कर्ण पर्व · अध्याय 55
अर्जुन द्वारा संशप्तकों का संहार; कृष्ण दिखाते हैं रणभूमि
संशप्तकों को जीतकर लौटे अर्जुन अपने रथ पर टूट पड़ने वाले कौरव-प्रमुखों को काट डालते हैं और बाणों से उनके रथों, हाथियों तथा घोड़ों को नष्ट कर देते हैं। कृष्ण उनसे कहते हैं कि बचे हुए संशप्तकों को समाप्त करके कर्ण के वध के लिए शीघ्रता करें, फिर रणभूमि के बीच से चलते हुए उन्हें वहाँ बिखरे शस्त्र, आभूषण और शव दिखाते हैं। आगे बढ़ने पर वे दुर्योधन की सेना में भारी कोलाहल सुनते हैं और देखते हैं कि पाण्ड्य राजा कौरव-सेना को कड़ाई से दबा रहा है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (8.55.1)
प्रत्येत्याथ पुनर्जिष्णुर्जित्वा संशप्तकान्बभौ । वक्रानुवक्रगमनादङ्गारक इव ग्रहः ॥
pratyetyātha punarjiṣṇurjitvā saṃśaptakānbabhau | vakrānuvakragamanādaṅgāraka iva grahaḥ
संशप्तकों को जीतकर अर्जुन फिर लौट आया और वक्र तथा अनुवक्र गति से चलने वाले अंगारक (मंगल) ग्रह के समान शोभित हुआ।
श्लोक 2 (8.55.2)
पार्थबाणहता राजन्नराश्वरथकुञ्जराः । विचेलुर्बभ्रमुर्नेशुः पेतुर्मम्लुश्च भारत ॥
pārthabāṇahatā rājannarāśvarathakuñjarāḥ | vicelurbabhramurneśuḥ peturmamluśca bhārata
हे राजन्, पार्थ के बाणों से मारे गए मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथी लड़खड़ाए, चक्कर काटते रहे, नष्ट हुए, गिरे और मुरझा गए, हे भारत।
श्लोक 3 (8.55.3)
धुर्यान्धुर्येतरान्सूतान्ध्वजांश्चापासिसायकान् । पाणीन्पाणिगताञ्शस्त्रान्बाहूनपि शिरांसि च ॥
dhuryāndhuryetarānsūtāndhvajāṃścāpāsisāyakān | pāṇīnpāṇigatāñśastrānbāhūnapi śirāṃsi ca
प्रधान घोड़ों और अन्य घोड़ों को, सारथियों को, ध्वजाओं को, धनुषों, तलवारों और बाणों को, हाथों को और उनमें थमे हुए शस्त्रों को, भुजाओं को और सिरों को भी
श्लोक 4 (8.55.4)
भल्लैः क्षुरैरर्धचन्द्रैर्वत्सदन्तैश्च पाण्डवः । चिच्छेदामित्रवीराणां समरे प्रतियुध्यताम् ॥
bhallaiḥ kṣurairardhacandrairvatsadantaiśca pāṇḍavaḥ | cicchedāmitravīrāṇāṃ samare pratiyudhyatām
भल्लों, क्षुरों, अर्धचन्द्रों और वत्सदन्त बाणों से पाण्डुपुत्र ने रणभूमि में सामने लड़ने वाले शत्रु-वीरों के ये सब काट डाले।
श्लोक 5 (8.55.5)
तं प्रवीरास्त्वदीयानां नर्दमानाऽभिदुद्रुवुः । वासितार्थे युयुत्सन्तो वृषभा वृषभं यथा । निपतन्त्यर्जुनं शूराः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
taṃ pravīrāstvadīyānāṃ nardamānā'bhidudruvuḥ | vāsitārthe yuyutsanto vṛṣabhā vṛṣabhaṃ yathā | nipatantyarjunaṃ śūrāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
गरजते हुए आपके प्रमुख वीर उस पर टूट पड़े, जैसे ऋतुमती गाय के लिए लड़ने की इच्छा से साँड़ दूसरे साँड़ पर टूट पड़ते हैं; सैकड़ों और हज़ारों शूर अर्जुन पर गिरने लगे।
श्लोक 6 (8.55.6)
तेषां तस्य च तद्युद्धमभवद्रोमहर्षणम् । त्रैलोक्यविजये यादृग्दैत्यानां सह वज्रिणा ॥
teṣāṃ tasya ca tadyuddhamabhavadromaharṣaṇam | trailokyavijaye yādṛgdaityānāṃ saha vajriṇā
उनके और अर्जुन के बीच रोंगटे खड़े कर देने वाला वैसा ही युद्ध हुआ, जैसा तीनों लोकों को जीतने के समय दैत्यों का वज्रधारी इन्द्र के साथ हुआ था।
श्लोक 7 (8.55.7)
तमविध्यत्त्रिभिर्बाणैर्दन्दशूकैरिवाहिभिः । उग्रायुधस्य तस्याशु शिरः कायादपाहरत् ॥
tamavidhyattribhirbāṇairdandaśūkairivāhibhiḥ | ugrāyudhasya tasyāśu śiraḥ kāyādapāharat
उसने डसने वाले सर्पों के समान तीन बाणों से उसे बींध डाला और उग्रायुध के सिर को शीघ्र ही उसके धड़ से अलग कर दिया।
श्लोक 8 (8.55.8)
तेऽर्जुनं सर्वतः क्रुद्धा नानाशस्त्रैरवीवृषन् । मरुद्भिः प्रेरिता मेघा हिमवन्तमिवोष्णगे ॥
te'rjunaṃ sarvataḥ kruddhā nānāśastrairavīvṛṣan | marudbhiḥ preritā meghā himavantamivoṣṇage
क्रोध में भरे हुए उन्होंने चारों ओर से अर्जुन पर नाना प्रकार के शस्त्रों की वर्षा की, जैसे ग्रीष्म बीत जाने पर वायु से प्रेरित बादल हिमालय पर बरसते हैं।
श्लोक 9 (8.55.9)
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य द्विषतां सर्वतोऽर्जुनः । सम्यगस्तैः शरैः सर्वानहितानहनद्बहून् ॥
astrairastrāṇi saṃvārya dviṣatāṃ sarvato'rjunaḥ | samyagastaiḥ śaraiḥ sarvānahitānahanadbahūn
शत्रुओं के अस्त्रों को अपने अस्त्रों से सब ओर रोककर अर्जुन ने भली-भाँति चलाए हुए बाणों से बहुत-से शत्रुओं को मार डाला।
श्लोक 10 (8.55.10)
छिन्नत्रिवेणुजङ्घेषान्हताश्वान्हतसारथीन् । विस्रस्तहस्ततूणीरान्विचक्ररथकेतनान् ॥
chinnatriveṇujaṅgheṣānhatāśvānhatasārathīn | visrastahastatūṇīrānvicakrarathaketanān
जिनके त्रिवेणु, जंघा और ईषा कट गए थे, घोड़े और सारथि मारे गए थे, सवारों के हाथों से तरकस ढीले होकर गिर पड़े थे, जिनके पहिये टूट गए थे और ध्वजाएँ नष्ट हो गई थीं,
श्लोक 11 (8.55.11)
सञ्छिन्नरश्मियोक्त्राक्षान्व्यनुकर्षयुगान्रथान् । विध्वस्तसर्वसन्नाहान्बाणैश्चक्रेऽर्जुनस्त्वरन् ॥
sañchinnaraśmiyoktrākṣānvyanukarṣayugānrathān | vidhvastasarvasannāhānbāṇaiścakre'rjunastvaran
जिनकी रस्सियाँ, जुए के बन्धन और धुरे कट गए थे, अनुकर्ष और जुए उखड़ गए थे और सारे कवच बिखर गए थे—ऐसे रथ अर्जुन ने शीघ्रता से अपने बाणों द्वारा बना डाले।
श्लोक 12 (8.55.12)
ते रथास्तत्र विध्वस्ताः परार्ध्या भान्त्यनेकशः । धनिनामिव वेश्मानि हतान्यग्न्यनिलाम्बुभिः ॥
te rathāstatra vidhvastāḥ parārdhyā bhāntyanekaśaḥ | dhanināmiva veśmāni hatānyagnyanilāmbubhiḥ
वहाँ टूटे हुए वे बहुमूल्य रथ अनेक संख्या में पड़े शोभित हो रहे थे, जैसे अग्नि, वायु और जल से नष्ट हुए धनवानों के भवन।
श्लोक 13 (8.55.13)
द्विपाः सम्भिन्नमर्माणो वज्राशनिसमैः शरैः । पेतुर्गिर्यग्रवेश्मानि वज्रवाताग्निभिर्यथा ॥
dvipāḥ sambhinnamarmāṇo vajrāśanisamaiḥ śaraiḥ | peturgiryagraveśmāni vajravātāgnibhiryathā
वज्र और बिजली के समान बाणों से जिनके मर्मस्थान फट गए थे, ऐसे हाथी गिर पड़े, जैसे वज्र, आँधी और आग से नष्ट हुए पर्वत-शिखर के घर गिरते हैं।
श्लोक 14 (8.55.14)
अनेकैश्च शिलाधौतैर्वज्रानलविषोपमैः । शरैर्निजघ्निवान्पार्थो महेन्द्र इव दानवान् ॥
anekaiśca śilādhautairvajrānalaviṣopamaiḥ | śarairnijaghnivānpārtho mahendra iva dānavān
शिला पर तेज़ किए हुए, वज्र, अग्नि और विष के समान अनेक बाणों से पार्थ ने उन्हें वैसे ही मार गिराया, जैसे महेन्द्र ने दानवों को मारा था।
श्लोक 15 (8.55.15)
सारोहास्तुरगाः पेतुर्बहवोऽर्जुनताडिताः । निर्जिह्वान्त्राः क्षितौ क्षीणा रुधिरार्द्राः सुदुर्दृशः ॥
sārohāsturagāḥ peturbahavo'rjunatāḍitāḥ | nirjihvāntrāḥ kṣitau kṣīṇā rudhirārdrāḥ sudurdṛśaḥ
अर्जुन के प्रहार से सवारों सहित बहुत-से घोड़े गिरे; उनकी जीभें और आँतें बाहर निकल आई थीं, वे धरती पर निढाल पड़े थे, रक्त से भीगे थे और देखने में भयंकर थे।
श्लोक 16 (8.55.16)
नराश्वनागा नाराचैः संस्यूताः सव्यसाचिना । बभ्रमुश्चस्खलुः पेतुर्नेदुर्मम्लुश्च मारिष ॥
narāśvanāgā nārācaiḥ saṃsyūtāḥ savyasācinā | babhramuścaskhaluḥ peturnedurmamluśca māriṣa
सव्यसाची के नाराचों से बिंधे हुए मनुष्य, घोड़े और हाथी चक्कर खाते, लड़खड़ाते, गिरते, चिल्लाते और मुरझाते गए, हे माननीय।
श्लोक 17 (8.55.17)
महार्हवर्माभरणा नानारूपाम्बरायुधाः । सरथाश्वद्विपा वीरा हताः पार्थेन शेरते ॥
mahārhavarmābharaṇā nānārūpāmbarāyudhāḥ | sarathāśvadvipā vīrā hatāḥ pārthena śerate
बहुमूल्य कवच और आभूषण धारण किए, नाना रूप के वस्त्र और आयुध वाले वीर रथ, घोड़ों और हाथियों सहित पार्थ के हाथों मारे जाकर पड़े हैं।
श्लोक 18 (8.55.18)
निर्भयाः पुण्यकर्माणो विशिष्टाभिजनश्रुताः । गताः शरीरैर्वसुधामूर्जितैः कर्मभिर्दिवम् ॥
nirbhayāḥ puṇyakarmāṇo viśiṣṭābhijanaśrutāḥ | gatāḥ śarīrairvasudhāmūrjitaiḥ karmabhirdivam
निर्भय, पुण्यकर्मा, उत्तम कुल और विद्या वाले वे वीर अपने प्रबल कर्मों के बल से शरीर पृथ्वी पर छोड़कर स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 19 (8.55.19)
अथार्जुनरथं वीरास्त्वदीयाः समभिद्रवन् । नानाजनपदाध्यक्षाः सगणा जातमन्यवः ॥
athārjunarathaṃ vīrāstvadīyāḥ samabhidravan | nānājanapadādhyakṣāḥ sagaṇā jātamanyavaḥ
तब आपके वीर अर्जुन के रथ पर टूट पड़े—अनेक जनपदों के अधिपति, अपनी-अपनी टुकड़ियों के साथ, क्रोध से भरे हुए,
श्लोक 20 (8.55.20)
उह्यमाना रथाश्वेभैः पत्तयश्च जिघांसवः । समभ्यधावन्नस्यन्तो विविधं क्षिप्रमायुधम् ॥
uhyamānā rathāśvebhaiḥ pattayaśca jighāṃsavaḥ | samabhyadhāvannasyanto vividhaṃ kṣipramāyudham
रथों, घोड़ों और हाथियों पर सवार, तथा मारने को आतुर पैदल सैनिक—वे नाना प्रकार के शस्त्र शीघ्रता से फेंकते हुए उस पर दौड़े।
श्लोक 21 (8.55.21)
तदायुधमहावर्षं क्षिप्तं योधमहाम्बुदैः । व्यधमन्निशितैर्बाणैः क्षिप्रमर्जुनमारुतः ॥
tadāyudhamahāvarṣaṃ kṣiptaṃ yodhamahāmbudaiḥ | vyadhamanniśitairbāṇaiḥ kṣipramarjunamārutaḥ
योद्धारूपी बड़े बादलों द्वारा बरसाई गई उस शस्त्रों की महावर्षा को अर्जुनरूपी वायु ने अपने तीखे बाणों से शीघ्र ही छिन्न-भिन्न कर दिया।
श्लोक 22 (8.55.22)
साश्वपत्तिद्विपरथं महाशस्त्रौघसम्प्लवम् । सहसा सन्तितीर्षन्तं पार्थं शस्त्रास्त्रसेतुना ॥
sāśvapattidviparathaṃ mahāśastraughasamplavam | sahasā santitīrṣantaṃ pārthaṃ śastrāstrasetunā
घोड़ों, पैदलों, हाथियों और रथों से युक्त उस शस्त्र-समूह के महान् प्रवाह को जब पार्थ अपने शस्त्रों और अस्त्रों के सेतु से सहसा पार करना चाहते थे,
श्लोक 23 (8.55.23)
अथाब्रवीद्वासुदेवः पार्थ किं क्रीडसेऽनघ । संशप्तकान्प्रमथ्यैनांस्ततः कर्णवधे त्वर ॥
athābravīdvāsudevaḥ pārtha kiṃ krīḍase'nagha | saṃśaptakānpramathyaināṃstataḥ karṇavadhe tvara
तब वासुदेव ने कहा—“हे निष्पाप पार्थ, तुम खेल क्यों रहे हो? इन संशप्तकों को कुचल डालो और फिर कर्ण के वध के लिए शीघ्रता करो।”
श्लोक 24 (8.55.24)
तथेत्युक्त्वाऽर्जुनः कृष्णं शिष्टान्संशप्तकांस्तदा । क्षपयिष्यंस्तदा बाणैर्दैत्यानिन्द्र इवावधीत् ॥
tathetyuktvā'rjunaḥ kṛṣṇaṃ śiṣṭānsaṃśaptakāṃstadā | kṣapayiṣyaṃstadā bāṇairdaityānindra ivāvadhīt
“ऐसा ही हो” कहकर अर्जुन ने कृष्ण से स्वीकार किया और बचे हुए संशप्तकों को समाप्त करने की इच्छा से उन्हें बाणों द्वारा वैसे ही मार गिराया, जैसे इन्द्र ने दैत्यों को मारा था।
श्लोक 25 (8.55.25)
आददत्सन्दधन्नेषून्दृष्टः कैश्चिद्रणेऽर्जुनः । विमुञ्चन्वा शराञ्शीघ्रं दृश्यन्ते वै नरा हताः ॥
ādadatsandadhanneṣūndṛṣṭaḥ kaiścidraṇe'rjunaḥ | vimuñcanvā śarāñśīghraṃ dṛśyante vai narā hatāḥ
कुछ लोगों ने रण में अर्जुन को बाण उठाते, चढ़ाते या शीघ्रता से छोड़ते देखा; उसके बाद तो केवल मरे हुए मनुष्य ही दिखाई देते थे।
श्लोक 26 (8.55.26)
आश्चर्यमिति गोविन्दो ब्रुवन्नश्वानचोदयत् । हंसांशुगौरास्ते सेनां हंसाः सर इवाविशन् ॥
āścaryamiti govindo bruvannaśvānacodayat | haṃsāṃśugaurāste senāṃ haṃsāḥ sara ivāviśan
“आश्चर्य है!” कहते हुए गोविन्द ने घोड़ों को हाँका; हंस की किरणों के समान श्वेत वे घोड़े सेना में वैसे ही घुसे, जैसे हंस सरोवर में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 27 (8.55.27)
ततः सङ्ग्रामभूमिं तां वर्तमाने जनक्षये । अवेक्षमाणो गोविन्दः सव्यसाचिनमब्रवीत् ॥
tataḥ saṅgrāmabhūmiṃ tāṃ vartamāne janakṣaye | avekṣamāṇo govindaḥ savyasācinamabravīt
तब जनसंहार के चलते रहने पर उस रणभूमि को देखते हुए गोविन्द ने सव्यसाची से कहा—
वासुदेव उवाच
श्लोक 28 (8.55.28)
एष पार्थ महारौद्रो वर्तते भरतक्षयः । पृथिव्यां पार्थिवानां वै दुर्योधनकृते महान् ॥
eṣa pārtha mahāraudro vartate bharatakṣayaḥ | pṛthivyāṃ pārthivānāṃ vai duryodhanakṛte mahān
हे पार्थ, यह भरतवंशियों का भयंकर विनाश हो रहा है—दुर्योधन के कारण पृथ्वी के राजाओं का यह महान् संहार।
श्लोक 29 (8.55.29)
पश्य भारत चापानि रुक्मपृष्ठानि धन्विनाम् । हतानामपविद्धानि कलापानिषुधींस्तथा ॥
paśya bhārata cāpāni rukmapṛṣṭhāni dhanvinām | hatānāmapaviddhāni kalāpāniṣudhīṃstathā
देखो भारत, मारे गए धनुर्धरों के सोने की पीठ वाले धनुष इधर-उधर फेंके पड़े हैं, और उनके तूणीर तथा बाणों के भाथे भी।
श्लोक 30 (8.55.30)
जातरूपमयैः पुङ्खैः शरांश्च नतपर्वणः । तैलधौतांश्च नाराचान्निर्मुक्तानिव पन्नगान् ॥
jātarūpamayaiḥ puṅkhaiḥ śarāṃśca nataparvaṇaḥ | tailadhautāṃśca nārācānnirmuktāniva pannagān
सुनहरे पंखों और झुकी हुई गाँठों वाले बाणों को देखो, और तेल से धुले हुए नाराचों को देखो, जो केंचुल उतार चुके साँपों के समान पड़े हैं।
श्लोक 31 (8.55.31)
आकीर्णांस्तोमरान्वाहांश्छत्रान्हेमविभूषितान् । चर्माणि चापविद्धानि रुक्मपृष्ठानि भारत ॥
ākīrṇāṃstomarānvāhāṃśchatrānhemavibhūṣitān | carmāṇi cāpaviddhāni rukmapṛṣṭhāni bhārata
बिखरे पड़े तोमर देखो, सवारियाँ देखो, सोने से सजे छत्र देखो, और फेंकी हुई, सोने की पीठ वाली ढालें देखो, हे भारत।
श्लोक 32 (8.55.32)
सुवर्णविकृतान्प्रासाञ्शक्तीः कनकभूषिताः । जाम्बूनदमयैः पट्टैर्बद्धाश्च विपुला गदाः ॥
suvarṇavikṛtānprāsāñśaktīḥ kanakabhūṣitāḥ | jāmbūnadamayaiḥ paṭṭairbaddhāśca vipulā gadāḥ
सोने से गढ़े प्रास देखो, सोने से सजी शक्तियाँ देखो, और जाम्बूनद स्वर्ण की पट्टियों से बँधी विशाल गदाएँ देखो,
श्लोक 33 (8.55.33)
जातरूपमयीश्चर्ष्टीः पट्टसान्हेमभूषितान् । दण्डैः कनकचित्रैश्च विप्रविद्धान्परश्वथान् ॥
jātarūpamayīścarṣṭīḥ paṭṭasānhemabhūṣitān | daṇḍaiḥ kanakacitraiśca vipraviddhānparaśvathān
सोने की ऋष्टियाँ, सोने से सजे पट्टिश, और सुनहरे दण्डों वाले फेंके हुए फरसे देखो,
श्लोक 34 (8.55.34)
परिघान्भिण्डिपालांश्च भुशुण्डीः कणपानपि । अयस्कुन्तांश्च पतितान्मुसलानि गुरूणि च ॥
parighānbhiṇḍipālāṃśca bhuśuṇḍīḥ kaṇapānapi | ayaskuntāṃśca patitānmusalāni gurūṇi ca
परिघ, भिण्डिपाल, भुशुण्डी और कणप, गिरे हुए लोहे की नोक वाले भाले और भारी मूसल भी देखो।
श्लोक 35 (8.55.35)
नानाविधानि शस्त्राणि प्रगृह्य जयगृद्धिनः । जीवन्त इव दृश्यन्ते गतसत्वास्तरस्विनः ॥
nānāvidhāni śastrāṇi pragṛhya jayagṛddhinaḥ | jīvanta iva dṛśyante gatasatvāstarasvinaḥ
नाना प्रकार के शस्त्र पकड़े हुए, विजय के लोभी वे बलवान वीर प्राणहीन होकर भी जीवित-से दिखाई देते हैं।
श्लोक 36 (8.55.36)
गदाविमथितैर्गात्रैर्मुसलैर्भिन्नमस्तकान् । गजवाजिरथैः क्षुण्णान्पश्य योधान्सहस्रशः ॥
gadāvimathitairgātrairmusalairbhinnamastakān | gajavājirathaiḥ kṣuṇṇānpaśya yodhānsahasraśaḥ
देखो, हज़ारों योद्धा, जिनके अंग गदाओं से कुचल गए हैं और मस्तक मूसलों से फट गए हैं, हाथियों, घोड़ों और रथों से रौंदे पड़े हैं।
श्लोक 37 (8.55.37)
मनुष्यगजवाजीनां शरशक्त्यृष्टितोमरैः । निस्त्रिंशैः पट्टसैः प्रासैर्नखरैर्लगुडैरपि ॥
manuṣyagajavājīnāṃ śaraśaktyṛṣṭitomaraiḥ | nistriṃśaiḥ paṭṭasaiḥ prāsairnakharairlaguḍairapi
मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों के, जो बाणों, शक्तियों, ऋष्टियों और तोमरों से, तलवारों, पट्टिशों, प्रासों, नखरों और लाठियों से मारे गए हैं,
श्लोक 38 (8.55.38)
शरीरैर्बहुघा छिन्नैः शोणितौघपरिप्लुतैः । गतासुभिरमित्रघ्न संवृता रणभूमयः ॥
śarīrairbahughā chinnaiḥ śoṇitaughapariplutaiḥ | gatāsubhiramitraghna saṃvṛtā raṇabhūmayaḥ
जिनके शरीर अनेक प्रकार से कटे और रक्त के प्रवाह में डूबे हैं, उन प्राणहीनों से रणभूमियाँ पट गई हैं, हे शत्रुओं का नाश करने वाले।
श्लोक 39 (8.55.39)
बाहुभिश्चन्दनादिग्धैः साङ्गदैः शुभभूषणैः । सतलत्रैः सकेयूरैर्भाति भारत मेदिनी ॥
bāhubhiścandanādigdhaiḥ sāṅgadaiḥ śubhabhūṣaṇaiḥ | satalatraiḥ sakeyūrairbhāti bhārata medinī
चन्दन से लिपी, बाजूबन्दों और सुन्दर आभूषणों से सजी, भुजत्राणों और केयूरों से युक्त भुजाओं से, हे भारत, पृथ्वी शोभित हो रही है,
श्लोक 40 (8.55.40)
साङ्गुलित्रैर्भुजाग्रैश्च विप्रविद्धैरलङ्कृतैः । हस्तिहस्तोपमैश्छिन्नैरूरुभिश्च तरस्विनाम् ॥
sāṅgulitrairbhujāgraiśca vipraviddhairalaṅkṛtaiḥ | hastihastopamaiśchinnairūrubhiśca tarasvinām
अँगुलित्राण पहने, इधर-उधर फेंके हुए अलंकृत हाथों से, और बलवानों की कटी हुई जंघाओं से, जो हाथी की सूँड़ के समान हैं,
श्लोक 41 (8.55.41)
बद्धचूडामणिवरैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः । निकृत्तैर्वृषभाक्षाणां शरीरैश्चापि सङ्घशः ॥
baddhacūḍāmaṇivaraiḥ śirobhiśca sakuṇḍalaiḥ | nikṛttairvṛṣabhākṣāṇāṃ śarīraiścāpi saṅghaśaḥ
सुन्दर चूड़ामणि बाँधे और कुण्डल पहने सिरों से, और बैल की-सी आँखों वाले वीरों के ढेर-के-ढेर कटे हुए शरीरों से।
श्लोक 42 (8.55.42)
गजवाजिमनुष्याणां शरशक्त्यृष्टितोमरैः । कबन्धैः शोणितादिग्धैश्छिन्नगात्रशिरोधरैः । भूर्भाति भरतश्रेष्ठ शान्ताग्निभिरिवाध्वरे ॥
gajavājimanuṣyāṇāṃ śaraśaktyṛṣṭitomaraiḥ | kabandhaiḥ śoṇitādigdhaiśchinnagātraśirodharaiḥ | bhūrbhāti bharataśreṣṭha śāntāgnibhirivādhvare
बाणों, शक्तियों, ऋष्टियों और तोमरों से मारे गए हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों के रक्त से सने, अंगों और गर्दनों से कटे धड़ों से, हे भरतश्रेष्ठ, पृथ्वी यज्ञ में शान्त हुई अग्नियों के समान दिखाई देती है।
श्लोक 43 (8.55.43)
रथांश्च बहुधा भग्नान्हेमकिङ्किणिनः शुभान् । अश्वांश्च बहुधा पश्य शोणितेन परिप्लुतान् ॥
rathāṃśca bahudhā bhagnānhemakiṅkiṇinaḥ śubhān | aśvāṃśca bahudhā paśya śoṇitena pariplutān
अनेक प्रकार से टूटे हुए रथ देखो, सोने की छोटी घण्टियों वाले सुन्दर रथ, और रक्त से भीगे हुए घोड़े भी कितनी ही दशाओं में पड़े देखो।
श्लोक 44 (8.55.44)
अनुकर्षानुपासङ्गान्पताका विविधान्ध्वजान् । योधानां च महाशङ्खान्पाण्डुरांश्च प्रकीर्णकान् । निरस्तजिह्वान्मातङ्गाञ्शयानान्पर्वतोपमान् ॥
anukarṣānupāsaṅgānpatākā vividhāndhvajān | yodhānāṃ ca mahāśaṅkhānpāṇḍurāṃśca prakīrṇakān | nirastajihvānmātaṅgāñśayānānparvatopamān
रथों के अनुकर्ष और तरकस के बन्धन देखो, नाना प्रकार की पताकाएँ और ध्वजाएँ देखो, योद्धाओं के बड़े शंख और बिखरे हुए श्वेत चँवर देखो, और जीभें बाहर निकाले पर्वतों के समान पड़े हाथियों को देखो।
श्लोक 45 (8.55.45)
वैजयन्तीर्विचित्राश्च हतांश्च गजयोधिनः । वारणानां परिस्तोमान्संयुक्तानेककम्बलान् ॥
vaijayantīrvicitrāśca hatāṃśca gajayodhinaḥ | vāraṇānāṃ paristomānsaṃyuktānekakambalān
रंग-बिरंगी वैजयन्ती पताकाएँ देखो, मारे गए गजयोद्धा देखो, और अनेक कम्बलों को जोड़कर बने हाथियों के आवरण देखो।
श्लोक 46 (8.55.46)
विपाटितविचित्राश्च रूपचित्राः कुथास्तथा । भिन्नाश्च बहुधा घण्टाः पतद्भिश्चूर्णिता गजैः ॥
vipāṭitavicitrāśca rūpacitrāḥ kuthāstathā | bhinnāśca bahudhā ghaṇṭāḥ patadbhiścūrṇitā gajaiḥ
फटी हुई, रंग-बिरंगी, चित्रित झूलें देखो, और गिरते हाथियों से कुचलकर अनेक प्रकार से टूटी हुई घण्टियाँ देखो।
श्लोक 47 (8.55.47)
वैदूर्यमणिदण्डांश्च पतितांश्चाङ्कुशान्भुवि । अश्वानां च युगापीडान्रत्नचित्रानुरश्छदान् ॥
vaidūryamaṇidaṇḍāṃśca patitāṃścāṅkuśānbhuvi | aśvānāṃ ca yugāpīḍānratnacitrānuraśchadān
वैदूर्य और मणियों से जड़े दण्डों वाले अंकुश पृथ्वी पर गिरे हुए देखो, घोड़ों के जुए के गद्दे देखो, और रत्नों से चित्रित वक्षस्त्राण देखो।
श्लोक 48 (8.55.48)
विद्धाः सादिध्वजाग्रेषु सुवर्णविकृताः कुथाः । विचित्रान्मणिचित्रांश्च जातरूपपरिष्कृतान् ॥
viddhāḥ sādidhvajāgreṣu suvarṇavikṛtāḥ kuthāḥ | vicitrānmaṇicitrāṃśca jātarūpapariṣkṛtān
घुड़सवारों की ध्वजाओं के सिरों पर टँगे, बिंधे हुए, सोने से बने झूल देखो, और विविध रंगों के, मणियों से जड़े, सोने से सजे
श्लोक 49 (8.55.49)
अश्वास्तरपरिस्तोमान्राङ्कवान्पतितान्भुवि । चूडामणीन्नरेन्द्राणां विचित्राः काञ्चनस्रजः । छत्राणि चापविद्धानि चामरव्यजनानि च ॥
aśvāstaraparistomānrāṅkavānpatitānbhuvi | cūḍāmaṇīnnarendrāṇāṃ vicitrāḥ kāñcanasrajaḥ | chatrāṇi cāpaviddhāni cāmaravyajanāni ca
घोड़ों के बिछौने और राङ्कव मृगचर्म के आवरण भूमि पर गिरे देखो, राजाओं के चूड़ामणि, अद्भुत स्वर्णमालाएँ, और फेंके हुए छत्र तथा चँवर-पंखे देखो।
श्लोक 50 (8.55.50)
चन्द्रनक्षत्रभासैश्च वदनैश्चारुकुण्डलैः । क्लृप्तश्मश्रुभिरत्यर्थं वीराणां समलङ्कृतैः । वदनैः पश्य सञ्छन्नां महीं शोणितकर्दमाम् ॥
candranakṣatrabhāsaiśca vadanaiścārukuṇḍalaiḥ | klṛptaśmaśrubhiratyarthaṃ vīrāṇāṃ samalaṅkṛtaiḥ | vadanaiḥ paśya sañchannāṃ mahīṃ śoṇitakardamām
वीरों के मुखों से ढकी हुई पृथ्वी को देखो—चन्द्रमा और नक्षत्रों के समान दीप्त, सुन्दर कुण्डलों वाले, सँवारी हुई दाढ़ी-मूँछों से भली-भाँति सजे मुखों से, और रक्त की कीचड़ बनी हुई।
श्लोक 51 (8.55.51)
सजीवांश्च नरान्पश्य कूजमानान्समन्ततः । उपास्यमानांश्च बहून्न्यस्तशस्त्रैश्च भूपते । ज्ञातिभिश्च जलक्लिन्नान्रोदमानैर्मुहुर्मुहुः ॥
sajīvāṃśca narānpaśya kūjamānānsamantataḥ | upāsyamānāṃśca bahūnnyastaśastraiśca bhūpate | jñātibhiśca jalaklinnānrodamānairmuhurmuhuḥ
हे राजन्, देखो चारों ओर कराहते हुए वे मनुष्य, जो अभी जीवित हैं, जिनकी सेवा शस्त्र रख चुके अनेक लोग कर रहे हैं, और जिन्हें बार-बार रोते हुए उनके स्वजन जल से भिगो रहे हैं।
श्लोक 52 (8.55.52)
उत्क्रान्तानपरान्योधाञ्छादयित्वा तरस्विनः । पुनर्युद्धाय गच्छन्ति जये लुब्धाः प्रमन्यवः ॥
utkrāntānaparānyodhāñchādayitvā tarasvinaḥ | punaryuddhāya gacchanti jaye lubdhāḥ pramanyavaḥ
देह छोड़ चुके अन्य योद्धाओं को ढककर विजय के लोभी और क्रोधित बलवान वीर फिर युद्ध के लिए जा रहे हैं।
श्लोक 53 (8.55.53)
अपरे तत्रतत्रैव परिधावन्ति मानवाः । सन्निवृत्ताश्च ते शूरा दृष्टा चैतान्विचेतसः ॥
apare tatratatraiva paridhāvanti mānavāḥ | sannivṛttāśca te śūrā dṛṣṭā caitānvicetasaḥ
दूसरे लोग यहाँ-वहाँ दौड़ रहे हैं; और लौट आए वे शूर इन्हें देखकर अचेत-से हो जाते हैं।
श्लोक 54 (8.55.54)
जलं त्यक्त्वा प्रधावन्ति क्रोशमानाः परस्परम् । जलं पीत्वा मृतान्पश्य पिबतोऽन्यांश्च भारत ॥
jalaṃ tyaktvā pradhāvanti krośamānāḥ parasparam | jalaṃ pītvā mṛtānpaśya pibato'nyāṃśca bhārata
कुछ लोग जल छोड़कर एक-दूसरे को पुकारते हुए दौड़ रहे हैं; जल पीकर मरे हुओं को देखो, और पीते हुए अन्य लोगों को भी देखो, हे भारत।
श्लोक 55 (8.55.55)
परिष्वज्य प्रियानन्ये बान्धवान्बन्धुवत्सलाः । विसंज्ञान्समरे योधांस्तत्रतत्र महारणे ॥
pariṣvajya priyānanye bāndhavānbandhuvatsalāḥ | visaṃjñānsamare yodhāṃstatratatra mahāraṇe
दूसरे, अपने बन्धुओं से प्रेम करने वाले, महायुद्ध में जहाँ-तहाँ अचेत पड़े अपने प्रिय सम्बन्धियों को गले लगा रहे हैं।
श्लोक 56 (8.55.56)
पश्यापरान्नरश्रेष्ठ सन्दष्टोष्ठपुटान्पुनः । भृकुटीकुटिलैर्वक्त्रैः प्रेक्षमाणान्महारणम् ॥
paśyāparānnaraśreṣṭha sandaṣṭoṣṭhapuṭānpunaḥ | bhṛkuṭīkuṭilairvaktraiḥ prekṣamāṇānmahāraṇam
हे नरश्रेष्ठ, अन्य लोगों को भी देखो, जिन्होंने होंठ दाँतों में दबा रखे हैं और जिनके मुख भौंहें तनने से टेढ़े हैं, जो उस महारण की ओर देख रहे हैं।
श्लोक 57 (8.55.57)
एतत्तवैवानुरूपं कर्मार्जुन महाहवे । दिवि वा देवराजस्य त्वया यत्कृतमाहवे ॥
etattavaivānurūpaṃ karmārjuna mahāhave | divi vā devarājasya tvayā yatkṛtamāhave
हे अर्जुन, इस महासंग्राम में यह कर्म तुम्हारे ही योग्य है—जो तुमने स्वर्ग में देवराज के लिए युद्ध में किया था।
सञ्जय उवाच
श्लोक 58 (8.55.58)
एवं तां दर्शयन्कृष्णो युद्धभूमिं किरीटिने । गच्छन्नेवाशृणोच्छब्दं दुर्योधनबले महत् ॥
evaṃ tāṃ darśayankṛṣṇo yuddhabhūmiṃ kirīṭine | gacchannevāśṛṇocchabdaṃ duryodhanabale mahat
इस प्रकार किरीटी को वह रणभूमि दिखाते हुए कृष्ण आगे बढ़े, और चलते-चलते उन्होंने दुर्योधन की सेना में भारी कोलाहल सुना—
श्लोक 59 (8.55.59)
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषं भेरीपणवनिःस्वनम् । रथाश्वनरनागानां पादशब्दांश्च दारुणान् ॥
śaṅkhadundubhinirghoṣaṃ bherīpaṇavaniḥsvanam | rathāśvanaranāgānāṃ pādaśabdāṃśca dāruṇān
शंखों और दुन्दुभियों की ध्वनि, भेरी और पणव का नाद, तथा रथों, घोड़ों, मनुष्यों और हाथियों के पैरों की भयानक आवाज़ें।
श्लोक 60 (8.55.60)
प्रविश्य तद्बलं कृष्णस्तुरगैर्वातवेगितैः । पाण्ड्येनाभ्यर्दितं सैन्यं त्वदीयं वीक्ष्य विस्मितः ॥
praviśya tadbalaṃ kṛṣṇasturagairvātavegitaiḥ | pāṇḍyenābhyarditaṃ sainyaṃ tvadīyaṃ vīkṣya vismitaḥ
वायु के समान वेग वाले घोड़ों से उस सेना में घुसकर कृष्ण ने देखा कि आपकी सेना को पाण्ड्य राजा सता रहा है, और वे विस्मित हो गए।
श्लोक 61 (8.55.61)
स हि नानाविधैर्बाणैरिष्वस्त्रप्रवरो युधि । न्यहनद्द्विषतां पूगान्गतासूनन्तको यथा ॥
sa hi nānāvidhairbāṇairiṣvastrapravaro yudhi | nyahanaddviṣatāṃ pūgāngatāsūnantako yathā
क्योंकि वह श्रेष्ठ धनुर्धर और अस्त्रवेत्ता युद्ध में नाना प्रकार के बाणों से शत्रुओं के झुण्ड के झुण्ड, यम की भाँति, प्राणहीन करके गिरा रहा था।
श्लोक 62 (8.55.62)
गजवाजिमनुष्याणां शरीराणि शितैः शरैः । भित्त्वा प्रहरतां श्रेष्ठो विदेहासूनपातयत् ॥
gajavājimanuṣyāṇāṃ śarīrāṇi śitaiḥ śaraiḥ | bhittvā praharatāṃ śreṣṭho videhāsūnapātayat
प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ उसने हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों के शरीरों को तीखे बाणों से बींधकर उन्हें देह और प्राण से रहित कर दिया।
श्लोक 63 (8.55.63)
शत्रुप्रवीरैरस्त्राणि नानाशस्त्राणि सायकैः । छित्त्वा तानवधीच्छत्रून्पाण्ड्यः शक्र इवासुरान् ॥
śatrupravīrairastrāṇi nānāśastrāṇi sāyakaiḥ | chittvā tānavadhīcchatrūnpāṇḍyaḥ śakra ivāsurān
शत्रुओं के प्रमुख वीरों के अस्त्र-शस्त्रों को बाणों से काटकर पाण्ड्य ने उन शत्रुओं को वैसे ही मार डाला, जैसे शक्र ने असुरों को मारा था।