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कर्ण पर्व · अध्याय 58

अर्जुन अश्वत्थामा से धृष्टद्युम्न की रक्षा करता है

धृष्टद्युम्न अश्वत्थामा की धमकी का उत्तर देता है और उसे घायल करता है। अश्वत्थामा धृष्टद्युम्न का धनुष, घोड़े, सारथि और रथ नष्ट कर देता है, उसकी तलवार काट डालता है और अपनी तलवार लेकर उस पर झपटता है। कृष्ण अर्जुन से उसे बचाने को कहते हैं; अर्जुन के बाण अश्वत्थामा को पीछे धकेलते हैं, फिर एक नाराच उसे मूर्च्छित कर देता है और उसका सारथि उसे रणभूमि से हटा ले जाता है। सहदेव धृष्टद्युम्न को रणक्षेत्र से निकाल ले जाता है; कर्ण अर्जुन को देखकर द्वन्द्व-युद्ध की इच्छा करता है, पर अर्जुन कृष्ण से संशप्तकों की ओर चलने को कहते हैं।

अध्याय 57अध्याय-सूचीअध्याय 59

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (8.58.1)

एवमुक्तः प्रत्युवाच धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् । आशिषं तां प्रवक्तव्यां मामको दास्यते तव ॥

evamuktaḥ pratyuvāca dhṛṣṭadyumnaḥ pratāpavān | āśiṣaṃ tāṃ pravaktavyāṃ māmako dāsyate tava

यह सुनकर प्रतापी धृष्टद्युम्न ने उत्तर दिया — "मेरी तलवार तुझे वह आशीर्वाद देगी जो कहा जाना चाहिए,

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 2 (8.58.2)

येनैव ते पितुर्दत्ता यतमानस्य संयुगे । एष ते प्रतिवाक्यं वै असिर्दास्यति मामकः । येन कृत्तं तव पितुर्यतमानस्य तच्छिरः ॥

yenaiva te piturdattā yatamānasya saṃyuge | eṣa te prativākyaṃ vai asirdāsyati māmakaḥ | yena kṛttaṃ tava pituryatamānasya tacchiraḥ

वही जो युद्ध में यत्न करते हुए तेरे पिता को दिया गया था। मेरी यही तलवार तुझे उत्तर देगी — वही तलवार जिसने यत्न करते हुए तेरे पिता का सिर काट डाला था।"

श्लोक 3 (8.58.3)

यदि तावन्मया द्रोणो निहतो ब्राह्मणब्रुवः । त्वामिदानीं कथं युद्धे न हनिष्यामि किल्बिषम् ॥

yadi tāvanmayā droṇo nihato brāhmaṇabruvaḥ | tvāmidānīṃ kathaṃ yuddhe na haniṣyāmi kilbiṣam

"यदि मैंने नाम के ब्राह्मण द्रोण को मार डाला, तो पापी, अब तुझे युद्ध में अपने पराक्रम से क्यों न मारूँगा?"

सञ्जय उवाच

श्लोक 4 (8.58.4)

एवमुक्त्वा महातेजाः सेनापतिररिन्दमः । सुतीक्ष्णेनाथ भल्लेन द्रौणिं विव्याध पार्षतः ॥

evamuktvā mahātejāḥ senāpatirarindamaḥ | sutīkṣṇenātha bhallena drauṇiṃ vivyādha pārṣataḥ

ऐसा कहकर शत्रुओं का दमन करने वाले महातेजस्वी सेनापति पार्षत ने अत्यन्त तीखे भल्ल से द्रोणपुत्र को बींध दिया।

श्लोक 5 (8.58.5)

ततो द्रौणिः सुसङ्क्रुद्धः शरैः सन्नतपर्वभिः । आच्छादयद्दिशो राजन्धृष्टद्युम्नस्य संयुगे ॥

tato drauṇiḥ susaṅkruddhaḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ | ācchādayaddiśo rājandhṛṣṭadyumnasya saṃyuge

तब द्रोणपुत्र ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर, हे राजन्, चिकने जोड़ वाले बाणों से युद्ध में धृष्टद्युम्न के चारों ओर की दिशाएँ ढक दीं।

श्लोक 6 (8.58.6)

नैवान्तरिक्षं न दिशो नापि योधाः सहस्रशः । दृश्यन्ते वै महाराज शरैश्छन्नाः समन्ततः । एकः सन्वारयामास प्रेक्षणीयः समन्ततः ॥

naivāntarikṣaṃ na diśo nāpi yodhāḥ sahasraśaḥ | dṛśyante vai mahārāja śaraiśchannāḥ samantataḥ | ekaḥ sanvārayāmāsa prekṣaṇīyaḥ samantataḥ

हे महाराज, न आकाश दिखाई देता था, न दिशाएँ, न हज़ारों योद्धा — सब कुछ चारों ओर बाणों से ढका था; और एक अकेला वीर, जो देखने योग्य था, सबको चारों ओर से रोके हुए था।

श्लोक 7 (8.58.7)

तथैव पार्षतो राजन्द्रौणिमाहवशोभिनम् । शरैः सञ्छादयामास सूतपुत्रस्य पश्यतः ॥

tathaiva pārṣato rājandrauṇimāhavaśobhinam | śaraiḥ sañchādayāmāsa sūtaputrasya paśyataḥ

उसी प्रकार, हे राजन्, पार्षत ने रणभूमि की शोभा द्रोणपुत्र को बाणों से ढक दिया, और सूतपुत्र कर्ण देखता रहा।

श्लोक 8 (8.58.8)

राधेयोऽपि महाराज पाञ्चालान्सह पाण्डवैः । द्रौपदेया युधामन्युमुत्तमौजसमेव च ॥

rādheyo'pi mahārāja pāñcālānsaha pāṇḍavaiḥ | draupadeyā yudhāmanyumuttamaujasameva ca

और राधापुत्र कर्ण, हे महाराज, पाण्डवों सहित पाञ्चालों, द्रौपदी के पुत्रों, युधामन्यु और उत्तमौजा का सामना कर रहा था,

श्लोक 9 (8.58.9)

सात्यकिश्च महाराज योधांश्चान्यान्सहस्रशः । एकस्तान्वारयामास प्रेक्षणीयः समन्ततः ॥

sātyakiśca mahārāja yodhāṃścānyānsahasraśaḥ | ekastānvārayāmāsa prekṣaṇīyaḥ samantataḥ

और सात्यकि का, हे महाराज, तथा हज़ारों अन्य योद्धाओं का भी; इन सबको उसने अकेले ही रोक रखा था, और वह चारों ओर से देखने योग्य था।

श्लोक 10 (8.58.10)

धृष्टद्युम्नस्तु समरे द्रौणेश्चिच्छेद कार्मुकम् । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन पश्यतां सर्वयोधिनाम् ॥

dhṛṣṭadyumnastu samare drauṇeściccheda kārmukam | kṣurapreṇa sutīkṣṇena paśyatāṃ sarvayodhinām

सब योद्धाओं के देखते-देखते धृष्टद्युम्न ने युद्ध में अत्यन्त तीखे क्षुरप्र से द्रोणपुत्र का धनुष काट डाला।

श्लोक 11 (8.58.11)

तदपास्य धनुश्छिन्नमन्यदादत्त कार्मुकम् । वेगवत्समरे घोरं शरांश्चाशीविषोपमान् ॥

tadapāsya dhanuśchinnamanyadādatta kārmukam | vegavatsamare ghoraṃ śarāṃścāśīviṣopamān

कटे हुए धनुष को फेंककर द्रोणपुत्र ने दूसरा वेगवान और भयंकर धनुष उठाया, और विषधर सर्पों के समान बाण लिए।

श्लोक 12 (8.58.12)

स पार्षतस्य राजेन्द्र धनुः शक्तिं गदां ध्वजम् । हयान्सूतं रथं चैव निमेषाद्व्यधमच्छरैः ॥

sa pārṣatasya rājendra dhanuḥ śaktiṃ gadāṃ dhvajam | hayānsūtaṃ rathaṃ caiva nimeṣādvyadhamaccharaiḥ

हे राजाधिराज, उसने पलक झपकते ही बाणों से पार्षत का धनुष, शक्ति, गदा, ध्वज, घोड़े, सारथि और रथ नष्ट कर डाले।

श्लोक 13 (8.58.13)

स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । खड्गमादत्त विपुलं शतचन्द्रं च भानुमत् ॥

sa cchinnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ | khaḍgamādatta vipulaṃ śatacandraṃ ca bhānumat

धनुष कट जाने पर, रथहीन, घोड़ों और सारथि के मारे जाने पर, उसने एक विशाल तलवार और सौ चन्द्र-चिह्नों वाली चमकती ढाल उठा ली।

श्लोक 14 (8.58.14)

द्रौणिस्तदपि राजेन्द्र भल्लैः क्षिप्रं महारथः । चिच्छेद समरे वीरः क्षिप्रहस्तो दृढायुधः ॥

drauṇistadapi rājendra bhallaiḥ kṣipraṃ mahārathaḥ | ciccheda samare vīraḥ kṣiprahasto dṛḍhāyudhaḥ

परन्तु हे राजाधिराज, फुर्तीले हाथों और दृढ़ शस्त्र वाले उस महारथी द्रोणपुत्र ने उसे भी रण में भल्लों से शीघ्र काट डाला।

श्लोक 15 (8.58.15)

रथादनवरूढस्य धन्विनो बाहुशालिनः । पश्यतां सर्वसैन्यानां तदद्भुतमिवाभवत् ॥

rathādanavarūḍhasya dhanvino bāhuśālinaḥ | paśyatāṃ sarvasainyānāṃ tadadbhutamivābhavat

रथ से उतरे बिना ही उस बाहुबली धनुर्धर का वह कर्म सब सेनाओं को देखते-देखते अद्भुत-सा लगा।

श्लोक 16 (8.58.16)

धृष्टद्युम्नं तु विरथं हताश्वरथसारथिम् । शस्त्रैश्च बहुधा विद्धमस्त्रैश्च शकलीकृतम् । नातरद्भरतश्रेष्ठ यतमानो महारथः ॥

dhṛṣṭadyumnaṃ tu virathaṃ hatāśvarathasārathim | śastraiśca bahudhā viddhamastraiśca śakalīkṛtam | nātaradbharataśreṣṭha yatamāno mahārathaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, रथहीन धृष्टद्युम्न, जिसके घोड़े, रथ और सारथि मारे जा चुके थे, जो अनेक प्रकार से शस्त्रों से बिंधा था और अस्त्रों से टुकड़े-टुकड़े किया गया था, यत्न करने पर भी उस संकट से पार न पा सका।

श्लोक 17 (8.58.17)

तस्यान्तमिषुभी राजन्यदा द्रौणिर्न गच्छति । अथ त्यक्त्वा रथं वीरः पार्षतं त्वरितोऽन्वगात् । प्रगृह्य विपुलं खड्गं जातरूपपरिष्कृतम् ॥

tasyāntamiṣubhī rājanyadā drauṇirna gacchati | atha tyaktvā rathaṃ vīraḥ pārṣataṃ tvarito'nvagāt | pragṛhya vipulaṃ khaḍgaṃ jātarūpapariṣkṛtam

जब द्रोणपुत्र बाणों से उसका अन्त न कर सका, हे राजन्, तब उस वीर ने रथ छोड़ दिया और सोने से सजी विशाल तलवार लेकर शीघ्रता से पार्षत के पीछे दौड़ा।

श्लोक 18 (8.58.18)

तस्य सम्पततो राजन्वपुरासीन्महात्मनः । गरुडस्येव ततो जिघृक्षोः पन्नगोत्तमम् ॥

tasya sampatato rājanvapurāsīnmahātmanaḥ | garuḍasyeva tato jighṛkṣoḥ pannagottamam

झपटते हुए, हे राजन्, उस महात्मा का रूप ऐसा था जैसे श्रेष्ठ सर्प को पकड़ने की इच्छा से गरुड़ टूट पड़ा हो।

श्लोक 19 (8.58.19)

एतस्मिन्नेव काले तु केशवः परवीरहा । अब्रवीद्भरतश्रेष्ठमर्जुनं जयतां वरम् ॥

etasminneva kāle tu keśavaḥ paravīrahā | abravīdbharataśreṣṭhamarjunaṃ jayatāṃ varam

उसी क्षण शत्रु-वीरों का संहार करने वाले केशव ने भरतश्रेष्ठ, विजेताओं में श्रेष्ठ अर्जुन से कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 20 (8.58.20)

पश्य द्रौणिं पार्षतस्य यतमानं वधं प्रति । यत्नं करोति विपुलं हन्याच्चैनं न संशयः ॥

paśya drauṇiṃ pārṣatasya yatamānaṃ vadhaṃ prati | yatnaṃ karoti vipulaṃ hanyāccainaṃ na saṃśayaḥ

"देखो, द्रोणपुत्र पार्षत का वध करने का यत्न कर रहा है। वह बहुत बड़ा प्रयास कर रहा है और निःसन्देह उसे मार डालेगा!"

श्लोक 21 (8.58.21)

त्रायस्वैनं महाबाहो पार्षतं युद्धदुर्मदम् । द्रौणेरास्यगतं वीर मृत्योरास्यगतं यथा ॥

trāyasvainaṃ mahābāho pārṣataṃ yuddhadurmadam | drauṇerāsyagataṃ vīra mṛtyorāsyagataṃ yathā

"हे महाबाहु, युद्ध के मद में चूर पार्षत को बचाओ, जो मृत्यु के मुख में पड़े मनुष्य की तरह द्रोणपुत्र के मुख में आ गया है, हे वीर!"

सञ्जय उवाच

श्लोक 22 (8.58.22)

एवमुक्त्वा महाराज वासुदेवः प्रतापवान् । प्रैषयत्तुरगान्यत्र द्रौणिर्वीरो व्यवस्थितः ॥

evamuktvā mahārāja vāsudevaḥ pratāpavān | praiṣayatturagānyatra drauṇirvīro vyavasthitaḥ

ऐसा कहकर, हे महाराज, प्रतापी वासुदेव ने घोड़ों को वहाँ हाँक दिया जहाँ वीर द्रोणपुत्र खड़ा था।

श्लोक 23 (8.58.23)

ते हयाश्चन्द्रसङ्काशाः केशवेन प्रचोदिताः । पिबन्त इव चाकाशं जग्मुर्द्रौणेर्महारथम् ॥

te hayāścandrasaṅkāśāḥ keśavena pracoditāḥ | pibanta iva cākāśaṃ jagmurdrauṇermahāratham

केशव की प्रेरणा से चन्द्रमा के समान उजले वे घोड़े मानो आकाश को पीते हुए द्रोणपुत्र के महारथ की ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 24 (8.58.24)

दृष्ट्वा द्रौणिर्महाराज वासुदेवधनंजयौ । धृष्टद्युम्नवधे राजंश्चक्रे यत्नं महाबलः ॥

dṛṣṭvā drauṇirmahārāja vāsudevadhanaṃjayau | dhṛṣṭadyumnavadhe rājaṃścakre yatnaṃ mahābalaḥ

वासुदेव और धनञ्जय को देखकर, हे महाराज, महाबली द्रोणपुत्र ने धृष्टद्युम्न को मारने का प्रयत्न किया।

श्लोक 25 (8.58.25)

विकृष्यमाणं दृष्ट्वैव धृष्टद्युम्नं जनेश्वर । शरांश्चिक्षेप वै पार्थो द्रौणिं प्रति महारथः ॥

vikṛṣyamāṇaṃ dṛṣṭvaiva dhṛṣṭadyumnaṃ janeśvara | śarāṃścikṣepa vai pārtho drauṇiṃ prati mahārathaḥ

धृष्टद्युम्न को घसीटा जाता देखकर, हे नरेश्वर, महारथी पार्थ ने द्रोणपुत्र पर बाण छोड़े।

श्लोक 26 (8.58.26)

ते शरा हेमविकृता गाण्डीवप्रेषिता भृशम् । द्रौणिमासाद्य विविशुर्वल्मीकमिव पन्नगाः ॥

te śarā hemavikṛtā gāṇḍīvapreṣitā bhṛśam | drauṇimāsādya viviśurvalmīkamiva pannagāḥ

गाण्डीव से वेग से छूटे सोने से सजे वे बाण द्रोणपुत्र के शरीर में वैसे ही घुस गए जैसे साँप बाँबी में घुसते हैं।

श्लोक 27 (8.58.27)

विद्धस्तु तैः शरैर्घोरैर्द्रोणपुत्रः प्रतापवान् । उत्सृज्य समरे राजन्पाञ्चालममितौजसम् ॥

viddhastu taiḥ śarairghorairdroṇaputraḥ pratāpavān | utsṛjya samare rājanpāñcālamamitaujasam

उन भयंकर बाणों से बिंधकर प्रतापी द्रोणपुत्र ने, हे राजन्, अपार तेज वाले उस पाञ्चाल को रण में छोड़ दिया,

श्लोक 28 (8.58.28)

आरुरोह रथं वीरो धनञ्जयशरार्दितः । प्रगृह्य च धनुः श्रेष्ठं पार्थं विव्याध सायकैः ॥

āruroha rathaṃ vīro dhanañjayaśarārditaḥ | pragṛhya ca dhanuḥ śreṣṭhaṃ pārthaṃ vivyādha sāyakaiḥ

और धनञ्जय के बाणों से पीड़ित वह वीर रथ पर चढ़ा तथा अपना श्रेष्ठ धनुष लेकर पार्थ को बाणों से बींधने लगा।

श्लोक 29 (8.58.29)

एतस्मिन्नन्तरे शूरः सहदेवो जनाधिप । अपोवाह रथेनाजौ पार्षतं शत्रुतापनम् ॥

etasminnantare śūraḥ sahadevo janādhipa | apovāha rathenājau pārṣataṃ śatrutāpanam

इसी बीच वीर सहदेव, हे प्रजापालक, शत्रुओं को तपाने वाले पार्षत को अपने रथ में बैठाकर रणभूमि से हटा ले गया।

श्लोक 30 (8.58.30)

अर्जुनोऽपि महाराज द्रौणिं विव्याध पत्रिभिः । तं द्रोणपुत्रः संरब्धो बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥

arjuno'pi mahārāja drauṇiṃ vivyādha patribhiḥ | taṃ droṇaputraḥ saṃrabdho bāhvorurasi cārpayat

हे महाराज, अर्जुन ने भी द्रोणपुत्र को बाणों से बींधा, और क्रुद्ध द्रोणपुत्र ने उसकी भुजाओं और छाती में बाण मारे।

श्लोक 31 (8.58.31)

क्रोधितस्तु रणे पार्थो नाराचं कालसन्निभम् । द्रोणपुत्राय चिक्षेप यमदण्डमिवापरम् ॥

krodhitastu raṇe pārtho nārācaṃ kālasannibham | droṇaputrāya cikṣepa yamadaṇḍamivāparam

रण में क्रुद्ध पार्थ ने द्रोणपुत्र पर काल-सा नाराच फेंका, मानो यमराज का दूसरा दण्ड हो।

श्लोक 32 (8.58.32)

स ब्राह्मणस्यांसदेशे निपपात महाद्युतेः । स विह्वलो महाराज शरवेगेन संयुगे । निषसाद रथोपस्थे वैक्लव्यं परमं ययौ ॥

sa brāhmaṇasyāṃsadeśe nipapāta mahādyuteḥ | sa vihvalo mahārāja śaravegena saṃyuge | niṣasāda rathopasthe vaiklavyaṃ paramaṃ yayau

वह उस तेजस्वी ब्राह्मण के कन्धे पर जा गिरा। बाण के वेग से रण में विह्वल होकर, हे महाराज, वह रथ के पिछले भाग में बैठ गया और अत्यन्त मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 33 (8.58.33)

तं तु मत्वा हतं वीरं सारथिः शत्रुकर्शनम् । अपोवाह रथेनाजौ त्वरमाणो रणाजिरात् ॥

taṃ tu matvā hataṃ vīraṃ sārathiḥ śatrukarśanam | apovāha rathenājau tvaramāṇo raṇājirāt

उसे मरा हुआ समझकर उसका सारथि शीघ्रता से शत्रुओं को सताने वाले उस वीर को रथ में लेकर रणभूमि से हटा ले गया।

श्लोक 34 (8.58.34)

अथोद्धृष्टं महाराज पाञ्चालैर्जितकाशिभिः । मोक्षितं पार्षतं दृष्ट्वा द्रोणपुत्रं च पीडितम् ॥

athoddhṛṣṭaṃ mahārāja pāñcālairjitakāśibhiḥ | mokṣitaṃ pārṣataṃ dṛṣṭvā droṇaputraṃ ca pīḍitam

तब विजय के उल्लास में भरे पाञ्चालों ने, हे महाराज, पार्षत को छूटा और द्रोणपुत्र को पीड़ित देखकर बड़ा जयघोष किया।

श्लोक 35 (8.58.35)

वादित्राणि च दिव्यानि प्रावाद्यन्त सहस्रशः । सिंहनादश्च सञ्जज्ञे दृष्ट्वा युद्धं तदद्भुतम् ॥

vāditrāṇi ca divyāni prāvādyanta sahasraśaḥ | siṃhanādaśca sañjajñe dṛṣṭvā yuddhaṃ tadadbhutam

उस अद्भुत युद्ध को देखकर हज़ारों दिव्य वाद्य बज उठे और सिंहनाद होने लगा।

श्लोक 36 (8.58.36)

ततः कर्णो महाराज व्याक्षिपद्विजयं धनुः । दृष्ट्वार्जुनं रणे क्रुद्धः प्रेक्षते च मुहुर्मुहुः । द्वैरथं चापि पार्थेन गन्तुकामो महाद्युतिः ॥

tataḥ karṇo mahārāja vyākṣipadvijayaṃ dhanuḥ | dṛṣṭvārjunaṃ raṇe kruddhaḥ prekṣate ca muhurmuhuḥ | dvairathaṃ cāpi pārthena gantukāmo mahādyutiḥ

तब हे महाराज, कर्ण ने अपने विजय धनुष की टंकार की; रण में अर्जुन को देखकर क्रुद्ध वह बार-बार उसकी ओर ताकने लगा, और उस परम तेजस्वी पार्थ के साथ द्वन्द्व-युद्ध की इच्छा करने लगा।

श्लोक 37 (8.58.37)

एवं कृत्वाऽब्रवीत्पार्थो वासुदेवं धनञ्जयः । याहि संशप्तकान्कृष्ण कार्यमेतत्परं मम ॥

evaṃ kṛtvā'bravītpārtho vāsudevaṃ dhanañjayaḥ | yāhi saṃśaptakānkṛṣṇa kāryametatparaṃ mama

यह करके पार्थ धनञ्जय ने वासुदेव से कहा — "कृष्ण, संशप्तकों की ओर चलो; वही मेरा प्रधान कार्य है।"

श्लोक 38 (8.58.38)

ततः प्रयातो गोविन्दः श्रुत्वा पाण्डवभाषितम् । रथेनातिपताकेन मनोमारुतरंहसा ॥

tataḥ prayāto govindaḥ śrutvā pāṇḍavabhāṣitam | rathenātipatākena manomārutaraṃhasā

तब पाण्डव के वचन सुनकर गोविन्द ऊँची पताका वाले रथ से, मन और वायु के समान वेग से चल पड़े।

श्लोक 39 (8.58.39)

एवमेष क्षयो वृत्तः पृथिव्यां पृथिवीपते । तावकानां परेषां च राजन्दुर्मन्त्रिते तव ॥

evameṣa kṣayo vṛttaḥ pṛthivyāṃ pṛthivīpate | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca rājandurmantrite tava

इस प्रकार, हे पृथ्वीपति, तुम्हारे दुष्ट परामर्श के कारण पृथ्वी पर तुम्हारे और शत्रुओं के लोगों का यह संहार हुआ, हे राजन्।

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