कर्ण पर्व · अध्याय 57
कर्ण पाण्डवों को रोकता है; अश्वत्थामा धृष्टद्युम्न के सामने
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि पाण्ड्य राजा के गिरने के बाद अर्जुन ने क्या किया। संजय बताते हैं कि कृष्ण अर्जुन को पीछे हटती पाण्डव सेना, कौरवों को सँभालते कर्ण और अश्वत्थामा द्वारा सृञ्जयों के संहार की ओर दिखाते हैं, और अर्जुन रथ आगे बढ़ाने को कहते हैं। धृष्टद्युम्न और पाण्डव कर्ण पर टूट पड़ते हैं; कर्ण अकेला उन्हें रोकता है और धृष्टद्युम्न से बाणों का आदान-प्रदान करता है। तब अश्वत्थामा धृष्टद्युम्न पर चढ़ आता है और पिता के वध का बदला लेने के लिए उसे यमलोक भेजने की प्रतिज्ञा करता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (8.57.1)
पाण्ड्ये हते किमकरोदर्जुनो जयतांवरः । एकवीरेण कर्णेन द्राविते च युधिष्ठिरे ॥
pāṇḍye hate kimakarodarjuno jayatāṃvaraḥ | ekavīreṇa karṇena drāvite ca yudhiṣṭhire
पाण्ड्य के मारे जाने पर, और एकमात्र वीर कर्ण द्वारा युधिष्ठिर के खदेड़े जाने पर, विजेताओं में श्रेष्ठ अर्जुन ने क्या किया?
श्लोक 2 (8.57.2)
समाप्तविद्यो बलवान्युक्तो वीरश्च पाण्डवः । सर्वभूतेष्वनुज्ञातः शङ्करेण महात्मना ॥
samāptavidyo balavānyukto vīraśca pāṇḍavaḥ | sarvabhūteṣvanujñātaḥ śaṅkareṇa mahātmanā
पाण्डुपुत्र अर्जुन की शिक्षा पूरी हो चुकी थी। वह बलवान, दृढ़ और शूरवीर था, और महात्मा शंकर ने उसे सब प्राणियों पर अस्त्र चलाने की अनुमति दे रखी थी।
श्लोक 3 (8.57.3)
तस्मान्महद्भयं तीव्रममित्रघ्नाद्धनञ्जयात् । स यत्तत्राकरोत्पार्थस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
tasmānmahadbhayaṃ tīvramamitraghnāddhanañjayāt | sa yattatrākarotpārthastanmamācakṣva sañjaya
शत्रुओं का संहार करने वाले उस धनञ्जय से हमें बड़ा और भीषण भय है। संजय, पार्थ ने वहाँ जो किया, वह मुझे बताओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 4 (8.57.4)
हते पाण्ड्येऽर्जुनं कृष्णस्त्वरन्नाह वचो हितम् । हतं पश्य स्वराजानमपयातांश्च पाण्डवान् ॥
hate pāṇḍye'rjunaṃ kṛṣṇastvarannāha vaco hitam | hataṃ paśya svarājānamapayātāṃśca pāṇḍavān
पाण्ड्य के मारे जाने पर कृष्ण ने शीघ्रता से अर्जुन से हितकर वचन कहे — "देखो, तुम्हारे अपने राजा चोट खाकर गिरे हैं और पाण्डव पीछे हट गए हैं।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 5 (8.57.5)
कर्णं पश्य महारङ्गे ज्वलन्तमिव पावकम् । असौ भीमो महेष्वासः प्रतिवृत्तो रणं प्रति ॥
karṇaṃ paśya mahāraṅge jvalantamiva pāvakam | asau bhīmo maheṣvāsaḥ prativṛtto raṇaṃ prati
"उस विशाल रणभूमि में आग की तरह दहकते कर्ण को देखो। और वह महाधनुर्धर भीम फिर युद्ध की ओर लौट आया है।"
श्लोक 6 (8.57.6)
त इमे नानुवर्तन्ते धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । पाञ्चालाः सृञ्जयाश्चैव पाण्डवानां चमूमुखम् ॥
ta ime nānuvartante dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ | pāñcālāḥ sṛñjayāścaiva pāṇḍavānāṃ camūmukham
"धृष्टद्युम्न को आगे रखने वाले ये पाञ्चाल और सृञ्जय, जो पाण्डवों की सेना का अग्रभाग हैं, पीछे-पीछे नहीं आ रहे हैं।"
श्लोक 7 (8.57.7)
निवृत्तैश्च पुनः पार्थैर्भग्नं शत्रुबलं महत् । कौरवान्द्रवतो ह्येष कर्णो वारयते भृशम् ॥
nivṛttaiśca punaḥ pārthairbhagnaṃ śatrubalaṃ mahat | kauravāndravato hyeṣa karṇo vārayate bhṛśam
"पार्थ फिर लौट आए हैं और शत्रु की विशाल सेना टूट गई है; और यह कर्ण भागते हुए कौरवों को बड़े यत्न से रोक रहा है।"
श्लोक 8 (8.57.8)
अन्तकप्रतिमो वेगे शक्रतुल्यपराक्रमः । असौ गच्छति कौन्तेय द्रौणिः शस्त्रभृतां वरः ॥
antakapratimo vege śakratulyaparākramaḥ | asau gacchati kaunteya drauṇiḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ
"वेग में यमराज के समान और पराक्रम में इन्द्र के तुल्य — वह देखो, हे कुन्तीपुत्र, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रोणपुत्र जा रहा है।"
श्लोक 9 (8.57.9)
तमेष प्रद्रुतः सङ्ख्ये धृष्टद्युम्नो महारथः । अश्वत्थाम्ना हताः सङ्ख्ये सर्वे कौन्तेय सृञ्जयाः ॥
tameṣa pradrutaḥ saṅkhye dhṛṣṭadyumno mahārathaḥ | aśvatthāmnā hatāḥ saṅkhye sarve kaunteya sṛñjayāḥ
"और महारथी धृष्टद्युम्न युद्ध में उसके पीछे दौड़ पड़ा है। हे कुन्तीपुत्र, सारे सृञ्जय रण में अश्वत्थामा के हाथों मारे गए हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 10 (8.57.10)
रथाश्वनरनागानां कृतं च कदनं महत् । इत्येतत्सर्वमाचष्ट वासुदेवः किरीटिने ॥
rathāśvanaranāgānāṃ kṛtaṃ ca kadanaṃ mahat | ityetatsarvamācaṣṭa vāsudevaḥ kirīṭine
"और रथों, घोड़ों, मनुष्यों और हाथियों का भारी संहार हुआ है।" यह सब वासुदेव ने किरीटधारी अर्जुन को बताया।
श्लोक 11 (8.57.11)
एतच्छ्रुत्वा च दृष्ट्वा च भ्रातृणां व्यसनं महत् । वाहयाश्वान्हृषीकेश क्षिप्रमित्याह पाण्डवः ॥
etacchrutvā ca dṛṣṭvā ca bhrātṛṇāṃ vyasanaṃ mahat | vāhayāśvānhṛṣīkeśa kṣipramityāha pāṇḍavaḥ
यह सुनकर और अपने भाइयों पर आई भारी विपत्ति देखकर पाण्डुपुत्र अर्जुन ने कहा — "हृषीकेश, घोड़ों को शीघ्र हाँको!"
श्लोक 12 (8.57.12)
ततः प्रायाद्धृषीकेशो रथेनाप्रतिमो युधि । ततो रेणुः समभवत्पुनस्तत्र महारणे ॥
tataḥ prāyāddhṛṣīkeśo rathenāpratimo yudhi | tato reṇuḥ samabhavatpunastatra mahāraṇe
तब युद्ध में अप्रतिम हृषीकेश रथ से आगे बढ़े, और उस महासमर में फिर धूल उठने लगी।
श्लोक 13 (8.57.13)
ततो राजन्महानासीत्सङ्गामो रोमहर्षणः । सिंहनादरवाश्चात्र प्रादुरासन्समागमे । उभयोः सेनयो राजन्मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥
tato rājanmahānāsītsaṅgāmo romaharṣaṇaḥ | siṃhanādaravāścātra prādurāsansamāgame | ubhayoḥ senayo rājanmṛtyuṃ kṛtvā nivartanam
तब, हे राजन्, रोमांच खड़े कर देने वाला विकराल संग्राम छिड़ गया; उस मुठभेड़ में सिंहनाद गूँजने लगे, और दोनों सेनाओं ने, हे राजन्, मृत्यु को ही लौटने का एकमात्र मार्ग ठान लिया।
श्लोक 14 (8.57.14)
ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुसृञ्जयाः । युधिष्ठिरमुखाः पार्था वैकर्तनमुखा वयम् ॥
tataḥ punaḥ samājagmurabhītāḥ kurusṛñjayāḥ | yudhiṣṭhiramukhāḥ pārthā vaikartanamukhā vayam
तब कुरु और सृञ्जय निर्भय होकर फिर आमने-सामने आ जुटे — पार्थ युधिष्ठिर के नेतृत्व में और हम कर्ण के नेतृत्व में।
श्लोक 15 (8.57.15)
ततः प्रववृते युद्धं घोररूपं विशाम्पते । कर्णस्य पाण्डवानां च यमराष्ट्रविवर्धनम् ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṃ ghorarūpaṃ viśāmpate | karṇasya pāṇḍavānāṃ ca yamarāṣṭravivardhanam
तब, हे प्रजापालक, कर्ण और पाण्डवों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया, जिससे यमराज का राज्य बढ़ने लगा।
श्लोक 16 (8.57.16)
तस्मिन्प्रवृत्ते सङ्ग्रामे तुमुले रोमहर्षणे । संशप्तकेषु वीरेषु किञ्चिच्छेषेषु भारत ॥
tasminpravṛtte saṅgrāme tumule romaharṣaṇe | saṃśaptakeṣu vīreṣu kiñciccheṣeṣu bhārata
हे भारत, जब वह तुमुल, रोमांचकारी युद्ध छिड़ा और संशप्तक वीरों में थोड़े ही बचे रह गए,
श्लोक 17 (8.57.17)
धृष्टद्युम्नो महाराज सहितः सर्वराजभिः । कर्णमेवाभिदुद्राव पाण्डवाश्च महारथाः ॥
dhṛṣṭadyumno mahārāja sahitaḥ sarvarājabhiḥ | karṇamevābhidudrāva pāṇḍavāśca mahārathāḥ
तब हे महाराज, सब राजाओं के साथ धृष्टद्युम्न और महारथी पाण्डव कर्ण पर टूट पड़े।
श्लोक 18 (8.57.18)
आगच्छमानांस्तान्दृष्ट्वा सङ्ग्रामे विजयैषिणः । दधारैको रणे कर्णो जलौघानिव पर्वतः ॥
āgacchamānāṃstāndṛṣṭvā saṅgrāme vijayaiṣiṇaḥ | dadhāraiko raṇe karṇo jalaughāniva parvataḥ
विजय की इच्छा से आते हुए उन्हें देखकर अकेले कर्ण ने उन्हें रणभूमि में उसी तरह रोक लिया जैसे पर्वत जल की धाराओं को रोक लेता है।
श्लोक 19 (8.57.19)
समासाद्य तु ते कर्णं व्यशीर्यन्त महारथाः । यथाऽचलं समासाद्य वार्योघाः सर्वतोदिशम् ॥
samāsādya tu te karṇaṃ vyaśīryanta mahārathāḥ | yathā'calaṃ samāsādya vāryoghāḥ sarvatodiśam
कर्ण के सामने पहुँचकर वे महारथी बिखर गए, जैसे पर्वत से टकराकर जल की धाराएँ चारों ओर बिखर जाती हैं।
श्लोक 20 (8.57.20)
तयोरासीन्महाराज सङ्ग्रामो घोरदर्शनः । प्रवृद्धयोर्महारङ्गे बलिनोर्विजिगीषतोः ॥
tayorāsīnmahārāja saṅgrāmo ghoradarśanaḥ | pravṛddhayormahāraṅge balinorvijigīṣatoḥ
तब, हे महाराज, उन दोनों के बीच — जो उस महारणभूमि में उग्र, बलवान और विजय के अभिलाषी हो उठे थे — भयंकर संग्राम हुआ।
श्लोक 21 (8.57.21)
धृष्टद्युम्नस्तु राधेयं शरेणानतपर्वणा । छादयामास सङ्क्रुद्धस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
dhṛṣṭadyumnastu rādheyaṃ śareṇānataparvaṇā | chādayāmāsa saṅkruddhastiṣṭhatiṣṭheti cābravīt
क्रोध में भरे धृष्टद्युम्न ने चिकने जोड़ वाले बाण से राधापुत्र को ढक दिया और कहा — "ठहर, ठहर!"
श्लोक 22 (8.57.22)
विजयं तु धनुः श्रेष्ठं विधृन्वानो महारथः । पार्षतस्य धनुश्छित्त्वा शरांश्चाशीविषोपमान् ॥
vijayaṃ tu dhanuḥ śreṣṭhaṃ vidhṛnvāno mahārathaḥ | pārṣatasya dhanuśchittvā śarāṃścāśīviṣopamān
महारथी कर्ण ने अपने श्रेष्ठ धनुष विजय की टंकार करते हुए पार्षत का धनुष काट डाला और विषधर सर्पों के समान बाण छोड़े।
श्लोक 23 (8.57.23)
ववर्ष शरवर्षाणि तोयवर्षानिवाम्बुदः । छादयामास सङ्क्रुद्धः पार्षतं नवभिः शरैः ॥
vavarṣa śaravarṣāṇi toyavarṣānivāmbudaḥ | chādayāmāsa saṅkruddhaḥ pārṣataṃ navabhiḥ śaraiḥ
उसने मेघ के जल बरसाने की तरह बाणों की वर्षा की और क्रुद्ध होकर नौ बाणों से पार्षत को ढक दिया।
श्लोक 24 (8.57.24)
ते हेमविकृतं वर्म भित्त्वा तस्य महात्मनः । शोणिताक्ता व्यराजन्त शक्रगोपा इवानघ ॥
te hemavikṛtaṃ varma bhittvā tasya mahātmanaḥ | śoṇitāktā vyarājanta śakragopā ivānagha
उस महात्मा के सोने से जड़े कवच को भेदकर लहू से सने वे बाण, हे निष्पाप, इन्द्रगोप कीड़ों की तरह लाल चमक उठे।
श्लोक 25 (8.57.25)
तदपास्य धनुश्छिन्नं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् । ततोऽन्यद्धनुरादाय सारवद्भारसाधनम् । कर्णं विव्याध सप्तत्या शरैः सन्नतपर्वभिः ॥
tadapāsya dhanuśchinnaṃ dhṛṣṭadyumnaḥ pratāpavān | tato'nyaddhanurādāya sāravadbhārasādhanam | karṇaṃ vivyādha saptatyā śaraiḥ sannataparvabhiḥ
टूटे धनुष को फेंककर प्रतापी धृष्टद्युम्न ने दूसरा दृढ़ धनुष लिया, जो भार सह सकता था, और चिकने जोड़ वाले सत्तर बाणों से कर्ण को बींध दिया।
श्लोक 26 (8.57.26)
तथैव राजन्कर्णोऽपि पार्षतं शत्रुतापनम् । द्रोणशत्रुं महेष्वासो विव्याध निशितैः शरैः ॥
tathaiva rājankarṇo'pi pārṣataṃ śatrutāpanam | droṇaśatruṃ maheṣvāso vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ
उसी प्रकार, हे राजन्, महाधनुर्धर कर्ण ने भी शत्रुओं को तपाने वाले, द्रोण के शत्रु पार्षत को तीखे बाणों से बींध दिया।
श्लोक 27 (8.57.27)
पुनरन्यं महाराज शरं कनकभूषणम् । प्रेषयामास समरे मृत्युदण्डमिवापरम् ॥
punaranyaṃ mahārāja śaraṃ kanakabhūṣaṇam | preṣayāmāsa samare mṛtyudaṇḍamivāparam
हे महाराज, उसने फिर युद्ध में सोने से सजा एक और बाण छोड़ा, मानो यमराज का दूसरा दण्ड हो।
श्लोक 28 (8.57.28)
तमापतन्तं सहसा घोररूपं विशाम्पते । चिच्छेद शतधा राजन्पार्षतः कृतहस्तवत् ॥
tamāpatantaṃ sahasā ghorarūpaṃ viśāmpate | ciccheda śatadhā rājanpārṣataḥ kṛtahastavat
भयंकर रूप वाले उस बाण को अचानक अपनी ओर आते देख, हे प्रजापालक, अभ्यस्त हाथ वाले पार्षत ने उसके सौ टुकड़े कर डाले।
श्लोक 29 (8.57.29)
दृष्टवान्पतितं भूमौ शरं कर्णो विशाम्पते ॥
dṛṣṭavānpatitaṃ bhūmau śaraṃ karṇo viśāmpate
हे प्रजापालक, कर्ण ने उस बाण को भूमि पर गिरा देखा।
श्लोक 30 (8.57.30)
पार्षतः शरवर्षेण समन्तात्पर्यवारयत् । विव्याध चैनं त्वरितो नाराचैः सप्तभिस्तदा ॥
pārṣataḥ śaravarṣeṇa samantātparyavārayat | vivyādha cainaṃ tvarito nārācaiḥ saptabhistadā
पार्षत ने बाणों की वर्षा से उसे चारों ओर से घेर लिया और फुर्ती से सात नाराचों से उसे बींध दिया।
श्लोक 31 (8.57.31)
तं प्रत्यविध्यद्दशभिः शरैर्हेमविभूषितैः । तयोर्युद्धं समभवद्दृष्टिश्रोत्रमनोहरम् ॥
taṃ pratyavidhyaddaśabhiḥ śarairhemavibhūṣitaiḥ | tayoryuddhaṃ samabhavaddṛṣṭiśrotramanoharam
कर्ण ने बदले में सोने से सजे दस बाणों से उसे बींधा, और उन दोनों का युद्ध आँखों और कानों को मोह लेने वाला हो उठा।
श्लोक 32 (8.57.32)
आसीद्धोरं च चित्रं च प्रेक्षणीयं च सर्वशः ॥
āsīddhoraṃ ca citraṃ ca prekṣaṇīyaṃ ca sarvaśaḥ
वह युद्ध भयंकर भी था और अद्भुत भी, और हर ओर से देखने योग्य था।
श्लोक 33 (8.57.33)
सर्वेषां तत्र भूतानां रोमहर्षो व्यजायत । दृष्ट्वा तत्समरे कर्म कर्णपार्षतयोर्नृप ॥
sarveṣāṃ tatra bhūtānāṃ romaharṣo vyajāyata | dṛṣṭvā tatsamare karma karṇapārṣatayornṛpa
हे राजन्, रणभूमि में कर्ण और पार्षत का वह पराक्रम देखकर वहाँ के सभी प्राणियों के रोंगटे खड़े हो गए।
श्लोक 34 (8.57.34)
एतस्मिन्नन्तरे द्रौणिरभ्ययात्तं महारथम् । पार्षतं शत्रुदमनं शत्रुवीर्यासुनाशनम् ॥
etasminnantare drauṇirabhyayāttaṃ mahāratham | pārṣataṃ śatrudamanaṃ śatruvīryāsunāśanam
इसी बीच द्रोणपुत्र उस महारथी पार्षत के पास जा पहुँचा, जो शत्रुओं का दमन करने वाला और उनके बल तथा प्राण का नाश करने वाला था।
श्लोक 35 (8.57.35)
स दृष्ट्वा समरे यान्तमभीतं च महारथम् । अभ्यभाषत सङ्क्रुद्धः पार्षतं शत्रुतापनम् ॥
sa dṛṣṭvā samare yāntamabhītaṃ ca mahāratham | abhyabhāṣata saṅkruddhaḥ pārṣataṃ śatrutāpanam
उस निर्भय महारथी को रणभूमि में आता देखकर उसने क्रोध में भरकर शत्रुओं को तपाने वाले पार्षत से कहा।
श्लोक 36 (8.57.36)
रथं रथेन सम्पीड्य पार्षतस्य तु ब्राह्मणः ॥
rathaṃ rathena sampīḍya pārṣatasya tu brāhmaṇaḥ
उस ब्राह्मण ने अपने रथ से पार्षत के रथ को कसकर दबा लिया।
श्लोक 37 (8.57.37)
तिष्ठतिष्ठेति ब्रह्मघ्न न मे जीवन्विमोक्ष्यसे । इत्युक्त्वा सुभृशं वीरः शीघ्रकृन्निशितैः शरैः । छादयामास समरे यतमानो महारथः ॥
tiṣṭhatiṣṭheti brahmaghna na me jīvanvimokṣyase | ityuktvā subhṛśaṃ vīraḥ śīghrakṛnniśitaiḥ śaraiḥ | chādayāmāsa samare yatamāno mahārathaḥ
"ठहर, ठहर, ब्राह्मण के हत्यारे! तू मुझसे जीवित नहीं बच पाएगा!" यह कहकर शीघ्रता से हाथ चलाने वाले उस वीर ने रणभूमि में पूरा यत्न करके तीखे बाणों से उसे ढक दिया।
श्लोक 38 (8.57.38)
यत्नतः परया शक्त्या धृष्टद्युम्नं महारथम् । योधयामास समरे क्रुद्धरूपो विशाम्पते ॥
yatnataḥ parayā śaktyā dhṛṣṭadyumnaṃ mahāratham | yodhayāmāsa samare kruddharūpo viśāmpate
पूरी शक्ति और पूरे यत्न से, क्रोध भरे रूप में, हे प्रजापालक, उसने रण में महारथी धृष्टद्युम्न से युद्ध किया।
श्लोक 39 (8.57.39)
तयोस्तु सन्निपाते हि घोररूपो विशाम्पते ॥
tayostu sannipāte hi ghorarūpo viśāmpate
हे प्रजापालक, जब वे दोनों भिड़े तो उस मुठभेड़ ने भयंकर रूप धारण कर लिया।
श्लोक 40 (8.57.40)
यथा हि समरे द्रौणिः पार्षतं वीक्ष्य मारिष । नातिहृष्टमना ह्यासीन्मन्वानो मृत्युमात्मनः ॥
yathā hi samare drauṇiḥ pārṣataṃ vīkṣya māriṣa | nātihṛṣṭamanā hyāsīnmanvāno mṛtyumātmanaḥ
हे मान्यवर, रणभूमि में जब द्रोणपुत्र ने पार्षत को देखा, तब पार्षत का मन बहुत प्रसन्न नहीं रहा; वह इसे अपनी मृत्यु ही मान रहा था।
श्लोक 41 (8.57.41)
स ज्ञात्वा पितुरत्यन्तवैरिणं तु महाहवे । आत्मानं समरे ज्ञात्वाऽशस्त्रवध्यं महाबलः । जवेनाभिययौ द्रौणिं कालः कालक्षये यथा ॥
sa jñātvā pituratyantavairiṇaṃ tu mahāhave | ātmānaṃ samare jñātvā'śastravadhyaṃ mahābalaḥ | javenābhiyayau drauṇiṃ kālaḥ kālakṣaye yathā
उस घोर युद्ध में उसे अपने पिता का भीषण शत्रु जानकर, और यह जानकर कि वह स्वयं शस्त्र से नहीं मारा जा सकता, उस महाबली ने प्रलयकाल में काल की तरह वेग से द्रोणपुत्र पर धावा बोल दिया।
श्लोक 42 (8.57.42)
द्रौणिस्तु दृष्ट्वा राजेन्द्र धृष्टद्युम्नमवस्थितम् । क्रोधेन निःश्वसन्वीरः पार्षतं समभिद्रवत् ॥
drauṇistu dṛṣṭvā rājendra dhṛṣṭadyumnamavasthitam | krodhena niḥśvasanvīraḥ pārṣataṃ samabhidravat
परन्तु द्रोणपुत्र ने धृष्टद्युम्न को सामने खड़ा देखकर क्रोध से फुफकारते हुए उस वीर पार्षत पर धावा बोल दिया।
श्लोक 43 (8.57.43)
तावन्योन्यं तु दृष्ट्वैव संरम्भं जग्मतुः परम् । प्रगृह्य महती चापे शरासनसमन्विते ॥
tāvanyonyaṃ tu dṛṣṭvaiva saṃrambhaṃ jagmatuḥ param | pragṛhya mahatī cāpe śarāsanasamanvite
एक-दूसरे को देखते ही वे दोनों अत्यन्त क्रोध से भर उठे और दोनों ने अपने-अपने बड़े, सज्जित धनुष उठा लिए।
श्लोक 44 (8.57.44)
अथाब्रवीन्महाराज द्रोणपुत्रः प्रतापवान् । धृष्टद्युम्नं समीपस्थं त्वरमाणो विशाम्पते ॥
athābravīnmahārāja droṇaputraḥ pratāpavān | dhṛṣṭadyumnaṃ samīpasthaṃ tvaramāṇo viśāmpate
तब, हे महाराज, प्रतापी द्रोणपुत्र ने जल्दी में अपने पास खड़े धृष्टद्युम्न से कहा —
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 45 (8.57.45)
पाञ्चालापसदाद्य त्वां प्रेषयामि यमक्षयम् । पापं हि यत्त्वया कर्म कृतं तातं घ्नता रणे ॥
pāñcālāpasadādya tvāṃ preṣayāmi yamakṣayam | pāpaṃ hi yattvayā karma kṛtaṃ tātaṃ ghnatā raṇe
"नीच पाञ्चाल! आज मैं तुझे यमलोक भेजता हूँ, क्योंकि तूने रण में मेरे पिता को मारकर जो पाप किया है!"
श्लोक 46 (8.57.46)
अद्य त्वं प्राप्स्यसे तद्वै यथा ह्यकुशलस्तथा । अरक्ष्यमाणः पार्थेन यदि तिष्ठसि संयुगे । नापक्रामसि वा मोहात्सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
adya tvaṃ prāpsyase tadvai yathā hyakuśalastathā | arakṣyamāṇaḥ pārthena yadi tiṣṭhasi saṃyuge | nāpakrāmasi vā mohātsatyametadbravīmi te
"आज तू उस कर्म का फल पाएगा, जैसा तुझ जैसे दुष्कर्मी को मिलना चाहिए। यदि तू पार्थ के संरक्षण के बिना रणभूमि में डटा रहेगा और मूर्खतावश भागेगा नहीं, तो मैं तुझसे यह सत्य कहता हूँ।"