कर्ण पर्व · अध्याय 48
अर्जुन संशप्तकों और सुशर्मा पर विजय पाते हैं
सञ्जय बताते हैं कि सुशर्मा अर्जुन और कृष्ण को बाणों से घायल करता है और अर्जुन की ध्वजा को बींधता है; ध्वजा के वानर की गर्जना से कौरव-सेना भय के मारे ठिठक जाती है। संशप्तक अर्जुन के रथ पर चढ़कर उसे जकड़ लेते हैं, किन्तु अर्जुन उन्हें झटक देते हैं, देवदत्त शङ्ख बजाते हैं जिसका उत्तर कृष्ण पाञ्चजन्य से देते हैं, और नागास्त्र से उनके पैर बाँधकर उन्हें मार डालते हैं। सुशर्मा सौपर्ण अस्त्र से उन्हें छुड़ा लेता है और अर्जुन को घायल करता है; अर्जुन क्षण-भर बैठ जाते हैं, फिर सँभलकर ऐन्द्र अस्त्र से हजारों को और मार गिराते हैं, और संशप्तक विजय या मृत्यु का निश्चय करके फिर उन्हें घेर लेते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.48.1)
वर्तमाने तथा युद्धे क्षत्रियाणां निमज्जने । गाण्डीवस्य महाघोषः श्रूयते युधि मारिष ॥
vartamāne tathā yuddhe kṣatriyāṇāṃ nimajjane | gāṇḍīvasya mahāghoṣaḥ śrūyate yudhi māriṣa
हे माननीय! जब वह युद्ध चल रहा था और क्षत्रिय उसमें डूबते जा रहे थे, तब रणभूमि में गाण्डीव की भारी गर्जना सुनाई दे रही थी।
श्लोक 2 (8.48.2)
संशप्तकानामकरोत्कदनं यत्र पाण्डवः । कोसलानां तथा राजन्नारायणबलस्य च ॥
saṃśaptakānāmakarotkadanaṃ yatra pāṇḍavaḥ | kosalānāṃ tathā rājannārāyaṇabalasya ca
वह गर्जना वहाँ सुनाई दे रही थी, जहाँ पाण्डुपुत्र अर्जुन संशप्तकों, कोसलों और नारायणी सेना का संहार कर रहे थे, हे राजन्।
श्लोक 3 (8.48.3)
संशप्तकास्तु समरे शरवृष्टिं समन्ततः । अपातयन्पार्थमूर्ध्नि जयगृद्धाः प्रमन्यवः ॥
saṃśaptakāstu samare śaravṛṣṭiṃ samantataḥ | apātayanpārthamūrdhni jayagṛddhāḥ pramanyavaḥ
विजय के लालची और क्रोध से भरे संशप्तक युद्ध में चारों ओर से पार्थ के मस्तक पर बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 4 (8.48.4)
तां शस्त्रवृष्टिमायान्तीमुरसा धारयन्प्रभुः । व्यगाहत परान्पार्थो विनिघ्नन्रथिनां वरान् ॥
tāṃ śastravṛṣṭimāyāntīmurasā dhārayanprabhuḥ | vyagāhata parānpārtho vinighnanrathināṃ varān
सामने आती हुई उस शस्त्र-वर्षा को छाती पर सहते हुए प्रभु पार्थ शत्रुओं के बीच घुस गए और श्रेष्ठ रथियों को मारते चले गए।
श्लोक 5 (8.48.5)
विक्षोभ्य तु रथानीकं कङ्कपत्रैः शिलाशितैः । आससाद ततः पार्थः सुशर्माणं महारथम् ॥
vikṣobhya tu rathānīkaṃ kaṅkapatraiḥ śilāśitaiḥ | āsasāda tataḥ pārthaḥ suśarmāṇaṃ mahāratham
शिला पर तेज किए हुए कङ्कपत्र बाणों से रथ-सेना को विचलित करके पार्थ फिर महारथी सुशर्मा के सामने जा पहुँचे।
श्लोक 6 (8.48.6)
स तस्य शरवर्षाणि ववर्ष रथिनां वरः । तथा संशप्तकाश्चैव पार्थस्य समरे स्थिताः ॥
sa tasya śaravarṣāṇi vavarṣa rathināṃ varaḥ | tathā saṃśaptakāścaiva pārthasya samare sthitāḥ
रथियों में श्रेष्ठ उस वीर ने उस पर बाणों की झड़ी लगा दी, और संशप्तक भी युद्ध में पार्थ के सामने डटकर बाण बरसाने लगे।
श्लोक 7 (8.48.7)
सुशर्मा तु ततः पार्थं विद्ध्वा दशभिराशुगैः । जनार्दनं त्रिभिर्बाणैरहनद्दक्षिणे भुजे ॥
suśarmā tu tataḥ pārthaṃ viddhvā daśabhirāśugaiḥ | janārdanaṃ tribhirbāṇairahanaddakṣiṇe bhuje
तब सुशर्मा ने पार्थ को दस तीखे बाणों से और जनार्दन की दाहिनी भुजा को तीन बाणों से घायल किया।
श्लोक 8 (8.48.8)
ततोऽपरेण भल्लेन केतुं पार्थस्य मारिष । विव्याध समरे राजन्सुशर्मा क्रोधमूर्च्छितः ॥
tato'pareṇa bhallena ketuṃ pārthasya māriṣa | vivyādha samare rājansuśarmā krodhamūrcchitaḥ
फिर, हे राजन्, क्रोध से मूर्च्छित-सा हुआ सुशर्मा युद्ध में एक और भल्ल से पार्थ की ध्वजा को बींध बैठा।
श्लोक 9 (8.48.9)
स वानरवरो राजन्विश्वकर्मकृतो महान् । ननाद सुमहानादं नृत्यन्निव विभीषयन् ॥
sa vānaravaro rājanviśvakarmakṛto mahān | nanāda sumahānādaṃ nṛtyanniva vibhīṣayan
विश्वकर्मा के बनाए हुए वह महान् श्रेष्ठ वानर नाचता-सा हुआ बड़ी भारी गर्जना कर उठा और सबको डराने लगा।
श्लोक 10 (8.48.10)
कपेस्तु निनदं श्रुत्वा सन्त्रस्ता तव वाहिनी । भयं विपुलमासाद्य निश्चेष्टा समपद्यत ॥
kapestu ninadaṃ śrutvā santrastā tava vāhinī | bhayaṃ vipulamāsādya niśceṣṭā samapadyata
उस वानर की गर्जना सुनकर आपकी सेना घबरा गई और भारी भय में पड़कर निश्चेष्ट हो गई।
श्लोक 11 (8.48.11)
ततः सा शुशुभे सेना निश्चेष्टाऽवस्थिता नृप । नानापुष्पसमाकीर्णं यथा चित्रीकृतं वनम् ॥
tataḥ sā śuśubhe senā niśceṣṭā'vasthitā nṛpa | nānāpuṣpasamākīrṇaṃ yathā citrīkṛtaṃ vanam
तब हे राजन्, निश्चल खड़ी वह सेना ऐसी शोभित हुई, जैसे अनेक फूलों से भरा हुआ कोई चित्रित वन हो।
श्लोक 12 (8.48.12)
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां योधास्ते कुरुसत्तम । अर्जुनं सिषिचुर्बाणैः पर्वतं जलदा इव ॥
pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ yodhāste kurusattama | arjunaṃ siṣicurbāṇaiḥ parvataṃ jaladā iva
फिर होश सँभालकर वे योद्धा, हे कुरुश्रेष्ठ, अर्जुन पर बाणों की वर्षा करने लगे, जैसे बादल पर्वत को सींचते हैं।
श्लोक 13 (8.48.13)
सञ्छाद्य समरे पार्थं परिवव्रुः समन्ततः । ते हयान्रथचक्रे तु रथेषां चापि मारिष । ग्रहीतुं प्रचक्रमुश्चैव क्रोधाविष्टाः समन्ततः ॥
sañchādya samare pārthaṃ parivavruḥ samantataḥ | te hayānrathacakre tu ratheṣāṃ cāpi māriṣa | grahītuṃ pracakramuścaiva krodhāviṣṭāḥ samantataḥ
वे क्रोध में भरकर युद्ध में पार्थ को ढककर चारों ओर से घेर बैठे, और हे माननीय, उनके घोड़ों, रथ के पहियों और रथ के ईषादण्ड को भी चारों ओर से पकड़ने का यत्न करने लगे।
श्लोक 14 (8.48.14)
निगृह्य तु रथं तस्य योधास्ते तु सहस्रशः । रथबन्धं प्रचक्रुर्हि पाण्डवस्यामितौजसः ॥
nigṛhya tu rathaṃ tasya yodhāste tu sahasraśaḥ | rathabandhaṃ pracakrurhi pāṇḍavasyāmitaujasaḥ
उनके रथ को पकड़कर हजारों योद्धाओं ने अपार तेजस्वी पाण्डव के रथ को जकड़ लिया।
श्लोक 15 (8.48.15)
रथमारुरुहुः केचित्कृष्णपार्थौ जिघृक्षवः । संशप्तकानां योधास्ते सिंहनादांश्च नेदिरे ॥
rathamāruruhuḥ kecitkṛṣṇapārthau jighṛkṣavaḥ | saṃśaptakānāṃ yodhāste siṃhanādāṃśca nedire
कुछ लोग कृष्ण और पार्थ को पकड़ने की इच्छा से रथ पर चढ़ गए, और वे संशप्तक योद्धा सिंहनाद करने लगे।
श्लोक 16 (8.48.16)
अपरे जगृहुश्चैव केशवस्य महाभुजौ । पार्थं चैके महाराज रथस्थं जगृहुर्मुदा ॥
apare jagṛhuścaiva keśavasya mahābhujau | pārthaṃ caike mahārāja rathasthaṃ jagṛhurmudā
दूसरों ने केशव की विशाल भुजाएँ पकड़ लीं, और कुछ ने, हे महाराज, रथ पर खड़े पार्थ को आनन्द से पकड़ लिया।
श्लोक 17 (8.48.17)
अच्युतः स महाबाहुर्विधुन्वन्रणमूर्धनि । पातयामास तान्सर्वान्दुष्टहस्तीव हस्तिपान् ॥
acyutaḥ sa mahābāhurvidhunvanraṇamūrdhani | pātayāmāsa tānsarvānduṣṭahastīva hastipān
महाबाहु अच्युत ने रणभूमि के अग्रभाग में उन्हें झटककर सबको वैसे ही गिरा दिया, जैसे दुष्ट हाथी अपने महावतों को गिरा देता है।
श्लोक 18 (8.48.18)
स रथस्तैर्गृहीतस्तु पाण्डवस्य महात्मनः । स्पन्दितुं नाशकद्राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
sa rathastairgṛhītastu pāṇḍavasya mahātmanaḥ | spandituṃ nāśakadrājaṃstadadbhutamivābhavat
किन्तु उनके पकड़े जाने से महात्मा पाण्डव का वह रथ, हे राजन्, हिल भी न सका, और यह एक अद्भुत बात-सी हुई।
श्लोक 19 (8.48.19)
ततः पार्थो महाबाहुः संवृतस्तैर्महारथैः । निगृहीतं रथं दृष्ट्वा तांश्चाप्याद्रवतो बहून् ॥
tataḥ pārtho mahābāhuḥ saṃvṛtastairmahārathaiḥ | nigṛhītaṃ rathaṃ dṛṣṭvā tāṃścāpyādravato bahūn
तब उन महारथियों से घिरे हुए महाबाहु पार्थ ने अपने रथ को जकड़ा हुआ देखा और यह भी देखा कि बहुत-से योद्धा उन पर टूट रहे हैं,
श्लोक 20 (8.48.20)
रथारूढांश्च सुबहून्पदाऽऽक्षिप्य न्यपातयत् । अपातयदसम्भ्रान्तः शरैरासन्नयोधिभिः ॥
rathārūḍhāṃśca subahūnpadā''kṣipya nyapātayat | apātayadasambhrāntaḥ śarairāsannayodhibhiḥ
और रथ पर चढ़े हुए बहुत-से योद्धाओं को पैर की ठोकर से हटाकर गिरा दिया; फिर निकट से लड़ने वालों को भी वे बिना घबराए बाणों से मार गिराने लगे।
श्लोक 21 (8.48.21)
तांस्तापयित्वा समरे पार्थः परपुरञ्जयः । स्मयन्निव महाबाहुः केशवं वाक्यमब्रवीत् ॥
tāṃstāpayitvā samare pārthaḥ parapurañjayaḥ | smayanniva mahābāhuḥ keśavaṃ vākyamabravīt
युद्ध में उन्हें तपाकर शत्रुओं के नगर जीतने वाले महाबाहु पार्थ ने मानो मुस्कराते हुए केशव से कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 22 (8.48.22)
पश्य कृष्ण महाबाहो संशप्तकगणान्बहून् । कुर्वतोऽसुकरं कर्म मुमूर्षून्कालचोदितान् ॥
paśya kṛṣṇa mahābāho saṃśaptakagaṇānbahūn | kurvato'sukaraṃ karma mumūrṣūnkālacoditān
“हे महाबाहु कृष्ण, देखिए, काल की प्रेरणा से मरने को तैयार ये बहुत-से संशप्तक-गण कितना कठिन काम कर रहे हैं।
श्लोक 23 (8.48.23)
रथबन्धमिमं प्राप्य पृथिव्यां नास्ति कश्चन । यः सहेत पुमाँल्लोके मदन्यः क्षत्रियर्षभः ॥
rathabandhamimaṃ prāpya pṛthivyāṃ nāsti kaścana | yaḥ saheta pumām̐lloke madanyaḥ kṣatriyarṣabhaḥ
इस रथ-बन्धन में पड़कर इसे सह सकने वाला मेरे सिवा कोई दूसरा क्षत्रिय-श्रेष्ठ इस पृथ्वी पर, इस लोक में नहीं है।
श्लोक 24 (8.48.24)
पश्यैतानद्य समरे मत्प्रयुक्तैः सुतेजनैः । पात्यमानान्रणे कृष्ण शरैराशीविषोपमैः ॥
paśyaitānadya samare matprayuktaiḥ sutejanaiḥ | pātyamānānraṇe kṛṣṇa śarairāśīviṣopamaiḥ
देखिए, हे कृष्ण, मेरे चलाए हुए तेज धार वाले, विषैले सर्पों जैसे बाणों से आज ये युद्ध में गिराए जा रहे हैं।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 25 (8.48.25)
इत्येवमुक्त्वा बीभत्सुः शङ्खप्रवरमुत्तमम् । व्यनादयदमेयात्मा देवदत्तं महामृधे ॥
ityevamuktvā bībhatsuḥ śaṅkhapravaramuttamam | vyanādayadameyātmā devadattaṃ mahāmṛdhe
ऐसा कहकर अमित-आत्मबल वाले बीभत्सु ने उस महायुद्ध में अपना श्रेष्ठ, उत्तम शङ्ख देवदत्त बजाया।
श्लोक 26 (8.48.26)
देवदत्तस्वनं श्रुत्वा केशवोऽपि महायशाः । पाञ्चजन्यस्वनं चक्रे पूरयन्निव रोदसी ॥
devadattasvanaṃ śrutvā keśavo'pi mahāyaśāḥ | pāñcajanyasvanaṃ cakre pūrayanniva rodasī
देवदत्त की ध्वनि सुनकर महायशस्वी केशव ने भी पाञ्चजन्य बजाया, मानो द्युलोक और पृथ्वी को भर दिया हो।
श्लोक 27 (8.48.27)
तयोः शङ्खस्वनं श्रुत्वा संशप्तकवरूथिनी । सञ्चचाल महाराज वित्रस्ता चाद्रवद्भृशम् ॥
tayoḥ śaṅkhasvanaṃ śrutvā saṃśaptakavarūthinī | sañcacāla mahārāja vitrastā cādravadbhṛśam
उन दोनों शङ्खों की ध्वनि सुनकर, हे महाराज, संशप्तकों की सेना काँप उठी और अत्यन्त भयभीत होकर भाग चली।
श्लोक 28 (8.48.28)
नागमस्त्रं ततः पार्थः प्रादुश्चक्रे हसन्निव । पादबन्धं स तेषां वै चक्रे तेन महास्त्रवित् ॥
nāgamastraṃ tataḥ pārthaḥ prāduścakre hasanniva | pādabandhaṃ sa teṣāṃ vai cakre tena mahāstravit
तब पार्थ ने मुस्कराते हुए-से नागास्त्र प्रकट किया, और उस महान् अस्त्रवेत्ता ने उसी से उनके पैर बाँध दिए।
श्लोक 29 (8.48.29)
यानुद्दिश्य रणे पार्थः पादबन्धं चकार ह । ते बद्धाः पादबन्धेन योधाः संशप्तकास्तदा ॥
yānuddiśya raṇe pārthaḥ pādabandhaṃ cakāra ha | te baddhāḥ pādabandhena yodhāḥ saṃśaptakāstadā
रणभूमि में पार्थ ने जिन्हें लक्ष्य करके पाद-बन्धन किया था, वे संशप्तक योद्धा उस समय पैर-बन्धन से बँध गए,
श्लोक 30 (8.48.30)
निर्विचेष्टास्तदाऽभूवन्पाण्डवस्यास्त्रतेजसा । निर्विचेष्टांस्ततो योधानवधीत्पाण्डुनन्दनः । यथेन्द्रः समरे दैत्यांस्तारकस्य वधे पुरा ॥
nirviceṣṭāstadā'bhūvanpāṇḍavasyāstratejasā | nirviceṣṭāṃstato yodhānavadhītpāṇḍunandanaḥ | yathendraḥ samare daityāṃstārakasya vadhe purā
और पाण्डव के अस्त्र के तेज से निश्चेष्ट हो गए; तब पाण्डुनन्दन ने उन निश्चेष्ट योद्धाओं को मार डाला, जैसे पूर्वकाल में तारक के वध के युद्ध में इन्द्र ने दैत्यों को मारा था।
श्लोक 31 (8.48.31)
ते वध्यमानाः समरे मुमुचुस्तं रथोत्तमम् । आयुधानि च सर्वाणि विस्रष्टुमुपचक्रमुः ॥
te vadhyamānāḥ samare mumucustaṃ rathottamam | āyudhāni ca sarvāṇi visraṣṭumupacakramuḥ
युद्ध में मारे जाते हुए उन्होंने उस श्रेष्ठ रथ को छोड़ दिया और अपने सारे शस्त्र भी फेंक देने लगे।
श्लोक 32 (8.48.32)
ततः सुशर्मा राजेन्द्र गृहीतां वीक्ष्य वाहिनीम् । सौपर्णमस्त्रं त्वरितः प्रादुश्चक्रे महारथः ॥
tataḥ suśarmā rājendra gṛhītāṃ vīkṣya vāhinīm | sauparṇamastraṃ tvaritaḥ prāduścakre mahārathaḥ
तब, हे राजेन्द्र, अपनी सेना को बँधी हुई देखकर महारथी सुशर्मा ने शीघ्रता से सौपर्ण अस्त्र प्रकट किया।
श्लोक 33 (8.48.33)
ततः सुपर्णाः सम्पेतुर्भक्षयन्तो भुजङ्गमान् । ततो विदुद्रुवुर्नागास्तान्दृष्ट्वा खेचरान्नृप ॥
tataḥ suparṇāḥ sampeturbhakṣayanto bhujaṅgamān | tato vidudruvurnāgāstāndṛṣṭvā khecarānnṛpa
तब गरुड़ झपटकर सर्पों को खाने लगे, और, हे राजन्, आकाश में उड़ने वाले उन पक्षियों को देखकर नाग भाग खड़े हुए।
श्लोक 34 (8.48.34)
तद्विमुक्तं बलं रेजे पादबन्धाद्विशाम्पते । मेघबन्धाद्यथा मुक्तो भास्करस्तापयन्प्रजाः ॥
tadvimuktaṃ balaṃ reje pādabandhādviśāmpate | meghabandhādyathā mukto bhāskarastāpayanprajāḥ
हे प्रजापालक, पैरों के बन्धन से छूटी हुई वह सेना वैसे ही शोभित हुई, जैसे बादलों के बन्धन से छूटा हुआ सूर्य प्रजा को तपाता हुआ शोभित होता है।
श्लोक 35 (8.48.35)
विप्रमुक्ताः स्वका योधाः फल्गुनस्य रथं प्रति । ससृजुः शरसङ्घांश्च शस्त्रसङ्घांश्च मारिष ॥
vipramuktāḥ svakā yodhāḥ phalgunasya rathaṃ prati | sasṛjuḥ śarasaṅghāṃśca śastrasaṅghāṃśca māriṣa
छूटे हुए आपके योद्धाओं ने, हे माननीय, अर्जुन के रथ की ओर बाणों और शस्त्रों के समूह बरसा दिए।
श्लोक 36 (8.48.36)
तां महास्त्रमयीं वृष्टिं शरैः सञ्छिद्य भारत । अवधीत्सततो योधान्वासविः परवीरहा ॥
tāṃ mahāstramayīṃ vṛṣṭiṃ śaraiḥ sañchidya bhārata | avadhītsatato yodhānvāsaviḥ paravīrahā
हे भारत, इन्द्रपुत्र शत्रुवीरों के संहारक अर्जुन ने बाणों से उस महान् अस्त्रमयी वर्षा को काटकर फिर योद्धाओं को मार डाला।
श्लोक 37 (8.48.37)
सुशर्मा तु ततो राजन्बाणेन नतपर्वणा । अर्जुनं हृदये विद्ध्वा विव्याधान्यैस्त्रिसप्तभिः ॥
suśarmā tu tato rājanbāṇena nataparvaṇā | arjunaṃ hṛdaye viddhvā vivyādhānyaistrisaptabhiḥ
फिर, हे राजन्, सुशर्मा ने झुकी हुई गाँठ वाले एक बाण से अर्जुन की छाती बींधकर इक्कीस और बाणों से भी उन्हें घायल कर दिया।
श्लोक 38 (8.48.38)
स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् । तत उच्चुक्रुशुः सर्वे हतः पार्थ इति ब्रुवन् ॥
sa gāḍhaviddho vyathito rathopastha upāviśat | tata uccukruśuḥ sarve hataḥ pārtha iti bruvan
गहरी चोट खाकर वे व्यथित हो रथ के पिछले भाग में बैठ गए, और सब चिल्ला उठे कि “पार्थ मारे गए!”
श्लोक 39 (8.48.39)
ततः शङ्खनिनादाश्च भेरीशब्दाश्च पुष्कलाः । नानावादित्रनिनदाः सिंहनादाश्च जज्ञिरे ॥
tataḥ śaṅkhaninādāśca bherīśabdāśca puṣkalāḥ | nānāvāditraninadāḥ siṃhanādāśca jajñire
तब शङ्खों की ध्वनि, भेरियों के बहुत-से शब्द, नाना वाद्यों की गूँज और सिंहनाद होने लगे।
श्लोक 40 (8.48.40)
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां श्वेताश्वः कृष्णसारथिः । सोऽतिविद्धो महेष्वासः शरैराशीविषोपमैः । सुशर्माणं महाराज क्रोधाविष्टो महारथः ॥
pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ śvetāśvaḥ kṛṣṇasārathiḥ | so'tividdho maheṣvāsaḥ śarairāśīviṣopamaiḥ | suśarmāṇaṃ mahārāja krodhāviṣṭo mahārathaḥ
होश आने पर श्वेत घोड़ों वाले, कृष्ण जिनके सारथि हैं, वे महाधनुर्धर, विषैले सर्पों जैसे बाणों से अत्यन्त घायल हुए, हे महाराज, महारथी अर्जुन सुशर्मा पर क्रोध से भर उठे।
श्लोक 41 (8.48.41)
ततः शरशतैः पार्थः सञ्छाद्यैनं क्षणाद्रणे । दिशस्तु वारयामास बाणैस्तत्र महास्त्रवित् ॥
tataḥ śaraśataiḥ pārthaḥ sañchādyainaṃ kṣaṇādraṇe | diśastu vārayāmāsa bāṇaistatra mahāstravit
तब पार्थ ने क्षण-भर में सैकड़ों बाणों से उसे ढक दिया, और उस महान् अस्त्रवेत्ता ने बाणों से सब दिशाओं को रोक दिया।
श्लोक 42 (8.48.42)
विमुखीकृत्य समरे सुशर्माणं धनञ्जयः । ऐन्द्रमस्त्रममेयात्मा प्रादुश्चक्रे हसन्निव ॥
vimukhīkṛtya samare suśarmāṇaṃ dhanañjayaḥ | aindramastramameyātmā prāduścakre hasanniva
सुशर्मा को युद्ध में विमुख करके अमित-आत्मा धनञ्जय ने मुस्कराते हुए-से ऐन्द्र अस्त्र प्रकट किया।
श्लोक 43 (8.48.43)
ततो बाणसहस्राणि तदुत्सृष्टानि मारिष । सर्वदिक्षु व्यदृश्यन्त सूदयन्ति रथद्विपान् ॥
tato bāṇasahasrāṇi tadutsṛṣṭāni māriṣa | sarvadikṣu vyadṛśyanta sūdayanti rathadvipān
तब, हे माननीय, उसके छोड़े हुए हजारों बाण सब दिशाओं में दिखाई देने लगे, जो रथों और हाथियों को मार रहे थे।
श्लोक 44 (8.48.44)
हयान्पत्तींश्च समरे शस्त्रैः शतसहस्रशः । रराज समरे राजञ्शक्रो निघ्नन्निवासुरान् ॥
hayānpattīṃśca samare śastraiḥ śatasahasraśaḥ | rarāja samare rājañśakro nighnannivāsurān
घोड़ों और पैदल सैनिकों को लाखों की संख्या में शस्त्रों से मारते हुए वे युद्ध में, हे राजन्, असुरों को मारते इन्द्र के समान शोभित हुए।
श्लोक 45 (8.48.45)
वध्यमाने ततः सैन्ये भयं सुमहदाविशत् । संशप्तकगणानां च गोपालानां च भारत ॥
vadhyamāne tataḥ sainye bhayaṃ sumahadāviśat | saṃśaptakagaṇānāṃ ca gopālānāṃ ca bhārata
सेना के मारे जाने पर, हे भारत, संशप्तकों और गोपालों के दलों में भारी भय समा गया।
श्लोक 46 (8.48.46)
न हि तत्र पुमान्कश्चिद्योऽर्जुनं प्रतियुध्यते । पश्यतां तत्र वीराणामहन्यत बलं तव ॥
na hi tatra pumānkaścidyo'rjunaṃ pratiyudhyate | paśyatāṃ tatra vīrāṇāmahanyata balaṃ tava
वहाँ कोई ऐसा पुरुष न था जो अर्जुन का सामना कर सके; वीरों के देखते-देखते आपकी सेना मारी जा रही थी।
श्लोक 47 (8.48.47)
हन्यमानं च तदभून्निश्चेष्टं च पराक्रमे ॥
hanyamānaṃ ca tadabhūnniśceṣṭaṃ ca parākrame
और मारी जाती हुई वह सेना पराक्रम करने में निश्चेष्ट हो गई।
श्लोक 48 (8.48.48)
अयुतं तत्र योधानां हत्वा पाण्डुसुतो रणे । व्यभ्राजत महाराज विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥
ayutaṃ tatra yodhānāṃ hatvā pāṇḍusuto raṇe | vyabhrājata mahārāja vidhūmo'gniriva jvalan
वहाँ दस हजार योद्धाओं को मारकर पाण्डुपुत्र, हे महाराज, धुएँ से रहित जलती अग्नि के समान चमक उठे।
श्लोक 49 (8.48.49)
चतुर्दशसहस्राणि यानि दृष्टानि भारत । रथानामयुतं चैव त्रिसहस्राश्च दन्तिनः ॥
caturdaśasahasrāṇi yāni dṛṣṭāni bhārata | rathānāmayutaṃ caiva trisahasrāśca dantinaḥ
हे भारत, वहाँ चौदह हजार योद्धा दिखाई दिए, तथा दस हजार रथ और तीन हजार हाथी भी।
श्लोक 50 (8.48.50)
ततः संशप्तका भूयः परिवव्रुर्धनञ्जयम् । मर्तव्यमिति निश्चित्य जयं वाप्यनिवर्तनम् ॥
tataḥ saṃśaptakā bhūyaḥ parivavrurdhanañjayam | martavyamiti niścitya jayaṃ vāpyanivartanam
तब संशप्तकों ने “मरना ही है, या विजय पाएँगे, पीछे नहीं हटेंगे” ऐसा निश्चय करके फिर धनञ्जय को घेर लिया।
श्लोक 51 (8.48.51)
तत्र युद्धं महच्चासीत्तावकानां विशाम्पते । शूरेण बलिना सार्धं पाण्डवेन किरीटिना । जित्वा तान्न्यहनत्पार्थः शत्रूञ्शक्र इवासुरान् ॥
tatra yuddhaṃ mahaccāsīttāvakānāṃ viśāmpate | śūreṇa balinā sārdhaṃ pāṇḍavena kirīṭinā | jitvā tānnyahanatpārthaḥ śatrūñśakra ivāsurān
हे प्रजानाथ, वहाँ आपके वीरों और बलवान् शूर पाण्डव किरीटी के बीच बड़ा युद्ध हुआ। पार्थ ने उन्हें जीतकर शत्रुओं को वैसे ही मार डाला, जैसे इन्द्र असुरों को मारता है।