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कर्ण पर्व · अध्याय 51

तीन मोर्चों पर घमासान

सञ्जय तीन मोर्चों पर चल रहे युद्ध का वर्णन करते हैं। सेनापति कर्ण पाञ्चालों, चेदियों और सृञ्जयों को काटता जाता है, भीम कौरव-सेना में विनाश मचाते हैं और अर्जुन संशप्तकों का संहार करते हैं। दुर्योधन नकुल, सहदेव और धृष्टद्युम्न से लड़ता है और रथहीन तथा घायल होकर कुण्डधार द्वारा निकाल लिया जाता है; कर्ण पाञ्चाल और चेदि पक्ष के अनेक नामी वीरों को मारता है। अर्जुन के कहने पर कृष्ण रथ को काम्बोजों के पार्श्व में ले जाते हैं, जहाँ अर्जुन सुदक्षिण के छोटे भाई तथा हज़ारों योद्धाओं को मारते हैं और अश्वत्थामा उनके सामने आता है।

अध्याय 50अध्याय-सूचीअध्याय 52

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.51.1)

भीमसेनं सपाञ्चालं चेदिकेकयसंवृतम् । सेनापतिः स्वयं क्रुद्धो वारयामास सायकैः ॥

bhīmasenaṃ sapāñcālaṃ cedikekayasaṃvṛtam | senāpatiḥ svayaṃ kruddho vārayāmāsa sāyakaiḥ

क्रोध से भरे सेनापति कर्ण ने स्वयं बाणों की वर्षा से भीमसेन को रोक लिया, जो पाञ्चालों के साथ था और चेदियों तथा केकयों से घिरा हुआ था।

श्लोक 2 (8.51.2)

ततस्तु चेदिकारूषान्सृञ्जयांश्च महारथान् । कर्णो जघान समरे भीमसेनस्य पश्यतः ॥

tatastu cedikārūṣānsṛñjayāṃśca mahārathān | karṇo jaghāna samare bhīmasenasya paśyataḥ

तब भीमसेन के देखते-देखते कर्ण ने युद्ध में चेदियों, कारूषों और सृञ्जयों जैसे महारथियों को मार गिराया।

श्लोक 3 (8.51.3)

भीमसेनस्ततः कर्णे विहाय रथसत्तमम् । प्रययौ कौरवं सैन्यं कक्षमग्निरिव ज्वलन् ॥

bhīmasenastataḥ karṇe vihāya rathasattamam | prayayau kauravaṃ sainyaṃ kakṣamagniriva jvalan

तब भीमसेन उस रथियों में श्रेष्ठ कर्ण को छोड़कर, सूखे घास में लगी आग की तरह जलता हुआ कौरवों की सेना में घुस गया।

श्लोक 4 (8.51.4)

सूतपुत्रोऽपि समरे पाञ्चालान्केकयांस्तथा । सृञ्जयांश्च महेष्वासान्निजघान सहस्रशः ॥

sūtaputro'pi samare pāñcālānkekayāṃstathā | sṛñjayāṃśca maheṣvāsānnijaghāna sahasraśaḥ

सूतपुत्र ने भी युद्ध में पाञ्चालों, केकयों और महाधनुर्धर सृञ्जयों को हज़ारों की संख्या में मार डाला।

श्लोक 5 (8.51.5)

संशप्तकेषु पार्थश्च कौरवेषु वृकोदरः । पाञ्चालेषु तथा कर्णः क्षयं चक्रुर्महारथाः ॥

saṃśaptakeṣu pārthaśca kauraveṣu vṛkodaraḥ | pāñcāleṣu tathā karṇaḥ kṣayaṃ cakrurmahārathāḥ

संशप्तकों में पार्थ ने, कौरवों में वृकोदर ने और पाञ्चालों में कर्ण ने — इन तीनों महारथियों ने विनाश मचा दिया।

श्लोक 6 (8.51.6)

ते क्षत्रिया दह्यमानास्त्रिभिस्तैः पावकोपमैः । जग्मुर्विनाशं समरे राजन्दुर्मन्त्रिते तव ॥

te kṣatriyā dahyamānāstribhistaiḥ pāvakopamaiḥ | jagmurvināśaṃ samare rājandurmantrite tava

अग्नि के समान उन तीनों के हाथों जलते हुए वे क्षत्रिय युद्ध में नष्ट हो गए, राजन्! यह आपकी बुरी मन्त्रणा का ही फल था।

श्लोक 7 (8.51.7)

ततो दुर्योधनः क्रुद्धो नकुलं नवभिः शरैः । विव्याध भरतश्रेष्ठ चतुरश्चास्य वाजिनः ॥

tato duryodhanaḥ kruddho nakulaṃ navabhiḥ śaraiḥ | vivyādha bharataśreṣṭha caturaścāsya vājinaḥ

तब क्रुद्ध दुर्योधन ने नकुल को नौ बाणों से बींध दिया, हे भरतश्रेष्ठ, और उसके चारों घोड़ों को भी।

श्लोक 8 (8.51.8)

ततः परममेयात्मा तव पुत्रो जनाधिप । क्षुरेण सहदेवस्य ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ॥

tataḥ paramameyātmā tava putro janādhipa | kṣureṇa sahadevasya dhvajaṃ ciccheda kāñcanam

इसके बाद, हे जनाधिप, आपके अमित पराक्रमी पुत्र ने छुरे जैसी धार वाले बाण से सहदेव की सोने की ध्वजा काट डाली।

श्लोक 9 (8.51.9)

नकुलस्तु ततः क्रुद्धस्तव पुत्रं च सप्तभिः । जघान समरे राजन्सहदेवश्च पञ्चभिः ॥

nakulastu tataḥ kruddhastava putraṃ ca saptabhiḥ | jaghāna samare rājansahadevaśca pañcabhiḥ

तब क्रुद्ध नकुल ने युद्ध में आपके पुत्र को सात बाणों से मारा, राजन्, और सहदेव ने पाँच से।

श्लोक 10 (8.51.10)

तावुभौ भरतश्रेष्ठौ ज्येष्ठौ सर्वधनुष्मताम् । विव्याधोरसि सङ्क्रुद्धः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ॥

tāvubhau bharataśreṣṭhau jyeṣṭhau sarvadhanuṣmatām | vivyādhorasi saṅkruddhaḥ pañcabhiḥ pañcabhiḥ śaraiḥ

अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसने उन दोनों भरतश्रेष्ठों को, जो सब धनुर्धारियों में अग्रणी थे, पाँच-पाँच बाणों से छाती में बींध दिया।

श्लोक 11 (8.51.11)

ततोऽपराभ्यां भल्लाभ्यां धनुषी समकृन्तत । यमयोः प्रसभं वीरो विव्याधाशु त्रिभिस्त्रिभिः ॥

tato'parābhyāṃ bhallābhyāṃ dhanuṣī samakṛntata | yamayoḥ prasabhaṃ vīro vivyādhāśu tribhistribhiḥ

फिर उस वीर ने दो भल्ल बाणों से उन दोनों के धनुष काट दिए और तुरंत उन दोनों जुड़वाँ भाइयों को बलपूर्वक तीन-तीन बाणों से बींध दिया।

श्लोक 12 (8.51.12)

तावन्ये धनुषी श्रेष्ठे शक्रचापनिभे शुभे । प्रगृह्य रेजतुः शूरौ देवपुत्रसमौ युधि ॥

tāvanye dhanuṣī śreṣṭhe śakracāpanibhe śubhe | pragṛhya rejatuḥ śūrau devaputrasamau yudhi

उन दोनों शूरों ने इन्द्रधनुष के समान सुन्दर दूसरे उत्तम धनुष उठा लिए और युद्ध में देवपुत्रों के समान शोभित हुए।

श्लोक 13 (8.51.13)

ततस्तौ रभसौ युद्धे भ्रातरौ भ्रातरं युधि । शरैर्ववर्षतुर्घोरैर्महामेघौ यथाऽचलम् ॥

tatastau rabhasau yuddhe bhrātarau bhrātaraṃ yudhi | śarairvavarṣaturghorairmahāmeghau yathā'calam

तब वे दोनों भाई रणभूमि में उग्र होकर अपने भाई पर भयंकर बाणों की वर्षा करने लगे, जैसे दो बड़े बादल पर्वत पर बरसते हैं।

श्लोक 14 (8.51.14)

ततः क्रुद्धो महाराज तव पुत्रो महारथः । पाण्डुपुत्रौ महेष्वासौ वारयामास पत्रिभिः ॥

tataḥ kruddho mahārāja tava putro mahārathaḥ | pāṇḍuputrau maheṣvāsau vārayāmāsa patribhiḥ

तब आपके महारथी पुत्र ने क्रुद्ध होकर, महाराज, उन दोनों महाधनुर्धर पाण्डुपुत्रों को बाणों से रोक दिया।

श्लोक 15 (8.51.15)

धनुर्मण्डलमेवास्य ददृशे युधि भारत । सायकाश्चाप्यदृश्यन्त निश्चरन्तः समन्ततः ॥

dhanurmaṇḍalamevāsya dadṛśe yudhi bhārata | sāyakāścāpyadṛśyanta niścarantaḥ samantataḥ

युद्ध में, हे भारत, उसके धनुष का केवल मण्डल दिखाई देता था और चारों ओर निकलते हुए बाण ही बाण दिखते थे।

श्लोक 16 (8.51.16)

तस्य सायकसञ्छन्नौ माद्रेयौ न विरेजतुः । मेघच्छन्नौ यथा व्योम्नि चन्द्रसूर्यौ गतप्रभौ ॥

tasya sāyakasañchannau mādreyau na virejatuḥ | meghacchannau yathā vyomni candrasūryau gataprabhau

उसके बाणों से ढके हुए माद्री के दोनों पुत्र शोभित नहीं हुए, जैसे आकाश में बादलों से ढके चन्द्रमा और सूर्य की प्रभा खो जाती है।

श्लोक 17 (8.51.17)

ते तु बाणा महाराज स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः । आच्छादयन्दिशः सर्वाः सूर्यस्येव मरीचयः ॥

te tu bāṇā mahārāja svarṇapuṅkhāḥ śilāśitāḥ | ācchādayandiśaḥ sarvāḥ sūryasyeva marīcayaḥ

महाराज! सोने के पंखों वाले, शान पर तेज़ किए हुए वे बाण सूर्य की किरणों की तरह सब दिशाओं को ढकने लगे।

श्लोक 18 (8.51.18)

बाणभूते ततस्तस्मिन्सञ्छन्ने च नभस्तले । राज्ञस्तु ददृशे रूपं कालान्तकयमोपमम् ॥

bāṇabhūte tatastasminsañchanne ca nabhastale | rājñastu dadṛśe rūpaṃ kālāntakayamopamam

जब आकाश बाणों से भर गया और ढक गया, तब राजा का रूप काल, अन्तक और यम के समान दिखाई दिया।

श्लोक 19 (8.51.19)

पराक्रमं तु तं दृष्ट्वा तव सूनोर्महारथाः । मृत्योरुपान्तिकं प्राप्तौ माद्रीपुत्रौ स्म मेनिरे ॥

parākramaṃ tu taṃ dṛṣṭvā tava sūnormahārathāḥ | mṛtyorupāntikaṃ prāptau mādrīputrau sma menire

आपके पुत्र का वह पराक्रम देखकर महारथियों ने माना कि माद्री के दोनों पुत्र मृत्यु के निकट पहुँच गए हैं।

श्लोक 20 (8.51.20)

ततः सेनापती राजन्पाण्डवानां महारथः । पार्षतः प्रययौ तत्र यत्र राजा सुयोधनः ॥

tataḥ senāpatī rājanpāṇḍavānāṃ mahārathaḥ | pārṣataḥ prayayau tatra yatra rājā suyodhanaḥ

तब, राजन्, पाण्डवों के सेनापति महारथी पृषत-पुत्र धृष्टद्युम्न उस ओर चले, जहाँ राजा सुयोधन था।

श्लोक 21 (8.51.21)

माद्रीपुत्रौ ततः शूरौ व्यतिक्रम्य महारथौ । धृष्टद्युम्नस्तव सुतं पीडयामास सायकैः ॥

mādrīputrau tataḥ śūrau vyatikramya mahārathau | dhṛṣṭadyumnastava sutaṃ pīḍayāmāsa sāyakaiḥ

तब धृष्टद्युम्न माद्री के उन दोनों शूर महारथी पुत्रों को पार करके आपके पुत्र को बाणों से पीड़ित करने लगा।

श्लोक 22 (8.51.22)

तमविध्यदमेयात्मा तव पुत्रो ह्यमर्षणः । पाञ्चाल्यं पञ्चविंशत्या प्रहस्य पुरुषर्षभः ॥

tamavidhyadameyātmā tava putro hyamarṣaṇaḥ | pāñcālyaṃ pañcaviṃśatyā prahasya puruṣarṣabhaḥ

आपके अमित पराक्रमी और असहनशील पुत्र ने, जो पुरुषों में बैल के समान था, हँसकर पाञ्चाल राजकुमार को पच्चीस बाणों से बींध दिया।

श्लोक 23 (8.51.23)

ततः पुनरमेयात्मा तव पुत्रो ह्यमर्षणः । विद्ध्वा ननाद पाञ्चाल्यं षष्ट्या पञ्चभिरेव च ॥

tataḥ punarameyātmā tava putro hyamarṣaṇaḥ | viddhvā nanāda pāñcālyaṃ ṣaṣṭyā pañcabhireva ca

फिर अमित पराक्रमी और असहनशील आपके पुत्र ने पाञ्चाल को पैंसठ बाणों से बींधकर सिंहनाद किया।

श्लोक 24 (8.51.24)

तथास्य सशरं चापं मुष्टिदेशे विशाम्पते । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन राजा चिच्छेद संयुगे ॥

tathāsya saśaraṃ cāpaṃ muṣṭideśe viśāmpate | kṣurapreṇa sutīkṣṇena rājā ciccheda saṃyuge

फिर, हे विशाम्पते, राजा ने युद्ध में अत्यन्त तीखे क्षुरप्र बाण से पाञ्चाल के बाण-सहित धनुष को मुट्ठी वाले स्थान पर काट डाला।

श्लोक 25 (8.51.25)

तदपास्य धनुश्छिन्नं पाञ्चाल्यः शत्रुकर्शनः । अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भारसहं नवम् ॥

tadapāsya dhanuśchinnaṃ pāñcālyaḥ śatrukarśanaḥ | anyadādatta vegena dhanurbhārasahaṃ navam

शत्रुओं का संहार करने वाले पाञ्चाल राजकुमार ने उस कटे धनुष को फेंक दिया और शीघ्रता से दूसरा नया धनुष उठा लिया, जो खिंचाव सह सकता था।

श्लोक 26 (8.51.26)

क्रोधाद्रुधिररक्ताक्षः संरम्भात्प्रज्वलन्निव । अशोभत महेष्वासो धृष्टद्युम्नः कृतव्रणः ॥

krodhādrudhiraraktākṣaḥ saṃrambhātprajvalanniva | aśobhata maheṣvāso dhṛṣṭadyumnaḥ kṛtavraṇaḥ

क्रोध से रक्त के समान लाल आँखों वाला, आवेश में मानो जलता हुआ, घायल महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न शोभित हुआ।

श्लोक 27 (8.51.27)

स पञ्चदश नाराचाञ्श्वसतः पन्नगानिव । जिघांसुर्भरतश्रेष्ठं धृष्टद्युम्नो व्यपासृजत् ॥

sa pañcadaśa nārācāñśvasataḥ pannagāniva | jighāṃsurbharataśreṣṭhaṃ dhṛṣṭadyumno vyapāsṛjat

भरतश्रेष्ठ दुर्योधन को मार डालने की इच्छा से धृष्टद्युम्न ने फुफकारते हुए सर्पों जैसे पन्द्रह नाराच छोड़े।

श्लोक 28 (8.51.28)

ते वर्म हेमविकृतं भित्त्वा राज्ञः शिलीमुखाः । विविशुर्वसुधां वेगात्कङ्कबर्हिणवाससः ॥

te varma hemavikṛtaṃ bhittvā rājñaḥ śilīmukhāḥ | viviśurvasudhāṃ vegātkaṅkabarhiṇavāsasaḥ

बगुले और मोर के पंखों वाले वे बाण राजा के सोने से जड़े कवच को चीरकर वेग से धरती में घुस गए।

श्लोक 29 (8.51.29)

सोऽतिविद्धो महाराज पुत्रस्तेऽतिव्यराजत । वसन्तकाले सुमहान्प्रफुल्ल इव किंशुकः ॥

so'tividdho mahārāja putraste'tivyarājata | vasantakāle sumahānpraphulla iva kiṃśukaḥ

बुरी तरह बिंधा हुआ आपका पुत्र, महाराज, वसन्त ऋतु में खिले हुए विशाल किंशुक वृक्ष के समान अत्यन्त शोभित हुआ।

श्लोक 30 (8.51.30)

स च्छिन्नवर्मा नाराचप्रहारैर्झर्झरीकृतः । धृष्टद्युम्नस्य भल्लेन क्रुद्धश्चिच्छेद कार्मुकम् ॥

sa cchinnavarmā nārācaprahārairjharjharīkṛtaḥ | dhṛṣṭadyumnasya bhallena kruddhaściccheda kārmukam

उसका कवच टूट चुका था और नाराचों के प्रहारों से शरीर छलनी हो गया था; फिर भी क्रुद्ध होकर उसने भल्ल से धृष्टद्युम्न का धनुष काट दिया।

श्लोक 31 (8.51.31)

अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महीपतिः । सायकैर्दशभी राजन्भ्रुवोर्मध्ये समार्पयत् ॥

athainaṃ chinnadhanvānaṃ tvaramāṇo mahīpatiḥ | sāyakairdaśabhī rājanbhruvormadhye samārpayat

तब, राजन्, उस पृथ्वीपति ने जल्दी से धनुष कट चुके उस पर दस बाणों से भौंहों के बीच प्रहार किया।

श्लोक 32 (8.51.32)

तस्य तेऽशोभयन्वक्त्रं कर्मारपरिमार्जिताः । प्रफुल्लं पङ्कजं यद्वद्भ्रमरा मधुलिप्सवः ॥

tasya te'śobhayanvaktraṃ karmāraparimārjitāḥ | praphullaṃ paṅkajaṃ yadvadbhramarā madhulipsavaḥ

लोहार के हाथों चमकाए हुए वे बाण उसके मुख की शोभा बढ़ा रहे थे, जैसे मधु के लोभी भौंरे खिले हुए कमल की।

श्लोक 33 (8.51.33)

तदपास्य धनुश्छिन्नं धृष्टद्युम्नो महामनाः । अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भल्लांश्च षोडश ॥

tadapāsya dhanuśchinnaṃ dhṛṣṭadyumno mahāmanāḥ | anyadādatta vegena dhanurbhallāṃśca ṣoḍaśa

उस कटे धनुष को फेंककर महामनस्वी धृष्टद्युम्न ने शीघ्र ही दूसरा धनुष और सोलह भल्ल उठा लिए।

श्लोक 34 (8.51.34)

ततो दुर्योधनस्याश्वान्हत्वा सूतं च पञ्चभिः । धनुश्चिच्छेद भल्लेन जातरूपपरिष्कृतम् ॥

tato duryodhanasyāśvānhatvā sūtaṃ ca pañcabhiḥ | dhanuściccheda bhallena jātarūpapariṣkṛtam

फिर उसने पाँच बाणों से दुर्योधन के घोड़ों और सारथि को मारकर एक भल्ल से उसका सोने से सजा धनुष काट दिया।

श्लोक 35 (8.51.35)

रथं सोपस्करं छत्रं शक्तिं खड्गं गदां ध्वजम् । भल्लैश्चिच्छेद दशभिः पुत्रस्य तव पार्षतः ॥

rathaṃ sopaskaraṃ chatraṃ śaktiṃ khaḍgaṃ gadāṃ dhvajam | bhallaiściccheda daśabhiḥ putrasya tava pārṣataḥ

पृषत-पुत्र ने दस भल्लों से आपके पुत्र का साज-सामान सहित रथ, छत्र, शक्ति, खड्ग, गदा और ध्वज काट डाले।

श्लोक 36 (8.51.36)

तपनीयाङ्गदं छत्रं नागं मणिमयं शुभम् । ध्वजं कुरुपतेश्छिन्नं ददृशुः सर्वपार्थिवाः ॥

tapanīyāṅgadaṃ chatraṃ nāgaṃ maṇimayaṃ śubham | dhvajaṃ kurupateśchinnaṃ dadṛśuḥ sarvapārthivāḥ

सब राजाओं ने देखा कि कुरुराज का सुवर्ण से सजा छत्र, मणियों से जड़ा सुन्दर नाग-चिह्न और उसकी ध्वजा कट गई है।

श्लोक 37 (8.51.37)

दुर्योधनं तु विरथं छिन्नवर्मायुधध्वजम् । भ्रातरं समुदैक्षन्त सोदरा भरतर्षभ ॥

duryodhanaṃ tu virathaṃ chinnavarmāyudhadhvajam | bhrātaraṃ samudaikṣanta sodarā bharatarṣabha

हे भरतर्षभ! उसके सहोदर भाइयों ने दुर्योधन को देखा, जो रथहीन हो चुका था और जिसका कवच, शस्त्र और ध्वज कट गया था।

श्लोक 38 (8.51.38)

तमारोप्य रथे राजन्कुण्डधारो महारथम् । अपाहरदसम्भ्रान्तो धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ॥

tamāropya rathe rājankuṇḍadhāro mahāratham | apāharadasambhrānto dhṛṣṭadyumnasya paśyataḥ

हे राजन्! कुण्डधार ने बिना घबराए उस महारथी को अपने रथ पर चढ़ा लिया और धृष्टद्युम्न के देखते-देखते उसे हटा ले गया।

श्लोक 39 (8.51.39)

कर्णस्तु सात्यकिं हित्वा राजगृध्नुरमर्षणः । द्रोणहन्तारमुग्रेषुं ससाराभिमुखो रणे ॥

karṇastu sātyakiṃ hitvā rājagṛdhnuramarṣaṇaḥ | droṇahantāramugreṣuṃ sasārābhimukho raṇe

राजा के हित में उत्सुक और असहनशील कर्ण सात्यकि को छोड़कर युद्ध में द्रोण के हत्यारे, भयंकर बाणों वाले धृष्टद्युम्न की ओर दौड़ा।

श्लोक 40 (8.51.40)

तं पृष्ठतोऽन्वयात्तूर्णं शैनेयोऽभिहतः शरैः । वारणं जघनोपान्ते विषाणाभ्यामिव द्विपः ॥

taṃ pṛṣṭhato'nvayāttūrṇaṃ śaineyo'bhihataḥ śaraiḥ | vāraṇaṃ jaghanopānte viṣāṇābhyāmiva dvipaḥ

बाणों से घायल सात्यकि तेज़ी से उसके पीछे गया, जैसे हाथी दूसरे हाथी के पिछले भाग में अपने दोनों दाँतों से प्रहार करता है।

श्लोक 41 (8.51.41)

स भारतपुरोगानां राज्ञां च सुमहात्मनाम् । कर्णपार्षतयोर्युद्धे सङ्क्रुद्धानां महारणे ॥

sa bhāratapurogānāṃ rājñāṃ ca sumahātmanām | karṇapārṣatayoryuddhe saṅkruddhānāṃ mahāraṇe

कर्ण और पृषत-पुत्र के उस महायुद्ध में भरतवंशियों को आगे रखकर लड़ते हुए उन क्रुद्ध महामना राजाओं में से

श्लोक 42 (8.51.42)

न पाण्डवानां नास्माकं कश्चिदासीत्पराङ्मुखः । प्रत्यदृश्यत यत्कर्णः पाञ्चालांस्त्वरितो ययौ ॥

na pāṇḍavānāṃ nāsmākaṃ kaścidāsītparāṅmukhaḥ | pratyadṛśyata yatkarṇaḥ pāñcālāṃstvarito yayau

पाण्डवों में या हमारे पक्ष में कोई भी पीठ दिखाने वाला नहीं रहा, क्योंकि कर्ण को शीघ्रता से पाञ्चालों पर जाते हुए देखा गया।

श्लोक 43 (8.51.43)

तस्मिन्क्षणे नरश्रेष्ठ गजवाजिरथक्षयः । प्रादुरासीदुभयतो राजन्मध्यगतेऽहनि ॥

tasminkṣaṇe naraśreṣṭha gajavājirathakṣayaḥ | prādurāsīdubhayato rājanmadhyagate'hani

उसी क्षण, हे नरश्रेष्ठ, दोपहर के समय दोनों ओर हाथियों, घोड़ों और रथों का संहार होने लगा, राजन्।

श्लोक 44 (8.51.44)

पाञ्चालास्तु महाराज त्वरिता विजिगीषवः । सर्वतोऽभ्यद्रवन्कर्णं पतत्त्रिण इव द्रुमम् ॥

pāñcālāstu mahārāja tvaritā vijigīṣavaḥ | sarvato'bhyadravankarṇaṃ patattriṇa iva drumam

पाञ्चाल, महाराज, विजय की इच्छा से उतावले होकर चारों ओर से कर्ण पर टूट पड़े, जैसे पक्षी वृक्ष पर।

श्लोक 45 (8.51.45)

तेषामाधिरथिः क्रुद्धः प्रधानान्वै तरस्विनः । विचिन्वन्निव बाणौघैः समासादयदग्रतः ॥

teṣāmādhirathiḥ kruddhaḥ pradhānānvai tarasvinaḥ | vicinvanniva bāṇaughaiḥ samāsādayadagrataḥ

क्रुद्ध अधिरथ-पुत्र ने मानो बाणों की बौछार से ढूँढ-ढूँढकर उनके प्रधान और बलवान वीरों का सामना किया।

श्लोक 46 (8.51.46)

व्याघ्रकेतुः सुशर्मा च शुक्रश्चित्रायुधः क्रतुः । दुर्जयो रोचमानश्च सिंहसेनस्तथाऽष्टमः । महता रथवंशेन परिवव्रुर्नरोत्तमम् ॥

vyāghraketuḥ suśarmā ca śukraścitrāyudhaḥ kratuḥ | durjayo rocamānaśca siṃhasenastathā'ṣṭamaḥ | mahatā rathavaṃśena parivavrurnarottamam

व्याघ्रकेतु, सुशर्मा, शुक्र, चित्रायुध, क्रतु, दुर्जय, रोचमान और आठवें सिंहसेन — इन्होंने रथों की विशाल टुकड़ी के साथ उस नरश्रेष्ठ को घेर लिया।

श्लोक 47 (8.51.47)

सृजन्तः सायकांस्तूर्णं कर्णमाहवशोभिनम् । यतमानांस्तु ताञ्शूरान्मनुजेन्द्रः शितैः शरैः । अष्टाभिरष्टौ राधेयः पाञ्चालान्न्यहनद्रणे ॥

sṛjantaḥ sāyakāṃstūrṇaṃ karṇamāhavaśobhinam | yatamānāṃstu tāñśūrānmanujendraḥ śitaiḥ śaraiḥ | aṣṭābhiraṣṭau rādheyaḥ pāñcālānnyahanadraṇe

जब वे युद्ध की शोभा कर्ण पर तेज़ी से बाण बरसा रहे थे, तब नरेन्द्र राधेय ने प्रयत्न करते हुए उन शूरों में से आठ पाञ्चालों को आठ तीखे बाणों से युद्ध में मार डाला।

श्लोक 48 (8.51.48)

अथापरान्महाराज सूतपुत्रः प्रतापवान् । जघान बहुसाहस्रान्योधान्युद्धविशारदान् ॥

athāparānmahārāja sūtaputraḥ pratāpavān | jaghāna bahusāhasrānyodhānyuddhaviśāradān

फिर, महाराज, प्रतापी सूतपुत्र ने युद्ध-कुशल दूसरे अनेक हज़ार योद्धाओं को मार डाला।

श्लोक 49 (8.51.49)

विष्णुं च विष्णुवर्माणं देवापिं भद्रमेव च । दण्डधारं च समरे चित्रं चित्रायुधं हरिम् ॥

viṣṇuṃ ca viṣṇuvarmāṇaṃ devāpiṃ bhadrameva ca | daṇḍadhāraṃ ca samare citraṃ citrāyudhaṃ harim

विष्णु, विष्णुवर्मा, देवापि, भद्र, दण्डधार, चित्र, चित्रायुध और हरि — इन्हें उसने युद्ध में मार डाला।

श्लोक 50 (8.51.50)

सिंहकेतुं रोचमानं शलभं च महारथम् । निजघान सुसङ्क्रुद्धश्चेदीनां च महारथान् ॥

siṃhaketuṃ rocamānaṃ śalabhaṃ ca mahāratham | nijaghāna susaṅkruddhaścedīnāṃ ca mahārathān

सिंहकेतु, रोचमान और महारथी शलभ को तथा चेदियों के महारथियों को भी उसने अत्यन्त क्रोध में आकर मार गिराया।

श्लोक 51 (8.51.51)

तेषामाददतः प्राणानासीदाधिरथेर्वपुः । शोणिताभ्युक्षिताङ्गस्य रुद्रस्यैवातिभैरवम् ॥

teṣāmādadataḥ prāṇānāsīdādhirathervapuḥ | śoṇitābhyukṣitāṅgasya rudrasyaivātibhairavam

उनके प्राण हरते हुए अधिरथ-पुत्र का रूप, जिसके अंग रक्त से भीग गए थे, रुद्र के समान अत्यन्त भयंकर हो गया।

श्लोक 52 (8.51.52)

तत्र भारत कर्णेन मातङ्गास्ताडिताः शरैः । सर्वतोऽभ्यद्रवन्भीताः कुर्वन्तो महदाकुलम् ॥

tatra bhārata karṇena mātaṅgāstāḍitāḥ śaraiḥ | sarvato'bhyadravanbhītāḥ kurvanto mahadākulam

वहाँ, हे भारत, कर्ण के बाणों से मारे गए हाथी भयभीत होकर चारों ओर भागे और भारी उथल-पुथल मचा दी।

श्लोक 53 (8.51.53)

निपेतुरुर्व्यां समरे कर्णसायकताडिताः । कुर्वन्तो विविधान्नादान्वज्रनुन्ना इवाचलाः ॥

nipetururvyāṃ samare karṇasāyakatāḍitāḥ | kurvanto vividhānnādānvajranunnā ivācalāḥ

कर्ण के बाणों से घायल होकर वे तरह-तरह की चिंघाड़ें मारते हुए रणभूमि में गिर पड़े, मानो वज्र से टूटे पर्वत हों।

श्लोक 54 (8.51.54)

गजवाजिमनुष्यैश्च निपतद्भिः समन्ततः । रथैर्भग्नैर्ध्वजैश्चैव समास्तीर्यत मेदिनी ॥

gajavājimanuṣyaiśca nipatadbhiḥ samantataḥ | rathairbhagnairdhvajaiścaiva samāstīryata medinī

चारों ओर गिरते हुए हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों से तथा टूटे हुए रथों और ध्वजाओं से धरती पट गई।

श्लोक 55 (8.51.55)

नैवं भीष्मो न च द्रोणो नान्ये युधि च तावकाः । चक्रुः स्म तादृशं कर्म यादृशं कृतवान्रणे ॥

naivaṃ bhīṣmo na ca droṇo nānye yudhi ca tāvakāḥ | cakruḥ sma tādṛśaṃ karma yādṛśaṃ kṛtavānraṇe

न भीष्म ने, न द्रोण ने, न आपके पक्ष के किसी और योद्धा ने रण में वैसा कर्म किया, जैसा उसने किया।

श्लोक 56 (8.51.56)

मृगमध्ये यथा सिंहो दृश्यते निर्भयश्चरन् । पाञ्चालानां तथा मध्ये कर्णोऽचरदभीतवत् ॥

mṛgamadhye yathā siṃho dṛśyate nirbhayaścaran | pāñcālānāṃ tathā madhye karṇo'caradabhītavat

जैसे मृगों के बीच सिंह निर्भय घूमता दिखाई देता है, वैसे ही कर्ण पाञ्चालों के बीच निडर होकर विचरता रहा।

श्लोक 57 (8.51.57)

सूतपुत्रोऽथ नागेषु हयेषु च रथेषु च । नरेषु च नरव्याघ्रश्चकार कदनं महत् ॥

sūtaputro'tha nāgeṣu hayeṣu ca ratheṣu ca | nareṣu ca naravyāghraścakāra kadanaṃ mahat

उस नरव्याघ्र सूतपुत्र ने हाथियों, घोड़ों, रथों और मनुष्यों में भारी संहार किया।

श्लोक 58 (8.51.58)

यथा मृगगणांस्त्रस्तान्सिंहो द्रावयते दिशः । पाञ्चालानां रथव्रातान्कर्णो व्यद्रावयत्तथा ॥

yathā mṛgagaṇāṃstrastānsiṃho drāvayate diśaḥ | pāñcālānāṃ rathavrātānkarṇo vyadrāvayattathā

जैसे सिंह डरे हुए मृगों के झुण्ड को सब दिशाओं में भगा देता है, वैसे ही कर्ण ने पाञ्चालों के रथ-समूहों को भगा दिया।

श्लोक 59 (8.51.59)

सिंहं स्म हि यथा प्राप्य न जीवन्ति मृगाः क्वचित् । तथा कर्णमनुप्राप्ता न जीवन्ति स्म सृञ्जयाः ॥

siṃhaṃ sma hi yathā prāpya na jīvanti mṛgāḥ kvacit | tathā karṇamanuprāptā na jīvanti sma sṛñjayāḥ

जैसे सिंह के सामने पड़कर मृग कभी जीवित नहीं बचते, वैसे ही कर्ण के सामने आकर सृञ्जय जीवित नहीं बचे।

श्लोक 60 (8.51.60)

वैश्वानरमुखं प्राप्य दह्यन्ते शलभा यथा । कर्णाग्निं समरे प्राप्य दग्धा भारत सृञ्जयाः ॥

vaiśvānaramukhaṃ prāpya dahyante śalabhā yathā | karṇāgniṃ samare prāpya dagdhā bhārata sṛñjayāḥ

जैसे पतंगे अग्नि के मुख में पहुँचकर जल जाते हैं, वैसे ही हे भारत, युद्ध में कर्ण-रूपी अग्नि के पास पहुँचकर सृञ्जय भस्म हो गए।

श्लोक 61 (8.51.61)

चेदिष्वेकेन कर्णेन पाञ्चालेषु च भारत । विश्राव्य नाम निहता बहवः शूरसम्मताः ॥

cediṣvekena karṇena pāñcāleṣu ca bhārata | viśrāvya nāma nihatā bahavaḥ śūrasammatāḥ

चेदियों और पाञ्चालों में, हे भारत, अनेक सम्मानित शूर अपना नाम सुनाकर अकेले कर्ण के हाथों मारे गए।

श्लोक 62 (8.51.62)

मम चासीन्मती राजन्दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् । नैकोऽप्याधिरथेर्जीवन्पाञ्चाल्यो मोक्ष्यते युधि ॥

mama cāsīnmatī rājandṛṣṭvā karṇasya vikramam | naiko'pyādhiratherjīvanpāñcālyo mokṣyate yudhi

और कर्ण का पराक्रम देखकर, राजन्, मैंने सोचा कि इस युद्ध में अधिरथ-पुत्र से एक भी पाञ्चाल जीवित नहीं छूटेगा।

श्लोक 63 (8.51.63)

सङ्ख्ये विमर्द्य पाञ्चालान्सूतपुत्रः पुनः पुनः । अभ्यधावत्सुसङ्क्रुद्धः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥

saṅkhye vimardya pāñcālānsūtaputraḥ punaḥ punaḥ | abhyadhāvatsusaṅkruddhaḥ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram

युद्ध में बार-बार पाञ्चालों को कुचलकर सूतपुत्र अत्यन्त क्रुद्ध होकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर पर टूट पड़ा।

श्लोक 64 (8.51.64)

धृष्टद्युम्नश्च राजानं द्रौपदेयाश्च मारिष । परिवव्रुरमित्रघ्नं शतशश्चापरे जनाः ॥

dhṛṣṭadyumnaśca rājānaṃ draupadeyāśca māriṣa | parivavruramitraghnaṃ śataśaścāpare janāḥ

धृष्टद्युम्न और द्रौपदी के पुत्रों ने, हे मान्यवर, तथा सैकड़ों अन्य जनों ने उस शत्रुनाशक राजा को घेर लिया।

श्लोक 65 (8.51.65)

शिखण्डी सहदेवश्च नकुलो नाकुलिस्तथा । जनमेजयः शिनेर्नप्ता बहवश्च प्रभद्रकाः ॥

śikhaṇḍī sahadevaśca nakulo nākulistathā | janamejayaḥ śinernaptā bahavaśca prabhadrakāḥ

शिखण्डी, सहदेव, नकुल और नकुल का पुत्र, जनमेजय, शिनि का पौत्र तथा बहुत-से प्रभद्रक।

श्लोक 66 (8.51.66)

एते पुरोगमा भूत्वा धृष्टद्युम्नश्च संयुगे । कर्णमस्यन्तमिष्वस्त्रैस्ततक्षुरमितौजसम् ॥

ete purogamā bhūtvā dhṛṣṭadyumnaśca saṃyuge | karṇamasyantamiṣvastraistatakṣuramitaujasam

ये सब धृष्टद्युम्न के साथ आगे रहकर युद्ध में बाण और अस्त्र चलाते हुए अपार तेजस्वी कर्ण पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 67 (8.51.67)

तांस्तत्राधिरथिः सङ्ख्ये चेदिपाञ्चालपाण्डवान् । एको बहूनभ्यपतद्गरुत्मानिव पन्नगान् ॥

tāṃstatrādhirathiḥ saṅkhye cedipāñcālapāṇḍavān | eko bahūnabhyapatadgarutmāniva pannagān

अधिरथ-पुत्र अकेला ही युद्ध में उन अनेक चेदियों, पाञ्चालों और पाण्डवों पर टूट पड़ा, जैसे गरुड़ सर्पों पर।

श्लोक 68 (8.51.68)

तैः कर्णस्याभवद्युद्धं घोररूपं विशाम्पते । तादृग्यादृक्पुरावृत्तं देवानां दानवैः सह ॥

taiḥ karṇasyābhavadyuddhaṃ ghorarūpaṃ viśāmpate | tādṛgyādṛkpurāvṛttaṃ devānāṃ dānavaiḥ saha

उनके साथ कर्ण का भयंकर युद्ध हुआ, हे विशाम्पते, वैसा ही जैसा पूर्वकाल में देवताओं और दानवों के बीच हुआ था।

श्लोक 69 (8.51.69)

तान्समेतान्महेष्वासाञ्शरवर्षौधवर्षिणः । एको व्यधमदव्यग्रस्तमांसीव दिवाकरः ॥

tānsametānmaheṣvāsāñśaravarṣaudhavarṣiṇaḥ | eko vyadhamadavyagrastamāṃsīva divākaraḥ

उसने अकेले ही, बिना घबराए, एकत्र हुए और बाणों की धाराएँ बरसाते उन महाधनुर्धरों को वैसे ही तितर-बितर कर दिया, जैसे सूर्य अन्धकार को।

श्लोक 70 (8.51.70)

भीमसेनस्तु संसक्ते राधेये पाण्डवैः सह । सर्वतोऽभ्यहनत्क्रुद्धो यमदण्डनिभैः शरैः ॥

bhīmasenastu saṃsakte rādheye pāṇḍavaiḥ saha | sarvato'bhyahanatkruddho yamadaṇḍanibhaiḥ śaraiḥ

जब राधेय पाण्डवों से भिड़ा हुआ था, तब भीमसेन ने क्रुद्ध होकर यमदण्ड के समान बाणों से चारों ओर प्रहार किया।

श्लोक 71 (8.51.71)

बाह्लीकान्केकयान्मात्स्यान्वासात्यान्मद्रसैन्धवान् । एकः सङ्ख्ये महेष्वासो योधयन्बह्वशोभत ॥

bāhlīkānkekayānmātsyānvāsātyānmadrasaindhavān | ekaḥ saṅkhye maheṣvāso yodhayanbahvaśobhata

बाह्लीकों, केकयों, मत्स्यों, वासातियों, मद्रों और सैन्धवों से अकेले लड़ता हुआ वह महाधनुर्धर रण में बहुत शोभित हुआ।

श्लोक 72 (8.51.72)

तत्र मर्मसु भीमेन नाराचैस्ताडिता गजाः । प्रपतन्तो हतारोहाः कम्पयन्ति स्म मेदिनीम् ॥

tatra marmasu bhīmena nārācaistāḍitā gajāḥ | prapatanto hatārohāḥ kampayanti sma medinīm

वहाँ भीम के नाराचों से मर्म-स्थानों में घायल हुए हाथी, जिनके सवार मारे जा चुके थे, गिरते हुए धरती को कँपाने लगे।

श्लोक 73 (8.51.73)

वाजिनश्च हतारोहाः पत्तयश्च गतासवः । अशेरत महाराज वमन्तो रुधिरं बहु ॥

vājinaśca hatārohāḥ pattayaśca gatāsavaḥ | aśerata mahārāja vamanto rudhiraṃ bahu

जिनके सवार मारे गए थे ऐसे घोड़े और प्राणहीन पैदल सैनिक, महाराज, बहुत-सा रक्त उगलते हुए पड़े थे।

श्लोक 74 (8.51.74)

ताडिताः सहसा नागा भीमसेनेन मारिष । निपतन्ति महावेगा वज्ररुग्णा इवाचलाः ॥

tāḍitāḥ sahasā nāgā bhīmasenena māriṣa | nipatanti mahāvegā vajrarugṇā ivācalāḥ

भीमसेन के अचानक प्रहार से घायल हाथी, हे मान्यवर, वज्र से टूटे पर्वतों की तरह बड़े वेग से गिर पड़ते थे।

श्लोक 75 (8.51.75)

पतितैस्तैर्महाराज वेगवद्भिर्महारथैः । शुशुभे वसुधा राजन्विकीर्णैरिव पर्वतैः ॥

patitaistairmahārāja vegavadbhirmahārathaiḥ | śuśubhe vasudhā rājanvikīrṇairiva parvataiḥ

महाराज! उन वेगवान महारथियों के गिर जाने से धरती ऐसी शोभित हुई मानो उस पर पर्वत बिखरे पड़े हों।

श्लोक 76 (8.51.76)

सहस्रशश्च रथिनः पत्तयः पतितायुधाः । अक्षताः समदृश्यन्त भीमाद्भीता गतासवः ॥

sahasraśaśca rathinaḥ pattayaḥ patitāyudhāḥ | akṣatāḥ samadṛśyanta bhīmādbhītā gatāsavaḥ

हज़ारों रथी और पैदल सैनिक, जिनके हथियार गिर गए थे, बिना घाव के ही भीम के भय से प्राण त्यागे हुए दिखाई दिए।

श्लोक 77 (8.51.77)

रथिभिः सादिभिः सूतैः पादातैर्वाजिभिर्गजैः । भीमसेनशरैश्छिन्नैराच्छन्ना वसुधाभवत् । तत्स्तम्भितमिवातिष्ठद्भीमसेनभयार्दितम् ॥

rathibhiḥ sādibhiḥ sūtaiḥ pādātairvājibhirgajaiḥ | bhīmasenaśaraiśchinnairācchannā vasudhābhavat | tatstambhitamivātiṣṭhadbhīmasenabhayārditam

भीमसेन के बाणों से कटे हुए रथियों, घुड़सवारों, सारथियों, पैदलों, घोड़ों और हाथियों से धरती पट गई। वह सेना भीमसेन के भय से पीड़ित होकर मानो जड़ होकर खड़ी रह गई।

श्लोक 78 (8.51.78)

दुर्योधनबलं सर्वं निरुत्साहं कृतं रणे । निश्चेष्टं तुमुलं दीनं बभौ तस्मिन्महारणे ॥

duryodhanabalaṃ sarvaṃ nirutsāhaṃ kṛtaṃ raṇe | niśceṣṭaṃ tumulaṃ dīnaṃ babhau tasminmahāraṇe

दुर्योधन की सारी सेना रण में उत्साहहीन हो गई; वह निश्चल, अस्त-व्यस्त और दीन दिखाई देने लगी उस महायुद्ध में।

श्लोक 79 (8.51.79)

प्रसन्नसलिले काले यथा स्यात्सागरो नृप । तद्वत्तव बलं तद्वै निश्चलं समवस्थितम् ॥

prasannasalile kāle yathā syātsāgaro nṛpa | tadvattava balaṃ tadvai niścalaṃ samavasthitam

जैसे, राजन्, जल के शान्त होने पर समुद्र निश्चल हो जाता है, वैसे ही आपकी वह सेना निश्चल खड़ी रह गई।

श्लोक 80 (8.51.80)

मन्युवीर्यबलोपेतं दर्पात्प्रत्यवरोपितम् । अभवत्तव पुत्रस्य तत्सैन्यं निष्प्रभं तदा ॥

manyuvīryabalopetaṃ darpātpratyavaropitam | abhavattava putrasya tatsainyaṃ niṣprabhaṃ tadā

क्रोध, पराक्रम और बल से भरी होने पर भी उसका अभिमान उतर गया; आपके पुत्र की वह सेना तब निस्तेज हो गई।

श्लोक 81 (8.51.81)

ते बले भरतश्रेष्ठ वध्यमाने परस्परम् । रुधिरौघपरिक्लिन्ने रुधिरार्द्रे बभूवतुः ॥

te bale bharataśreṣṭha vadhyamāne parasparam | rudhiraughapariklinne rudhirārdre babhūvatuḥ

हे भरतश्रेष्ठ! परस्पर मारी जाती हुई वे दोनों सेनाएँ रक्त की धाराओं से भीगकर लथपथ हो गईं।

श्लोक 82 (8.51.82)

सूतपुत्रोऽवधीत्क्रुद्वः पाण्डवानामनीकिनीम् । भीमसेनः कुरूणां च त्रिगर्तानां धनञ्जयः ॥

sūtaputro'vadhītkrudvaḥ pāṇḍavānāmanīkinīm | bhīmasenaḥ kurūṇāṃ ca trigartānāṃ dhanañjayaḥ

क्रुद्ध सूतपुत्र पाण्डवों की सेना का संहार करने लगा, भीमसेन कौरवों का और धनञ्जय त्रिगर्तों का।

श्लोक 83 (8.51.83)

वर्तमाने तथा रौद्रे सङ्ग्रामेऽद्भुतदर्शने । निहत्य पृतनामध्यं संशप्तकगणान्बहून् । अर्जुनो जयतां श्रेष्ठो वासुदेवमथाब्रवीत् ॥

vartamāne tathā raudre saṅgrāme'dbhutadarśane | nihatya pṛtanāmadhyaṃ saṃśaptakagaṇānbahūn | arjuno jayatāṃ śreṣṭho vāsudevamathābravīt

जब वह भयंकर और विस्मयकारी संग्राम चल रहा था, तब विजेताओं में श्रेष्ठ अर्जुन ने सेना के बीच बहुत-से संशप्तकगणों को मारकर वासुदेव से कहा।

अर्जुन उवाच

श्लोक 84 (8.51.84)

प्रभग्नं बलमेतद्धि योत्स्यमानं मया सह । एते धावन्ति सगणाः संशप्तकमहारथाः ॥

prabhagnaṃ balametaddhi yotsyamānaṃ mayā saha | ete dhāvanti sagaṇāḥ saṃśaptakamahārathāḥ

मुझसे लड़ने को तैयार यह सेना टूट गई है। ये संशप्तक महारथी अपने दलों के साथ भागे जा रहे हैं।

श्लोक 85 (8.51.85)

दुर्जया ह्येव समरे देवैरपि सवासवैः । अपारयन्तो मद्बाणान्सिंहशब्दं मृगा इव ॥

durjayā hyeva samare devairapi savāsavaiḥ | apārayanto madbāṇānsiṃhaśabdaṃ mṛgā iva

युद्ध में देवताओं और इन्द्र के लिए भी जिन्हें जीतना कठिन था, वे ही मेरे बाणों को न सह पाकर सिंह की गर्जना सुनकर भागते मृगों की तरह भाग रहे हैं।

श्लोक 86 (8.51.86)

दीर्यते च महत्सैन्यं सृञ्जयानां महारणे । कुरवश्चाभिधावन्ति भीमसेनभयार्दिताः ॥

dīryate ca mahatsainyaṃ sṛñjayānāṃ mahāraṇe | kuravaścābhidhāvanti bhīmasenabhayārditāḥ

और इस महायुद्ध में सृञ्जयों की विशाल सेना बिखर रही है तथा भीमसेन के भय से पीड़ित कौरव भाग रहे हैं।

श्लोक 87 (8.51.87)

हस्तिकक्ष्यो ह्यसौ कृष्ण केतुः कर्णस्य धीमतः । दृश्यते राजसैन्यस्य मध्ये विचरतो मुहुः ॥

hastikakṣyo hyasau kṛṣṇa ketuḥ karṇasya dhīmataḥ | dṛśyate rājasainyasya madhye vicarato muhuḥ

कृष्ण! वह बुद्धिमान कर्ण की ध्वजा है, जिस पर हाथी की रस्सी का चिह्न है; वह राजा की सेना के बीच बार-बार घूमती दिखाई दे रही है।

श्लोक 88 (8.51.88)

न च कर्णं रणे शक्ता जेतुमेते महारथाः । जानीते हि भवान्कर्णं वीर्यवन्तं पराक्रमे ॥

na ca karṇaṃ raṇe śaktā jetumete mahārathāḥ | jānīte hi bhavānkarṇaṃ vīryavantaṃ parākrame

ये महारथी रण में कर्ण को जीतने में समर्थ नहीं हैं। आप जानते ही हैं कि कर्ण पराक्रम में कितना बलवान है।

श्लोक 89 (8.51.89)

तत्र याहि यतः कर्णो द्रावयत्येष नो बलम् । त्रिगर्तान्वर्जयन्याहि सूतपुत्रं महारथम् । एतन्मे रोचते कृष्ण यथा वा तव रोचते ॥

tatra yāhi yataḥ karṇo drāvayatyeṣa no balam | trigartānvarjayanyāhi sūtaputraṃ mahāratham | etanme rocate kṛṣṇa yathā vā tava rocate

वहाँ चलिए, जहाँ कर्ण हमारी सेना को भगा रहा है। त्रिगर्तों को छोड़कर उस महारथी सूतपुत्र की ओर चलिए। कृष्ण! मुझे यही अच्छा लगता है, अथवा जैसा आपको अच्छा लगे।

सञ्जय उवाच

श्लोक 90 (8.51.90)

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य गोविन्दः प्रहसन्निव । अब्रवीदर्जुनं तूर्णं कौरवान्याहि पाण्डव ॥

etacchrutvā vacastasya govindaḥ prahasanniva | abravīdarjunaṃ tūrṇaṃ kauravānyāhi pāṇḍava

उसकी यह बात सुनकर गोविन्द ने मानो मुस्कराते हुए अर्जुन से शीघ्र कहा, "पाण्डव! कौरवों की ओर चलो।"

श्लोक 91 (8.51.91)

ततस्तव महासैन्यं गोविन्दप्रेरिता हयाः । हंसवर्णा विविशुस्तूर्णं वहन्तोऽर्जुनमाहवे ॥

tatastava mahāsainyaṃ govindapreritā hayāḥ | haṃsavarṇā viviśustūrṇaṃ vahanto'rjunamāhave

तब गोविन्द के हाँके हुए हंस के समान श्वेत घोड़े अर्जुन को रण में ढोते हुए शीघ्र ही आपकी विशाल सेना में घुस गए।

श्लोक 92 (8.51.92)

केशवप्रेरितैरश्वैः श्वेतैः काञ्चनभूषणैः । प्रविशद्भिस्तव बलं चतुर्दिशमदीर्यत ॥

keśavapreritairaśvaiḥ śvetaiḥ kāñcanabhūṣaṇaiḥ | praviśadbhistava balaṃ caturdiśamadīryata

केशव के हाँके हुए सोने के आभूषणों से सजे श्वेत घोड़ों के भीतर घुसने से आपकी सेना चारों दिशाओं में फट गई।

श्लोक 93 (8.51.93)

मेघस्तनितनिर्ह्रादः स रथो वानरध्वजः । चलत्पताकस्तां सेनां विमानं द्यामिवाविशत् ॥

meghastanitanirhrādaḥ sa ratho vānaradhvajaḥ | calatpatākastāṃ senāṃ vimānaṃ dyāmivāviśat

मेघ की गर्जना जैसी ध्वनि वाला, लहराती पताकाओं से युक्त वह वानर-ध्वज रथ उस सेना में ऐसे घुसा, जैसे दिव्य विमान आकाश में प्रवेश करता है।

श्लोक 94 (8.51.94)

तौ विदार्य महासेनां प्रविष्टौ केशवार्जुनो । क्रुद्धौ संरम्भरक्ताक्षौ विभ्राजेतां महाद्युती ॥

tau vidārya mahāsenāṃ praviṣṭau keśavārjuno | kruddhau saṃrambharaktākṣau vibhrājetāṃ mahādyutī

उस विशाल सेना को चीरकर केशव और अर्जुन भीतर घुस गए; क्रोध से उनकी आँखें लाल थीं और वे दोनों महातेजस्वी बड़े प्रकाशित हो रहे थे।

श्लोक 95 (8.51.95)

युद्धशौण्डौ समाहूतावागतौ तौ रणाध्वरम् । यज्वभिर्विधिना हूतौ मखं देवाविवाश्विनौ ॥

yuddhaśauṇḍau samāhūtāvāgatau tau raṇādhvaram | yajvabhirvidhinā hūtau makhaṃ devāvivāśvinau

युद्ध के रसिक वे दोनों बुलाए जाने पर रण-रूपी यज्ञ में आ पहुँचे, जैसे यज्ञ करने वालों से विधिपूर्वक आहूत दोनों अश्विनीकुमार यज्ञ में आते हैं।

श्लोक 96 (8.51.96)

क्रोधताम्रेक्षणौ शूरौ शुशुभाते महाबलौ । मदोत्कटौ यथा नागौ दृष्टिसञ्चारचारिणौ ॥

krodhatāmrekṣaṇau śūrau śuśubhāte mahābalau | madotkaṭau yathā nāgau dṛṣṭisañcāracāriṇau

क्रोध से ताँबे जैसी लाल आँखों वाले वे दोनों महाबली शूर, इधर-उधर दृष्टि घुमाते हुए, मदमस्त दो हाथियों के समान शोभित हुए।

श्लोक 97 (8.51.97)

क्रुद्धौ तौ तु नरव्याघ्रौ योगवन्तौ बभूवतुः । तलशब्देन रुषितौ महानागाविवोत्कटौ ॥

kruddhau tau tu naravyāghrau yogavantau babhūvatuḥ | talaśabdena ruṣitau mahānāgāvivotkaṭau

क्रुद्ध हुए वे दोनों पुरुषव्याघ्र दृढ़ निश्चय वाले हो गए और ताल ठोंकने की ध्वनि से रुष्ट होकर दो विशाल मदमस्त हाथियों जैसे लगने लगे।

श्लोक 98 (8.51.98)

विगाह्य तु रथानीकमश्वसङ्घांश्च फल्गुनः । व्यचरत्पृतनामध्ये पाशहस्त इवान्तकः ॥

vigāhya tu rathānīkamaśvasaṅghāṃśca phalgunaḥ | vyacaratpṛtanāmadhye pāśahasta ivāntakaḥ

रथों की पंक्तियों और घोड़ों के झुण्डों में घुसकर फल्गुन सेना के बीच पाश हाथ में लिए अन्तक के समान विचरने लगा।

श्लोक 99 (8.51.99)

तं दृष्ट्वा युधि विक्रान्तं सेनायां तव भारत । संशप्तकगणान्भूयः पुत्रस्ते समचूचुदत् ॥

taṃ dṛṣṭvā yudhi vikrāntaṃ senāyāṃ tava bhārata | saṃśaptakagaṇānbhūyaḥ putraste samacūcudat

आपकी सेना में उस पराक्रमी को लड़ते देखकर, हे भारत, आपके पुत्र ने संशप्तकगणों को फिर बढ़ावा दिया।

श्लोक 100 (8.51.100)

ततो रथसहस्रेण द्विरदानां त्रिभिः शतैः । चतुर्दशसहस्रैस्तु तुरगाणां महाहवे । द्वाभ्यां शतसहस्राभ्यां पदातीनां च धन्विनाम् ॥

tato rathasahasreṇa dviradānāṃ tribhiḥ śataiḥ | caturdaśasahasraistu turagāṇāṃ mahāhave | dvābhyāṃ śatasahasrābhyāṃ padātīnāṃ ca dhanvinām

तब एक हज़ार रथों, तीन सौ हाथियों और उस महायुद्ध में चौदह हज़ार घोड़ों के साथ, तथा दो लाख धनुर्धर पैदल सैनिकों के साथ,

श्लोक 101 (8.51.101)

शूराणां लब्धलक्षाणां विदितानां समन्ततः । अभ्यवर्तन्त कौन्तेयं छादयन्तो महारथाः ॥

śūrāṇāṃ labdhalakṣāṇāṃ viditānāṃ samantataḥ | abhyavartanta kaunteyaṃ chādayanto mahārathāḥ

जिनके निशाने अचूक थे और जो चारों ओर प्रसिद्ध थे, ऐसे शूरों के रूप में वे महारथी कुन्तीपुत्र को ढकते हुए उस पर चढ़ आए।

श्लोक 102 (8.51.102)

शरवर्षैर्महाराज सर्वतः पाण्डुनन्दनम् । स च्छाद्यमानः समरे शरैः परबलार्दनः ॥

śaravarṣairmahārāja sarvataḥ pāṇḍunandanam | sa cchādyamānaḥ samare śaraiḥ parabalārdanaḥ

महाराज! रण में चारों ओर से बाणों की वर्षा से ढका जाता हुआ वह शत्रुसेना का नाशक पाण्डुनन्दन

श्लोक 103 (8.51.103)

दर्शयन्रौद्रमात्मानं पाशहस्त इवान्तकः । निघ्नन्संशप्तकान्पार्थः प्रेक्षणीयतरोऽभवत् ॥

darśayanraudramātmānaṃ pāśahasta ivāntakaḥ | nighnansaṃśaptakānpārthaḥ prekṣaṇīyataro'bhavat

पाशधारी यम के समान अपना भयंकर रूप दिखाता हुआ संशप्तकों को मारने लगा और और भी दर्शनीय हो उठा।

श्लोक 104 (8.51.104)

ततो विद्युत्प्रभैर्बाणैः कार्तस्वरविभूषितैः । निरन्तरमिवाकाशमासीच्छन्नं किरीटिना ॥

tato vidyutprabhairbāṇaiḥ kārtasvaravibhūṣitaiḥ | nirantaramivākāśamāsīcchannaṃ kirīṭinā

तब बिजली जैसी चमकते, सोने से सजे बाणों से किरीटी ने आकाश को ऐसा ढक दिया कि उसमें कोई अन्तर न रहा।

श्लोक 105 (8.51.105)

किरीटिचापनिर्मुक्तैः सम्पतद्भिर्महाशरैः । समाच्छन्नं बभौ सर्वं काद्रवेयैरिव प्रभो ॥

kirīṭicāpanirmuktaiḥ sampatadbhirmahāśaraiḥ | samācchannaṃ babhau sarvaṃ kādraveyairiva prabho

हे प्रभो! किरीटी के धनुष से छूटकर गिरते महाबाणों से ढका हुआ सब कुछ ऐसा लगा मानो कद्रू के पुत्रों, अर्थात् सर्पों, से ढक गया हो।

श्लोक 106 (8.51.106)

रुक्मपुङ्खाञ्शरान्घोरान्प्रसन्नान्नतपर्वणः । अवासृजदमेयात्मा दिक्षु सर्वासु पाण्डवः ॥

rukmapuṅkhāñśarānghorānprasannānnataparvaṇaḥ | avāsṛjadameyātmā dikṣu sarvāsu pāṇḍavaḥ

अमित पराक्रमी पाण्डव ने सब दिशाओं में सोने के पंखों वाले, भयंकर, तीखे और सीधी गाँठों वाले बाण छोड़े।

श्लोक 107 (8.51.107)

मही वियद्दिशः सर्वाः समुद्रा गिरयोऽपि वा । स्फुटन्तीति जना जज्ञुः पार्थस्य तलनिःस्वनात् ॥

mahī viyaddiśaḥ sarvāḥ samudrā girayo'pi vā | sphuṭantīti janā jajñuḥ pārthasya talaniḥsvanāt

पार्थ के करतल की ध्वनि से पृथ्वी, आकाश, सब दिशाएँ, समुद्र और पर्वत मानो फटे जा रहे हैं — लोगों ने ऐसा समझा।

श्लोक 108 (8.51.108)

हत्वा दशसहस्राणि पार्थिवानां महारथः । संशप्तकानां कौन्तेयः प्रपक्षं त्वरितोऽभ्ययात् ॥

hatvā daśasahasrāṇi pārthivānāṃ mahārathaḥ | saṃśaptakānāṃ kaunteyaḥ prapakṣaṃ tvarito'bhyayāt

संशप्तकों के दस हज़ार राजाओं को मारकर महारथी कुन्तीपुत्र शीघ्र ही उनके पार्श्व-भाग की ओर बढ़ा।

श्लोक 109 (8.51.109)

प्रपक्षं च समासाद्य पार्थः काम्भोजरक्षितम् । प्रममाथ बलं भल्लैर्दानवानिव वासवः ॥

prapakṣaṃ ca samāsādya pārthaḥ kāmbhojarakṣitam | pramamātha balaṃ bhallairdānavāniva vāsavaḥ

कम्बोजों द्वारा रक्षित उस पार्श्व-भाग के पास पहुँचकर पार्थ ने भल्लों से उस सेना को वैसे ही कुचल दिया, जैसे इन्द्र दानवों को।

श्लोक 110 (8.51.110)

प्रचिच्छेदाशु भल्लेन द्विषतामाततायिनाम् । शस्त्रपाणींस्तथा बाहूंस्तथापि च शिरांस्युत ॥

pracicchedāśu bhallena dviṣatāmātatāyinām | śastrapāṇīṃstathā bāhūṃstathāpi ca śirāṃsyuta

उसने भल्लों से शीघ्र ही उन आततायी शत्रुओं के शस्त्र थामे हाथ, भुजाएँ और सिर भी काट डाले।

श्लोक 111 (8.51.111)

अङ्गाङ्गावयवैश्छिन्नैर्व्यायुधास्तेऽपतन्भुवि । विष्वग्वाताभिसम्भग्ना बहुशाखा इव द्रुमाः ॥

aṅgāṅgāvayavaiśchinnairvyāyudhāste'patanbhuvi | viṣvagvātābhisambhagnā bahuśākhā iva drumāḥ

अंग-अंग कट जाने से वे निरस्त्र होकर धरती पर गिर पड़े, जैसे चारों ओर की हवाओं से टूटे हुए बहुत शाखाओं वाले वृक्ष।

श्लोक 112 (8.51.112)

हस्त्यश्वरथपत्तीनां व्रातान्निघ्नन्तमर्जुनम् । सुदक्षिणादवरजः शरवृष्ट्याभ्यवीवृषत् ॥

hastyaśvarathapattīnāṃ vrātānnighnantamarjunam | sudakṣiṇādavarajaḥ śaravṛṣṭyābhyavīvṛṣat

हाथी, घोड़े, रथ और पैदलों के समूहों को काटते हुए अर्जुन पर सुदक्षिण के छोटे भाई ने बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 113 (8.51.113)

तस्यास्यतोऽर्धचन्द्राभ्यां स बाहू परिघोपमौ । पूर्णचन्द्राभवक्त्रं च क्षुरेणापाहरच्छिरः ॥

tasyāsyato'rdhacandrābhyāṃ sa bāhū parighopamau | pūrṇacandrābhavaktraṃ ca kṣureṇāpāharacchiraḥ

उसके बाण चलाते-चलाते अर्जुन ने दो अर्धचन्द्र बाणों से परिघ जैसी उसकी दोनों भुजाएँ और एक क्षुर से पूर्णचन्द्र जैसे मुख वाला उसका सिर काट गिराया।

श्लोक 114 (8.51.114)

तत्पपात ततो वेगात्स्वलोहितपरिष्कृतम् । मनः शिलागिरेः शृङ्गं वज्रेणेवावदारितम् ॥

tatpapāta tato vegātsvalohitapariṣkṛtam | manaḥ śilāgireḥ śṛṅgaṃ vajreṇevāvadāritam

वह सिर अपने ही रक्त से सजा हुआ वेग से गिरा, जैसे वज्र से टूटा मैनसिल पर्वत का शिखर।

श्लोक 115 (8.51.115)

सुदक्षिणादवरजं काम्भोजा ददृशुर्हतम् । प्रांशुं कमलपत्राक्षमत्यर्थं प्रियदर्शनम् । काञ्चनस्तम्भसदृशं भिन्नं हेमगिरिं यथा ॥

sudakṣiṇādavarajaṃ kāmbhojā dadṛśurhatam | prāṃśuṃ kamalapatrākṣamatyarthaṃ priyadarśanam | kāñcanastambhasadṛśaṃ bhinnaṃ hemagiriṃ yathā

काम्बोजों ने सुदक्षिण के छोटे भाई को मरा हुआ देखा — ऊँचे डील-डौल वाला, कमलपत्र जैसी आँखों वाला, अत्यन्त प्रिय दिखने वाला, सोने के खम्भे जैसा, मानो टूटा हुआ स्वर्ण-पर्वत।

श्लोक 116 (8.51.116)

ततोऽभवत्पुनर्युद्धं घोरमत्यर्थमद्भुतम् । नानावस्थाश्च योधानां बभूवुस्तत्र युध्यताम् ॥

tato'bhavatpunaryuddhaṃ ghoramatyarthamadbhutam | nānāvasthāśca yodhānāṃ babhūvustatra yudhyatām

तब फिर अत्यन्त भयंकर और अद्भुत युद्ध छिड़ गया, और वहाँ लड़ते हुए योद्धाओं की तरह-तरह की दशाएँ हुईं।

श्लोक 117 (8.51.117)

पार्थेषुनिहतैरश्वैः काम्भोजैर्यवनैः शकैः । शोणिताक्तैस्तदा रक्तं सर्वमासीद्विशां पते ॥

pārtheṣunihatairaśvaiḥ kāmbhojairyavanaiḥ śakaiḥ | śoṇitāktaistadā raktaṃ sarvamāsīdviśāṃ pate

पार्थ के बाणों से मारे गए और रक्त से लथपथ काम्बोजों, यवनों और शकों के घोड़ों से तब सारा रणक्षेत्र लाल हो गया, हे विशाम्पते।

श्लोक 118 (8.51.118)

रथैर्हताश्वसूतैश्च हतारोहैश्च वाजिभिः । द्विरदैश्च हतारोहैर्महामात्रैर्हतद्विपैः ॥

rathairhatāśvasūtaiśca hatārohaiśca vājibhiḥ | dviradaiśca hatārohairmahāmātrairhatadvipaiḥ

जिन रथों के घोड़े और सारथि मारे गए थे, जिन घोड़ों के सवार मारे गए थे, जिन हाथियों के सवार मारे गए थे और जिन महावतों के हाथी मारे गए थे — इन सबके साथ

श्लोक 119 (8.51.119)

अन्योन्येन महाराज विनाशः पृथिवीक्षिताम् । आसीत्क्रुद्धेऽर्जुने कर्णे भीमसेने च दारुणम् ॥

anyonyena mahārāja vināśaḥ pṛthivīkṣitām | āsītkruddhe'rjune karṇe bhīmasene ca dāruṇam

अर्जुन, कर्ण और भीमसेन के क्रुद्ध होने पर, महाराज, राजाओं का परस्पर भयंकर विनाश हुआ।

श्लोक 120 (8.51.120)

तस्मिन्प्रपक्षे पक्षे च वध्यमाने मदोत्कटः । अर्जुनं जयतां श्रेष्ठं त्वरितो द्रौणिरभ्ययात् ॥

tasminprapakṣe pakṣe ca vadhyamāne madotkaṭaḥ | arjunaṃ jayatāṃ śreṣṭhaṃ tvarito drauṇirabhyayāt

उस पार्श्व-भाग और पक्ष के कटते जाने पर क्रोध से मतवाला द्रोणपुत्र विजेताओं में श्रेष्ठ अर्जुन की ओर शीघ्रता से बढ़ा।

श्लोक 121 (8.51.121)

विधुन्वानो महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् । आददानः शरान्घोरान्स्वरश्मीनिव भास्करः ॥

vidhunvāno mahaccāpaṃ kārtasvaravibhūṣitam | ādadānaḥ śarānghorānsvaraśmīniva bhāskaraḥ

वह सोने से सजे अपने विशाल धनुष को हिलाता हुआ और भयंकर बाण उठाता हुआ ऐसा लगा, जैसे सूर्य अपनी किरणों को समेट रहा हो।

श्लोक 122 (8.51.122)

तयोरासीन्महद्युद्धं धर्मभ्रात्रोरनैष्ठिकम् । विस्मापयिषतोर्लोकं यशश्चोत्तममिच्छतोः ॥

tayorāsīnmahadyuddhaṃ dharmabhrātroranaiṣṭhikam | vismāpayiṣatorlokaṃ yaśaścottamamicchatoḥ

लोक को चकित करने और सर्वोत्तम यश पाने की इच्छा रखने वाले उन दो धर्मभाइयों के बीच अनिर्णायक महायुद्ध हुआ।

श्लोक 123 (8.51.123)

संशप्तकांस्तु कौन्तेयः कुरूंश्चापि वृकोदरः । सूतपुत्रस्तु पाञ्चालांस्त्रयोऽघ्नंस्त्वरिताः शरैः ॥

saṃśaptakāṃstu kaunteyaḥ kurūṃścāpi vṛkodaraḥ | sūtaputrastu pāñcālāṃstrayo'ghnaṃstvaritāḥ śaraiḥ

कुन्तीपुत्र संशप्तकों को, वृकोदर कौरवों को और सूतपुत्र पाञ्चालों को बाणों से तेज़ी से मारने लगे — ये तीनों ही।

श्लोक 124 (8.51.124)

एवमेष महाराज विनाशः पृथिवीक्षिताम् । युद्धं घोरं तथा त्वासीत्त्रिधाभूते चमूमुखे ॥

evameṣa mahārāja vināśaḥ pṛthivīkṣitām | yuddhaṃ ghoraṃ tathā tvāsīttridhābhūte camūmukhe

इस प्रकार, महाराज, राजाओं का यह विनाश हुआ, और सेना के अग्रभाग के तीन ओर बँट जाने पर युद्ध भयंकर हो गया।

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