तब महाबाहु भीम ने सोने की पट्टियों से सजा हुआ, मृत्यु के दूसरे दण्ड के समान भयंकर परिघ उठाया और कर्ण के वध की इच्छा से गरजते हुए बड़े वेग से उसे फेंका।

श्लोक 32 (8.46.32)

तमापतन्तं परिघं वज्राशनिसमस्वनम् । चिच्छेद बहुधा कर्णः शरैराशीविषोपमैः ॥

tamāpatantaṃ parighaṃ vajrāśanisamasvanam | ciccheda bahudhā karṇaḥ śarairāśīviṣopamaiḥ

वज्र की गड़गड़ाहट-जैसे शब्द वाले उस परिघ को अपनी ओर आता देख कर्ण ने विषैले सर्पों के समान बाणों से उसके अनेक टुकड़े कर दिए।

श्लोक 33 (8.46.33)

ततः कार्मुकमादाय भीमो दृढतरं तदा । छादयामास विशिखैः कर्णं परबलार्दनम् ॥

tataḥ kārmukamādāya bhīmo dṛḍhataraṃ tadā | chādayāmāsa viśikhaiḥ karṇaṃ parabalārdanam

तब भीम ने और भी दृढ़ धनुष लेकर शत्रुसेना को पीड़ित करने वाले कर्ण को बाणों से ढक दिया।

श्लोक 34 (8.46.34)

ततो युद्धमभूद्धोरं कर्णपाण्डवयोर्मृधे । बलीन्द्रयोरिव मुहुः परस्परवधैषिणोः ॥

tato yuddhamabhūddhoraṃ karṇapāṇḍavayormṛdhe | balīndrayoriva muhuḥ parasparavadhaiṣiṇoḥ

तब कर्ण और पाण्डव के बीच वह भयंकर युद्ध हुआ, मानो एक-दूसरे का वध चाहने वाले दो बलशाली अधिपति भिड़ गए हों।

श्लोक 35 (8.46.35)

ततः कर्णो महाराज भीमसेनं त्रिभिः शरैः । आकर्णपूर्णैर्विव्याध दृढमानम्य कार्मुकम् ॥

tataḥ karṇo mahārāja bhīmasenaṃ tribhiḥ śaraiḥ | ākarṇapūrṇairvivyādha dṛḍhamānamya kārmukam

तब, हे महाराज, कर्ण ने धनुष को दृढ़ता से खींचकर कान तक खिंचे हुए तीन बाणों से भीमसेन को बींध दिया।

श्लोक 36 (8.46.36)

सोऽतिविद्धो महेष्वासः कर्णेन बलिनां वरः । घोरमादत्त विशिखं कर्णकायावदारणम् ॥

so'tividdho maheṣvāsaḥ karṇena balināṃ varaḥ | ghoramādatta viśikhaṃ karṇakāyāvadāraṇam

कर्ण से गहरी चोट खाकर बलवानों में श्रेष्ठ उस महाधनुर्धर ने कर्ण के शरीर को चीर डालने वाला भयंकर बाण उठाया।

श्लोक 37 (8.46.37)

तस्य भित्त्वा तनुत्राणं भित्त्वा कायं च सायकः । प्राविशद्वरणीं राजन्वल्मीकमिव पन्नगः ॥

tasya bhittvā tanutrāṇaṃ bhittvā kāyaṃ ca sāyakaḥ | prāviśadvaraṇīṃ rājanvalmīkamiva pannagaḥ

हे राजन्, वह बाण उसके कवच और शरीर को भेदकर वैसे ही धरती में समा गया, जैसे साँप बाँबी में घुस जाता है।

श्लोक 38 (8.46.38)

स तेनातिप्रहारेण व्यथितो विह्वलन्निव । सञ्चचाल रथे कर्णः क्षितिकम्पे यथाऽचलः ॥

sa tenātiprahāreṇa vyathito vihvalanniva | sañcacāla rathe karṇaḥ kṣitikampe yathā'calaḥ

उस प्रबल प्रहार से व्यथित और मानो मूर्च्छित-सा कर्ण रथ पर वैसे ही डगमगा गया, जैसे भूकम्प में पर्वत हिलता है।

श्लोक 39 (8.46.39)

ततः कर्णो महाराज रोषामर्षसमन्वितः । भीमं तं पञ्चविंशत्या नाराचानां समार्पयत् ॥

tataḥ karṇo mahārāja roṣāmarṣasamanvitaḥ | bhīmaṃ taṃ pañcaviṃśatyā nārācānāṃ samārpayat

तब, हे महाराज, रोष और अमर्ष से भरे कर्ण ने भीम पर पच्चीस नाराच चलाए।

श्लोक 40 (8.46.40)

चिच्छेद कार्मुकं तूर्णं पाण्डवस्याशु पत्रिणा ॥

ciccheda kārmukaṃ tūrṇaṃ pāṇḍavasyāśu patriṇā

उसने शीघ्र ही एक पंखदार बाण से पाण्डव का धनुष काट डाला।

श्लोक 41 (8.46.41)

ततो मुहूर्ताद्राजेन्द्र नातिकृच्छ्राद्धसन्निव । विरथं भीमकर्माणं भीमं कर्णश्चकार ह ॥

tato muhūrtādrājendra nātikṛcchrāddhasanniva | virathaṃ bhīmakarmāṇaṃ bhīmaṃ karṇaścakāra ha

तब, हे राजेन्द्र, कर्ण ने क्षण भर में, बिना विशेष कष्ट के, मानो हँसते हुए, भयंकर कर्म करने वाले भीम को रथहीन कर दिया।

श्लोक 42 (8.46.42)

विरथो भरतश्रेष्ठ प्रहसन्ननिलोपमः । गदां गृह्य महाबाहुरपतत्स्यन्दनोत्तमात् ॥

viratho bharataśreṣṭha prahasannanilopamaḥ | gadāṃ gṛhya mahābāhurapatatsyandanottamāt

हे भरतश्रेष्ठ, रथहीन हुआ वायु के समान वेगवान महाबाहु भीम हँसते हुए गदा लेकर अपने उत्तम रथ से कूद पड़ा।

श्लोक 43 (8.46.43)

गदया च महाराज कर्णस्य रथकूबरम् । पोथयामास सङ्क्रुद्धः समरे शत्रुतापनः ॥

gadayā ca mahārāja karṇasya rathakūbaram | pothayāmāsa saṅkruddhaḥ samare śatrutāpanaḥ

और हे महाराज, क्रोध में भरे उस शत्रुतापन ने गदा से युद्ध में कर्ण के रथ की धुरी के ढाँचे को चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 44 (8.46.44)

स क्रोधवशमापन्नः पाण्डुपुत्रः प्रतापवान् । विद्राव्य गदया वीरस्तव पुत्रान्महाहवे ॥

sa krodhavaśamāpannaḥ pāṇḍuputraḥ pratāpavān | vidrāvya gadayā vīrastava putrānmahāhave

क्रोध के वश में आए प्रतापी पाण्डुपुत्र वीर ने उस महायुद्ध में गदा से आपके पुत्रों को खदेड़कर—

श्लोक 45 (8.46.45)

नागान्सप्तशतान्राजन्नीषादन्तान्प्रहारिणः । व्यधमत्सहसा भीमः क्रुद्धरूपः परन्तपः ॥

nāgānsaptaśatānrājannīṣādantānprahāriṇaḥ | vyadhamatsahasā bhīmaḥ kruddharūpaḥ parantapaḥ

हे राजन्, शत्रुओं को तपाने वाले भीम ने क्रोध में भरकर हल की ईषा के समान दाँतों वाले, प्रहार करने वाले सात सौ हाथियों को सहसा मार गिराया।

श्लोक 46 (8.46.46)

दन्तवेष्टेषु नेत्रेषु कुम्भेषु च कटेषु च । मर्मस्वपि च मर्मज्ञस्तान्नागानवधीद्बली ॥

dantaveṣṭeṣu netreṣu kumbheṣu ca kaṭeṣu ca | marmasvapi ca marmajñastānnāgānavadhīdbalī

मर्मों को जानने वाले उस बली ने उन हाथियों को दाँतों के मूल, आँखों, गण्डस्थलों और कनपटियों पर तथा अन्य मर्मस्थानों पर भी चोट करके मार डाला।

श्लोक 47 (8.46.47)

अर्दिता भीमसेनेन विनदन्तो भृशातुराः । ततस्ते प्राद्रवन्भीताः प्रहताश्च पुनःपुनः । महामात्रास्तमावव्रुर्मेघा इव दिवाकरम् ॥

arditā bhīmasenena vinadanto bhṛśāturāḥ | tataste prādravanbhītāḥ prahatāśca punaḥpunaḥ | mahāmātrāstamāvavrurmeghā iva divākaram

भीमसेन से पीड़ित, चिंघाड़ते और अत्यन्त व्याकुल वे हाथी बार-बार मार खाकर भयभीत हो भागे; और उनके महावतों ने उसे सूर्य को घेरने वाले मेघों की तरह घेर लिया।

श्लोक 48 (8.46.48)

तान्स सप्तशतान्नागान्सारोहायुधकेतनान् । भूमिष्ठो गदया जघ्ने वज्रेणेन्द्र इवाचलान् ॥

tānsa saptaśatānnāgānsārohāyudhaketanān | bhūmiṣṭho gadayā jaghne vajreṇendra ivācalān

भूमि पर खड़े होकर उसने सवारों, आयुधों और ध्वजाओं सहित उन सात सौ हाथियों को गदा से वैसे ही मार गिराया, जैसे इन्द्र वज्र से पर्वतों को गिराता है।

श्लोक 49 (8.46.49)

ततः सुबलपुत्रस्य नागानतिबलान्पुनः । पोथयामास कौन्तेयो द्विपञ्चाशदरिन्दमः ॥

tataḥ subalaputrasya nāgānatibalānpunaḥ | pothayāmāsa kaunteyo dvipañcāśadarindamaḥ

तब शत्रुदमन कुन्तीपुत्र ने सुबलपुत्र के बावन और अति बलवान हाथियों को कुचल डाला।

श्लोक 50 (8.46.50)

तथा रथशतं साग्रं पत्तींश्च शतशोऽपरान् । न्यहनत्पाण्डवो युद्धे तापयंस्तव वाहिनीम् ॥

tathā rathaśataṃ sāgraṃ pattīṃśca śataśo'parān | nyahanatpāṇḍavo yuddhe tāpayaṃstava vāhinīm

और पाण्डव ने युद्ध में सौ से अधिक रथों तथा सैकड़ों अन्य पैदल सैनिकों को मार डाला और आपकी सेना को तपा डाला।

श्लोक 51 (8.46.51)

प्रताप्यमानं सूर्येण भीमेन च महात्मना । तव सैन्यं सञ्चुकोच चर्माग्नावाहितं यथा ॥

pratāpyamānaṃ sūryeṇa bhīmena ca mahātmanā | tava sainyaṃ sañcukoca carmāgnāvāhitaṃ yathā

महात्मा भीम से सूर्य की भाँति तपाई जाती हुई आपकी सेना आग पर रखे चमड़े की तरह सिकुड़ गई।

श्लोक 52 (8.46.52)

ते भीमभयसन्त्रस्तास्तावका भरतर्षभ । विहाय समरे कर्णं दुद्रुवुर्वै दिशो दश ॥

te bhīmabhayasantrastāstāvakā bharatarṣabha | vihāya samare karṇaṃ dudruvurvai diśo daśa

हे भरतश्रेष्ठ, भीम के भय से त्रस्त आपके वे योद्धा रण में कर्ण को छोड़कर दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 53 (8.46.53)

रथाः पञ्चशताश्चान्ये हादिनः शरवर्षिणः । भीममभ्यद्रवन्घ्नन्तः शरपूगैः समन्ततः ॥

rathāḥ pañcaśatāścānye hādinaḥ śaravarṣiṇaḥ | bhīmamabhyadravanghnantaḥ śarapūgaiḥ samantataḥ

गरजते और बाणों की वर्षा करते हुए अन्य पाँच सौ रथ चारों ओर से बाणों की झड़ी लगाते हुए भीम पर टूट पड़े।

श्लोक 54 (8.46.54)

तान्स पञ्चशतान्वीरान्सपताकध्वजायुधान् । पोथयामास गदया भीमो विष्णुरिवासुरान् ॥

tānsa pañcaśatānvīrānsapatākadhvajāyudhān | pothayāmāsa gadayā bhīmo viṣṇurivāsurān

भीम ने पताकाओं, ध्वजाओं और आयुधों सहित उन पाँच सौ वीरों को गदा से वैसे ही कुचल दिया, जैसे विष्णु ने असुरों को कुचला था।

श्लोक 55 (8.46.55)

ततः शकुनिनिर्दिष्टाः सादिनः शूरसम्मताः । त्रिसाहस्राण्यभिययुः शरशक्त्यृष्टिपाणयः ॥

tataḥ śakuninirdiṣṭāḥ sādinaḥ śūrasammatāḥ | trisāhasrāṇyabhiyayuḥ śaraśaktyṛṣṭipāṇayaḥ

तब शकुनि की भेजी हुई, शूरों में मान्य, तीन हज़ार घुड़सवारों की टुकड़ी बाण, शक्ति और ऋष्टि हाथ में लिए आगे बढ़ी।

श्लोक 56 (8.46.56)

तान्प्रत्युद्गम्य यवनान्साश्वारोहांस्तदाऽरिहा । विविधान्विचरन्मार्गान्गदया समपोथयत् ॥

tānpratyudgamya yavanānsāśvārohāṃstadā'rihā | vividhānvicaranmārgāngadayā samapothayat

शत्रुहन्ता भीम ने सामने जाकर अनेक प्रकार के मार्गों में विचरते हुए उन यवनों को घोड़ों और सवारों सहित गदा से मार गिराया।

श्लोक 57 (8.46.57)

तेषामासीन्महाञ्छब्दस्ताडितानां च सर्वशः । अग्निभिर्दह्यमानानां नलानामिव भारत ॥

teṣāmāsīnmahāñchabdastāḍitānāṃ ca sarvaśaḥ | agnibhirdahyamānānāṃ nalānāmiva bhārata

हे भारत, सब ओर से मारे जाते हुए उनका बड़ा भारी शब्द उठा, जैसे आग में जलते नरकटों का होता है।

श्लोक 58 (8.46.58)

एवं सुबलपुत्रस्य त्रिसाहस्रान्हयोत्तमान् । हत्वाऽन्यं रथमास्थाय क्रुद्धो राधेयमभ्ययात् ॥

evaṃ subalaputrasya trisāhasrānhayottamān | hatvā'nyaṃ rathamāsthāya kruddho rādheyamabhyayāt

इस प्रकार सुबलपुत्र के तीन हज़ार उत्तम घोड़ों को मारकर और दूसरे रथ पर चढ़कर वह क्रुद्ध होकर राधापुत्र की ओर बढ़ा।

श्लोक 59 (8.46.59)

कर्णोऽपि समरे राजन्धर्मपुत्रमरिन्दमम् । स शरैश्छादयामास सारथिं चाप्यपातयत् ॥

karṇo'pi samare rājandharmaputramarindamam | sa śaraiśchādayāmāsa sārathiṃ cāpyapātayat

हे राजन्, कर्ण ने भी युद्ध में शत्रुदमन धर्मपुत्र को बाणों से ढक दिया और उसके सारथि को गिरा दिया।

श्लोक 60 (8.46.60)

ततः स प्रद्रुतं सैन्यं दृष्ट्वा कर्णो महारथः । अन्वधावत्किरन्बाणैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः ॥

tataḥ sa pradrutaṃ sainyaṃ dṛṣṭvā karṇo mahārathaḥ | anvadhāvatkiranbāṇaiḥ kaṅkapatrairajihmagaiḥ

तब महारथी कर्ण ने उस सेना को भागते देखकर कङ्क-पंख वाले सीधे जाने वाले बाणों की वर्षा करते हुए उसका पीछा किया।

श्लोक 61 (8.46.61)

राजानमभिधावन्तं शरैरावृत्य रोदसी । क्रुद्धः प्रच्छादयामास शरजालेन मारुतिः ॥

rājānamabhidhāvantaṃ śarairāvṛtya rodasī | kruddhaḥ pracchādayāmāsa śarajālena mārutiḥ

राजा का पीछा करते हुए कर्ण पर, आकाश और पृथ्वी को बाणों से भरकर, वायुपुत्र भीम ने क्रुद्ध होकर बाणों का जाल बिछा दिया।

श्लोक 62 (8.46.62)

सन्निवृत्तस्ततस्तूर्णं राधेयः शत्रुकर्शनः । भीमं प्रच्छादयामास समन्तान्निशितैः शरैः ॥

sannivṛttastatastūrṇaṃ rādheyaḥ śatrukarśanaḥ | bhīmaṃ pracchādayāmāsa samantānniśitaiḥ śaraiḥ

तब शत्रुओं को पीड़ित करने वाला राधेय शीघ्र लौट पड़ा और उसने भीम को चारों ओर से तीखे बाणों से ढक दिया।

श्लोक 63 (8.46.63)

भीमसेनरथप्रेप्सुं कर्णं भारत सात्यकिः । अभ्यर्दयदमेयात्मा पार्ष्णिग्रहणकारणात् ॥

bhīmasenarathaprepsuṃ karṇaṃ bhārata sātyakiḥ | abhyardayadameyātmā pārṣṇigrahaṇakāraṇāt

हे भारत, भीमसेन के रथ तक पहुँचना चाहने वाले कर्ण को अमितात्मा सात्यकि ने भीम के पृष्ठभाग की रक्षा के लिए पीड़ित किया।

श्लोक 64 (8.46.64)

भीमसेनरथप्रेप्सुं कर्णो भारत सात्यकिम् । अभ्यवर्तत शैनेयमर्दयञ्छरवृष्टिभिः ॥

bhīmasenarathaprepsuṃ karṇo bhārata sātyakim | abhyavartata śaineyamardayañcharavṛṣṭibhiḥ

हे भारत, भीमसेन के रथ तक पहुँचना चाहने वाला कर्ण बाणों की वर्षा से शिनिपौत्र सात्यकि को पीड़ित करते हुए उसकी ओर मुड़ा।

श्लोक 65 (8.46.65)

तावन्योन्यं समासाद्य वृषभौ सर्वधन्विनाम् । विसृजन्तौ शरान्दीप्तान्विभ्राजेतां मनस्विनौ ॥

tāvanyonyaṃ samāsādya vṛṣabhau sarvadhanvinām | visṛjantau śarāndīptānvibhrājetāṃ manasvinau

समस्त धनुर्धारियों में वृषभ के समान वे दोनों मनस्वी वीर एक-दूसरे से भिड़कर दीप्त बाण छोड़ते हुए शोभित हुए।

श्लोक 66 (8.46.66)

ताभ्यां वियति राजेन्द्र विततं भीमदर्शनम् । क्रौञ्चपृष्ठारुणं रौद्रं बाणजालं व्यदृश्यत ॥

tābhyāṃ viyati rājendra vitataṃ bhīmadarśanam | krauñcapṛṣṭhāruṇaṃ raudraṃ bāṇajālaṃ vyadṛśyata

हे राजेन्द्र, उन दोनों से आकाश में क्रौञ्च पक्षी की पीठ के समान अरुण, फैला हुआ भयंकर और भीषण बाणों का जाल दिखाई दिया।

श्लोक 67 (8.46.67)

नैव सूर्यप्रभा राजन्न दिशः प्रदिशस्तथा । प्राज्ञासिष्म वयं ते वा शरैर्मुक्तैः सहस्रशः ॥

naiva sūryaprabhā rājanna diśaḥ pradiśastathā | prājñāsiṣma vayaṃ te vā śarairmuktaiḥ sahasraśaḥ

हे राजन्, उनके छोड़े हज़ारों बाणों के कारण हम न सूर्य की प्रभा को, न दिशाओं-उपदिशाओं को और न उन दोनों को पहचान पाए।

श्लोक 68 (8.46.68)

मध्याह्ने तपतो राजन्भास्करस्य महाप्रभाः । हृताः सर्वाः शरौघैस्तैः कर्णमाधवयोस्तदा ॥

madhyāhne tapato rājanbhāskarasya mahāprabhāḥ | hṛtāḥ sarvāḥ śaraughaistaiḥ karṇamādhavayostadā

हे राजन्, दोपहर में तपते सूर्य की प्रखर प्रभा को उस समय कर्ण और माधव के बाणों की उन धाराओं ने पूरी तरह हर लिया।

श्लोक 69 (8.46.69)

सौबलं कृतवर्माणं द्रौणिमाधिरथिं कृपम् । संसक्तान्पाण्डवैर्दृष्ट्वा निवृत्ताः कुरवः पुनः ॥

saubalaṃ kṛtavarmāṇaṃ drauṇimādhirathiṃ kṛpam | saṃsaktānpāṇḍavairdṛṣṭvā nivṛttāḥ kuravaḥ punaḥ

शकुनि, कृतवर्मा, द्रोणपुत्र, अधिरथपुत्र और कृप को पाण्डवों से भिड़ा हुआ देखकर कौरव फिर लौट पड़े।

श्लोक 70 (8.46.70)

तेषामापततां शब्दस्तीत्र आसीद्विशाम्पते । उद्वृत्तानां यथा वृष्ट्या सागराणां भयावहः ॥

teṣāmāpatatāṃ śabdastītra āsīdviśāmpate | udvṛttānāṃ yathā vṛṣṭyā sāgarāṇāṃ bhayāvahaḥ

हे प्रजापति, लौटकर आते हुए उनका शब्द तीव्र था, वर्षा से उमड़े हुए सागरों की तरह भयावह।

श्लोक 71 (8.46.71)

ते सेने भृशसंसक्ते दृष्ट्वाऽन्योन्यं महाहवे । हर्षेण महता युक्ते परिगृह्य परस्परम् ॥

te sene bhṛśasaṃsakte dṛṣṭvā'nyonyaṃ mahāhave | harṣeṇa mahatā yukte parigṛhya parasparam

उस महायुद्ध में एक-दूसरे को निकट भिड़ा देखकर दोनों सेनाएँ बड़े हर्ष से भरकर परस्पर गुँथ गईं।

श्लोक 72 (8.46.72)

ततः प्रववृते युद्धं मध्यं प्राप्ते दिवाकरे । यादृशं नैवमस्माभिर्दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ madhyaṃ prāpte divākare | yādṛśaṃ naivamasmābhirdṛṣṭapūrvaṃ na ca śrutam

तब सूर्य के आकाश के मध्य में पहुँचने पर ऐसा युद्ध छिड़ा, जैसा हमने पहले न कभी देखा था, न सुना था।

श्लोक 73 (8.46.73)

बलौघस्तु समासाद्य बलौघं सहसा रणे । उपासर्पत वेगेन वार्योघ इव सागरम् ॥

balaughastu samāsādya balaughaṃ sahasā raṇe | upāsarpata vegena vāryogha iva sāgaram

सेना की धारा रण में सहसा दूसरी सेना की धारा से मिलकर वेग से वैसे ही बढ़ी, जैसे जल की धारा सागर की ओर बढ़ती है।

श्लोक 74 (8.46.74)

आसीन्निनादः सुमहान्बाणौघानां परस्परम् । गर्जतां सागरौघाणां यथा स्यान्निःस्वनो महान् ॥

āsīnninādaḥ sumahānbāṇaughānāṃ parasparam | garjatāṃ sāgaraughāṇāṃ yathā syānniḥsvano mahān

दोनों ओर बाणों की धाराओं का बड़ा भारी निनाद उठा, जैसे गरजते महासागरों की धाराओं का महाघोष होता है।

श्लोक 75 (8.46.75)

ते तु सेने समासाद्य वेगवत्यौ परस्परम् । एकीभावमनुप्राप्ते नद्याविव समागमे ॥

te tu sene samāsādya vegavatyau parasparam | ekībhāvamanuprāpte nadyāviva samāgame

वेगवती नदियों के समान वे दोनों सेनाएँ एक-दूसरे से मिलकर संगम पर मिली दो नदियों की तरह एक हो गईं।

श्लोक 76 (8.46.76)

ततः प्रववृते युद्धं घोररूपं विशाम्पते । कुरूणां पाण्डवानां च लिप्सतां सुमहद्यशः ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ ghorarūpaṃ viśāmpate | kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca lipsatāṃ sumahadyaśaḥ

तब, हे प्रजापति, महान यश की इच्छा रखने वाले कौरवों और पाण्डवों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 77 (8.46.77)

शूराणां गर्जतां तत्र ह्यविच्छेदकृता गिरः । श्रूयन्ते विविधा राजन्नामान्युद्दिश्य भारत ॥

śūrāṇāṃ garjatāṃ tatra hyavicchedakṛtā giraḥ | śrūyante vividhā rājannāmānyuddiśya bhārata

हे राजन्, वहाँ गरजते हुए वीरों की निरन्तर पुकारें सुनाई देती थीं, जिनमें, हे भारत, वे नाम ले-लेकर एक-दूसरे को ललकारते थे।

श्लोक 78 (8.46.78)

यस्य यद्धि रणे व्यङ्गं पितृतो मातृतोऽपि वा । कर्मतः शीलतो वाऽपि स तच्छ्रावयते युधि ॥

yasya yaddhi raṇe vyaṅgaṃ pitṛto mātṛto'pi vā | karmataḥ śīlato vā'pi sa tacchrāvayate yudhi

जिसके पिता या माता के कुल से, कर्म से अथवा शील से जो भी दोष रहा हो, वही दोष उसे रण में सुनाया जाता था।

श्लोक 79 (8.46.79)

तान्दृष्ट्वा समरे शूरांस्तर्जमानान्परस्परम् । अभवन्मे मती राजन्नैषामस्तीति जीवितम् ॥

tāndṛṣṭvā samare śūrāṃstarjamānānparasparam | abhavanme matī rājannaiṣāmastīti jīvitam

हे राजन्, रण में उन वीरों को एक-दूसरे को धमकाते देखकर मुझे लगा कि इनके प्राण नहीं बचेंगे।

श्लोक 80 (8.46.80)

तेषां दृष्ट्वा तु क्रुद्धानां वपूंष्यमिततेजसाम् । अभवन्मे भयं तीव्रं कथमेतद्भविष्यति ॥

teṣāṃ dṛṣṭvā tu kruddhānāṃ vapūṃṣyamitatejasām | abhavanme bhayaṃ tīvraṃ kathametadbhaviṣyati

उन क्रुद्ध, अमित तेजस्वी वीरों के शरीर देखकर मुझे बड़ा भय हुआ कि यह कैसे समाप्त होगा।

श्लोक 81 (8.46.81)

ततस्ते पाण्डवा राजन्कौरवाश्च महारथाः । ततक्षुः सायकैस्तूर्णमन्योन्यं विजयैषिणः ॥

tataste pāṇḍavā rājankauravāśca mahārathāḥ | tatakṣuḥ sāyakaistūrṇamanyonyaṃ vijayaiṣiṇaḥ

तब, हे राजन्, पाण्डव और कौरव महारथी विजय की इच्छा से शीघ्रता से एक-दूसरे को बाणों से छलनी करने लगे।

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