कर्ण पर्व · अध्याय 49
कृपाचार्य सुकेतु को मारते हैं; धृष्टद्युम्न कृतवर्मा को गिराते हैं
कृपाचार्य और शिखण्डी का द्वन्द्व होता है; कृपाचार्य शिखण्डी को घोड़ों, सारथि और रथ से रहित कर देते हैं, और जब वह तलवार लेकर बढ़ता है तो उसकी ढाल बाणों से तोड़ डालते हैं। चित्रकेतु का पुत्र सुकेतु शिखण्डी की सहायता को आता है, पर कृपाचार्य उसका सिर काट देते हैं और उसके साथी भाग जाते हैं। धृष्टद्युम्न और कृतवर्मा का बाणों, तलवारों और गदाओं से भीषण युद्ध होता है, जिसमें धृष्टद्युम्न की गदा से कृतवर्मा गिर पड़ता है और श्रुतर्वा उसे रणभूमि से ले जाता है; तब कौरव योद्धा धृष्टद्युम्न पर टूट पड़ते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.49.1)
कृतवर्मा कृपो द्रौणिः सूतपुत्रश्च मारिष । उलूकः सौबलश्चैव राजा च सह सोदरैः ॥
kṛtavarmā kṛpo drauṇiḥ sūtaputraśca māriṣa | ulūkaḥ saubalaścaiva rājā ca saha sodaraiḥ
हे माननीय, कृतवर्मा, कृपाचार्य, द्रोणपुत्र, सूतपुत्र कर्ण, उलूक, सुबलपुत्र शकुनि और भाइयों सहित राजा—
श्लोक 2 (8.49.2)
सीदमानां चमूं दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रभयार्दिताम् । समुज्जह्रुः स्म वेगेन भिन्नां नावमिवार्णवे ॥
sīdamānāṃ camūṃ dṛṣṭvā pāṇḍuputrabhayārditām | samujjahruḥ sma vegena bhinnāṃ nāvamivārṇave
पाण्डवों के भय से पीड़ित और डूबती हुई अपनी सेना को देखकर उन्होंने उसे वेग से वैसे ही उबार लिया, जैसे समुद्र में टूटी हुई नाव को उबारा जाता है।
श्लोक 3 (8.49.3)
ततो युद्धमतीवासीन्मुहूर्तमिव भारत । भीरूणां त्रासजननं शूराणां हर्षवर्धनम् ॥
tato yuddhamatīvāsīnmuhūrtamiva bhārata | bhīrūṇāṃ trāsajananaṃ śūrāṇāṃ harṣavardhanam
हे भारत, तब एक क्षण के लिए-सा युद्ध अत्यन्त भीषण हो उठा, जो डरपोकों को त्रास देने वाला और शूरों का उत्साह बढ़ाने वाला था।
श्लोक 4 (8.49.4)
कृपेण शरवर्षाणि प्रतिमुक्तानि संयुगे । सृञ्जयांश्छादयामासुः शलभानां व्रजा इव ॥
kṛpeṇa śaravarṣāṇi pratimuktāni saṃyuge | sṛñjayāṃśchādayāmāsuḥ śalabhānāṃ vrajā iva
संग्राम में कृपाचार्य के छोड़े हुए बाणों की झड़ियों ने सृञ्जयों को वैसे ही ढक दिया, जैसे टिड्डियों के झुण्ड ढक लेते हैं।
श्लोक 5 (8.49.5)
शिखण्डी च ततः क्रुद्धो गौतमं त्वरितो ययौ । ववर्ष शरवर्षाणि समन्ताद्द्विजपुङ्गवम् ॥
śikhaṇḍī ca tataḥ kruddho gautamaṃ tvarito yayau | vavarṣa śaravarṣāṇi samantāddvijapuṅgavam
तब क्रुद्ध शिखण्डी तेजी से गौतम (कृपाचार्य) की ओर बढ़ा और उस श्रेष्ठ ब्राह्मण पर चारों ओर से बाणों की वर्षा करने लगा।
श्लोक 6 (8.49.6)
कृपस्तु शरवर्षं तद्विनिहत्य महास्त्रवित् । शिखण्डिनं रणे क्रुद्धो विव्याध दशभिः शरैः ॥
kṛpastu śaravarṣaṃ tadvinihatya mahāstravit | śikhaṇḍinaṃ raṇe kruddho vivyādha daśabhiḥ śaraiḥ
महान् अस्त्रवेत्ता कृपाचार्य ने उस बाण-वर्षा को काटकर क्रुद्ध हो रण में शिखण्डी को दस बाणों से बींध दिया।
श्लोक 7 (8.49.7)
ततः शिखण्डी कुपितः शरैः सप्तभिराहवे । कृपं विव्याध कुपितं कङ्कपत्रैरजिह्मगैः ॥
tataḥ śikhaṇḍī kupitaḥ śaraiḥ saptabhirāhave | kṛpaṃ vivyādha kupitaṃ kaṅkapatrairajihmagaiḥ
तब कुपित शिखण्डी ने युद्ध में सीधे जाने वाले, कङ्कपत्र लगे सात बाणों से क्रुद्ध कृपाचार्य को घायल किया।
श्लोक 8 (8.49.8)
ततः कृपः शरैस्तीक्ष्णैः सोऽतिविद्धो महारथः । ततः सुनिशितैस्तीक्ष्णैः क्षुरप्रैर्हेमभूषितैः । व्यश्वसूतरथं चक्रे शिखण्डिनमथो द्विजः ॥
tataḥ kṛpaḥ śaraistīkṣṇaiḥ so'tividdho mahārathaḥ | tataḥ suniśitaistīkṣṇaiḥ kṣuraprairhemabhūṣitaiḥ | vyaśvasūtarathaṃ cakre śikhaṇḍinamatho dvijaḥ
तब तीखे बाणों से अत्यन्त घायल हुए उन महारथी ब्राह्मण कृपाचार्य ने, सोने से सजे हुए अत्यन्त तीखे क्षुरप्र बाणों से, शिखण्डी के घोड़े, सारथि और रथ नष्ट कर दिए।
श्लोक 9 (8.49.9)
हताश्वात्तु ततो यानादवप्लुत्य महारथः । खड्गं चर्म तथा गृह्य सत्वरं ब्राह्मणं ययौ ॥
hatāśvāttu tato yānādavaplutya mahārathaḥ | khaḍgaṃ carma tathā gṛhya satvaraṃ brāhmaṇaṃ yayau
घोड़े मारे जाने पर वह महारथी रथ से कूद पड़ा और तलवार तथा ढाल लेकर शीघ्रता से उस ब्राह्मण की ओर चला।
श्लोक 10 (8.49.10)
तमापतन्तं सहसा शरैः सन्नतपर्वभिः । वारयामास समरे तदद्भुतमिवाभवत् ॥
tamāpatantaṃ sahasā śaraiḥ sannataparvabhiḥ | vārayāmāsa samare tadadbhutamivābhavat
सहसा आते हुए उसे कृपाचार्य ने झुकी गाँठ वाले बाणों से युद्ध में रोक दिया, और वह एक अद्भुत बात-सी हुई।
श्लोक 11 (8.49.11)
तत्राद्भुतमपश्याम शिलानां प्लवनं यथा । निश्चेष्टो यद्रणे राजञ्छिखण्डी समतिष्ठत ॥
tatrādbhutamapaśyāma śilānāṃ plavanaṃ yathā | niśceṣṭo yadraṇe rājañchikhaṇḍī samatiṣṭhata
वहाँ हमने एक अद्भुत बात देखी, मानो पत्थर तैर रहे हों: हे राजन्, शिखण्डी युद्ध में निश्चल खड़ा रह गया।
श्लोक 12 (8.49.12)
कृपेण वारितं दृष्ट्वा शिखण्डिनमथो नृप । प्रत्युद्ययौ कृपं तूर्णं धृष्टद्युम्नो महारथः ॥
kṛpeṇa vāritaṃ dṛṣṭvā śikhaṇḍinamatho nṛpa | pratyudyayau kṛpaṃ tūrṇaṃ dhṛṣṭadyumno mahārathaḥ
शिखण्डी को कृपाचार्य के द्वारा रोका हुआ देखकर, हे राजन्, महारथी धृष्टद्युम्न तुरंत कृपाचार्य की ओर बढ़ा।
श्लोक 13 (8.49.13)
धृष्टद्युम्नं ततो यान्तं शारद्वतरथं प्रति । प्रतिजग्राह वेगेन कृतवर्मा महारथः ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ tato yāntaṃ śāradvatarathaṃ prati | pratijagrāha vegena kṛtavarmā mahārathaḥ
शारद्वत के रथ की ओर जाते हुए धृष्टद्युम्न को महारथी कृतवर्मा ने वेग से रोक लिया।
श्लोक 14 (8.49.14)
युधिष्ठिरमथायान्तं शारद्वतरथं प्रति । सपुत्रं सहसैन्यं च द्रोणपुत्रो न्यवारयत् ॥
yudhiṣṭhiramathāyāntaṃ śāradvatarathaṃ prati | saputraṃ sahasainyaṃ ca droṇaputro nyavārayat
और शारद्वत के रथ की ओर आते हुए युधिष्ठिर को पुत्र और सेना सहित द्रोणपुत्र ने रोक दिया।
श्लोक 15 (8.49.15)
नकुलं सहदेवं च त्वरमाणौ महारथौ । प्रतिजग्राह ते पुत्रः शरवर्षेण वारयन् ॥
nakulaṃ sahadevaṃ ca tvaramāṇau mahārathau | pratijagrāha te putraḥ śaravarṣeṇa vārayan
शीघ्रता से आते हुए दोनों महारथियों, नकुल और सहदेव को आपके पुत्र ने बाणों की वर्षा से रोकते हुए सामना किया।
श्लोक 16 (8.49.16)
भीमसेनं करूशांश्च केकयान्सह सृञ्जयैः । कर्णो वैकर्तनो युद्धे वारयामास भारत ॥
bhīmasenaṃ karūśāṃśca kekayānsaha sṛñjayaiḥ | karṇo vaikartano yuddhe vārayāmāsa bhārata
भीमसेन को, तथा करूषों और केकयों को सृञ्जयों सहित, हे भारत, वैकर्तन कर्ण ने युद्ध में रोक लिया।
श्लोक 17 (8.49.17)
शिखण्डिने ततो बाणान्कृपः शारद्वतो युधि । प्राहिणोत्त्वरया युक्तो बीभत्सोरथ सन्निधौ ॥
śikhaṇḍine tato bāṇānkṛpaḥ śāradvato yudhi | prāhiṇottvarayā yukto bībhatsoratha sannidhau
तब शारद्वत कृपाचार्य ने युद्ध में शीघ्रता से शिखण्डी पर बाण चलाए, उस स्थान के पास जहाँ बीभत्सु (अर्जुन) थे।
श्लोक 18 (8.49.18)
ताञ्छरान्प्रेषितांस्तेन समन्तात्स्वर्णभूषितान् । चिच्छेद खड्गमाविध्य भ्रामयंश्च पुनः पुनः ॥
tāñcharānpreṣitāṃstena samantātsvarṇabhūṣitān | ciccheda khaḍgamāvidhya bhrāmayaṃśca punaḥ punaḥ
उसने चारों ओर से भेजे गए उन सोने से सजे बाणों को तलवार को घुमाते और बार-बार चलाते हुए काट डाला।
श्लोक 19 (8.49.19)
शतचन्द्रं च तच्चर्म गौतमस्तस्य भारत । व्यधमत्सायकैस्तूर्णं तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ॥
śatacandraṃ ca taccarma gautamastasya bhārata | vyadhamatsāyakaistūrṇaṃ tata uccukruśurjanāḥ
और हे भारत, गौतम ने उसकी उस सौ चन्द्रों वाली ढाल को शीघ्र ही बाणों से छलनी कर दिया; तब लोग चिल्ला उठे।
श्लोक 20 (8.49.20)
स विचर्मा महाराज खड्गपाणिरुपाद्रवत् । कृपस्तं शरसङ्घातैराद्रवन्तमपीडयत् ॥
sa vicarmā mahārāja khaḍgapāṇirupādravat | kṛpastaṃ śarasaṅghātairādravantamapīḍayat
हे महाराज, ढाल से रहित वह तलवार हाथ में लिए दौड़ा, और कृपाचार्य ने आगे दौड़ते हुए उसे बाणों के समूहों से पीड़ित किया।
श्लोक 21 (8.49.21)
शारद्वतशरैर्ग्रस्तं क्लिश्यमानं महाबलः । चित्रकेतुसुतो राजन्सुकेतुस्त्वरितो ययौ ॥
śāradvataśarairgrastaṃ kliśyamānaṃ mahābalaḥ | citraketusuto rājansuketustvarito yayau
शारद्वत के बाणों से ग्रस्त और पीड़ित उसे देखकर, हे राजन्, चित्रकेतु का पुत्र महाबली सुकेतु शीघ्रता से वहाँ पहुँचा।
श्लोक 22 (8.49.22)
विकिरन्ब्राह्मणं युद्धे बहुभिर्निशितैः शरैः । अभ्यापतदमेयात्मा गौतमस्य रथं प्रति ॥
vikiranbrāhmaṇaṃ yuddhe bahubhirniśitaiḥ śaraiḥ | abhyāpatadameyātmā gautamasya rathaṃ prati
उस अमित-आत्मबल वाले ने युद्ध में बहुत-से तीखे बाणों से ब्राह्मण को बींधते हुए गौतम के रथ पर आक्रमण किया।
श्लोक 23 (8.49.23)
दृष्ट्वा विषक्तं तं चैव ब्राह्मणं च निवारितम् । अपयातस्ततस्तूर्णं शिखण्डी राजसत्तम ॥
dṛṣṭvā viṣaktaṃ taṃ caiva brāhmaṇaṃ ca nivāritam | apayātastatastūrṇaṃ śikhaṇḍī rājasattama
उस वीर को उलझा हुआ और ब्राह्मण को रुका हुआ देखकर, हे राजाओं में श्रेष्ठ, शिखण्डी तब शीघ्र ही वहाँ से हट गया।
श्लोक 24 (8.49.24)
सुकेतुस्तु ततो राजन्गौतमं नवभिः शरैः । विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या पुनश्चैनं त्रिभिः शरैः ॥
suketustu tato rājangautamaṃ navabhiḥ śaraiḥ | viddhvā vivyādha saptatyā punaścainaṃ tribhiḥ śaraiḥ
फिर, हे राजन्, सुकेतु ने गौतम को नौ बाणों से बींधकर सत्तर बाणों से घायल किया, और फिर तीन बाणों से भी।
श्लोक 25 (8.49.25)
अथास्य सशरं चापं पुनश्चिच्छेद मारिष । सारथिं च शरेणास्य भृशं मर्मस्वताडयत् ॥
athāsya saśaraṃ cāpaṃ punaściccheda māriṣa | sārathiṃ ca śareṇāsya bhṛśaṃ marmasvatāḍayat
हे माननीय, उसने फिर उनके बाणसहित धनुष को काट डाला, और एक बाण से उनके सारथि के मर्मस्थानों पर गहरी चोट की।
श्लोक 26 (8.49.26)
गौतमस्तु ततः क्रुद्धो धनुर्गृह्य नवं दृढम् । सुकेतुं त्रिंशता बाणैः सर्वमर्मस्वताडयत् ॥
gautamastu tataḥ kruddho dhanurgṛhya navaṃ dṛḍham | suketuṃ triṃśatā bāṇaiḥ sarvamarmasvatāḍayat
तब गौतम ने क्रुद्ध होकर नया, दृढ़ धनुष लेकर तीस बाणों से सुकेतु के सभी मर्मस्थानों पर प्रहार किया।
श्लोक 27 (8.49.27)
स विह्वलितसर्वाङ्गः प्रचचाल रथोत्तमे । भूमिकम्पे यथा वृक्षश्चचालाकम्पितो भृशम् ॥
sa vihvalitasarvāṅgaḥ pracacāla rathottame | bhūmikampe yathā vṛkṣaścacālākampito bhṛśam
उसके सारे अङ्ग काँप उठे और वह अपने श्रेष्ठ रथ पर डगमगा गया, जैसे भूकम्प में बुरी तरह हिलता हुआ वृक्ष डोलता है।
श्लोक 28 (8.49.28)
चलतस्तस्य कायात्तु शिरो ज्वलितकुण्डलम् । सोष्णीषं सशिरस्त्राणं क्षुरप्रेण त्वपातयत् ॥
calatastasya kāyāttu śiro jvalitakuṇḍalam | soṣṇīṣaṃ saśirastrāṇaṃ kṣurapreṇa tvapātayat
डोलते हुए उसके शरीर से जगमगाते कुण्डलों वाला सिर—पगड़ी और शिरस्त्राण सहित—कृपाचार्य ने क्षुरप्र बाण से गिरा दिया।
श्लोक 29 (8.49.29)
तच्छिरः प्रापतद्भूमौ श्येनाहृतमिवामिषम् । ततोऽस्य कायो वसुधां पश्चात्प्रापतदच्युत ॥
tacchiraḥ prāpatadbhūmau śyenāhṛtamivāmiṣam | tato'sya kāyo vasudhāṃ paścātprāpatadacyuta
वह सिर बाज के उठा ले जाए हुए मांस के टुकड़े की तरह भूमि पर गिरा; फिर, हे राजन्, उसका धड़ भी पीछे पृथ्वी पर गिर पड़ा।
श्लोक 30 (8.49.30)
तस्मिन्हते महाराज पुत्रास्तस्य पदानुगाः । गौतमं समरे त्यक्त्वा दुद्रुवुस्ते दिशो दश ॥
tasminhate mahārāja putrāstasya padānugāḥ | gautamaṃ samare tyaktvā dudruvuste diśo daśa
हे महाराज, उसके मारे जाने पर उसके पीछे चलने वाले पुत्र गौतम को रणभूमि में छोड़कर दसों दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 31 (8.49.31)
धृष्टद्युम्नं तु समरे सन्निवार्य महारथः । कृतवर्माऽब्रवीद्धृष्टस्तिष्ठतिष्ठेति भारत ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ tu samare sannivārya mahārathaḥ | kṛtavarmā'bravīddhṛṣṭastiṣṭhatiṣṭheti bhārata
इधर महारथी कृतवर्मा ने युद्ध में धृष्टद्युम्न को रोककर निर्भय होकर कहा, “ठहर, ठहर!”, हे भारत।
श्लोक 32 (8.49.32)
तदभूत्तुमुलं युद्धं वृष्णिपार्षतयो रणे । आमिषार्थे यथा युद्धं श्येनयोः क्रुद्धयोर्नृप ॥
tadabhūttumulaṃ yuddhaṃ vṛṣṇipārṣatayo raṇe | āmiṣārthe yathā yuddhaṃ śyenayoḥ kruddhayornṛpa
तब रण में वृष्णि और पृषत-पुत्र के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया, जैसे मांस के लिए दो क्रुद्ध बाजों में युद्ध होता है, हे राजन्।
श्लोक 33 (8.49.33)
धृष्टद्युम्नस्तु समरे हार्दिक्यं नवभिः शरैः । आजघानोरसि क्रुद्धः पीडयन्हृदिकात्मजम् ॥
dhṛṣṭadyumnastu samare hārdikyaṃ navabhiḥ śaraiḥ | ājaghānorasi kruddhaḥ pīḍayanhṛdikātmajam
धृष्टद्युम्न ने रण में क्रुद्ध होकर हृदिक के पुत्र हार्दिक्य (कृतवर्मा) को नौ बाणों से छाती में मारा और उसे पीड़ित किया।
श्लोक 34 (8.49.34)
कृतवर्मा तु समरे पार्षतेन दृढाहतः । पार्षतं सरथं साश्वं छादयामास सायकैः ॥
kṛtavarmā tu samare pārṣatena dṛḍhāhataḥ | pārṣataṃ sarathaṃ sāśvaṃ chādayāmāsa sāyakaiḥ
रण में पार्षत से जोर की चोट खाकर कृतवर्मा ने पार्षत को रथ और घोड़ों सहित बाणों से ढक दिया।
श्लोक 35 (8.49.35)
सरथश्छादितो राजन्धृष्टद्युम्नो न दृश्यते । मेघैरिव परिच्छन्नो भास्करो जलधारिभिः ॥
sarathaśchādito rājandhṛṣṭadyumno na dṛśyate | meghairiva paricchanno bhāskaro jaladhāribhiḥ
हे राजन्, रथ सहित ढक जाने से धृष्टद्युम्न दिखाई नहीं देता था, जैसे जल से भरे बादलों से ढका हुआ सूर्य।
श्लोक 36 (8.49.36)
विधूय तं बाणगणं शरैः कनकभूषणैः । व्यरोचत रणे राजन्धृष्टद्युम्नः कृतव्रणः ॥
vidhūya taṃ bāṇagaṇaṃ śaraiḥ kanakabhūṣaṇaiḥ | vyarocata raṇe rājandhṛṣṭadyumnaḥ kṛtavraṇaḥ
सोने से सजे बाणों से उस बाण-समूह को हटाकर, हे राजन्, घाव खाए हुए धृष्टद्युम्न रण में दमक उठा।
श्लोक 37 (8.49.37)
ततस्तु पार्षतः क्रुद्धः शस्त्रवृष्टिं सुदारुणाम् । कृतवर्माणमासाद्य व्यसृजत्पृतनापतिः ॥
tatastu pārṣataḥ kruddhaḥ śastravṛṣṭiṃ sudāruṇām | kṛtavarmāṇamāsādya vyasṛjatpṛtanāpatiḥ
तब क्रुद्ध सेनापति पार्षत ने कृतवर्मा के पास पहुँचकर अत्यन्त भयंकर शस्त्र-वर्षा की।
श्लोक 38 (8.49.38)
तामापतन्तीं सहसा शस्त्रवृष्टिं सुदारुणाम् । शरैरनेकसाहस्रैर्हार्दिक्योऽवारयद्युधि ॥
tāmāpatantīṃ sahasā śastravṛṣṭiṃ sudāruṇām | śarairanekasāhasrairhārdikyo'vārayadyudhi
सहसा आती हुई उस अत्यन्त भयंकर शस्त्र-वर्षा को हार्दिक्य ने युद्ध में कई हजार बाणों से रोक दिया।
श्लोक 39 (8.49.39)
दृष्ट्वा तु वारितां युद्धे शस्त्रवृष्टिं दुरासदाम् । कृतवर्माणमासाद्य वारयामास पार्षतः ॥
dṛṣṭvā tu vāritāṃ yuddhe śastravṛṣṭiṃ durāsadām | kṛtavarmāṇamāsādya vārayāmāsa pārṣataḥ
युद्ध में उस दुर्जेय शस्त्र-वर्षा को रुका हुआ देखकर पार्षत ने कृतवर्मा के पास पहुँचकर उसे रोक लिया।
श्लोक 40 (8.49.40)
यथा युग्मरथेनाजौ वाहान्वाहैरमिश्रयत् । गृहीत्वा चर्म खड्गं च रथं तस्यावपुप्लुवे ॥
yathā yugmarathenājau vāhānvāhairamiśrayat | gṛhītvā carma khaḍgaṃ ca rathaṃ tasyāvapupluve
जैसे उसने रण में जोड़ी वाले रथ से घोड़ों को घोड़ों से मिला दिया, वैसे ही ढाल और तलवार लेकर वह उसके रथ पर कूद पड़ा।
श्लोक 41 (8.49.41)
मिलितेष्वथ वाहेषु प्रत्यासन्ने च पार्षते । दृष्ट्वाऽपदानं तस्याशु गदां जग्राह सात्वतः ॥
militeṣvatha vāheṣu pratyāsanne ca pārṣate | dṛṣṭvā'padānaṃ tasyāśu gadāṃ jagrāha sātvataḥ
घोड़ों के मिल जाने पर और पार्षत के पास आ जाने पर, उसके साहसिक कार्य को देखकर सात्वत (कृतवर्मा) ने तुरंत गदा उठा ली।
श्लोक 42 (8.49.42)
गदापाणिस्ततो राजन्रथात्तूर्णमवप्लुतः । तमदृष्ट्वा रथोपस्थे सारथिं समताडयत् ॥
gadāpāṇistato rājanrathāttūrṇamavaplutaḥ | tamadṛṣṭvā rathopasthe sārathiṃ samatāḍayat
हे राजन्, तब गदा हाथ में लिए वह शीघ्र ही रथ से कूद पड़ा; रथ के पटरे पर उसे न देखकर उसने सारथि को मारा।
श्लोक 43 (8.49.43)
खड्गेन शितधारेण स हतः प्रापतद्रथात् । कृतवर्मा ततो हृष्टस्तलशब्दं चकार ह ॥
khaḍgena śitadhāreṇa sa hataḥ prāpatadrathāt | kṛtavarmā tato hṛṣṭastalaśabdaṃ cakāra ha
तेज धार वाली तलवार से मारा गया वह रथ से गिर पड़ा। तब कृतवर्मा ने हर्षित होकर ताल ठोकने की आवाज़ की।
श्लोक 44 (8.49.44)
पार्षतं चाब्रवीद्राजन्नेह्येहीति पुनःपुनः । स तं न ममृषे युद्धे तलशब्दं समीरितम् ॥
pārṣataṃ cābravīdrājannehyehīti punaḥpunaḥ | sa taṃ na mamṛṣe yuddhe talaśabdaṃ samīritam
और हे राजन्, उसने पार्षत से बार-बार कहा, “आ, आ!” पर उसने रण में उस ताल ठोकने की ललकार को सहन नहीं किया।
श्लोक 45 (8.49.45)
अवप्लुत्य रथात्तस्मात्स्वरथं पुनरास्थितः । अभ्ययात्स तु तत्तूर्णं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
avaplutya rathāttasmātsvarathaṃ punarāsthitaḥ | abhyayātsa tu tattūrṇaṃ tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
उस रथ से कूदकर वह फिर अपने रथ पर जा बैठा, और “ठहर, ठहर!” कहता हुआ शीघ्र उसकी ओर बढ़ा।
श्लोक 46 (8.49.46)
ततो राजन्महेष्वासं कृतवर्माणमाशु वै । गदां गृह्य पुनर्वेगात्कृतवर्माणमाहनत् ॥
tato rājanmaheṣvāsaṃ kṛtavarmāṇamāśu vai | gadāṃ gṛhya punarvegātkṛtavarmāṇamāhanat
तब, हे राजन्, उसने उस महाधनुर्धर कृतवर्मा पर झपटकर, गदा लेकर फिर वेग से उसे मारा।
श्लोक 47 (8.49.47)
सोऽतिविद्धो बलवता न्यपतन्मूर्च्छया हतः । श्रुतर्वा रथमारोप्य अपोवाह रणाजिरात् ॥
so'tividdho balavatā nyapatanmūrcchayā hataḥ | śrutarvā rathamāropya apovāha raṇājirāt
उस बलवान् की गहरी चोट खाकर वह मूर्च्छित हो गिर पड़ा, और श्रुतर्वा उसे रथ में डालकर रणभूमि से ले गया।
श्लोक 48 (8.49.48)
धृष्टद्युम्नस्तु समरे दृष्ट्वा शत्रुं महारथः । कौरवान्समरे तूर्णं वारयामास सायकैः ॥
dhṛṣṭadyumnastu samare dṛṣṭvā śatruṃ mahārathaḥ | kauravānsamare tūrṇaṃ vārayāmāsa sāyakaiḥ
तब महारथी धृष्टद्युम्न ने शत्रु को सामने देखकर रण में बाणों से कौरवों को शीघ्र रोक दिया।
श्लोक 49 (8.49.49)
ततस्ते तावका योधा धृष्टद्युम्नमुपाद्रवन् । सिंहनादरवांश्चक्रुस्ततो युद्धमवर्तत ॥
tataste tāvakā yodhā dhṛṣṭadyumnamupādravan | siṃhanādaravāṃścakrustato yuddhamavartata
तब आपके योद्धा सिंहनाद करते हुए धृष्टद्युम्न पर टूट पड़े और फिर युद्ध चलता रहा।