कर्ण पर्व · अध्याय 56
अश्वत्थामा द्वारा पाण्ड्यराज का वध
धृतराष्ट्र के पूछने पर सञ्जय उस पाण्ड्य राजा का वर्णन करते हैं, जो सभी महान् धनुर्धरों को तुच्छ समझता था और अब कर्ण की सेना का संहार कर रहा था। अश्वत्थामा उसे ललकारता है और दोनों बाणों से द्वन्द्व करते हुए एक-दूसरे के धनुष, घोड़े और शस्त्र काटते हैं। पाण्ड्य एक भागे हुए हाथी पर चढ़कर तोमर चलाता है, जो अश्वत्थामा का मुकुट चूर कर देता है; क्रोध से जल उठा अश्वत्थामा चौदह बाणों से हाथी, राजा और उसके छः प्रमुख योद्धाओं को मार डालता है, और दुर्योधन उसका सम्मान करता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (8.56.1)
प्रोक्तस्त्वया पूर्वमेव प्रवीरो लोकविश्रुतः । न त्वस्य कर्म सङ्ग्रामे त्वया सञ्जय कीर्तितम् ॥
proktastvayā pūrvameva pravīro lokaviśrutaḥ | na tvasya karma saṅgrāme tvayā sañjaya kīrtitam
तुमने पहले एक लोकविख्यात वीर की चर्चा की थी, परन्तु हे सञ्जय, युद्ध में उसके कर्म तुमने नहीं बताए।
श्लोक 2 (8.56.2)
तस्य विस्तरशो ब्रूहि प्रवीरस्याद्य विक्रमम् । शिक्षां प्रभावं वीर्यं च प्रमाणं दर्पमेव च ॥
tasya vistaraśo brūhi pravīrasyādya vikramam | śikṣāṃ prabhāvaṃ vīryaṃ ca pramāṇaṃ darpameva ca
अब उस वीर का पराक्रम विस्तार से बताओ—उसकी शिक्षा, प्रभाव, बल, सामर्थ्य और अभिमान।
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (8.56.3)
भीष्मद्रोणकृपद्रौणिकर्णार्जुनजनार्दनान् । समाप्तविद्यान्धनुषि श्रेष्ठान्यान्सप्त मन्यसे ॥
bhīṣmadroṇakṛpadrauṇikarṇārjunajanārdanān | samāptavidyāndhanuṣi śreṣṭhānyānsapta manyase
भीष्म, द्रोण, कृप, द्रोणपुत्र, कर्ण, अर्जुन और जनार्दन—इन सात को आप धनुर्विद्या में सर्वश्रेष्ठ और सम्पूर्ण विद्या के ज्ञाता मानते हैं।
श्लोक 4 (8.56.4)
यो ह्याक्षिपति वीर्येण सर्वानेतान्महारथान् । न मेने चात्मना तुल्यं कञ्चिदेव नरेश्वरम् ॥
yo hyākṣipati vīryeṇa sarvānetānmahārathān | na mene cātmanā tulyaṃ kañcideva nareśvaram
पर जो अपने बल के कारण इन सभी महारथियों को तुच्छ समझता था और किसी भी राजा को अपने समान नहीं मानता था,
श्लोक 5 (8.56.5)
तुल्यतांद्रोणभीष्माभ्यामात्मनो यो न मृष्यते । वासुदेवार्जुनाभ्यां च न्यूनतां नैच्छतात्मनि ॥
tulyatāṃdroṇabhīṣmābhyāmātmano yo na mṛṣyate | vāsudevārjunābhyāṃ ca nyūnatāṃ naicchatātmani
जो द्रोण और भीष्म के साथ अपनी बराबरी सहन नहीं करता था, और वासुदेव तथा अर्जुन से अपने को छोटा नहीं मानना चाहता था,
श्लोक 6 (8.56.6)
स पाण्ड्योऽर्थपतिश्रेष्ठः सर्वशस्त्रभृतां वरः । कर्णस्यानीकमहनत्पाशहस्त इवान्तकः ॥
sa pāṇḍyo'rthapatiśreṣṭhaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | karṇasyānīkamahanatpāśahasta ivāntakaḥ
वही पाण्ड्य राजा, राजाओं में श्रेष्ठ और सब शस्त्रधारियों में उत्तम, पाश हाथ में लिए यमराज के समान कर्ण की सेना का संहार करने लगा।
श्लोक 7 (8.56.7)
तदुदीर्णरथाश्वेभं पत्तिप्रवरसङ्कुलम् । कुलालचक्रवद्भ्रान्तं पाण्ड्येनाभ्याहतं बलात् ॥
tadudīrṇarathāśvebhaṃ pattipravarasaṅkulam | kulālacakravadbhrāntaṃ pāṇḍyenābhyāhataṃ balāt
रथों, घोड़ों और हाथियों के उद्विग्न हो जाने से और श्रेष्ठ पैदल योद्धाओं से भरी हुई वह सेना पाण्ड्य के बलपूर्वक प्रहार से कुम्हार के चाक की भाँति घूम गई।
श्लोक 8 (8.56.8)
व्यश्वसूतध्वजरथान्विप्रयुक्तयुगान्रथान् । सम्यगस्तैः शरैः पाण्ड्यो वायुर्मेघानिवाक्षिपत् ॥
vyaśvasūtadhvajarathānviprayuktayugānrathān | samyagastaiḥ śaraiḥ pāṇḍyo vāyurmeghānivākṣipat
जिनके घोड़े, सारथि और ध्वजाएँ नष्ट हो गई थीं और जुए उखड़ गए थे, उन रथों को पाण्ड्य ने भली-भाँति चलाए हुए बाणों से वैसे ही बिखेर दिया, जैसे वायु बादलों को बिखेरती है।
श्लोक 9 (8.56.9)
द्विरदान्प्रवरारोहान्विपताकायुधध्वजान् । स पादरक्षानहनद्वज्रेणाद्रीनिवाद्रिहा ॥
dviradānpravarārohānvipatākāyudhadhvajān | sa pādarakṣānahanadvajreṇādrīnivādrihā
उसने उत्तम सवारों, पताकाओं, आयुधों और ध्वजाओं सहित हाथियों को और पादरक्षकों को वैसे ही मार गिराया, जैसे पर्वतों को तोड़ने वाले इन्द्र वज्र से पर्वतों को गिराते हैं।
श्लोक 10 (8.56.10)
स शक्तिप्रासतूणीरानश्वारोहान्हयानपि । पुलिन्दखसबाह्लीकनिषादान्ध्रककुन्तलान् ॥
sa śaktiprāsatūṇīrānaśvārohānhayānapi | pulindakhasabāhlīkaniṣādāndhrakakuntalān
शक्ति, प्रास और तरकस वाले योद्धाओं को, घुड़सवारों और घोड़ों को, पुलिन्द, खस, बाह्लीक, निषाद, आन्ध्रक और कुन्तल जनों को,
श्लोक 11 (8.56.11)
दाक्षिणात्यांश्च भोजांश्च शूरान्सङ्ग्रामकर्कशान् । विशस्त्रकवचान्बाणैः कृत्वा पाण्ड्योऽकरोद्व्यसून् ॥
dākṣiṇātyāṃśca bhojāṃśca śūrānsaṅgrāmakarkaśān | viśastrakavacānbāṇaiḥ kṛtvā pāṇḍyo'karodvyasūn
दक्षिण देश के निवासियों और भोजों को, युद्ध में कठोर शूरों को—इन्हें बाणों से शस्त्र और कवच से रहित करके पाण्ड्य ने निष्प्राण कर दिया।
श्लोक 12 (8.56.12)
चतुरङ्गं बलं बाणैर्निघ्नन्तं पाण्ड्यमाहवे । दृष्ट्वा द्रौणिरसम्भ्रान्तमसम्भ्रान्तस्ततोऽभ्ययात् ॥
caturaṅgaṃ balaṃ bāṇairnighnantaṃ pāṇḍyamāhave | dṛṣṭvā drauṇirasambhrāntamasambhrāntastato'bhyayāt
पाण्ड्य को युद्ध में बिना घबराए चतुरंगिणी सेना का बाणों से संहार करते देखकर द्रोणपुत्र भी निश्चिन्त भाव से उसके पास पहुँचा।
श्लोक 13 (8.56.13)
आभाष्य चैनं मधुरमभीतं तमभीतवत् । प्राह प्रहरतां श्रेष्ठः स्मितपूर्वं समाह्वयत् ॥
ābhāṣya cainaṃ madhuramabhītaṃ tamabhītavat | prāha praharatāṃ śreṣṭhaḥ smitapūrvaṃ samāhvayat
निर्भय पाण्ड्य से स्वयं भी निर्भय की भाँति मधुर वाणी में बोलकर प्रहारकों में श्रेष्ठ उसने मुस्कराते हुए उसे ललकारा और कहा—
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 14 (8.56.14)
राजन्कमलपत्राक्ष प्रधानायुधवाहन । वज्रसंहननप्रख्य प्रख्यातबलपौरुष ॥
rājankamalapatrākṣa pradhānāyudhavāhana | vajrasaṃhananaprakhya prakhyātabalapauruṣa
हे राजन्, कमल-नयन, श्रेष्ठ आयुधों और वाहनों वाले, वज्र के समान दृढ़ देह वाले, बल और पौरुष में विख्यात—
श्लोक 15 (8.56.15)
मुष्टिक्लिष्टाङ्गुलिभ्यां च व्यायताभ्यां महद्धनुः । दोर्भ्यां विस्फारयन्भासि महाजलदवद्भृशम् ॥
muṣṭikliṣṭāṅgulibhyāṃ ca vyāyatābhyāṃ mahaddhanuḥ | dorbhyāṃ visphārayanbhāsi mahājaladavadbhṛśam
मुट्ठी में उँगलियाँ कसे हुए अपनी दो लम्बी भुजाओं से विशाल धनुष खींचते हुए तुम बड़े मेघ के समान अत्यन्त शोभित होते हो।
श्लोक 16 (8.56.16)
शरवर्षैर्महावेगैरमित्रानभिवर्षतः । मदन्यं नानुपश्यामि प्रतिवीरं तवाहवे ॥
śaravarṣairmahāvegairamitrānabhivarṣataḥ | madanyaṃ nānupaśyāmi prativīraṃ tavāhave
तुम अपने शत्रुओं पर तीव्र वेग वाली बाण-वर्षा करते हो; मुझे छोड़कर युद्ध में तुम्हारा कोई प्रतिद्वन्द्वी वीर मैं नहीं देखता।
श्लोक 17 (8.56.17)
रथद्विरदपत्त्यश्वानेकः प्रमथसे बहून् । मृगसङ्घानिवारण्ये विभीर्भीमबलो हरिः ॥
rathadviradapattyaśvānekaḥ pramathase bahūn | mṛgasaṅghānivāraṇye vibhīrbhīmabalo hariḥ
अकेले तुम बहुत-से रथों, हाथियों, पैदलों और घोड़ों को वैसे ही रौंद डालते हो, जैसे वन में निर्भय और भयंकर बल वाला सिंह मृगों के झुण्डों को।
श्लोक 18 (8.56.18)
महता रथघोषेण दिवं भूमिं च नादयन् । वर्षान्ते सस्यां सूर्यो भाभिरादीपयन्निव ॥
mahatā rathaghoṣeṇa divaṃ bhūmiṃ ca nādayan | varṣānte sasyāṃ sūryo bhābhirādīpayanniva
अपने रथ की भारी घर्घराहट से आकाश और पृथ्वी को गुँजाते हुए तुम वर्षा के अन्त में अपनी किरणों से अन्न से भरी भूमि को चमकाते सूर्य के समान लगते हो।
श्लोक 19 (8.56.19)
संस्पृशानः शरैः पूर्णौ तूणी चाशीविषोपमैः । मयैवैकेन युध्यस्व त्र्यम्बकेनान्धको यथा ॥
saṃspṛśānaḥ śaraiḥ pūrṇau tūṇī cāśīviṣopamaiḥ | mayaivaikena yudhyasva tryambakenāndhako yathā
विषधर सर्पों के समान बाणों से भरे अपने दोनों तरकसों को छूते हुए तुम केवल मुझसे ही लड़ो, जैसे अन्धक ने त्र्यम्बक से युद्ध किया था।
सञ्जय उवाच
श्लोक 20 (8.56.20)
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा प्रमथ्यैनं स पार्थिवः । कर्णिना द्रोणतनयं विव्याध मलयध्वजः ॥
evamuktastathetyuktvā pramathyainaṃ sa pārthivaḥ | karṇinā droṇatanayaṃ vivyādha malayadhvajaḥ
ऐसा कहे जाने पर मलयध्वज राजा ने “ऐसा ही हो” कहा और उस पर आक्रमण करके द्रोणपुत्र को कर्णी नामक बाण से बींध दिया।
श्लोक 21 (8.56.21)
मर्मभेदिभिरत्युग्रैर्बाणैरग्निशिखोपमैः । मर्मस्वभ्यहनद्द्रौणिः पाण्ड्यमाचार्यनन्दनः ॥
marmabhedibhiratyugrairbāṇairagniśikhopamaiḥ | marmasvabhyahanaddrauṇiḥ pāṇḍyamācāryanandanaḥ
ज्वाला की लपटों के समान, मर्म को भेदने वाले अत्यन्त उग्र बाणों से आचार्यपुत्र द्रोणपुत्र ने पाण्ड्य के मर्मस्थलों पर प्रहार किया।
श्लोक 22 (8.56.22)
ततोऽपरान्नवांस्तूर्णं नाराचान्कङ्कवाससः । गत्या दशम्या संयुक्तानश्वत्थामाऽप्यवासृजत् ॥
tato'parānnavāṃstūrṇaṃ nārācānkaṅkavāsasaḥ | gatyā daśamyā saṃyuktānaśvatthāmā'pyavāsṛjat
तब अश्वत्थामा ने शीघ्र ही कंक पक्षी के पंखों वाले, दसवीं गति से युक्त नौ और नये नाराच छोड़े।
श्लोक 23 (8.56.23)
तानच्छिनत्तदा पाण्ड्यश्चतुर्भिरपरैः शरैः । चतुरोऽभ्याहनच्चाश्वानाशु ते व्यसवोऽभवन् ॥
tānacchinattadā pāṇḍyaścaturbhiraparaiḥ śaraiḥ | caturo'bhyāhanaccāśvānāśu te vyasavo'bhavan
तब पाण्ड्य ने चार दूसरे बाणों से उन्हें काट डाला, और चारों घोड़ों को मारा, जो शीघ्र ही प्राणहीन हो गए।
श्लोक 24 (8.56.24)
अथ द्रोणसुतस्येषूंस्ताञ्छित्त्वा निशितैः शरैः । धनुर्ज्यां विततां पाण्ड्यश्चिच्छेदादित्यतेजसः ॥
atha droṇasutasyeṣūṃstāñchittvā niśitaiḥ śaraiḥ | dhanurjyāṃ vitatāṃ pāṇḍyaścicchedādityatejasaḥ
फिर सूर्य के समान तेजस्वी पाण्ड्य ने तीखे बाणों से द्रोणपुत्र के बाणों को काटकर उसकी तनी हुई धनुष की डोरी भी काट दी।
श्लोक 25 (8.56.25)
दिव्यं धनुरथाधिज्यं कृत्वा द्रौणिरमित्रहा । प्रेक्ष्य चाशु रथे युक्तान्नरैरन्यान्हयोत्तमान् ॥
divyaṃ dhanurathādhijyaṃ kṛtvā drauṇiramitrahā | prekṣya cāśu rathe yuktānnarairanyānhayottamān
शत्रुओं के नाशक द्रोणपुत्र ने अपना दिव्य धनुष फिर चढ़ाया और देखा कि सेवकों ने उसके रथ में दूसरे उत्तम घोड़े जोत दिए हैं,
श्लोक 26 (8.56.26)
ततः शरसहस्राणि प्रेषयामास वै द्विजः । इषुसम्बाधमाकाशमकरोद्दिश एव च ॥
tataḥ śarasahasrāṇi preṣayāmāsa vai dvijaḥ | iṣusambādhamākāśamakaroddiśa eva ca
तब उस ब्राह्मण ने हज़ारों बाण छोड़े और आकाश तथा दिशाओं को बाणों की भीड़ से भर दिया।
श्लोक 27 (8.56.27)
ततस्तानस्यतः सर्वान्द्रौणेर्बाणान्महात्मनः । जानानोऽप्यक्षयान्पाण्ड्योऽशातयत्पुरुषर्षभः ॥
tatastānasyataḥ sarvāndrauṇerbāṇānmahātmanaḥ | jānāno'pyakṣayānpāṇḍyo'śātayatpuruṣarṣabhaḥ
फिर जब महात्मा द्रोणपुत्र के वे सब बाण चल रहे थे, तब यद्यपि पाण्ड्य जानता था कि वे अमोघ हैं, उस पुरुषश्रेष्ठ ने उन सबको काट गिराया।
श्लोक 28 (8.56.28)
प्रयुक्तांस्तान्प्रयत्नेन छित्त्वा द्रौणेरिषूनरिः । चक्ररक्षौ रणे तस्य प्राणुदन्निशितैः शरैः ॥
prayuktāṃstānprayatnena chittvā drauṇeriṣūnariḥ | cakrarakṣau raṇe tasya prāṇudanniśitaiḥ śaraiḥ
द्रोणपुत्र के प्रयत्नपूर्वक चलाए हुए बाणों को काटकर उस शत्रु ने रण में तीखे बाणों से उसके रथ के दोनों चक्ररक्षकों को भी हटा दिया।
श्लोक 29 (8.56.29)
अथ तल्लाघवं दृष्ट्वा मण्डलीकृतकार्मुकः । प्रास्यद्द्रोणसुतो बाणान्वृष्टिं पूषानुजो यथा ॥
atha tallāghavaṃ dṛṣṭvā maṇḍalīkṛtakārmukaḥ | prāsyaddroṇasuto bāṇānvṛṣṭiṃ pūṣānujo yathā
तब उसकी फुर्ती देखकर द्रोणपुत्र ने धनुष को मण्डलाकार खींचा और पूषा के छोटे भाई पर्जन्य की भाँति बाणों की वर्षा की।
श्लोक 30 (8.56.30)
अष्टावष्टगवान्यूहुः शकटानि यदायुधम् । अह्नस्तदष्टभागेन द्रौणिश्चिक्षेप मारिष ॥
aṣṭāvaṣṭagavānyūhuḥ śakaṭāni yadāyudham | ahnastadaṣṭabhāgena drauṇiścikṣepa māriṣa
आठ बैलों से खिंचने वाले आठ छकड़े जितने शस्त्र ढो सकें, उतने शस्त्र द्रोणपुत्र ने, हे माननीय, दिन के आठवें भाग में चला दिए।
श्लोक 31 (8.56.31)
तमन्तकमिव क्रुद्धमन्तकालान्तकोपमम् । ये ये ददृशिरे रूपं विसंज्ञाः प्रायशोऽभवन् ॥
tamantakamiva kruddhamantakālāntakopamam | ye ye dadṛśire rūpaṃ visaṃjñāḥ prāyaśo'bhavan
यम के समान क्रुद्ध, युगान्त के काल के समान उस रूप को जिस-जिसने देखा, वह प्रायः अचेत हो गया।
श्लोक 32 (8.56.32)
आचार्यपुत्रस्तां सेनां बाणवृष्ट्या व्यवीवृषत् । पर्जन्य इव घर्मान्ते वृष्ट्या साद्रिद्रुमां महीम् ॥
ācāryaputrastāṃ senāṃ bāṇavṛṣṭyā vyavīvṛṣat | parjanya iva gharmānte vṛṣṭyā sādridrumāṃ mahīm
आचार्यपुत्र ने उस सेना पर बाणों की वर्षा की, जैसे ग्रीष्म के अन्त में पर्जन्य पर्वतों और वृक्षों सहित पृथ्वी पर जल बरसाता है।
श्लोक 33 (8.56.33)
द्रौणिपर्जन्यमुक्तां तां बाणवृष्टिं सुदुःसहाम् । वायव्यास्त्रेण स क्षिप्रं विद्ध्वा पाण्ड्यानिलोऽनदत् ॥
drauṇiparjanyamuktāṃ tāṃ bāṇavṛṣṭiṃ suduḥsahām | vāyavyāstreṇa sa kṣipraṃ viddhvā pāṇḍyānilo'nadat
द्रोणपुत्ररूपी मेघ से छोड़ी गई उस असह्य बाण-वर्षा को पाण्ड्य ने, जो मानो वायु ही था, वायव्यास्त्र से शीघ्र बेधकर सिंहनाद किया।
श्लोक 34 (8.56.34)
तस्य नानदतः केतुं चन्दनागुरुरूषितम् । मलयप्रतिमं द्रौणिश्छित्त्वाश्वांश्चतुरोऽहनत् ॥
tasya nānadataḥ ketuṃ candanāgururūṣitam | malayapratimaṃ drauṇiśchittvāśvāṃścaturo'hanat
जब वह गरज रहा था, तब द्रोणपुत्र ने चन्दन और अगुरु से सजे, मलय पर्वत के समान उसके ध्वज को काटकर उसके चारों घोड़ों को मार डाला।
श्लोक 35 (8.56.35)
सूतमेकेषुणा हत्वा महाजलदनिःस्वनम् । धनुश्छित्त्वाऽर्धचन्द्रेण तिलशो व्यधमद्रथम् ॥
sūtamekeṣuṇā hatvā mahājaladaniḥsvanam | dhanuśchittvā'rdhacandreṇa tilaśo vyadhamadratham
एक बाण से सारथि को मारकर, अर्धचन्द्र बाण से धनुष काटकर उसने महामेघ के समान गर्जना करने वाले रथ को तिल-तिल करके चूर कर डाला।
श्लोक 36 (8.56.36)
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य छित्त्वा सर्वायुधानि च । प्राप्तमप्यहितं द्रौणिर्नाहनद्युद्धतृष्णया ॥
astrairastrāṇi saṃvārya chittvā sarvāyudhāni ca | prāptamapyahitaṃ drauṇirnāhanadyuddhatṛṣṇayā
अपने अस्त्रों से उसके अस्त्रों को रोककर और उसके सब आयुधों को काटकर भी द्रोणपुत्र ने युद्ध की प्यास के कारण पास आए शत्रु को नहीं मारा।
श्लोक 37 (8.56.37)
हतेश्वरो दन्तिवरः सुकल्पित- । सत्वराभिसृष्टः प्रतिशब्दगो बली । तमाद्रवद्द्रौणिशराहतस्त्वरन् । जवेन कृत्वा प्रतिहस्तिगर्जितम् ॥
hateśvaro dantivaraḥ sukalpita- | satvarābhisṛṣṭaḥ pratiśabdago balī | tamādravaddrauṇiśarāhatastvaran | javena kṛtvā pratihastigarjitam
स्वामी के मारे जाने पर एक श्रेष्ठ बलवान हाथी, जो भली-भाँति सजा था और जल्दी में छोड़ा गया था, प्रतिध्वनि के उत्तर में गरजता हुआ, द्रोणपुत्र के बाणों से घायल होकर, शत्रु-हाथी की गर्जना का-सा नाद करता हुआ वेग से उसकी ओर दौड़ा।
श्लोक 38 (8.56.38)
तं वारणं वारणयुद्धकोविदो । द्विपोत्तमं पर्वतसानुसन्निभम् । समभ्यतिष्ठन्मलयध्वजस्त्वर- । न्यथाऽद्रिशृङ्गं हरिरुन्नदंस्तथा ॥
taṃ vāraṇaṃ vāraṇayuddhakovido | dvipottamaṃ parvatasānusannibham | samabhyatiṣṭhanmalayadhvajastvara- | nyathā'driśṛṅgaṃ harirunnadaṃstathā
हाथियों से लड़ने की कला में निपुण मलयध्वज राजा शीघ्रता से उस पर्वत-शिखर जैसे श्रेष्ठ हाथी पर चढ़ बैठा, जैसे गरजता हुआ सिंह पर्वत की चोटी पर चढ़ता है।
श्लोक 39 (8.56.39)
स तोमरं भास्कररश्मिवर्चसं । बलास्त्रसर्गोत्तमयत्नमन्युभिः । ससर्ज शीघ्रं परिपीडयन्गजं । गुरोः सुताय द्रविडेश्वरो नदन् ॥
sa tomaraṃ bhāskararaśmivarcasaṃ | balāstrasargottamayatnamanyubhiḥ | sasarja śīghraṃ paripīḍayangajaṃ | guroḥ sutāya draviḍeśvaro nadan
तब द्रविड़ों के स्वामी ने गरजते हुए हाथी को अंकुश से प्रेरित करके, बल, अस्त्र-प्रक्षेप के सर्वोत्तम प्रयत्न और क्रोध के साथ, सूर्य की किरणों के समान दमकता तोमर द्रोणपुत्र पर शीघ्र चलाया।
श्लोक 40 (8.56.40)
मणिप्रवेकोत्तमवज्रहाटकै- । रलङ्कृतं चांशुकमाल्यमौक्तिकैः । हतो मयासीत्यसकृन्मुदा नद- । न्पराभिनद्द्रौणिवराङ्गभूषणम् ॥
maṇipravekottamavajrahāṭakai- | ralaṅkṛtaṃ cāṃśukamālyamauktikaiḥ | hato mayāsītyasakṛnmudā nada- | nparābhinaddrauṇivarāṅgabhūṣaṇam
“मेरे हाथ से तू मारा गया!” कहकर बार-बार हर्ष से गरजते हुए उसने द्रोणपुत्र के श्रेष्ठ शिरोभूषण को चूर-चूर कर दिया, जो उत्तम मणियों, हीरों और सोने से, तथा रेशमी वस्त्र, मालाओं और मोतियों से सजा था।
श्लोक 41 (8.56.41)
तदर्कचन्द्रग्रहपावकत्विषं । भृशाभिघातात्पतितं विघूर्णितम् । महेन्द्रवज्राभिहतं महास्वनं । यथाऽद्रिशृङ्गं धरणीतले तथा ॥
tadarkacandragrahapāvakatviṣaṃ | bhṛśābhighātātpatitaṃ vighūrṇitam | mahendravajrābhihataṃ mahāsvanaṃ | yathā'driśṛṅgaṃ dharaṇītale tathā
सूर्य, चन्द्रमा, ग्रहों और अग्नि के समान चमकता हुआ वह मुकुट उस भीषण प्रहार से घूमता हुआ भारी ध्वनि के साथ पृथ्वी पर वैसे ही गिरा, जैसे इन्द्र के वज्र से टूटा पर्वत-शिखर गिरता है।
श्लोक 42 (8.56.42)
ततः प्रजज्वाल परेण मन्युना । पादाहतो नागपतिर्यथा तथा । समाददे चान्तकदण्डसन्निभा- । निषूनमित्रान्तकरांश्चतुर्दश ॥
tataḥ prajajvāla pareṇa manyunā | pādāhato nāgapatiryathā tathā | samādade cāntakadaṇḍasannibhā- | niṣūnamitrāntakarāṃścaturdaśa
तब पैर से कुचले गए नागराज की भाँति वह परम क्रोध से जल उठा और यमदण्ड के समान शत्रुओं का अन्त करने वाले चौदह बाण उसने उठा लिए।
श्लोक 43 (8.56.43)
द्विपस्य पादाग्रकरान्स पञ्चभि- । र्नृपस्य बाहू च शिरोऽथ च त्रिभिः । जघान षड्भिः षडृतूपमत्विषः । स पाण्ड्यराजानुचरान्महारथान् ॥
dvipasya pādāgrakarānsa pañcabhi- | rnṛpasya bāhū ca śiro'tha ca tribhiḥ | jaghāna ṣaḍbhiḥ ṣaḍṛtūpamatviṣaḥ | sa pāṇḍyarājānucarānmahārathān
पाँच बाणों से उसने हाथी के पैरों और सूँड़ को, तीन से राजा की दोनों भुजाओं और सिर को, और छः से छहों ऋतुओं के समान तेजस्वी पाण्ड्यराज के अनुचर महारथियों को मारा।
श्लोक 44 (8.56.44)
सुदीर्घवृत्तौ वरचन्दनोक्षितौ । सुवर्णमुक्तामणिवज्रभूषणौ । भुजौ धरायां पतितौ नृपस्य तौ । विचेष्टतुस्तार्क्ष्यहताविवोरगौ ॥
sudīrghavṛttau varacandanokṣitau | suvarṇamuktāmaṇivajrabhūṣaṇau | bhujau dharāyāṃ patitau nṛpasya tau | viceṣṭatustārkṣyahatāvivoragau
राजा की वे दोनों भुजाएँ, लम्बी और गोल, उत्तम चन्दन से लिपी, सोने, मोती, मणि और हीरों से सजी, पृथ्वी पर गिरीं और गरुड़ के मारे हुए दो सर्पों की भाँति तड़पती रहीं।
श्लोक 45 (8.56.45)
शिरश्च तत्पूर्णशशिप्रभाननं । सरोषताम्रायतनेत्रमुन्नसम् । क्षितावपि भ्राजति तत्सकुण्डलं । विशाखयोर्मध्यगतः शशी यथा ॥
śiraśca tatpūrṇaśaśiprabhānanaṃ | saroṣatāmrāyatanetramunnasam | kṣitāvapi bhrājati tatsakuṇḍalaṃ | viśākhayormadhyagataḥ śaśī yathā
और उसका सिर, जिसका मुख पूर्ण चन्द्र के समान दीप्त था, लम्बी आँखें क्रोध से ताँबे-सी लाल थीं और नाक ऊँची थी, कुण्डलों सहित भूमि पर पड़ा हुआ भी दोनों विशाखा तारों के बीच स्थित चन्द्रमा के समान शोभित हुआ।
श्लोक 46 (8.56.46)
स तु द्विपः पञ्चभिरुत्तमेषुभिः । कृतः षडंशश्चतुरो नृपस्त्रिभिः । कृतो दशांशः कुशलेन युध्यता । यथा हविस्तद्दश दैवतं तथा ॥
sa tu dvipaḥ pañcabhiruttameṣubhiḥ | kṛtaḥ ṣaḍaṃśaścaturo nṛpastribhiḥ | kṛto daśāṃśaḥ kuśalena yudhyatā | yathā havistaddaśa daivataṃ tathā
उस हाथी को पाँच उत्तम बाणों से छः भागों में, और राजा को तीन बाणों से चार भागों में काटा गया; इस प्रकार कुशल योद्धा ने कुल दस भाग कर दिए, जैसे दस देवताओं के लिए बना हविष्य दस भागों में बाँटा जाता है।
श्लोक 47 (8.56.47)
स पादशो राक्षसभोजनान्बहून् । प्रदाय पाण्ड्योऽश्वमनुष्यकुञ्जरान् । स्वधामिवाप्य ज्वलनः पितृप्रिय- । स्ततः प्रशान्तः सलिलप्रवाहतः ॥
sa pādaśo rākṣasabhojanānbahūn | pradāya pāṇḍyo'śvamanuṣyakuñjarān | svadhāmivāpya jvalanaḥ pitṛpriya- | stataḥ praśāntaḥ salilapravāhataḥ
पाण्ड्य ने पहले टुकड़े-टुकड़े करके बहुत-से घोड़े, मनुष्य और हाथी राक्षसों के भोजन के रूप में दिए, और फिर वह शान्त हो गया, जैसे स्वधा पाकर पितरों को प्रिय अग्नि जल के प्रवाह से बुझ जाती है।
श्लोक 48 (8.56.48)
समाप्तविद्यं तु गुरोः सुतं नृपः । समाप्तकर्माणमुपेत्य ते सुतः । सुहृद्वृतोऽत्यर्थमपूजयन्मुदा । जिते बलौ विष्णुमिवामरेश्वरः ॥
samāptavidyaṃ tu guroḥ sutaṃ nṛpaḥ | samāptakarmāṇamupetya te sutaḥ | suhṛdvṛto'tyarthamapūjayanmudā | jite balau viṣṇumivāmareśvaraḥ
तब आपके पुत्र राजा ने मित्रों से घिरे हुए, पूर्ण विद्या वाले और कार्य पूरा कर चुके आचार्यपुत्र के पास जाकर हर्ष से उसका बड़ा सम्मान किया, जैसे बलि के जीते जाने पर देवराज इन्द्र ने विष्णु का सम्मान किया था।