कर्ण पर्व · अध्याय 50
अश्वत्थामा द्वारा युधिष्ठिर की पराजय
अश्वत्थामा रणभूमि को बाणों से ढक देता है, और सात्यकि, युधिष्ठिर तथा द्रौपदी के पुत्र मिलकर उस पर टूट पड़ते हैं। सब उससे बाणों का आदान-प्रदान करते हैं; वह उनके धनुष काटता है और सात्यकि के सारथि को गिरा देता है। युधिष्ठिर उसे नाम का ब्राह्मण कहकर ताना देते हैं और धृष्टद्युम्न से लड़ने की चुनौती देते हैं; अश्वत्थामा बाणों की वर्षा से उत्तर देता है, तब युधिष्ठिर पीछे हट जाते हैं और दुर्योधन की सेना की ओर चले जाते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.50.1)
द्रौणिर्युधिष्ठिरं दृष्ट्वा शैनेयेनाभिरक्षितम् । द्रौपदेयैस्तथा शूरैरभ्यवर्तत हृष्टवत् ॥
drauṇiryudhiṣṭhiraṃ dṛṣṭvā śaineyenābhirakṣitam | draupadeyaistathā śūrairabhyavartata hṛṣṭavat
शैनेय (सात्यकि) और द्रौपदी के शूर पुत्रों से रक्षित युधिष्ठिर को देखकर द्रोणपुत्र हर्ष से भरकर उन पर टूट पड़ा।
श्लोक 2 (8.50.2)
किरन्निषुगणान्घोरान्हेमपुङ्खाञ्शिलाशितान् । दर्शयन्विविधान्मार्गाञ्शिक्षया लघुहस्तवान् ॥
kiranniṣugaṇānghorānhemapuṅkhāñśilāśitān | darśayanvividhānmārgāñśikṣayā laghuhastavān
वह सोने के पंखों वाले, शिला पर तेज किए हुए भयंकर बाणों की झड़ी लगाता हुआ, अपनी शिक्षा से पाई फुर्तीली हथेली से अनेक प्रकार के मार्ग दिखा रहा था।
श्लोक 3 (8.50.3)
खं पुरयञ्शरैस्तीक्ष्णैर्वेगवद्भिः समन्ततः । युधिष्ठिरस्य समरे दिशः सर्वाः समावृणोत् ॥
khaṃ purayañśaraistīkṣṇairvegavadbhiḥ samantataḥ | yudhiṣṭhirasya samare diśaḥ sarvāḥ samāvṛṇot
तीखे और वेगवान् बाणों से उसने चारों ओर आकाश को भर दिया और उस युद्ध में युधिष्ठिर की सब दिशाएँ ढक दीं।
श्लोक 4 (8.50.4)
भारद्वाजशरैश्छन्नं न प्राज्ञायत किञ्चन । बाणभूतमभूत्सर्वमायोधनशिरो महत् ॥
bhāradvājaśaraiśchannaṃ na prājñāyata kiñcana | bāṇabhūtamabhūtsarvamāyodhanaśiro mahat
भारद्वाज के पुत्र के बाणों से ढके रणक्षेत्र में कुछ भी पहचाना नहीं जाता था; युद्ध का सारा विशाल अग्रभाग मानो बाणों से ही बना हो गया था।
श्लोक 5 (8.50.5)
बाणजालं दिविष्ठं तत्स्वर्णपुङ्खविभूषितम् । शुशुभे भरतश्रेष्ठ विमानमिव विष्ठितम् ॥
bāṇajālaṃ diviṣṭhaṃ tatsvarṇapuṅkhavibhūṣitam | śuśubhe bharataśreṣṭha vimānamiva viṣṭhitam
आकाश में टिका हुआ वह स्वर्ण-पंखों से सजा बाणों का जाल, हे भरतश्रेष्ठ, आकाश में ठहरे हुए विमान के समान शोभित हुआ।
श्लोक 6 (8.50.6)
तेन च्छन्ने रणे राजन्बाणजालेन भास्वता । अभ्रच्छायेव सञ्जज्ञे हृतरश्मिस्तमोनुदः ॥
tena cchanne raṇe rājanbāṇajālena bhāsvatā | abhracchāyeva sañjajñe hṛtaraśmistamonudaḥ
हे राजन्, उस चमकते बाण-जाल से रणभूमि के ढक जाने पर अंधकार को हरने वाला सूर्य मानो किरणें हर ली जाने से बादल की छाया में पड़ गया।
श्लोक 7 (8.50.7)
तदद्भुतमपश्याम बाणभूते नभस्थले । न स्म सम्पतते भूतं द्रौणेर्दृष्ट्वा पराक्रमम् ॥
tadadbhutamapaśyāma bāṇabhūte nabhasthale | na sma sampatate bhūtaṃ drauṇerdṛṣṭvā parākramam
बाणों से भरे उस आकाश में हमने यह आश्चर्य देखा कि द्रोणपुत्र का पराक्रम देखकर कोई प्राणी वहाँ से उड़कर नहीं निकल पाता था।
श्लोक 8 (8.50.8)
सात्यकिर्यतमानस्तु धर्मराजस्तु पाण्डवः । तथेतराणि सैन्यानि न स्म चक्रुः पराक्रमम् ॥
sātyakiryatamānastu dharmarājastu pāṇḍavaḥ | tathetarāṇi sainyāni na sma cakruḥ parākramam
सात्यकि यत्न करते रहे, पाण्डव धर्मराज भी, और दूसरी सेनाएँ भी, पर कोई पराक्रम न दिखा सका।
श्लोक 9 (8.50.9)
लाघवं द्रोणपुत्रस्य दृष्ट्वा तत्र महारथाः । व्यस्मयन्त महाराज न चैनं प्रत्युदीक्षितुम् ॥
lāghavaṃ droṇaputrasya dṛṣṭvā tatra mahārathāḥ | vyasmayanta mahārāja na cainaṃ pratyudīkṣitum
द्रोणपुत्र के हाथ की फुर्ती देखकर वहाँ के महारथी विस्मय में पड़ गए, हे महाराज, और उसकी ओर देख भी न सके।
श्लोक 10 (8.50.10)
शेकुस्ते सर्वराजानस्तपन्तमिव भास्करम् । वध्यमाने ततः सैन्ये द्रौपदेया महारथाः ॥
śekuste sarvarājānastapantamiva bhāskaram | vadhyamāne tataḥ sainye draupadeyā mahārathāḥ
वे सब राजा उसे वैसे ही नहीं देख सके जैसे तपते हुए सूर्य को कोई नहीं देख सकता; और जब सेना कटती जा रही थी, तब द्रौपदी के पुत्र, वे महारथी,
श्लोक 11 (8.50.11)
सात्यकिर्धर्मराजश्च पाञ्चालाश्चापि सङ्गताः । त्यक्त्वा मृत्युभयं घोरं द्रौणायनिमुपाद्रवन् ॥
sātyakirdharmarājaśca pāñcālāścāpi saṅgatāḥ | tyaktvā mṛtyubhayaṃ ghoraṃ drauṇāyanimupādravan
सात्यकि, धर्मराज और पांचालों के साथ मिलकर भयंकर मृत्यु-भय को त्यागकर द्रोणपुत्र पर टूट पड़े।
श्लोक 12 (8.50.12)
सात्यकिः सप्तविंशत्या द्रौणिं विद्ध्वा शिलीमुखैः । पुनर्विव्याध नाराचैः सप्तभिः स्वर्णभूषितैः ॥
sātyakiḥ saptaviṃśatyā drauṇiṃ viddhvā śilīmukhaiḥ | punarvivyādha nārācaiḥ saptabhiḥ svarṇabhūṣitaiḥ
सात्यकि ने द्रौणि को सत्ताईस बाणों से बींधा और फिर सोने से सजे सात नाराचों से बींधा।
श्लोक 13 (8.50.13)
युधिष्ठिरस्त्रिसप्तत्या प्रतिविन्ध्यश्च सप्तभिः । श्रुतकर्मा त्रिभिर्बाणैः श्रुतकीर्तिश्च सप्तभिः ॥
yudhiṣṭhirastrisaptatyā prativindhyaśca saptabhiḥ | śrutakarmā tribhirbāṇaiḥ śrutakīrtiśca saptabhiḥ
युधिष्ठिर ने तिहत्तर से, प्रतिविन्ध्य ने सात से, श्रुतकर्मा ने तीन बाणों से और श्रुतकीर्ति ने सात से,
श्लोक 14 (8.50.14)
सुतसोमस्तु नवभिः शतानीकश्च सप्तभिः । अन्ये च बहवः शूरा विव्यधुस्तं समन्ततः ॥
sutasomastu navabhiḥ śatānīkaśca saptabhiḥ | anye ca bahavaḥ śūrā vivyadhustaṃ samantataḥ
सुतसोम ने नौ से, शतानीक ने सात से और अन्य बहुत-से शूरों ने भी चारों ओर से उसे बींधा।
श्लोक 15 (8.50.15)
स तु क्रुद्धस्ततो राजन्नाशीविष इव श्वसन् । सात्यकिं पञ्चविंशत्या प्राविध्यत शिलीमुखैः ॥
sa tu kruddhastato rājannāśīviṣa iva śvasan | sātyakiṃ pañcaviṃśatyā prāvidhyata śilīmukhaiḥ
तब वह क्रुद्ध होकर, हे राजन्, विषधर सर्प की भाँति फुफकारता हुआ सात्यकि को पच्चीस तीखे बाणों से बींध बैठा,
श्लोक 16 (8.50.16)
श्रुतकीर्तिं च नवभिः सुतसोमं च पञ्चभिः । अष्टभिः श्रुतकर्माणं प्रतिविन्ध्यं त्रिभिः शरैः ॥
śrutakīrtiṃ ca navabhiḥ sutasomaṃ ca pañcabhiḥ | aṣṭabhiḥ śrutakarmāṇaṃ prativindhyaṃ tribhiḥ śaraiḥ
श्रुतकीर्ति को नौ से, सुतसोम को पाँच से, श्रुतकर्मा को आठ से और प्रतिविन्ध्य को तीन बाणों से,
श्लोक 17 (8.50.17)
शतानीकं च नवभिर्धर्मपुत्रं च पञ्चभिः । तथेतरांस्ततः शूरान्द्वाभ्यां द्वाभ्यामताडयत् । श्रुतकीर्तेस्तथा चापं चिच्छेद निशितैः शरैः ॥
śatānīkaṃ ca navabhirdharmaputraṃ ca pañcabhiḥ | tathetarāṃstataḥ śūrāndvābhyāṃ dvābhyāmatāḍayat | śrutakīrtestathā cāpaṃ ciccheda niśitaiḥ śaraiḥ
शतानीक को नौ से और धर्मपुत्र को पाँच से; फिर शेष शूरों में से प्रत्येक को दो-दो बाणों से मारा, और तीखे बाणों से श्रुतकीर्ति का धनुष काट डाला।
श्लोक 18 (8.50.18)
अथान्यद्धनुरादाय श्रुतकीर्तिर्महारथः । द्रौणायनिं त्रिभिर्विद्ध्वा विव्याधान्यैः शितैः शरैः ॥
athānyaddhanurādāya śrutakīrtirmahārathaḥ | drauṇāyaniṃ tribhirviddhvā vivyādhānyaiḥ śitaiḥ śaraiḥ
तब महारथी श्रुतकीर्ति ने दूसरा धनुष लेकर द्रोणपुत्र को तीन बाणों से बींधा और फिर अन्य तीखे बाणों से भी घायल किया।
श्लोक 19 (8.50.19)
ततो द्रौणिर्महाराज शरवर्षेण भारत । छादयामास तत्सैन्यं समन्ताद्भरतर्षभ ॥
tato drauṇirmahārāja śaravarṣeṇa bhārata | chādayāmāsa tatsainyaṃ samantādbharatarṣabha
तब द्रौणि ने, हे महाराज, हे भारत, उस सेना को चारों ओर से बाणों की वर्षा से ढक दिया, हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक 20 (8.50.20)
ततः पुनरमेयात्मा धर्मराजस्य कार्मुकम् । द्रौणिश्चिच्छेद विहसन्विव्याध च शरैस्त्रिभिः ॥
tataḥ punarameyātmā dharmarājasya kārmukam | drauṇiściccheda vihasanvivyādha ca śaraistribhiḥ
फिर अमित-आत्मबल वाले द्रौणि ने हँसते हुए धर्मराज का धनुष काट दिया और उन्हें तीन बाणों से बींध दिया।
श्लोक 21 (8.50.21)
ततो धर्मसुतो राजन्प्रगृह्यान्यन्महद्धनुः । द्रोणपुत्रं त्रिषष्ट्या तु बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥
tato dharmasuto rājanpragṛhyānyanmahaddhanuḥ | droṇaputraṃ triṣaṣṭyā tu bāhvorurasi cārpayat
तब धर्मपुत्र ने, हे राजन्, दूसरा बड़ा धनुष लेकर द्रोणपुत्र को तिरसठ बाणों से मारा और उसकी दोनों भुजाओं तथा छाती को घायल किया।
श्लोक 22 (8.50.22)
सात्यकिस्तु ततः क्रुद्धो द्रौणेः प्रहरतो रणे । अर्धचन्द्रेण तीक्ष्णेन धनुश्छित्त्वाऽनदद्भृशम् ॥
sātyakistu tataḥ kruddho drauṇeḥ praharato raṇe | ardhacandreṇa tīkṣṇena dhanuśchittvā'nadadbhṛśam
तब रण में प्रहार करते हुए द्रोणपुत्र पर क्रुद्ध सात्यकि ने तीखे अर्धचन्द्र बाण से उसका धनुष काट दिया और ज़ोर से गरजा।
श्लोक 23 (8.50.23)
छिन्नधन्वा ततो द्रौणिः शक्त्या शक्तिमतां वरः । सारथिं पातयामास शैनेयस्य रथाद्रुतम् ॥
chinnadhanvā tato drauṇiḥ śaktyā śaktimatāṃ varaḥ | sārathiṃ pātayāmāsa śaineyasya rathādrutam
धनुष कट जाने पर शक्तिशालियों में श्रेष्ठ द्रौणि ने शक्ति (बरछी) से शैनेय के सारथि को रथ से तुरंत गिरा दिया।
श्लोक 24 (8.50.24)
अथान्यद्धनुरादाय द्रोणपुत्रः प्रतापवान् । शैनेयं शरवर्षेण च्छादयामास भारत ॥
athānyaddhanurādāya droṇaputraḥ pratāpavān | śaineyaṃ śaravarṣeṇa cchādayāmāsa bhārata
तब पराक्रमी द्रोणपुत्र ने दूसरा धनुष लेकर शैनेय को बाणों की वर्षा से ढक दिया, हे भारत।
श्लोक 25 (8.50.25)
तस्याश्वाः प्रद्रुताः सङ्ख्ये पतिते रथसारथौ । तत्रतत्रैव धावन्तः समदृश्यन्त भारत ॥
tasyāśvāḥ pradrutāḥ saṅkhye patite rathasārathau | tatratatraiva dhāvantaḥ samadṛśyanta bhārata
रथ के सारथि के गिर जाने पर उसके घोड़े युद्ध में भाग निकले और इधर-उधर दौड़ते दिखाई दिए, हे भारत।
श्लोक 26 (8.50.26)
युधिष्ठिरपुरोगास्तु द्रौणिं शस्त्रभृतां वरम् । अभ्यवर्षन्त वेगेन विसृजन्तः शिताञ्छरान् ॥
yudhiṣṭhirapurogāstu drauṇiṃ śastrabhṛtāṃ varam | abhyavarṣanta vegena visṛjantaḥ śitāñcharān
युधिष्ठिर के नेतृत्व वाले योद्धा शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रौणि पर तीखे बाण छोड़ते हुए वेग से बरस पड़े।
श्लोक 27 (8.50.27)
सहसा पततस्तान्वै क्रुद्धरूपान्परन्तपः । प्रहसन्प्रतिजग्राह द्रोणपुत्रो महारणे ॥
sahasā patatastānvai kruddharūpānparantapaḥ | prahasanpratijagrāha droṇaputro mahāraṇe
अचानक क्रोधित रूप में टूटते हुए उनको शत्रुओं को तपाने वाले द्रोणपुत्र ने उस महायुद्ध में हँसते हुए रोक लिया।
श्लोक 28 (8.50.28)
ततः शरशतज्वालः सेनाकक्षं महारणे । द्रौणिर्ददाह समरे कक्षमग्निरिवोत्थितः ॥
tataḥ śaraśatajvālaḥ senākakṣaṃ mahāraṇe | drauṇirdadāha samare kakṣamagnirivotthitaḥ
तब सैकड़ों बाणों की ज्वाला वाले द्रौणि ने उस महायुद्ध में सेना के पार्श्व को वैसे जला डाला जैसे उठी हुई आग सूखी घास को जलाती है।
श्लोक 29 (8.50.29)
तद्बलं पाण्डुपुत्रस्य द्रोणपुत्रप्रतापितम् । चुक्षुभे भरतश्रेष्ठ तस्मिन्नेव चमूमुखे ॥
tadbalaṃ pāṇḍuputrasya droṇaputrapratāpitam | cukṣubhe bharataśreṣṭha tasminneva camūmukhe
पाण्डुपुत्र की वह सेना द्रोणपुत्र के तेज से तपकर, हे भरतश्रेष्ठ, उसी अग्रभाग में क्षुब्ध हो उठी।
श्लोक 30 (8.50.30)
तद्बलं पाण्डवेयस्य द्रोणपुत्रः शरार्चिषा । तापयन्भरतश्रेष्ठ गभस्तिभिरिवांशुमान् ॥
tadbalaṃ pāṇḍaveyasya droṇaputraḥ śarārciṣā | tāpayanbharataśreṣṭha gabhastibhirivāṃśumān
द्रोणपुत्र अपने बाणों की ज्वाला से पाण्डव की उस सेना को वैसे ही तपाता रहा, हे भरतश्रेष्ठ, जैसे सूर्य अपनी किरणों से तपाता है।
श्लोक 31 (8.50.31)
तत्पच्यमानं मर्षेण ब्राह्मणस्य च सायकैः । क्षुभ्यते पाण्डवं सैन्यं तिमिनेव नदीमुखम् ॥
tatpacyamānaṃ marṣeṇa brāhmaṇasya ca sāyakaiḥ | kṣubhyate pāṇḍavaṃ sainyaṃ timineva nadīmukham
ब्राह्मण के क्रोध और उसके बाणों से झुलसती हुई पाण्डवों की सेना वैसे ही क्षुब्ध हो उठी जैसे तिमि नामक विशाल मत्स्य से नदी का मुहाना।
श्लोक 32 (8.50.32)
दृष्ट्वा चैव महाराज द्रोणपुत्रपराक्रमम् । सर्वान्दुर्योधनः पार्थान्हतान्युद्धेऽभ्यमन्यत ॥
dṛṣṭvā caiva mahārāja droṇaputraparākramam | sarvānduryodhanaḥ pārthānhatānyuddhe'bhyamanyata
और द्रोणपुत्र का पराक्रम देखकर, हे महाराज, दुर्योधन ने समझ लिया कि युद्ध में पृथा के सब पुत्र मारे जा चुके हैं।
श्लोक 33 (8.50.33)
युधिष्ठिरस्तु त्वरितो द्रौणिं पीड्य महारथम् । अब्रवीद्द्रोणपुत्रं स रोषामर्षसमन्वितः ॥
yudhiṣṭhirastu tvarito drauṇiṃ pīḍya mahāratham | abravīddroṇaputraṃ sa roṣāmarṣasamanvitaḥ
युधिष्ठिर ने शीघ्रता से महारथी द्रौणि को दबाकर क्रोध और अमर्ष से भरे हुए द्रोणपुत्र से कहा:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 34 (8.50.34)
जानामि त्वां युधि श्रेष्ठ वीर्यवन्तं बलान्वितम् । कृतास्त्रं कृतिनं चैव तथा लघुपराक्रमम् ॥
jānāmi tvāṃ yudhi śreṣṭha vīryavantaṃ balānvitam | kṛtāstraṃ kṛtinaṃ caiva tathā laghuparākramam
हे योद्धाओं में श्रेष्ठ, मैं जानता हूँ कि तुम बलवान् और शक्तिशाली हो, अस्त्रों में निपुण, कुशल और फुर्तीले पराक्रम वाले हो।
श्लोक 35 (8.50.35)
बलमेतद्भवान्सर्वं पार्षते यदि दर्शयेत् । ततस्त्वां बलवन्तं च कृतविद्यं च विद्महे ॥
balametadbhavānsarvaṃ pārṣate yadi darśayet | tatastvāṃ balavantaṃ ca kṛtavidyaṃ ca vidmahe
यदि तुम यह सारा बल पार्षत (धृष्टद्युम्न) पर दिखाओ, तब हम तुम्हें बलवान् और विद्या में निपुण मानेंगे।
श्लोक 36 (8.50.36)
न हि वै पार्षतं दृष्ट्वा समरे शत्रुसूदनम् । भवेत्तव बलं किञ्चिद्ब्रवीमि त्वां न तु द्विजम् ॥
na hi vai pārṣataṃ dṛṣṭvā samare śatrusūdanam | bhavettava balaṃ kiñcidbravīmi tvāṃ na tu dvijam
क्योंकि शत्रुओं का संहार करने वाले पार्षत को युद्ध में देखकर तुम्हारा बल कुछ भी न रह जाएगा। मैं यह तुमसे कह रहा हूँ, किसी ब्राह्मण से नहीं।
श्लोक 37 (8.50.37)
नैव नाम तव प्रीतिर्नैव नाम कृतज्ञता । यतस्त्वं पुरुषव्याघ्र मामेवाद्य जिघांससि ॥
naiva nāma tava prītirnaiva nāma kṛtajñatā | yatastvaṃ puruṣavyāghra māmevādya jighāṃsasi
निश्चय ही तुममें न प्रीति है, न कृतज्ञता, क्योंकि हे पुरुषव्याघ्र, आज तुम मुझे ही मारना चाहते हो।
श्लोक 38 (8.50.38)
ब्राह्मणेन तपः कार्यं शमश्च दम एव च । क्षत्रियेण धनुर्नाम्यं स भवान्ब्राह्मणब्रुवः ॥
brāhmaṇena tapaḥ kāryaṃ śamaśca dama eva ca | kṣatriyeṇa dhanurnāmyaṃ sa bhavānbrāhmaṇabruvaḥ
ब्राह्मण का कर्म तप, शम और दम है; क्षत्रिय का कर्म धनुष चढ़ाना है। और तुम तो केवल नाम के ब्राह्मण हो।
श्लोक 39 (8.50.39)
मिषतस्ते महाबाहो युधि जेष्यामि कौरवान् । कुरुष्व समरे कर्म ब्रह्मबन्धो यथेष्टतः ॥
miṣataste mahābāho yudhi jeṣyāmi kauravān | kuruṣva samare karma brahmabandho yatheṣṭataḥ
हे महाबाहु, तुम्हारे देखते-देखते मैं युद्ध में कौरवों को जीत लूँगा; हे नाम के ब्राह्मण, रण में तुम जैसा चाहो वैसा पराक्रम करो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 40 (8.50.40)
एवमुक्तो महाराज द्रोणपुत्रः स्मयन्निव । युक्तं तत्त्वं च सञ्चिन्त्य नोत्तरं किञ्चिदब्रवीत् ॥
evamukto mahārāja droṇaputraḥ smayanniva | yuktaṃ tattvaṃ ca sañcintya nottaraṃ kiñcidabravīt
ऐसा कहे जाने पर, हे महाराज, द्रोणपुत्र ने मानो मुस्कराते हुए, उचित और यथार्थ बात पर विचार करके कोई उत्तर नहीं दिया।
श्लोक 41 (8.50.41)
अनुक्त्वा च ततः किञ्चिच्छरवर्षेण पाण्डवम् । छादयामास समरे क्रुद्धोऽन्तक इव प्रजाः ॥
anuktvā ca tataḥ kiñciccharavarṣeṇa pāṇḍavam | chādayāmāsa samare kruddho'ntaka iva prajāḥ
कुछ भी न कहकर उसने क्रुद्ध होकर, प्रजा के लिए अन्तक (यम) के समान, पाण्डव को रण में बाणों की वर्षा से ढक दिया।
श्लोक 42 (8.50.42)
स च्छाद्यमानस्तु तदा द्रोणपुत्रेण मारिष । पार्थोऽपयातः शीघ्रं वै प्रगृह्य महतीं चमूम् ॥
sa cchādyamānastu tadā droṇaputreṇa māriṣa | pārtho'payātaḥ śīghraṃ vai pragṛhya mahatīṃ camūm
द्रोणपुत्र द्वारा ढक दिए जाने पर, हे मारिष, पृथापुत्र अपनी विशाल सेना को साथ लेकर शीघ्र पीछे हट गया।
श्लोक 43 (8.50.43)
अपयाते ततस्तस्मिन्धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे । द्रोणपुत्रः स्थितो राजन्प्रत्यादेशान्महात्मनः ॥
apayāte tatastasmindharmaputre yudhiṣṭhire | droṇaputraḥ sthito rājanpratyādeśānmahātmanaḥ
धर्मपुत्र युधिष्ठिर के हट जाने पर, हे राजन्, द्रोणपुत्र उस महात्मा के तिरस्कार के कारण अपनी जगह डटा रहा।
श्लोक 44 (8.50.44)
ततो युधिष्ठिरो राजंस्त्यक्त्वा द्रौणिं महाहवे । प्रययौ तावकं सैन्यं युक्तः क्रूराय कर्मणे ॥
tato yudhiṣṭhiro rājaṃstyaktvā drauṇiṃ mahāhave | prayayau tāvakaṃ sainyaṃ yuktaḥ krūrāya karmaṇe
तब राजा युधिष्ठिर उस महायुद्ध में द्रौणि को छोड़कर, क्रूर कर्म के लिए उद्यत होकर आपकी सेना की ओर चले गए।